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कहानी १८२: तट के किनारे सैर 

Sea of Galilee in Israel

युहन्ना २१:१५-२५

चेले नाश्ता खाने के बाद उठकर तट के किनारे चलने लगे। परमेश्वर ने पतरस से कहा, ‘शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तुम सच में मुझे इन से अधिक प्यार करते हो ?”

इसका क्या मतलब था? और उसने ऐसा क्यों पूछा? खैर, पतरस को हाल ही में एक भारी विफलता का सामना करना पड़ा था। उसने सार्वजनिक रूप में प्रभु के साथ विश्वासघात किया था। अब प्रभु पतरस को एक सार्वजनिक तरीके से बहाल करने जा रहे थे।

यीशु की गिरफ्तारी की रात पर जब यीशु आगे होने वाली बातों के बारे में समझा रहे थे, अन्य सभी चेले शांत हो गए। वह केवल पतरस ही था जिसने बड़े साहस से यह घोषणा की कि वह प्रभु का इनकार कभी नहीं करेगा। उसके इस वफादार संकल्प के घोषणा के बाद ही, अन्य चेलों को ऐसा करने के लिए साहस आया। पर पतरस के साड़ी बहादुरी और दृढ़ संकल्प के बावजूद, उसकी अपनी मानव शक्ति पर्याप्त नहीं थी। महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण घंटे में, जब वफादारी सबसे पवित्र गुण था, वह कमजोर पड़ गया और ऐसा करने में विफल हुआ। और मामला इस बात से बदतर हो जाता है कि वह एक रोमन सैनिक के चेहरे में और न मौत की धमकी पर अस्थिर हो गया। उसने ऐसा इनकार एक छोटी गुलाम लड़की के पूछताछ में ही कर दिया। और यह हर कोई जानता था।

यीशु पहले ही समझ गए थे कि क्या होने जा रहा था और उसे चेतावनी दी, लेकिन पतरस इसे सुनना सहन नहीं कर सका। उसने इस बात का विश्वास करने से इनकार किया कि वह ऐसी बात कर सकता है। लेकिन यीशु जानता था कि शैतान, जो परमेश्वर का शक्तिशाली दुश्मन था, वही चालबाज़ साँप जिसने आदम और हव्वा की परीक्षा ली थी, पतरस के पीछे जाने की अनुमति माँगी थी, और परमेश्वर ने “हाँ” भरी थी। स्वर्गीय पिता अपने दुश्मन के नापाक इरादों का उपयोग करने के लिए जा रहा था ताकि वो अपने सेवक की परीक्षा ले सके जो उसके बेटे यीशु के लिए समर्पित था। पतरस को अपने स्वयं की प्रचुरता और गर्व से छुटकारा पाने के लिए एक महान तोड़ने की प्रक्रिया से जाना था।

पतरस को यह कुछ भी समझ में नहीं आया। वह इस भ्रम में था कि वह अपने स्वयं के बल से सब कुछ कर सकता है। लेकिन यह उस आदमी के लिए अतिरिक्त नहीं था जिसे ‘कलीसिया की चट्टान’ बनना था। अगर उसे मार्गदर्शन करना था, तो उसे यह सीखना होगा कि  वह कितना कमजोर है ताकि वह परमप्रधान परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर हो सके।

यह दर्दनाक सबक था,  पर रंग भी लाया। पतरस अपने विश्वासघात के बाद उन भयानक दिनों में खुद के अंत तक आ गया था। यीशु ने अपने जी उठने के बाद अपने को पहले पतरस को प्रकट किया। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उनके बीच क्या वार्तालाप हुई, लेकिन हम केवल कल्पना कर सकते है कि पतरस ने अपने स्वामी की ओर  कितना दु: ख और पश्चाताप प्रकट किया होगा। उन्होंने प्रभु और सेवक जैसे कितना करीबी और पवित्र क्षण गुज़ारा होगा।

अब जैसे वो गलील के सागर के तट पर चल रहे थे, यीशु पतरस से उसके प्रति अपने प्यार की पुन: पुष्टि कर रहे थे। इस बार, यह वार्तालाप अन्य चेलों के सामने हो रहा था और वो यह सब सुन सकते थे। पतरस वास्तव में परमेश्वर का चुन हुआ अगुआ होने को था, लेकिन पतरस के इनकार की कहानी उसके लिए उनके सम्मान को क्षतिग्रस्त कर सकती थी। क्या वह अनुग्रह से गिर गया था? यीशु उसे सम्मान के साथ बहाल करने के लिए सुनिश्चित कर रहे थे।

फिर भी, इस सवाल ने पतरस को भेद होगा। ‘हाँ, प्रभु,’ उसने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस को यह विश्वास था कि यीशु जानता था। अपने महान असफलताओं के बावजूद, उसका प्यार वास्तव था।

यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरे मेमनों को खिलाओ’। पतरस को यीशु के लिए प्यार उसके लोगों की देखरेख करके दिखाना था। यीशु ने अपने आप को ‘भला चरवाहा’ के रूप में वर्णित किया था, और पतरस उनका सेवक था। प्रभु उसे अपनी सबसे क़ीमती संपत्ति को विश्वास समेत सौपने जा रहा था।

प्रभु ने फिर से पूछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?”

यह प्रश्न दो बार पूछने का क्या मतलब हो सकता है? ‘हाँ, प्रभु,’ पतरस ने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस अपने प्यार की सच्चाई का प्रमाण देने के लिए किसी वीर प्रदर्शन या वफादारी की घोषणा पर निर्भर नहीं करने जा रहा था। वो मसीह के बुध्धिमत्ता और ज्ञान पर निर्भर था। वह जानता था कि यीशु जानता था, क्योंकि पतरस को विश्वास था कि यीशु सब कुछ जानता है। यही सबसे मुख्य बात थी।

“मेरी भेड़ों की देखभाल करना, ‘यीशु ने कहा। उनके दूसरे अनुरोध के साथ, पतरस के कार्य का गहरा महत्व दिख रहा था। यह पतरस के लिए एक ऐसी भूमिका थी जो उसके खुद के लिए थी, और उसके चेलों को भी यह मालूम होना था, क्योंकि वे उसके साथ कलीसिया के निर्माण में शामिल होंगे। हालांकि यीशु ने नहीं कहा था, “यह सच है, तुम मुझे इन सब से ज्यादा प्यार करते हो,” उनका मतलब यही था। अगर उनका यह मतलब नहीं होता, तो वह पतरस के आगे ऐसा महत्वपूर्ण काम नहीं रखते। पतरस को अपनी स्वाभाविक प्रतिभा, बल या आकर्षण की वजह से इस कलीसिया का अगुआ नहीं बनाया गया था। उसे यीशु मसीह के प्रति समर्पण, प्यार और भक्ति की वजह से उन्नत किया गया था। यह एक सबसे जरूरी बात है।

एक बार फिर, यीशु ने पतरस से पुछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” तीसरी बार पतरस के लिए एक कड़वे डंक की तरह लगा होगा। यह उस खंडन की संख्या है जिसके बारे में यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वह कितनी बार येशु के महान पीड़ा के समय में उद्धारकर्ता का इनकार करेग। और फिर पतरस बोला, ‘हे प्रभु, आप को सब कुछ पता है। आपको पता है कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस के पास सिर्फ भरोसा था पर यीशु दिव्य था। वह हर झूठ से हर सच जानता था। वह जानता था कि पतरस उससे प्यार करता था।

यीशु ने कहा, ‘मेरी भेड़ों को चराओ। मैं तुम्हे सच बोलता हूँ, जब तुम छोटे थे, तो तुम अपने आप को तैयार करते थे और जहाँ चाहते उधर चले जाते, लेकिन जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो तू अपना हाथ बढाओगे, और कोई और तुम्हे कपड़े पहनाएगा और वहां ले जाएगा जहाँ तुम जाना नहीं चाहते हो’।

वाह। अब मसीह एक और भविष्यवाणी कर रहे थे। पतरस वास्तव में यीशु को प्यार करता था, और एक दिन मौत के मुंह में अपनी वफादारी दिखाएगा। हालांकि पतरस ने अपने प्रारंभिक वर्ष अपने ऊपर खर्च किये, उसके आगे का जीवन, मसीह के राज्य के लिए समर्पित होगा। अंत में, उसके हाथ क्रूस पर चढ़ाने के लिए फैला दिए जाएंगे। उसका जीवन यीशु के जीवन की तरह उसकी पीड़ा में भी होगा। और जैसे  यीशु अपने पिता को महिमा लाए, पतरस को भी मसीह के लिए महिमा लाना होगा। कलीसिया में अगुआ होने के नाते, पतरस के मौत की खबर दूर दूर तक पहुंचेगी। ऐसे निर्बाध और पूर्ण विश्वासयोग्यता को कौन समझा सकता था? उसके बलिदान की सीमा उसका येशु के प्रति प्यार का माप था, और यह उसके उद्धारकर्ता को आदर और प्रतिष्ठा लाएगी।

लेकिन यह कई दशकों के बाद होना था। अभी के लिए यीशु ने कहा, ‘ मेरे पीछे चलो’। कल्पना कीजिये कि आप अपने जीवन के अंत में यह जाने कि आप को क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। कल्पना कीजिये कि इसको जानना परमेश्वर की योजना का हिस्सा था, और उसके बावजूद भी उसके पीछे आपको चलना होगा। इसको पतरस के प्यार की गहराई के अलावा समझने का कोई रास्ता नहीं था। और पतरस इसी उच्च शिष्यत्व का भार उठाने को था।

लेकिन यह बातों पतरस के मन पर नहीं थी, जब उसने यह सुनी। इसके बजाय, उसने मुड़ कर युहन्ना को देखा। ‘हे प्रभु, क्या इस आदमी के बारे में?’ क्या युहन्ना भी दुःख सहेगा? युहन्ना तो यीशु के इतने करीबी था कि गिरफ्तारी की रात वो यीशु के सीने पर टिका हुआ था।जैसे यीशु चेलों को समझा रहे थे कि उनमे से कोई उसे पकड़वाएगा, पतरस को युहन्ना को पीछे टिकने को बोलना पड़ा ताकि वह प्रभु से पूछ सके कि वो गद्दार कौन है। यदि पतरस को पीड़ा सहने के लिए बुलाया गया था, तो युहन्ना को क्या होने जा रहा था?

