कहानी १३९: विजयी प्रवेश

मत्ती २६:६-१३, मरकुस १४:३-९, यूहन्ना ११:५५-१२:११

यहूदियों का फ़सह पर्व आने को था। बहुत से लोग अपने गाँवों से यरूशलेम चले गये थे ताकि वे फ़सह पर्व से पहले अपने को पवित्र कर लें। वे यीशु को खोज रहे थे। इसलिये जब वे मन्दिर में खड़े थे तो उन्होंने आपस में एक दूसरे से पूछना शुरू किया,कि आने वाले दिनों में क्या होगा।

महायाजक और फरीसी उन बातों से सचेत थे जो लोग आपस में कह रहे थे। वे अत्यंत क्रोधित हुए! उच्च सलाहकारों के स्थान में वे यह साज़िश कर रहे थे कि वे यीशु को कैसे पकड़वाएंगे। वे जानते थे कि भीड़ के सामने वे उसे नहीं पकड़ सकेंगे। वह बहुत ही प्रसिद्ध था और उत्तर देने में भी बहुत तेज़ था। वह उन्हें चतुरता में मात दे देता था और बातों तो घुमा देता था। वे लोगों के सामने उसके सवालों का उत्तर देने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। उन्हें और कोई रास्ता ढूंढना था जब भीड़ ना हो। एक बार यदि वह गिरफ्तार हो गया और उसका परिक्षण हो गया तब तक बहुत देर हो जाएगी। साधारण लोग उस सच को ग्रहण कर लेंगे और आराधनालय को अनुमति दे देंगे कि यीशु को क्या सज़ा मिले। आदेश दे दिए गए। यदि किसी को मालूम हो कि यीशु कहाँ है तो उन्हें धार्मिल अगुवों को सूचित करना होगा।

इस बीच, यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को रवाना हो गया, जो दाऊद के शहर से कुछ ही मीलों दूर था। यह मरियम, मार्था और लाज़र का शहर था और वहीं लाज़र रहता था जिसे यीशु ने मृतकों में से जीवित किया था। वहाँ यीशु के लिये उन्होंने भोजन तैयार किया। इस कहानी के दिन, वे सब शमौन कोढ़ी के घर पर थे।

लाज़र उनके साथ था। मरियम उसकी बहन ने जटामाँसी से तैयार किया हुआ कोई आधा लीटर बहुमूल्य इत्र ले कर आई। यह शायद मरियम के दहेज़ का था जो उसे अपने पति को विवाह के ख़ज़ाने कि तरह देना था। मरियम ने तो अपना खज़ाना यीशु में पा लिया था। उसने उस बोतल को खोला और उसे उसके सिर पर उँडेल दिया। मरियम ने जटामाँसी से तैयार किया हुआ कोई आधा लीटर बहुमूल्य इत्र यीशु के पैरों पर लगाया और फिर अपने केशों से उसके चरणों को पोंछा।

उसके मधुर विनम्रता को देखिये जो उसने अपने प्रभु के प्रति अपनी भक्ति के साथ दिखाया। वह उस पर अपने सबसे महान तोहफे को उंडेल रही थी।

जब उसके शिष्यों ने यह देखा तो वे क्रोध में भर कर बोले, “इत्र की ऐसी बर्बादी क्यों की गयी? यह इत्र अच्छे दामों में बेचा जा सकता था और फिर उस धन को दीन दुखियों में बाँटा जा सकता था।” इससे आपको मरियम के महान तोहफे के बारे में पता चलता है। एक मज़दूर को पूरे साल के लिए तीन सौ दिनार मिलते हैं। उसने यह बात इसलिये नहीं कही थी कि उसे गरीबों की बहुत चिन्ता थी बल्कि वह तो स्वयं एक चोर था। और रूपयों की थैली उसी के पास रहती थी। उसमें जो डाला जाता उसे वह चुरा लेता था।

चेले यहूदा कि बात पर यकीन कर रहे थे। मरियम इतनी तुच्छ हरकत कैसे कर सकती थी? वे उसे डाटने लगे लेकिन यीशु ने उन्हें रोका। उसने कहा, “‘तुम इस स्त्री को क्यूँ तंग करते हो?'”

“‘उसने तो मेरे लिए एक सुन्दर काम किया है क्योंकि दीन दुःखी तो सदा तुम्हारे पास रहेंगे पर मैं तुम्हारे साथ सदा नहीं रहूँगा। उसने मेरे शरीर पर यह सुगंधित इत्र छिड़क कर मेरे गाड़े जाने की तैयारी की है। मैं तुमसे सच कहता हूँ समस्त संसार में जहाँ कहीं भी सुसमाचार का प्रचार-प्रसार किया जायेगा, वहीं इसकी याद में, जो कुछ इसने किया है, उसकी चर्चा होगी।’”  मत्ती २६:१०-१३ और मरकुस १४:८

कितना दयालू प्रभु है! और सबसे अचंबित बात यह है कि, हम पीछे मुड़ कर देख सकते हैं कि उसकी भविष्यवाणी पूरी हुई है। मरियम कि महान भक्ति के वर्णन तीनो सुसमाचारों में दिए हुए हैं। इसके विषय में पूरे संसार में बता दिया गया है!

यीशु बैतनिय्याह को रवाना हो गया, जहां वह लाज़र के साथ था और जिसे यीशु ने मृतकों में से जीवित किया था।

यीशु और लाज़र को देखने के लिए विशाल भीड़ इकट्ठा हो गयी। जो पर्व के लिए येरूशलेम जा रहे थे  उन्होंने बैतनिय्याह

जाने कि योजना बना ली। जो लाज़र को देखने गए थे उन्होंने यीशु पर विश्वास किया।

जब महायाजक के पास इसकी सूचना पहुँची तो उन्होंने सलाहकारों को बुला लिया। जब वे उस नयी परिस्थिति के विषय में चर्चा कर रहे थे, उन्होंने यह एहसास हुआ कि लाज़र उस महान चमत्कार का जीवित सबूत है। आज तक किसने सुना था कि किसी ने मौत के ऊपर भी अधिकार पाया हो? उनके पास उसे अस्वीकार करने और कोई रास्ता भी नहीं था।

वहाँ बहुत सारे लोग थे जिन्होंने अपनी आँखों से देखा था।

यह बहुत दिलचस्प है कि इससे धार्मिक अगुवे एक पल के लिए भी नहीं रुके। क्या वे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसने एक मृतक को जीवित किया? क्या वे उसके साथ उलझना चाहते थे जिसके पास अकल्पनीय सामर्थ थी? उन्हें यह साबित करने के लिए कि वह मसीहा है वह और क्या कर सकता था? परन्तु धार्मिक अगुवों के अपने ईर्षा के कारण वे समझदार नहीं थे। नहीं, उन्होंने निर्णय लिया। इस यीशु का मरना अवश्य है और साथ में उसके साथी का भी।

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