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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १७९: आत्मा का उंडेला जाना 

लूका २४:४६-४९, यूहन्ना २०:१९-२३

shining dove with rays on a dark

यीशु अपने चेलों से यरूशलेम के एक गुप्त, बंद कमरे में बात कर रहे थे, और चेले पूरे ध्यान के साथ सुन रहे थे। अंत में, यीशु की योजनाए उनके जीवनों के बारे में उन्हें ज्ञात हो रही थी। प्रभु यीशु अपने चेलों को उनके आगे जीवन के बारे में निर्देश दे रहे थे। वह अग्रसर आदेश दे रहे थे! वह उन्हें कुछ ऐसा शक्तिशाली देने जा रहे थे जो चेलों की मदद वो सुसमाचार फैलाने में करेगी जो उसने अभी क्रूस पर किया।

कल्पना कीजिए कि चेलों को कैसा लगा होगा जब उन्होंने इस बारे में सुना। नाराज भीड़, उग्र धार्मिक नेता जिन्होंने देश पर नियंत्रण किया हुआ था, और रोमन सैनिकों की हिंसक ताकत अभी भी उनकी यादों में गूँज रही होगी। भला वे कैसे, कभी भी, उस शहर में यीशु के नाम से फिर प्रचार कर पाएंगे? वे जिंदा थे, बस इसलिए खुश थे! और इसका क्या मतलब था कि वे उच्च पर से सशक्त होंगे? यह अप्रत्याशित, रहस्यमय परमेश्वर अब आगे क्या करने जा रहा था?

पुराने नियम में कुछ ऐसी भविष्यवाणियाँ थी जो एक ओर संकेत कर रही थी –  ऐसी उज्जवल बाते जो परमेश्वर करने जा रहा था। आप देखते हैं, यीशु ने क्रूस पर अंतिम जीत जीती थी, और ऐसे कई तरीके थे जिससे यह जीत दुनिया को आशीषित कर सकती थी। नबी योएल ने कहा:
“उन बातोंके बाद मैं सब प्राणियोंपर अपना आत्मा उण्डेलूंगा; तुम्हारे बेटे-बेटियां भविष्यद्वाणी करेंगी, और तुम्हारे पुरनिथे स्वप्न देखेंगे, और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।
तुम्हारे दास और दासियोंपर भी मैं उन दिनोंमें अपना आत्मा उण्डेलूंगा।” योएल २:२८-२९

पिता परमेश्वर किसी तरह से अपने वफादार बच्चों पर अपनी आत्मा उंडेलेंगे, और एक नया युग मानव जीवन में शुरू किया जाएगा! जो कोई यीशु में अपना विश्वास डालेंगे, उनको पवित्र आत्मा प्राप्त होगी। वे पृथ्वी पर चलने वाले एक नए प्रकार के प्राणी  हो जाएंगे—–मनुष्य जो दिव्य जीवन और शक्ति के साथ रह रहे हो! यीशु ने पाप से पूर्ण शुद्धिकरण और सम्पूर्ण माफी के लिए एक रास्ता बनाया था। उन्होंने अपने चुने हुए लोगों को अपने जैसे सिद्ध, शुद्ध, और धर्मी बनने के लिए रास्ता बनाया। अब पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की उपस्थिति उनके पास आकर हमेशा के लिए रह सकती थी! परमेश्वर ने इसे इस तरह से नबी यहेजकेल को वर्णित किया:
“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूंगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतोंसे शुद्ध करूंगा।
मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्यर का ह्रृदय निकालकर तुम को मांस का ह्रृदय दूंगा।
और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियोंपर चलोगे और मेरे नियमोंको मानकर उनके अनुसार करोगे।” -यहेजकेल ३६:२५-२७

वाह। यहेजकेल नई वाचा के अधीन, नए जीवन का वर्णन, छह सौ साल पहले कर रहा था!

परमेश्वर की आत्मा का उंडेला जाना जल्द होने जा रहा था। क्या आपको यीशु की अपने चेलों के साथ लंबी बात याद है जो उन्होंने अपने गिरफ्तारी की रात से पहले की? क्या आपको याद है कि उन्होंने अपने चेलों को उनके छोड़ने पर दुखी नहीं होने को कहा था? उन्होंने कहा कि उन्हें खुश होना चाहिए क्योंकि वह अपनी आत्मा उनको भेजने जा रहा था। उनकी आत्मा शक्ति में काम करेगी और उन्हें मार्गदर्शन और दिलासा देगी,जैसे जैसे वो उसके नाम का एह्लान करते जाएंगे!

आत्मा की शक्ति वही शक्ति थी जिसके द्वारा यीशु ने पृथ्वी पर अपने जीवन को व्यतीत किया। यीशु हमेशा था और हमेशा पूरी तरह परमेश्वर है और रहेगा, लेकिन जब वह स्वर्ग से नीचे आया था, वह पूरी तरह से मनुष्य बन गया। जैसे वो इस पृथ्वी पर आया और रहा, उसने खुद के दिव्य शक्तियों के बलबूते पर ना चमत्कार किये और ना अद्भुत सत्य बोले। हर दिन वह एक सामान्य आदमी की शक्ति में रहा। लेकिन उसने एक परिपूर्ण, सिद्ध जीवन जिया, क्योंकि एक मनुष्य होके, वह परमेश्वर पर पूरे विश्वास और आज्ञाकारिता से निर्भर रहा। उसने आत्मा को अपना सिद्ध मार्गदर्शक बनने की अनुमति दी थी। एक सामान्य मनुष्य के नाते, यीशु को प्यास और थकावट लगती थी। लेकिन वह अपने पिता के साथ निरंतर निकटता में और पूर्ण आज्ञाकारिता में रहते थे। उन्होंने यह पवित्र आत्मा की शक्ति में किया। अब जब कि यीशु ने मनुष्य को परमेश्वर के लिए मोल लिया था, वो अपने अनुयायियों को आत्माभी दे सकता था।

जैसे यीशु ने अपने चेलों के साथ उस यात्रा पर कहे शब्दों को समाप्त किया, उन्होंने कहा, ‘शांति तुम्हारे साथ हो, जैसे पिता ने मुझे भेजा है, मैं भी तुम्हे भेजता हूँ।’ अब पहले से कहीं ज्यादा, चेले समझने लगे थे कि यीशु स्वर्ग से भेजा हुआ है। और अब, वे परमेश्वर की अद्भुत योजना में मानो लिपटे हुए थे। पिता के पास उनमें से प्रत्येक के लिए, पृथ्वी पर अपने जीवन के लिए, एक बहुत ही विशिष्ट कार्य था।

यीशु अपने आदमियों की ओर मुड़ा और उन पर सांस ली और कहा, ‘पवित्र आत्मा प्राप्त करो।’

यह नहीं था कि जीवते परमेश्वर की आत्मा चेलों के जीवन में पहले से काम नहीं कर रही थी। जब आत्मा ने उनके हिर्दय में काम किया, तो वो सन्देश को समझने लगे। वो आत्मा ही थी जिससे वो जागृत और क्रियाशील हो गए! लेकिन अब आत्मा एक कई अधिक तीव्र, और स्थायी तरीके से आ रही थी। यीशु के साथ यह पल शुरुआत थी, और इससे आगे, अधिक से अधिक बातें होने को थी।

तब यीशु ने कहा, “यदि तुम किसी के पापों को क्षमा करते हो, उनके पाप उन्हें माफ कर दिया जाएंगे; अगर तुम उन्हें माफ नहीं करते हो, उन्हें माफ नहीं किया जाएगा”. वाह! यह अपने चेलों को देने के लिए एक उच्च और खतरनाक शक्ति है! उन्हें परमेश्वर द्वारा ऐसे सशक्त किया जाएगा कि परमेश्वर के परिवार में, उनका निर्णय, परमेश्वर के निर्णय जैसा गिना जाएगा। परमेश्वर के राज्य में यह क्या उच्च और पवित्र भूमिका है!

चेलों में से एक उस दिन वहां नहीं था। किसी कारणवश, थोमा  वहाँ नहीं था। आने वाले दिनों में, अन्य चेलों ने उसे वहां होने वाली बातों के बारे में बताया होगा। जब थोमा ने उनकी कहानियों सुनी होंगी,  उसको ये लगा  होगा की ये पगला गए है! उसने उन पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। वे इसे इतनी बुरी तरह से चाहता था कि वे खुद को मूर्खता में झूटी दिलासा दे रहे थे! थोमा ने कहा, ‘जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लू, और कीलों की जगह में अपनी उंगली डालू, और उसकी कमर में अपना हाथ न रख लू, मैं विश्वास नहीं करूंगा।’

कहानी १७५: जी उठा

मत्ती २८:१-१०, मरकुस १६:१-२२, लूका २४:१-१३, यूहन्ना २०:१-१८

Ressurrection of Christ

रविवार की सुबह आई। यह यहूदी सप्ताह का पहला दिन था। मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम सुबह होने से पहले अपने बने मसालों के साथ तैयार थी। जैसे जैसे सूरज पूर्वी आकाश को हल्का करने लगा, वे अन्य महिलाओं के साथ कब्र के लिए निकल पड़ी। उनकी यात्रा में कुछ बिंदु पर ज़मीन हिलने लगी। यह एक और भूकंप था। इसका क्या मतलब हो सकता है? अक्सर बाइबिल में भूकंप परमेश्वर के आने का एक संकेत था।

लेकिन शायद उनके विचार अभी भी अपने दु: ख से भरे हुए थे। वे भूकंप के आश्चर्यजनक, अद्भुत अर्थ का अनुमान नहीं लगा सकीं। क्यूंकि असल में, परमेश्वर आए थे। यीशु मरे हुओं में से जी उठे थे! और जब एक शानदार स्वर्गदूत उसके कब्र पर पत्थर को लुड्काने आया था, पृथ्वी कांप उठी। जब रोमी पहरेदारों ने उस चमकदार स्वर्गीय प्राणी को देखा, तो वे भय से भर कर ज़मीन पर गिर गए।

स्वर्गदूत यीशु को बाहर निकलने में मदद के लिए नहीं आया था। परमेश्वर अपने अविनाशी जीवन की शक्ति के आधार पर जी उठे थे। वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की शक्ति में जी उठे। और जब स्वर्गदूत ने पत्थर लुढ़काया, तो वह परमेश्वर के काम का एक प्रकाशन, एक घोषणा थी! क्या ही महान घटना का एक अकाट्य सबूत!