यीशु ने कहा, ‘अगर मैं उसे अपने वापस आने तक जीवित चाहता हूँ, तो उससे तुम्हे क्या? तुम्हे मेरे पीछे चलना होगा’। यीशु पतरस को कह रहा था, ‘इससे तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है’! क्योंकि बात यह हैं कि  यीशु फिर वापस आएगा, और अगर परमेश्वर ने यह ठहराया कि युहन्ना इतने लंबे समय तक जीवित रहेगा, वो सर्वशक्तिमान ईश्वर का वो सही निर्णय होगा।

अब, क्योंकि यीशु ने यह कहा, अफवाहें फैलने लगी। लोग यह कहने लगे कि युहन्ना कभी नहीं मरेगा। लेकिन यीशु ने यह नहीं कहा था। वह पतरस को यह बता रहा था कि परमेश्वर के चुने हुओं का जीवन और मौत उस पर निर्भर है। पतरस को अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा करना था, न की परमेश्वर की योजना किसी और के जीवन से मापना!

एक दिन पतरस को येशु की तरह क्रूस पर टंगना था। बाइबिल इस बात का विवरण नहीं करती है कि कैसे पतरस ने अपना जीवन यीशु के लिए दे दिया। हम जानते हैं कि यह घटना इस भविष्वाणी के तीन दशकों के बाद हुई, और हम यह जानते हैं कि उसने रोम में एक क्रूस पर यीशु के लिए अपनी जान दे दी। युहन्ना के सुसमाचार लिखने के बाद ही यह घटना घट चुकी थी। जो भी शर्म और खेद पतरस ने अपने प्रभु का इनकार करके महसूस किया, उसके प्रभु सेवा और विनम्रता के जीवन से अभिभूत था।

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कहानी १८१: मछली पकड़ने की यात्रा

युहन्ना २१:१-१४

The Great Catch of Fish

प्रभु ने अपने चेलों से कहा था कि वह उन्हें गलील में मिलना चाहते हैं, तो चेले वहाँ यात्रा करके गए,और पतरस के पुराने शहर में समुन्दर के किनारे रहने लगे। पतरस, थोमा, नथानिएल , याकूब और युहन्ना, और अन्य दो चेलों सब साथ वहां थे। एक ऐसा क्षण आया जब  पतरस ने कुछ व्यस्त होने का फैसला किया। ‘मैं मछली पकड़ने के लिए जा रहा हूँ,’ उसने कहा। बाकी चेलों ने भी उत्साहित होकर कहा, ‘हम भी आ रहे हैं’।

चेले नौकाओं की और बढ़ने लगे और उन्होंने रात वहां पानी के ऊपर बिताई। स्याही जैसे काले आसमान की कल्पना कीजिये। क्या वहाँ करोरों उज्ज्वल चमकते सितारों थे? या वहाँ बादलों की एक गहरी चादर नीचे अंधेरे, आसपास की पहाड़ों पर मँडरा रही थी? कल्पना कीजिये उस मंद मंद हवा और पानी की आवाज़े को जो नौकाओं को धीरे धीरे झुला रहीं थी, मनो कोई लोरी सुना रही हो। मछली पकड़ने के लिए यह एक शांत रात थी। चेले कुछ भी पकड़ नहीं पाए। रात के लम्बे घंटे बड़ते गए। उन्होंने भोर की किरणों को पानी में चमकते देखा। अभी भी कोई मछली हाथ न आई थी। तब किसी ने देखा है कि वहाँ छोर पर एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन चेलों ने उसे नहीं पहचाना।

‘दोस्तों!’, प्रभु ने आवाज़ लगाईं। ‘क्या तुमने अभी तक कोई मछली नहीं पकड़ी?’ यह बात सुबह सुबह के घंटों में सुनना कितना विचित्र था।

‘नहीं,’ उन्होंने जवाब दिया। यह कितनी निराशाजनक रात थी। उनके जीवन में सब कुछ एक बड़ी प्रतीक्षा की तरह लग रहा था। उस ‘उंडेलने’ की, जिसकी येशु बात कर रहे थे, वो कब होने को था? उन्हें कब तक इंतजार करना था? यीशु कहाँ थे?

तट पर आदमी ने कहा, “‘नाव के दाईं ओर पर अपने जाल फेंको और तुम्हे कुछ मछली मिलेगी’। अब यह वास्तव में एक अजीब बात कहने को थी। आखिरकार, इस आदमी को यह कैसे पता था कि नाव के दाहिनी ओर उन्हें मछली मिलेगी? और अगर मछली उस ओर थी, तो नाव के बाए हाथ की तरफ भी क्यूँ नहीं थी?

लेकिन चेलों ने उस आदमी की सलाह मानी और अपने जाल वहां फेंक  दिए। और ऐसा करने से, वे बहुत धन्य और आशीषित हुए। मछली की एक भारी संख्या पानी में तैर रही थी। जाल मछली से इतना भारी हो गया था कि उसे नाव में वापस ढोना मुश्किल हो गया।

यह कहानी युहन्ना के लिए कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी-  युहन्ना: वही चेला जो यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने पतरस की ओर देखा, जो उसका पुराना मछुआरा साथी था। क्या उसे भी याद था? अंत में युहन्ना ने कहा, ‘यह प्रभु है!’

जैसे ही पतरस ने यह सुना, वह जानता था कि यह सच था। और वो नाव का तट तक पहुँचने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर पाया। उसने अपना वस्त्र निकालकर, अपने कमर के चारों ओर बाँध लिया। और फिर वह बर्फीले पानी में कूद पड़ा!

बाकि चेले तट की ओर अपनी नावों में, अपने पीछे भरी जाल खींचते हुए आए। उन्हें ज्यादा दूर जाना नहीं था। वे तट से केवल सौ गज दूर थे।

जब तक वो पहुंचे, उन्होंने देखा कि एक कैम्प फायर की गंध हवा में थी। यीशु ने लकड़ी के कोयले से एक आग जलाई थी। कुछ मछली उस पर सिक रही थी और वहाँ कुछ रोटी भी थी। यीशु उनके लिए नाश्ता बना रहे थे। वहाँ उनके सामने यीशु थे, अपने पुनर्जीवित शरीर में, और वे रोज़ मर्राह का काम कर रहे थे। अपने दोस्तों के लिए खाना बनाना उनकी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं था। अनंत काल के जीवन में भी, सेवा और काम का जीवन सम्माननीय है। यहां तक ​​कि खुद परमेश्वर के लिए भी। येशु ने क्या पौष्टिक, साधारण भोजन, वहां, समुद्र के तट पर प्रदान किया!

अब, हमें इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प बात जाननी चाहिए। नए नियम के लेखकों ने इसे यूनानी भाषा में लिखा था।अक्सर, वे बहुत ही खास शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे पाठकों को मूल, विशेष बात समझने में मदद मिलती थी।इस शब्द ‘लकड़ी का कोयला’ का इस्तेमाल इस कहानी के अलावा केवल नए नियम के एक अन्य समय में इस्तेमाल किया गया था। पहली बार इसका प्रयोग तब होता है जब पतरस, यीशु के परीक्षण के दौरान, आग से अपने को गरमा रहा था। इस लकड़ी के कोयले की बहुत तगड़ी बू थी, कि वह उस रात की हवा में भर गई होगी। यह वही गंध थी जो पतरस के फेफड़ों भरी होगी, जब उसने अपने प्रभु का इनकार किया था।

दूसरी और केवल यही एक और समय था जब यह शब्द का प्रयोग यहाँ, नए नियम के इस कहानी में होता है; जब यीशु ने अपने चेलों के साथ एक बार फिर से मुलाकात की। वही गंध पतरस के फेफड़ों में भरी, जब वो  मसीह के साथ समुद्र तट पर खड़ा हुआ बाकि चेलों के लिए इंतज़ार कर रहा था। क्या यीशु जानबूझकर यह दर्दनाक यादगार वापस ला रहे थे? क्यों?

जैसे नाव पहुँची, यीशु ने कहा, ‘तुमने जो मछली पकड़ी है, उसमे से कुछ ले आओ।’ पतरस नाव पर चढ़ कर समुद्र तट तक जाल घसीटते हुए लाया। उस जाल में १५३ मछली थी, लेकिन फिर भी, वो नहीं टूटी।

कल्पना कीजिए चेलों को कैसा लगा होगा जब वे नाव से बाहर उतरे होंगे। यह तीसरी बार था जब उन्होंने यीशु को उसके मौत के बाद देखा था। उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसको, उनके जीवनकाल के सबसे भयंकर, सार्वजनिक मौत द्वारा मारा गया था। तो भी, वह उनका अपना प्रभु और स्वामी था। अब वो उनके सामने जीवित था – वो यीशु जिसके पास एक ऐसा विचित्र अधिकार था जो प्रकृति के नियमों को भी लांघ गया।वो परमेश्वर था। उन्होंने उसके आने की कल्पना जीत और सत्ता के साथ की थी, लेकिन इस तरह नहीं! एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख कौन क्या कर सकता है, खासकर जब वह आपके लिए मछली पका रहें हो?

