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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १७४: कब्र और इंतज़ार की घड़ी 

मत्ती २७:५७-२८:८, मरकुस १५:४२-१६:११, लूका २३:५०-२४:११, यूहन्ना १९:३८-४२

Cementary of  Pere Lachaise in Paris

मसीह के शरीर को क्रूस से उतार लिया गया। एक आदमी था जिसका नाम था अरिमथिया का यूसुफ़ था, जो यीशु पर विश्वास करता था और गुप्त में उसका चेला था। वह एक सच्चा शिष्य था, लेकिन वह महासभा का भी सदस्य था। परमेश्वर के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की नफरत इतनी ज्यादा थी कि यूसुफ इस बात का खुलासा करने में डरता था। अगर वे उसके खिलाफ हो गए, तो वह सब कुछ खो देगा।

उस दिन के भयानक अन्याय पर उसे कितना शोक हुआ होगा . . ये वह आदमी थे जिसके साथ उसने अपना जीवन बिताया था। वह उस ज़माने के कुलीन वर्ग थे जिसकी वजह से उसने अपने विश्वास को दबा के रखा था। उसे उनके प्रतिघातक व्यवहार से कितनी घृणा होती होगी। मसीह के लिए खड़े होने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। कम से कम वो उसकी मौत में उसे सम्मान दे सकता था। सप्ताह की घटनाए ऐसे थी कि यह खबर, कि महासभा का एक सदस्य यीशु को इतना सम्मान दे रहा है, पूरे इस्राएल में फैल जाती। इसको दुश्मन के साथ दोस्ती के रूप में देखा जाता। लेकिन यूसुफ पेंतुस पीलातुस के पास गया और मसीह के शरीर को दफ़नाने के लिए इजाज़त मांगी। एक बार फिर, इस आदमी यीशु के मामले पीलातुस के सामने आए। उसने अपनी सहमती इस आदमी को दे दी जो स्पष्ट रूप से यीशु का भक्त था।

यूसुफ मसीह का शरीर मांगने गया। निकोदेमुस मदद के लिए आया था। वह अपने साथ चौतीस किलो मुसब्बर लोहबान लाया, वो सामग्री जो यहूदी मृत के संरक्षण के लिए परंपरागत रूप से प्रयोग करते थे। निकोदेमुस भी मसीह का एक शिष्य था, और यूसुफ की तरह, उसने भी इसे छिपा रखा था। वो रात में प्रभु से सवाल पूछने के लिए आता था क्यूंकि उसे डर था कि इस बात को जानने के बाद कि वो यीशु पर विश्वास करता है, नेतृत्व उसके साथ कुछ भी कर सकती है। नेतृत्व का रोष कम नहीं हुआ था, लेकिन मसीह के उज्ज्वल पवित्रता के खिलाफ उनके महान अपराधों ने निकोदेमुस को कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा। उनकी मृत्यु में भी, प्रभु यीशु उसकी वफादारी के हकदार थे। वो उन सभी बातों के लिए खड़ा होगा जो यीशु था। वह उसको अब आदर देगा, चाहे उसकी कोई कीमत क्यों न हो।

उन्होंने यीशु का शरीर लिया और उसे चादर के साथ मसाले में बाँधा। जिस जगह यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, उसके पास एक बगीचा था। वहां एक कब्र थी जिसमे किसी को भी पहले दफन नहीं किया गया था। यह जगह जाने माने, अमीर लोगों की अंतिम विश्रामस्थल थी। और क्यूंकि यह कबर क्रूस के पास थी, यह लोग सूर्यास्त और सबत से पहले, यीशु के शरीर को तरीके से दफना सके। एक बार फिर, उन्होंने अनजाने में वचन की पूर्ती की। यशायाह 53:9 में लिखा है: “और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का अपद्रव न किया या और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।”  जब वे कब्र में मसीह को छोड़ कर निकल रहे थे, उन्होंने एक बड़े पत्थर को प्रवेश द्वार पर लुढ़का दिया। मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम उनके पीछे आए ताकि वह यह जान सके कि मसीह को कहाँ दफनाया गया था। तब वे मसाले खरीदने के लिए बाहर चली गई। वे यीशु को एक उचित दफन देने साबत के बाद लौटने को थी।

शुक्रवार शाम हो गई, और फसह का सबत शुरू हुआ। इसराइल भर से परिवार जो सफ़र करके आए थे, वो अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साथ जश्न मनाने और आराम करने के लिए एक साथ इकट्ठे हुए। शनिवार की बाकी भी ऐसे ही गई। किसी को कोई काम नहीं करना था। पूरा देश अपने परमेश्वर के अद्भुत काम का लुप्त उठाने का अवकाश ले रहा था। यरूशलेम  में एक दिन पहले, शहर को उल्टा करने वाली घटनाओं से उनका दिमाग भरा हुआ था। क्या उनमें से किसी के पास यह देखने के लिए आँखें थी कि यह सब परमेश्वर के सबसे बड़े काम का उत्प्रवाह है?

जबकि इसराइल में बाकी सब सबत का सम्मान कर रहे थे, फरीसी और महायाजक व्यस्त थे।उनके पास कुछ काम था। यीशु ने कब्र से फिर से उठने का दावा किया था। क्या या हो सकता था कि उसके चेले उसके जी उठने की जालसाजी कर रहे हो? इससे उनको यह सब साफ़ करने के लिए एक नया झंझट पैदा होगा! वे सालों के लिए यह विधर्म लड़ते रहेंगे। कैसी विडंबना है कि यह मनहूस नेताओं ने मसीह के शब्दों को याद किया। उसके अपने ही शिष्य यह पूरी तरह से भूल गए थे! वे ऐसी आशा के लिए दु: ख में निगले हुए थे। लेकिन यहूदी नेता यह नहीं जानते थे और वे एक और अनुरोध के साथ पिलातुस के पास वापस गए।

हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमानेवाले ने आपको जीते जी कहा या, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। 
सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहनें लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।  -मत्ती २७:६३-६४

