कहानी १४४: यंत्रणा सप्ताह : तीसरा दिन ( मंगलवार)

मत्ती २१:२३-४६, मरकुस ११:२७-३३, लूका २०:१-१८

Vineyard, San Vicente de la Sonsierra as background, La Rioja

सुबह हो गयी थी, यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को जैतून के पहाड़ पर येरूशलेम के उस पार चला गया। यीशु उन्हें स्वर्गीय पिता के विषय में सिखा रहा था। चेले परमेश्वर के बेटे पर विश्वास करते थे, और इसीलिए उनके परमेश्वर ने इच्छापूर्वक उनकी प्रार्थना को सुना। उसके पास उनके लिए वह सामर्थ थी जिससे वे एक क्षण में एक पेड़ को सुख सकते थे और पहाड़ को समुन्दर में जाने का आदेश दे सकते थे। जब वह बोलता था, क्या वे जैतून के पहाड़ पर गए? क्या उन्होंने उस मार्ग को ढूँढा जो महासागर को जाता है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर उनके साथ था, जो अपने सेवकों कि प्रार्थनाओं को सुनने को तैयार था। आशा रखनी कि एक बहुत बड़ी वजह थी। और फिर भी उन्हें दूसरों को क्षमा करने का ह्रदय रखना था। यीशु मनुष्य के ह्रदय कि बातों को कितने नम्रता पूर्वक निपटता था।

जब वे मंदिर पहुँचे, यीशु ने प्रचार करना शुरू कर दिया। जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रमुख याजक, धर्मशास्त्री और बुजुर्ग यहूदी नेता उसके पास आये। और बोले,“तू इन कार्यों को किस अधिकार से करता है? इन्हें करने का अधिकार तुझे किसने दिया है?”

यह कितना अपमानित है। वे सब के सामने कह रहे थे, “तुम होते कौन हो?” ये लोग देश के प्रभारी थे, इस उग्र को उनके मंदिर के साथ उलझने का क्या अधिकार? वह कौन होता है उनके व्यापार को निकलने का या मंदिर में घुसने का? अपनी चँगाइयों से और शिक्षाओं से मंदिर ओ भ्रष्ट कैसे किया? राष्ट्र के वे अभिषिक्त धार्मिक अगुवे थे। एक बढ़ई को देश कि व्यवस्था के साथ उलझने कि क्या ज़रुरत?

और यदि यीशु के पास अधिकार है, तो वह किसने दिया? उन्हें उसके उत्तर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनकी अपनी मुख्य

इच्छाएं उनके अपने ही स्वार्थ में छुपा हुआ था। वे यीशु को फ़साना चाहते थे। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए उकसाते थे। यीशु ने अपनी सच्चाई से उनके झूठ को दबा दिया।

“मैं तुमसे एक प्रश्न पूछता हूँ, यदि मुझे उत्तर दे दो तो मैं तुम्हें बता दूँगा कि मैं यह कार्य किस अधिकार से करता हूँ। जो बपतिस्मा यूहन्ना दिया करता था, वह उसे स्वर्ग से प्राप्त हुआ था या मनुष्य से? मुझे उत्तर दो!”
मरकुस ११:२७-३३

यीशु ने उन्हें एक प्रस्ताव दिया। यदि वे उसे उत्तर देते हैं, वह उन्हें अपनी असली पेहचान बता देगा। यह बहुत ही मोहक होगा। वे उसके सवाल का जवाब नहीं दे पाये। जब धार्मिक अगुवे उसे उत्तर देने के लिए जमा हुए, उन्होंने कहा:  “यदि हम कहते हैं ‘परमेश्वर से’ तो यह हमसे पूछेगा ‘फिर तुम उस पर विश्वास क्यों नहीं करते?’ किन्तु यदि हम कहते हैं ‘मनुष्य से’ तो हमें लोगों का डर है क्योंकि वे यूहन्ना को एक नबी मानते हैं।” मत्ती २१:२५-२६

एक बार फिर, यीशु ने उनकी ही छलयोजना और धोकेपन में उन्हें फसा दिया। उसने परिस्थिति को घुमा दिया। अचानक, धार्मिक अगुवों को परमेश्वर के नबी को इंकार करने का जवाब देना पड़ा। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने उन्हें सांप के बच्चे कहा था और उन्होंने पश्चाताप करने से इंकार कर दिया और अब वे परमेश्वर के लोगों के साथ भी उसी तरह व्यवहार कर रहे थे। वे परमेश्वर को अपमानित करके  नहीं हो रहे थे बल्कि लोगों को अपमानित करने से डर रहे थे। उनका मुख्य सम्बन्ध उनके अपने पद और अधिकार से था। इसलिये उन्होंने यीशु को उत्तर दिया,“हम नहीं जानते।”

इस पर यीशु ने उनसे कहा,हूँ।”तो फिर मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगा कि मैं ये कार्य किस अधिकार से करता हूँ।
यदि वे यूहन्ना कि सेवकाई को आदर नहीं देते तो वे यीशु कि सच्चाई को भी कभी नहीं जान पाऐंगे, क्योंकि यह दोनों परमेश्वर कि ओर से है।

यीशु ने उन्हे एक और दृष्टान्त बताया जिससे कि सच्च और स्पष्ट हो जाता। पहली कहानी में उसने कहा:
अच्छा बताओ तुम लोग इसके बारे में क्या सोचते हो? एक व्यक्ति के दो पुत्र थे। वह बड़े के पास गया और बोला,‘पुत्र आज मेरे अंगूरों के बगीचे में जा और काम कर।किन्तु पुत्र ने उत्तर दिया, ‘मेरी इच्छा नहीं हैपर बाद में उसका मन बदल गया और वह चला गया। फिर वह पिता दूसरे बेटे के पास गया और उससे भी वैसे ही कहा। उत्तर में बेटे ने कहा, ‘जी हाँ,’ मगर वह गया नहीं।
बताओ इन दोनों में से जो पिता चाहता था, किसने किया?”
लोगों ने कहा कि पहला पुत्र आज्ञाकारी था।