यीशु ने उन्हें कहा, ‘आओ, नाश्ता तैयार है।’ यीशु ने अभी भी अपना परिचय नहीं दिया। चेलों को यकीन था कि वो येशु ही है, पर पूछने का साहस किसी को नहीं था। इस दुनिया की सांसारिक, रोज़ मर्राह की बाते, अनन्त दायरे के उज्ज्वल महिमा के साथ टकरा रहीं थी। यह लगभग वैसे था जैसे जमीन उनके पैरों के नीचे खिसक रही थी और उन्हें अपना संतुलन लाना नहीं आ रहा था। कितने धैर्यपूर्वकता से  परमेश्वर ने यह भद्दापन संभाला। उसने रोटी ली और उनमें से प्रत्येक को दिया। फिर उसने मछली पकड़ाई।

इस्राएल का पूरा राष्ट्र उस सागर तट के छोटे से झुण्ड से मोहित हो जाता। लेकिन यीशु मानव जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए नहीं आए। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे। वह उन्हें बहाल और मजबूत बनाने के लिए और उन्हें तैयार करने के लिए आया था। एक दिन, उनमें से हर एक उसके साथ उसके राज्य में होगा। वे स्वर्ग में मसीह के साथ राज्य करेंगे। लेकिन इससे पहले कि यह शानदार समय आए, आगे एक कार्य था।

कहानी १८०: शक्की थोमा 

आठ दिन बीत चुके थे जब मसीह अपने चेलों के सामने प्रकट हुए थे। कई जबरदस्त बातें इस छोटे दौरान हुई थी! वे उसके मौत के सदमे से बाहर भी नहीं आ पाए थे जब अचानक वह मुर्दों में से जी उठा! और तो भी, वह उनके साथ नहीं था, कम से कम पहले की तरह तो नहीं।

कल्पना कीजिये उन आठ दिन इंतेजारी, के जब उन्हें धीरे धीरे इन बातों का एहसास होने लगा। कल्पना कीजिये कि वह चुपके से यरूशलेम की गलियों में खाना खरीदने के लिए और एक दूसरे से मिलने जाते होंगे, हमेशा उस डर में की कोई उन्हें पहचान ना ले।उनके बीच बातचीत और प्रार्थनाओं की कल्पना कीजिये।

उन्हें आगे क्या करना था? वे सही मायने में यीशु के पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ चुके थे, और अब भविष्य उनके सामने एक खुली खाई की तरह थी – एक अज्ञात क्षेत्र की नई दुनिया की तरह! क्यूंकि अब राजा मुर्दों में से जी उठा था, तो राज्य कैसा दिखेगा? और अब उन्हें उन बचे हुए होने के वास्ते क्या करना था? विशेषकर जब येशु की मृत्यु से जुड़े धार्मिक नेता और राजनीतिक विवाद एक जलता हुआ मुद्दा था!

चेले एक साथ फिर इकट्ठा हुए। इस बार उन्होंने ध्यान से दरवाजा बंद किया और चिटकनी लगा ली। इस समय थोमा भी उनके साथ था। अचानक, यीशु आ के ठीक उनके बीच खड़े हो गए। ‘शांति तुम्हारे साथ हो,”उन्होंने कहा।

यह पहली बार था कि थोमा ने जीवते प्रभु को देखा था। बाकी सब ने कहानियों बताई और विश्वास के साथ भर गए। लेकिन थोमा येशु को पहली बार खोने पर निराशा से भर गया था। वह अपनी आशा को फिर जगाना नहीं चाहता था। वो ऐसी निराशा दोबारा नहीं झेलना चाहता था। यीशु को स्वयं उसके पास आना था और थोमा को उसके हाथों पर कीलों के निशान को छूना था ताकि वो विश्वास कर सके!

थोमा के दिल में गुज़रती हर बात को येशु जनता था। तो वह उसकी तरफ मुड़े और अपना हाथ बड़ाया। ‘यहाँ अपनी उंगली रखो, मेरे हाथ देखो। अपने हाथ से मेरी कमर छुओ। शंका मत करो और विश्वास करो।’ यीशु कितनी उदारता और धीरज से भरे थे!

थोमा ने जैसे वो ज़ख्म देखे, वे बोल पड़ा – ‘मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर!’ यह एक वास्तविक और सच्चे विश्वास की एक घोषणा थी। थोमा ने विश्वास करने में बेशक समय लिया, लेकिन जब उसने किया, तो उसने विश्वास की सबसे ज़ोरदार और मज़बूत घोषणा की। किसी ने अभी तक यह घोषित नहीं किया था कि यीशु परमेश्वर था! और प्रभु ने उसकी भक्ति के शब्दों को प्राप्त किया।

यीशु ने कहा, ‘क्योंकि तुमने मुझे देखा है, तो तुमने विश्वास किया है; धन्य है वो जिन्होंने देखा नहीं पर फिर भी विश्वास किया है।’

और इसी जगह में आप और मैं कहानी में प्रवेश करते है। वो इसलिए, क्यूंकि हम मानते हैं कि यीशु की मृत्यु हो गई और वो फिर मुर्दों में से जी उठा, भले ही हम अपनी आँखों से उनके निशान या उनका पुनरुथान किया हुआ देह नहीं देखा हो! हैना यह एक आश्चर्यजनक बात है कि हम विश्वास के इस लंबे, स्वर्ण श्रृंखला का एक हिस्सा हैं, जो इन पहले चेलों से शुरू हुई।

जब तक युहन्ना ने इन कहानियों को अपने सुसमाचार में लिखी, यीशु के मृत्यु और पुनरुथान को कई दशक गुज़र गए थे। चेलों ने रोमी साम्राज्य में सुसमाचार की घोषणा की थी। थोमा, उद्धार का यह शुभ समाचा,र भारत देश तक भी लाया। दुनिया भर में कलीसिया मज़बूत और फलवन्त होती जा रही थी। जैसे जैसे युहन्ना ने यीशु के शब्दों को कलीसियाओं के लिए लिखा, वैसे वैसे उसे लोगों को येशु के बारे में सिखाने में कई साल लग गए। उसने हजारों को येशु पर विश्वास लाते देखा, हालांकि वे प्रभु से कभी नहीं मिले थे। उसने शायद कईयों को मसीह के नाम के लिए मरते भी देखा होगा। कितना अद्भुत होगा उस व्यक्ति के लिए- जिसने येशु की गिरफ्तारी की रात उसकी छाती पर विश्राम किया होगा – यह देखना कि  कितने लोग उसके प्रभु को प्यार करते थे, भले ही उन्होंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा हो। कल्पना कीजिए कि यह उसके दिल को कितना छुआ होगा! वास्तव में, यही वो कारण है जिसकी वजह से युहन्ना ने यह पुस्तक (युहन्ना) लिखी।

प्रभु यीशु अपने जी उठने के बाद चालीस दिन के लिए अपने चेलों को प्रकट होते रहे। यह शिक्षण और प्रशिक्षण का समय था जब यीशु उन्हें राज्य के काम के लिए तैयार कर रहे थे। युहन्ना ने इसका वर्णन ऐसे किया है:
“यीशु ने और भी बहुत चिह्न चेलोंके साम्हने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए। परंतु थे इसलिथे लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” -युहन्ना २०:३०-३१

कहानी १७९: आत्मा का उंडेला जाना 

लूका २४:४६-४९, यूहन्ना २०:१९-२३

shining dove with rays on a dark

यीशु अपने चेलों से यरूशलेम के एक गुप्त, बंद कमरे में बात कर रहे थे, और चेले पूरे ध्यान के साथ सुन रहे थे। अंत में, यीशु की योजनाए उनके जीवनों के बारे में उन्हें ज्ञात हो रही थी। प्रभु यीशु अपने चेलों को उनके आगे जीवन के बारे में निर्देश दे रहे थे। वह अग्रसर आदेश दे रहे थे! वह उन्हें कुछ ऐसा शक्तिशाली देने जा रहे थे जो चेलों की मदद वो सुसमाचार फैलाने में करेगी जो उसने अभी क्रूस पर किया।

कल्पना कीजिए कि चेलों को कैसा लगा होगा जब उन्होंने इस बारे में सुना। नाराज भीड़, उग्र धार्मिक नेता जिन्होंने देश पर नियंत्रण किया हुआ था, और रोमन सैनिकों की हिंसक ताकत अभी भी उनकी यादों में गूँज रही होगी। भला वे कैसे, कभी भी, उस शहर में यीशु के नाम से फिर प्रचार कर पाएंगे? वे जिंदा थे, बस इसलिए खुश थे! और इसका क्या मतलब था कि वे उच्च पर से सशक्त होंगे? यह अप्रत्याशित, रहस्यमय परमेश्वर अब आगे क्या करने जा रहा था?

पुराने नियम में कुछ ऐसी भविष्यवाणियाँ थी जो एक ओर संकेत कर रही थी –  ऐसी उज्जवल बाते जो परमेश्वर करने जा रहा था। आप देखते हैं, यीशु ने क्रूस पर अंतिम जीत जीती थी, और ऐसे कई तरीके थे जिससे यह जीत दुनिया को आशीषित कर सकती थी। नबी योएल ने कहा:
“उन बातोंके बाद मैं सब प्राणियोंपर अपना आत्मा उण्डेलूंगा; तुम्हारे बेटे-बेटियां भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिथे स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।
तुम्हारे दास और दासियोंपर भी मैं उन दिनोंमें अपना आत्मा उण्डेलूंगा।” योएल २:२८-२९

पिता परमेश्वर किसी तरह से अपने वफादार बच्चों पर अपनी आत्मा उंडेलेंगे, और एक नया युग मानव जीवन में शुरू किया जाएगा! जो कोई यीशु में अपना विश्वास डालेंगे, उनको पवित्र आत्मा प्राप्त होगी। वे पृथ्वी पर चलने वाले एक नए प्रकार के प्राणी  हो जाएंगे—–मनुष्य जो दिव्य जीवन और शक्ति के साथ रह रहे हो! यीशु ने पाप से पूर्ण शुद्धिकरण और सम्पूर्ण माफी के लिए एक रास्ता बनाया था। उन्होंने अपने चुने हुए लोगों को अपने जैसे सिद्ध, शुद्ध, और धर्मी बनने के लिए रास्ता बनाया। अब पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की उपस्थिति उनके पास आकर हमेशा के लिए रह सकती थी! परमेश्वर ने इसे इस तरह से नबी यहेजकेल को वर्णित किया:
“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूंगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतोंसे शुद्ध करूंगा।
मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्यर का ह्रृदय निकालकर तुम को मांस का ह्रृदय दूंगा।
और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियोंपर चलोगे और मेरे नियमोंको मानकर उनके अनुसार करोगे।” -यहेजकेल ३६:२५-२७

वाह। यहेजकेल नई वाचा के अधीन, नए जीवन का वर्णन, छह सौ साल पहले कर रहा था!