लेकिन महिलाओं को अभी तक यह पता नहीं था। जैसे वो साथ चल रहीं थीं, वे सोच में थी कि पत्थर को कैसे हटाया जाए। क्या रोमी पहरेदार उनको कब्र के पास जाने देंगे?

जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि अब यह एक प्रश्न नहीं रहा। हैरान रोमन पहरेदारों के शव चारों ओर पड़े हुए थे। क्या चल रहा था? कब्र के अंदर जा कर उन्होंने पाया कि शव तो गायब था। यह कैसे हो सकता है? वे प्रभु को कहाँ ले गए थे? वे भ्रम और थके हुए, दु: ख में एक दूसरे को देखने लगे।

अचानक, दो स्वर्गदूत शानदार सफेद कपड़ों में दिखाई पड़े। महिलाए डर में अपने चेहरे के बल ज़मीन पर गिर गई।

स्वर्गदूतों में से एक ने उन से पूछा, “तुम मृतकों में जीवितों को क्यूँ ढूँढ रहे हो? डरो मत, क्यूंकि मै जानता हूँ तुम किसे ढूँढ रहे हो। वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है! याद करो कि जब वो तुम्हारे साथ यहाँ गालील में था तो उसने तुम्हे क्या बताया था- यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र पापी पुरुषों के हाथों में डाल दिया जाए, क्रूस पर चढ़ाया जाए और तीसरे दिन फिर से उठाया जाए “‘

जैसे जैसे स्वर्गदूत बोलता गया, वैसे वैसे महिलाओं ने यीशु के शब्द याद किये।

स्वर्गदूत ने कहा: “‘जल्दी जाओ, उनके चेलों को बताओ कि वो मुर्दों में से जी उठा है। वह गलील में तुम से पहले जा रहा है, वहाँ तुम उन्हें पाओगे, जैसे उन्होंने तुमसे कहा। ‘”

महिलाए डर और खुशी से काँप उठी। वे शिष्यों को यह अद्भुत खबर बताने के लिए कब्र से चल पड़ी। उन्होंने रास्ते में किसी से बात नहीं की,यह डर से कि वे इस आश्चर्यजनक खबर के बारे में क्या कह दे। उन्होंने ग्यारह को पाया और अपने आँखों देखा हाल उन्हें बताया। महिलाओं के शब्द बकवास की तरह लग रहे थे। और कुछ हद तक, वे थे। यहां तक ​​कि मरियम मगदलीनी की रिपोर्ट अभी उलझन से भरी थी। “‘वे प्रभु को कब्र से बाहर ले गए है, और हम नहीं जानते है कि उन लोगों ने उन्हें कहाँ रखा है'” उसने घोषणा की। अपनी हताशा में, उसके पास सिर्फ एक ही ख्याल था। शानदार स्वर्गदूतों के शब्द उसके लिए कोई मान्यता नहीं रखते थे। उसके लिए सिर्फ प्रभु को ढूँढना मायने रखता था।

पहले तो चेलों ने महिलाओं पर विश्वास नहीं किया। लेकिन जब वह इन शब्दों को समझने लगे, पतरस को लगा कि इस बात में सच्चाई हो सकती है! वह कूद कर कब्र की ओर भागा। यूहन्ना भी बहुत पीछे नहीं था। वे पूरी ताकत लगा के भागे। यूहन्ना जवान और तेज़ था और सबसे पहले कब्र पर पहुंचा। वह प्रवेश द्वार पर रुका और एक शरीर या एक दूत या एक चिन्ह के लिए खोजने लगा। वहाँ, जहाँ यीशु को रखा गया था, बड़े तरीके से कपड़ा में तह लगा हुआ अलग रखा था। चेहरे का कपड़ा एक ओर अलग से रखा था। पतरस यूहन्ना को पार कर सीधे कब्र में घुस गया। उसने भी वो कपड़े की पट्टियाँ देखीं। यूहन्ना पतरस के पीछे आया, और इसके अर्थ के बारे में दोनों सोचने लगे। यूहन्ना ने विश्वास किया पर फिर भी विचारा। दोनों इस बात की पूर्णता को नहीं समझ पा रहे थे। सांसारिक रूप से, यह नए तथ्य कुछ अटपटे लग रहे थे। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे थे कि येशु को मुर्दों में से जिंदा होना था। चेले कब्र छोड़ कर चले गए और वापस अपने घरों को लौट गए।

मरियम मगदलीनी उन लोगों के पीछे कब्र की ओर बड़ रही थी। वह वहाँ खड़े होकर रोने लगी। क्यूंकि उसके पास कहीं जाने को नहीं था। प्रभु यीशु उसकी आशा और जिंदगी बन गए थे। वह द्वार के पास गई और अंदर कदम रखा। एक बार फिर, दो स्वर्गदूत उसके समक्ष पेश हुए। एक, जहाँ यीशु को रखा गया था, उसके सिरे और उसके पैर में बैठे थे।

आने वाले दिनों में, मरियम और चेलों ने इसके बारे में विचारा होगा। क्यूंकि यह वही चित्र था जो वाचा के सन्दूक के ढक्कन पर पाया जा सकता था और जो केवल परम पवित्र में रखा जाता था। यह सोने का डब्बा परमेश्वर ने मूसा के लिए बनाया था। ढक्कन ही शुद्ध सोने का बना था, और उसे परमेश्वर की दया की गद्दी बुलाई जाती थी। परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिए कि सन्दूक के दोनों छोर पर दो, गौरवशाली, सुनहरे स्वर्गदूतों की प्रतिमा लगाईं जाए। उनके पंख दया की गद्दी पर फैले थे। यह सन्दूक खोने से पहले, इसराइल के देश की सबसे पवित्र चीज़ थी, और इसकी छवि हर यहूदी के मन में गड़ी थी। अब, मसीह स्वयं परमेश्वर की दया की गद्दी थे – वो महान प्रायश्चित जिसके द्वारा सारे मानव का उद्धार हो सकता है। जब यह दो स्वर्गदूत उनके बलिदान हुए शरीर की जगह पर इर्द गिर्द बैठे थे, तो क्या उन महिलाओं को यह समझ में आया होगा?

यह सारी गहरी और सुंदर चीज़े वो गौरवशाली सत्य थे जिन्हें आने वाले सालों में कलीसिया समझेगी और अनुभव करेगी। प्रेरित यूहन्ना ने अपने लेखन में यह सुनिश्चित किया। लेकिन स्वर्गदूतों की उपस्थिति में रो रही वहां खड़ी तबाह मरियम के दिमाग में, यह बातें नहीं थी।

“‘नारी, तू क्यों रोती है?” उन्होंने कहा.

वह सिर्फ प्रभु के बारे में ही सोच सकती थी। “‘क्योंकि वे मेरे प्रभु को उठा ले गए है, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने प्रभु को कहाँ रखा है'” उसे अभी भी उनके जी उठने की आशा नहीं थी, लेकिन उसका प्यार इतना विशाल था कि उसे अपने प्रभु को खोजना था।

जैसे ही उसने यह कहा, वह जाने को निकली, लेकिन वहाँ एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन उसे यह पता नहीं था। उसे लगा कि यह माली है।“‘नारी, तू क्यों रोती है?'” यीशु से पूछा। “‘तुम किसे खोज रही हो?”

उसने कहा, “‘सरकार, अगर आपने उन्हें उठाया है, तो मुझे बताएँ की आपने उसे कहाँ रखा है ताकि मै उन्हें ले जाऊं।”

वह अपने उद्धारकर्ता को कितना प्यार करती थी! क्या आप इस लालसा को सुन सकते हैं? यीशु भी सुन सकते थे। “‘मरियम,” उन्होंने कहा। जैसे ही उन्होंने मरियम का नाम लिया, वो पहचान गई कि वो कौन थे। “‘गुरु!'” वह बोल पड़ी। वह धरती पर गिर पड़ी और अपने को उनके पैरों से लपेट लिया।

” मुझे पकड़ों मत’, यीशु ने कहा, ” क्यूंकि मै अभी तक अपने पिता के पास नहीं पहुंचा हूँ। इसके बजाय, मेरे भाइयों के पास जाओ और उन्हें बताओ, “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास लौट रहा हूँ।”

मरियम बेसुध उत्साह से भर गई। उसका प्रिय प्रभु गायब नहीं हो गया था! उन्होंने उसे छोड़ा नहीं था! उसका उत्तम प्रेम जिंदा था! वह चेलों को यह अकल्पनीय अच्छी खबर बताने के लिए भागी। “‘मैंने प्रभु को देखा है!'” उसने घोषणा की। फिर उसने इन बातों का विवरण दिया। क्या आप उनके सदमे और उत्तेजना की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उन सवालों  की कल्पना कर सकते हैं जो उठे होंगे? और अब आगे क्या होने जा रहा था?

कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

कहानी १७१: क्रूस पर

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Jesus christ in heaven

यीशु उस पीड़ा के साथ क्रूस पर था, उसके पास बहुत से खड़े जो उसे देख रहे थे। ऐसा लगता था कि कुछ हो जाएगा। क्या वह इस हास्य जनक अनुकरण को अपनी सामर्थ से जीत पाएगा?