कल्पना कीजिए कि यह अनुरोध सुनके पिलातुस को कैसा लगा होगा। यह यीशु जो एक अदृश्य देश का राजा होने का दावा कर रहा था, वही यीशु मरे हुओं में से जिंदा होने को दावा कर के गया था। वह इस सब से क्या समझे? पिलातुस ने उन्हें देखा और कहा, “‘तुम्हारे पास एक गार्ड है। जाओ और उस जगह को सुरक्षित कर लो, जैसे तुम जानते हो।”

अगर यहूदी नेता सही थे, और चेले एक धोखाधड़ी करना चाहता थे, उन्हें उच्च प्रशिक्षित, भारी हथियारों से लैस रोमन सैनिकों के सामने होकर गुज़ारना होगा। इसकी संभावना नहीं थी। यीशु के चेले वही आदमी थे जो बगीचे में भाग गए थे। क्या वे वास्तव में, सैनिकों को उनके स्वामी को क्रूस पर चढ़ाने के बाद देखकर, इतनी साहस जुटा पाते कि वो उन भयानक पहरेदारों का सामना कर सके? कोई भी आम नागरिकों की टोली, तैनात रोमी सैनिकों के सामने से नहीं गुज़र सकती थी; यह अनसुना था। पिलातुस यह जानता था कि अगर यह एक धोखा था, कब्र खाली होने का कोई रास्ता नहीं था।  दूसरी ओर अगर यीशु वास्तव में वही थे जिसका वो दावा कर रहे थे, तो सभी दांव अमान्य थे। अगर यीशु दिव्य थे, तो कब्र पर तैनात कितने सैनिक थे, इस बात का कोई महत्व नहीं था।

कहानी १६८: वापस पिलातुस के पास 

Jerusalem - Jesus judgment for Pilate ceramic tiled cross way station

मत्ती २७:१५-२६; मरकुस १५:६-२०; लूका २३:१३-२४; यूहन्ना १८:३८-१९:१६

हेरोदेस, मसीह के मामले में, किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने में सक्षम नहीं था, इसलिए उसने यीशु को पिलातुस के पास वापस भेज दिया। अब, पिलातुस की यहूदी लोगों के साथ एक परंपरा थी। हर फसह के पर्व पर, वह उनसे किसी एक कैदी की रिहाई का अनुरोध लेता, और वह उसे मुक्त कर देता। उस समय, रोमीयों ने बरब्बा नाम के एक खुख्यात अपराधी को कैदी बनाया था। वह एक यहूदी विरोध आंदोलन का हिस्सा था जो यहूदिया पर रोमन सरकार की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था। उन्होंने पिलातुस के खिलाफ विद्रोह छेड़ी हुई थी। बरब्बा ने इस प्रक्रिया में हत्या और डकैती भी की थी। लेकिन यहूदी लोगों को उसके कारण से सहानुभूति थी। वे रोमी शासन से नफरत करते थे, और इसलिए बरब्बा अपने साहसी, घातक कारनामे के लिए उनके लिए एक हीरो था।

यहूदी इस फसह के कैदी को रिहा करवाने के लिए, पिलातुस से मांग करने के लिए एकत्र हुए। इस बीच, पिलातुस ने धार्मिक नेताओं और महायाजकों को बुलाया और यीशु के विषय में कहा, “‘तुम इस आदमी को लाए हो, यह कहते हुए कि यह विद्रोह करने के लिए लोगों को उकसाता है; और तुम्हारे सामने इसे जांचने के बाद, देखो, मैं इस आदमी को तुम्हारे आरोपों के बल पर, दोषी नहीं पाता हूँ। और न तो हेरोदेस ने, क्यूंकि उसने हमें इसे वापस भेजा। ेदेखो, इसने मौत के योग्य कुछ नहीं किया है।” पिलातुस को इस बात का एहसास था कि इन लोगों का यीशु को उनके समक्ष लाने का एक ही कारण था – ईर्ष्या। उनकी ईर्ष्या एक निर्दोष आदमी को मारने के लिए कोई कारण नहीं था।

पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और अपने सिंघासन पर बैठ गया। उसने पूछा: “तुम रिहाई के लिए किसे चाहते हो? बरब्बा या यीशु, जो मसीह कहलाता है?” निश्चित रूप से भीड़ उपदेशक के पक्ष पर होगी!

जब पिलातुस वहां बैठा हुआ था, उसे अपनी पत्नी से एक संदेश प्राप्त हुआ। “‘उस धर्मी आदमी के साथ कुछ नहीं करना, क्यूंकि कल रात मैंने उसकी वजह से एक सपने में काफी पीड़ा उठाई।'”

इस बीच, महायाजक और पुरनी, भीड़ के बीच में बाहर जा कर, उन्हें यीशु के बजाय बरब्बा की रिहाई के लिए उकसा रहे थे। वे यीशु को मार डालने की मांग के लिए उकसा रहे थे। उनकी शातिर नफरत कैसी सक्रिय थी!

पिलातुस ने कहा: “‘इन दोनों में से तुम किसे रिहा चाहते हो?'”

“‘इस आदमी को दूर कर दो!'” भीड़ बोल उठी, “और हमें बरब्बा रिहा कर दो!'”

