Category Archives: Gospel of Luke

कहानी १८०: शक्की थोमा 

आठ दिन बीत चुके थे जब मसीह अपने चेलों के सामने प्रकट हुए थे। कई जबरदस्त बातें इस छोटे दौरान हुई थी! वे उसके मौत के सदमे से बाहर भी नहीं आ पाए थे जब अचानक वह मुर्दों में से जी उठा! और तो भी, वह उनके साथ नहीं था, कम से कम पहले की तरह तो नहीं।

कल्पना कीजिये उन आठ दिन इंतेजारी, के जब उन्हें धीरे धीरे इन बातों का एहसास होने लगा। कल्पना कीजिये कि वह चुपके से यरूशलेम की गलियों में खाना खरीदने के लिए और एक दूसरे से मिलने जाते होंगे, हमेशा उस डर में की कोई उन्हें पहचान ना ले।उनके बीच बातचीत और प्रार्थनाओं की कल्पना कीजिये।

उन्हें आगे क्या करना था? वे सही मायने में यीशु के पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ चुके थे, और अब भविष्य उनके सामने एक खुली खाई की तरह थी – एक अज्ञात क्षेत्र की नई दुनिया की तरह! क्यूंकि अब राजा मुर्दों में से जी उठा था, तो राज्य कैसा दिखेगा? और अब उन्हें उन बचे हुए होने के वास्ते क्या करना था? विशेषकर जब येशु की मृत्यु से जुड़े धार्मिक नेता और राजनीतिक विवाद एक जलता हुआ मुद्दा था!

चेले एक साथ फिर इकट्ठा हुए। इस बार उन्होंने ध्यान से दरवाजा बंद किया और चिटकनी लगा ली। इस समय थोमा भी उनके साथ था। अचानक, यीशु आ के ठीक उनके बीच खड़े हो गए। ‘शांति तुम्हारे साथ हो,”उन्होंने कहा।

यह पहली बार था कि थोमा ने जीवते प्रभु को देखा था। बाकी सब ने कहानियों बताई और विश्वास के साथ भर गए। लेकिन थोमा येशु को पहली बार खोने पर निराशा से भर गया था। वह अपनी आशा को फिर जगाना नहीं चाहता था। वो ऐसी निराशा दोबारा नहीं झेलना चाहता था। यीशु को स्वयं उसके पास आना था और थोमा को उसके हाथों पर कीलों के निशान को छूना था ताकि वो विश्वास कर सके!

थोमा के दिल में गुज़रती हर बात को येशु जनता था। तो वह उसकी तरफ मुड़े और अपना हाथ बड़ाया। ‘यहाँ अपनी उंगली रखो, मेरे हाथ देखो। अपने हाथ से मेरी कमर छुओ। शंका मत करो और विश्वास करो।’ यीशु कितनी उदारता और धीरज से भरे थे!

थोमा ने जैसे वो ज़ख्म देखे, वे बोल पड़ा – ‘मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर!’ यह एक वास्तविक और सच्चे विश्वास की एक घोषणा थी। थोमा ने विश्वास करने में बेशक समय लिया, लेकिन जब उसने किया, तो उसने विश्वास की सबसे ज़ोरदार और मज़बूत घोषणा की। किसी ने अभी तक यह घोषित नहीं किया था कि यीशु परमेश्वर था! और प्रभु ने उसकी भक्ति के शब्दों को प्राप्त किया।

यीशु ने कहा, ‘क्योंकि तुमने मुझे देखा है, तो तुमने विश्वास किया है; धन्य है वो जिन्होंने देखा नहीं पर फिर भी विश्वास किया है।’

और इसी जगह में आप और मैं कहानी में प्रवेश करते है। वो इसलिए, क्यूंकि हम मानते हैं कि यीशु की मृत्यु हो गई और वो फिर मुर्दों में से जी उठा, भले ही हम अपनी आँखों से उनके निशान या उनका पुनरुथान किया हुआ देह नहीं देखा हो! हैना यह एक आश्चर्यजनक बात है कि हम विश्वास के इस लंबे, स्वर्ण श्रृंखला का एक हिस्सा हैं, जो इन पहले चेलों से शुरू हुई।

जब तक युहन्ना ने इन कहानियों को अपने सुसमाचार में लिखी, यीशु के मृत्यु और पुनरुथान को कई दशक गुज़र गए थे। चेलों ने रोमी साम्राज्य में सुसमाचार की घोषणा की थी। थोमा, उद्धार का यह शुभ समाचा,र भारत देश तक भी लाया। दुनिया भर में कलीसिया मज़बूत और फलवन्त होती जा रही थी। जैसे जैसे युहन्ना ने यीशु के शब्दों को कलीसियाओं के लिए लिखा, वैसे वैसे उसे लोगों को येशु के बारे में सिखाने में कई साल लग गए। उसने हजारों को येशु पर विश्वास लाते देखा, हालांकि वे प्रभु से कभी नहीं मिले थे। उसने शायद कईयों को मसीह के नाम के लिए मरते भी देखा होगा। कितना अद्भुत होगा उस व्यक्ति के लिए- जिसने येशु की गिरफ्तारी की रात उसकी छाती पर विश्राम किया होगा – यह देखना कि  कितने लोग उसके प्रभु को प्यार करते थे, भले ही उन्होंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा हो। कल्पना कीजिए कि यह उसके दिल को कितना छुआ होगा! वास्तव में, यही वो कारण है जिसकी वजह से युहन्ना ने यह पुस्तक (युहन्ना) लिखी।

प्रभु यीशु अपने जी उठने के बाद चालीस दिन के लिए अपने चेलों को प्रकट होते रहे। यह शिक्षण और प्रशिक्षण का समय था जब यीशु उन्हें राज्य के काम के लिए तैयार कर रहे थे। युहन्ना ने इसका वर्णन ऐसे किया है:
“यीशु ने और भी बहुत चिह्न चेलोंके साम्हने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए। परंतु थे इसलिथे लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” -युहन्ना २०:३०-३१

Advertisements

कहानी १७९: आत्मा का उंडेला जाना 

लूका २४:४६-४९, यूहन्ना २०:१९-२३

shining dove with rays on a dark

यीशु अपने चेलों से यरूशलेम के एक गुप्त, बंद कमरे में बात कर रहे थे, और चेले पूरे ध्यान के साथ सुन रहे थे। अंत में, यीशु की योजनाए उनके जीवनों के बारे में उन्हें ज्ञात हो रही थी। प्रभु यीशु अपने चेलों को उनके आगे जीवन के बारे में निर्देश दे रहे थे। वह अग्रसर आदेश दे रहे थे! वह उन्हें कुछ ऐसा शक्तिशाली देने जा रहे थे जो चेलों की मदद वो सुसमाचार फैलाने में करेगी जो उसने अभी क्रूस पर किया।

कल्पना कीजिए कि चेलों को कैसा लगा होगा जब उन्होंने इस बारे में सुना। नाराज भीड़, उग्र धार्मिक नेता जिन्होंने देश पर नियंत्रण किया हुआ था, और रोमन सैनिकों की हिंसक ताकत अभी भी उनकी यादों में गूँज रही होगी। भला वे कैसे, कभी भी, उस शहर में यीशु के नाम से फिर प्रचार कर पाएंगे? वे जिंदा थे, बस इसलिए खुश थे! और इसका क्या मतलब था कि वे उच्च पर से सशक्त होंगे? यह अप्रत्याशित, रहस्यमय परमेश्वर अब आगे क्या करने जा रहा था?

पुराने नियम में कुछ ऐसी भविष्यवाणियाँ थी जो एक ओर संकेत कर रही थी –  ऐसी उज्जवल बाते जो परमेश्वर करने जा रहा था। आप देखते हैं, यीशु ने क्रूस पर अंतिम जीत जीती थी, और ऐसे कई तरीके थे जिससे यह जीत दुनिया को आशीषित कर सकती थी। नबी योएल ने कहा:
“उन बातोंके बाद मैं सब प्राणियोंपर अपना आत्मा उण्डेलूंगा; तुम्हारे बेटे-बेटियां भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिथे स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।
तुम्हारे दास और दासियोंपर भी मैं उन दिनोंमें अपना आत्मा उण्डेलूंगा।” योएल २:२८-२९

पिता परमेश्वर किसी तरह से अपने वफादार बच्चों पर अपनी आत्मा उंडेलेंगे, और एक नया युग मानव जीवन में शुरू किया जाएगा! जो कोई यीशु में अपना विश्वास डालेंगे, उनको पवित्र आत्मा प्राप्त होगी। वे पृथ्वी पर चलने वाले एक नए प्रकार के प्राणी  हो जाएंगे—–मनुष्य जो दिव्य जीवन और शक्ति के साथ रह रहे हो! यीशु ने पाप से पूर्ण शुद्धिकरण और सम्पूर्ण माफी के लिए एक रास्ता बनाया था। उन्होंने अपने चुने हुए लोगों को अपने जैसे सिद्ध, शुद्ध, और धर्मी बनने के लिए रास्ता बनाया। अब पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की उपस्थिति उनके पास आकर हमेशा के लिए रह सकती थी! परमेश्वर ने इसे इस तरह से नबी यहेजकेल को वर्णित किया:
“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूंगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतोंसे शुद्ध करूंगा।
मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्यर का ह्रृदय निकालकर तुम को मांस का ह्रृदय दूंगा।
और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियोंपर चलोगे और मेरे नियमोंको मानकर उनके अनुसार करोगे।” -यहेजकेल ३६:२५-२७

वाह। यहेजकेल नई वाचा के अधीन, नए जीवन का वर्णन, छह सौ साल पहले कर रहा था!

