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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १८२: तट के किनारे सैर 

Sea of Galilee in Israel

युहन्ना २१:१५-२५

चेले नाश्ता खाने के बाद उठकर तट के किनारे चलने लगे। परमेश्वर ने पतरस से कहा, ‘शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तुम सच में मुझे इन से अधिक प्यार करते हो ?”

इसका क्या मतलब था? और उसने ऐसा क्यों पूछा? खैर, पतरस को हाल ही में एक भारी विफलता का सामना करना पड़ा था। उसने सार्वजनिक रूप में प्रभु के साथ विश्वासघात किया था। अब प्रभु पतरस को एक सार्वजनिक तरीके से बहाल करने जा रहे थे।

यीशु की गिरफ्तारी की रात पर जब यीशु आगे होने वाली बातों के बारे में समझा रहे थे, अन्य सभी चेले शांत हो गए। वह केवल पतरस ही था जिसने बड़े साहस से यह घोषणा की कि वह प्रभु का इनकार कभी नहीं करेगा। उसके इस वफादार संकल्प के घोषणा के बाद ही, अन्य चेलों को ऐसा करने के लिए साहस आया। पर पतरस के साड़ी बहादुरी और दृढ़ संकल्प के बावजूद, उसकी अपनी मानव शक्ति पर्याप्त नहीं थी। महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण घंटे में, जब वफादारी सबसे पवित्र गुण था, वह कमजोर पड़ गया और ऐसा करने में विफल हुआ। और मामला इस बात से बदतर हो जाता है कि वह एक रोमन सैनिक के चेहरे में और न मौत की धमकी पर अस्थिर हो गया। उसने ऐसा इनकार एक छोटी गुलाम लड़की के पूछताछ में ही कर दिया। और यह हर कोई जानता था।

यीशु पहले ही समझ गए थे कि क्या होने जा रहा था और उसे चेतावनी दी, लेकिन पतरस इसे सुनना सहन नहीं कर सका। उसने इस बात का विश्वास करने से इनकार किया कि वह ऐसी बात कर सकता है। लेकिन यीशु जानता था कि शैतान, जो परमेश्वर का शक्तिशाली दुश्मन था, वही चालबाज़ साँप जिसने आदम और हव्वा की परीक्षा ली थी, पतरस के पीछे जाने की अनुमति माँगी थी, और परमेश्वर ने “हाँ” भरी थी। स्वर्गीय पिता अपने दुश्मन के नापाक इरादों का उपयोग करने के लिए जा रहा था ताकि वो अपने सेवक की परीक्षा ले सके जो उसके बेटे यीशु के लिए समर्पित था। पतरस को अपने स्वयं की प्रचुरता और गर्व से छुटकारा पाने के लिए एक महान तोड़ने की प्रक्रिया से जाना था।

पतरस को यह कुछ भी समझ में नहीं आया। वह इस भ्रम में था कि वह अपने स्वयं के बल से सब कुछ कर सकता है। लेकिन यह उस आदमी के लिए अतिरिक्त नहीं था जिसे ‘कलीसिया की चट्टान’ बनना था। अगर उसे मार्गदर्शन करना था, तो उसे यह सीखना होगा कि  वह कितना कमजोर है ताकि वह परमप्रधान परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर हो सके।

यह दर्दनाक सबक था,  पर रंग भी लाया। पतरस अपने विश्वासघात के बाद उन भयानक दिनों में खुद के अंत तक आ गया था। यीशु ने अपने जी उठने के बाद अपने को पहले पतरस को प्रकट किया। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उनके बीच क्या वार्तालाप हुई, लेकिन हम केवल कल्पना कर सकते है कि पतरस ने अपने स्वामी की ओर  कितना दु: ख और पश्चाताप प्रकट किया होगा। उन्होंने प्रभु और सेवक जैसे कितना करीबी और पवित्र क्षण गुज़ारा होगा।

अब जैसे वो गलील के सागर के तट पर चल रहे थे, यीशु पतरस से उसके प्रति अपने प्यार की पुन: पुष्टि कर रहे थे। इस बार, यह वार्तालाप अन्य चेलों के सामने हो रहा था और वो यह सब सुन सकते थे। पतरस वास्तव में परमेश्वर का चुन हुआ अगुआ होने को था, लेकिन पतरस के इनकार की कहानी उसके लिए उनके सम्मान को क्षतिग्रस्त कर सकती थी। क्या वह अनुग्रह से गिर गया था? यीशु उसे सम्मान के साथ बहाल करने के लिए सुनिश्चित कर रहे थे।

फिर भी, इस सवाल ने पतरस को भेद होगा। ‘हाँ, प्रभु,’ उसने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस को यह विश्वास था कि यीशु जानता था। अपने महान असफलताओं के बावजूद, उसका प्यार वास्तव था।

यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरे मेमनों को खिलाओ’। पतरस को यीशु के लिए प्यार उसके लोगों की देखरेख करके दिखाना था। यीशु ने अपने आप को ‘भला चरवाहा’ के रूप में वर्णित किया था, और पतरस उनका सेवक था। प्रभु उसे अपनी सबसे क़ीमती संपत्ति को विश्वास समेत सौपने जा रहा था।

प्रभु ने फिर से पूछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?”

यह प्रश्न दो बार पूछने का क्या मतलब हो सकता है? ‘हाँ, प्रभु,’ पतरस ने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस अपने प्यार की सच्चाई का प्रमाण देने के लिए किसी वीर प्रदर्शन या वफादारी की घोषणा पर निर्भर नहीं करने जा रहा था। वो मसीह के बुध्धिमत्ता और ज्ञान पर निर्भर था। वह जानता था कि यीशु जानता था, क्योंकि पतरस को विश्वास था कि यीशु सब कुछ जानता है। यही सबसे मुख्य बात थी।

“मेरी भेड़ों की देखभाल करना, ‘यीशु ने कहा। उनके दूसरे अनुरोध के साथ, पतरस के कार्य का गहरा महत्व दिख रहा था। यह पतरस के लिए एक ऐसी भूमिका थी जो उसके खुद के लिए थी, और उसके चेलों को भी यह मालूम होना था, क्योंकि वे उसके साथ कलीसिया के निर्माण में शामिल होंगे। हालांकि यीशु ने नहीं कहा था, “यह सच है, तुम मुझे इन सब से ज्यादा प्यार करते हो,” उनका मतलब यही था। अगर उनका यह मतलब नहीं होता, तो वह पतरस के आगे ऐसा महत्वपूर्ण काम नहीं रखते। पतरस को अपनी स्वाभाविक प्रतिभा, बल या आकर्षण की वजह से इस कलीसिया का अगुआ नहीं बनाया गया था। उसे यीशु मसीह के प्रति समर्पण, प्यार और भक्ति की वजह से उन्नत किया गया था। यह एक सबसे जरूरी बात है।

एक बार फिर, यीशु ने पतरस से पुछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” तीसरी बार पतरस के लिए एक कड़वे डंक की तरह लगा होगा। यह उस खंडन की संख्या है जिसके बारे में यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वह कितनी बार येशु के महान पीड़ा के समय में उद्धारकर्ता का इनकार करेग। और फिर पतरस बोला, ‘हे प्रभु, आप को सब कुछ पता है। आपको पता है कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस के पास सिर्फ भरोसा था पर यीशु दिव्य था। वह हर झूठ से हर सच जानता था। वह जानता था कि पतरस उससे प्यार करता था।

यीशु ने कहा, ‘मेरी भेड़ों को चराओ। मैं तुम्हे सच बोलता हूँ, जब तुम छोटे थे, तो तुम अपने आप को तैयार करते थे और जहाँ चाहते उधर चले जाते, लेकिन जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो तू अपना हाथ बढाओगे, और कोई और तुम्हे कपड़े पहनाएगा और वहां ले जाएगा जहाँ तुम जाना नहीं चाहते हो’।

वाह। अब मसीह एक और भविष्यवाणी कर रहे थे। पतरस वास्तव में यीशु को प्यार करता था, और एक दिन मौत के मुंह में अपनी वफादारी दिखाएगा। हालांकि पतरस ने अपने प्रारंभिक वर्ष अपने ऊपर खर्च किये, उसके आगे का जीवन, मसीह के राज्य के लिए समर्पित होगा। अंत में, उसके हाथ क्रूस पर चढ़ाने के लिए फैला दिए जाएंगे। उसका जीवन यीशु के जीवन की तरह उसकी पीड़ा में भी होगा। और जैसे  यीशु अपने पिता को महिमा लाए, पतरस को भी मसीह के लिए महिमा लाना होगा। कलीसिया में अगुआ होने के नाते, पतरस के मौत की खबर दूर दूर तक पहुंचेगी। ऐसे निर्बाध और पूर्ण विश्वासयोग्यता को कौन समझा सकता था? उसके बलिदान की सीमा उसका येशु के प्रति प्यार का माप था, और यह उसके उद्धारकर्ता को आदर और प्रतिष्ठा लाएगी।

लेकिन यह कई दशकों के बाद होना था। अभी के लिए यीशु ने कहा, ‘ मेरे पीछे चलो’। कल्पना कीजिये कि आप अपने जीवन के अंत में यह जाने कि आप को क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। कल्पना कीजिये कि इसको जानना परमेश्वर की योजना का हिस्सा था, और उसके बावजूद भी उसके पीछे आपको चलना होगा। इसको पतरस के प्यार की गहराई के अलावा समझने का कोई रास्ता नहीं था। और पतरस इसी उच्च शिष्यत्व का भार उठाने को था।

लेकिन यह बातों पतरस के मन पर नहीं थी, जब उसने यह सुनी। इसके बजाय, उसने मुड़ कर युहन्ना को देखा। ‘हे प्रभु, क्या इस आदमी के बारे में?’ क्या युहन्ना भी दुःख सहेगा? युहन्ना तो यीशु के इतने करीबी था कि गिरफ्तारी की रात वो यीशु के सीने पर टिका हुआ था।जैसे यीशु चेलों को समझा रहे थे कि उनमे से कोई उसे पकड़वाएगा, पतरस को युहन्ना को पीछे टिकने को बोलना पड़ा ताकि वह प्रभु से पूछ सके कि वो गद्दार कौन है। यदि पतरस को पीड़ा सहने के लिए बुलाया गया था, तो युहन्ना को क्या होने जा रहा था?