यीशु ने उनसे कहा,
“’मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कर वसूलने वाले और वेश्याएँ परमेश्वर के राज्य में तुमसे पहले जायेंगे।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना तुम्हें जीवन का सही रास्ता दिखाने आया और तुमने उसमें विश्वास नहीं किया। किन्तु कर वसूलने वालों और वेश्याओं ने उसमें विश्वास किया। तुमने जब यह देखा तो भी बाद में न मन फिराया और न ही उस पर विश्वास किया।'”

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यीशु ने क्या कहा? उसने घोषित किया कि व्यभिचार करने वाली और भ्रष्टाचार करने वाले और एक लालची कर चुकाने वाला, ये धार्मिक अगुवों से कहीं अधिक अच्छे थे। वे यह घोषित कर थे कि यीशु को अपनी सेवकाई का प्रमाण देना होगा जबकि यीशु ने सब बातों को उल्टा कर दिया और यह घोषित किया कि उन्हें स्वयं पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। उन्होंने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का आदर नहीं किया था, जिसे परमेश्वर ने यह अधिकार दिया था कि वह देश को सच्चाई बताये। यीशु ने उनकी लज्जा को स्पष्ट कर दिया था। परन्तु यीशु ने यहाँ समाप्त नहीं किया था।

“एक और दृष्टान्त सुनो: एक ज़मींदार था। उसने अंगूरों का एक बगीचा लगाया और उसके चारों ओर बाड़ लग दी। फिर अंगूरों का रस निकालने का गरठ लगाने को एक गडढ़ा खोदा और रखवाली के लिए एक मीनार बनायी। फिर उसे बटाई पर देकर वह यात्रा पर चला गया। जब अंगूर उतारने का समय आया तो बगीचे के मालिक ने किसानों के पास अपने दास भेजे ताकि वे अपने हिस्से के अंगूर ले आयें।
“किन्तु किसानों ने उसके दासों को पकड़ लिया। किसी की पिटाई की, किसी पर पत्थर फेंके और किसी को तो मार ही डाला। एक बार फिर उसने पहले से और अधिक दास भेजे। उन किसानों ने उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया। बाद में उसने उनके पास अपने बेटे को भेजा। उसने कहा, ‘वे मेरे बेटे का तो मान रखेंगे ही।’
“किन्तु उन किसानों ने जब उसके बेटे को देखा तो वे आपस में कहने लगे, ‘यह तो उसका उत्तराधिकारी है, आओ इसे मार डालें और उसका उत्तराधिकार हथिया लें।’ सो उन्होंने उसे पकड़ कर बगीचे के बाहर धकेल दिया और मार डाला।
“तुम क्या सोचते हो जब वहाँ अंगूरों के बगीचे का मालिक आयेगा तो उन किसानों के साथ क्या करेगा?” मत्ती २१:३३-४०

आपने देखा कि कैसे ठेकेदार भी उन धार्मिक अगुवों के समान हैं? परमेश्वर के राष्ट्र पर उनको कुछ समय के लिए अधिकार दिया गया था। कुछ सेवक परमेश्वर के नबी थे, जैसे यशायाह और यर्मियाह, एलिया और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला। उन्होंने आकर इस पापी देश को परमेश्वर के विषय सच्चाई सुनाई, और इसीलिए इस्राएल के राजा और अगुवे उनसे घृणा करते थे। परमेश्वर ने एकलौते पुत्र को भेजा, और धार्मिक अगुवे उसे मार डालने कि साज़िश कर रहा थे। वे इस्राएल के इतिहास के विपरीत थे। वे परमेश्वर कि योजना के विपरीत थे! क्या इस फटकार से वे परिवर्तित होंगे? क्या परमेश्वर का भय उनके भीतर काम करेगा?

दृष्टान्त में यीशु ने इस बात का वर्णन किया कि परमेश्वर उन लोगों के साथ क्या करने जा रहा था जिन्होंने उसके सेवकों को सताया है। वे पूर्णरूप से नष्ट हो जाएंगे, और अंगूर कि बाड़ी किसी और को दे दी जाएगी।

फिर यीशु ने कहा:
“’क्या तुमने शास्त्र का वह वचन नहीं पढ़ा:

जिस पत्थर को मकान बनाने वालों ने बेकार समझा, वही कोने का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पत्थर बन गया?
ऐसा प्रभु के द्वारा किया गया जो हमारी दृष्टि में अद्भुत है।

“इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ परमेश्वर का राज्य तुमसे छीन लिया जायेगा और वह उन लोगों को दे दिया जायेगा जो उसके राज्य के अनुसार बर्ताव करेंगे। जो इस चट्टान पर गिरेगा, टुकड़े टुकड़े हो जायेगा और यदि यह चट्टान किसी पर गिरेगी तो उसे रौंद डालेगी।’” मत्ती २१:४३-४४

जब फरीसी और महायाजक उसके दृष्टान्त को सुन रहे थे, वे जानते थे कि यीशु उन्हें कोई सन्देश देना चाह रहा है। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए कितने उत्सुक थे! लेकिन वे कर नहीं पा रहे थे! भीड़ बीच में आ रही थी। यदि वे उसे गिरफ्तार करने कि कोशिश करते तो दंगा हो जाता! भीड़ जानती थी कि यीशु एक नबी है।

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