कहानी १४५: मंदिर के अहास में 

मत्ती २३:१-१२, मरकुस १२:३८-३९, लूका २०:४५-४६

Segnender Jesus Christus Glasfenster

परमेश्वर के पुत्र का इस्राएल के अगुवों के विरुद्ध परमेश्वर  का अभियोग

धार्मिक बहुत क्रोधित थे। और वे डर गए थे। किसी को भी, यहाँ तक के सबसे बुद्धिमान इंसान भी यीशु के विरुद्ध में खड़े होने कि हिम्मत नहीं कर पा रहा था। वह उनके लिए बहुत तेज़ था। जिस अधिकार और सामर्थ के साथ वह बोलता था, वे उसका उत्तर नहीं दे पाते थे, और अपनी योजनाओं को गुप्त स्थान में ले जाते थे जहां कोई उन्हें देख नहीं सकता था।वे गुप्त में साज़िश करते थे ताकि उन्हें स्वयं सेवकों को जवाब ना देना पड़े। वे अपने छुपाते हुए बंद दरवाज़ों में योजनाएं बनाते थे। परमेश्वर के पुत्र को मरने के लिए वे हर तरीका सोच रहे थे।

संसार के सभी लोगों में से जो चुना हुआ राष्ट्र था जिसे परमेश्वर ने अपना कीमती खज़ाना बनाया, उस शानदार उद्धार को मना रहे थे जो यीशु ने उन्हें पहले फसह पर दिया था, और उनके अगुवे उस परम उद्धार को पाने के लिए रास्ता बना रहे थे जो यीशु ने उन्हें दिया था। परमेश्वर उनके द्वेष और पाप का उपयोग कर के इस संसार में अपने बेटे के द्वारा उद्धार लाएगा।

मनुष्य के इतिहास के लिए परमेश्वर का गौरवशाली उद्देश्य जो उन पर बड़े ही सामर्थी रूप से बह कर आ रहा था, ये लोग उन में से आज्ञाकारी हो सकते थे। वे परमेश्वर कि विजय का हिस्सा हो सकते थे। उन्हें उस विजय का हिस्सा होना ही था। उन्हें इस्राएल देश को पश्चाताप करने के लिए अगुवाई करनी थी जिस समय मसीह आया था। उन्हें स्वर्ग के राज्य का अभिनन्दन करना था! परन्तु, उन्होंने अपने लिए एक रेंगने वाले सांप कि छोटा सी भूमिका निभाई। और हमेशा कि तरह, परमेश्वर उनके कपटी पाप को एक महान अच्छाई के लिए उपयोग करने जा रहा था। यीशु पवित्र आत्मा कि सामर्थ में पिता के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में अटल रहा। वह जानता था कि वे क्या करने जा रहे हैं, और उसे निश्चय था कि क्या होने जा रहा है। वह ख़ुशी से गया, यह जानते हुए कि अंत में वह सब कुछ नया कर देगा।

यीशु जानता था कि उसे अपनी जान देनी है, और उस फसह के हफ्ते में उसे बहुत सी महत्वपूर्ण बातें बतानी थीं। मंदिर कि सीढ़ियों में, उसने उन धार्मिक कुलीन लोगों निष्फल कोशिशों को, उन्हें फ़साने के लिए नाश कर दिया था वे बुरी तरह से शांत हो गए। अब उसकी बरी थी बात करने कि। यह कोई हल्का फुल्का सन्देश नहीं होने जा रहा था। यीशु ने उन्हें उनकी प्रतिकारक दुष्टता के लिए उन्हें बहुत गुस्से से डांटा। उसने उनकि आकांशाओं के लिए और धोखेपन के लिए और छलयोजना के लिए डाटा। अब समय आ गया था कि मसीह उन अगुवों के विरुद्ध जिन्होंने परमेश्वर के पुत्र का इंकार किया था, परमेश्वर के न्याय के लिए सौंप दे। उसने ऐसे आरम्भ किया: “’यहूदी धर्म शास्त्री और फ़रीसी मूसा के विधान की व्याख्या के अधिकारी हैं। इसलिए जो कुछ वे कहें उस पर चलना और उसका पालन करना। किन्तु जो वे करते हैं वह मत करना। मैं यह इसलिए कहता हूँ क्योंकि वे बस कहते हैं पर करते नहीं हैं।'”