यीशु ने कहा, ‘अगर मैं उसे अपने वापस आने तक जीवित चाहता हूँ, तो उससे तुम्हे क्या? तुम्हे मेरे पीछे चलना होगा’। यीशु पतरस को कह रहा था, ‘इससे तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है’! क्योंकि बात यह हैं कि  यीशु फिर वापस आएगा, और अगर परमेश्वर ने यह ठहराया कि युहन्ना इतने लंबे समय तक जीवित रहेगा, वो सर्वशक्तिमान ईश्वर का वो सही निर्णय होगा।

अब, क्योंकि यीशु ने यह कहा, अफवाहें फैलने लगी। लोग यह कहने लगे कि युहन्ना कभी नहीं मरेगा। लेकिन यीशु ने यह नहीं कहा था। वह पतरस को यह बता रहा था कि परमेश्वर के चुने हुओं का जीवन और मौत उस पर निर्भर है। पतरस को अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा करना था, न की परमेश्वर की योजना किसी और के जीवन से मापना!

एक दिन पतरस को येशु की तरह क्रूस पर टंगना था। बाइबिल इस बात का विवरण नहीं करती है कि कैसे पतरस ने अपना जीवन यीशु के लिए दे दिया। हम जानते हैं कि यह घटना इस भविष्वाणी के तीन दशकों के बाद हुई, और हम यह जानते हैं कि उसने रोम में एक क्रूस पर यीशु के लिए अपनी जान दे दी। युहन्ना के सुसमाचार लिखने के बाद ही यह घटना घट चुकी थी। जो भी शर्म और खेद पतरस ने अपने प्रभु का इनकार करके महसूस किया, उसके प्रभु सेवा और विनम्रता के जीवन से अभिभूत था।

कहानी १८१: मछली पकड़ने की यात्रा

युहन्ना २१:१-१४

The Great Catch of Fish

प्रभु ने अपने चेलों से कहा था कि वह उन्हें गलील में मिलना चाहते हैं, तो चेले वहाँ यात्रा करके गए,और पतरस के पुराने शहर में समुन्दर के किनारे रहने लगे। पतरस, थोमा, नथानिएल , याकूब और युहन्ना, और अन्य दो चेलों सब साथ वहां थे। एक ऐसा क्षण आया जब  पतरस ने कुछ व्यस्त होने का फैसला किया। ‘मैं मछली पकड़ने के लिए जा रहा हूँ,’ उसने कहा। बाकी चेलों ने भी उत्साहित होकर कहा, ‘हम भी आ रहे हैं’।

चेले नौकाओं की और बढ़ने लगे और उन्होंने रात वहां पानी के ऊपर बिताई। स्याही जैसे काले आसमान की कल्पना कीजिये। क्या वहाँ करोरों उज्ज्वल चमकते सितारों थे? या वहाँ बादलों की एक गहरी चादर नीचे अंधेरे, आसपास की पहाड़ों पर मँडरा रही थी? कल्पना कीजिये उस मंद मंद हवा और पानी की आवाज़े को जो नौकाओं को धीरे धीरे झुला रहीं थी, मनो कोई लोरी सुना रही हो। मछली पकड़ने के लिए यह एक शांत रात थी। चेले कुछ भी पकड़ नहीं पाए। रात के लम्बे घंटे बड़ते गए। उन्होंने भोर की किरणों को पानी में चमकते देखा। अभी भी कोई मछली हाथ न आई थी। तब किसी ने देखा है कि वहाँ छोर पर एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन चेलों ने उसे नहीं पहचाना।

‘दोस्तों!’, प्रभु ने आवाज़ लगाईं। ‘क्या तुमने अभी तक कोई मछली नहीं पकड़ी?’ यह बात सुबह सुबह के घंटों में सुनना कितना विचित्र था।

‘नहीं,’ उन्होंने जवाब दिया। यह कितनी निराशाजनक रात थी। उनके जीवन में सब कुछ एक बड़ी प्रतीक्षा की तरह लग रहा था। उस ‘उंडेलने’ की, जिसकी येशु बात कर रहे थे, वो कब होने को था? उन्हें कब तक इंतजार करना था? यीशु कहाँ थे?

तट पर आदमी ने कहा, “‘नाव के दाईं ओर पर अपने जाल फेंको और तुम्हे कुछ मछली मिलेगी’। अब यह वास्तव में एक अजीब बात कहने को थी। आखिरकार, इस आदमी को यह कैसे पता था कि नाव के दाहिनी ओर उन्हें मछली मिलेगी? और अगर मछली उस ओर थी, तो नाव के बाए हाथ की तरफ भी क्यूँ नहीं थी?

लेकिन चेलों ने उस आदमी की सलाह मानी और अपने जाल वहां फेंक  दिए। और ऐसा करने से, वे बहुत धन्य और आशीषित हुए। मछली की एक भारी संख्या पानी में तैर रही थी। जाल मछली से इतना भारी हो गया था कि उसे नाव में वापस ढोना मुश्किल हो गया।

यह कहानी युहन्ना के लिए कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी-  युहन्ना: वही चेला जो यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने पतरस की ओर देखा, जो उसका पुराना मछुआरा साथी था। क्या उसे भी याद था? अंत में युहन्ना ने कहा, ‘यह प्रभु है!’

जैसे ही पतरस ने यह सुना, वह जानता था कि यह सच था। और वो नाव का तट तक पहुँचने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर पाया। उसने अपना वस्त्र निकालकर, अपने कमर के चारों ओर बाँध लिया। और फिर वह बर्फीले पानी में कूद पड़ा!

बाकि चेले तट की ओर अपनी नावों में, अपने पीछे भरी जाल खींचते हुए आए। उन्हें ज्यादा दूर जाना नहीं था। वे तट से केवल सौ गज दूर थे।

जब तक वो पहुंचे, उन्होंने देखा कि एक कैम्प फायर की गंध हवा में थी। यीशु ने लकड़ी के कोयले से एक आग जलाई थी। कुछ मछली उस पर सिक रही थी और वहाँ कुछ रोटी भी थी। यीशु उनके लिए नाश्ता बना रहे थे। वहाँ उनके सामने यीशु थे, अपने पुनर्जीवित शरीर में, और वे रोज़ मर्राह का काम कर रहे थे। अपने दोस्तों के लिए खाना बनाना उनकी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं था। अनंत काल के जीवन में भी, सेवा और काम का जीवन सम्माननीय है। यहां तक ​​कि खुद परमेश्वर के लिए भी। येशु ने क्या पौष्टिक, साधारण भोजन, वहां, समुद्र के तट पर प्रदान किया!

अब, हमें इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प बात जाननी चाहिए। नए नियम के लेखकों ने इसे यूनानी भाषा में लिखा था।अक्सर, वे बहुत ही खास शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे पाठकों को मूल, विशेष बात समझने में मदद मिलती थी।इस शब्द ‘लकड़ी का कोयला’ का इस्तेमाल इस कहानी के अलावा केवल नए नियम के एक अन्य समय में इस्तेमाल किया गया था। पहली बार इसका प्रयोग तब होता है जब पतरस, यीशु के परीक्षण के दौरान, आग से अपने को गरमा रहा था। इस लकड़ी के कोयले की बहुत तगड़ी बू थी, कि वह उस रात की हवा में भर गई होगी। यह वही गंध थी जो पतरस के फेफड़ों भरी होगी, जब उसने अपने प्रभु का इनकार किया था।

दूसरी और केवल यही एक और समय था जब यह शब्द का प्रयोग यहाँ, नए नियम के इस कहानी में होता है; जब यीशु ने अपने चेलों के साथ एक बार फिर से मुलाकात की। वही गंध पतरस के फेफड़ों में भरी, जब वो  मसीह के साथ समुद्र तट पर खड़ा हुआ बाकि चेलों के लिए इंतज़ार कर रहा था। क्या यीशु जानबूझकर यह दर्दनाक यादगार वापस ला रहे थे? क्यों?

जैसे नाव पहुँची, यीशु ने कहा, ‘तुमने जो मछली पकड़ी है, उसमे से कुछ ले आओ।’ पतरस नाव पर चढ़ कर समुद्र तट तक जाल घसीटते हुए लाया। उस जाल में १५३ मछली थी, लेकिन फिर भी, वो नहीं टूटी।

कल्पना कीजिए चेलों को कैसा लगा होगा जब वे नाव से बाहर उतरे होंगे। यह तीसरी बार था जब उन्होंने यीशु को उसके मौत के बाद देखा था। उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसको, उनके जीवनकाल के सबसे भयंकर, सार्वजनिक मौत द्वारा मारा गया था। तो भी, वह उनका अपना प्रभु और स्वामी था। अब वो उनके सामने जीवित था – वो यीशु जिसके पास एक ऐसा विचित्र अधिकार था जो प्रकृति के नियमों को भी लांघ गया।वो परमेश्वर था। उन्होंने उसके आने की कल्पना जीत और सत्ता के साथ की थी, लेकिन इस तरह नहीं! एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख कौन क्या कर सकता है, खासकर जब वह आपके लिए मछली पका रहें हो?

यीशु ने उन्हें कहा, ‘आओ, नाश्ता तैयार है।’ यीशु ने अभी भी अपना परिचय नहीं दिया। चेलों को यकीन था कि वो येशु ही है, पर पूछने का साहस किसी को नहीं था। इस दुनिया की सांसारिक, रोज़ मर्राह की बाते, अनन्त दायरे के उज्ज्वल महिमा के साथ टकरा रहीं थी। यह लगभग वैसे था जैसे जमीन उनके पैरों के नीचे खिसक रही थी और उन्हें अपना संतुलन लाना नहीं आ रहा था। कितने धैर्यपूर्वकता से  परमेश्वर ने यह भद्दापन संभाला। उसने रोटी ली और उनमें से प्रत्येक को दिया। फिर उसने मछली पकड़ाई।

इस्राएल का पूरा राष्ट्र उस सागर तट के छोटे से झुण्ड से मोहित हो जाता। लेकिन यीशु मानव जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए नहीं आए। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे। वह उन्हें बहाल और मजबूत बनाने के लिए और उन्हें तैयार करने के लिए आया था। एक दिन, उनमें से हर एक उसके साथ उसके राज्य में होगा। वे स्वर्ग में मसीह के साथ राज्य करेंगे। लेकिन इससे पहले कि यह शानदार समय आए, आगे एक कार्य था।

कहानी १८०: शक्की थोमा 

आठ दिन बीत चुके थे जब मसीह अपने चेलों के सामने प्रकट हुए थे। कई जबरदस्त बातें इस छोटे दौरान हुई थी! वे उसके मौत के सदमे से बाहर भी नहीं आ पाए थे जब अचानक वह मुर्दों में से जी उठा! और तो भी, वह उनके साथ नहीं था, कम से कम पहले की तरह तो नहीं।

कल्पना कीजिये उन आठ दिन इंतेजारी, के जब उन्हें धीरे धीरे इन बातों का एहसास होने लगा। कल्पना कीजिये कि वह चुपके से यरूशलेम की गलियों में खाना खरीदने के लिए और एक दूसरे से मिलने जाते होंगे, हमेशा उस डर में की कोई उन्हें पहचान ना ले।उनके बीच बातचीत और प्रार्थनाओं की कल्पना कीजिये।

उन्हें आगे क्या करना था? वे सही मायने में यीशु के पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ चुके थे, और अब भविष्य उनके सामने एक खुली खाई की तरह थी – एक अज्ञात क्षेत्र की नई दुनिया की तरह! क्यूंकि अब राजा मुर्दों में से जी उठा था, तो राज्य कैसा दिखेगा? और अब उन्हें उन बचे हुए होने के वास्ते क्या करना था? विशेषकर जब येशु की मृत्यु से जुड़े धार्मिक नेता और राजनीतिक विवाद एक जलता हुआ मुद्दा था!

