कहानी १७०: क्रूस पर चढ़ाया गया राजा

मत्ती २७:३३-३८; मरकुस १५:२२-२६; लूका २३:३३,३८; यूहन्ना १९:१६-२२

Holy Week

फिर जब वे गुलगुता (जिसका अर्थ है “खोपड़ी का स्थान।”) नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने यीशु को पित्त मिली दाखरस पीने को दी। किन्तु जब यीशु ने उसे चखा तो पीने से मना कर दिया।

रोमी सिपाहियों ने  क्रूस को ज़मीन पर रख यीशु कपड़े उतार दिए। यीशु ने अपने हाथ उस लकड़ी के पट्टे पर फैला कर अपने आप को पूरी विनम्रता के साथ सौंप दिया। सिपाहियों ने उसके हाथों में कीलें ठोकीं और क्रूस पर चढ़ा दिया। यह कितना भयंकर था। जो उपकरण अच्छी चीज़ों को बनाने के लिए होते हैं, उन्हें एक मनुष्य के शरीर को फाड़ने के लिए इस्तेमाल किये गए।

सिपाहियों ने क्रूस को खड़ा कर दिया। हर एक सांस जब वह लेता था, अपने शरीर को खींचता था ताकि वह सांस अंदर ले सके। उसके लहू लुहान शरीर उस लकड़ी के पत्ते पर रगड़ता था। हर पल उसकी पीड़ा बढ़ती ही जाती थी। परन्तु ये उस पीड़ा के सामने कुछ नहीं थी जो अनदेखी थी। क्यूंकि आप देखिये, आत्मिक क्षेत्र में, उस पवित्र जन ने पाप को अपने ऊपर ले लिया था। वह परमेश्वर के आगे पाप के अवतार को लेकर आया। मनुष्य के पापों के घिनौने अपमान के कारण उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध को उसे अपने ऊपर हाथ फैला कर लेने कि आवश्यकता नहीं थी। उसने परमेश्वर कि इच्छा में होकर उसे पूरे मान सम्मान के साथ लेने कि ठान ली थी। जब वह मनुष्य के हर घिनौने पाप कि सज़ा को अपने ऊपर ले रहा था, परमेश्वर का क्रोध दुष्ट के प्रति भड़का हुआ था। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था ताकि हम आज़ाद हो जाएं। कितना महाप्रतापी परमेश्वर है।

दो डाकू भी उसके साथ चढ़ाये गए, एक दायें और एक बाएं। सिपाही अपने ही दूषी व्यापार में लगे हुए थे। यीशु के कपड़ों का अब क्या करना था? उसके वस्त्र के चार भाग किये और हर एक सिपाही को उसका एक हिस्सा दे दिया। परन्तु यीशु का भीतरी वस्त्र बहुत अनोखा था। वह बहुत विशेषता से बनाया गया था। वे उसे फाड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने पासे फेंके। यूहन्ना प्रेरित ने यह दिखलाया कि यह वचन का पूरा होना हुआ है। भजन सहित २२:१८ कहता है,”वे मेरे कपड़े आपस में बाँट रहे हैं। मेरे वस्त्रों के लिये वे पासे फेंक रहे हैं।'” इसके बाद वे वहाँ बैठ कर उस पर पहरा देने लगे। जब तक उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, सुबह के नौ बज गए थे।

पिलातुस यीशु के विषय में अभी और कुछ कहना चाहता था। उसने इब्रानियों, लातौनी और यहूदी भाषा में कुछ लिखा।

“‘यह यहूदियों का राजा यीशु नासरी है'”

यीशु को शहर के निकट क्रूस पर चढ़ाया था ताकि सारे यहूदी उसे देख सकें। पिलातुस कि घोषणा उस भाषा में लिखी गयी जो अधिकतर पश्चिमी दुनिया में बोली जाती है। रोमी राज में लातौनी भाषा बोलते थे, जो अपने संग्रामिक अधिकार से सब पर हुकुम चलते थे। यह बहुत ही संपन्न विधिपूर्वक भाषा थी जिसे रोम के कुलीन लोग बोलते थे और अपने बच्चों को सिखाते थे। सभी विचार धरणाओं पर यह हावी था। परन्तु इब्रानी भाषा वो भाषा थी जिससे परमेश्वर का वचन मनुष्य के पास आया। यह कितना उचित था कि तीनों ने यीशु के शासन को उसके बलिदान के दिन घोषित किया!