परमेश्वर की आत्मा का उंडेला जाना जल्द होने जा रहा था। क्या आपको यीशु की अपने चेलों के साथ लंबी बात याद है जो उन्होंने अपने गिरफ्तारी की रात से पहले की? क्या आपको याद है कि उन्होंने अपने चेलों को उनके छोड़ने पर दुखी नहीं होने को कहा था? उन्होंने कहा कि उन्हें खुश होना चाहिए क्योंकि वह अपनी आत्मा उनको भेजने जा रहा था। उनकी आत्मा शक्ति में काम करेगी और उन्हें मार्गदर्शन और दिलासा देगी,जैसे जैसे वो उसके नाम का एह्लान करते जाएंगे!

आत्मा की शक्ति वही शक्ति थी जिसके द्वारा यीशु ने पृथ्वी पर अपने जीवन को व्यतीत किया। यीशु हमेशा था और हमेशा पूरी तरह परमेश्वर है और रहेगा, लेकिन जब वह स्वर्ग से नीचे आया था, वह पूरी तरह से मनुष्य बन गया। जैसे वो इस पृथ्वी पर आया और रहा, उसने खुद के दिव्य शक्तियों के बलबूते पर ना चमत्कार किये और ना अद्भुत सत्य बोले। हर दिन वह एक सामान्य आदमी की शक्ति में रहा। लेकिन उसने एक परिपूर्ण, सिद्ध जीवन जिया, क्योंकि एक मनुष्य होके, वह परमेश्वर पर पूरे विश्वास और आज्ञाकारिता से निर्भर रहा। उसने आत्मा को अपना सिद्ध मार्गदर्शक बनने की अनुमति दी थी। एक सामान्य मनुष्य के नाते, यीशु को प्यास और थकावट लगती थी। लेकिन वह अपने पिता के साथ निरंतर निकटता में और पूर्ण आज्ञाकारिता में रहते थे। उन्होंने यह पवित्र आत्मा की शक्ति में किया। अब जब कि यीशु ने मनुष्य को परमेश्वर के लिए मोल लिया था, वो अपने अनुयायियों को आत्माभी दे सकता था।

जैसे यीशु ने अपने चेलों के साथ उस यात्रा पर कहे शब्दों को समाप्त किया, उन्होंने कहा, ‘शांति तुम्हारे साथ हो, जैसे पिता ने मुझे भेजा है, मैं भी तुम्हे भेजता हूँ।’ अब पहले से कहीं ज्यादा, चेले समझने लगे थे कि यीशु स्वर्ग से भेजा हुआ है। और अब, वे परमेश्वर की अद्भुत योजना में मानो लिपटे हुए थे। पिता के पास उनमें से प्रत्येक के लिए, पृथ्वी पर अपने जीवन के लिए, एक बहुत ही विशिष्ट कार्य था।

यीशु अपने आदमियों की ओर मुड़ा और उन पर सांस ली और कहा, ‘पवित्र आत्मा प्राप्त करो।’

यह नहीं था कि जीवते परमेश्वर की आत्मा चेलों के जीवन में पहले से काम नहीं कर रही थी। जब आत्मा ने उनके हिर्दय में काम किया, तो वो सन्देश को समझने लगे। वो आत्मा ही थी जिससे वो जागृत और क्रियाशील हो गए! लेकिन अब आत्मा एक कई अधिक तीव्र, और स्थायी तरीके से आ रही थी। यीशु के साथ यह पल शुरुआत थी, और इससे आगे, अधिक से अधिक बातें होने को थी।

तब यीशु ने कहा, “यदि तुम किसी के पापों को क्षमा करते हो, उनके पाप उन्हें माफ कर दिया जाएंगे; अगर तुम उन्हें माफ नहीं करते हो, उन्हें माफ नहीं किया जाएगा”. वाह! यह अपने चेलों को देने के लिए एक उच्च और खतरनाक शक्ति है! उन्हें परमेश्वर द्वारा ऐसे सशक्त किया जाएगा कि परमेश्वर के परिवार में, उनका निर्णय, परमेश्वर के निर्णय जैसा गिना जाएगा। परमेश्वर के राज्य में यह क्या उच्च और पवित्र भूमिका है!

चेलों में से एक उस दिन वहां नहीं था। किसी कारणवश, थोमा  वहाँ नहीं था। आने वाले दिनों में, अन्य चेलों ने उसे वहां होने वाली बातों के बारे में बताया होगा। जब थोमा ने उनकी कहानियों सुनी होंगी,  उसको ये लगा  होगा की ये पगला गए है! उसने उन पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। वे इसे इतनी बुरी तरह से चाहता था कि वे खुद को मूर्खता में झूटी दिलासा दे रहे थे! थोमा ने कहा, ‘जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लू, और कीलों की जगह में अपनी उंगली डालू, और उसकी कमर में अपना हाथ न रख लू, मैं विश्वास नहीं करूंगा।’

कहानी १७८: जीवित मसीह

मरकुस १६:१२-१४,यूहन्ना २०:१९-२३, लूका २४:३२-४९

Venice - Resurrected Christ in Saint Nicholas church

क्लीओपस और उसके दोस्त को कुछ अद्भुत दिया गया था। जब वे इम्मौस के लिए यरूशलेम से घर जा रहे थे, यीशु वहां आए। शुरू में, वे उसे नहीं पहचान सके। किसी तरह, उनकी आंखों को यह प्रकट करना यीशु का काम था।

जब वह उनके साथ शामिल हुआ, तो उन्होंने इस्राएल के पूरे इतिहास की व्याख्या की – मूसा से लेकर नबियों तक – यह दिखाने के लिए कि उसका आना परमेश्वर के महान छुटकारे की योजना की पूर्ति थी! अंत में जब वो नीचे बैठे और यीशु रोटी तोड़ने लगे, तो अचानक उन्हें यह प्रकट हुआ कि यह वही था! यीशु ने अपने आप को प्रकाशित किया। यह प्रभु था! लेकिन उसके बाद, वह गायब हो गया।

पुरुषों ने कोई समय बर्बाद नहीं किया। वे उठकर यरूशलेम सीधे वापस चले गए। क्या आप शहर के उन सात मील की दूरी पर उनकी चर्चा और उत्साह की कल्पना कर सकते हैं? उन्हें चेलों को बताना था कि जो महिलाओं ने बोला था, वो सच था!

जब वे आए, तो कुछ और खबर थी। चेलों ने बोला: “प्रभु वास्तव में जी उठा है, और शमौन पतरस को प्रकट हुआ है! ‘” अब, चारों में से कोई भी सुसमाचार हमें यह नहीं बताती है कि यीशु ने पतरस को उसके विश्वासघात के बाद पहली बार मिलने पर क्या कहा। यह यीशु और उसके प्रिय सेवक के बीच एक बेहद निजी समय था। लेकिन क्या आप पतरस और उसके शोकित पश्चाताप की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उसके राहत की कल्पना कर सकते हैं? उसके पास माफी की भीक मांगने का मौका था! उसके लिए यह एक कैसी शक्तिशाली बात रही होगी कि उसके भयानक विश्वासघात के बावजूद, प्रभु यीशु ने उसे मिलने के लिए ढूंडा? प्रिय मरियम के बाद दुनिया में सभी लोगों में से, पतरस जीवित मसीह के साथ मिलने के लिए पहला जन था। क्या ही कोमल प्रभु!

जब चेलों ने क्लीओपस और उसके दोस्त को अपऩी अच्छी खबर बताई, तब यात्रियों ने यीशु के साथ सड़क पर अपनी मुलाक़ात के बारे में चेलों को बताया। उत्तेजित आवाज़ो का कितना शोर होगा!

इसके पश्चात जब पुरुष अपने आश्चर्य में बातें कर रहे थे, वे खतरे की संभावना के बारे में जानते थे। यहूदी नेता खुश नहीं थे। अफवाह यह थी कि वे मसीह के शरीर के चोरी का आरोप चेलों पर लगा रहे थे! तो चेलों ने अपनी बैठक जगह का दरवाजा सावधानी से बंद किया। फिर वे इस अद्भुत सच्चाई पर चर्चा करने के लिए मुड़े: यीशु जीवित था।

पुरुष मेज़ के पास एकत्रित होकर बैठ गए। वे अपने भोजन के पास बैठे उन उल्लेखनीय बातों के बारे में चर्चा करने लगे जो उन के आस पास उस रविवार हुई। अब तक, यीशु ने अपने को केवल चार लोगों को प्रकट किया। वह मरियम के पास  पहले क्यों आए थे? और महिलाओं ने क्यों स्वर्गदूतों को देखा, लेकिन यूहन्ना और पतरस को केवल खुली कब्र और तह लगे हुए कपडे देखने को मिले? धार्मिक नेता अब क्या करने जा रहे थे? क्या वे मसीह के जी उठने को एक धोखा साबित करने के लिए, चेलों को दंडित करने की कोशिश करेंगे? और अब वे यीशु को अगली बार कब देखेंगे?