चेले एक साथ फिर इकट्ठा हुए। इस बार उन्होंने ध्यान से दरवाजा बंद किया और चिटकनी लगा ली। इस समय थोमा भी उनके साथ था। अचानक, यीशु आ के ठीक उनके बीच खड़े हो गए। ‘शांति तुम्हारे साथ हो,”उन्होंने कहा।

यह पहली बार था कि थोमा ने जीवते प्रभु को देखा था। बाकी सब ने कहानियों बताई और विश्वास के साथ भर गए। लेकिन थोमा येशु को पहली बार खोने पर निराशा से भर गया था। वह अपनी आशा को फिर जगाना नहीं चाहता था। वो ऐसी निराशा दोबारा नहीं झेलना चाहता था। यीशु को स्वयं उसके पास आना था और थोमा को उसके हाथों पर कीलों के निशान को छूना था ताकि वो विश्वास कर सके!

थोमा के दिल में गुज़रती हर बात को येशु जनता था। तो वह उसकी तरफ मुड़े और अपना हाथ बड़ाया। ‘यहाँ अपनी उंगली रखो, मेरे हाथ देखो। अपने हाथ से मेरी कमर छुओ। शंका मत करो और विश्वास करो।’ यीशु कितनी उदारता और धीरज से भरे थे!

थोमा ने जैसे वो ज़ख्म देखे, वे बोल पड़ा – ‘मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर!’ यह एक वास्तविक और सच्चे विश्वास की एक घोषणा थी। थोमा ने विश्वास करने में बेशक समय लिया, लेकिन जब उसने किया, तो उसने विश्वास की सबसे ज़ोरदार और मज़बूत घोषणा की। किसी ने अभी तक यह घोषित नहीं किया था कि यीशु परमेश्वर था! और प्रभु ने उसकी भक्ति के शब्दों को प्राप्त किया।

यीशु ने कहा, ‘क्योंकि तुमने मुझे देखा है, तो तुमने विश्वास किया है; धन्य है वो जिन्होंने देखा नहीं पर फिर भी विश्वास किया है।’

और इसी जगह में आप और मैं कहानी में प्रवेश करते है। वो इसलिए, क्यूंकि हम मानते हैं कि यीशु की मृत्यु हो गई और वो फिर मुर्दों में से जी उठा, भले ही हम अपनी आँखों से उनके निशान या उनका पुनरुथान किया हुआ देह नहीं देखा हो! हैना यह एक आश्चर्यजनक बात है कि हम विश्वास के इस लंबे, स्वर्ण श्रृंखला का एक हिस्सा हैं, जो इन पहले चेलों से शुरू हुई।

जब तक युहन्ना ने इन कहानियों को अपने सुसमाचार में लिखी, यीशु के मृत्यु और पुनरुथान को कई दशक गुज़र गए थे। चेलों ने रोमी साम्राज्य में सुसमाचार की घोषणा की थी। थोमा, उद्धार का यह शुभ समाचा,र भारत देश तक भी लाया। दुनिया भर में कलीसिया मज़बूत और फलवन्त होती जा रही थी। जैसे जैसे युहन्ना ने यीशु के शब्दों को कलीसियाओं के लिए लिखा, वैसे वैसे उसे लोगों को येशु के बारे में सिखाने में कई साल लग गए। उसने हजारों को येशु पर विश्वास लाते देखा, हालांकि वे प्रभु से कभी नहीं मिले थे। उसने शायद कईयों को मसीह के नाम के लिए मरते भी देखा होगा। कितना अद्भुत होगा उस व्यक्ति के लिए- जिसने येशु की गिरफ्तारी की रात उसकी छाती पर विश्राम किया होगा – यह देखना कि  कितने लोग उसके प्रभु को प्यार करते थे, भले ही उन्होंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा हो। कल्पना कीजिए कि यह उसके दिल को कितना छुआ होगा! वास्तव में, यही वो कारण है जिसकी वजह से युहन्ना ने यह पुस्तक (युहन्ना) लिखी।

प्रभु यीशु अपने जी उठने के बाद चालीस दिन के लिए अपने चेलों को प्रकट होते रहे। यह शिक्षण और प्रशिक्षण का समय था जब यीशु उन्हें राज्य के काम के लिए तैयार कर रहे थे। युहन्ना ने इसका वर्णन ऐसे किया है:
“यीशु ने और भी बहुत चिह्न चेलोंके साम्हने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए। परंतु थे इसलिथे लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” -युहन्ना २०:३०-३१

कहानी १७९: आत्मा का उंडेला जाना 

लूका २४:४६-४९, यूहन्ना २०:१९-२३

shining dove with rays on a dark

यीशु अपने चेलों से यरूशलेम के एक गुप्त, बंद कमरे में बात कर रहे थे, और चेले पूरे ध्यान के साथ सुन रहे थे। अंत में, यीशु की योजनाए उनके जीवनों के बारे में उन्हें ज्ञात हो रही थी। प्रभु यीशु अपने चेलों को उनके आगे जीवन के बारे में निर्देश दे रहे थे। वह अग्रसर आदेश दे रहे थे! वह उन्हें कुछ ऐसा शक्तिशाली देने जा रहे थे जो चेलों की मदद वो सुसमाचार फैलाने में करेगी जो उसने अभी क्रूस पर किया।

कल्पना कीजिए कि चेलों को कैसा लगा होगा जब उन्होंने इस बारे में सुना। नाराज भीड़, उग्र धार्मिक नेता जिन्होंने देश पर नियंत्रण किया हुआ था, और रोमन सैनिकों की हिंसक ताकत अभी भी उनकी यादों में गूँज रही होगी। भला वे कैसे, कभी भी, उस शहर में यीशु के नाम से फिर प्रचार कर पाएंगे? वे जिंदा थे, बस इसलिए खुश थे! और इसका क्या मतलब था कि वे उच्च पर से सशक्त होंगे? यह अप्रत्याशित, रहस्यमय परमेश्वर अब आगे क्या करने जा रहा था?

पुराने नियम में कुछ ऐसी भविष्यवाणियाँ थी जो एक ओर संकेत कर रही थी –  ऐसी उज्जवल बाते जो परमेश्वर करने जा रहा था। आप देखते हैं, यीशु ने क्रूस पर अंतिम जीत जीती थी, और ऐसे कई तरीके थे जिससे यह जीत दुनिया को आशीषित कर सकती थी। नबी योएल ने कहा:
“उन बातोंके बाद मैं सब प्राणियोंपर अपना आत्मा उण्डेलूंगा; तुम्हारे बेटे-बेटियां भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिथे स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।
तुम्हारे दास और दासियोंपर भी मैं उन दिनोंमें अपना आत्मा उण्डेलूंगा।” योएल २:२८-२९

पिता परमेश्वर किसी तरह से अपने वफादार बच्चों पर अपनी आत्मा उंडेलेंगे, और एक नया युग मानव जीवन में शुरू किया जाएगा! जो कोई यीशु में अपना विश्वास डालेंगे, उनको पवित्र आत्मा प्राप्त होगी। वे पृथ्वी पर चलने वाले एक नए प्रकार के प्राणी  हो जाएंगे—–मनुष्य जो दिव्य जीवन और शक्ति के साथ रह रहे हो! यीशु ने पाप से पूर्ण शुद्धिकरण और सम्पूर्ण माफी के लिए एक रास्ता बनाया था। उन्होंने अपने चुने हुए लोगों को अपने जैसे सिद्ध, शुद्ध, और धर्मी बनने के लिए रास्ता बनाया। अब पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की उपस्थिति उनके पास आकर हमेशा के लिए रह सकती थी! परमेश्वर ने इसे इस तरह से नबी यहेजकेल को वर्णित किया:
“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूंगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतोंसे शुद्ध करूंगा।
मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्यर का ह्रृदय निकालकर तुम को मांस का ह्रृदय दूंगा।
और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियोंपर चलोगे और मेरे नियमोंको मानकर उनके अनुसार करोगे।” -यहेजकेल ३६:२५-२७

वाह। यहेजकेल नई वाचा के अधीन, नए जीवन का वर्णन, छह सौ साल पहले कर रहा था!

परमेश्वर की आत्मा का उंडेला जाना जल्द होने जा रहा था। क्या आपको यीशु की अपने चेलों के साथ लंबी बात याद है जो उन्होंने अपने गिरफ्तारी की रात से पहले की? क्या आपको याद है कि उन्होंने अपने चेलों को उनके छोड़ने पर दुखी नहीं होने को कहा था? उन्होंने कहा कि उन्हें खुश होना चाहिए क्योंकि वह अपनी आत्मा उनको भेजने जा रहा था। उनकी आत्मा शक्ति में काम करेगी और उन्हें मार्गदर्शन और दिलासा देगी,जैसे जैसे वो उसके नाम का एह्लान करते जाएंगे!