परमेश्वर की आत्मा का उंडेला जाना जल्द होने जा रहा था। क्या आपको यीशु की अपने चेलों के साथ लंबी बात याद है जो उन्होंने अपने गिरफ्तारी की रात से पहले की? क्या आपको याद है कि उन्होंने अपने चेलों को उनके छोड़ने पर दुखी नहीं होने को कहा था? उन्होंने कहा कि उन्हें खुश होना चाहिए क्योंकि वह अपनी आत्मा उनको भेजने जा रहा था। उनकी आत्मा शक्ति में काम करेगी और उन्हें मार्गदर्शन और दिलासा देगी,जैसे जैसे वो उसके नाम का एह्लान करते जाएंगे!

आत्मा की शक्ति वही शक्ति थी जिसके द्वारा यीशु ने पृथ्वी पर अपने जीवन को व्यतीत किया। यीशु हमेशा था और हमेशा पूरी तरह परमेश्वर है और रहेगा, लेकिन जब वह स्वर्ग से नीचे आया था, वह पूरी तरह से मनुष्य बन गया। जैसे वो इस पृथ्वी पर आया और रहा, उसने खुद के दिव्य शक्तियों के बलबूते पर ना चमत्कार किये और ना अद्भुत सत्य बोले। हर दिन वह एक सामान्य आदमी की शक्ति में रहा। लेकिन उसने एक परिपूर्ण, सिद्ध जीवन जिया, क्योंकि एक मनुष्य होके, वह परमेश्वर पर पूरे विश्वास और आज्ञाकारिता से निर्भर रहा। उसने आत्मा को अपना सिद्ध मार्गदर्शक बनने की अनुमति दी थी। एक सामान्य मनुष्य के नाते, यीशु को प्यास और थकावट लगती थी। लेकिन वह अपने पिता के साथ निरंतर निकटता में और पूर्ण आज्ञाकारिता में रहते थे। उन्होंने यह पवित्र आत्मा की शक्ति में किया। अब जब कि यीशु ने मनुष्य को परमेश्वर के लिए मोल लिया था, वो अपने अनुयायियों को आत्माभी दे सकता था।

जैसे यीशु ने अपने चेलों के साथ उस यात्रा पर कहे शब्दों को समाप्त किया, उन्होंने कहा, ‘शांति तुम्हारे साथ हो, जैसे पिता ने मुझे भेजा है, मैं भी तुम्हे भेजता हूँ।’ अब पहले से कहीं ज्यादा, चेले समझने लगे थे कि यीशु स्वर्ग से भेजा हुआ है। और अब, वे परमेश्वर की अद्भुत योजना में मानो लिपटे हुए थे। पिता के पास उनमें से प्रत्येक के लिए, पृथ्वी पर अपने जीवन के लिए, एक बहुत ही विशिष्ट कार्य था।

यीशु अपने आदमियों की ओर मुड़ा और उन पर सांस ली और कहा, ‘पवित्र आत्मा प्राप्त करो।’

यह नहीं था कि जीवते परमेश्वर की आत्मा चेलों के जीवन में पहले से काम नहीं कर रही थी। जब आत्मा ने उनके हिर्दय में काम किया, तो वो सन्देश को समझने लगे। वो आत्मा ही थी जिससे वो जागृत और क्रियाशील हो गए! लेकिन अब आत्मा एक कई अधिक तीव्र, और स्थायी तरीके से आ रही थी। यीशु के साथ यह पल शुरुआत थी, और इससे आगे, अधिक से अधिक बातें होने को थी।

तब यीशु ने कहा, “यदि तुम किसी के पापों को क्षमा करते हो, उनके पाप उन्हें माफ कर दिया जाएंगे; अगर तुम उन्हें माफ नहीं करते हो, उन्हें माफ नहीं किया जाएगा”. वाह! यह अपने चेलों को देने के लिए एक उच्च और खतरनाक शक्ति है! उन्हें परमेश्वर द्वारा ऐसे सशक्त किया जाएगा कि परमेश्वर के परिवार में, उनका निर्णय, परमेश्वर के निर्णय जैसा गिना जाएगा। परमेश्वर के राज्य में यह क्या उच्च और पवित्र भूमिका है!

चेलों में से एक उस दिन वहां नहीं था। किसी कारणवश, थोमा  वहाँ नहीं था। आने वाले दिनों में, अन्य चेलों ने उसे वहां होने वाली बातों के बारे में बताया होगा। जब थोमा ने उनकी कहानियों सुनी होंगी,  उसको ये लगा  होगा की ये पगला गए है! उसने उन पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। वे इसे इतनी बुरी तरह से चाहता था कि वे खुद को मूर्खता में झूटी दिलासा दे रहे थे! थोमा ने कहा, ‘जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लू, और कीलों की जगह में अपनी उंगली डालू, और उसकी कमर में अपना हाथ न रख लू, मैं विश्वास नहीं करूंगा।’

कहानी १७८: जीवित मसीह

मरकुस १६:१२-१४,यूहन्ना २०:१९-२३, लूका २४:३२-४९

Venice - Resurrected Christ in Saint Nicholas church

क्लीओपस और उसके दोस्त को कुछ अद्भुत दिया गया था। जब वे इम्मौस के लिए यरूशलेम से घर जा रहे थे, यीशु वहां आए। शुरू में, वे उसे नहीं पहचान सके। किसी तरह, उनकी आंखों को यह प्रकट करना यीशु का काम था।

जब वह उनके साथ शामिल हुआ, तो उन्होंने इस्राएल के पूरे इतिहास की व्याख्या की – मूसा से लेकर नबियों तक – यह दिखाने के लिए कि उसका आना परमेश्वर के महान छुटकारे की योजना की पूर्ति थी! अंत में जब वो नीचे बैठे और यीशु रोटी तोड़ने लगे, तो अचानक उन्हें यह प्रकट हुआ कि यह वही था! यीशु ने अपने आप को प्रकाशित किया। यह प्रभु था! लेकिन उसके बाद, वह गायब हो गया।

पुरुषों ने कोई समय बर्बाद नहीं किया। वे उठकर यरूशलेम सीधे वापस चले गए। क्या आप शहर के उन सात मील की दूरी पर उनकी चर्चा और उत्साह की कल्पना कर सकते हैं? उन्हें चेलों को बताना था कि जो महिलाओं ने बोला था, वो सच था!

जब वे आए, तो कुछ और खबर थी। चेलों ने बोला: “प्रभु वास्तव में जी उठा है, और शमौन पतरस को प्रकट हुआ है! ‘” अब, चारों में से कोई भी सुसमाचार हमें यह नहीं बताती है कि यीशु ने पतरस को उसके विश्वासघात के बाद पहली बार मिलने पर क्या कहा। यह यीशु और उसके प्रिय सेवक के बीच एक बेहद निजी समय था। लेकिन क्या आप पतरस और उसके शोकित पश्चाताप की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उसके राहत की कल्पना कर सकते हैं? उसके पास माफी की भीक मांगने का मौका था! उसके लिए यह एक कैसी शक्तिशाली बात रही होगी कि उसके भयानक विश्वासघात के बावजूद, प्रभु यीशु ने उसे मिलने के लिए ढूंडा? प्रिय मरियम के बाद दुनिया में सभी लोगों में से, पतरस जीवित मसीह के साथ मिलने के लिए पहला जन था। क्या ही कोमल प्रभु!

जब चेलों ने क्लीओपस और उसके दोस्त को अपऩी अच्छी खबर बताई, तब यात्रियों ने यीशु के साथ सड़क पर अपनी मुलाक़ात के बारे में चेलों को बताया। उत्तेजित आवाज़ो का कितना शोर होगा!

इसके पश्चात जब पुरुष अपने आश्चर्य में बातें कर रहे थे, वे खतरे की संभावना के बारे में जानते थे। यहूदी नेता खुश नहीं थे। अफवाह यह थी कि वे मसीह के शरीर के चोरी का आरोप चेलों पर लगा रहे थे! तो चेलों ने अपनी बैठक जगह का दरवाजा सावधानी से बंद किया। फिर वे इस अद्भुत सच्चाई पर चर्चा करने के लिए मुड़े: यीशु जीवित था।

पुरुष मेज़ के पास एकत्रित होकर बैठ गए। वे अपने भोजन के पास बैठे उन उल्लेखनीय बातों के बारे में चर्चा करने लगे जो उन के आस पास उस रविवार हुई। अब तक, यीशु ने अपने को केवल चार लोगों को प्रकट किया। वह मरियम के पास  पहले क्यों आए थे? और महिलाओं ने क्यों स्वर्गदूतों को देखा, लेकिन यूहन्ना और पतरस को केवल खुली कब्र और तह लगे हुए कपडे देखने को मिले? धार्मिक नेता अब क्या करने जा रहे थे? क्या वे मसीह के जी उठने को एक धोखा साबित करने के लिए, चेलों को दंडित करने की कोशिश करेंगे? और अब वे यीशु को अगली बार कब देखेंगे?

