कहानी १५७: रोटी और प्याला 

मत्ती २८:२६-२९, मरकुस १४:२२-२५, लूका २२:१७-२०, १ कुरिन्थियों ११:२३-२६

Last supper

फसह का भोज यहूदी लोगों के लिए एक उच्च और पवित्र समय था। यह यहूदी लोगों के लिए मुक्ति के महान दिन की स्मृति में मनाया जाता है। यीशु के संसार में आने के पंद्रह सौ साल पहले, परमेश्वर ने मिस्र के फिरौन की भयानक अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त किया और इस्राएल को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाया। परमेश्वर ने अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा का सम्मान किया। उसका वंश आकाश के तारों के समान बढ़े।

जिस प्रकार परमेश्वर अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा को रख रहा था,उसी प्रकार उसने मूसा को एक अस्थायी वाचा दी। उसने उन्हें कुछ नियम दिए जिससे कि वह लोगों कि अगुवाई कर सके और उन्हें अपनी ओर खींच सके। उसने एक ख़ूबसूरत बलिदान कि विधि मांगी ताकि वे अपने पश्चाताप कि भेंट प्रभु के पास ला सकें और देश अपने पापों से शुद्ध हो सके। उसने उनके समाज को इस तरह बनाय जिससे कि वे आस पास के देशों अपमान और अप्रतिष्ठा से बचे रहें। और मूसा के जीवन के अंत में, परमेश्वर के लोगों ने वायदे के देश में प्रवेश किया।

जब वे परमेश्वर के काम करने के पवित्र तरीकों को सम्मान दे रहे थे, वे उसकी पवित्र उपस्थिति को पृथ्वी पर बड़े विशेषता के साथ फासले को रख रहे थे। परमेश्वर कि पवित्र विधि के अनुसार, उन्होंने जो वाचा का संदूक बनाया, उसका ढक्कन परमेश्वर का सिंहासन था। उनका आराधनालय और फिर उनका मंदिर दोनों उसके सिंहासन के महान हिस्सा थे। परमेश्वर कि उपस्थिति और उसके लोगों के बीच एक पर्दा था। वे उसके कीमती खज़ाना थे, परन्तु वे अपने पापों के कारण कलंकित हो गए थे।

अपने पापों से पश्चाताप करने के लिए लोग अपनी भेटें महायाजक के सामने लाते थे। इस्राएल के महायाजक पशु के बलिदान को परमेश्वर की वेदी पर लेकर आते थे। परमेश्वर ने अपने लहू को लोगों के पापों से धोने का प्रतिनिधि नियुक्त किया। रोज़-ब-रोज़ और हफ्ते हफ्ते लोग परमेश्वर कि पवित्र व्यवस्था के लिए अपने आप को जांचने के लिए अपने बलिदान को महायाजक के पास लेकर आते थे। बलिदान प्रणाली द्वारा, हर एक पाप कि घोषणा की जाती थी। जब लोग यह देख पा रहे थे कि उनकी कमज़ोरी और स्वार्थपरता को उन्हें जांचना है, वे यह सीखते थे कि उनके पाप कितने गहरे हैं। परमेश्वर की व्यव्यस्था जो उन्हें यह सिखाता था कि वे अपने टूटेपन को किस तरह परमेश्वर के सम्पूर्णता और प्रेम के द्वारा ठीक कर सकते थे। वे देख पाये कि मनुष्य के पाप के कारण यह कितना असम्भव था कि वे परमेश्वर कि अच्छाई और पूर्णता का आदर कर सकें। उनके पाप कि गम्भीरता और स्पष्ट हो गयी, और परमेश्वर कि पवित्रता प्रकट हुई।

परमेश्वर ने इस्राएल को शुद्ध होने के लिए बुलाया ताकि वे पृथ्वी के लिए एक शाही राष्ट्र बन सके। इतने सालों का राष्ट्र रहने पर भी, वह असफ़ल रहा। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया, और उसके मार्गों में चलने से इंकार किया। उनके राजाओं ने उस परमेश्वर के विरुद्ध में मूर्तियां स्थापित कर दीं

जिसने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और वो अधिकार दिया जो परमेश्वर कि सामर्थ से भी बढ़कर है। राष्ट्र दो भागों में बात गया और अंत में निर्वासित किया गया।

परमेश्वर के पवित्र देश के इन प्रलय सम्बंधित ख़ामियों के बीच कुछ ऐसे थे जो वफ़ादार थे। हमेशा वे होते थे जो परमेश्वर के लिए समर्पित होते थे और उसके आगे अपनी भेटों को लाते थे। जिस प्रेम को यीशु ने अपने चेलों से चाहा था वही प्रेम उनका भी परमेश्वर के प्रति था। परमेश्वर के ह्रदय का अवशेष हमेशा से एक सा रहा है। उनके पश्चाताप के बलिदान उस यशस्वी बलिदान पर केंद्रित करता है जो यीशु देने वाला था। उनके समय में जो परमेश्वर ने उन्हें प्रकट किया था, वे परमेश्वर कि उस आशा कि बाट जो रहे थे यीशु में पूर्ण होती है, और जो उद्धार हमें मिला वही उन्हें भी मिला।