आत्मा की शक्ति वही शक्ति थी जिसके द्वारा यीशु ने पृथ्वी पर अपने जीवन को व्यतीत किया। यीशु हमेशा था और हमेशा पूरी तरह परमेश्वर है और रहेगा, लेकिन जब वह स्वर्ग से नीचे आया था, वह पूरी तरह से मनुष्य बन गया। जैसे वो इस पृथ्वी पर आया और रहा, उसने खुद के दिव्य शक्तियों के बलबूते पर ना चमत्कार किये और ना अद्भुत सत्य बोले। हर दिन वह एक सामान्य आदमी की शक्ति में रहा। लेकिन उसने एक परिपूर्ण, सिद्ध जीवन जिया, क्योंकि एक मनुष्य होके, वह परमेश्वर पर पूरे विश्वास और आज्ञाकारिता से निर्भर रहा। उसने आत्मा को अपना सिद्ध मार्गदर्शक बनने की अनुमति दी थी। एक सामान्य मनुष्य के नाते, यीशु को प्यास और थकावट लगती थी। लेकिन वह अपने पिता के साथ निरंतर निकटता में और पूर्ण आज्ञाकारिता में रहते थे। उन्होंने यह पवित्र आत्मा की शक्ति में किया। अब जब कि यीशु ने मनुष्य को परमेश्वर के लिए मोल लिया था, वो अपने अनुयायियों को आत्माभी दे सकता था।

जैसे यीशु ने अपने चेलों के साथ उस यात्रा पर कहे शब्दों को समाप्त किया, उन्होंने कहा, ‘शांति तुम्हारे साथ हो, जैसे पिता ने मुझे भेजा है, मैं भी तुम्हे भेजता हूँ।’ अब पहले से कहीं ज्यादा, चेले समझने लगे थे कि यीशु स्वर्ग से भेजा हुआ है। और अब, वे परमेश्वर की अद्भुत योजना में मानो लिपटे हुए थे। पिता के पास उनमें से प्रत्येक के लिए, पृथ्वी पर अपने जीवन के लिए, एक बहुत ही विशिष्ट कार्य था।

यीशु अपने आदमियों की ओर मुड़ा और उन पर सांस ली और कहा, ‘पवित्र आत्मा प्राप्त करो।’

यह नहीं था कि जीवते परमेश्वर की आत्मा चेलों के जीवन में पहले से काम नहीं कर रही थी। जब आत्मा ने उनके हिर्दय में काम किया, तो वो सन्देश को समझने लगे। वो आत्मा ही थी जिससे वो जागृत और क्रियाशील हो गए! लेकिन अब आत्मा एक कई अधिक तीव्र, और स्थायी तरीके से आ रही थी। यीशु के साथ यह पल शुरुआत थी, और इससे आगे, अधिक से अधिक बातें होने को थी।

तब यीशु ने कहा, “यदि तुम किसी के पापों को क्षमा करते हो, उनके पाप उन्हें माफ कर दिया जाएंगे; अगर तुम उन्हें माफ नहीं करते हो, उन्हें माफ नहीं किया जाएगा”. वाह! यह अपने चेलों को देने के लिए एक उच्च और खतरनाक शक्ति है! उन्हें परमेश्वर द्वारा ऐसे सशक्त किया जाएगा कि परमेश्वर के परिवार में, उनका निर्णय, परमेश्वर के निर्णय जैसा गिना जाएगा। परमेश्वर के राज्य में यह क्या उच्च और पवित्र भूमिका है!

चेलों में से एक उस दिन वहां नहीं था। किसी कारणवश, थोमा  वहाँ नहीं था। आने वाले दिनों में, अन्य चेलों ने उसे वहां होने वाली बातों के बारे में बताया होगा। जब थोमा ने उनकी कहानियों सुनी होंगी,  उसको ये लगा  होगा की ये पगला गए है! उसने उन पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। वे इसे इतनी बुरी तरह से चाहता था कि वे खुद को मूर्खता में झूटी दिलासा दे रहे थे! थोमा ने कहा, ‘जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लू, और कीलों की जगह में अपनी उंगली डालू, और उसकी कमर में अपना हाथ न रख लू, मैं विश्वास नहीं करूंगा।’

कहानी १७८: जीवित मसीह

मरकुस १६:१२-१४,यूहन्ना २०:१९-२३, लूका २४:३२-४९

Venice - Resurrected Christ in Saint Nicholas church

क्लीओपस और उसके दोस्त को कुछ अद्भुत दिया गया था। जब वे इम्मौस के लिए यरूशलेम से घर जा रहे थे, यीशु वहां आए। शुरू में, वे उसे नहीं पहचान सके। किसी तरह, उनकी आंखों को यह प्रकट करना यीशु का काम था।

जब वह उनके साथ शामिल हुआ, तो उन्होंने इस्राएल के पूरे इतिहास की व्याख्या की – मूसा से लेकर नबियों तक – यह दिखाने के लिए कि उसका आना परमेश्वर के महान छुटकारे की योजना की पूर्ति थी! अंत में जब वो नीचे बैठे और यीशु रोटी तोड़ने लगे, तो अचानक उन्हें यह प्रकट हुआ कि यह वही था! यीशु ने अपने आप को प्रकाशित किया। यह प्रभु था! लेकिन उसके बाद, वह गायब हो गया।

पुरुषों ने कोई समय बर्बाद नहीं किया। वे उठकर यरूशलेम सीधे वापस चले गए। क्या आप शहर के उन सात मील की दूरी पर उनकी चर्चा और उत्साह की कल्पना कर सकते हैं? उन्हें चेलों को बताना था कि जो महिलाओं ने बोला था, वो सच था!

जब वे आए, तो कुछ और खबर थी। चेलों ने बोला: “प्रभु वास्तव में जी उठा है, और शमौन पतरस को प्रकट हुआ है! ‘” अब, चारों में से कोई भी सुसमाचार हमें यह नहीं बताती है कि यीशु ने पतरस को उसके विश्वासघात के बाद पहली बार मिलने पर क्या कहा। यह यीशु और उसके प्रिय सेवक के बीच एक बेहद निजी समय था। लेकिन क्या आप पतरस और उसके शोकित पश्चाताप की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उसके राहत की कल्पना कर सकते हैं? उसके पास माफी की भीक मांगने का मौका था! उसके लिए यह एक कैसी शक्तिशाली बात रही होगी कि उसके भयानक विश्वासघात के बावजूद, प्रभु यीशु ने उसे मिलने के लिए ढूंडा? प्रिय मरियम के बाद दुनिया में सभी लोगों में से, पतरस जीवित मसीह के साथ मिलने के लिए पहला जन था। क्या ही कोमल प्रभु!

जब चेलों ने क्लीओपस और उसके दोस्त को अपऩी अच्छी खबर बताई, तब यात्रियों ने यीशु के साथ सड़क पर अपनी मुलाक़ात के बारे में चेलों को बताया। उत्तेजित आवाज़ो का कितना शोर होगा!

इसके पश्चात जब पुरुष अपने आश्चर्य में बातें कर रहे थे, वे खतरे की संभावना के बारे में जानते थे। यहूदी नेता खुश नहीं थे। अफवाह यह थी कि वे मसीह के शरीर के चोरी का आरोप चेलों पर लगा रहे थे! तो चेलों ने अपनी बैठक जगह का दरवाजा सावधानी से बंद किया। फिर वे इस अद्भुत सच्चाई पर चर्चा करने के लिए मुड़े: यीशु जीवित था।

पुरुष मेज़ के पास एकत्रित होकर बैठ गए। वे अपने भोजन के पास बैठे उन उल्लेखनीय बातों के बारे में चर्चा करने लगे जो उन के आस पास उस रविवार हुई। अब तक, यीशु ने अपने को केवल चार लोगों को प्रकट किया। वह मरियम के पास  पहले क्यों आए थे? और महिलाओं ने क्यों स्वर्गदूतों को देखा, लेकिन यूहन्ना और पतरस को केवल खुली कब्र और तह लगे हुए कपडे देखने को मिले? धार्मिक नेता अब क्या करने जा रहे थे? क्या वे मसीह के जी उठने को एक धोखा साबित करने के लिए, चेलों को दंडित करने की कोशिश करेंगे? और अब वे यीशु को अगली बार कब देखेंगे?

और फिर,ठीक उनके भोजन के बीच में, प्रभु यीशु एक बार फिर से दिखाई दिए! “‘शांति तुम्हारे साथ हो” उन्होंने कहा।

चेले हैरान हो गए, और उसके बाद वे घबरा भी गए! उन्हे लगा कि यह एक आत्मा है! परमेश्वर के अनन्त दायरे, मसीह के माध्यम से पृथ्वी और प्रकृति के नियमों पर हावी हो रही थी। यीशु को बंद दरवाजे से आके अपने हाथ की सफाई नहीं दिखानी थी। वह सिर्फ वहां बस आ गए! शिष्यों के लिए, यह अजीब और बहकानेवाली बात थी। जिस ठोस और स्थायी दुनिया को वो जानते थे, वो महान यथार्थ अपने असीम रूप से इस ठोस और स्थायी दुनिया को एक अनिश्चित छाया बना रहा था।

यीशु ने पूछा: “तुम इतना परेशां क्यूँ हो, और तुम्हारे मन में संदेह क्यों उठता है?  मेरे हाथ और मेरे पैर देखो, कि यह वास्तव में मै ही हूँ; मुझे छुओं और देखो, क्यूंकि एक आत्मा के पास मांस और हड्डियों नहीं होती, जैसे तुम देखते हो मेरे पास है।”

जैसे ही उन्होंने यह बातें कही, यीशु ने अपने हाथों और पैरों में निशान दिखाए जो उन क्रूर कीलों ने बनाई। फिर उन्होंने अपनी कमर दिखाई जहां भाले ने उसे बेधा था।

फिर वे खुशी से भर गए, और उस पर आश्चर्य करने लगे जो सच नहीं लग रहा था, लेकिन था। यह एक अकल्पनीय आशा थी! यह दिखाने के लिए कि वह सिर्फ आत्मा में नहीं वरण शरीर के साथ भी जी उठा है, यीशु ने पूछा: “‘क्या तुम्हारे पास खाने के लिए कुछ है?”

चेलों ने उसे कुछ भुनी मछली दी।यीशु ने ले लिया और उनके सामने उसे खा लिया। सत्य अब वास्तविकता बन रही थी, और वे उज्ज्वल आश्चर्य से भर गए। जिसको उन्होंने सोचा कि वह हमेशा के लिए खो गया है, वह वापस आ गया था!

यीशु ने समझाया: “‘मैंने तुम्हे यही बताया था जब मै तुम्हारे साथ था: मेरे बारे में जो कुछ मूसा की व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं, और भजन में लिखा है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।” प्रभु ने बार बार कोशिश की उन्हें आने वाली बातों की चेतावनी दे, लेकिन वह उसे तब तक नहीं समझ पाए जब तक वह हुई नहीं। अब भी, उनके सामने जबकि वह स्वयं जीवित थे, उन्हें इसे समझना कठिन था। तो वह उन्हें सिखाने लगे, ताकि उनके दिमाग खुले और वह पूरे रूप से समझ पाए कि कैसे पुराना नियम हमेशा से यीशु की ओर संकेत कर रहा था! खुद यीशु के ही होठों से सुनने के लिए यह एक आकर्षक सबक था! क्या आप उस दीवार पर एक मक्खी होने की इच्छा नहीं करते है?

प्रभु ने आगे बोला:
और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।
और यरूशलेम से लेकर सब जातियोंमें मन फिराव का और पापों की झमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।
तुम इन सब बातें के गवाह हो।
और देखो, जिस की प्रतिज्ञा मेरे पिता ने की है, मैं उस को तुम पर उतारूंगा और जब तक स्वर्ग में सामर्थ  न पाओ, तब तक तुम इसी नगर में ठहरे रहो।।

वाह! यीशु का क्या मतलब था? वो कैसे यरूशलेम में मसीह के बारे में प्रचार करेंगे, यह जान के कि धार्मिक नेताओं का प्रकोप उनका पीछा कर रहा था? और इसका क्या मतलब था कि वह स्वर्ग से सामर्थ पाएंगे?