पिलातुस को नहीं मालूम था कि आने वाले सालों में पूरे रोमी राज में सुसमाचार लातौनी भाषा और यहूदी भाषा में सुनाया जाएगा। एक दिन, जिस यीशु को उसने क्रूस पर चढ़ाया था, उसे अनंतकाल के राजा कि तरह उसकी उपासना की जाएगी। रोम के महाराजा यीशु के आगे घुटने टेकेंगे!

लेकिन यह सब भविष्य में होना है। इस बीच, यहूदी अगुवे उस चिन्ह से नाखुश थे जो यीशु के सिर पर लगाया गया था। यह रोमी सरकार द्वारा एक लिखित घोषणा थी। सो वे पिलातुस के पास गए और बोले इस बदल कर ऐसे लिखो: “‘उसने कहा, मैं यहूदियोंका राजा हूँ।'” यह चिन्ह का एक दूसरा हास्यास्पद था लेकिन पिलातुस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला था।

सोचिये पिलातुस के क्या विचार रहे होंगे जब वह उन आराधनालय के दुष्ट सदस्यों को यीशु को क्रूस पर चढाने के लिए लेजाते देख रहा था। इस विचार से हसी आती है कि वे अपने को परमेश्वर के पवित्र लोग मानते थे, और इससे यहूदी अगुवों का गुस्सा और भी अधिक बढ़ जाता था। यदि इन लोगों का कोई भी अनंतकाल का भविष्य है तो वह इन लोगों के जीवन से नहीं दिख सकता था जो परमेश्वर के मंदिर को चलाते थे।

परन्तु यीशु में, पिलातुस ने कुछ भिन्न पाया। उसके किसी भी शिक्षाओं से ऐसा कुछ नहीं था जो उसे स्पष्ट कर सके। पिलातुस दुनिया के सबसे उच्च ज्ञान से शिक्षित था। उसने सभी जगहों में जाकर भिन्न भिन्न धर्मों और संस्कृतियों को। देखा। उसके पास वो अधिकार था जिससे वह शासन चला सकता था। वह उन अगुवों के बीच में रहता था जो मनुष्य जाती से सम्बंधित जटिल सच्चाइयों के हल को लेकर आते थे। युद्ध, अकाल, सामाजिक विश्लेषण आदि, जैसे विषय वे लेकर आते थे। सारे मनुष्य जाती में, केवल ये थे जो मनुष्य के जीवन के भाग को तय करते थे।

जब पिलातुस ने इस महान संकटकाल का सामना किया, तब उसने पुछा,”‘सच्चाई क्या है?'” यूनानी और रोमी दार्शनिकों के समाधान, रोमी फ़ौज में पाये गए समाधान, और ज़बरदस्ती से दी गयी शांति, सब में थोड़ी बहुत सच्चाई थी पर बगैर स्वयं के भीतर कि सच्चाई के। जन पिलातुस ने यीशु के विनम्रता और शुद्धता को देखा, तब उसने जाना कि उसने सच्चाई का सामना किया है।

इस शांत और लहूलुहान मनुष्य कि कोई महानता और सामर्थ थी, जो उस अनदेखी दुनिया का राजा कहलाता था। या तो वह, पागल था या फिर वह सही था। यदि वह सही था, तो फिर उसके चरों ओर चल रहे कोलाहल में पागलपन था। पिलातुस इतने लम्बे समय से था जो जनता था कि छोटी से छोटे से छोटा पद ढोंग था। पर यीशु ने वो सब नष्ट कर दिया। यदि कोई अनन्तकाल का राजा था, तो वह ऐसा होगा जब वह एक स्वार्थी और टूटी दुनिया में प्रवेश करेगा। अपने दुष्ट घृणा के कारण, येरूशलेम के अगुवे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसकी आत्मा उन सब आत्माओं से कहीं अधिक मूलयवान थी।

हम नहीं जानते कि पिलातुस के मन में क्या चल रहा था जब वह अपने महल में बैठा था। परन्तु हम यह जानते हैं कि उसी के हाथों यह घोषणा लिखवाई गयी कि यीशु यहूदियों का राजा है। और सभी यहूदी अगुवों के विरोध करने पर भी उसने यह लिखा,”‘जो मैंने लिख दिया सो लिख दिया।'”

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