यह अनिश्चित था कि फसह के पर्व पर वह अपनी जान दे देगा। उस राष्ट्र का उसके जीवन का परिणाम और उत्तम उद्देश्य था जो फसह ने स्थापित किया था। इस्राएल देश इसीलिए बनाया गया ताकि इस संसार में लोग अपने मसीह कि प्रतीक्षा करें। श्राप के इतिहास को उस चंगाई के लिए तैयार रहना था जो परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के माध्यम से भेज रहा था।

यीशु अब नए दौर के लिए एक नयी वाचा को बना रहा था। उसका अपने लहू उस अंतिम बलिदान के लिए होगा जो उसके अविनाशी जीवन के सामर्थ पर आधारित था।

फसह कि क्रियाओं को यहूदी देश एक हज़ार पांच सौ साल से मना रहे थे। परमेश्वर के अद्भुद कामों को सारे देशों ने जमा होकर स्मरण किया। फसह के पर्व का हर एक हिस्सा परमेश्वर कि वफादारी का चिन्ह था। अब जब यीशु और चेले उस क्रिया को मान रहे थे, यीशु ने उन्हें एक नयी क्रिया दी। यह परमेश्वर कि ओर से नया नियम था। नयी क्रिया यीशु कोई स्मरण करने और उसकी उपासना करने के लिए दी गयी थी जो उसके बलिदान द्वारा दिया जाएगा।

पुरानी व्यवस्था अब नहीं मानी जाएगी। नई व्यस्था पवित्र आत्मा के रूप में आएगी, और उन सब के ह्रदयों में लिख दी जाएगी जो यीशु पर विश्वास करेंगे। पुराने नियम में इसका चर्चा होता था।

यिर्मयाह ने कहा:
“वह समय आ रहा है जब मैं इस्राएल के परिवार तथा यहूदा के परिवार के साथ नयी वाचा करूँगा। यह उस वाचा की तरह नहीं होगी जिसे मैंने उनके पूर्वजों के साथ की थी। मैंने वह वाचा तब की जब मैंने उनके हाथ पकड़े और उन्हें मिस्र से बाहर लाया। मैं उनका स्वामी था और उन्होंने वाचा तोड़ी।” यह सन्देश यहोवा का है। भविष्य में यह वाचा मैं इस्राएल के लोगों के साथ करूँगा।” यह सन्देश यहोवा का है। मैं अपनी शिक्षाओं को उनके मस्तिष्क में रखूँगा तथा उनके हृदयों पर लिखूँगा। मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।'” –यिर्मयाह ३१:३१-३३

पवित्र आत्मा उन सब के लिए उद्धार का मोहर होगा जो विश्वास करते हैं। परमेश्वर कि उपस्थिति हर एक ह्रदय में होगी जो यीशु के लहू से धोया गया है। यीशु कि आत्मा हर एक विश्वास करने वाले ह्रदय में वास करेगी।

ये सब महान बातें मनुष्य के इतिहास में जब से हो रही थीं जब से यीशु अपने जीवन के अंतिम दिनों में येरूशलेम में था।और अब वह अपने उन चेलों के साथ ऊपर के कमरे में था जो जाकर सुसमाचार को सुनाएंगे।

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, उसने थोड़ी रोटी ली और धन्यवाद दिया। उसने उसे तोड़ा और उन्हें देते हुए कहा,“यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिये दी गयी है। मेरी याद में ऐसा ही करना।”

यह कितना पवित्र और ख़ूबसूरत पल था। यह यीशु का कितना शांत अनुष्ठान था जो यीशु ने अपने चेलों को दिया ताकि वे मिलकर उद्धारकर्ता के कामों को याद कर सकें। यीशु ऐसा राजा था जैसा और कोई भी नहीं। वह उन सब के लिए अपने लहू और प्राण को देने जा रह था जो उसके राज्य के वारिस थे। वह एक सच्चा फसह का मेमना बनने जा रहा था।हज़ारों सालों के लिए यह नयी क्रिया परमेश्वर के राज्य के लिए एक शक्तिशाली चिन्ह बनने जा रहा था।

जो चेले यीशु के साथ में मेज़ पर बैठे थे वे उसके दूत होंगे जो उसके जय कि घोषणा करेंगे जिसे यीशु इस संसार के लिए क्रूस पर जीतने जा रहा था। जब वे उसकी कलीसिया को बनाने जा रहे थे, वे यीशु कि  आज्ञाओं को याद करके उन्हें नए विश्वासियों को सिखाएंगे।  दो हज़ार साल बाद,  उनकी शिक्षाएं हम तक पहुँच गयीं हैं। यीशु के बलिदान को हम रोटी और प्याले को लेकर स्मरण करते हैं। उसकी उपस्थिति कलीसिया के साथ एक विशेष रीति से है। हमारा पवित्र मेज़ में भाग लेना उस समय को बंधता है जिस रात यीशु मरने वाला था।

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