कहानी १७७: जीवन का सबूत

मत्ती २८:११-१५; मरकुस १६:१२-१५; लूका २४:१३-३५

Conversion of Saul

परमेश्वर की दिव्य योजना का चमत्कार, भूकंप की शक्ति और महिमा, लुड़काए हुए पत्थर, शानदार स्वर्गदूतों, और उनके दुखियारे दोस्तों से कहे गए प्यार के शब्दों से प्रकट हुई। इस बीच, महायाजक एक बार फिर से एक उन्माद में थे। बात यह थी कि कब्र की रखवाली कर रहा रोमी पहरेदार वहां आया था। उन्होंने उस शानदार स्वर्गदूत और पत्थर के लुड़काए जाने के बारे में बताया। पर इन चमत्कारी कामों से यरूशलेम के महायाजकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। क्या यह विचित्र नहीं लगता कि कुछ अविश्वासी सैनिकों के दल ने एक स्वर्गदूत देखने का दावा किया था, ठीक वैसे ही जैसे यहूदी धर्मग्रंथों में वर्णित किया गया है? क्या उन्हें यह भय नहीं था कि कहीं न कहीं, परमेश्वर का हाथ यीशु के पक्ष में था?

जाहिर है नहीं, क्यूंकि उनकी पहली प्रतिक्रिया एक और धोखाधड़ी करने की थी। उन्होंने एक बार फिर बड़ों और महायाजकों को एक साथ बुलाया। उन्हीने गुप्त में आने वाले अफवाहों को खामोश करने के तरीकों पर विचार विमर्श किया। खुली कब्र और यीशु के शरीर के लापता होने की खबर का फैलना लिखा था। जब लोग इसके बारे में सुनेंगे, तो वे निश्चित रूप से यीशु को मसीहा करार करेंगे। यह अचानक बहुत स्पष्ट हो जाएगा कि धार्मिक नेताओं ने परमेश्वर के अपने दूत को मौत की घाटी उतार दिया। उनको यह रोकना होगा। इसलिए उन्होंने पैसे की एक बड़ी राशि एकत्र की और सैनिकों को झूठ बोलने के लिए रिश्वत दी। वे उनकी कहानी बोलने के लिए तैयार हो गए।

बात असल में यह थी कि अगर एक रोमी सैनिक पहरा दे रहा था, यह एक बड़ा अपराध था अगर वो अपनी ज़िम्मेदारी ना निभा पाए। उन्हें मौत की घाटी उतरना पड़ता था। सैनिक उन सुबह के घंटों की घटनाओं को कैसे समझा सकता थे? वे अदालत को यह तो नहीं कह सकते थे कि एक शक्तिशाली स्वर्गदूत वहां आया था। अगर वे झूठ बोलते और कहते कि वे सभी सो गए थे, तो वे इस बात का दावा कर रहे होते कि चेलों ने आकर शरीर को चुरा लिया है। तब, कोई भी मसीह के अनुयायियों पर विश्वास नहीं करता ; क्यूंकि कौन सा सैनिक अपने जीवन को जोखिम में डालकर ऐसी बात  की गवाही करता? तब महायाजक और बड़ों ने सैनिकों को वादा किया कि अगर कभी यह बात राज्यपाल तक कभी पहुंची, तो वे हस्तक्षेप करके उनको प्राणदंड से बचा लेंगे। दोनों पक्षों को इसमें फैदा था।

क्या आप इन लोगों की मूर्खता की कल्पना कर सकते हैं? कौन एक स्वर्गीय दूत के आने के बारे में झूठ कहता?क्या कुछ भी उनके पश्चाताप का कारण नहीं बनेगी? लेकिन उनके दिल इतने कठोर थे कि इस सब का कोई फैदा नहीं था। बस एक सप्ताह पहले ही, यीशु ने एक अमीर आदमी और लाजर के बारे में एक दृष्टान्त बताया। उस कहानी में, यीशु ने यह कहा कि जो कोई सच में पुराने नियम के परमेश्वर को प्यार करता, वो उनके अपने शब्दों को भी प्यार और सम्मानित करता। उन्होंने इस बात की चेतावनी भी दी कि जिनका दिल कठोर है, वो तब भी पश्चाताप नहीं करेंगे अगर कोई मुर्दों में से जी उठे। याजकों, फरीसियों और बड़ों ने इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया, और अब यह सच हो रहा था। वे पूरी तरह से परमेश्वर के शातिर दुश्मन के काम में लगे थे – वो था परमेश्वर के वैभवपूर्ण, नए काम को लोगों से छिपाना और मसीह के पुनुरुथान का शुभ सन्देश लोगों से दूर रखना।

इन छोटे पुरुषों के लिए यह विश्वास करना कितनी मूर्खता थी कि वे परमेश्वर की योजना को विफल कर सकते है। असल में, यह उनके परमेश्वर पर अविश्वास का संकेत करता है। वे केवल सत्ता के लिए अपनी इच्छा के प्रकाश में चीजों को देख रहे थे। लेकिन इसराइल में यह हर किसी के लिए सच नहीं था। परमेश्वर ने कईयों को अपना बनाया था, और शुभ सन्देश उन्हें बहुत स्पष्ट से समझ आता!

ऐसे दो पुरुष, फसह पर्व के बाद अपने घर जा रहे थे। वे इम्मौस को जा रहे थे जो यरूशलेम से सात मील की दूरी पर था। जैसे वे चल रहे थे, वे पर्व पर हुई उन अविश्वसनीय बातों के बारे में चर्चा कर रहे थे। वे गहरी बातचीत में चल रहे थे जब यीशु भी उनके साथ शामिल हुए। उनकी आँखें को उसे पहचानने से रखा गया था, तो वे उन्हें एक अजनबी के रूप में देख रहे थे। यीशु ने पुछा :“यह कौन से शब्द है जो तुम एक दूसरे के साथ आदान प्रदान कर रहे हो ?”

पुरुष वहीँ रुक गए। इस सवाल ने उनको गहरी उदासी में डाल दिया। क्या इस आदमी को वास्तव में नहीं पता था? पुरुषों में से एक का नाम क्लीओपस था। उसने पूछा, “‘क्या येरूशलेम में होने वाली बातों के बारे  में तुम कुछ नहीं जानते ?”

यीशु ने पूछा ”क्या बातें?”

वे कितने चकित हुए होंगे! क्या यह आदमी दीन  दुनिया से अलग किसी गढढे  में रहता था? उन्होंने कहा: ‘‘यीशु नासरी के बारे में -जो परमेश्वर और सब लोगों की दृष्टि में कर्म और वचन में एक शक्तिशाली नबी था , और कैसे मुख्य याजकों और हमारे शासकों ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। लेकिन हम इस बात की आशा कर रहे थे कि वह इसराइल के राज्य को मुक्त करेगा। दरअसल, इस सब के अलावा, इन बातों को हुए तीन दिन हो गए है। और तो और, हमारे बीच कुछ महिलाओं ने हमें चकित कर दिया। जब वे सुबह जल्दी कब्र पर गई और उनको शरीर को वहां नहीं पाया, तो वे वापस यह कहते हुए आई कि उन्होंने  स्वप्न में स्वर्गदूतों को देखा था जिन्होंने कहा कि यीशु जिंदा है। और हम में से कुछ कब्र पे गए और सब कुछ वैसे ही पाया जैसे महिलाओं ने देखा, लेकिन यीशु  नहीं दिखाई दिए।”

तब यीशु ने कहा : ‘हे ​​मूर्ख आदमी और कमज़ोर दिल। तुमने नबियों के बोल पर विश्वास नहीं किया! क्या यह मसीह के लिए आवश्यक नहीं था कि वो इन बातों की पीड़ा उठाए और अपनी महिमा में प्रवेश करे? ‘”

तब यीशु ने उन्हें इतिहास के सबकों के इतिहास में सबसे अच्छा इतिहास सबक दिया। उन्होंने मूसा के साथ शुरू किया और फिर सारे नबियों के बारे में – यह दिखाने के लिए कि वो कैसे पूरे पुराने नियम भर मसीह के आने के बारे में बताते थे। यह एक बहुत ही दिलचस्प सफ़र रहा होगा। जैसे जैसे वे चल रहे थे, उनके सामने इतिहास के सैकड़ों वर्ष सामने थे। आखिरकार, वे एप्रैम पर पहुंचे। यीशु और आगे जाना चाहते थे। पुरुष नहीं चाहते थे कि वो जाए। “‘हमारे साथ रहिये” उन्होंने कहा”‘ अब शाम की ओर हो रहा है और दिन अब लगभग खत्म हो गया है।” तो वह उनके घर चले गए।

भोजन का समय आया, और जब यीशु मेज के पास बैठे, उन्होंने कुछ रोटी ली और उसे तोड़ी। फिर वह उन्हें एक एक टुकड़ा देने लगे। अचानक, वे यह जाने कि यह खुद यीशु ही है! उनकी आँखें खुल गई थी! इसके तत्काल बाद, वह उनकी नजर से गायब हो गए।

यीशु के लिए यह कितनी खुशी की बात होगी कि वह इस चमत्कारिक ढंग से अपने प्रिय मित्रों के जीवन में आए, और उन गौरवशाली बाते जो उन्होंने उनके लिए की, उसके मानो छोटी छोटी खिड़कियाँ खोल दे।  पुरुष वहाँ बैठे दंग रह गए, और वे कहने लगे, “‘क्या हमारे दिल भीतर से नहीं जल रहे थे जब वो हमसे रास्ते में बात कर रहे थे और वचन सिखा रहे थे?'”उस ही घंटे के भीतर, पुरुष उठे और यरूशलेम को वापस चले गए। उन्हें चेलों को बताना था!