पिलातुस ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे यीशु को लेजाकर चाबुक के साथ कोड़े लगाए। अगर धार्मिक नेता यीशु को अपमानित और दंडित होते देखते, तो शायद वे संतुष्ट हो जाते।

सैनिक पूरे दिन इस यीशु की अफवाहें सुन रहे थे। जब तक उन्हें सैनिकों के पास लाया गया था, यह आरोप अच्छी तरह से जाना जा चुका था कि वह राजा होने का दावा कर रहे थे। यह एक नीच, छोटे यहूदी के लिए इतनी हास्यास्पद बात थी, कि वे उसके बारे में ठठ्ठा उड़ाने के प्रलोभन को रोक नहीं सके। अपने अंधेरे आत्माओं की हिंसा और द्वेष में, उन्हें यीशु को चाबुक से मारने में इतनी प्रसन्नता मिली कि  यीशु का रक्त उनकी पीठ से नीचे बह गया। जब तक वो यह सब कर चुके थे, यीशु की पीठ पर मांसपेशियों, हड्डियों से अलग होकर फट गई थी। लेकिन रोमी सैनिकों की क्रूर बर्बरता अभी तक संतुष्ट नहीं हुई थी। उनमें से कुछ लम्बे कांटों के साथ शाखाए काटने चले गए। उन्होंने उसका मुकुट बुना और उनके सिर पर उसे कुचल दिया। तब उन्होंने एक शाही बैंगनी रंग का एक वस्त्र उसके नुचे, लहू-लुहान पीठ पर डाल दिया। “जय हो, यहूदियों के राजा!” उन्होंने कहा और उन्हें उग्र अवमानना ​​के साथ चेहरे पर मारने लगे।

सैनिक यीशु को पिलातुस के पास वापस लाए। जो यातना मसीह ने सही, वो स्पष्ट थी। निश्चित रूप, से यह पर्याप्त होगा। पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और कहने लगा: “‘सुनो, मैं उसको तुम्हारे सामने वापस ला रहा हूँ, ताकि तुम जानो कि मै उसमे कोई दोष नहीं पाता हूँ।” तब यीशु को लोगों के सामने बाहर लाया गया। रक्त उनके सिर पर कांटों के ताज से बह रहा था, और बैंगनी वस्त्र उनके खूनी पीठ से चिपक गया था। पिलातुस ने कहा: “‘देखो इस आदमी को'”। उसकी यह आशा थी कि यीशु को इस तरह की भयानक स्तिथि में  देखने के सदमे के बाद, वे नरम होंगे और उनकी रिहाई के लिए मांग करेंगे। लेकिन भीड़ ने ऐसा नहीं किया। “‘मैं यीशु अर्थार्त, यहूदियों का राजा के साथ क्या करू?'” उन्होंने पूछा।

महायाजक चिल्लाने लगे, “उसे क्रूस पर चढ़ा दो, उसे क्रूस पर चढ़ा दो! ‘” भीड़  भी शामिल हुई। लोगों का रोष बड़ता जा रहा था।

” क्यों? इसने क्या दुष्कर्म किया है? मैंने उस में मौत की मांग लायक कोई दोष नहीं पाया है, इसलिए मैं उसे सज़ा देकर उसे रिहा कर दूंगा,'”पिलातुस ने कहा। लेकिन भीड़ काबू से बाहर हो गई। “‘उसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” वे चीखने लगे।

इस अव्यवस्था के बीच में, कुछ यहूदियों ने बताया: “‘हमारा एक कानून है, और उस कानून के अंतर्गत, उसे मरना चाहिए क्यूंकि उसने खुद को परमेश्वर का बेटा बोला है।'”

इसने पिलातुस को और डरा दिया। यीशु ने पहले से ही उसको बोला था कि वो किसी और जगह का एक राजा था, और उसकी पत्नी को उसके बारे में सपने आ रहे थे। वो वहां गया जहाँ यीशु को रखा जा रहा था और उनसे पूछा: “‘तुम कहां से हो?'”

लेकिन यीशु ने उसे जवाब नहीं दिया। पिलातुस क्रोध के साथ बोला: “‘तुम मुझसे बात नहीं करते? क्या तुम नहीं जानते कि मेरे पास तुम्हे रिहा करने का अधिकार है या क्रूस पर चढाने का अधिकार है? ”

यीशु ने उससे कहा: “यह अधिकार आपको ऊपर से दिया गया था, नहीं तो आपका मेरे ऊपर कोई अधिकार नहीं होता; इस कारणवश, जिसने मुझे पकड़वाया है, उसका पाप ज्यादा महान है।”

वाह। मसीह की आश्वास विश्वास की लहर उनके हर शब्द में थी। यह लहर उनकी चुप्पी में भी थी। पिलातुस का यह गलत मानना था कि वह उस दिन का सबसे उच्च अधिकारी था।  यीशु ने उसे बताया कि वास्तव में, पिलातुस ने अपना अधिकार परमेश्वर से प्राप्त किया था।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो उसने यीशु को बचाने के लिए और अधिक से अधिक प्रयास करना शुरू किया। लेकिन यहूदियों का रोष अधिक बढ़ रहा था और वो नियंत्रण से बाहर हो रहे थे। उसे इस बात का एहसास हो गया था कि वो एक दंगा शुरू करने वाले है। कुछ यहूदियों ने कहा: “‘अगर आप इस आदमी को रिहा करते हैं, तो आप कैसर के कोई दोस्त नहीं हैं। जो कोई भी खुद को राजा प्रतीत करवाता है, वो कैसर का विरोध करता है।”

उनके शब्दों रोम के कैसर के प्रति वफादारी के शब्द नहीं थे। यहूदी, सम्राट से उतनी नफरत करते थे जितनी वे पीलातुस और हेरोदेस से करते थे। वे एक खतरा बन रहे थे। अगर पिलातुस ने यीशु को क्रूस पर नहीं चड़ाया , वे इसका एक मामला बना कर रोम तक खीचते। वे उस पर सम्राट के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगाते।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो वह बाहर जा कर सिंघासन पर फिर से बैठ गया। इस समय तक, सुबह के शुरुआती घंटे बीत गए थे और दोपहर हो रही थी। मंदिर में फसह उत्सव का जश्न पूरे जोर शोर था। दोपहर में, फसह के भेड़, पंद्रह सौ साल पहले मिस्र में उस अंधेरी रात में इस्राएल के पहलौठे बेटों को बचाए जाने खून की याद में कुर्बान कर दिए जाएंगे। यह राष्ट्र के लिए के लिए रास्ता बनी। अब परमेश्वर का पहलौठा पुत्र, सभी राष्ट्रों के उद्धार को लाने के लिए अपने खून को भेट कर देंगे।

पिलातुस ने यीशु को लोगों के सामने बाहर बुलाया – “‘देखो, तुम्हारा राजा!'” उसने कहा।

“‘इसको हमारे से दूर कर दो, इसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” लोग चीखने लगे। भीड़ का उन्माद बहुत बड़ गया था।

“‘क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चड़ा दूँ?” पिलातुस ने पूछा।

महायाजकों ने कहा – “‘हमारा, केसर को छोड़, कोई राजा नहीं है!”