मूसा कि व्यवस्था के अधिकारी होने से यीशु का क्या मतलब था? मूसा इस्राएल का महान अगुवा था जिसने सीनै पहाड़ पर जाकर परमेश्वर से बात की। वह इस्राएल के लिए दस आज्ञाओं को लेकर आया। उनके भयंकर पाप के बावजूद, उनके शास्त्री और फरीसी प्राधिकरण के पद पर होते हुए परमेश्वर के वसाहन का प्रचार कर रहे थे। उनके कार्यों उनके उन अच्छी बातों से जो वे सिखाते थे उनसे बहुत भिन्न थे। उन्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार बनने के लिए चुनना था और उन बातों को छोड़ना था जो उनके अगुवों ने उन्हें सिखाईं!

फिर यीशु ने उन अगुवों के कर्मों का वर्णन किया:

 “’वे अच्छे कर्म इसलिए करते हैं कि लोग उन्हें देखें। वास्तव में वे अपने ताबीज़ों और पोशाकों की झालरों को इसलिये बड़े से बड़ा करते रहते हैं ताकि लोग उन्हें धर्मात्मा समझें। वे उत्सवों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान पाना चाहते हैं। आराधनालयों में उन्हें प्रमुख आसन चाहिये। बाज़ारों में वे आदर के साथ नमस्कार कराना चाहते हैं। और चाहते हैं कि लोग उन्हें ‘रब्बी’ कहकर संबोधित करें।'”

इन घमंडी लोगों कि कल्पना कीजिये, जो सड़कों पर इस तरह चलते हैं जैसे कि वे बहुत पवित्र और दूसरों से बढ़कर योग्य हैं। उनकी दिखावटी धर्मनिष्ठा चमड़े के थे जिनमें वचन के कुछ हिस्से थे। वे उन्हें अपने गले में पहनकर यह दिखाते थे कि वे कितने धर्मी हैं और दूसरों कि निंदा करते थे।

पुराने नियम के अनुसार यह गुच्छा उनके वस्त्र का एक हिस्सा था। परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों को यह आज्ञा दी थी कि वे चार गुच्छे अपने वस्त्रों में सीएं ताकि वे अपने आप को पवित्र और परमेश्वर के अलग किये हुए लोग दिख सकें। (गिनती १५:४०) यीशु ने भी वे गुच्छे पहने! परन्तु इन लोगो ने परमेश्वर का आदर करने के लिए नहीं पहना था। उन्होंने उसे अपनी महिमा के लिए पहना था, और आम लोगों से अपने लिए प्रशंसा और महिमा कि मांग की। वे उस उपासना और आदर कि मांग कर रहे थे जो केवल परमेश्वर के लिए है! यीशु इससे बहुत अपमानित हुआ।

उसने कहा:

“’किन्तु तुम लोगों से अपने आप को ‘रब्बी’ मत कहलवाना क्योंकि तुम्हारा सच्चा गुरु तो बस एक है। और तुम सब केवल भाई बहन हो। धरती पर लोगों को तुम अपने में से किसी को भी ‘पिता’ मत कहने देना। क्योंकि तुम्हारा पिता तो बस एक ही है, और वह स्वर्ग में है। न ही लोगों को तुम अपने को स्वामी कहने देना क्योंकि तुम्हारा स्वामी तो बस एक ही है और वह मसीह है। तुममें सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही होगा जो तुम्हारा सेवक बनेगा। जो अपने आपको उठायेगा, उसे नीचा किया जाएगा और जो अपने आपको नीचा बनाएगा, उसे उठाया जायेगा।'”

यीशु के चेलों को इस्राएल के अगुवों से बहुत भिन्न होना था।

सोचिये यदि हर कोई अपने तरीके से चलने लगे? यह कितना अच्छा होगा उन लोगों के बीच में रहना जो विनम्रता और नम्रता से भरे हुए हैं। यीशु अपने चेलों को एक बिलकुल भिन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बुला रहा था! वह स्वर्ग राज्य का मार्ग था!

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