कहानी १७६: मरियम की आवाज

हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते है कि मरियम मगदलीनी ने क्या सोचा और महसूस किया होगा जब वो यीशु के पीछे चलती थी और उनकी मृत्यु और जी उठने से गुजरी। बाइबल हमें कुछ करीबी चित्र देती है जो हमें कल्पना करने में मदद करती है कि उसने क्या कहा होगा। यूहन्ना प्रेरित हमें यीशु के जी उठने की कहानी का लम्बा संस्करण, मरियम के आँखों देखी से बताता है। यीशु ने बहुत महान, भव्य, और शानदार काम किए और कई महाकाव्य घटनाए हुई जब उन्होंने येरूशलेम को ऊपर नीचे कर दिया।  लेकिन, मरियम की कहानी में हम देखते है कि कैसे मसीह के लिए अपने प्रिय जनों के प्रति कोमलता एक प्राथमिकता थी। हम यह भी देखते है कि उनका रिश्ता अपने चेलों के साथ शिक्षक और छात्र जैसा अवैयक्तिक नहीं था – बल्कि उससे बहुत बड़ के था। वह एक बिना दिल के कट्टरपंथी आदेश देने वाला देवता नहीं था। यीशु प्यार करते थे, और वे उसके प्यार को महसूस करते थे और उसकी लालसा करते थे। और वे बदले में उसे प्यार करते थे। तो, यहाँ पर उस प्रेम का चित्रण है जो उस व्यक्ति ने महसूस किया होगा जिसको यीशु ने पुनरुथान के बाद सबसे पहले प्रकट होने के लिए चुना।

जब मैंने गिरफ्तारी के बारे में सुना, मुझे समझ में नहीं आया कि मै क्या करू। यह एक कुल आश्चर्य की बात नहीं थी। वे सालों से प्रभु को गिरफ्तार करना चाहते थे, पर किसी तरह, यीशु हमेशा सहज प्रयास के साथ ऐसा होने नहीं देते थे। बल्कि इस बात से हम बहुत मनोरंजित रहते थे। लेकिन इस बार यह वास्तव में हुआ, और इसका विश्वास करना मुश्किल था। यूहन्ना, यीशु की माँ और मुझे लेने आया था। शहर भयंकर कोलाहल में था। यह सब द्वेष कहां से आया? उसने संभवत: ऐसा क्या किया था?वो इधर उधर की जगाहों में हमे चंगाई देता। उन्होंने मुझे चंगा किया। इस बात का कोई मतलब नहीं बनता है।

हम भीड़ में खड़े होकर यह सब देखते रहे। यह भयानक था। सैनिकों ने इन भयानक कीलों को लेकर उनकी कलाई में धड़ से घुसा दिया। बेचारी मरियम। वह उनके हर दर्द से पिस गई। रक्त भयानक था। ठठ्ठा करने वाली भीड़, भयंकर सैनिक, और वो लानत भरे धार्मिक नेता बस वहाँ खड़े रहे। लेकिन किसी तरह, यूहन्ना, मरियम और मैं उनके बहुत पास थे, इतने पास कि सब कुछ पृष्ठभूमि में फीका हो गया।

जबकि वो क्रूस पर लटके थ, तो भी उनकी आवाज कोमल और प्रभावशाली थी। यह उन लोगों को समझाना मुश्किल है जो उन्हें नहीं जानते थे। उनमे महिमापूर्ण गौरव था, जबकि वह नग्न लटके थे, और गंदगी, पसीने और खून से लथपथ थे। अँधेरा एक दया का रूप था, और भूकंप जिसने धरती हिला दी, वो मेरे क्रोध और क्षति की शारीरिक अभिव्यक्ति थी। मै दुनिया को ऐसी हिंसा से झिंझोड़ना चाहती थी, जिसको वो अनसुना नहीं कर सकती थी, और कहना चाहती थी “क्यों?”. मैं चीखना चाहती थी “तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?”

लेकिन उसने ऐसा किया, और वह चला गया। लेकिन मैं उसे वहां नहीं छोड़ पाई। मैं बस वहाँ खड़ी रही, मानो लकुआ मार गया हो – जब उन्होंने यीशु के शरीर को नीचे उतरा। वहां था मेरा प्रभु – शिथिल और टूटा हुआ। उसकी मां कितना रोई। आरिमथिया के यूसुफ उनका शरीर लेने आए, पर मै अब भी उस जगह को नहीं छोड़ पाई। मैं उनके साथ उनके पीछे चली गई, और मरियम भी मेरे साथ शामिल हुई। मुझे पता लगाना था कि वे उसे कहाँ ले जा रहे है। मुझे उनके साथ साथ जाना था। मैं छोड़ नहीं पा रही थी। वे उन्हें सफेद कपड़े पहनाने लगे और हम कब्र के सामने बैठ गए। वे बाहर आए और एक बड़े पत्थर के साथ उनकी कब्र को बंद कर दिया। मेरा दिल चिल्ला उठा “यह अंत नहीं हो सकता!” ऐसा कुछ अवश्य होगा जो हम कर सकते थे। यह बहुत छोटा था, बहुत जल्दी। जुलूस कहां थी? सारे यरूशलेम को इस मौत का विलाप करना चाहिए था। पूरी दुनिया को ठहर कर जीवन भर दुःख मानना चाहिए था। तो हम चले गए और वह एकलौता काम किया जो हम कर सकते थे। हम गए और उनके शरीर के लिए अधिक मसाले तैयार करने लगे। हम और कैसे अपने प्रभु का सम्मान कर सकते थे? हम और कैसे उसे फिर से देख सकते थे?

परमेश्वर मुझे माफ करें, लेकिन वो उच्च और पवित्र सबत अति पीड़ादायक था। यह मेरे और मेरे प्रिय के बीच एक बड़ी बाधा की तरह था। मुझे उनके पास जाना ही था। मुझे उनके पास जाना था –  सिर्फ उसको छूने के लिए जिसने मुझे छुआ था।

यीशु अक्सर कहानियाँ बताते कि कैसे जो लोग सबसे अधिक प्यार करते थे, उन्हें सबसे ज्यादा माफी की जरूरत होती थी। मुझे लगता है कि यह मेरी हताशा बताती हैं। यीशु के पीछे चलने वाली महिलाओं में से बहुत सी सम्मानजनक तरीके में उसके पास आई। उनका विवाह सत्ता और धन के पुरुषों के साथ हुआ था, और उन्होंने इसका इस्तेमाल परमेश्वर को आशीषित करने और उनकी सेवकाई को आगे बड़ाने के लिए किया। उनके पास देने के लए बहुत कुछ था। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती हूँ कि ऐसा कैसा होता होगा। मेरी दुनिया बहुत अलग थी। मेरा परिवार उस प्रकार का था जो अपने बच्चों के जीवन में शैतानी बंधन को आमंत्रित करता था। जब मैं यीशु से मिली, उस समय सात दुष्ट आत्माए मुझे परेशान कर रहीं थी। उसने मुझे अपमान और एक अलगाव के जीवन की ओर ढकेला … मैं बहिष्कृत थी। मुझे अपने साथ किसी तरह का संबंध स्वीकार करना शर्मनाक लगता था। मुझे छुटकारे का कोई सपना नहीं था। अगर मुझे छुटकारा मिलता भी, मेरे पास प्यार या स्वीकृति के लिए कोई आशा नहीं थी। मग्देला जैसे एक गांव की स्मृति बहुत लंबी है। चाहे कितना परिवर्तन मेरे में आ जाए, मैं हमेशा अपने शर्म के लिए जानी जाउंगी। किसी कारण, मुझे निंदा के जीवन के लिए चुना गया था। परमेश्वर का हाथ मेरे विरुद्ध था।

लेकिन तब यीशु आए, और सब कुछ बदल गया। उन्होंने मेरे उत्पीड़कों को वापस भेजा। लेकिन उससे बड़कर, उन्होंने खुद को मेरे लिए दे दिया। उन्होंने मुझे प्यार किया। और उनके प्यार की वजह से, मैं देखभाल के एक पूरे समुदाय में ले ली गई। लोग जिन्होंने सारी ज़िन्दगी मुझे नहीं स्वीकारा, अब मुझे यीशु के प्यार की रोशनी में देख रहे थे। उनकी अपनी मां मुझसे प्यार करती थी। यह घर था।

मै सुबह तड़के, सलोमी की मां के साथ, कब्र के लिए निकल पड़ी। मुझे लगता है कि हम दोनों बहुत लालसा से वहां गए थे। मैं सिर्फ उनके साथ, उनके बाजू में कुछ अधिक क्षणों को बिताना चाहती थी। मै उनको एक सभ्य दफ़न से सम्मानित करना चाहती थी। हम इसी विचार में थे कि हम पत्थर को कैसे हटायेंगे। लेकिन जब हम वहां पहुँचे, हम सदमे में वहां खड़े हो गए। किसी ने हमसे पहले आकर भारी पत्थर को लुढ़का दिया था। रोमी सैनि,क जो वहां पहरेदारी कर रहे थे, चारों ओर चित्त पड़े हुए थे, मानो कोई गहरी नींद में हो। हम शरीर को देखने के लिए अंदर धीरे से गए। वह वहाँ नहीं थे। मेरा दिल सबसे नीचे, गहरी निराशा में लांघ गया।

अचानक, दो पुरुष शानदार, चमकदार सफेद में दिखाई पड़े। मरियम और मैं भूमि पर अपने चेहरे करके गिर गए। हमने पढ़ा था कि स्वर्गदूत से मिलना कैसा होता है, लेकिन अभी तक किसी ने मुझे इसके लिए तैयार नहीं किया। यह एक ही क्षण में प्रतिभाशाली, भयानक और आनाद्पूर्ण था।

” “तुम मृतकों में जीवितों को क्यूँ ढूँढ रहे हो?  “उन्होंने पुछा। मैं वास्तव में उनका मतलब पकड़ नहीं पाई, लेकिन वे बोलते गए, “‘डरो मत, क्यूंकि मै जानता हूँ तुम किसे ढूँढ रहे हो। वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है! याद करो कि जब वो तुम्हारे साथ यहाँ गालील में था तो उसने तुम्हे क्या बताया था- यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र पापी पुरुषों के हाथों में डाल दिया जाए, क्रूस पर चढ़ाया जाए और तीसरे दिन फिर से उठाया जाए। “‘

अचानक, मुझे यीशु के शब्द याद आए। मैं उन्हें कैसे भूल गई थी? क्या यह सब एक योजना थी?