और फिर,ठीक उनके भोजन के बीच में, प्रभु यीशु एक बार फिर से दिखाई दिए! “‘शांति तुम्हारे साथ हो” उन्होंने कहा।

चेले हैरान हो गए, और उसके बाद वे घबरा भी गए! उन्हे लगा कि यह एक आत्मा है! परमेश्वर के अनन्त दायरे, मसीह के माध्यम से पृथ्वी और प्रकृति के नियमों पर हावी हो रही थी। यीशु को बंद दरवाजे से आके अपने हाथ की सफाई नहीं दिखानी थी। वह सिर्फ वहां बस आ गए! शिष्यों के लिए, यह अजीब और बहकानेवाली बात थी। जिस ठोस और स्थायी दुनिया को वो जानते थे, वो महान यथार्थ अपने असीम रूप से इस ठोस और स्थायी दुनिया को एक अनिश्चित छाया बना रहा था।

यीशु ने पूछा: “तुम इतना परेशां क्यूँ हो, और तुम्हारे मन में संदेह क्यों उठता है?  मेरे हाथ और मेरे पैर देखो, कि यह वास्तव में मै ही हूँ; मुझे छुओं और देखो, क्यूंकि एक आत्मा के पास मांस और हड्डियों नहीं होती, जैसे तुम देखते हो मेरे पास है।”

जैसे ही उन्होंने यह बातें कही, यीशु ने अपने हाथों और पैरों में निशान दिखाए जो उन क्रूर कीलों ने बनाई। फिर उन्होंने अपनी कमर दिखाई जहां भाले ने उसे बेधा था।

फिर वे खुशी से भर गए, और उस पर आश्चर्य करने लगे जो सच नहीं लग रहा था, लेकिन था। यह एक अकल्पनीय आशा थी! यह दिखाने के लिए कि वह सिर्फ आत्मा में नहीं वरण शरीर के साथ भी जी उठा है, यीशु ने पूछा: “‘क्या तुम्हारे पास खाने के लिए कुछ है?”

चेलों ने उसे कुछ भुनी मछली दी।यीशु ने ले लिया और उनके सामने उसे खा लिया। सत्य अब वास्तविकता बन रही थी, और वे उज्ज्वल आश्चर्य से भर गए। जिसको उन्होंने सोचा कि वह हमेशा के लिए खो गया है, वह वापस आ गया था!

यीशु ने समझाया: “‘मैंने तुम्हे यही बताया था जब मै तुम्हारे साथ था: मेरे बारे में जो कुछ मूसा की व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं, और भजन में लिखा है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।” प्रभु ने बार बार कोशिश की उन्हें आने वाली बातों की चेतावनी दे, लेकिन वह उसे तब तक नहीं समझ पाए जब तक वह हुई नहीं। अब भी, उनके सामने जबकि वह स्वयं जीवित थे, उन्हें इसे समझना कठिन था। तो वह उन्हें सिखाने लगे, ताकि उनके दिमाग खुले और वह पूरे रूप से समझ पाए कि कैसे पुराना नियम हमेशा से यीशु की ओर संकेत कर रहा था! खुद यीशु के ही होठों से सुनने के लिए यह एक आकर्षक सबक था! क्या आप उस दीवार पर एक मक्खी होने की इच्छा नहीं करते है?

प्रभु ने आगे बोला:
और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।
और यरूशलेम से लेकर सब जातियोंमें मन फिराव का और पापों की झमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।
तुम इन सब बातें के गवाह हो।
और देखो, जिस की प्रतिज्ञा मेरे पिता ने की है, मैं उस को तुम पर उतारूंगा और जब तक स्वर्ग में सामर्थ  न पाओ, तब तक तुम इसी नगर में ठहरे रहो।।

वाह! यीशु का क्या मतलब था? वो कैसे यरूशलेम में मसीह के बारे में प्रचार करेंगे, यह जान के कि धार्मिक नेताओं का प्रकोप उनका पीछा कर रहा था? और इसका क्या मतलब था कि वह स्वर्ग से सामर्थ पाएंगे?

कहानी १७५: जी उठा

मत्ती २८:१-१०, मरकुस १६:१-२२, लूका २४:१-१३, यूहन्ना २०:१-१८

Ressurrection of Christ

रविवार की सुबह आई। यह यहूदी सप्ताह का पहला दिन था। मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम सुबह होने से पहले अपने बने मसालों के साथ तैयार थी। जैसे जैसे सूरज पूर्वी आकाश को हल्का करने लगा, वे अन्य महिलाओं के साथ कब्र के लिए निकल पड़ी। उनकी यात्रा में कुछ बिंदु पर ज़मीन हिलने लगी। यह एक और भूकंप था। इसका क्या मतलब हो सकता है? अक्सर बाइबिल में भूकंप परमेश्वर के आने का एक संकेत था।

लेकिन शायद उनके विचार अभी भी अपने दु: ख से भरे हुए थे। वे भूकंप के आश्चर्यजनक, अद्भुत अर्थ का अनुमान नहीं लगा सकीं। क्यूंकि असल में, परमेश्वर आए थे। यीशु मरे हुओं में से जी उठे थे! और जब एक शानदार स्वर्गदूत उसके कब्र पर पत्थर को लुड्काने आया था, पृथ्वी कांप उठी। जब रोमी पहरेदारों ने उस चमकदार स्वर्गीय प्राणी को देखा, तो वे भय से भर कर ज़मीन पर गिर गए।

स्वर्गदूत यीशु को बाहर निकलने में मदद के लिए नहीं आया था। परमेश्वर अपने अविनाशी जीवन की शक्ति के आधार पर जी उठे थे। वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शक्ति में जी उठे। और जब स्वर्गदूत ने पत्थर लुढ़काया, तो वह परमेश्वर के काम का एक प्रकाशन, एक घोषणा थी! क्या ही महान घटना का एक अकाट्य सबूत!

लेकिन महिलाओं को अभी तक यह पता नहीं था। जैसे वो साथ चल रहीं थीं, वे सोच में थी कि पत्थर को कैसे हटाया जाए। क्या रोमी पहरेदार उनको कब्र के पास जाने देंगे?

जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि अब यह एक प्रश्न नहीं रहा। हैरान रोमन पहरेदारों के शव चारों ओर पड़े हुए थे। क्या चल रहा था? कब्र के अंदर जा कर उन्होंने पाया कि शव तो गायब था। यह कैसे हो सकता है? वे प्रभु को कहाँ ले गए थे? वे भ्रम और थके हुए, दु: ख में एक दूसरे को देखने लगे।

अचानक, दो स्वर्गदूत शानदार सफेद कपड़ों में दिखाई पड़े। महिलाए डर में अपने चेहरे के बल ज़मीन पर गिर गई।

स्वर्गदूतों में से एक ने उन से पूछा, “तुम मृतकों में जीवितों को क्यूँ ढूँढ रहे हो? डरो मत, क्यूंकि मै जानता हूँ तुम किसे ढूँढ रहे हो। वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है! याद करो कि जब वो तुम्हारे साथ यहाँ गालील में था तो उसने तुम्हे क्या बताया था- यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र पापी पुरुषों के हाथों में डाल दिया जाए, क्रूस पर चढ़ाया जाए और तीसरे दिन फिर से उठाया जाए “‘

जैसे जैसे स्वर्गदूत बोलता गया, वैसे वैसे महिलाओं ने यीशु के शब्द याद किये।

स्वर्गदूत ने कहा: “‘जल्दी जाओ, उनके चेलों को बताओ कि वो मुर्दों में से जी उठा है। वह गलील में तुम से पहले जा रहा है, वहाँ तुम उन्हें पाओगे, जैसे उन्होंने तुमसे कहा। ‘”

महिलाए डर और खुशी से काँप उठी। वे शिष्यों को यह अद्भुत खबर बताने के लिए कब्र से चल पड़ी। उन्होंने रास्ते में किसी से बात नहीं की,यह डर से कि वे इस आश्चर्यजनक खबर के बारे में क्या कह दे। उन्होंने ग्यारह को पाया और अपने आँखों देखा हाल उन्हें बताया। महिलाओं के शब्द बकवास की तरह लग रहे थे। और कुछ हद तक, वे थे। यहां तक ​​कि मरियम मगदलीनी की रिपोर्ट अभी उलझन से भरी थी। “‘वे प्रभु को कब्र से बाहर ले गए है, और हम नहीं जानते है कि उन लोगों ने उन्हें कहाँ रखा है'” उसने घोषणा की। अपनी हताशा में, उसके पास सिर्फ एक ही ख्याल था। शानदार स्वर्गदूतों के शब्द उसके लिए कोई मान्यता नहीं रखते थे। उसके लिए सिर्फ प्रभु को ढूँढना मायने रखता था।

पहले तो चेलों ने महिलाओं पर विश्वास नहीं किया। लेकिन जब वह इन शब्दों को समझने लगे, पतरस को लगा कि इस बात में सच्चाई हो सकती है! वह कूद कर कब्र की ओर भागा। यूहन्ना भी बहुत पीछे नहीं था। वे पूरी ताकत लगा के भागे। यूहन्ना जवान और तेज़ था और सबसे पहले कब्र पर पहुंचा। वह प्रवेश द्वार पर रुका और एक शरीर या एक दूत या एक चिन्ह के लिए खोजने लगा। वहाँ, जहाँ यीशु को रखा गया था, बड़े तरीके से कपड़ा में तह लगा हुआ अलग रखा था। चेहरे का कपड़ा एक ओर अलग से रखा था। पतरस यूहन्ना को पार कर सीधे कब्र में घुस गया। उसने भी वो कपड़े की पट्टियाँ देखीं। यूहन्ना पतरस के पीछे आया, और इसके अर्थ के बारे में दोनों सोचने लगे। यूहन्ना ने विश्वास किया पर फिर भी विचारा। दोनों इस बात की पूर्णता को नहीं समझ पा रहे थे। सांसारिक रूप से, यह नए तथ्य कुछ अटपटे लग रहे थे। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे थे कि येशु को मुर्दों में से जिंदा होना था। चेले कब्र छोड़ कर चले गए और वापस अपने घरों को लौट गए।