और फिर,ठीक उनके भोजन के बीच में, प्रभु यीशु एक बार फिर से दिखाई दिए! “‘शांति तुम्हारे साथ हो” उन्होंने कहा।

चेले हैरान हो गए, और उसके बाद वे घबरा भी गए! उन्हे लगा कि यह एक आत्मा है! परमेश्वर के अनन्त दायरे, मसीह के माध्यम से पृथ्वी और प्रकृति के नियमों पर हावी हो रही थी। यीशु को बंद दरवाजे से आके अपने हाथ की सफाई नहीं दिखानी थी। वह सिर्फ वहां बस आ गए! शिष्यों के लिए, यह अजीब और बहकानेवाली बात थी। जिस ठोस और स्थायी दुनिया को वो जानते थे, वो महान यथार्थ अपने असीम रूप से इस ठोस और स्थायी दुनिया को एक अनिश्चित छाया बना रहा था।

यीशु ने पूछा: “तुम इतना परेशां क्यूँ हो, और तुम्हारे मन में संदेह क्यों उठता है?  मेरे हाथ और मेरे पैर देखो, कि यह वास्तव में मै ही हूँ; मुझे छुओं और देखो, क्यूंकि एक आत्मा के पास मांस और हड्डियों नहीं होती, जैसे तुम देखते हो मेरे पास है।”

जैसे ही उन्होंने यह बातें कही, यीशु ने अपने हाथों और पैरों में निशान दिखाए जो उन क्रूर कीलों ने बनाई। फिर उन्होंने अपनी कमर दिखाई जहां भाले ने उसे बेधा था।

फिर वे खुशी से भर गए, और उस पर आश्चर्य करने लगे जो सच नहीं लग रहा था, लेकिन था। यह एक अकल्पनीय आशा थी! यह दिखाने के लिए कि वह सिर्फ आत्मा में नहीं वरण शरीर के साथ भी जी उठा है, यीशु ने पूछा: “‘क्या तुम्हारे पास खाने के लिए कुछ है?”

चेलों ने उसे कुछ भुनी मछली दी।यीशु ने ले लिया और उनके सामने उसे खा लिया। सत्य अब वास्तविकता बन रही थी, और वे उज्ज्वल आश्चर्य से भर गए। जिसको उन्होंने सोचा कि वह हमेशा के लिए खो गया है, वह वापस आ गया था!

यीशु ने समझाया: “‘मैंने तुम्हे यही बताया था जब मै तुम्हारे साथ था: मेरे बारे में जो कुछ मूसा की व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं, और भजन में लिखा है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।” प्रभु ने बार बार कोशिश की उन्हें आने वाली बातों की चेतावनी दे, लेकिन वह उसे तब तक नहीं समझ पाए जब तक वह हुई नहीं। अब भी, उनके सामने जबकि वह स्वयं जीवित थे, उन्हें इसे समझना कठिन था। तो वह उन्हें सिखाने लगे, ताकि उनके दिमाग खुले और वह पूरे रूप से समझ पाए कि कैसे पुराना नियम हमेशा से यीशु की ओर संकेत कर रहा था! खुद यीशु के ही होठों से सुनने के लिए यह एक आकर्षक सबक था! क्या आप उस दीवार पर एक मक्खी होने की इच्छा नहीं करते है?

प्रभु ने आगे बोला:
और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।
और यरूशलेम से लेकर सब जातियोंमें मन फिराव का और पापों की झमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।
तुम इन सब बातें के गवाह हो।
और देखो, जिस की प्रतिज्ञा मेरे पिता ने की है, मैं उस को तुम पर उतारूंगा और जब तक स्वर्ग में सामर्थ  न पाओ, तब तक तुम इसी नगर में ठहरे रहो।।

वाह! यीशु का क्या मतलब था? वो कैसे यरूशलेम में मसीह के बारे में प्रचार करेंगे, यह जान के कि धार्मिक नेताओं का प्रकोप उनका पीछा कर रहा था? और इसका क्या मतलब था कि वह स्वर्ग से सामर्थ पाएंगे?

कहानी १७७: जीवन का सबूत

मत्ती २८:११-१५; मरकुस १६:१२-१५; लूका २४:१३-३५

Conversion of Saul

परमेश्वर की दिव्य योजना का चमत्कार, भूकंप की शक्ति और महिमा, लुड़काए हुए पत्थर, शानदार स्वर्गदूतों, और उनके दुखियारे दोस्तों से कहे गए प्यार के शब्दों से प्रकट हुई। इस बीच, महायाजक एक बार फिर से एक उन्माद में थे। बात यह थी कि कब्र की रखवाली कर रहा रोमी पहरेदार वहां आया था। उन्होंने उस शानदार स्वर्गदूत और पत्थर के लुड़काए जाने के बारे में बताया। पर इन चमत्कारी कामों से यरूशलेम के महायाजकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। क्या यह विचित्र नहीं लगता कि कुछ अविश्वासी सैनिकों के दल ने एक स्वर्गदूत देखने का दावा किया था, ठीक वैसे ही जैसे यहूदी धर्मग्रंथों में वर्णित किया गया है? क्या उन्हें यह भय नहीं था कि कहीं न कहीं, परमेश्वर का हाथ यीशु के पक्ष में था?

जाहिर है नहीं, क्यूंकि उनकी पहली प्रतिक्रिया एक और धोखाधड़ी करने की थी। उन्होंने एक बार फिर बड़ों और महायाजकों को एक साथ बुलाया। उन्हीने गुप्त में आने वाले अफवाहों को खामोश करने के तरीकों पर विचार विमर्श किया। खुली कब्र और यीशु के शरीर के लापता होने की खबर का फैलना लिखा था। जब लोग इसके बारे में सुनेंगे, तो वे निश्चित रूप से यीशु को मसीहा करार करेंगे। यह अचानक बहुत स्पष्ट हो जाएगा कि धार्मिक नेताओं ने परमेश्वर के अपने दूत को मौत की घाटी उतार दिया। उनको यह रोकना होगा। इसलिए उन्होंने पैसे की एक बड़ी राशि एकत्र की और सैनिकों को झूठ बोलने के लिए रिश्वत दी। वे उनकी कहानी बोलने के लिए तैयार हो गए।

बात असल में यह थी कि अगर एक रोमी सैनिक पहरा दे रहा था, यह एक बड़ा अपराध था अगर वो अपनी ज़िम्मेदारी ना निभा पाए। उन्हें मौत की घाटी उतरना पड़ता था। सैनिक उन सुबह के घंटों की घटनाओं को कैसे समझा सकता थे? वे अदालत को यह तो नहीं कह सकते थे कि एक शक्तिशाली स्वर्गदूत वहां आया था। अगर वे झूठ बोलते और कहते कि वे सभी सो गए थे, तो वे इस बात का दावा कर रहे होते कि चेलों ने आकर शरीर को चुरा लिया है। तब, कोई भी मसीह के अनुयायियों पर विश्वास नहीं करता ; क्यूंकि कौन सा सैनिक अपने जीवन को जोखिम में डालकर ऐसी बात  की गवाही करता? तब महायाजक और बड़ों ने सैनिकों को वादा किया कि अगर कभी यह बात राज्यपाल तक कभी पहुंची, तो वे हस्तक्षेप करके उनको प्राणदंड से बचा लेंगे। दोनों पक्षों को इसमें फैदा था।

क्या आप इन लोगों की मूर्खता की कल्पना कर सकते हैं? कौन एक स्वर्गीय दूत के आने के बारे में झूठ कहता?क्या कुछ भी उनके पश्चाताप का कारण नहीं बनेगी? लेकिन उनके दिल इतने कठोर थे कि इस सब का कोई फैदा नहीं था। बस एक सप्ताह पहले ही, यीशु ने एक अमीर आदमी और लाजर के बारे में एक दृष्टान्त बताया। उस कहानी में, यीशु ने यह कहा कि जो कोई सच में पुराने नियम के परमेश्वर को प्यार करता, वो उनके अपने शब्दों को भी प्यार और सम्मानित करता। उन्होंने इस बात की चेतावनी भी दी कि जिनका दिल कठोर है, वो तब भी पश्चाताप नहीं करेंगे अगर कोई मुर्दों में से जी उठे। याजकों, फरीसियों और बड़ों ने इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया, और अब यह सच हो रहा था। वे पूरी तरह से परमेश्वर के शातिर दुश्मन के काम में लगे थे – वो था परमेश्वर के वैभवपूर्ण, नए काम को लोगों से छिपाना और मसीह के पुनुरुथान का शुभ सन्देश लोगों से दूर रखना।

इन छोटे पुरुषों के लिए यह विश्वास करना कितनी मूर्खता थी कि वे परमेश्वर की योजना को विफल कर सकते है। असल में, यह उनके परमेश्वर पर अविश्वास का संकेत करता है। वे केवल सत्ता के लिए अपनी इच्छा के प्रकाश में चीजों को देख रहे थे। लेकिन इसराइल में यह हर किसी के लिए सच नहीं था। परमेश्वर ने कईयों को अपना बनाया था, और शुभ सन्देश उन्हें बहुत स्पष्ट से समझ आता!

ऐसे दो पुरुष, फसह पर्व के बाद अपने घर जा रहे थे। वे इम्मौस को जा रहे थे जो यरूशलेम से सात मील की दूरी पर था। जैसे वे चल रहे थे, वे पर्व पर हुई उन अविश्वसनीय बातों के बारे में चर्चा कर रहे थे। वे गहरी बातचीत में चल रहे थे जब यीशु भी उनके साथ शामिल हुए। उनकी आँखें को उसे पहचानने से रखा गया था, तो वे उन्हें एक अजनबी के रूप में देख रहे थे। यीशु ने पुछा :“यह कौन से शब्द है जो तुम एक दूसरे के साथ आदान प्रदान कर रहे हो ?”

पुरुष वहीँ रुक गए। इस सवाल ने उनको गहरी उदासी में डाल दिया। क्या इस आदमी को वास्तव में नहीं पता था? पुरुषों में से एक का नाम क्लीओपस था। उसने पूछा, “‘क्या येरूशलेम में होने वाली बातों के बारे  में तुम कुछ नहीं जानते ?”

यीशु ने पूछा ”क्या बातें?”