वाह। इस्राएल के देश के महायाजकों ने परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकृत घोषित कर दिया। उनकी आवाज, पिलातुस की निर्दोष आदमी को मौत की सज़ा सुनाने की अनिच्छा पर विजय प्राप्त करने लगी। यह स्पष्ट था कि अब कुछ नहीं किया जा सकता था। पिलातुस ने थोड़ा पानी लिया और उस अराजक, उग्र भीड़ के सामने अपने हाथ धोए। “‘मैं इस आदमी के रक्त से निर्दोष हूँ'” उसने घोषणा की। “‘अब इस मामले को खुद ही देख लो।'”

भीड़ वापस चिल्लाई – “‘उसका खून हम पर और हमारे बच्चों पर हो!'”

तब पिलातुस ने यीशु के खिलाफ, मौत की सज़ा सुनाई। धार्मिक नेताओं और भीड़ की मांगों को स्वीकृत किया जा रहा था। बरब्बा को स्वतंत्र कर दिया गया, लेकिन यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए दे दिया गया।

कहानी १६५: महायाजक के लिए एक अँधेरी रात 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

roman soldier and prisoner

यीशु को अन्नास के घर से कैफा के घर ले जाया गया। पतरस अभी तक पीछे पीछे आ रहा था। जैसे ही यीशु को महासभा के उन सदस्यों के समक्ष लाया जा रहा था जो इतनी रात वहां आए, पतरस आँगन में चला गया। वह अधिकारियों के साथ, आग के पास, बैठ गया ताकि उसे परिणाम पता चले, और उसे अपने प्रभु के साथ खड़ा होने के लिए अवसर मिले।

जब यीशु को लाया गया, तो महासभा ने एक के बाद एक गवाह खड़े किये जो उसके विरुद्ध साक्षी दे। उनकी कहानियाँ झूठी थी, और उनके शब्द एक दूसरे के साथ सहमत नहीं थे। वे इतने असंगत थे कि उन्होंने एक के बाद एक रद्द कर दिया गया। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, एक व्यक्ति दोषी तब पाया जाता जब दो गवाह एक ही आरोप के साथ सामने आए। यह नहीं हो रहा था, तो वे और अधिक गवाह लाए। किसी की गवाही यीशु को मौत की सज़ा सुनाने के लायक नहीं थी, और इस्राएल के शासक इससे कम कुछ नहीं चाहते थे। यीशु को मरना था। अंत में, एक गवाह आगे आया और यह दोष लगाया कि यीशु ने यह घोषणा की थी कि वह परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा। प्रभु ने कहा था कि वह तीन दिनों में मानव हाथ के बिना इसका पुनर्निर्माण करेंगे। हम जानते है कि यीशु अपने शरीर के बारे में बात कर रहे थे। वह नष्ट होने जा रही थी क्यूंकि यीशु ने अपने को परमेश्वर के हाथों सुपुर्ट किया। लेकिन यीशु को तीन दिन में पूर्णतः, जीवते प्रभु के हाथों जिला लिया जाएगा! यीशु के खिलाफ उनकी झूठी गवाही के द्वेष में, उन्होंने उसी रात इस सच्चाई की घोषणा की थी, लेकिन उनकी आँखे देखते हुए भी बहुत अंधी थी!

सच्चाई में, इन आरोपों का वास्तव में कोई मायना नहीं था।यह शासक उसे मारने के लिए उत्सुक थे, और अगर इस आरोप से उनकी बात नहीं बनी, तो वे एक और की खोज करते। तो यीशु ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। उसके आसपास के वातावरण के चेहरे में उनकी शांत, आश्वस्त संकल्प की कल्पना कीजिये।

महायाजक व्यथित था। वह उठ खड़ा हुआ और यीशु के पास गया। “‘क्या तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं हैं? यह क्या है जो यह लोग तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहे है? ”

यीशु चुप रहे। महायाजक ने खिज में आकर कहा: “‘मैं तुम्हें जीवते परमेश्वर से शपथ खा कर पूछता हूँ कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम मसीह, परमेश्वर के पुत्र हो?'”एक बार फिर, यीशु के दुश्मनो ने उसके बारे में सच की घोषणा की –  ठीक उसी कार्यवाही में जिसमे उसे दोषित किया जा रहा था। इस बार, यीशु ने जवाब दिया:

“” आप खुद ही कह चुके हैं, फिर भी, मैं आपको बताता हूँ; इसके बाद आप मनुष्य के पुत्र को शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठे देखेंगे, और आकाश के बादलों पर आते हुए देखेंगे।”

वाह! यीशु ने यह घोषित कर दिया कि वो न केवल मसीहा था। वह मनुष्य का पुत्र भी था! यह शब्द पुराने नियम से था। इसका मतलब यह था कि वह शक्ति और महिमा में दिव्य होने का दावा कर रहे थे! वो परमेश्वर के साथ एक होने का दावा कर रहे थे!