पास से जाते हुए लोग अपना सिर मटकाते हुए उसका अपमान कर रहे थे। वे कह रहे थे,“अरे मन्दिर को गिरा कर तीन दिन में उसे फिर से बनाने वाले, अपने को तो बचा। यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो क्रूस से नीचे उतर आ।”

शिक्षक और अगुवे अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे। उसकी हसी उड़ाते हुए उन्होंने कहा,“’दूसरों का उद्धार करने वाला यह अपना उद्धार नहीं कर सकता! यह इस्राएल का राजा है। यह क्रूस से अभी नीचे उतरे तो हम इसे मान लें।'” पुराने नियम से कुछ बातों को लेकर दुसरे यह कहने लगे,”‘यह परमेश्वर में विश्वास करता है। सो यदि परमेश्वर चाहे तो अब इसे बचा ले। आखिर यह तो कहता भी था, ‘मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ।’”

उन लुटेरों ने भी जो उसके साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे, उसकी ऐसे ही हँसी उड़ाई। सिपाहियों ने भी उनके साथ मिलकर हसी उड़ाई और कहा,“यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने आपको बचा ले।”

इन सब दोष लगाने वालों को यीशु ने कुछ नहीं कहा। हज़ारों दूत वहाँ खड़े उसे देख रहे थे जो स्वर्ग का सिंहासन का अधिकारी है और इस कष्ट और मृत्यु को सह रहा है। यीशु एक ही शब्द बोलकर अपने आप को ऊपर लेजा कर हटा सकता था। परन्तु यह उसके पिता कि इच्छा नहीं थी।

वहाँ लटकाये गये अपराधियों में से एक ने उसका अपमान करते हुए कहा,“क्या तू मसीह नहीं है? हमें और अपने आप को बचा ले।” परन्तु दूसरे डाकू का ह्रदय परिवर्तन हो गया था। उसने उन सब अपमानित करने वाली बातों को सुना और उस यीशु को देखा जो शांत था। यह मनुष्य कौन था जो उसके साथ क्रूस पर टंगा हुआ था?

दूसरे ने उस पहले अपराधी को फटकारते हुए कहा,“क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता? तुझे भी वही दण्ड मिल रहा है। किन्तु हमारा दण्ड तो न्याय पूर्ण है क्योंकि हमने जो कुछ किया, उसके लिये जो हमें मिलना चाहिये था, वही मिल रहा है पर इस व्यक्ति ने तो कुछ भी बुरा नहीं किया है।”

फिर वह बोला,“यीशु जब तू अपने राज्य में आये तो मुझे याद रखना।”

यह यीशु किस प्रकार का इंसान था कि इस तरह उसका राजसी गौरव क्रूस पर बढ़ा कर दिखाया जा रहा है! यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ से सत्य कहता हूँ, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

अपने पीढ़ा के बीच में भी यीशु कि करुणा दिखाई पड़ती है। उसकी आत्मा कितनी महान थी। अवश्य वह परमेश्वर है!

थोड़े ही थे जो गुलगुता तक उसके साथ गए और वे यीशु से। प्रेम करते थे।  उसकी माँ, मरियम, उसकी बहन मरियम और मरियम मगदिलिनी, वे सब आये थे। उसका चेला यूहन्ना भी उनके साथ क्रूस पर आया। यीशु ने जब अपनी माँ और अपने प्रिय शिष्य को पास ही खड़े देखा तो अपनी माँ से कहा,“प्रिय महिला, यह रहा तेरा बेटा।” फिर वह अपने शिष्य से बोला,“यह रही तेरी माँ।”

यीशु सबसे बड़ा पुत्र था और मरियम एक विधवा थी। परिवार में उसका कर्तव्य था कि वह मरियम का ध्यान रखे। उसके चाहिता चेला यूहन्ना भी उसका चचेरा भाई था, और उसने वह कर्तव्य उसे सौंप दिया। और उसी समय से यूहन्ना मरियम को अपने घर ले गया।

यीशु को क्रूस पर चढ़े तीन घंटे हो गए थे और कुछ अद्भुद होने लगा था। फिर समूची धरती पर दोपहर तक अंधकार छाया रहा। दिन के तीन बजे ऊँचे स्वर में पुकारते हुए यीशु ने कहा,

“’इलोई, इलोई, लमा शबकतनी।’अर्थात,
“’मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों भुला दिया?'”

उसका चिल्लाना पीड़ा से भरा हुआ था, जो उन लोगों को याद करके था जो क्रूस के पास थे। यीशु ने ऐसा क्यूँ कहा? क्या उसे याद नहीं था कि वह क्रूस पर किस वजह से गया है? क्या वह नहीं जानता था कि यह अलगाव मनुष्य के पापों को सहने के लिए था। क्या उसने वास्तव में विश्वास कर लिया था कि परमेश्वर ने उसे सदा के लिए छोड़ दिया है?

गुलगुता पर जो यहूदी जमा थे, वे यीशु कि वाणी को पहचान सकते थे क्यूंकि उसने पुराने नियम से लिया था। महान विपत्ति के समय दाऊद राजा ने भजन सहित में लिखा था। फिर उन सब्दों में कोई संदेह नहीं था। दाऊद का विश्वास डगमगाने वाला नहीं था, वह प्रभु में मज़बूत होता जाता था। वह विश्वास में स्थिर था और किसी और कि ओर नहीं देखता था। वह पाप कि समस्या के हल के लिए किसी मनुष्य कि ओर नहीं देखता था और संकट के समय में परमेश्वर को कोस्ता नहीं था। इस भजन सहित में, दाऊद राजा ने अपनी आशा को परमेश्वर के छुटकारे पर केंद्रित किया हुआ था एयर केवल उसी को पुकारता था। यह परमेश्वर में गहरायी कि एक तस्वीर है। आइये इस भजन सहित से और पढ़ते हैं :

हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर!
तूने मुझे क्यों त्याग दिया है? मुझे बचाने के लिये तू क्यों बहुत दूर है?
मेरी सहायता की पुकार को सुनने के लिये तू बहुत दूर है।
हे मेरे परमेश्वर, मैंने तुझे दिन में पुकारा
किन्तु तूने उत्तर नहीं दिया,
और मैं रात भर तुझे पुकाराता रहा।
हे परमेश्वर, तू पवित्र है।
तू राजा के जैसे विराजमान है। इस्राएल की स्तुतियाँ तेरा सिंहासन हैं।                                  
हमारे पूर्वजों ने तुझ पर विश्वस किया।
हाँ! हे परमेश्वर, वे तेरे भरोसे थे! और तूने उनको बचाया।                                        
हे परमेश्वर, हमारे पूर्वजों ने तुझे सहायता को पुकारा और वे अपने शत्रुओं से बच निकले।
उन्होंने तुझ पर विश्वास किया और वे निराश नहीं हुए। –भजन सहित  22:1-5

आपने देखा कैसे दाऊद राजा ने परमेश्वर कि स्तुति करने में देरी नहीं की, जिस समय वह छुटकारे के लिए रुका हुआ था?

यीशु परमेश्वर से नहीं पूछ रहा था कि उसने उसे क्यूँ छोड़ दिया। वह एक मनुष्य कि तरह उसे जो परमेश्वर कि आज्ञाकारिता के प्रति दुःख उठा रहा था। अब तक, यीशु को क्रूस पर छे घंटे हो चुके थे। परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के पाप के कारण आया था। यीशु ने अपने ही शरीर में उस भयानक संघर्ष को सहा। वह जानता था कि यह असीम क्लेश हमेशा के लिए नहीं है। एक यशस्वी विजय दूसरी और थी। अपने मनुष्य स्वभाव में होकर उसने पुछा,”‘और कितनी देर प्रभु?'”

यीशु ने जब अपने महान पूर्वजों के शब्दों को पुकारा, उसने उस भविष्यवाणी को पूरा किया जो भजन सहित में भी दी गई है। यह दोनों, दाऊद कि व्यक्तिगत प्रार्थना भी थी और मसीह के आने का सन्देश था!

जो पास में खड़े थे, उनमें से कुछ ने जब यह सुना तो वे बोले,“सुनो! यह एलिय्याह को पुकार रहा है।” दूसरे बोले,“ठहरो, देखते हैं कि इसे नीचे उतारने के लिए एलिय्याह आता है कि नहीं।” वे अभी यह सोच रहे थे कि यह व्यक्ति कौन है।

यीशु जानता था कि उसका समय आ गया है। उसने वो सब पूरा कर दिया था जिस काम से पिता ने उसे भेजा था। एक और वचन था जिसे पूरा होना था, सो उसने कहा,“‘मैं प्यास हूँ।'”

सिरके में डुबोया हुआ स्पंज एक छड़ी पर टाँग कर लाया गया और उसे यीशु को चूसने के लिए दिया। भजन सहित 69:21 के वचन पूरे हुए “…उन्होंने मुझे विष दिया, भोजन नहीं दिया। सिरका मुझे दे दिया, दाखमधु नहीं दिया।'”

जब यीशु पी चुका, उसने कहा,“पूरा हुआ।”

उन शांत शब्दों में यीशु ने घोषित किया कि समाप्त हुआ। जय मिल गई थी। सब कुछ बदल गया था। आदम के पाप से, इंसानियत ने परमेश्वर के विरुद्ध आवाज़ उठाकर शैतान के प्रति वफ़ादारी दिखायी, जिसका अंजाम पाप और मृत्यु था। परन्तु यीशु मनुष्य रूप में आया और दोनों पर विजय प्राप्त की और जीवन के मार्ग को दिखाया। उसके पृथ्वी पर जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ और उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये।

कहानी १६७: पीलातुस और हेरोदेस के पास 

मत्ती २७:१-२,११-१४; मरकुस १५:१-५; लूका २३:१-१२; यूहन्ना १८:२८-३७

Neuberg and der Murz - paint of Jesus judgment for Pilate (1505)