वे कितने चकित हुए होंगे! क्या यह आदमी दीन  दुनिया से अलग किसी गढढे  में रहता था? उन्होंने कहा: ‘‘यीशु नासरी के बारे में -जो परमेश्वर और सब लोगों की दृष्टि में कर्म और वचन में एक शक्तिशाली नबी था , और कैसे मुख्य याजकों और हमारे शासकों ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। लेकिन हम इस बात की आशा कर रहे थे कि वह इसराइल के राज्य को मुक्त करेगा। दरअसल, इस सब के अलावा, इन बातों को हुए तीन दिन हो गए है। और तो और, हमारे बीच कुछ महिलाओं ने हमें चकित कर दिया। जब वे सुबह जल्दी कब्र पर गई और उनको शरीर को वहां नहीं पाया, तो वे वापस यह कहते हुए आई कि उन्होंने  स्वप्न में स्वर्गदूतों को देखा था जिन्होंने कहा कि यीशु जिंदा है। और हम में से कुछ कब्र पे गए और सब कुछ वैसे ही पाया जैसे महिलाओं ने देखा, लेकिन यीशु  नहीं दिखाई दिए।”

तब यीशु ने कहा : ‘हे ​​मूर्ख आदमी और कमज़ोर दिल। तुमने नबियों के बोल पर विश्वास नहीं किया! क्या यह मसीह के लिए आवश्यक नहीं था कि वो इन बातों की पीड़ा उठाए और अपनी महिमा में प्रवेश करे? ‘”

तब यीशु ने उन्हें इतिहास के सबकों के इतिहास में सबसे अच्छा इतिहास सबक दिया। उन्होंने मूसा के साथ शुरू किया और फिर सारे नबियों के बारे में – यह दिखाने के लिए कि वो कैसे पूरे पुराने नियम भर मसीह के आने के बारे में बताते थे। यह एक बहुत ही दिलचस्प सफ़र रहा होगा। जैसे जैसे वे चल रहे थे, उनके सामने इतिहास के सैकड़ों वर्ष सामने थे। आखिरकार, वे एप्रैम पर पहुंचे। यीशु और आगे जाना चाहते थे। पुरुष नहीं चाहते थे कि वो जाए। “‘हमारे साथ रहिये” उन्होंने कहा”‘ अब शाम की ओर हो रहा है और दिन अब लगभग खत्म हो गया है।” तो वह उनके घर चले गए।

भोजन का समय आया, और जब यीशु मेज के पास बैठे, उन्होंने कुछ रोटी ली और उसे तोड़ी। फिर वह उन्हें एक एक टुकड़ा देने लगे। अचानक, वे यह जाने कि यह खुद यीशु ही है! उनकी आँखें खुल गई थी! इसके तत्काल बाद, वह उनकी नजर से गायब हो गए।

यीशु के लिए यह कितनी खुशी की बात होगी कि वह इस चमत्कारिक ढंग से अपने प्रिय मित्रों के जीवन में आए, और उन गौरवशाली बाते जो उन्होंने उनके लिए की, उसके मानो छोटी छोटी खिड़कियाँ खोल दे।  पुरुष वहाँ बैठे दंग रह गए, और वे कहने लगे, “‘क्या हमारे दिल भीतर से नहीं जल रहे थे जब वो हमसे रास्ते में बात कर रहे थे और वचन सिखा रहे थे?'”उस ही घंटे के भीतर, पुरुष उठे और यरूशलेम को वापस चले गए। उन्हें चेलों को बताना था!

कहानी १७५: जी उठा

मत्ती २८:१-१०, मरकुस १६:१-२२, लूका २४:१-१३, यूहन्ना २०:१-१८

Ressurrection of Christ

रविवार की सुबह आई। यह यहूदी सप्ताह का पहला दिन था। मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम सुबह होने से पहले अपने बने मसालों के साथ तैयार थी। जैसे जैसे सूरज पूर्वी आकाश को हल्का करने लगा, वे अन्य महिलाओं के साथ कब्र के लिए निकल पड़ी। उनकी यात्रा में कुछ बिंदु पर ज़मीन हिलने लगी। यह एक और भूकंप था। इसका क्या मतलब हो सकता है? अक्सर बाइबिल में भूकंप परमेश्वर के आने का एक संकेत था।

लेकिन शायद उनके विचार अभी भी अपने दु: ख से भरे हुए थे। वे भूकंप के आश्चर्यजनक, अद्भुत अर्थ का अनुमान नहीं लगा सकीं। क्यूंकि असल में, परमेश्वर आए थे। यीशु मरे हुओं में से जी उठे थे! और जब एक शानदार स्वर्गदूत उसके कब्र पर पत्थर को लुड्काने आया था, पृथ्वी कांप उठी। जब रोमी पहरेदारों ने उस चमकदार स्वर्गीय प्राणी को देखा, तो वे भय से भर कर ज़मीन पर गिर गए।

स्वर्गदूत यीशु को बाहर निकलने में मदद के लिए नहीं आया था। परमेश्वर अपने अविनाशी जीवन की शक्ति के आधार पर जी उठे थे। वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शक्ति में जी उठे। और जब स्वर्गदूत ने पत्थर लुढ़काया, तो वह परमेश्वर के काम का एक प्रकाशन, एक घोषणा थी! क्या ही महान घटना का एक अकाट्य सबूत!

लेकिन महिलाओं को अभी तक यह पता नहीं था। जैसे वो साथ चल रहीं थीं, वे सोच में थी कि पत्थर को कैसे हटाया जाए। क्या रोमी पहरेदार उनको कब्र के पास जाने देंगे?

जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि अब यह एक प्रश्न नहीं रहा। हैरान रोमन पहरेदारों के शव चारों ओर पड़े हुए थे। क्या चल रहा था? कब्र के अंदर जा कर उन्होंने पाया कि शव तो गायब था। यह कैसे हो सकता है? वे प्रभु को कहाँ ले गए थे? वे भ्रम और थके हुए, दु: ख में एक दूसरे को देखने लगे।

अचानक, दो स्वर्गदूत शानदार सफेद कपड़ों में दिखाई पड़े। महिलाए डर में अपने चेहरे के बल ज़मीन पर गिर गई।

स्वर्गदूतों में से एक ने उन से पूछा, “तुम मृतकों में जीवितों को क्यूँ ढूँढ रहे हो? डरो मत, क्यूंकि मै जानता हूँ तुम किसे ढूँढ रहे हो। वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है! याद करो कि जब वो तुम्हारे साथ यहाँ गालील में था तो उसने तुम्हे क्या बताया था- यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र पापी पुरुषों के हाथों में डाल दिया जाए, क्रूस पर चढ़ाया जाए और तीसरे दिन फिर से उठाया जाए “‘

जैसे जैसे स्वर्गदूत बोलता गया, वैसे वैसे महिलाओं ने यीशु के शब्द याद किये।

स्वर्गदूत ने कहा: “‘जल्दी जाओ, उनके चेलों को बताओ कि वो मुर्दों में से जी उठा है। वह गलील में तुम से पहले जा रहा है, वहाँ तुम उन्हें पाओगे, जैसे उन्होंने तुमसे कहा। ‘”

महिलाए डर और खुशी से काँप उठी। वे शिष्यों को यह अद्भुत खबर बताने के लिए कब्र से चल पड़ी। उन्होंने रास्ते में किसी से बात नहीं की,यह डर से कि वे इस आश्चर्यजनक खबर के बारे में क्या कह दे। उन्होंने ग्यारह को पाया और अपने आँखों देखा हाल उन्हें बताया। महिलाओं के शब्द बकवास की तरह लग रहे थे। और कुछ हद तक, वे थे। यहां तक ​​कि मरियम मगदलीनी की रिपोर्ट अभी उलझन से भरी थी। “‘वे प्रभु को कब्र से बाहर ले गए है, और हम नहीं जानते है कि उन लोगों ने उन्हें कहाँ रखा है'” उसने घोषणा की। अपनी हताशा में, उसके पास सिर्फ एक ही ख्याल था। शानदार स्वर्गदूतों के शब्द उसके लिए कोई मान्यता नहीं रखते थे। उसके लिए सिर्फ प्रभु को ढूँढना मायने रखता था।

पहले तो चेलों ने महिलाओं पर विश्वास नहीं किया। लेकिन जब वह इन शब्दों को समझने लगे, पतरस को लगा कि इस बात में सच्चाई हो सकती है! वह कूद कर कब्र की ओर भागा। यूहन्ना भी बहुत पीछे नहीं था। वे पूरी ताकत लगा के भागे। यूहन्ना जवान और तेज़ था और सबसे पहले कब्र पर पहुंचा। वह प्रवेश द्वार पर रुका और एक शरीर या एक दूत या एक चिन्ह के लिए खोजने लगा। वहाँ, जहाँ यीशु को रखा गया था, बड़े तरीके से कपड़ा में तह लगा हुआ अलग रखा था। चेहरे का कपड़ा एक ओर अलग से रखा था। पतरस यूहन्ना को पार कर सीधे कब्र में घुस गया। उसने भी वो कपड़े की पट्टियाँ देखीं। यूहन्ना पतरस के पीछे आया, और इसके अर्थ के बारे में दोनों सोचने लगे। यूहन्ना ने विश्वास किया पर फिर भी विचारा। दोनों इस बात की पूर्णता को नहीं समझ पा रहे थे। सांसारिक रूप से, यह नए तथ्य कुछ अटपटे लग रहे थे। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे थे कि येशु को मुर्दों में से जिंदा होना था। चेले कब्र छोड़ कर चले गए और वापस अपने घरों को लौट गए।