जब महायाजक ने यह सुना, तो वह जान गया कि उसके पास वो था जो वह चाहता था। उसने अपने हाथों से अपने याजकी पहनावे को पकड़ा और उसे फाड़ा। यह उसके चरम अपकार और यीशु के हर शब्द की पूर्ण निंदा की घोषणा थी। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से जो अपने महायाजकों के लिए वस्त्र ठहराया था, उसे कभी फाड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा, जिसके लिए उसे थोड़ा सम्मान भी नहीं था, उसकी परेशानी का कारण नहीं थी।

लेकिन सच में, अब किस बात का मायना था? व्यवस्था जिस पवित्रता को  इन पापी याजकों के द्वारा पूरा नहीं कर सका, वो अब यीशु में पूरी तरह से सफल होने जा रही थी। अपने विद्रोह में, कैफा ने परमेश्वर का यंत्र बनके, कानून का अंत, मंदिर में आराधना, और उस वाचा को परिपूर्ण किया जो इस आदमी को सशक्त कर रही थी। अपने जीवन पर पकड़ रखने के लोभी रोष में, वह उसे खो रहा था।

“‘इसने परमेश्वर के विरुद्ध बोला है!'”उसने पागलों की तरह घोषणा की। “‘हमें आगे गवाहों की क्या ज़रूरत है? देखो, तुमने इसके शब्द सुने है; तुम क्या सोचते हो? ‘”महासभा के बाकी लोग बोल पड़े: “‘ वह मौत के योग्य है!”

फिर अपने शातिर गुस्से में, उन्होंने अपनी मुट्ठी से उसे पीटा, उसके चेहरे पर थूका, और थप्पड़ मार कर उसे अपमानित किया। और जब यह सब हो रहा था, प्रभु अपने सम्मानजनक ताकत में वहां खड़े रहे  – उस प्याले को सहन करते हुए जो उसके पिता ने उसे दिया था।

इस दयनीय अन्याय के बीच में, पतरस आग के पास अपने हाथ, आंगन में सेक रहा था। कैफा की एक नौकरानी ने उसके पास जाकर उसके चेहरे को बारीकी से देखा। “‘क्या तुम भी यीशु गलीली के साथ थे?'” और सब के सामने उसने घोषणा की: “मैं नहीं जानता तुम किस बारे में बात कर रही हो। ‘” फिर वह उठकर  प्रवेश द्वार से बरामदे पर चला गया। क्या वह बच निकलने का रास्ता तलाश रहा था? हालात उसके स्वामी के लिए अच्छा नहीं लग रहे थे। एक और नौकरानी पतरस के पास आई और उससे कहने लगी: “‘तुम भी उनमें से एक हो!’

पतरस ने कहा: “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता!’ उस दबाव की कल्पना कीजिये जो उसने महसूस किया होगा।

एक और घंटा बीत गया, और मसीह की कार्यवाही बदतर होती जा रही थी।  इन भयानक पुरुषों के जब उसके प्रभु को ठूस ठूस कर पीता होगा, तो पतरस का दिल कितना टूटा होगा। वह क्या कर सकता था? वह इसका हल निकालने के लिए क्या कर सकता था? वह अब अपनी वफादारी को कैसे दिखा सकता था? हजारों विचार उसके दिमाग में चले होंगे, लेकिन मानो उसे लकुआ मार गया हो। दासों में से एक ने पतरस को देखा और कहा: “‘निश्चित रूप से आप भी उनमें से एक हैं क्यूंकि आप एक गलीली है।” यह दास यीशु की गिरफ्तारी के लिए बगीचे में मौजूद था। जिसका कान पतरस ने काटा था, यह उसका चचेरा भाई था, और उसे यकीन था कि यह इसी आदमी ने किया था!

पतरस कसम और श्राप के शब्द, झूठे गुस्से के साथ बोलने लगा – ठीक उसी प्रकार जब किसी को एक झूठ में पकड़ा जाता है। “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम बात कर रहे हो!'” तुरंत, एक मुर्गा ने बांग दिया। प्रभु ने भी इसे अच्छी तरह से सुना, और अपने अराजक कार्यवाही के बीच में पतरस की ओर देखा। पतरस को यीशु की बात याद आई जो उन्होंने बस कुछ घंटे पहले ही ऊपरी कक्ष में बोली थी। “‘मुर्गा कौवे से पहले, तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” सबसे खराब विफलता सच हो गई थी। पतरस उठकर बाहर चला गया और फूट फूट कर रोने लगा।

धार्मिक शासक अपने रोष में आगे बड़ते गए। किसी ने यीशु  के आंखों के चारों ओर एक पट्टी बाँधी। तब उन्होंने प्रभु को पीटा और उसे थप्पड़ मारा, और कहा:  “‘भविष्यवाणी कर, तू तो मसीह है, तो बता किसने तुझे मारा?'”

उनके असीम नफरत और शातिर दुष्टता पर ख़ुशी की कल्पना कीजिये। आखिरकार, उनके पास इस लोकप्रिय युवा शिक्षक के प्रति सालों के असंतोष और नफरत व्यक्त करने की शक्ति मिली – और वे अपनी घृणा में इतने एकजुट थे कि किसी को यह काम में शर्म नहीं आई। और जैसे वो उस परमेश्वर की निंदा कर रहे थे जिस पर वो परमेश्वर की निंदा का दोष लगा रहे थे – परमेश्वर वहां शांत बल में खड़े रहे, अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए और उस प्याले को पूर्णता से पीते हुए।

कहानी १६४: अन्नास के घर में प्रभु 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

Accusation of Jesus on Good Friday

रात की शांति में, उसके चेलों थके हुए नींद में गिर गए। यीशु प्रार्थना में अपने पिता के पास चले गए। तीन बार उन्होंने वह बोझ हटा देने को माँगा। क्या पिता इस काम को हटा सकते थे? क्या यीशु किसी तरह आने वाली पीड़ा को आने से रोक सकते थे? क्या उन्हें परमेश्वर का वह प्रकोप का प्याला पीना ही पड़ा था? क्या यह सुचमुच मनुष्य के उद्धार एक ही रास्ता था? कल्पना कीजिये पिता के अस्सेम प्यार की जब उन्होंने मानव जाति के उद्धार को अपने बेटे से आगे रखा और कहा: “तुम एक ही रास्ता हो।” पुत्र की दिल से, परिपूर्ण प्रेम और समर्पण की कल्पना कीजिये जब उसने अपने ऊपर उस दंड को ले लिया जो हम सब को लेना था।