पेंतुस पीलातुस के जैसे आदमी के लिए, यहूदी महासभा के पुरुष एक हास्यास्पद भीड़ की तरह होंगे। पिलातुस रोमी राज्यपाल था जिसे दुनिया में सबसे शक्तिशाली आदमी द्वारा नियुक्त गया था – रोमी कैसर। रोमी साम्राज्य ने ज्ञात दुनिया पर विजय प्राप्त की और सैकड़ों वर्ष के लिए इतिहास पर प्रभुत्व की। इस्राएल के देश का नक्षा एक तुच्छ धब्बे की तरह लगता था। उनके धार्मिक नेता भी हर रूप में भ्रष्ट, और सत्ता के भूखे थे- ठीक रोमी राजनीति में खेलने वालों की तरह, पर बिना उस आकर्षण और चमक धमक के। वे एक राष्ट्र के रूप में स्वयं के महत्व से भरे थे, जो बाकि दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती थी। रोमियों के लिए इन पर आँखे चड़ाना आसान था, लेकिन पिलातुस के लिए, वे एक वास्तविक खतरा थे। यहूदी नेतृत्व का लोगों पर जबरदस्त प्रभाव था। वे एक विद्रोही उन्माद में भीड़ को उकसा सकते थे। जो आखरी चीज़ पिलातुस चाहता था वो था रोम को एक रिपोर्ट कि वह अपनी सत्ता को कायम नहीं रख सकता है।

जब महासभा यीशु के साथ पहुंची, उन्होंने अंदर कदम रखने से इनकार कर दिया। यह एक बड़ा किला था जहाँ रोमी राज्यपाल रहता था, और इसलिए उसकी भूमि अशुद्ध थी। अगर यहूदी अंदर चले जाते, तो वे अशुद्ध हो जाते। वो फसह के बाकी के पर्व को मनाने के लिए अयोग्य हो जाते। पिलातुस यहूदियों के धार्मिक रीति रिवाजों के प्रति संवेदनशील था, इसलिए वह उनसे मिलने के लिए बाहर चला गया। वहां वो यीशु के सामने खड़ा हो गया, जिसके हाथ पैर एक आम कैदी की तरह बंधे हुए थे। उनका चेहरा चोट के निशान से भरा हुआ था। इस साधारण आदमी ने कैसे इन शक्तिशाली पुरुषों को ऐसे आक्रोश में डाल दिया, और वो भी उनके त्योहार के चरम बिंदु पर? और वे उसे वहां क्यूँ ला रहे थे?

“‘तुम इस आदमी के खिलाफ क्या आरोप लगते हो?'” पिलातुस ने पूछा।

“‘अगर यह आदमी बुराई का कर्ता नहीं होता, हम इसे आप के पास नहीं लाते,” उन्होंने कहा। “‘हमने इस आदमी को हमारे देश को गुमराह करने और कैसर को कर का भुगतान मना करने का, और खुद को मसीह -एक राजा घोषित करने के अपराध में पाया है!'”

ज़ाहिर है, यह आरोप झूठे थे। और यह उन आरोपों से काफी अलग थे जो उन्होंने अपने स्वयं की कार्यवाही में घोषित की थी। लेकिन पेंतुस पीलातुस और रोमी साम्राज्य इस बात की परवाह नहीं करते थे कि कौन अपने को यहूदी मसीह बोलता है, और वे इसके लिए मौत की सजा कभी नहीं देते। यहूदी नेतृत्व इस से अच्छी तरह परिचित थी, इसलिए उन्होंने झूठे आरोप बनाए ताकि वो पिलातुस को यीशु को मौत के सजा सुनाने के लिए विश्वास दिला सके। वे यह बोल रहे थे कि यीशु ने अपने को रोमी कैसर की शक्तियों के मुकाबले किया। यह एक इतना हास्यास्पद दावे की तरह लग रहा था कि पिलातुस ने इसे आसानी से खारिज कर दिया। उसने कहा, “‘उसे अपने आप ले जाओ और अपने खुद के कानूनों द्वारा उसका न्याय करो।”

“‘हम कानूनी रूप से किसी को मौत की सज़ा नहीं सुना सकते है,” उन्होंने  उत्तर दिया।

आह। उनके आने का असली कारण पता चल रहा था। वे जंजीरों में इस आदमी को मारना चाहते थे। रोमी लोग अपने न्याय की नीतियों पर गर्व करते थे, और पीलातुस जानता था कि धार्मिक नेताओं को उसे सच बताने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे कोई दूसरे रास्ते से पता लगाना होगा कि असल बात क्या थी। तो उसने यीशु को अंदर बुलाया ताकि वे अकेले में उनसे बात कर सके।

“‘क्या तुम यहूदियों के राजा हो?'” उसने पुछा। अब, रोमी राज्यपाल भी यह सुझाव दे रहा था कि यीशु एक राजा हो सकता है!

“‘क्या आप अपनी स्वयं की पहल पर यह कह रहे हैं, या क्या दूसरों ने आपको मेरे बारे में बताया है?'” यीशु ने उत्तर दिया।

“‘मैं एक यहूदी तो नहीं हूँ, हैना?” पिलातुस ने कहा। “‘तुम्हारे अपने ही देश और महायाजक ने तुमको मुझे सौपा है। तुमने क्या किया है?”

क्या यह दिलचस्प नहीं है कि पिलातुस यहूदियों के बातों से ज्यादा यीशु को सुनना चाहता था? वो प्रभु को उनके भ्रष्ट नेतृत्व के उन्माद के उपरान्त, अपना नाम साफ़ करने का मौका दे रहा था।

यीशु ने उत्तर दिया: “मेरा राज्य इस दुनिया का नहीं है। अगर मेरा राज्य इस दुनिया का होता, तो मेरे दास जंग छेड़ रहे होते ताकि मै यहूदियों को न सौपा जाऊं; लेकिन, मेरा राज्य इस दायरे से नहीं है। ‘”

कल्पना कीजिये कि उनका जवाब पिलातुस को कितना अटपटा लगा होगा। उसने यीशु से पुछा: “‘तो तुम एक राजा हो?”

प्रभु ने उसे बोला: “‘आपने मुझे राजा कहकर सही बोला है। मैं इसलिए पैदा हुआ हूँ, और इसलिए दुनिया में आया हूँ ताकि मैं सच के लिए साक्षी दे सकूं। जो कोई मेरी आवाज सुनता है, सच्चाई सुनता है।'”

“सच्चाई क्या है? ‘” पिलातुस ने कहा।

यह स्पष्ट था कि यीशु रोमी साम्राज्य के लिए कोई वास्तविक खतरा नहीं थे। रोम, दार्शनिकों और शिक्षकों से भरा था जो अपना जीवन उच्च विचारों पर चर्चा करके बिताते थे, और वे एक अहिंसक भीड़ थे। पिलातुस यह नहीं समझा कि यीशु ही वास्तव में सत्य है, जो जिंदा और मनुष्य के रूप में अवतीर्ण हैं, और यह कि वह पिलातुस द्वारा पूछे गए हर गंभीर सवाल का जवाब दे सकते थे। लेकिन वो यह जानता था कि यह आदमी मौत के योग्य नहीं है। वो बाहर महासभा के मंथन गुस्से में चला गया और घोषणा की, “‘मैं उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ।'”

महायाजक और बड़े बहुत कठोरता से यीशु पर आरोप लगाने लगे। उनके उठे हाथों और हिंसक जुनून में उठाए आवाज की कल्पना कीजिये। यीशु उनके व्यंग्य का सामना करते हुए, चुपचाप, पूर्ण संतुलन में खड़े रहे। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। लोगों को सच्चाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पिलातुस चकित था। वह यीशु को वापस अंदर ले गया और उससे कहा: “क्या तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है? देखो वो तुम्हारे खिलाफ कितना दोष लगा रहे हैं!”

पिलातुस यीशु के पास वहाँ खड़े होकर उन्हें कुछ बोलने के लिए उत्साहित कर रहा था ताकि वो यीशु के बचाव में कुछ कह सके। लेकिन यीशु ने पहले से ही सच्चाई पर पिलातुस के सवालों का जवाब दे दिया था, और उन्हें अधिक कहने के लिए कुछ भी नहीं था।

पिलातुस यीशु पर हैरान था। यीशु के शाही, आत्मसमर्पित शान्ति के विपरीत, धार्मिक नेता गंभीर से गंभीर सजा की मांग करते रहे। “‘वह यहूदिया भर में शिक्षण देता है – गलील से शुरू करके और यहाँ इतनी दूर तक वो लोगों को उकसाता है।'”

पिलातुस के आगे एक समस्या बड़ती जा रही थी। वो जानता था कि लोग झूठ बोल रहे थे और आरोप झूठे थे, लेकिन वे इसे जाने के लिए राज़ी नहीं थे। और इस यीशु ने खुद का बचाव करने से इनकार कर दिया था। वह अपने को इस झंझट से बाहर कैसे निकले?

जब उसने सुना कि यीशु गलील से नीचे आया है, उसने पूछा था अगर यीशु  वास्तव में एक गलीली था। क्यूंकि बात असल में यह थी कि हेरोदेस अन्तिपस उस क्षेत्र के उत्तरी भाग पर शासक नियुक्त किया गया था, तो फिर पेंतुस यह मामला उसे सौप देता। हेरोदेस को उसके बजाय इस झंझट को संभालना पड़ता!