मरियम मगदलीनी उन लोगों के पीछे कब्र की ओर बड़ रही थी। वह वहाँ खड़े होकर रोने लगी। क्यूंकि उसके पास कहीं जाने को नहीं था। प्रभु यीशु उसकी आशा और जिंदगी बन गए थे। वह द्वार के पास गई और अंदर कदम रखा। एक बार फिर, दो स्वर्गदूत उसके समक्ष पेश हुए। एक, जहाँ यीशु को रखा गया था, उसके सिरे और उसके पैर में बैठे थे।

आने वाले दिनों में, मरियम और चेलों ने इसके बारे में विचारा होगा। क्यूंकि यह वही चित्र था जो वाचा के सन्दूक के ढक्कन पर पाया जा सकता था और जो केवल परम पवित्र में रखा जाता था। यह सोने का डब्बा परमेश्वर ने मूसा के लिए बनाया था। ढक्कन ही शुद्ध सोने का बना था, और उसे परमेश्वर की दया की गद्दी बुलाई जाती थी। परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिए कि सन्दूक के दोनों छोर पर दो, गौरवशाली, सुनहरे स्वर्गदूतों की प्रतिमा लगाईं जाए। उनके पंख दया की गद्दी पर फैले थे। यह सन्दूक खोने से पहले, इसराइल के देश की सबसे पवित्र चीज़ थी, और इसकी छवि हर यहूदी के मन में गड़ी थी। अब, मसीह स्वयं परमेश्वर की दया की गद्दी थे – वो महान प्रायश्चित जिसके द्वारा सारे मानव का उद्धार हो सकता है। जब यह दो स्वर्गदूत उनके बलिदान हुए शरीर की जगह पर इर्द गिर्द बैठे थे, तो क्या उन महिलाओं को यह समझ में आया होगा?

यह सारी गहरी और सुंदर चीज़े वो गौरवशाली सत्य थे जिन्हें आने वाले सालों में कलीसिया समझेगी और अनुभव करेगी। प्रेरित यूहन्ना ने अपने लेखन में यह सुनिश्चित किया। लेकिन स्वर्गदूतों की उपस्थिति में रो रही वहां खड़ी तबाह मरियम के दिमाग में, यह बातें नहीं थी।

“‘नारी, तू क्यों रोती है?” उन्होंने कहा.

वह सिर्फ प्रभु के बारे में ही सोच सकती थी। “‘क्योंकि वे मेरे प्रभु को उठा ले गए है, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने प्रभु को कहाँ रखा है'” उसे अभी भी उनके जी उठने की आशा नहीं थी, लेकिन उसका प्यार इतना विशाल था कि उसे अपने प्रभु को खोजना था।

जैसे ही उसने यह कहा, वह जाने को निकली, लेकिन वहाँ एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन उसे यह पता नहीं था। उसे लगा कि यह माली है।“‘नारी, तू क्यों रोती है?'” यीशु से पूछा। “‘तुम किसे खोज रही हो?”

उसने कहा, “‘सरकार, अगर आपने उन्हें उठाया है, तो मुझे बताएँ की आपने उसे कहाँ रखा है ताकि मै उन्हें ले जाऊं।”

वह अपने उद्धारकर्ता को कितना प्यार करती थी! क्या आप इस लालसा को सुन सकते हैं? यीशु भी सुन सकते थे। “‘मरियम,” उन्होंने कहा। जैसे ही उन्होंने मरियम का नाम लिया, वो पहचान गई कि वो कौन थे। “‘गुरु!'” वह बोल पड़ी। वह धरती पर गिर पड़ी और अपने को उनके पैरों से लपेट लिया।

” मुझे पकड़ों मत’, यीशु ने कहा, ” क्यूंकि मै अभी तक अपने पिता के पास नहीं पहुंचा हूँ। इसके बजाय, मेरे भाइयों के पास जाओ और उन्हें बताओ, “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास लौट रहा हूँ।”

मरियम बेसुध उत्साह से भर गई। उसका प्रिय प्रभु गायब नहीं हो गया था! उन्होंने उसे छोड़ा नहीं था! उसका उत्तम प्रेम जिंदा था! वह चेलों को यह अकल्पनीय अच्छी खबर बताने के लिए भागी। “‘मैंने प्रभु को देखा है!'” उसने घोषणा की। फिर उसने इन बातों का विवरण दिया। क्या आप उनके सदमे और उत्तेजना की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उन सवालों  की कल्पना कर सकते हैं जो उठे होंगे? और अब आगे क्या होने जा रहा था?

कहानी १७४: कब्र और इंतज़ार की घड़ी 

मत्ती २७:५७-२८:८, मरकुस १५:४२-१६:११, लूका २३:५०-२४:११, यूहन्ना १९:३८-४२

Cementary of  Pere Lachaise in Paris

मसीह के शरीर को क्रूस से उतार लिया गया। एक आदमी था जिसका नाम था अरिमथिया का यूसुफ़ था, जो यीशु पर विश्वास करता था और गुप्त में उसका चेला था। वह एक सच्चा शिष्य था, लेकिन वह महासभा का भी सदस्य था। परमेश्वर के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की नफरत इतनी ज्यादा थी कि यूसुफ इस बात का खुलासा करने में डरता था। अगर वे उसके खिलाफ हो गए, तो वह सब कुछ खो देगा।

उस दिन के भयानक अन्याय पर उसे कितना शोक हुआ होगा . . ये वह आदमी थे जिसके साथ उसने अपना जीवन बिताया था। वह उस ज़माने के कुलीन वर्ग थे जिसकी वजह से उसने अपने विश्वास को दबा के रखा था। उसे उनके प्रतिघातक व्यवहार से कितनी घृणा होती होगी। मसीह के लिए खड़े होने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। कम से कम वो उसकी मौत में उसे सम्मान दे सकता था। सप्ताह की घटनाए ऐसे थी कि यह खबर, कि महासभा का एक सदस्य यीशु को इतना सम्मान दे रहा है, पूरे इस्राएल में फैल जाती। इसको दुश्मन के साथ दोस्ती के रूप में देखा जाता। लेकिन यूसुफ पेंतुस पीलातुस के पास गया और मसीह के शरीर को दफ़नाने के लिए इजाज़त मांगी। एक बार फिर, इस आदमी यीशु के मामले पीलातुस के सामने आए। उसने अपनी सहमती इस आदमी को दे दी जो स्पष्ट रूप से यीशु का भक्त था।

यूसुफ मसीह का शरीर मांगने गया। निकोदेमुस मदद के लिए आया था। वह अपने साथ चौतीस किलो मुसब्बर लोहबान लाया, वो सामग्री जो यहूदी मृत के संरक्षण के लिए परंपरागत रूप से प्रयोग करते थे। निकोदेमुस भी मसीह का एक शिष्य था, और यूसुफ की तरह, उसने भी इसे छिपा रखा था। वो रात में प्रभु से सवाल पूछने के लिए आता था क्यूंकि उसे डर था कि इस बात को जानने के बाद कि वो यीशु पर विश्वास करता है, नेतृत्व उसके साथ कुछ भी कर सकती है। नेतृत्व का रोष कम नहीं हुआ था, लेकिन मसीह के उज्ज्वल पवित्रता के खिलाफ उनके महान अपराधों ने निकोदेमुस को कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा। उनकी मृत्यु में भी, प्रभु यीशु उसकी वफादारी के हकदार थे। वो उन सभी बातों के लिए खड़ा होगा जो यीशु था। वह उसको अब आदर देगा, चाहे उसकी कोई कीमत क्यों न हो।

उन्होंने यीशु का शरीर लिया और उसे चादर के साथ मसाले में बाँधा। जिस जगह यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, उसके पास एक बगीचा था। वहां एक कब्र थी जिसमे किसी को भी पहले दफन नहीं किया गया था। यह जगह जाने माने, अमीर लोगों की अंतिम विश्रामस्थल थी। और क्यूंकि यह कबर क्रूस के पास थी, यह लोग सूर्यास्त और सबत से पहले, यीशु के शरीर को तरीके से दफना सके। एक बार फिर, उन्होंने अनजाने में वचन की पूर्ती की। यशायाह 53:9 में लिखा है: “और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का अपद्रव न किया या और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।”  जब वे कब्र में मसीह को छोड़ कर निकल रहे थे, उन्होंने एक बड़े पत्थर को प्रवेश द्वार पर लुढ़का दिया। मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम उनके पीछे आए ताकि वह यह जान सके कि मसीह को कहाँ दफनाया गया था। तब वे मसाले खरीदने के लिए बाहर चली गई। वे यीशु को एक उचित दफन देने साबत के बाद लौटने को थी।

शुक्रवार शाम हो गई, और फसह का सबत शुरू हुआ। इसराइल भर से परिवार जो सफ़र करके आए थे, वो अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साथ जश्न मनाने और आराम करने के लिए एक साथ इकट्ठे हुए। शनिवार की बाकी भी ऐसे ही गई। किसी को कोई काम नहीं करना था। पूरा देश अपने परमेश्वर के अद्भुत काम का लुप्त उठाने का अवकाश ले रहा था। यरूशलेम  में एक दिन पहले, शहर को उल्टा करने वाली घटनाओं से उनका दिमाग भरा हुआ था। क्या उनमें से किसी के पास यह देखने के लिए आँखें थी कि यह सब परमेश्वर के सबसे बड़े काम का उत्प्रवाह है?