महायाजक और सिपाही जब यीशु को गिरफ्तार करने के लिए आए, लड़ाई पहले ही जीती हुई थी। परमेश्वर के पुत्र ने पहले से ही अपने आप को दीन किया और परमेश्वर के सामने अपने आप को शून्य किया। उनको पूरी तरह से दूसरी तरफ महिमा का आश्वासन था, और वो इस अंधेरे में पिता की सेवा करेंगे। परमेश्वर उन्हें सर्वोच्च स्थान पर, स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान करेंगे। यीशु का नाम हर नाम से ऊपर होगा, और स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हर घुटना उसके सामने झुकेगा, और हर एक जीभ इस बात का अंगीकार करेगी कि यीशु मसीह हर बात पर प्रभु है। और पुत्र को दिया यह भव्य सम्मान उनके महान प्रेम के पिता को सम्मान और गौरव देगा।

जब यीशु ने क्रूस का सामना किया, उन्हें पता था की यह सब बाते दूसरी ओर है। उसे गिरफ्तार करने जो पुरुष बगीचे में आए थे, वे इस गलत सोच में थे कि वह आने वाली घटनाओं को साकार करना उनकी शक्ति में था। यीशु ने जब अपने को उन विषैली हमलों और शारीरिक शोषण के पीड़ा में खुद को सौप दिया, वह सभी पर प्रभु बने रहे।

शमौन पतरस और शिष्य अपने विश्वास में बढ़ रहे थे, लेकिन उनके पास उस पल की घटनाओं से परे देखने की दृष्टि नहीं थी। जब शमौन पतरस तलवार के साथ आगे बड़ा, उसने एक पल के लिए हिंसा की भयावहता को आमंत्रित किया, जो एक समर्पण का पल था। यीशु ने संघर्ष के अंत की आज्ञा दी और उस आदमी के कान को चंगाई दी जिस पर पतरस ने हमला किया।

फिर वह गिरफ्तार करने वाले आदमियों के ओर मुड़े और बोले: ‘क्या तुम मुझे गिरफ्तार करने के लिए तलवार और लाठियों के साथ आए हो, जैसे कि मै कोई चोर उचक्का हूँ? हर दिन मैं मंदिर में शिक्षण देते तुम्हारे साथ था, और तुमने मुझे गिरफ्तार नहीं किया; लेकिन यह इसलिए हुआ है ताकि इंजील पूरी हो सके। इस समय और अंधेरे की शक्ति तुम्हारी हैं।”

जब चेलों ने यीशु को सुना और देखा कि वह आत्मसमर्पण कर रहे है, वे घबरा कर भाग गए। कल्पना कीजिये कि धार्मिक शासकों ने कैसे उसका ठठ्ठा उड़ाया होगा जब सैनिकों ने यीशु के हाथों और पैरों पर बेड़ी डाली होगी। जब वे उसे ले जा रहे थे, तो एक जवान आदमी उसके पीछे आया था। उसने एक चादर को छोड़कर कोई कपड़े नहीं पहने थे। जब सैनिकों ने देखा कि वो यीशु का एक दोस्त था, उन्होंने उसे गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन वह चादर पीछे छोड़कर भाग गया। वह उस ठंडी रात में नग्न चला गया – अपने प्रभु के हाल देख कर तहस – नहस।

भीड़ अंधेरे में अन्नास के घर की ओर बड़ी, जो इस्राएल पर एक पूर्व महायाजक था। वो कैफा का ससुर था – कैफा एक महायाजक था। वो कैफा ही था जिसने यह घोषणा की कि देश को बचाने के लिए, मसीह के लिए मरना बेहतर था। अगर रोमी यीशु के बढ़ाए हुए उत्तेजना से थक जाते, तो वे अपनी स्वतंत्रता के सभी पहलों पर रोक टोक लगाते। यह, ज़ाहिर है, हास्यास्पद था। रोमियों ने न तो मसीह की यात्राओं न उनके सन्देश पर कोई चिंता दिखाई थी। लेकिन यह एक अच्छा बहाना था। इस महायाजक को क्या पता कि उसकी विषैली घोषणा वास्तव में परमेश्वर से एक भविष्यवाणी थी।

कैफा का मसीह के प्रति द्वेष का असली कारण ज्यादा निजी था। वह ईर्षापूर्ण था। वह एक लम्बे समय से प्रतिष्ठा और प्रभाव के एक परिवार से आता था। उन्हें सत्ता चलाने और देश की दिशा को नियंत्रित करने की आदत थी। यह युवा उपदेशक उनके इस कार्यवाली में एक खतरा था – और इसे रस्ते से हटाना था। अब उसे और राष्ट्र की घाटियों और दरारें में आसपास चुपके, अज्ञानी भीड़ में घुलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उसे आखिरकार उन लोगों का सामना करना था जिसके नेतृत्व की अवहेलना उसने अपने शर्तों पर करने की हिम्मत की थी। कितनी दुष्टतापूर्वक कैफा और उसके साथी शासकों ने उनको अपमानित करने के चस्के का स्वाद लिया होगा।

शमौन पतरस अपने प्रारंभिक आतंक से बाहर निकल गया था। उसने भीड़ का पीछा किया ताकि वो आने वाली घटनाओं के खुलासे पर नजर रखे। यूहन्ना भी साथ आया था। वो अन्नास के घर में जाना जाता था, तो जब  यीशु को पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा था, उसे रियासत पर आने की अनुमति दी गई थी। पतरस को बाहर इंतजार करना पड़ा, लेकिन यूहन्ना को  उसके लिए द्वारपाल के पास जाना पड़ा। जब पतरस उसके लिए बाहर इंतजार कर रहा था, वहीं दरवाजे पर काम करने वाली एक छोटी गुलाम लड़की उसके पास आई और कहने लगी, “‘क्या आप भी इस आदमी के शिष्यों में से एक नहीं हैं, हैना?” क्षण भर की प्रतिक्रिया में पतरस ने कहा:  “मैं नहीं हूँ। ‘”उसने सोचने से पहले ही, पहली बार अपने प्रभु का इनकार किया था।

यूहन्ना पतरस को दरवाज़े के अंदर ले जा पाया, तो पतरस आंगन में चला गया और दास और सैनिकों के साथ खुद को गर्म करने के लिए कोयले की  आग के पास खड़ा हो गया।

इस बीच, अन्नास ने यीशु से उसके चेलों और उसके सिखाए संदेशों के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की। यीशु ने उसे वापस देखा और तथ्य प्रदान किये:  मैंने हमेशा खुल कर स्पष्टता से बोला है, मैंने सभाओं में पढ़ाया है, और मंदिर में, जहाँ सभी यहूदी एकत्रित होते हैं, और मैंने कुछ गुप्त में नहीं बोला है। आप मुझसे सवाल क्यूँ करते हैं? उनसे सवाल करिए जिन्होंने वो सुना जो मैंने  कहा। उन्हें पता है जो मैंने कहा।”

इस पर एक अधिकारी ने यीशु को मारा और भोहे चडाकर कहा: “‘क्या तुम इस तरह से महायाजक को जवाब देते हो?”

यीशु ने साहसपूर्वक उत्तर दिया: ‘अगर मैंने गलत तरीके से बात की है, तो गलत की गवाही मानो; पर अगर सही, तो तुम मुझ पर क्यूँ हाथ उठाते हो? यीशु ने पुराने नियम के शब्दों से जवाब दिया। निर्गमन २२:२८ में, परमेश्वर इस्राएल के देश को बताते है कि आत्मरक्षा में सच्चाई बोलना धार्मिकता है। जाहिर है, अधिकारी परमेश्वर के वचन के धर्मी आदेशों का सम्मान करने से ज्यादा, महायाजक की सुरक्षा के बारे में चिंतित था।

यीशु नैतिक अधिकार के उत्तम बल के साथ अन्नास के सामने खड़े था। अन्नास को कहने के लिए कुछ भी नहीं था। शायद वह थोड़ा परेशान हो गया था। यह स्पष्ट था कि उसके पास यीशु को भयभीत करने के लिए कोई क्षमता थी। उसने उसे वहां से जाने दिया और अपने दामाद के यहाँ भेजा जहाँ महासभा और इसराइल की सर्वोच्च अदालत से लोग पहले से ही एकत्र हुए थे। यह सब समय से पहले साजिश रची गई थी। रात के गहरे अंधेरे में, वे अपने मंदिर की अदालतों में इस तरह के क्रुद्ध करनेवाला संदेशों को उपदेश देने वाले जन की पूछताछ और निंदा की अध्यक्षता करने के लिए आए थे।

कहानी १६३: हर कोई दूर हो जाता है: गिरफ्तारी 

मत्ती २६:४६-५६; मरकुस १४:४३-५२; लूका २२:४७-६५; यूहन्ना १८:२-११

Jerusalem - mosaic of arresting of Jesus in Gethsemane garden

जब यीशु ने बगीचे के अंधेरे में प्रार्थना में घुटने टेके, तो उन्होंने अपने को पिता की इच्छा के सुपुर्त कर दिया। तब वह अपने पैरों पे उठकर अपने चेलों के पास गए। उन्होंने उन्हें एक बार फिर से सोया पाया। “‘बाद में सो कर अपना आराम ले लेना” उन्होंने कहा। “देखो, समय आ गया है , और मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ पकड़वाया जाएगा। उठो, हमें जाना है।”

यीशु ने यह बोलना खत्म ही नहीं किया था, जब वे लोग आ गए। कवच की आवाज़ और पैरों की गड़गड़ाहट सुनाइ दे रही थी और मशालों की लौ बगीचे के पेड़ों के अंधेरे में झिलमिला रही थी। यहूदा एक पुरुषों की टोली का नेत्रित्व कर रहा था। महायाजक, बड़े और फरी,सी रात की घटनाओं का एक हिस्सा बनने के लिए उत्सुक, अपनी लालटेन और हथियारों के साथ आए थे। वे अपने साथ रोमी सैनिकों की एक टोली भी लाए थे। कम से कम दो सौ पुरुष अपने हथियार ले कर आए थे, मानो जंग के लिए आए हो।

“‘तुम किसे चाहते हैं?'” यीशु ने पूछा , यह अच्छी तरह जानते हुए कि वे उसके पीछे आ रहे थे।

“‘यीशु नासरी'” उन्होंने जवाब दिया।

“‘मैं वही हूं,” प्रभु ने कहा। उनके शब्दों से, भीड़ वापस खिच कर जमीन पर गिर गई। क्या वो इसलिए गिर गए क्यूंकि परमेश्वर ने उनके सामने खुद को घोषित कर दिया था, या वे उसकी घोषणा की सरासर साहस से अचंबित हो गए?

फिर यीशु ने पूछा: “तुम किसे चाहते हो?” यीशु बिलकुल निर्भय थे और उन्होंने अपने को छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने पहले से ही अपने पिता का पालन करने का निर्णय किया था, और पिता ने यही घटनाए ठहराई थी। जब वे वापस होश में आए, तो उन्होंने कहा: “‘यीशु नासरी।”

प्रभु ने कहा: ” मैंने तुम्हे बोला था कि मै ही वो हूँ। अगर तुम मुझे ही ढून्ढ रहे हो, तो दूसरों को जाने दो।” यीशु अपने शिष्यों के बारे में बात कर रहे थे।  उन्होंने स्पष्ट रूप से खुद की पहचान करी और अपने आदमियों की रक्षा के लिए आगे कदम रखा। बस एक रात पहले ही, उसने कहा था कि वो परमेश्वर के दिए शिष्यों में से एक को भी नहीं खोएगा।बारह में से केवल एक को उन्होंने खो दिया था, लेकिन उसके कार्यों से यह पता चला कि वो मसीह का कभी था ही नहीं।