स्वर्गदूतों ने फिर बोला: “”जल्दी जाओ, उनके चेलों को बताओ कि वो मुर्दों में से जी उठा है। वह गलील में तुम से पहले जा रहा है, वहाँ तुम उन्हें पाओगे, जैसे उन्होंने तुमसे कहा। ‘”

फिर स्वर्गदूत वहां से चले गये। मरियम और मैं कब्र से बाहर भागते हुए आए। जब हम बाहर आए, तो  हम कांप रहे थे, और पूरी तरह से चकित खुशी और चौंकाने वाले भय से जकड़े हुए थे। फिर हम चेलों को यह अकल्पनीय अच्छी खबर बताने के लिए भाग निकले।

बेशक, जब हम वहाँ पहुंचे, तो चेलों ने सोचा कि हम बकवास कर रहे थे। हमने शायद अपने उत्साह में ऐसा थोड़ा किया भी हो। लेकिन जो हमने कहा, उसने पतरस और यूहन्ना के तहत एक चिंगारी जैसी जलाई। वे भागते हुए कब्र की ओर निकले। मैं उनके पीछे – पीछा चली गई। स्वर्गदूतों के शब्दों धीरे धीर वास्तविक लग रहे थे, लेकिन कब्र अभी भी अपने प्रभु के पास होने के लिए सबसे अच्छा तरीका लग रहा था।

मैं पिछले कुछ दिनों दु: ख में इतनी घिरी हुई थी, कि मै घटनाओं के इस उलट फेर को समझ नहीं पा रही थी। पतरस और यूहन्ना आए और गए, लेकिन मैं वहीँ ठहरी रही। मैं बस छोड़ ही नहीं पा रही थी। ऐसा लग रहा था कि स्वर्गदूतों ने जो कहा, उससे कोई फर्क नहीं था—- वह अभी तक गायब था और गलील दूर, बहुत दूर था।

मेरे दु: ख ने मुझे फिर से घेर लिया। मैं कब्र के अंदर एक बार और देख कर रोने लगी। वो दो स्वर्गदूत एक बार फिर वहाँ थे। “‘नारी, तू क्यों रोती है?” उन्होंने कहा। मैं एक बेवकूफ की तरह लग रही होंगी, लेकिन यह सब अनंतकाल की दूसरी ओर समझने में बहुत आसान था। “‘क्योंकि वे मेरे प्रभु को उठा ले गए है, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने प्रभु को कहाँ रखा है।”

और फिर वह मेरे पास आए। मैं यह नहीं जानती कि उन्होंने मुझे उन्हें पहली बार देखने के लिए क्यूँ चुना। शायद इसलिए क्यूंकि मेरी जरूरत सबसे बड़ी थी। मजेदार बात यह है, कि मैंने उन्हें पहली बार में पहचाना नहीं। इस अजीब आदमी ने मुझसे पूछा, “‘नारी, तू क्यों रोती है? तुम किसे खोज रही हो?” मुझे लगा यह माली था। स्वर्गदूतों को यह बहुत मनोरंजक लग रहा होगा। मैंने कहा: “‘सरकार, अगर आपने उन्हें उठाया है, तो मुझे बताएँ की आपने उसे कहाँ रखा है ताकि मै उन्हें ले जाऊं।”

और फिर यीशु ने मुझसे कहा,’ मरियम’, और मैं जान गई। उन्होंने जैसे ही मेरा नाम लिया, सब कुछ बदल गया। मैंने उनकी ओर मुड़ा और कहा, “‘गुरु!” मैं उनके चरणों में गिर गई और अपने हाथों से उनके पैरों को पकड़ लिया – ऐसा जैसे कि मै उन्हें कभी न छोडूं।

मुझे लगता है कि यीशु हँस रहे थे जब उन्होंने कहा, “मुझे पकड़ों मत,  क्यूंकि मै अभी तक अपने पिता के पास नहीं पहुंचा हूँ। इसके बजाय, मेरे भाइयों के पास जाओ और उन्हें बताओ, “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास लौट रहा हूँ।”

मैं उनसे हमेशा के लिए चिपटी रह सकती थी, लेकिन मुझे पता था कि मुझे वो करना था जो उन्होंने आदेश दिया। तो मै यह खबर के साथ चेलों के पास गई। आने वाले दिनों और हफ्तों में, हम सब को उन्हें देखने को मिला, और उन्होंने हमें बहुत कुछ सिखाया। उनके पास होना बहुत संतोषजनक रहा था, और जिस समय तक वह स्वर्ग में चढ़ गए, मुझे लगता है कि हम सब यह समझ गए थे कि हम वास्तव में उन्हें खो नहीं रहे थे – जबकि वो एक बहुत अलग तरह से उपस्थित होंगे। लेकिन यह मेरे दिल को नहीं बदलता है। इस दुनिया के प्रस्ताव, उस जीवन की अधिकता जो हम परमेश्वर की उपस्थिति की चमक में महसूस करेंगे, फीके और तुच्छ लगते है। मेरी आशा है कि एक दिन, मैं आपको वहां पाउंगी।

कहानी १७५: जी उठा

मत्ती २८:१-१०, मरकुस १६:१-२२, लूका २४:१-१३, यूहन्ना २०:१-१८

Ressurrection of Christ

रविवार की सुबह आई। यह यहूदी सप्ताह का पहला दिन था। मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम सुबह होने से पहले अपने बने मसालों के साथ तैयार थी। जैसे जैसे सूरज पूर्वी आकाश को हल्का करने लगा, वे अन्य महिलाओं के साथ कब्र के लिए निकल पड़ी। उनकी यात्रा में कुछ बिंदु पर ज़मीन हिलने लगी। यह एक और भूकंप था। इसका क्या मतलब हो सकता है? अक्सर बाइबिल में भूकंप परमेश्वर के आने का एक संकेत था।

लेकिन शायद उनके विचार अभी भी अपने दु: ख से भरे हुए थे। वे भूकंप के आश्चर्यजनक, अद्भुत अर्थ का अनुमान नहीं लगा सकीं। क्यूंकि असल में, परमेश्वर आए थे। यीशु मरे हुओं में से जी उठे थे! और जब एक शानदार स्वर्गदूत उसके कब्र पर पत्थर को लुड्काने आया था, पृथ्वी कांप उठी। जब रोमी पहरेदारों ने उस चमकदार स्वर्गीय प्राणी को देखा, तो वे भय से भर कर ज़मीन पर गिर गए।

स्वर्गदूत यीशु को बाहर निकलने में मदद के लिए नहीं आया था। परमेश्वर अपने अविनाशी जीवन की शक्ति के आधार पर जी उठे थे। वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शक्ति में जी उठे। और जब स्वर्गदूत ने पत्थर लुढ़काया, तो वह परमेश्वर के काम का एक प्रकाशन, एक घोषणा थी! क्या ही महान घटना का एक अकाट्य सबूत!

लेकिन महिलाओं को अभी तक यह पता नहीं था। जैसे वो साथ चल रहीं थीं, वे सोच में थी कि पत्थर को कैसे हटाया जाए। क्या रोमी पहरेदार उनको कब्र के पास जाने देंगे?

जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि अब यह एक प्रश्न नहीं रहा। हैरान रोमन पहरेदारों के शव चारों ओर पड़े हुए थे। क्या चल रहा था? कब्र के अंदर जा कर उन्होंने पाया कि शव तो गायब था। यह कैसे हो सकता है? वे प्रभु को कहाँ ले गए थे? वे भ्रम और थके हुए, दु: ख में एक दूसरे को देखने लगे।

अचानक, दो स्वर्गदूत शानदार सफेद कपड़ों में दिखाई पड़े। महिलाए डर में अपने चेहरे के बल ज़मीन पर गिर गई।

स्वर्गदूतों में से एक ने उन से पूछा, “तुम मृतकों में जीवितों को क्यूँ ढूँढ रहे हो? डरो मत, क्यूंकि मै जानता हूँ तुम किसे ढूँढ रहे हो। वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है! याद करो कि जब वो तुम्हारे साथ यहाँ गालील में था तो उसने तुम्हे क्या बताया था- यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र पापी पुरुषों के हाथों में डाल दिया जाए, क्रूस पर चढ़ाया जाए और तीसरे दिन फिर से उठाया जाए “‘

जैसे जैसे स्वर्गदूत बोलता गया, वैसे वैसे महिलाओं ने यीशु के शब्द याद किये।

स्वर्गदूत ने कहा: “‘जल्दी जाओ, उनके चेलों को बताओ कि वो मुर्दों में से जी उठा है। वह गलील में तुम से पहले जा रहा है, वहाँ तुम उन्हें पाओगे, जैसे उन्होंने तुमसे कहा। ‘”

महिलाए डर और खुशी से काँप उठी। वे शिष्यों को यह अद्भुत खबर बताने के लिए कब्र से चल पड़ी। उन्होंने रास्ते में किसी से बात नहीं की,यह डर से कि वे इस आश्चर्यजनक खबर के बारे में क्या कह दे। उन्होंने ग्यारह को पाया और अपने आँखों देखा हाल उन्हें बताया। महिलाओं के शब्द बकवास की तरह लग रहे थे। और कुछ हद तक, वे थे। यहां तक ​​कि मरियम मगदलीनी की रिपोर्ट अभी उलझन से भरी थी। “‘वे प्रभु को कब्र से बाहर ले गए है, और हम नहीं जानते है कि उन लोगों ने उन्हें कहाँ रखा है'” उसने घोषणा की। अपनी हताशा में, उसके पास सिर्फ एक ही ख्याल था। शानदार स्वर्गदूतों के शब्द उसके लिए कोई मान्यता नहीं रखते थे। उसके लिए सिर्फ प्रभु को ढूँढना मायने रखता था।

पहले तो चेलों ने महिलाओं पर विश्वास नहीं किया। लेकिन जब वह इन शब्दों को समझने लगे, पतरस को लगा कि इस बात में सच्चाई हो सकती है! वह कूद कर कब्र की ओर भागा। यूहन्ना भी बहुत पीछे नहीं था। वे पूरी ताकत लगा के भागे। यूहन्ना जवान और तेज़ था और सबसे पहले कब्र पर पहुंचा। वह प्रवेश द्वार पर रुका और एक शरीर या एक दूत या एक चिन्ह के लिए खोजने लगा। वहाँ, जहाँ यीशु को रखा गया था, बड़े तरीके से कपड़ा में तह लगा हुआ अलग रखा था। चेहरे का कपड़ा एक ओर अलग से रखा था। पतरस यूहन्ना को पार कर सीधे कब्र में घुस गया। उसने भी वो कपड़े की पट्टियाँ देखीं। यूहन्ना पतरस के पीछे आया, और इसके अर्थ के बारे में दोनों सोचने लगे। यूहन्ना ने विश्वास किया पर फिर भी विचारा। दोनों इस बात की पूर्णता को नहीं समझ पा रहे थे। सांसारिक रूप से, यह नए तथ्य कुछ अटपटे लग रहे थे। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे थे कि येशु को मुर्दों में से जिंदा होना था। चेले कब्र छोड़ कर चले गए और वापस अपने घरों को लौट गए।

मरियम मगदलीनी उन लोगों के पीछे कब्र की ओर बड़ रही थी। वह वहाँ खड़े होकर रोने लगी। क्यूंकि उसके पास कहीं जाने को नहीं था। प्रभु यीशु उसकी आशा और जिंदगी बन गए थे। वह द्वार के पास गई और अंदर कदम रखा। एक बार फिर, दो स्वर्गदूत उसके समक्ष पेश हुए। एक, जहाँ यीशु को रखा गया था, उसके सिरे और उसके पैर में बैठे थे।

आने वाले दिनों में, मरियम और चेलों ने इसके बारे में विचारा होगा। क्यूंकि यह वही चित्र था जो वाचा के सन्दूक के ढक्कन पर पाया जा सकता था और जो केवल परम पवित्र में रखा जाता था। यह सोने का डब्बा परमेश्वर ने मूसा के लिए बनाया था। ढक्कन ही शुद्ध सोने का बना था, और उसे परमेश्वर की दया की गद्दी बुलाई जाती थी। परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिए कि सन्दूक के दोनों छोर पर दो, गौरवशाली, सुनहरे स्वर्गदूतों की प्रतिमा लगाईं जाए। उनके पंख दया की गद्दी पर फैले थे। यह सन्दूक खोने से पहले, इसराइल के देश की सबसे पवित्र चीज़ थी, और इसकी छवि हर यहूदी के मन में गड़ी थी। अब, मसीह स्वयं परमेश्वर की दया की गद्दी थे – वो महान प्रायश्चित जिसके द्वारा सारे मानव का उद्धार हो सकता है। जब यह दो स्वर्गदूत उनके बलिदान हुए शरीर की जगह पर इर्द गिर्द बैठे थे, तो क्या उन महिलाओं को यह समझ में आया होगा?