मरियम मगदलीनी उन लोगों के पीछे कब्र की ओर बड़ रही थी। वह वहाँ खड़े होकर रोने लगी। क्यूंकि उसके पास कहीं जाने को नहीं था। प्रभु यीशु उसकी आशा और जिंदगी बन गए थे। वह द्वार के पास गई और अंदर कदम रखा। एक बार फिर, दो स्वर्गदूत उसके समक्ष पेश हुए। एक, जहाँ यीशु को रखा गया था, उसके सिरे और उसके पैर में बैठे थे।

आने वाले दिनों में, मरियम और चेलों ने इसके बारे में विचारा होगा। क्यूंकि यह वही चित्र था जो वाचा के सन्दूक के ढक्कन पर पाया जा सकता था और जो केवल परम पवित्र में रखा जाता था। यह सोने का डब्बा परमेश्वर ने मूसा के लिए बनाया था। ढक्कन ही शुद्ध सोने का बना था, और उसे परमेश्वर की दया की गद्दी बुलाई जाती थी। परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिए कि सन्दूक के दोनों छोर पर दो, गौरवशाली, सुनहरे स्वर्गदूतों की प्रतिमा लगाईं जाए। उनके पंख दया की गद्दी पर फैले थे। यह सन्दूक खोने से पहले, इसराइल के देश की सबसे पवित्र चीज़ थी, और इसकी छवि हर यहूदी के मन में गड़ी थी। अब, मसीह स्वयं परमेश्वर की दया की गद्दी थे – वो महान प्रायश्चित जिसके द्वारा सारे मानव का उद्धार हो सकता है। जब यह दो स्वर्गदूत उनके बलिदान हुए शरीर की जगह पर इर्द गिर्द बैठे थे, तो क्या उन महिलाओं को यह समझ में आया होगा?

यह सारी गहरी और सुंदर चीज़े वो गौरवशाली सत्य थे जिन्हें आने वाले सालों में कलीसिया समझेगी और अनुभव करेगी। प्रेरित यूहन्ना ने अपने लेखन में यह सुनिश्चित किया। लेकिन स्वर्गदूतों की उपस्थिति में रो रही वहां खड़ी तबाह मरियम के दिमाग में, यह बातें नहीं थी।

“‘नारी, तू क्यों रोती है?” उन्होंने कहा.

वह सिर्फ प्रभु के बारे में ही सोच सकती थी। “‘क्योंकि वे मेरे प्रभु को उठा ले गए है, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने प्रभु को कहाँ रखा है'” उसे अभी भी उनके जी उठने की आशा नहीं थी, लेकिन उसका प्यार इतना विशाल था कि उसे अपने प्रभु को खोजना था।

जैसे ही उसने यह कहा, वह जाने को निकली, लेकिन वहाँ एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन उसे यह पता नहीं था। उसे लगा कि यह माली है।“‘नारी, तू क्यों रोती है?'” यीशु से पूछा। “‘तुम किसे खोज रही हो?”

उसने कहा, “‘सरकार, अगर आपने उन्हें उठाया है, तो मुझे बताएँ की आपने उसे कहाँ रखा है ताकि मै उन्हें ले जाऊं।”

वह अपने उद्धारकर्ता को कितना प्यार करती थी! क्या आप इस लालसा को सुन सकते हैं? यीशु भी सुन सकते थे। “‘मरियम,” उन्होंने कहा। जैसे ही उन्होंने मरियम का नाम लिया, वो पहचान गई कि वो कौन थे। “‘गुरु!'” वह बोल पड़ी। वह धरती पर गिर पड़ी और अपने को उनके पैरों से लपेट लिया।

” मुझे पकड़ों मत’, यीशु ने कहा, ” क्यूंकि मै अभी तक अपने पिता के पास नहीं पहुंचा हूँ। इसके बजाय, मेरे भाइयों के पास जाओ और उन्हें बताओ, “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास लौट रहा हूँ।”

मरियम बेसुध उत्साह से भर गई। उसका प्रिय प्रभु गायब नहीं हो गया था! उन्होंने उसे छोड़ा नहीं था! उसका उत्तम प्रेम जिंदा था! वह चेलों को यह अकल्पनीय अच्छी खबर बताने के लिए भागी। “‘मैंने प्रभु को देखा है!'” उसने घोषणा की। फिर उसने इन बातों का विवरण दिया। क्या आप उनके सदमे और उत्तेजना की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उन सवालों  की कल्पना कर सकते हैं जो उठे होंगे? और अब आगे क्या होने जा रहा था?

कहानी १७४: कब्र और इंतज़ार की घड़ी 

मत्ती २७:५७-२८:८, मरकुस १५:४२-१६:११, लूका २३:५०-२४:११, यूहन्ना १९:३८-४२

Cementary of  Pere Lachaise in Paris

मसीह के शरीर को क्रूस से उतार लिया गया। एक आदमी था जिसका नाम था अरिमथिया का यूसुफ़ था, जो यीशु पर विश्वास करता था और गुप्त में उसका चेला था। वह एक सच्चा शिष्य था, लेकिन वह महासभा का भी सदस्य था। परमेश्वर के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की नफरत इतनी ज्यादा थी कि यूसुफ इस बात का खुलासा करने में डरता था। अगर वे उसके खिलाफ हो गए, तो वह सब कुछ खो देगा।

उस दिन के भयानक अन्याय पर उसे कितना शोक हुआ होगा . . ये वह आदमी थे जिसके साथ उसने अपना जीवन बिताया था। वह उस ज़माने के कुलीन वर्ग थे जिसकी वजह से उसने अपने विश्वास को दबा के रखा था। उसे उनके प्रतिघातक व्यवहार से कितनी घृणा होती होगी। मसीह के लिए खड़े होने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। कम से कम वो उसकी मौत में उसे सम्मान दे सकता था। सप्ताह की घटनाए ऐसे थी कि यह खबर, कि महासभा का एक सदस्य यीशु को इतना सम्मान दे रहा है, पूरे इस्राएल में फैल जाती। इसको दुश्मन के साथ दोस्ती के रूप में देखा जाता। लेकिन यूसुफ पेंतुस पीलातुस के पास गया और मसीह के शरीर को दफ़नाने के लिए इजाज़त मांगी। एक बार फिर, इस आदमी यीशु के मामले पीलातुस के सामने आए। उसने अपनी सहमती इस आदमी को दे दी जो स्पष्ट रूप से यीशु का भक्त था।

यूसुफ मसीह का शरीर मांगने गया। निकोदेमुस मदद के लिए आया था। वह अपने साथ चौतीस किलो मुसब्बर लोहबान लाया, वो सामग्री जो यहूदी मृत के संरक्षण के लिए परंपरागत रूप से प्रयोग करते थे। निकोदेमुस भी मसीह का एक शिष्य था, और यूसुफ की तरह, उसने भी इसे छिपा रखा था। वो रात में प्रभु से सवाल पूछने के लिए आता था क्यूंकि उसे डर था कि इस बात को जानने के बाद कि वो यीशु पर विश्वास करता है, नेतृत्व उसके साथ कुछ भी कर सकती है। नेतृत्व का रोष कम नहीं हुआ था, लेकिन मसीह के उज्ज्वल पवित्रता के खिलाफ उनके महान अपराधों ने निकोदेमुस को कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा। उनकी मृत्यु में भी, प्रभु यीशु उसकी वफादारी के हकदार थे। वो उन सभी बातों के लिए खड़ा होगा जो यीशु था। वह उसको अब आदर देगा, चाहे उसकी कोई कीमत क्यों न हो।

उन्होंने यीशु का शरीर लिया और उसे चादर के साथ मसाले में बाँधा। जिस जगह यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, उसके पास एक बगीचा था। वहां एक कब्र थी जिसमे किसी को भी पहले दफन नहीं किया गया था। यह जगह जाने माने, अमीर लोगों की अंतिम विश्रामस्थल थी। और क्यूंकि यह कबर क्रूस के पास थी, यह लोग सूर्यास्त और सबत से पहले, यीशु के शरीर को तरीके से दफना सके। एक बार फिर, उन्होंने अनजाने में वचन की पूर्ती की। यशायाह 53:9 में लिखा है: “और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का अपद्रव न किया या और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।”  जब वे कब्र में मसीह को छोड़ कर निकल रहे थे, उन्होंने एक बड़े पत्थर को प्रवेश द्वार पर लुढ़का दिया। मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम उनके पीछे आए ताकि वह यह जान सके कि मसीह को कहाँ दफनाया गया था। तब वे मसाले खरीदने के लिए बाहर चली गई। वे यीशु को एक उचित दफन देने साबत के बाद लौटने को थी।

शुक्रवार शाम हो गई, और फसह का सबत शुरू हुआ। इसराइल भर से परिवार जो सफ़र करके आए थे, वो अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साथ जश्न मनाने और आराम करने के लिए एक साथ इकट्ठे हुए। शनिवार की बाकी भी ऐसे ही गई। किसी को कोई काम नहीं करना था। पूरा देश अपने परमेश्वर के अद्भुत काम का लुप्त उठाने का अवकाश ले रहा था। यरूशलेम  में एक दिन पहले, शहर को उल्टा करने वाली घटनाओं से उनका दिमाग भरा हुआ था। क्या उनमें से किसी के पास यह देखने के लिए आँखें थी कि यह सब परमेश्वर के सबसे बड़े काम का उत्प्रवाह है?