जबकि इसराइल में बाकी सब सबत का सम्मान कर रहे थे, फरीसी और महायाजक व्यस्त थे।उनके पास कुछ काम था। यीशु ने कब्र से फिर से उठने का दावा किया था। क्या या हो सकता था कि उसके चेले उसके जी उठने की जालसाजी कर रहे हो? इससे उनको यह सब साफ़ करने के लिए एक नया झंझट पैदा होगा! वे सालों के लिए यह विधर्म लड़ते रहेंगे। कैसी विडंबना है कि यह मनहूस नेताओं ने मसीह के शब्दों को याद किया। उसके अपने ही शिष्य यह पूरी तरह से भूल गए थे! वे ऐसी आशा के लिए दु: ख में निगले हुए थे। लेकिन यहूदी नेता यह नहीं जानते थे और वे एक और अनुरोध के साथ पिलातुस के पास वापस गए।

हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमानेवाले ने आपको जीते जी कहा या, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। 
सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहनें लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।  -मत्ती २७:६३-६४

कल्पना कीजिए कि यह अनुरोध सुनके पिलातुस को कैसा लगा होगा। यह यीशु जो एक अदृश्य देश का राजा होने का दावा कर रहा था, वही यीशु मरे हुओं में से जिंदा होने को दावा कर के गया था। वह इस सब से क्या समझे? पिलातुस ने उन्हें देखा और कहा, “‘तुम्हारे पास एक गार्ड है। जाओ और उस जगह को सुरक्षित कर लो, जैसे तुम जानते हो।”

अगर यहूदी नेता सही थे, और चेले एक धोखाधड़ी करना चाहता थे, उन्हें उच्च प्रशिक्षित, भारी हथियारों से लैस रोमन सैनिकों के सामने होकर गुज़ारना होगा। इसकी संभावना नहीं थी। यीशु के चेले वही आदमी थे जो बगीचे में भाग गए थे। क्या वे वास्तव में, सैनिकों को उनके स्वामी को क्रूस पर चढ़ाने के बाद देखकर, इतनी साहस जुटा पाते कि वो उन भयानक पहरेदारों का सामना कर सके? कोई भी आम नागरिकों की टोली, तैनात रोमी सैनिकों के सामने से नहीं गुज़र सकती थी; यह अनसुना था। पिलातुस यह जानता था कि अगर यह एक धोखा था, कब्र खाली होने का कोई रास्ता नहीं था।  दूसरी ओर अगर यीशु वास्तव में वही थे जिसका वो दावा कर रहे थे, तो सभी दांव अमान्य थे। अगर यीशु दिव्य थे, तो कब्र पर तैनात कितने सैनिक थे, इस बात का कोई महत्व नहीं था।

कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

कहानी १७१: क्रूस पर

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Jesus christ in heaven

यीशु उस पीड़ा के साथ क्रूस पर था, उसके पास बहुत से खड़े जो उसे देख रहे थे। ऐसा लगता था कि कुछ हो जाएगा। क्या वह इस हास्य जनक अनुकरण को अपनी सामर्थ से जीत पाएगा?

पास से जाते हुए लोग अपना सिर मटकाते हुए उसका अपमान कर रहे थे। वे कह रहे थे,“अरे मन्दिर को गिरा कर तीन दिन में उसे फिर से बनाने वाले, अपने को तो बचा। यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो क्रूस से नीचे उतर आ।”

शिक्षक और अगुवे अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे। उसकी हसी उड़ाते हुए उन्होंने कहा,“’दूसरों का उद्धार करने वाला यह अपना उद्धार नहीं कर सकता! यह इस्राएल का राजा है। यह क्रूस से अभी नीचे उतरे तो हम इसे मान लें।'” पुराने नियम से कुछ बातों को लेकर दुसरे यह कहने लगे,”‘यह परमेश्वर में विश्वास करता है। सो यदि परमेश्वर चाहे तो अब इसे बचा ले। आखिर यह तो कहता भी था, ‘मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ।’”

उन लुटेरों ने भी जो उसके साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे, उसकी ऐसे ही हँसी उड़ाई। सिपाहियों ने भी उनके साथ मिलकर हसी उड़ाई और कहा,“यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने आपको बचा ले।”

इन सब दोष लगाने वालों को यीशु ने कुछ नहीं कहा। हज़ारों दूत वहाँ खड़े उसे देख रहे थे जो स्वर्ग का सिंहासन का अधिकारी है और इस कष्ट और मृत्यु को सह रहा है। यीशु एक ही शब्द बोलकर अपने आप को ऊपर लेजा कर हटा सकता था। परन्तु यह उसके पिता कि इच्छा नहीं थी।

वहाँ लटकाये गये अपराधियों में से एक ने उसका अपमान करते हुए कहा,“क्या तू मसीह नहीं है? हमें और अपने आप को बचा ले।” परन्तु दूसरे डाकू का ह्रदय परिवर्तन हो गया था। उसने उन सब अपमानित करने वाली बातों को सुना और उस यीशु को देखा जो शांत था। यह मनुष्य कौन था जो उसके साथ क्रूस पर टंगा हुआ था?

दूसरे ने उस पहले अपराधी को फटकारते हुए कहा,“क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता? तुझे भी वही दण्ड मिल रहा है। किन्तु हमारा दण्ड तो न्याय पूर्ण है क्योंकि हमने जो कुछ किया, उसके लिये जो हमें मिलना चाहिये था, वही मिल रहा है पर इस व्यक्ति ने तो कुछ भी बुरा नहीं किया है।”

फिर वह बोला,“यीशु जब तू अपने राज्य में आये तो मुझे याद रखना।”

यह यीशु किस प्रकार का इंसान था कि इस तरह उसका राजसी गौरव क्रूस पर बढ़ा कर दिखाया जा रहा है! यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ से सत्य कहता हूँ, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

अपने पीढ़ा के बीच में भी यीशु कि करुणा दिखाई पड़ती है। उसकी आत्मा कितनी महान थी। अवश्य वह परमेश्वर है!

थोड़े ही थे जो गुलगुता तक उसके साथ गए और वे यीशु से। प्रेम करते थे।  उसकी माँ, मरियम, उसकी बहन मरियम और मरियम मगदिलिनी, वे सब आये थे। उसका चेला यूहन्ना भी उनके साथ क्रूस पर आया। यीशु ने जब अपनी माँ और अपने प्रिय शिष्य को पास ही खड़े देखा तो अपनी माँ से कहा,“प्रिय महिला, यह रहा तेरा बेटा।” फिर वह अपने शिष्य से बोला,“यह रही तेरी माँ।”

यीशु सबसे बड़ा पुत्र था और मरियम एक विधवा थी। परिवार में उसका कर्तव्य था कि वह मरियम का ध्यान रखे। उसके चाहिता चेला यूहन्ना भी उसका चचेरा भाई था, और उसने वह कर्तव्य उसे सौंप दिया। और उसी समय से यूहन्ना मरियम को अपने घर ले गया।

यीशु को क्रूस पर चढ़े तीन घंटे हो गए थे और कुछ अद्भुद होने लगा था। फिर समूची धरती पर दोपहर तक अंधकार छाया रहा। दिन के तीन बजे ऊँचे स्वर में पुकारते हुए यीशु ने कहा,

“’इलोई, इलोई, लमा शबकतनी।’अर्थात,
“’मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों भुला दिया?'”

उसका चिल्लाना पीड़ा से भरा हुआ था, जो उन लोगों को याद करके था जो क्रूस के पास थे। यीशु ने ऐसा क्यूँ कहा? क्या उसे याद नहीं था कि वह क्रूस पर किस वजह से गया है? क्या वह नहीं जानता था कि यह अलगाव मनुष्य के पापों को सहने के लिए था। क्या उसने वास्तव में विश्वास कर लिया था कि परमेश्वर ने उसे सदा के लिए छोड़ दिया है?

गुलगुता पर जो यहूदी जमा थे, वे यीशु कि वाणी को पहचान सकते थे क्यूंकि उसने पुराने नियम से लिया था। महान विपत्ति के समय दाऊद राजा ने भजन सहित में लिखा था। फिर उन सब्दों में कोई संदेह नहीं था। दाऊद का विश्वास डगमगाने वाला नहीं था, वह प्रभु में मज़बूत होता जाता था। वह विश्वास में स्थिर था और किसी और कि ओर नहीं देखता था। वह पाप कि समस्या के हल के लिए किसी मनुष्य कि ओर नहीं देखता था और संकट के समय में परमेश्वर को कोस्ता नहीं था। इस भजन सहित में, दाऊद राजा ने अपनी आशा को परमेश्वर के छुटकारे पर केंद्रित किया हुआ था एयर केवल उसी को पुकारता था। यह परमेश्वर में गहरायी कि एक तस्वीर है। आइये इस भजन सहित से और पढ़ते हैं :

हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर!
तूने मुझे क्यों त्याग दिया है? मुझे बचाने के लिये तू क्यों बहुत दूर है?
मेरी सहायता की पुकार को सुनने के लिये तू बहुत दूर है।
हे मेरे परमेश्वर, मैंने तुझे दिन में पुकारा
किन्तु तूने उत्तर नहीं दिया,
और मैं रात भर तुझे पुकाराता रहा।
हे परमेश्वर, तू पवित्र है।
तू राजा के जैसे विराजमान है। इस्राएल की स्तुतियाँ तेरा सिंहासन हैं।                                  
हमारे पूर्वजों ने तुझ पर विश्वस किया।
हाँ! हे परमेश्वर, वे तेरे भरोसे थे! और तूने उनको बचाया।                                        
हे परमेश्वर, हमारे पूर्वजों ने तुझे सहायता को पुकारा और वे अपने शत्रुओं से बच निकले।
उन्होंने तुझ पर विश्वास किया और वे निराश नहीं हुए। –भजन सहित  22:1-5

आपने देखा कैसे दाऊद राजा ने परमेश्वर कि स्तुति करने में देरी नहीं की, जिस समय वह छुटकारे के लिए रुका हुआ था?

यीशु परमेश्वर से नहीं पूछ रहा था कि उसने उसे क्यूँ छोड़ दिया। वह एक मनुष्य कि तरह उसे जो परमेश्वर कि आज्ञाकारिता के प्रति दुःख उठा रहा था। अब तक, यीशु को क्रूस पर छे घंटे हो चुके थे। परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के पाप के कारण आया था। यीशु ने अपने ही शरीर में उस भयानक संघर्ष को सहा। वह जानता था कि यह असीम क्लेश हमेशा के लिए नहीं है। एक यशस्वी विजय दूसरी और थी। अपने मनुष्य स्वभाव में होकर उसने पुछा,”‘और कितनी देर प्रभु?'”

यीशु ने जब अपने महान पूर्वजों के शब्दों को पुकारा, उसने उस भविष्यवाणी को पूरा किया जो भजन सहित में भी दी गई है। यह दोनों, दाऊद कि व्यक्तिगत प्रार्थना भी थी और मसीह के आने का सन्देश था!

जो पास में खड़े थे, उनमें से कुछ ने जब यह सुना तो वे बोले,“सुनो! यह एलिय्याह को पुकार रहा है।” दूसरे बोले,“ठहरो, देखते हैं कि इसे नीचे उतारने के लिए एलिय्याह आता है कि नहीं।” वे अभी यह सोच रहे थे कि यह व्यक्ति कौन है।

यीशु जानता था कि उसका समय आ गया है। उसने वो सब पूरा कर दिया था जिस काम से पिता ने उसे भेजा था। एक और वचन था जिसे पूरा होना था, सो उसने कहा,“‘मैं प्यास हूँ।'”

सिरके में डुबोया हुआ स्पंज एक छड़ी पर टाँग कर लाया गया और उसे यीशु को चूसने के लिए दिया। भजन सहित 69:21 के वचन पूरे हुए “…उन्होंने मुझे विष दिया, भोजन नहीं दिया। सिरका मुझे दे दिया, दाखमधु नहीं दिया।'”

जब यीशु पी चुका, उसने कहा,“पूरा हुआ।”

उन शांत शब्दों में यीशु ने घोषित किया कि समाप्त हुआ। जय मिल गई थी। सब कुछ बदल गया था। आदम के पाप से, इंसानियत ने परमेश्वर के विरुद्ध आवाज़ उठाकर शैतान के प्रति वफ़ादारी दिखायी, जिसका अंजाम पाप और मृत्यु था। परन्तु यीशु मनुष्य रूप में आया और दोनों पर विजय प्राप्त की और जीवन के मार्ग को दिखाया। उसके पृथ्वी पर जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ और उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये।

कहानी १७०: क्रूस पर चढ़ाया गया राजा

मत्ती २७:३३-३८; मरकुस १५:२२-२६; लूका २३:३३,३८; यूहन्ना १९:१६-२२

Holy Week

फिर जब वे गुलगुता (जिसका अर्थ है “खोपड़ी का स्थान।”) नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने यीशु को पित्त मिली दाखरस पीने को दी। किन्तु जब यीशु ने उसे चखा तो पीने से मना कर दिया।

रोमी सिपाहियों ने  क्रूस को ज़मीन पर रख यीशु कपड़े उतार दिए। यीशु ने अपने हाथ उस लकड़ी के पट्टे पर फैला कर अपने आप को पूरी विनम्रता के साथ सौंप दिया। सिपाहियों ने उसके हाथों में कीलें ठोकीं और क्रूस पर चढ़ा दिया। यह कितना भयंकर था। जो उपकरण अच्छी चीज़ों को बनाने के लिए होते हैं, उन्हें एक मनुष्य के शरीर को फाड़ने के लिए इस्तेमाल किये गए।

सिपाहियों ने क्रूस को खड़ा कर दिया। हर एक सांस जब वह लेता था, अपने शरीर को खींचता था ताकि वह सांस अंदर ले सके। उसके लहू लुहान शरीर उस लकड़ी के पत्ते पर रगड़ता था। हर पल उसकी पीड़ा बढ़ती ही जाती थी। परन्तु ये उस पीड़ा के सामने कुछ नहीं थी जो अनदेखी थी। क्यूंकि आप देखिये, आत्मिक क्षेत्र में, उस पवित्र जन ने पाप को अपने ऊपर ले लिया था। वह परमेश्वर के आगे पाप के अवतार को लेकर आया। मनुष्य के पापों के घिनौने अपमान के कारण उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध को उसे अपने ऊपर हाथ फैला कर लेने कि आवश्यकता नहीं थी। उसने परमेश्वर कि इच्छा में होकर उसे पूरे मान सम्मान के साथ लेने कि ठान ली थी। जब वह मनुष्य के हर घिनौने पाप कि सज़ा को अपने ऊपर ले रहा था, परमेश्वर का क्रोध दुष्ट के प्रति भड़का हुआ था। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था ताकि हम आज़ाद हो जाएं। कितना महाप्रतापी परमेश्वर है।

दो डाकू भी उसके साथ चढ़ाये गए, एक दायें और एक बाएं। सिपाही अपने ही दूषी व्यापार में लगे हुए थे। यीशु के कपड़ों का अब क्या करना था? उसके वस्त्र के चार भाग किये और हर एक सिपाही को उसका एक हिस्सा दे दिया। परन्तु यीशु का भीतरी वस्त्र बहुत अनोखा था। वह बहुत विशेषता से बनाया गया था। वे उसे फाड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने पासे फेंके। यूहन्ना प्रेरित ने यह दिखलाया कि यह वचन का पूरा होना हुआ है। भजन सहित २२:१८ कहता है,”वे मेरे कपड़े आपस में बाँट रहे हैं। मेरे वस्त्रों के लिये वे पासे फेंक रहे हैं।'” इसके बाद वे वहाँ बैठ कर उस पर पहरा देने लगे। जब तक उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, सुबह के नौ बज गए थे।

पिलातुस यीशु के विषय में अभी और कुछ कहना चाहता था। उसने इब्रानियों, लातौनी और यहूदी भाषा में कुछ लिखा।

“‘यह यहूदियों का राजा यीशु नासरी है'”

यीशु को शहर के निकट क्रूस पर चढ़ाया था ताकि सारे यहूदी उसे देख सकें। पिलातुस कि घोषणा उस भाषा में लिखी गयी जो अधिकतर पश्चिमी दुनिया में बोली जाती है। रोमी राज में लातौनी भाषा बोलते थे, जो अपने संग्रामिक अधिकार से सब पर हुकुम चलते थे। यह बहुत ही संपन्न विधिपूर्वक भाषा थी जिसे रोम के कुलीन लोग बोलते थे और अपने बच्चों को सिखाते थे। सभी विचार धरणाओं पर यह हावी था। परन्तु इब्रानी भाषा वो भाषा थी जिससे परमेश्वर का वचन मनुष्य के पास आया। यह कितना उचित था कि तीनों ने यीशु के शासन को उसके बलिदान के दिन घोषित किया!

पिलातुस को नहीं मालूम था कि आने वाले सालों में पूरे रोमी राज में सुसमाचार लातौनी भाषा और यहूदी भाषा में सुनाया जाएगा। एक दिन, जिस यीशु को उसने क्रूस पर चढ़ाया था, उसे अनंतकाल के राजा कि तरह उसकी उपासना की जाएगी। रोम के महाराजा यीशु के आगे घुटने टेकेंगे!

लेकिन यह सब भविष्य में होना है। इस बीच, यहूदी अगुवे उस चिन्ह से नाखुश थे जो यीशु के सिर पर लगाया गया था। यह रोमी सरकार द्वारा एक लिखित घोषणा थी। सो वे पिलातुस के पास गए और बोले इस बदल कर ऐसे लिखो: “‘उसने कहा, मैं यहूदियोंका राजा हूँ।'” यह चिन्ह का एक दूसरा हास्यास्पद था लेकिन पिलातुस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला था।

सोचिये पिलातुस के क्या विचार रहे होंगे जब वह उन आराधनालय के दुष्ट सदस्यों को यीशु को क्रूस पर चढाने के लिए लेजाते देख रहा था। इस विचार से हसी आती है कि वे अपने को परमेश्वर के पवित्र लोग मानते थे, और इससे यहूदी अगुवों का गुस्सा और भी अधिक बढ़ जाता था। यदि इन लोगों का कोई भी अनंतकाल का भविष्य है तो वह इन लोगों के जीवन से नहीं दिख सकता था जो परमेश्वर के मंदिर को चलाते थे।

परन्तु यीशु में, पिलातुस ने कुछ भिन्न पाया। उसके किसी भी शिक्षाओं से ऐसा कुछ नहीं था जो उसे स्पष्ट कर सके। पिलातुस दुनिया के सबसे उच्च ज्ञान से शिक्षित था। उसने सभी जगहों में जाकर भिन्न भिन्न धर्मों और संस्कृतियों को। देखा। उसके पास वो अधिकार था जिससे वह शासन चला सकता था। वह उन अगुवों के बीच में रहता था जो मनुष्य जाती से सम्बंधित जटिल सच्चाइयों के हल को लेकर आते थे। युद्ध, अकाल, सामाजिक विश्लेषण आदि, जैसे विषय वे लेकर आते थे। सारे मनुष्य जाती में, केवल ये थे जो मनुष्य के जीवन के भाग को तय करते थे।