हेरोदेस उस समय यरूशलेम में था, तो पिलातुस ने यीशु को उसके पास भेज दिया। हेरोदेस यीशु के आने पर खुश था। उसने उन सब चमत्कारों के बारे में सुना था और चाहता था कि यीशु उसके लिए कोई चिन्ह का प्रदर्शन करें। इस हेरोदेस को लोगों को एक तार पर टंगे कठपुतलियाँ बनाकर इस्तेमाल करने की आदत थी क्यूंकि उसे इससे रोमांच होता था। उसने एक बारअपनी युवा सौतेली बेटी को अपना आधा राज्य देने का वादा किया था क्योंकि उसने अपने नृत्य के साथ उसके मेहमानों को खुश किया। उसकी भयानक इच्छा थी एक थाली पर यूहन्ना बप्तिस्मा देने वाले का सर। राजा हेरोदेस को इस तरह का विद्रोही अनुरोध मना करने का साहस नहीं था, और इसलिए यीशु के चचेरे भाई को उसी दिन मौत का सामना करना पड़ा।

यह सोचना दिलचस्प है यीशु की उन प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिक्रिया क्या थी जो पिता उसके मार्ग में लाए थे। जिनके दिल खुले लेकिन चोट खाए हुए थे, उनके लिए वह चमत्कार और सच्चाई का संदेश लाए। शिष्यों या निकोदेमुस या मार्था और मरियम की तरह विश्वास में उनके साथ खड़े होने वालों के लिए, उन्होंने परमेश्वर के रहस्यों के बारे में गहरे से गहरा खुलासा किया। यीशु ने पीलातुस के सवालों के जवाब इज्ज़त और सम्मान से दिया – अपने उच्च, अनन्त राज्य के बारे में रहस्य एक ऐसे आदमी के साथ बांटा जो अधिकार के स्तरों और दुनिया में शासन के बारे में बहुत समझटा था। परमेश्वर के अपने लोगों के कड़े – दिल, धार्मिक नेताओं के लिए, वह पश्चाताप करने के लिए और परिवर्तन लाने के अवसरों के साथ बार – बार आए। जब उन्हें मारने के लिए कार्यवाही चल रही थी, तो उन्होंने जवाब नहीं देने का कारण यह बताया कि वो नहीं सुनेंगे। यह छोटी सी स्पष्टीकरण भी उनके नेताओं को मन बदलने के लिए एक ‘दरवाजे में एक दरार’ का एक अवसर प्रदान करती थी।

यीशु ने प्रत्येक व्यक्ति से उनके जरूरत के स्थान पर मुलाकात की और खुद को ऐसे दिया जिसको वो समझ नहीं सकते थे, प्रत्येक को उतना उभारा जितनी आत्मा ने उन्हें अनुमति दी। यहाँ तक कि उनकी चेतावनी भी एक दया थी, क्योंकि वह एक दयावंत परमेश्वर की चेतावनियाँ थी। तो यह देखना दिलचस्प है कि जब प्रभु को हेरोदेस के सामने लाया गया था, यीशु ने पत्थर जैसी चुप्पी बनाई रखी।

धार्मिक नेता अपने आरोपों और मांगों के साथ आए थे। हेरोदेस को उनके लिए कोई बड़ा स्नेह नहीं था। उन्होंने एक दूसरे के प्रति आपसी अवमानना ​​में लंबे साल बिताए थे। इसके पश्चात, वह सवाल के बाद सवाल के साथ यीशु की ओर मुड़े, लेकिन यीशु के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था। परमेश्वर का पुत्र, परमेश्वर की शक्ति और सच्चाई का इस्तेमाल इस घृणित आदमी द्वारा अपने खुद के मनोरंजन के लिए अनुमति नहीं देगा। जैसे ही हेरोदेस को यह एहसास हुआ कि उसका यीशु पर कोई बोलबाला नहीं था, उसका मोह उपहास में बदल गया। उसने इस भटकते उपदेशक के साथ मनोरंजन का एक और रास्ता निकल लेगा। वह और उसके साथ सैनिक प्रभु का ठठ्ठा उड़ाने लगे। उन्होंने एक राजा के लायक एक खूबसूरत, शाही वस्त्र लेकर उसके कन्धों एक चारों तरफ बाँध लिया, और इस बढ़ई के शाही सत्ता के योग्य होने के दावे को तिरस्कृत करने लगे। तब उन्होंने यीशु को वापस पिलातुस के पास भेजा। उस समय तक, हेरोदेस और पीलातुस के बीच एक शांत दुश्मनी रही थी। पर जब दोनों को इस शांत उपदेशक के खिलाफ परिहासशील यहूदी नेताओं का सामना मिलकर करना पड़ा लेकिन, उनको एक जुट होने का मौका मिला। वे महासभा से घृणा करते थे, और सच्चा राजा जब आया, तो अपने घुटने झुकाने में विफल रहे। उस दिन से, वे दोस्त बन गए।

कहानी १६६: सरकारी कार्यवाही 

मत्ति २७:१-१०; मरकुस १४:४८-६५; लूका २२:५२, ६३-७१; यूहन्ना १८:२४-२६

Jesus Faces Pontius Pilate

धार्मिक शासकों ने उनकी गिरफ्तारी की रात से पहले ही यीशु की कार्यवाही के परिणाम का फैसला कर लिया था। उनको यह सुनिश्चित करना था कि यह उनकी मौत के साथ समाप्त होगी।वो बहुत ज्यादा खतरनाक था। लेकिन कैफा के घर में मसीह के साथ गुप्त रूप से धौस जमाना अवैध था। क्यूंकि यह रात के अंधेरे में आयोजित किया गया था, उनके निर्णय में कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं थी। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, उनको पूरे महासभा के सामने, दिन की रोशनी में एक पूर्ण पैमाने पर यह कार्यवाही आयोजित करनी थी। लेकिन दिन के उजाले में, यरूशलेम की सड़कों पर फसह पर्व की भीड़ भी एकत्रित होती। यीशु बेहद लोकप्रिय थे, और उसकी गिरफ्तारी की खबर तेजी से फैल जाती। याजक जानते थे कि अगर लोगों को यह पता चले कि यीशु एक अपराधी ठहराया गया है, तो एक गंभीर विद्रोह हो सकता था। तो सुबह तडके, भीड़ के जागने से पहले, वे इस कार्यवाही को महायाजक के घर से सामान्य वकील कक्ष में ले गए।

महायाजक और पुरनी यीशु की मृत्यु पर चर्चा करने के लिए इकट्ठे हुए। तब वे प्रभु को आगे लाए और उनसे पूछा, “‘अगर तुम मसीह हो, तो हमें बताओ।'”

यीशु ने उत्तर दिया:  “‘अगर मैं आपको बताऊंगा, तो आप यकीन नहीं करेंगे, और अगर मैं एक सवाल पूछू, तो आप जवाब नहीं देंगे।” वह जानते थे कि उनके पास इन लोगों के साथ बात करने के लिए कोई कारण नहीं था। तो उन्हेंने उनके जानलेवा महत्वाकांक्षाओं को औचित्य साबित करने के लिए जानकारी दे दी:
” लेकिन अब से, मनुष्य का पुत्र परमेश्वर की शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठेगा'”

वाह। एक बार फिर, यीशु ने ना केवल यह घोषित किया कि वह दिव्य थे, लेकिन यह कि वह परमेश्वर के सिंहासन से पृथ्वी पर सत्ता में राज करेंगे। क्या उनमे से कोई यह सुन कर काँप उठा? क्या उनमें से किसी ने इसकी सच्चाई के बारे में चिंता नहीं करी? यदि उन्होंने किया भी, तो उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा। “‘हमें आगे और गवाही की क्या जरूरत है?'” उन्होंने डाह से घोषणा की। “‘हमने उसके ही मुंह से अपने आप सुना है।'”

अब, यहूदा अभी भी आसपास छिपा देख रहा था कि क्या होने जा रहा था। जब उसने देखा की कार्यवाही बदतर होती जा रही है, उसे एहसास हुआ कि उसके पूर्व गुरु की मौत जल्दी आ रही है। अचानक, वह पश्चाताप से भर गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था कि बात यहाँ तक पहुँच जाएगी! वह अपने चांदी के तीस टुकड़ों के साथ महायाजक के पास गया। “‘मैंने निर्दोष खून को धोखा देकर पाप किया है।'”

वे अवमानना ​​के साथ यहूदा को देखने लगे। एक निष्पक्ष सुनवाई की गवाही में, इस तरह का एक बदलाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। यह कोई साधारण गवाह नहीं था, यह वही था जिसने यीशु को पकड़वाया था। निश्चित रूप से, उसके शब्दों को भारी वजन मिलते – इसलिए क्यूंकि वो यीशु के आंतरिक चक्र का एक सदस्य था! देशद्रोही अपनी बेगुनाही की घोषणा करने आया था! लेकिन धार्मिक नेता यीशु को मारने की अपनी योजना के रास्ते में आई कोई जानकारी में दिलचस्पी नहीं रखते थे। “‘हमें इससे क्या लेना देना? इसको अपने आप देख लो! ‘”वे बोले।

यहूदा ने मंदिर में ही चांदी के सिक्के फेके और भाग गया। अपने दुख और निराशा में, वह एक खेत में गया और खुद को गर्दन से लटका दिया। दिन की भयावहता फैल रही थी।

नेता जानते थे कि वह यह सिक्के मंदिर के खजाने में नहीं डाल सकता थे। यह खून का पैसा था। यह कलंकित था। उन्होंने इस बात को अनदेखी किया कि वे विश्वासघात खरीदने के लिए पैसे का उपयोग करने से, उस पैसे से ज्यादा कलंकित थे। उन सिक्कों से ज्यादा, परमेश्वर के मंदिर में इन याजकों की कोई जगह नहीं थी। सभी सच्ची धार्मिकता पूरी तरह से त्यागी हुई थी, लेकिन वे, खुद के साथ भी, इस ढोंग को ज़ारी रखते रहे। उन्होंने यहूदा के चांदी के सिक्कों से ‘पॉटर फील्ड’ नामक एक क्षेत्र को खरीदा – यह एक जगह थी जहाँ राष्ट्र के लिए अजनबी को दफन किया जाता था। आने वाले महीनों और वर्षों में, यह “, हकेल्दामा” के नाम से जाना गया, या ‘रक्त का खेत।’

और परमेश्वर का वचन पूरा किया गया। यह वैसे हुआ जैसे यिर्मयाह ने कहा था:
न्‍होंने वे तीस सिक्के अर्थार्थ उस ठहराए हुए मूल्य को (जिसे इस्‍त्राएल की सन्‍तान में से कितनोंने ठहराया था) ले लिए।
और जैसे प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी, वैसे ही उन्‍हें कुम्हार के खेत के मूल्य में दे दिया।।