जबकि इसराइल में बाकी सब सबत का सम्मान कर रहे थे, फरीसी और महायाजक व्यस्त थे।उनके पास कुछ काम था। यीशु ने कब्र से फिर से उठने का दावा किया था। क्या या हो सकता था कि उसके चेले उसके जी उठने की जालसाजी कर रहे हो? इससे उनको यह सब साफ़ करने के लिए एक नया झंझट पैदा होगा! वे सालों के लिए यह विधर्म लड़ते रहेंगे। कैसी विडंबना है कि यह मनहूस नेताओं ने मसीह के शब्दों को याद किया। उसके अपने ही शिष्य यह पूरी तरह से भूल गए थे! वे ऐसी आशा के लिए दु: ख में निगले हुए थे। लेकिन यहूदी नेता यह नहीं जानते थे और वे एक और अनुरोध के साथ पिलातुस के पास वापस गए।

हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमानेवाले ने आपको जीते जी कहा या, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। 
सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहनें लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।  -मत्ती २७:६३-६४

कल्पना कीजिए कि यह अनुरोध सुनके पिलातुस को कैसा लगा होगा। यह यीशु जो एक अदृश्य देश का राजा होने का दावा कर रहा था, वही यीशु मरे हुओं में से जिंदा होने को दावा कर के गया था। वह इस सब से क्या समझे? पिलातुस ने उन्हें देखा और कहा, “‘तुम्हारे पास एक गार्ड है। जाओ और उस जगह को सुरक्षित कर लो, जैसे तुम जानते हो।”

अगर यहूदी नेता सही थे, और चेले एक धोखाधड़ी करना चाहता थे, उन्हें उच्च प्रशिक्षित, भारी हथियारों से लैस रोमन सैनिकों के सामने होकर गुज़ारना होगा। इसकी संभावना नहीं थी। यीशु के चेले वही आदमी थे जो बगीचे में भाग गए थे। क्या वे वास्तव में, सैनिकों को उनके स्वामी को क्रूस पर चढ़ाने के बाद देखकर, इतनी साहस जुटा पाते कि वो उन भयानक पहरेदारों का सामना कर सके? कोई भी आम नागरिकों की टोली, तैनात रोमी सैनिकों के सामने से नहीं गुज़र सकती थी; यह अनसुना था। पिलातुस यह जानता था कि अगर यह एक धोखा था, कब्र खाली होने का कोई रास्ता नहीं था।  दूसरी ओर अगर यीशु वास्तव में वही थे जिसका वो दावा कर रहे थे, तो सभी दांव अमान्य थे। अगर यीशु दिव्य थे, तो कब्र पर तैनात कितने सैनिक थे, इस बात का कोई महत्व नहीं था।

कहानी १७३: पूर्ति

Stained glass showing Jesus crucified

यूहन्ना १९:३१-३७

यहूदियों के पास एक चिंता का विषय था। यरूशलेम के फाटकों के ठीक बाहर, तीन मृत या मरते हुए आदमी क्रूसों पर टंगे थे। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, उनके शरीर भूमि को अशुद्ध कर रहे थे। यह एक विशेष रूप से बड़ी समस्या थी क्योंकि सूर्यास्त के बाद सबत शुरू होने को था। विश्राम के दिन पर एक क्रूस से लटका हुआ, मरा आदमी, परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ने वाली बात थी। और सबसे बदतर बात यह थी कि यह कोई नियमित विश्राम का दिन नहीं था। यह एक उच्च और पवित्र दिन था। यह फसह का पर्व था! इसलिए वे पेंतुस पीलातुस के पास क्रूस पर चढ़ाये हुए के टूटे पैर मांगने गए।

यह एक अजीब अनुरोध लग सकता है, लेकिन यह वास्तव में समझ की बात थी। सूली पर चढ़ाये जाने की भयावहता यह थी कि लोग घुट घुट कर मरते थे। उनको हाथों को ऐसे क्रूस पर टांगा जाता था, कि जब वो सांस लेते थे तो फेफड़ों में उसका प्रवाह नहीं होता था। उन्हें सांस लेने के लिए कीलों पर अपने पंजों पर उठाना पड़ता था। सांस लेने की प्राकृतिक मानव वृत्ति उन्हें घंटे पे घंटे के लिए उन घावों पर कष्टदायी दुख सहन करने को मज्बोर करती। उनके कष्ट को जल्दी समाप्त करने का यही रास्ता था कि उनके पैरों को तोड़ दिया जाए ताकि वो अपने शरीरों को सांस लेने के लिए और न अघात करें। यह एक भयानक धंदा था, लेकिन रोमी साम्राज्य की दुनिया यही थी।

पिलातुस ने धार्मिक नेताओं के साथ सहमति व्यक्त की। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि उस दिन क्रूस पर चड़ाए जाने वाले आदमियों के पैर तोड़ दिए जाए। लेकिन सिपाही जब यीशु तक पहुंचे,वह मर चुके थे। उनके पैर तोड़ने की बजाय, सैनिकों ने उनके कमर को भाले से भेदा। रक्त और पानी बाहर बह आया।

यूहन्ना के सुसमाचार में इस बिंदु पर,यूहन्ना इस बात की साक्षी देना चाहता है कि यह सब बातें पूरी तरह सच है। वह खुद वहां था और उसने यह सब बातें देखी। वह क्रूस के एकदम पास खड़ा हुआ था जब यह सब हुआ। आने वाले दिनों में, यीशु के जीवन और मौत के बारे में कई अफवाहें फैलने को थी। कई लोग यीशु के पुनुरुथान को झूठा बोलने को थे।वे ऐसा बोलेंगे की शिष्यों ने यीशु के जी उठने के बारे में मन गड़ंत कहानी बनाई है, या फिर यीशु वास्तव में मरा नहीं था। लेकिन यूहन्ना अपने प्यारे दोस्त की सच्ची मौत को वहां खड़ा देख रहा था। उन्होंने कुल पीड़ा में तीन दिन बिताए, लेकिन तब यीशु फिर से जी उठे! वह चाहता था कि हम निश्चित रूप से विश्वास करें, जैसा उसने किया था! यही कारण है कि उसने यह पुस्तक लिखी।

यूहन्ना इस बात की ओर भी संकेत करना चाहता था कि अपने पुत्र के मौत के द्वारा, परमेश्वर अपने वचन की पूर्ती भी ज़ारी रख रहा था। क्या आपको फसह के पर्व की प्राचीन कहानी याद है? मिस्र के फिरौन ने परमेश्वर  के लोगों को अपनी भयानक, जानलेवा उत्पीड़न से मुक्त करने से इनकार कर दिया था। परमेश्वर ने महामारी के ऊपर महामारी भेजी, लेकिन तो भी उसने इनकार कर दिया। अंत में, परमेश्वर अपने सबसे भयानक दंड के साथ आने वाले थे। फिरौन परमेश्वर की सबसे क़ीमती चीज़ को रिहा करने से इनकार कर रहा था, तो परमेश्वर मिस्र के लोगों का सबसे बड़ा खजाना लेने जा रहा था। वह उनके पहले पैदा हुए बेटों की जान लेने जा रहा था। इस्राएलियों के पुत्रों की रक्षा करने के लिए, परमेश्वर ने उन्हें सावधान निर्देश दिए। उन्हें एक बेदाग मेमने का बलिदान करना होगा और उसे भोजन के रूप में लेना होगा। फिर उन्हें उस मेमने का खून लेकर अपने घर के चौखट पर लगाना था। जब परमेश्वर का स्वर्गदूत मिस्र के लिए आएगा, तो वह खून से संरक्षित घरों को छोड़ देगा। यहाँ, मेमने के बारे में परमेश्वर की अपने लोगों को दिए निर्देश हैं:
उसका खाना एक ही घर में हो; अर्थात तुम उसके मांस में से कुछ घर से बाहर न ले जाना; और बलिपशु की कोई हड्डी न तोड़ना। पर्ब् को मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्तव्य कर्म है।
निर्गमन १२:४६-४७

यीशु वह फसह का मेमना था, और उसका खून उसके लोगों की सुरक्षा होना था। यह सब घटनाएं जो इतनी पहले हुई, उस बात की एक तस्वीर थी कि परमेश्वर मसीह के द्वारा क्या करने जा रहा है। और जिस प्रकार लोगों को पहले फसह के मेमने का पैर नहीं तोडना था, ठीक उसी तरह इस महान फसह के मेमने का पैर भी नहीं तोड़ा जाना था।

पुराने नियम में एक और पद है जो यीशु के छेदे जाने की भविष्वाणी करता है। ज़करिया की किताब में परमेश्वर यूं कहते है:
और मैं दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियोंपर अपना अनुग्रह करनेवाली और प्रार्यना सिखानेवाली आत्मा उण्डेलूंगा, तब वे मुझे ताकेंगे अर्थात जिसे उन्होंने बेधा है, और उसके लिए ऐसे रोएंगे जैसे एकलौते पुत्र के लिथे रोते-पीटते हैं, और ऐसा भारी शोक करेंगे, जैसा पहिलौठे के लिए करते हैं।
ज़कारिया १२:१०

यूहन्ना और मसीह के अनुयायियी इस बात को मानोभावपूर्वक मानते थे कि जो कुछ मसीह के साथ हुआ है वो परमेश्वर के पुराने नियम में कार्यों का उत्प्रवाह है। परमेश्वर ने मसीह के जीवन, मृत्यु और जी उठने के हर पल को ठहराया था। पर उसने अपने पवित्र लोगों के जीवन के हर पहलू को भी ठहराया था ताकि वो उद्धारकर्ता की और रास्ता दिखा सकें। जैसे जैसे  चेलों ने आने वाले वर्षों में यीशु के जीवन पर विचार किया, उन्हें परमेश्वर के वचन में पद पे पद में यीशु की छाप दिखने लगी। परमेश्वर ने उन्हें वहां सैकड़ों और हजारों वर्ष पहले रखा ताकि आगे सुसमाचार सुनने वालों को आत्मविश्वास हो सके। यीशु वास्तव में वह था जिसके बारे में वो इतने समय से बात कर रहा था!

कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

कहानी १७१: क्रूस पर

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Jesus christ in heaven

यीशु उस पीड़ा के साथ क्रूस पर था, उसके पास बहुत से खड़े जो उसे देख रहे थे। ऐसा लगता था कि कुछ हो जाएगा। क्या वह इस हास्य जनक अनुकरण को अपनी सामर्थ से जीत पाएगा?

पास से जाते हुए लोग अपना सिर मटकाते हुए उसका अपमान कर रहे थे। वे कह रहे थे,“अरे मन्दिर को गिरा कर तीन दिन में उसे फिर से बनाने वाले, अपने को तो बचा। यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो क्रूस से नीचे उतर आ।”

शिक्षक और अगुवे अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे। उसकी हसी उड़ाते हुए उन्होंने कहा,“’दूसरों का उद्धार करने वाला यह अपना उद्धार नहीं कर सकता! यह इस्राएल का राजा है। यह क्रूस से अभी नीचे उतरे तो हम इसे मान लें।'” पुराने नियम से कुछ बातों को लेकर दुसरे यह कहने लगे,”‘यह परमेश्वर में विश्वास करता है। सो यदि परमेश्वर चाहे तो अब इसे बचा ले। आखिर यह तो कहता भी था, ‘मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ।’”

उन लुटेरों ने भी जो उसके साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे, उसकी ऐसे ही हँसी उड़ाई। सिपाहियों ने भी उनके साथ मिलकर हसी उड़ाई और कहा,“यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने आपको बचा ले।”

इन सब दोष लगाने वालों को यीशु ने कुछ नहीं कहा। हज़ारों दूत वहाँ खड़े उसे देख रहे थे जो स्वर्ग का सिंहासन का अधिकारी है और इस कष्ट और मृत्यु को सह रहा है। यीशु एक ही शब्द बोलकर अपने आप को ऊपर लेजा कर हटा सकता था। परन्तु यह उसके पिता कि इच्छा नहीं थी।

वहाँ लटकाये गये अपराधियों में से एक ने उसका अपमान करते हुए कहा,“क्या तू मसीह नहीं है? हमें और अपने आप को बचा ले।” परन्तु दूसरे डाकू का ह्रदय परिवर्तन हो गया था। उसने उन सब अपमानित करने वाली बातों को सुना और उस यीशु को देखा जो शांत था। यह मनुष्य कौन था जो उसके साथ क्रूस पर टंगा हुआ था?

दूसरे ने उस पहले अपराधी को फटकारते हुए कहा,“क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता? तुझे भी वही दण्ड मिल रहा है। किन्तु हमारा दण्ड तो न्याय पूर्ण है क्योंकि हमने जो कुछ किया, उसके लिये जो हमें मिलना चाहिये था, वही मिल रहा है पर इस व्यक्ति ने तो कुछ भी बुरा नहीं किया है।”

फिर वह बोला,“यीशु जब तू अपने राज्य में आये तो मुझे याद रखना।”

यह यीशु किस प्रकार का इंसान था कि इस तरह उसका राजसी गौरव क्रूस पर बढ़ा कर दिखाया जा रहा है! यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ से सत्य कहता हूँ, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

अपने पीढ़ा के बीच में भी यीशु कि करुणा दिखाई पड़ती है। उसकी आत्मा कितनी महान थी। अवश्य वह परमेश्वर है!

थोड़े ही थे जो गुलगुता तक उसके साथ गए और वे यीशु से। प्रेम करते थे।  उसकी माँ, मरियम, उसकी बहन मरियम और मरियम मगदिलिनी, वे सब आये थे। उसका चेला यूहन्ना भी उनके साथ क्रूस पर आया। यीशु ने जब अपनी माँ और अपने प्रिय शिष्य को पास ही खड़े देखा तो अपनी माँ से कहा,“प्रिय महिला, यह रहा तेरा बेटा।” फिर वह अपने शिष्य से बोला,“यह रही तेरी माँ।”

यीशु सबसे बड़ा पुत्र था और मरियम एक विधवा थी। परिवार में उसका कर्तव्य था कि वह मरियम का ध्यान रखे। उसके चाहिता चेला यूहन्ना भी उसका चचेरा भाई था, और उसने वह कर्तव्य उसे सौंप दिया। और उसी समय से यूहन्ना मरियम को अपने घर ले गया।

यीशु को क्रूस पर चढ़े तीन घंटे हो गए थे और कुछ अद्भुद होने लगा था। फिर समूची धरती पर दोपहर तक अंधकार छाया रहा। दिन के तीन बजे ऊँचे स्वर में पुकारते हुए यीशु ने कहा,

“’इलोई, इलोई, लमा शबकतनी।’अर्थात,
“’मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों भुला दिया?'”

उसका चिल्लाना पीड़ा से भरा हुआ था, जो उन लोगों को याद करके था जो क्रूस के पास थे। यीशु ने ऐसा क्यूँ कहा? क्या उसे याद नहीं था कि वह क्रूस पर किस वजह से गया है? क्या वह नहीं जानता था कि यह अलगाव मनुष्य के पापों को सहने के लिए था। क्या उसने वास्तव में विश्वास कर लिया था कि परमेश्वर ने उसे सदा के लिए छोड़ दिया है?

गुलगुता पर जो यहूदी जमा थे, वे यीशु कि वाणी को पहचान सकते थे क्यूंकि उसने पुराने नियम से लिया था। महान विपत्ति के समय दाऊद राजा ने भजन सहित में लिखा था। फिर उन सब्दों में कोई संदेह नहीं था। दाऊद का विश्वास डगमगाने वाला नहीं था, वह प्रभु में मज़बूत होता जाता था। वह विश्वास में स्थिर था और किसी और कि ओर नहीं देखता था। वह पाप कि समस्या के हल के लिए किसी मनुष्य कि ओर नहीं देखता था और संकट के समय में परमेश्वर को कोस्ता नहीं था। इस भजन सहित में, दाऊद राजा ने अपनी आशा को परमेश्वर के छुटकारे पर केंद्रित किया हुआ था एयर केवल उसी को पुकारता था। यह परमेश्वर में गहरायी कि एक तस्वीर है। आइये इस भजन सहित से और पढ़ते हैं :

हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर!
तूने मुझे क्यों त्याग दिया है? मुझे बचाने के लिये तू क्यों बहुत दूर है?
मेरी सहायता की पुकार को सुनने के लिये तू बहुत दूर है।
हे मेरे परमेश्वर, मैंने तुझे दिन में पुकारा
किन्तु तूने उत्तर नहीं दिया,
और मैं रात भर तुझे पुकाराता रहा।
हे परमेश्वर, तू पवित्र है।
तू राजा के जैसे विराजमान है। इस्राएल की स्तुतियाँ तेरा सिंहासन हैं।                                  
हमारे पूर्वजों ने तुझ पर विश्वस किया।
हाँ! हे परमेश्वर, वे तेरे भरोसे थे! और तूने उनको बचाया।                                        
हे परमेश्वर, हमारे पूर्वजों ने तुझे सहायता को पुकारा और वे अपने शत्रुओं से बच निकले।
उन्होंने तुझ पर विश्वास किया और वे निराश नहीं हुए। –भजन सहित  22:1-5

आपने देखा कैसे दाऊद राजा ने परमेश्वर कि स्तुति करने में देरी नहीं की, जिस समय वह छुटकारे के लिए रुका हुआ था?

यीशु परमेश्वर से नहीं पूछ रहा था कि उसने उसे क्यूँ छोड़ दिया। वह एक मनुष्य कि तरह उसे जो परमेश्वर कि आज्ञाकारिता के प्रति दुःख उठा रहा था। अब तक, यीशु को क्रूस पर छे घंटे हो चुके थे। परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के पाप के कारण आया था। यीशु ने अपने ही शरीर में उस भयानक संघर्ष को सहा। वह जानता था कि यह असीम क्लेश हमेशा के लिए नहीं है। एक यशस्वी विजय दूसरी और थी। अपने मनुष्य स्वभाव में होकर उसने पुछा,”‘और कितनी देर प्रभु?'”

यीशु ने जब अपने महान पूर्वजों के शब्दों को पुकारा, उसने उस भविष्यवाणी को पूरा किया जो भजन सहित में भी दी गई है। यह दोनों, दाऊद कि व्यक्तिगत प्रार्थना भी थी और मसीह के आने का सन्देश था!

जो पास में खड़े थे, उनमें से कुछ ने जब यह सुना तो वे बोले,“सुनो! यह एलिय्याह को पुकार रहा है।” दूसरे बोले,“ठहरो, देखते हैं कि इसे नीचे उतारने के लिए एलिय्याह आता है कि नहीं।” वे अभी यह सोच रहे थे कि यह व्यक्ति कौन है।

यीशु जानता था कि उसका समय आ गया है। उसने वो सब पूरा कर दिया था जिस काम से पिता ने उसे भेजा था। एक और वचन था जिसे पूरा होना था, सो उसने कहा,“‘मैं प्यास हूँ।'”

सिरके में डुबोया हुआ स्पंज एक छड़ी पर टाँग कर लाया गया और उसे यीशु को चूसने के लिए दिया। भजन सहित 69:21 के वचन पूरे हुए “…उन्होंने मुझे विष दिया, भोजन नहीं दिया। सिरका मुझे दे दिया, दाखमधु नहीं दिया।'”

जब यीशु पी चुका, उसने कहा,“पूरा हुआ।”

उन शांत शब्दों में यीशु ने घोषित किया कि समाप्त हुआ। जय मिल गई थी। सब कुछ बदल गया था। आदम के पाप से, इंसानियत ने परमेश्वर के विरुद्ध आवाज़ उठाकर शैतान के प्रति वफ़ादारी दिखायी, जिसका अंजाम पाप और मृत्यु था। परन्तु यीशु मनुष्य रूप में आया और दोनों पर विजय प्राप्त की और जीवन के मार्ग को दिखाया। उसके पृथ्वी पर जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ और उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये।