कहनी १३४: सबसे बड़ा और सबसे छोटा 

मत्ती २०:१-१६

चेले जब यीशु को सुन रहे थे, वे उसकी हर बात का विश्वास कर रहे थे। उनकी आशा और भविष्य़ उसकी बातों पर निर्भर करता था। उन्होंने सब कुछ का त्याग कर दिया था क्यूंकि वे उसकी बातों को गम्भीरता से लेते थे! और यीशु ने उन्हें बहुतायत से इनाम देने का वायदा किया है। फिर भी उसमें एक बहुत बड़ा खतरा था। क्या अगर यीशु के लिए उनका बलिदान उनके भीतर फरीसियों के समान घमंड पैदा कर दे? क्या यदि वे अपने आप को दूसरों से अधिक महान समझ कर उन पर अधिकार जमाने लगें? यीशु ने उन्हें एक और दृष्टान्त बताया:

“’स्वर्ग का राज्य एक ज़मींदार के समान है जो सुबह सवेरे अपने अंगूर के बगीचों के लिये मज़दूर लाने को निकला। उसने चाँदी के एक रुपया पर मज़दूर रख कर उन्हें अपने अंगूर के बगीचे में काम करने भेज दिया।

“नौ बजे के आसपास ज़मींदार फिर घर से निकला और उसने देखा कि कुछ लोग बाजार में इधर उधर यूँ ही बेकार खड़े हैं। तब उसने उनसे कहा, ‘तुम भी मेरे अंगूर के बगीचे में जाओ, मैं तुम्हें जो कुछ उचित होगा, दूँगा।’ सो वे भी बगीचे में काम करने चले गये।

“फिर कोई बारह बजे और दुबारा तीन बजे के आसपास, उसने वैसा ही किया। कोई पाँच बजे वह फिर अपने घर से गया और कुछ लोगों को बाज़ार में इधर उधर खड़े देखा। उसने उनसे पूछा, ‘तुम यहाँ दिन भर बेकार ही क्यों खड़े रहते हो?’

“उन्होंने उससे कहा,‘क्योंकि हमें किसी ने मज़दूरी पर नहीं रखा।’

“उसने उनसे कहा,‘तुम भी मेरे अंगूर के बगीचे में चले जाओ।’

“जब साँझ हूई तो अंगूर के बगीचे के मालिक ने अपने प्रधान कर्मचारी को कहा ‘मज़दूरों को बुलाकर अंतिम मज़दूर से शुरू करके जो पहले लगाये गये थे उन तक सब की मज़दूरी चुका दो।’

“सो वे मज़दूर जो पाँच बजे लगाये थे, आये और उनमें से हर किसी को चाँदी का एक रुपया मिला। फिर जो पहले लगाये गये थे, वे आये। उन्होंने सोचा उन्हें कुछ अधिक मिलेगा पर उनमें से भी हर एक को एक ही चाँदी का रुपया मिला रुपया तो उन्होंने ले लिया पर ज़मींदार से शिकायत करते हुए उन्होंने कहा ‘जो बाद में लगे थे, उन्होंने बस एक घंटा काम किया और तूने हमें भी उतना ही दिया जितना उन्हें। जबकि हमने सारे दिन चमचमाती धूप में मेहनत की।’

“उत्तर में उनमें से किसी एक से जमींदार ने कहा, ‘दोस्त, मैंने तेरे साथ कोई अन्याय नहीं किया है। क्या हमने तय नहीं किया था कि मैं तुम्हें चाँदी का एक रुपया दूँगा? जो तेरा बनता है, ले और चला जा। मैं सबसे बाद में रखे गये इस को भी उतनी ही मज़दूरी देना चाहता हूँ जितनी तुझे दे रहा हूँ। क्या मैं अपने धन का जो चाहूँ वह करने का अधिकार नहीं रखता? मैं अच्छा हूँ क्या तू इससे जलता है?’

“इस प्रकार अंतिम पहले हो जायेंगे और पहले अंतिम हो जायेंगे।’”    -मत्ती २०:१-१६

आपको क्या लगता है यीशु इस दृष्टान्त के द्वारा क्या चाह रहे होंगे?  स्मरण कीजिये, वह उन चेलों से बात कर रहा था जो उसके पीछे चलने से इंकार कर रहे थे। वे उन लोगों के सामान थे जिन्हें खेत में काम करने के लिए सबसे पहले चुना गया था। उन पहले कर्मचारियों ने कड़ी धुप में मेहनत की होगी। जैसे वक़्त बीतता जाता होगा, उनकी पीठ और हाथ पैर दर्द के मारे फटे जा रहे होंगे। उनके कपड़े धुल और पसीने से गंदे होते जाते होंगे। शाम होने तक, वे थक कर चूर हो जाते होंगे। उनकी मेहनत कि तस्वीर चेलों कि तरह थी जो वे यीशु को दिखा रहे थे। उन्होंने उसके लिए महान बलिदान देना आरम्भ कर दिया था। उनमें से बहुतों ने उसके नाम के लिए अपनी जान भी दे दी। उनका महान बलिदान परमेश्वर को प्रसन्न आएगा, फिर भी वे उससे कुछ कम नहीं था जो उन्हें उसे देना है। परमेश्वर हमारे जीवन के हर एक हिस्से पर अधिकार रखता है! यीशु हमारे लिए अनंतकाल के लिए उद्धार को लेकर आता है।  हम जितना भी कर लें वह वह उससे बड़ा नहीं हो सकता जो उसने हमारे लिए किया है!

बहुत से आएंगे और अपना विश्वास उस पर रखेंगे। वे उन पुरुषों के सामान हैं जिन्होंने दाख कि बाड़ी में काम किया था। वे कष्ट नहीं उठाएंगे, और उनका काम छोटा और शीग्र होगा। उन्होंने दिन के समाप्त होने तक काम शुरू किया और शीग्र ही समाप्त भी कर दिया। यह सही नहीं है। क्या आप इससे क्रोधित नहीं होंगे?

अब यह स्मरण रखना महत्वपूर्ण है कि यीशु ने अपने चेलों को यह बताया था कि वे बारह सिंहासनों पर बैठेंगे। उनका इनाम बहुत बड़ा होगा। यह याद् रखना बहुत ज़रूरी है कि जिस प्रकार उसके चेले उसकी सेवा बड़े सामर्थी तरीकों से करेंगे, उनका विश्वास और उसके पीछे चलने कि उनकी ताक़त उन्हें परमेश्वर कि ओर से दिया हुआ तोहफा था। उनका सही रवैया हेकड़ी और घमंड नहीं परन्तु एहसानमंद नम्रता से भरा हुआ था। यदि उनके ह्रदय सही थे, तो वे अपने स्वामी के उदारता से देने कि भावना से प्रसन्न होते जो वह दूसरों के लिए बेहद दे रहा था। परमेश्वर के राज्य में तंगदिली और प्रतियोगिता कि कोई जगह नहीं है। परमेश्वर के प्रति और दूसरे लोगों के लिए प्रेम और भक्ति भरे हुए ह्रदय कि सही प्रेरणा का चिन्ह है।

यीशु ने एक बार फिर स्मरण दिलाया कि वे जो पहले हैं वे आखिर हो जाएंगे, और जो आखिर होंगे वे पहले। उसके राज्य में, वे जो सेवा करते हैं वे परमेश्वार कि नज़र में आदर पाते हैं। जब हम अपने आप को उदारता और दयालुता से दिखाते हैं, तब हम परमेश्वर के हाथों में अपने स्वभाविक स्वार्थ को समर्पण करते हैं। हम उसके अच्छाई और महानता पर भरोसा करते हैं, अपने महत्त्व को और उसके प्रेम और सामर्थ कि आशा को ढूंढते हैं। एकबार जब हम अपने स्वयं की अभिलाषाओं और आवश्यकताओं को छोड़ देते हैं, तब हम परमेश्वर के कार्य के लिए मार्ग बनाते हैं। हम सुन सकते हैं और देख भी सकते हैं। परन्तु जब तक हम संघर्ष कर रहे हैं, हम अपने जीवन में उस कार्य को होने से सीमित कर रहे हैं। हम आत्मिक बढ़ोतरी के लिए अपने आप को अंतिम स्थान में पर रख देते हैं।

यीशु ने कहा कि अंत में, हमें इस बात से आश्चर्य होगा कि स्वर्ग में परमेश्वर कि ओर से कौन सबसे अधिक आदर पाएगा। परमेश्वर उन सब बातों को छानेगा जो हमने की हैं, और उन बातों को देखेगा जो एक शुद्ध मन के साथ की गयी हों। वह हमारे अंदर उन सब बातों को देखेगा जो पूरे नम्रता और दया के साथ की गई हों। यही खज़ाना है जो अनंतकाल के लिए रह जाएगा। बहुतेरे जिन्होंने शांतिपूर्वक और विनम्रता पूर्वक स्वर्ग राज्य के लिए परिश्रम किया, वे परमेश्वर  कि प्रशंसा से चमकेंगे। और वे जो परमेश्वर के नाम में परिश्रम करते हैं, परन्तु अपनी महिमा के लिए करते थे, वे परमेश्वर के इनाम को पाने के लिए अंतिम होंगे। हम इस पृथ्वी पर रह कर उस अनुग्रह को विनम्रतापूर्वक ढूंढते रहे ताकि हमें स्वर्ग में उसका महान अजर मिल सके!

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