जैसे यीशु की कार्यवाही का दिन चल रहा था, प्रभु के सच्चे अनुयायी बिखरे हुए थे। महासभा ने उनके परमेश्वर को दोषी ठहराया और उसे बाध्य कर दिया। अब जब उनका खुद का फैसला औपचारिक हो गया था, उन्होंने यीशु को रोमी राज्यपाल के सामने ले जाने का फैसला किया। असल में,  महासभा की शक्ति बहुत सीमित थी। वे वास्तव में अपने देश पर राज नहीं करते थे। रोमी साम्राज्य ने उन्हें राज्य में कुछ आजादी दी थी, लेकिन प्राधिकरण के असली मुद्दों में, वे अप्रासंगिक थे। वे यहूदी लोगों पर हावी हो सकते थे जो परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उनके साथ सम्मानजनक थे। वे अपने प्रतिष्ठा के बल का उपयोग कर उन्हें डरा धमका सकते थे। लकिन सच्चाई यह थी कि जो कुछ भ वो करते थे, उसे रोम के आदेशों के साथ अनुकूल होना था। उनके पास किसी पर मौत की सजा सुनाने की कोई शक्ति नहीं थी। अगर वे चाहते थे कि यीशु को मारा जाए, तो उन्हें उसे रोमी राज्यपाल के पास ले जाना पड़ता था, क्यूंकि यह निर्णय उन्ही के हाथों में था।

जिस रोमी सम्राट को यहूदिया के नेत्रित्व में डाला गया था, उस आदमी का नाम पेंतुस पीलातुस था। वह क्रूर होने के लिए जाना जाता था, और वह यहूदी लोगों से सख्त घृणा करता था। वे एक क्षुद्र, अपरिष्कृत समुदाय था जिसके लोग हमेशा एक दुसरे से छोटी छोटटी बातों में युद्ध करते थे। रोम की भव्यता और उसके शानदार इमारतों, उनके शानदार सेनाओं में प्रदर्शित विशाल शक्ति, साम्राज्य भर में स्थापित अविश्वसनीय सामाजिक आदेश, और उनके राजनीतिक प्रणाली की भव्यता की तुलना में, इसराइल पृथ्वी में एक बेजोड़, पिछड़ा छेद लगता था।

पिलातुस एक ऐसी धूल भरी, फुटपाथ जैसे राज्य पर शासन के सौंपे जाने पर खुश नहीं था –  थिस्सलुनीके या इफिसुस की तरह विशाल महानगरों के मामलों और सुख से इतनी दूर। यह एक अपमान था। लेकिन उसकी जगह उन शक्तिशाली पुरुषों के साथ बहस करने के लिए नहीं थी जिन्होंने उसे वहां रखा। अगर वह उनकी अच्छी तरह से सेवा करता, तो शायद वे उसे एक अधिक सहमत स्थल के लिए उसे बढावा देते – ऐसा जो वास्तविक सत्ता और प्रतिष्ठा की हो। रोम को उसके साथ खुश रहना था, इसलिए यह इसका फ़र्ज़ था कि वह दुनिया के इस कोने में शांति बनाए रखे। तो जब यीशु की कार्यवाही के दिन पूरी महासभा रोमी सेनापति के रियासत में गुस्से से घुसी, उसने इस बात पर ध्यान दिया। यह बात आखिरकार कहाँ तक जएगी?

कहानी १६५: महायाजक के लिए एक अँधेरी रात 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

roman soldier and prisoner

यीशु को अन्नास के घर से कैफा के घर ले जाया गया। पतरस अभी तक पीछे पीछे आ रहा था। जैसे ही यीशु को महासभा के उन सदस्यों के समक्ष लाया जा रहा था जो इतनी रात वहां आए, पतरस आँगन में चला गया। वह अधिकारियों के साथ, आग के पास, बैठ गया ताकि उसे परिणाम पता चले, और उसे अपने प्रभु के साथ खड़ा होने के लिए अवसर मिले।

जब यीशु को लाया गया, तो महासभा ने एक के बाद एक गवाह खड़े किये जो उसके विरुद्ध साक्षी दे। उनकी कहानियाँ झूठी थी, और उनके शब्द एक दूसरे के साथ सहमत नहीं थे। वे इतने असंगत थे कि उन्होंने एक के बाद एक रद्द कर दिया गया। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, एक व्यक्ति दोषी तब पाया जाता जब दो गवाह एक ही आरोप के साथ सामने आए। यह नहीं हो रहा था, तो वे और अधिक गवाह लाए। किसी की गवाही यीशु को मौत की सज़ा सुनाने के लायक नहीं थी, और इस्राएल के शासक इससे कम कुछ नहीं चाहते थे। यीशु को मरना था। अंत में, एक गवाह आगे आया और यह दोष लगाया कि यीशु ने यह घोषणा की थी कि वह परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा। प्रभु ने कहा था कि वह तीन दिनों में मानव हाथ के बिना इसका पुनर्निर्माण करेंगे। हम जानते है कि यीशु अपने शरीर के बारे में बात कर रहे थे। वह नष्ट होने जा रही थी क्यूंकि यीशु ने अपने को परमेश्वर के हाथों सुपुर्ट किया। लेकिन यीशु को तीन दिन में पूर्णतः, जीवते प्रभु के हाथों जिला लिया जाएगा! यीशु के खिलाफ उनकी झूठी गवाही के द्वेष में, उन्होंने उसी रात इस सच्चाई की घोषणा की थी, लेकिन उनकी आँखे देखते हुए भी बहुत अंधी थी!

सच्चाई में, इन आरोपों का वास्तव में कोई मायना नहीं था।यह शासक उसे मारने के लिए उत्सुक थे, और अगर इस आरोप से उनकी बात नहीं बनी, तो वे एक और की खोज करते। तो यीशु ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। उसके आसपास के वातावरण के चेहरे में उनकी शांत, आश्वस्त संकल्प की कल्पना कीजिये।

महायाजक व्यथित था। वह उठ खड़ा हुआ और यीशु के पास गया। “‘क्या तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं हैं? यह क्या है जो यह लोग तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहे है? ”

यीशु चुप रहे। महायाजक ने खिज में आकर कहा: “‘मैं तुम्हें जीवते परमेश्वर से शपथ खा कर पूछता हूँ कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम मसीह, परमेश्वर के पुत्र हो?'”एक बार फिर, यीशु के दुश्मनो ने उसके बारे में सच की घोषणा की –  ठीक उसी कार्यवाही में जिसमे उसे दोषित किया जा रहा था। इस बार, यीशु ने जवाब दिया:

“” आप खुद ही कह चुके हैं, फिर भी, मैं आपको बताता हूँ; इसके बाद आप मनुष्य के पुत्र को शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठे देखेंगे, और आकाश के बादलों पर आते हुए देखेंगे।”

वाह! यीशु ने यह घोषित कर दिया कि वो न केवल मसीहा था। वह मनुष्य का पुत्र भी था! यह शब्द पुराने नियम से था। इसका मतलब यह था कि वह शक्ति और महिमा में दिव्य होने का दावा कर रहे थे! वो परमेश्वर के साथ एक होने का दावा कर रहे थे!

जब महायाजक ने यह सुना, तो वह जान गया कि उसके पास वो था जो वह चाहता था। उसने अपने हाथों से अपने याजकी पहनावे को पकड़ा और उसे फाड़ा। यह उसके चरम अपकार और यीशु के हर शब्द की पूर्ण निंदा की घोषणा थी। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से जो अपने महायाजकों के लिए वस्त्र ठहराया था, उसे कभी फाड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा, जिसके लिए उसे थोड़ा सम्मान भी नहीं था, उसकी परेशानी का कारण नहीं थी।

लेकिन सच में, अब किस बात का मायना था? व्यवस्था जिस पवित्रता को  इन पापी याजकों के द्वारा पूरा नहीं कर सका, वो अब यीशु में पूरी तरह से सफल होने जा रही थी। अपने विद्रोह में, कैफा ने परमेश्वर का यंत्र बनके, कानून का अंत, मंदिर में आराधना, और उस वाचा को परिपूर्ण किया जो इस आदमी को सशक्त कर रही थी। अपने जीवन पर पकड़ रखने के लोभी रोष में, वह उसे खो रहा था।

“‘इसने परमेश्वर के विरुद्ध बोला है!'”उसने पागलों की तरह घोषणा की। “‘हमें आगे गवाहों की क्या ज़रूरत है? देखो, तुमने इसके शब्द सुने है; तुम क्या सोचते हो? ‘”महासभा के बाकी लोग बोल पड़े: “‘ वह मौत के योग्य है!”

फिर अपने शातिर गुस्से में, उन्होंने अपनी मुट्ठी से उसे पीटा, उसके चेहरे पर थूका, और थप्पड़ मार कर उसे अपमानित किया। और जब यह सब हो रहा था, प्रभु अपने सम्मानजनक ताकत में वहां खड़े रहे  – उस प्याले को सहन करते हुए जो उसके पिता ने उसे दिया था।

इस दयनीय अन्याय के बीच में, पतरस आग के पास अपने हाथ, आंगन में सेक रहा था। कैफा की एक नौकरानी ने उसके पास जाकर उसके चेहरे को बारीकी से देखा। “‘क्या तुम भी यीशु गलीली के साथ थे?'” और सब के सामने उसने घोषणा की: “मैं नहीं जानता तुम किस बारे में बात कर रही हो। ‘” फिर वह उठकर  प्रवेश द्वार से बरामदे पर चला गया। क्या वह बच निकलने का रास्ता तलाश रहा था? हालात उसके स्वामी के लिए अच्छा नहीं लग रहे थे। एक और नौकरानी पतरस के पास आई और उससे कहने लगी: “‘तुम भी उनमें से एक हो!’

पतरस ने कहा: “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता!’ उस दबाव की कल्पना कीजिये जो उसने महसूस किया होगा।

एक और घंटा बीत गया, और मसीह की कार्यवाही बदतर होती जा रही थी।  इन भयानक पुरुषों के जब उसके प्रभु को ठूस ठूस कर पीता होगा, तो पतरस का दिल कितना टूटा होगा। वह क्या कर सकता था? वह इसका हल निकालने के लिए क्या कर सकता था? वह अब अपनी वफादारी को कैसे दिखा सकता था? हजारों विचार उसके दिमाग में चले होंगे, लेकिन मानो उसे लकुआ मार गया हो। दासों में से एक ने पतरस को देखा और कहा: “‘निश्चित रूप से आप भी उनमें से एक हैं क्यूंकि आप एक गलीली है।” यह दास यीशु की गिरफ्तारी के लिए बगीचे में मौजूद था। जिसका कान पतरस ने काटा था, यह उसका चचेरा भाई था, और उसे यकीन था कि यह इसी आदमी ने किया था!

पतरस कसम और श्राप के शब्द, झूठे गुस्से के साथ बोलने लगा – ठीक उसी प्रकार जब किसी को एक झूठ में पकड़ा जाता है। “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम बात कर रहे हो!'” तुरंत, एक मुर्गा ने बांग दिया। प्रभु ने भी इसे अच्छी तरह से सुना, और अपने अराजक कार्यवाही के बीच में पतरस की ओर देखा। पतरस को यीशु की बात याद आई जो उन्होंने बस कुछ घंटे पहले ही ऊपरी कक्ष में बोली थी। “‘मुर्गा कौवे से पहले, तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” सबसे खराब विफलता सच हो गई थी। पतरस उठकर बाहर चला गया और फूट फूट कर रोने लगा।

धार्मिक शासक अपने रोष में आगे बड़ते गए। किसी ने यीशु  के आंखों के चारों ओर एक पट्टी बाँधी। तब उन्होंने प्रभु को पीटा और उसे थप्पड़ मारा, और कहा:  “‘भविष्यवाणी कर, तू तो मसीह है, तो बता किसने तुझे मारा?'”

उनके असीम नफरत और शातिर दुष्टता पर ख़ुशी की कल्पना कीजिये। आखिरकार, उनके पास इस लोकप्रिय युवा शिक्षक के प्रति सालों के असंतोष और नफरत व्यक्त करने की शक्ति मिली – और वे अपनी घृणा में इतने एकजुट थे कि किसी को यह काम में शर्म नहीं आई। और जैसे वो उस परमेश्वर की निंदा कर रहे थे जिस पर वो परमेश्वर की निंदा का दोष लगा रहे थे – परमेश्वर वहां शांत बल में खड़े रहे, अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए और उस प्याले को पूर्णता से पीते हुए।

कहानी १६४: अन्नास के घर में प्रभु 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

Accusation of Jesus on Good Friday

रात की शांति में, उसके चेलों थके हुए नींद में गिर गए। यीशु प्रार्थना में अपने पिता के पास चले गए। तीन बार उन्होंने वह बोझ हटा देने को माँगा। क्या पिता इस काम को हटा सकते थे? क्या यीशु किसी तरह आने वाली पीड़ा को आने से रोक सकते थे? क्या उन्हें परमेश्वर का वह प्रकोप का प्याला पीना ही पड़ा था? क्या यह सुचमुच मनुष्य के उद्धार एक ही रास्ता था? कल्पना कीजिये पिता के अस्सेम प्यार की जब उन्होंने मानव जाति के उद्धार को अपने बेटे से आगे रखा और कहा: “तुम एक ही रास्ता हो।” पुत्र की दिल से, परिपूर्ण प्रेम और समर्पण की कल्पना कीजिये जब उसने अपने ऊपर उस दंड को ले लिया जो हम सब को लेना था।

महायाजक और सिपाही जब यीशु को गिरफ्तार करने के लिए आए, लड़ाई पहले ही जीती हुई थी। परमेश्वर के पुत्र ने पहले से ही अपने आप को दीन किया और परमेश्वर के सामने अपने आप को शून्य किया। उनको पूरी तरह से दूसरी तरफ महिमा का आश्वासन था, और वो इस अंधेरे में पिता की सेवा करेंगे। परमेश्वर उन्हें सर्वोच्च स्थान पर, स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान करेंगे। यीशु का नाम हर नाम से ऊपर होगा, और स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हर घुटना उसके सामने झुकेगा, और हर एक जीभ इस बात का अंगीकार करेगी कि यीशु मसीह हर बात पर प्रभु है। और पुत्र को दिया यह भव्य सम्मान उनके महान प्रेम के पिता को सम्मान और गौरव देगा।

जब यीशु ने क्रूस का सामना किया, उन्हें पता था की यह सब बाते दूसरी ओर है। उसे गिरफ्तार करने जो पुरुष बगीचे में आए थे, वे इस गलत सोच में थे कि वह आने वाली घटनाओं को साकार करना उनकी शक्ति में था। यीशु ने जब अपने को उन विषैली हमलों और शारीरिक शोषण के पीड़ा में खुद को सौप दिया, वह सभी पर प्रभु बने रहे।

शमौन पतरस और शिष्य अपने विश्वास में बढ़ रहे थे, लेकिन उनके पास उस पल की घटनाओं से परे देखने की दृष्टि नहीं थी। जब शमौन पतरस तलवार के साथ आगे बड़ा, उसने एक पल के लिए हिंसा की भयावहता को आमंत्रित किया, जो एक समर्पण का पल था। यीशु ने संघर्ष के अंत की आज्ञा दी और उस आदमी के कान को चंगाई दी जिस पर पतरस ने हमला किया।

फिर वह गिरफ्तार करने वाले आदमियों के ओर मुड़े और बोले: ‘क्या तुम मुझे गिरफ्तार करने के लिए तलवार और लाठियों के साथ आए हो, जैसे कि मै कोई चोर उचक्का हूँ? हर दिन मैं मंदिर में शिक्षण देते तुम्हारे साथ था, और तुमने मुझे गिरफ्तार नहीं किया; लेकिन यह इसलिए हुआ है ताकि इंजील पूरी हो सके। इस समय और अंधेरे की शक्ति तुम्हारी हैं।”

जब चेलों ने यीशु को सुना और देखा कि वह आत्मसमर्पण कर रहे है, वे घबरा कर भाग गए। कल्पना कीजिये कि धार्मिक शासकों ने कैसे उसका ठठ्ठा उड़ाया होगा जब सैनिकों ने यीशु के हाथों और पैरों पर बेड़ी डाली होगी। जब वे उसे ले जा रहे थे, तो एक जवान आदमी उसके पीछे आया था। उसने एक चादर को छोड़कर कोई कपड़े नहीं पहने थे। जब सैनिकों ने देखा कि वो यीशु का एक दोस्त था, उन्होंने उसे गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन वह चादर पीछे छोड़कर भाग गया। वह उस ठंडी रात में नग्न चला गया – अपने प्रभु के हाल देख कर तहस – नहस।

भीड़ अंधेरे में अन्नास के घर की ओर बड़ी, जो इस्राएल पर एक पूर्व महायाजक था। वो कैफा का ससुर था – कैफा एक महायाजक था। वो कैफा ही था जिसने यह घोषणा की कि देश को बचाने के लिए, मसीह के लिए मरना बेहतर था। अगर रोमी यीशु के बढ़ाए हुए उत्तेजना से थक जाते, तो वे अपनी स्वतंत्रता के सभी पहलों पर रोक टोक लगाते। यह, ज़ाहिर है, हास्यास्पद था। रोमियों ने न तो मसीह की यात्राओं न उनके सन्देश पर कोई चिंता दिखाई थी। लेकिन यह एक अच्छा बहाना था। इस महायाजक को क्या पता कि उसकी विषैली घोषणा वास्तव में परमेश्वर से एक भविष्यवाणी थी।

कैफा का मसीह के प्रति द्वेष का असली कारण ज्यादा निजी था। वह ईर्षापूर्ण था। वह एक लम्बे समय से प्रतिष्ठा और प्रभाव के एक परिवार से आता था। उन्हें सत्ता चलाने और देश की दिशा को नियंत्रित करने की आदत थी। यह युवा उपदेशक उनके इस कार्यवाली में एक खतरा था – और इसे रस्ते से हटाना था। अब उसे और राष्ट्र की घाटियों और दरारें में आसपास चुपके, अज्ञानी भीड़ में घुलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उसे आखिरकार उन लोगों का सामना करना था जिसके नेतृत्व की अवहेलना उसने अपने शर्तों पर करने की हिम्मत की थी। कितनी दुष्टतापूर्वक कैफा और उसके साथी शासकों ने उनको अपमानित करने के चस्के का स्वाद लिया होगा।

शमौन पतरस अपने प्रारंभिक आतंक से बाहर निकल गया था। उसने भीड़ का पीछा किया ताकि वो आने वाली घटनाओं के खुलासे पर नजर रखे। यूहन्ना भी साथ आया था। वो अन्नास के घर में जाना जाता था, तो जब  यीशु को पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा था, उसे रियासत पर आने की अनुमति दी गई थी। पतरस को बाहर इंतजार करना पड़ा, लेकिन यूहन्ना को  उसके लिए द्वारपाल के पास जाना पड़ा। जब पतरस उसके लिए बाहर इंतजार कर रहा था, वहीं दरवाजे पर काम करने वाली एक छोटी गुलाम लड़की उसके पास आई और कहने लगी, “‘क्या आप भी इस आदमी के शिष्यों में से एक नहीं हैं, हैना?” क्षण भर की प्रतिक्रिया में पतरस ने कहा:  “मैं नहीं हूँ। ‘”उसने सोचने से पहले ही, पहली बार अपने प्रभु का इनकार किया था।

यूहन्ना पतरस को दरवाज़े के अंदर ले जा पाया, तो पतरस आंगन में चला गया और दास और सैनिकों के साथ खुद को गर्म करने के लिए कोयले की  आग के पास खड़ा हो गया।

इस बीच, अन्नास ने यीशु से उसके चेलों और उसके सिखाए संदेशों के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की। यीशु ने उसे वापस देखा और तथ्य प्रदान किये:  मैंने हमेशा खुल कर स्पष्टता से बोला है, मैंने सभाओं में पढ़ाया है, और मंदिर में, जहाँ सभी यहूदी एकत्रित होते हैं, और मैंने कुछ गुप्त में नहीं बोला है। आप मुझसे सवाल क्यूँ करते हैं? उनसे सवाल करिए जिन्होंने वो सुना जो मैंने  कहा। उन्हें पता है जो मैंने कहा।”

इस पर एक अधिकारी ने यीशु को मारा और भोहे चडाकर कहा: “‘क्या तुम इस तरह से महायाजक को जवाब देते हो?”