जब पिलातुस ने इस महान संकटकाल का सामना किया, तब उसने पुछा,”‘सच्चाई क्या है?'” यूनानी और रोमी दार्शनिकों के समाधान, रोमी फ़ौज में पाये गए समाधान, और ज़बरदस्ती से दी गयी शांति, सब में थोड़ी बहुत सच्चाई थी पर बगैर स्वयं के भीतर कि सच्चाई के। जन पिलातुस ने यीशु के विनम्रता और शुद्धता को देखा, तब उसने जाना कि उसने सच्चाई का सामना किया है।

इस शांत और लहूलुहान मनुष्य कि कोई महानता और सामर्थ थी, जो उस अनदेखी दुनिया का राजा कहलाता था। या तो वह, पागल था या फिर वह सही था। यदि वह सही था, तो फिर उसके चरों ओर चल रहे कोलाहल में पागलपन था। पिलातुस इतने लम्बे समय से था जो जनता था कि छोटी से छोटे से छोटा पद ढोंग था। पर यीशु ने वो सब नष्ट कर दिया। यदि कोई अनन्तकाल का राजा था, तो वह ऐसा होगा जब वह एक स्वार्थी और टूटी दुनिया में प्रवेश करेगा। अपने दुष्ट घृणा के कारण, येरूशलेम के अगुवे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसकी आत्मा उन सब आत्माओं से कहीं अधिक मूलयवान थी।

हम नहीं जानते कि पिलातुस के मन में क्या चल रहा था जब वह अपने महल में बैठा था। परन्तु हम यह जानते हैं कि उसी के हाथों यह घोषणा लिखवाई गयी कि यीशु यहूदियों का राजा है। और सभी यहूदी अगुवों के विरोध करने पर भी उसने यह लिखा,”‘जो मैंने लिख दिया सो लिख दिया।'”

कहानी १६९: क्रूस की मौत का रास्ता

मत्ती २७:२७-३२; मरकुस १५:१६-२१; लूका २३:२४-३१; यूहन्ना १९:१६

The Flagellation of Christ (stained glass)

यीशु के खिलाफ सज़ा, पिलातुस द्वारा घोषित की गई थी। उन्होंने सैनिकों की पूरी रोमी सेना को अंगना में बुलाया। अपनी बोरियत को दूर करने के लिए,प्रभु के आसपास एकत्र हुए एक सौ से अधिक पुरुष उसका ठट्ठा उड़ाने के लिए वहाँ जमा थे। उन्होंने यीशु का वस्त्र छीन लिया और उन पर एक बैंगनी वस्त्र डाल दिया। उन्होंने उनके सिर पर कांटों का मुकुट रखा और उनके प्रभुत्व का मज़ाक बनाने के लिए उनके दाहिने हाथ में एक ईख डाली। वे नकली श्रद्धा में उनके सामने झुक कर कहने लगे –  “यहूदियों के राजा की जय हो! ‘”तब वे उस ईख से उनके सिर को पीटने और थूकने लगे।

यह सभी के बावजूद, यीशु ने कुछ नहीं कहा। जबकि वह एक पल में अपनी मदद के लिए दस हजार स्वर्गदूतों को बुला सकते थे, वह अपने पिता की इच्छा में पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता में वहाँ खड़े रहे। यह एक शानदार शक्ति, और एक गौरवशाली नम्रता थी। उनकी भक्ति, स्वर्ग के उच्च राजा के लिए थी, और वह जानते थे कि उनके पिता यह सब देख रहे हैं। वह समझते थे कि दूसरी तरफ जीत उनका इंतजार कर रही है, और उन्होंने अपने पिता की ओर आज्ञाकारिता की वजह से होने वाले अपमानित घटनाओं को तुच्छ जाना।

जब सैनिकों ने यीशु का मजाक उड़ा लिया, तो उन्होंने बैंगनी वस्त्र निकाल कर, उन पर वापस उनके कपड़े डाल दिए।उन्होंने उनकी पीठ पर क्रूस का एक छोर रखा, और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए, यरूशलेम में से ले गए। जब वह चल रहे थे, लकड़ी का वजन यीशु के लिए बहुत ज्यादा हो गया। उनका शरीर एक बहुत कमजोर स्थिति में था। तो सैनिकों ने सिरेन नामक स्थान के शमौन नाम के राहगीर को पकड़ लिया। वो फसह उत्सव के लिए देश से यरूशलेम में आया था। वो नहीं जानता था कि परमेश्वर ने उसके लिए क्या रखा है। सैनिकों ने उस पर यीशु का क्रूस उठाने का दबाव डाला। यरूशलेम के पूरे शहर को इन गतिविधियों का ज्ञान हो गया था, और भीड़ सड़कों पर भर गई थी। जैसे यीशु आगे चल रहे थे, शिमौन उनके पीछे भरी भीड़ के साथ पीछे चल रहा था।

राष्ट्र, अपनी सांस यह जानने के लिए पकड़ी हुई थी कि क्या यीशु मसीहा था। शक्तिशाली, चमत्कार काम करने वाले शिक्षक और धार्मिक नेताओं के बीच संघर्ष की स्थापना,  तीन साल के तनाव में उमड़ गई थी। जैसे जैसे यीशु यरूशलेम की ओर जा रहे थे, अफवाहें उड़ने लगी। हर किसी की यह आशा थी कि फसह पर्व पर मामला उलझेगा, लेकिन इस तरह नहीं। यह कैसे हो सकता है? मसीहा को सत्ता में आना था! उन्हें एक लोहे की लाठी से प्रभुत्व के साथ शासन करना था! उन्हें राष्ट्रों को जीतना था!  आधी रात के कार्यवाही, बर्बर पिटाई की कहानियां, हेरोदेस और पीलातुस के महल के दौरे, पागल की तरह राष्ट्र में घूम रहे थे। जब यीशु शहर के बीच से गए, सब कुछ ठहर गया। इस प्रदूषित जुलूस का शोर यरूशलेम भर में सुनाई आ रहा था। भीड़,  क्रूस पर चड़ाए जाने वाले प्रसिद्ध युवा शिक्षक की एक झलक पाने के लिए दौड़ी। वह कितना कमजोर और खून से सना था! वह अपने स्वयं का क्रूस नहीं उठा पा रहा था! क्या यह वास्तव में अंत था? उनकी शिक्षाए कितनी सीधी, सही और सुंदर थी। बहुतों के लिए ऐसा हो रहा होगा जैसे मानो स्वयं अच्छाई ही मर रही है। उन सड़कों में कितने अन्य ने यीशु से चंगाई प्राप्त की होगी? जो यीशु को सुनने के लिए मीलों दूर चल के आते थे, आज उनके जीवन का परिणाम, दहशत में खड़े देख रहे थे। यीशु का अपमान येरूशलेम के साल में एक ऐसे दिन पर था जब ज्यादातर लोग, उस एकलौते, सच्चे मेमने के बलिदान को देखते।

कुछ महिलाए जो यीशु को प्यार करती थी, अपने प्रभु की पीड़ा पर रोते हुए विलाप कर रही थी। यीशु अपने वफादार लोगों के साथ बात करने के लिए मुड़े:

यीशु ने उन की ओर फिरकर कहा; हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिथे मत रोओ; परन्‍तु अपने और अपके बालकों के लिए रोओ। क्‍योंकि देखो, वे दिन आते हैं, जिन में कहेंगे, धन्य हैं वे जो बाँझ हैं, और वे गर्भ जो न जने और वे स्‍तन जिन्‍होंने दूध न पिलाया। उस समय वे पहाड़ों से कहने लगेंगे, कि हम पर गिरो, और टीलों से कि हमें ढाँप लो। क्‍योंकि जब वे हरे पेड़ के साय ऐसा करते हैं, तो सूखे के साय के साथ क्‍या कुछ न किया जाएगा| –लूका २३:२८-३१

बात असल में यह थी कि यीशु जानते थे कि एक ऐसा समय आने वाला था जब यरूशलेम को मसीहा के तिरस्कार के पाप के लिए पूर्ण परिणाम प्राप्त होगा। उसी सुबह, महायाजकों ने रोमी केसर के लिए अपनी वफादारी घोषित की थी, और लोगों ने यीशु का खून अपने खुद के सिर पर और अपने बच्चों के सिर पर होने की अनुमति दी! और परमेश्वर उन्हें अपने रास्ते जाने की अनुमति दे रहे थे। अपने जीवनकाल में, भीड़ जो यीशु के क्रूस के मार्ग के आसपास धूम मच रही थी, यरूशलेम के लोग यह जानेंगे कि भयानक रोमी सेना की दया पर निर्भर होने का मतलब क्या होता है। वहां कोई दया नहीं होगी। रोम, यरूशलेम को घेराबंद कर देगी। दीवारों के भीतर लोग पीड़ा और भुखमरी में महीने गुजारेंगे। वे घृणित पाप में एक दूसरे पर बारी होंगे। फिर रोमी सेना अपने शक्तिशाली हथियार के साथ पूरी ताकत में हमला करेगी। वो सड़कों जहाँ लोग चलते थे और शानदार मंदिर बर्बाद हो जाएगा, और यहूदी राष्ट्र पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।  यीशु जानते थे कि यह भयानक कार्यवाही एक निश्चित अंत लाएगी। तीन दिनों में, वह अनन्त महिमा को फिर से जी उठेंगे। लेकिन कई भयावहता अभी भी यरूशलेम के लोगों के सामने थी। मसीह की आत्मा इतनी महान थी कि यीशु इतनी भयानक यातना के बीच में, कयामत के रास्ते पर चलने वाले लोगों को दया और चेतावनी दे सकते थे|