यह सारी गहरी और सुंदर चीज़े वो गौरवशाली सत्य थे जिन्हें आने वाले सालों में कलीसिया समझेगी और अनुभव करेगी। प्रेरित यूहन्ना ने अपने लेखन में यह सुनिश्चित किया। लेकिन स्वर्गदूतों की उपस्थिति में रो रही वहां खड़ी तबाह मरियम के दिमाग में, यह बातें नहीं थी।

“‘नारी, तू क्यों रोती है?” उन्होंने कहा.

वह सिर्फ प्रभु के बारे में ही सोच सकती थी। “‘क्योंकि वे मेरे प्रभु को उठा ले गए है, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने प्रभु को कहाँ रखा है'” उसे अभी भी उनके जी उठने की आशा नहीं थी, लेकिन उसका प्यार इतना विशाल था कि उसे अपने प्रभु को खोजना था।

जैसे ही उसने यह कहा, वह जाने को निकली, लेकिन वहाँ एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन उसे यह पता नहीं था। उसे लगा कि यह माली है।“‘नारी, तू क्यों रोती है?'” यीशु से पूछा। “‘तुम किसे खोज रही हो?”

उसने कहा, “‘सरकार, अगर आपने उन्हें उठाया है, तो मुझे बताएँ की आपने उसे कहाँ रखा है ताकि मै उन्हें ले जाऊं।”

वह अपने उद्धारकर्ता को कितना प्यार करती थी! क्या आप इस लालसा को सुन सकते हैं? यीशु भी सुन सकते थे। “‘मरियम,” उन्होंने कहा। जैसे ही उन्होंने मरियम का नाम लिया, वो पहचान गई कि वो कौन थे। “‘गुरु!'” वह बोल पड़ी। वह धरती पर गिर पड़ी और अपने को उनके पैरों से लपेट लिया।

” मुझे पकड़ों मत’, यीशु ने कहा, ” क्यूंकि मै अभी तक अपने पिता के पास नहीं पहुंचा हूँ। इसके बजाय, मेरे भाइयों के पास जाओ और उन्हें बताओ, “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास लौट रहा हूँ।”

मरियम बेसुध उत्साह से भर गई। उसका प्रिय प्रभु गायब नहीं हो गया था! उन्होंने उसे छोड़ा नहीं था! उसका उत्तम प्रेम जिंदा था! वह चेलों को यह अकल्पनीय अच्छी खबर बताने के लिए भागी। “‘मैंने प्रभु को देखा है!'” उसने घोषणा की। फिर उसने इन बातों का विवरण दिया। क्या आप उनके सदमे और उत्तेजना की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उन सवालों  की कल्पना कर सकते हैं जो उठे होंगे? और अब आगे क्या होने जा रहा था?

कहानी १७४: कब्र और इंतज़ार की घड़ी 

मत्ती २७:५७-२८:८, मरकुस १५:४२-१६:११, लूका २३:५०-२४:११, यूहन्ना १९:३८-४२

Cementary of  Pere Lachaise in Paris

मसीह के शरीर को क्रूस से उतार लिया गया। एक आदमी था जिसका नाम था अरिमथिया का यूसुफ़ था, जो यीशु पर विश्वास करता था और गुप्त में उसका चेला था। वह एक सच्चा शिष्य था, लेकिन वह महासभा का भी सदस्य था। परमेश्वर के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की नफरत इतनी ज्यादा थी कि यूसुफ इस बात का खुलासा करने में डरता था। अगर वे उसके खिलाफ हो गए, तो वह सब कुछ खो देगा।

उस दिन के भयानक अन्याय पर उसे कितना शोक हुआ होगा . . ये वह आदमी थे जिसके साथ उसने अपना जीवन बिताया था। वह उस ज़माने के कुलीन वर्ग थे जिसकी वजह से उसने अपने विश्वास को दबा के रखा था। उसे उनके प्रतिघातक व्यवहार से कितनी घृणा होती होगी। मसीह के लिए खड़े होने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। कम से कम वो उसकी मौत में उसे सम्मान दे सकता था। सप्ताह की घटनाए ऐसे थी कि यह खबर, कि महासभा का एक सदस्य यीशु को इतना सम्मान दे रहा है, पूरे इस्राएल में फैल जाती। इसको दुश्मन के साथ दोस्ती के रूप में देखा जाता। लेकिन यूसुफ पेंतुस पीलातुस के पास गया और मसीह के शरीर को दफ़नाने के लिए इजाज़त मांगी। एक बार फिर, इस आदमी यीशु के मामले पीलातुस के सामने आए। उसने अपनी सहमती इस आदमी को दे दी जो स्पष्ट रूप से यीशु का भक्त था।

यूसुफ मसीह का शरीर मांगने गया। निकोदेमुस मदद के लिए आया था। वह अपने साथ चौतीस किलो मुसब्बर लोहबान लाया, वो सामग्री जो यहूदी मृत के संरक्षण के लिए परंपरागत रूप से प्रयोग करते थे। निकोदेमुस भी मसीह का एक शिष्य था, और यूसुफ की तरह, उसने भी इसे छिपा रखा था। वो रात में प्रभु से सवाल पूछने के लिए आता था क्यूंकि उसे डर था कि इस बात को जानने के बाद कि वो यीशु पर विश्वास करता है, नेतृत्व उसके साथ कुछ भी कर सकती है। नेतृत्व का रोष कम नहीं हुआ था, लेकिन मसीह के उज्ज्वल पवित्रता के खिलाफ उनके महान अपराधों ने निकोदेमुस को कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा। उनकी मृत्यु में भी, प्रभु यीशु उसकी वफादारी के हकदार थे। वो उन सभी बातों के लिए खड़ा होगा जो यीशु था। वह उसको अब आदर देगा, चाहे उसकी कोई कीमत क्यों न हो।

उन्होंने यीशु का शरीर लिया और उसे चादर के साथ मसाले में बाँधा। जिस जगह यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, उसके पास एक बगीचा था। वहां एक कब्र थी जिसमे किसी को भी पहले दफन नहीं किया गया था। यह जगह जाने माने, अमीर लोगों की अंतिम विश्रामस्थल थी। और क्यूंकि यह कबर क्रूस के पास थी, यह लोग सूर्यास्त और सबत से पहले, यीशु के शरीर को तरीके से दफना सके। एक बार फिर, उन्होंने अनजाने में वचन की पूर्ती की। यशायाह 53:9 में लिखा है: “और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का अपद्रव न किया या और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।”  जब वे कब्र में मसीह को छोड़ कर निकल रहे थे, उन्होंने एक बड़े पत्थर को प्रवेश द्वार पर लुढ़का दिया। मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम उनके पीछे आए ताकि वह यह जान सके कि मसीह को कहाँ दफनाया गया था। तब वे मसाले खरीदने के लिए बाहर चली गई। वे यीशु को एक उचित दफन देने साबत के बाद लौटने को थी।

शुक्रवार शाम हो गई, और फसह का सबत शुरू हुआ। इसराइल भर से परिवार जो सफ़र करके आए थे, वो अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साथ जश्न मनाने और आराम करने के लिए एक साथ इकट्ठे हुए। शनिवार की बाकी भी ऐसे ही गई। किसी को कोई काम नहीं करना था। पूरा देश अपने परमेश्वर के अद्भुत काम का लुप्त उठाने का अवकाश ले रहा था। यरूशलेम  में एक दिन पहले, शहर को उल्टा करने वाली घटनाओं से उनका दिमाग भरा हुआ था। क्या उनमें से किसी के पास यह देखने के लिए आँखें थी कि यह सब परमेश्वर के सबसे बड़े काम का उत्प्रवाह है?

जबकि इसराइल में बाकी सब सबत का सम्मान कर रहे थे, फरीसी और महायाजक व्यस्त थे।उनके पास कुछ काम था। यीशु ने कब्र से फिर से उठने का दावा किया था। क्या या हो सकता था कि उसके चेले उसके जी उठने की जालसाजी कर रहे हो? इससे उनको यह सब साफ़ करने के लिए एक नया झंझट पैदा होगा! वे सालों के लिए यह विधर्म लड़ते रहेंगे। कैसी विडंबना है कि यह मनहूस नेताओं ने मसीह के शब्दों को याद किया। उसके अपने ही शिष्य यह पूरी तरह से भूल गए थे! वे ऐसी आशा के लिए दु: ख में निगले हुए थे। लेकिन यहूदी नेता यह नहीं जानते थे और वे एक और अनुरोध के साथ पिलातुस के पास वापस गए।

हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमानेवाले ने आपको जीते जी कहा या, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। 
सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहनें लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।  -मत्ती २७:६३-६४

कल्पना कीजिए कि यह अनुरोध सुनके पिलातुस को कैसा लगा होगा। यह यीशु जो एक अदृश्य देश का राजा होने का दावा कर रहा था, वही यीशु मरे हुओं में से जिंदा होने को दावा कर के गया था। वह इस सब से क्या समझे? पिलातुस ने उन्हें देखा और कहा, “‘तुम्हारे पास एक गार्ड है। जाओ और उस जगह को सुरक्षित कर लो, जैसे तुम जानते हो।”

अगर यहूदी नेता सही थे, और चेले एक धोखाधड़ी करना चाहता थे, उन्हें उच्च प्रशिक्षित, भारी हथियारों से लैस रोमन सैनिकों के सामने होकर गुज़ारना होगा। इसकी संभावना नहीं थी। यीशु के चेले वही आदमी थे जो बगीचे में भाग गए थे। क्या वे वास्तव में, सैनिकों को उनके स्वामी को क्रूस पर चढ़ाने के बाद देखकर, इतनी साहस जुटा पाते कि वो उन भयानक पहरेदारों का सामना कर सके? कोई भी आम नागरिकों की टोली, तैनात रोमी सैनिकों के सामने से नहीं गुज़र सकती थी; यह अनसुना था। पिलातुस यह जानता था कि अगर यह एक धोखा था, कब्र खाली होने का कोई रास्ता नहीं था।  दूसरी ओर अगर यीशु वास्तव में वही थे जिसका वो दावा कर रहे थे, तो सभी दांव अमान्य थे। अगर यीशु दिव्य थे, तो कब्र पर तैनात कितने सैनिक थे, इस बात का कोई महत्व नहीं था।