यीशु ने साहसपूर्वक उत्तर दिया: ‘अगर मैंने गलत तरीके से बात की है, तो गलत की गवाही मानो; पर अगर सही, तो तुम मुझ पर क्यूँ हाथ उठाते हो? यीशु ने पुराने नियम के शब्दों से जवाब दिया। निर्गमन २२:२८ में, परमेश्वर इस्राएल के देश को बताते है कि आत्मरक्षा में सच्चाई बोलना धार्मिकता है। जाहिर है, अधिकारी परमेश्वर के वचन के धर्मी आदेशों का सम्मान करने से ज्यादा, महायाजक की सुरक्षा के बारे में चिंतित था।

यीशु नैतिक अधिकार के उत्तम बल के साथ अन्नास के सामने खड़े था। अन्नास को कहने के लिए कुछ भी नहीं था। शायद वह थोड़ा परेशान हो गया था। यह स्पष्ट था कि उसके पास यीशु को भयभीत करने के लिए कोई क्षमता थी। उसने उसे वहां से जाने दिया और अपने दामाद के यहाँ भेजा जहाँ महासभा और इसराइल की सर्वोच्च अदालत से लोग पहले से ही एकत्र हुए थे। यह सब समय से पहले साजिश रची गई थी। रात के गहरे अंधेरे में, वे अपने मंदिर की अदालतों में इस तरह के क्रुद्ध करनेवाला संदेशों को उपदेश देने वाले जन की पूछताछ और निंदा की अध्यक्षता करने के लिए आए थे।

कहानी १६२: गतसमनी का बगीचा-समर्पण की पीड़ा

मत्ती २६ ३०-४६, मरकुस १४:२६-४२, लूका २२:३९-४६, यूहन्ना १८:१

Basilica Our Lady of the Rosary

जब यीशु और उसके चेले फसह मना रहे थे, उसने उन्हें परमेश्वर कि योजना के रहस्य को  उनके आगे स्पष्ट रूप से दिखाया। अभी और भी प्रकाशन आने हैं। ऊपरी कमरे में मिले उपदेशों के बाद, यीशु ने पिता से अपने लिए, अपने चेलों के लिए और उन सभी के लिए जो उस पर विश्वास करेंगे। वे सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रेम और एकता में बंधे हुए थे। उस धन्य रात को यीशु ने जो कुछ अपने चेलों को सिखाया था उसे समझने के लिए उन्हें पूरा जीवन लग जाएगा। परन्तु अब समय था कि उस पर अमल करें। यीशु के आगे अभी एक अंतिम विजय थी और उसे पूरा करने के लिए उसने आगे कदम बढ़ा लिया था।

फसह के बाद उसके चेलों के साथ उसने एक अंतिम भजन गाया। फिर वे जैतून के पहाड़ पर चले गए। चेलों को नहीं पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। जब वे जा रहे थे यीशु उन्हें सावधान कर रहा था। उसने जकर्याह नबी (१३:७) से कहा:
“’तलवार, गड़ेरिये पर चाट कर! मेरे मित्र को मार! गड़ेरिये पर प्रहार करो और भेड़ें भाग खड़ी होंगी और मैं उन छोटों को दण्ड दूँगा। पर फिर से जी उठने के बाद मैं तुमसे पहले ही गलील चला जाऊँगा।’”

आपने देखा कि यीशु को कितना आत्मविश्वास था? इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह फिर से जी उठेगा, और वह चेलों को आने वाली बातों के लिए तैयार कर रहा था। परन्तु पतरस को केवल यही सुनाई दे रहा था कि यीशु अपने परमेश्वर को छोड़ देगा। उसने कहा,“चाहे सब तुझ में से विश्वास खो दें किन्तु मैं कभी नहीं खोऊँगा।”  मत्ती २६:३३

पतरस को अपने आत्मविश्वास पर पूरा भरोसा था जब कि परमेश्वर के पुत्र ने उसे और कुछ बताया था!  यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ में सत्य कहता हूँ आज इसी रात मुर्गे के बाँग देने से पहले तू तीन बार मुझे नकार चुकेगा।” यीशु समझ गया था कि इस मनुष्य के भीतर में क्या है। वह अपने चेले कि कमज़ोरी को समझ गया था। उसने अपने अनुग्रह के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था। उसकी एक ही चिंता थी कि वह उन्हें चेतावनी दे। आने वाले दिन दहशत भरे थे, परन्तु इन सब के बीच, वे यह याद कर पाएंगे की यीशु यह सब बातें पहले से जानता था। यदि वे विश्वास को चुनते हैं, तो वे यह समझ पाएंगे कि सब कुछ परमेश्वर कि योजना के अनुसार हो रहा था।

तब पतरस ने उससे कहा,“यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े तो भी तुझे मैं कभी नहीं नकारूँगा।” बाकी सब शिष्यों ने भी वही कहा।

फिर यीशु उनके साथ उस स्थान पर आया जो गतसमने कहलाता था। और उसने अपने शिष्यों से कहा,“जब तक मैं वहाँ जाऊँ और प्रार्थना करूँ, तुम यहीं बैठो।” फिर यीशु पतरस और जब्दी के दो बेटों को अपने साथ ले गया। फिर उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत दुःखी है, जैसे मेरे प्राण निकल जायेंगे। तुम मेरे साथ यहीं ठहरो और सावधान रहो।” परमेश्वर का पुत्र होने के नाते उसे अपने पिता कि योजना पर पूरा भरोसा था। परन्तु एक मनुष्य होते हुए उसे अपने दोस्तों कि आवश्यकता थी।

फिर थोड़ा आगे बढ़ने के बाद वह धरती पर झुक कर प्रार्थना करने लगा। उसने कहा,“हे मेरे परम पिता यदि हो सके तो यातना का यह प्याला मुझसे टल जाये। फिर भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं बल्कि जैसा तू चाहता है वैसा ही कर।”

स्वर्ग से एक दूत आया और उसने यीशु को सामर्थ दी। यीशु ने, परमेश्वर का क्रोध जो इंसान के पापों के कारण था, अकेला ही सहा। हमारे पापों को क्रूस तक ले जाने के लिए, उसने परमेश्वर कि सामर्थ का सहारा नहीं लिया। उसने परमेश्वर पिता के आगे पूरी आज्ञता में उसे पूरा किया। यह वो आज्ञाकारिता थी जो कोई भी इंसान नहीं कर सकता था। वे अपने पापों के बोझ के नीचे दब जाते। वह जो योग्य था और पूर्ण रूप से पवित्र था, केवल वही पाप और मृत्यु पर जय पा सकता था। उसके महान प्रेम के कारण, वह ऐसा करने में सक्षम था।

यीशु इतना ज़यादा तनाव में था कि उसका शरीर भी उसे सहन नहीं कर पाया। जब वह उस पीड़ा में प्रार्थना कर रहा था, उसका पसीना लहू कि बूँदें बनकर बह रहा था। जब वह अपने पिता से प्रार्थना कर रहा था वे धरती पर गिर रहे थे।

फिर वह अपने शिष्यों के पास गया और उन्हें सोता पाया। वह पतरस से बोला,“सो तुम लोग मेरे साथ एक घड़ी भी नहीं जाग सके? जगते रहो और प्रार्थना करो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो। तुम्हारा मन तो वही करना चाहता है जो उचित है किन्तु, तुम्हारा शरीर दुर्बल है।”

अपने दुःख के बीच में, यीशु ने कितने विनम्रता और समझ के साथ अपने चेलों पर दया दिखाई। एक बार फिर उसने जाकर प्रार्थना की और कहा,“हे मेरे परम पिता, यदि यातना का यह प्याला मेरे पिये बिना टल नहीं सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।” परन्तु परमेश्वर के क्रोध के प्याले को केवल यीशु ही अपने बलिदान के द्वारा संतुष्ट कर सकता था। तब वह आया और उन्हें फिर सोते पाया। वे अपनी आँखें खोले नहीं रख सके। वे नहीं जानते थे कि वे यीशु को अपनी दूसरी असफलता के लिए क्या बोलें।

सो वह उन्हें छोड़कर फिर गया और तीसरी बार भी पहले की तरह उन ही शब्दों में प्रार्थना की। परन्तु और कोई रास्ता नहीं था। इस श्राप कि समस्या का समाधान केवल उसका प्राण था। यदि वह अपने जीवन को बलिदान नहीं करता, तो और कोई भी नहीं कर पाता। सब कुछ नाश हो जाता। केवल वही सबको बंधन से छुड़ा सकता था। और इसलिए उसने अपने पिता कि इच्छा को स्वीकार किया।

हमारे लिए यह समझ बहुत कठिन है कि यीशु ने “हाँ” किसके लिए बोला होगा। उसका शरीर ऐसी कष्टदायी पीड़ा से गुज़रेगा जो कभी किसी मनुष्य ने ना सहा होगा। वह पाप और म्रत्यु के बोझ को उठाएगा क्यूंकि उसने परमेश्वर के क्रोध को अपने ऊपर ले लिया था। उस कष्टदायी पीड़ा को यीशु क्रूस पर तब चढ़ाए रखेगा जब तक वह उसकी पूरी कीमत नहीं। जो हमारे ऊपर अनतकाल तक के लिए आता यीशु ने एक ही दिन में समाप्त कर दिया। हम युगानुयुग तक उसकी उपासना करते रहेंगे उस कीमत के लिए जो उसने हमारे लिए चुकाई है।