जैसे जैसे यहूदा ने यहूदियों के साथ योजना बनाई और साजिश रची, उसने उन्हें उस बगीचे के बारे में बताया जहाँ यीशु सोने के लिए हर रात अपने चेलों के साथ जाते थे। यह उसे गिरफ्तार करने के लिए सबसे सही जगह होगी। भीड़, जो उसके प्रति वफादार थी बहुत दूर, गहरी नींद में सोए रहे होंगे। वे उसकी रक्षा करने में सक्षम नहीं होंगे। वे लोगों के सामने उनके असंभव सवालों के बिना, यीशु को गिरफ्तार कर सकते थे।

लेकिन एक समस्या थी। रात के अंधेरे में, यह पता लगाना मुश्किल था कि वास्तव में बगीचे में पुरुषों में से कौन यीशु है। केवल यहूदा यीशु और उसके चेलों के तरीके को अच्छी तरह से जानता था, जिसके कारणवश वो तुरंत प्रभु की पहचान कर सकता था। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई। जब वे बगीचे में पहुंचेंगे, यहूदा को यीशु के पास जाना था और गाल पर उन्हें चुंबन करना था। यह सैनिकों के लिए एक चिन्ह था कि वो ही यीशु था।

यहूदा प्रभु के पास गया और कहा, “‘नमस्ते गुरु!'” और यीशु को गाल पर चूमा।“‘यहूदा'” प्रभु ने कहा “‘क्या तुम एक चुंबन के साथ मनुष्य के पुत्र को धोखा दे रहे हो?'” तब उन्होंने कहा, “‘मेरे दोस्त, जिसके लिए तुम आए हो उसे करो।'” वो अपने विश्वासघाती के साथ कितनी नम्रता से पेश आए।

यह सभी बातों कुछ ही क्षणों में हो गई। कल्पना कीजिये सैनिकों की  अराजकता और खलल को जो दुःख, मदहोश नींद से उठकर आए थे। अचानक, रोमी सैनिकों और उनके जहरीला यहूदी नेताओं के चेहरे लालटेन की रोशनी में वहां खड़े दिख रहे थे। और यहूदा वहाँ था। क्या हो रहा था? क्या यही अंत था?

भय और तनाव और दहशत की लहर दौड़ पड़ी। यीशु के प्रति वफादार खड़े रहने का उनका उग्र निश्चय उनके दिल में उठा। “‘हे प्रभु, क्या हम तलवार से वार करे?'”उन्होंने कहा। निश्चित रूप से यह किसी भी अन्य परिस्थिति में एक निराशाजनक लड़ाई होती, लेकिन वे मसीहा के पक्ष में थे! वे सचमुच यीशु के लिए जान भी दे सकते थे।

जवाब के लिए इंतजार करने से पहले, शमौन पतरस ने अपनी तलवार खींच कर यीशु को जब्त करने वाले पुरुषों के खिलाफ वार किया। इसकी धार माल्कुस नामक महायाजक के एक दास के सिर पर लगी। पतरस के वार से उसका दाहिने कान कट गया। माल्कुस के पीड़ादायी चीख की कल्पना कीजिये। उस हत्याकांड की कल्पना कीजिये अगर सैनिक यहूदी नेताओं के बचाव में अपनी तलवार उठाते।

पर यीशु ने कहा: “बंद करो! इस से अधिक नहीं! ‘” सब लोग दंग रह गए। यीशु ने अपना हाथ बड़ा कर माल्कुस को चंगा किया, और पतरस से अपनी तलवार रखने को कहा। “‘जो कोई तलवार हाथ में ले लेंगे, वे सब तलवार से नष्ट हो जाएंगे,” उन्होंने कहा। “‘या फिर तुमको लगता है कि मै अपने पिता को विनती नहीं कर सकता हूँ, और वह एक ही बार में मेरे पास स्वर्गदूतों की बारह से अधिक फ़ौज नहीं डाल देंगे? कैसे फिर इंजील पूरी की जाएगी? यह इसी तरह से होना है। जो प्याला मेरे पिता ने मुझे दिया है, क्या मुझे उसे पीना नहीं चाहिए?”

वाह। पतरस को यह समझ में नहीं आया। यीशु उसे गिरफ्तार करने आए हुए पुरुषों की दया पर नहीं थे। उसके पिता ने उस रात की घटनाए ठहराई थी। धार्मिक नेता भी यह नहीं समझ पाए। उनको लगा कि वे एक विद्रोही, जवान उपदेशक को नष्ट करने के लिए आ रहे थे।

लेकिन यीशु जानते थे कि वह कौन था। वह स्वर्ग में अपने अधिकार को समझते थे।वह जानते थे कि उनके आदेश का पालन करने के लिए हजारों की तादाद में शानदार, शक्तिशाली स्वर्गदूतों तैयार खड़े है। उनके दिव्य योद्धा, एक आँख की झपकी में उस बगीचे में आए हर आदमी को नष्ट कर सकते थे। वे एक पल में यरूशलेम के पूरे शहर को नाश कर सकते थे। वे प्रभु के यहूदी दुश्मन और पूरे रोमी साम्राज्य का सफाया एक दिन में करके, उसे राजा बना सकते थे।

लेकिन यह पिता की योजना नहीं थी।उनके मन में एक बहुत बड़ी और गहरा जीत थी। जब प्रभु  दुनिया को जीतने आए थे, यह ठोस बल द्वारा नहीं था। ब्रह्मांड में सबसे बड़ी शक्ति हिंसा के रूप में नहीं आती है। यह सबसे उच्च परमेश्वर को समर्पण के रूप में आती है।

दुनिया शुरू होने से पहले, पिता और पुत्र ने इस उद्धार की योजना बनाई थी। उन्होंने इस्राएल के देश और उनके पवित्र वचन के माध्यम से दुनिया को इसके बारे में संकेत और छवियां दी थी। अब जब आखिरकार समय आ गया था कि परमेश्वर का पुत्र उद्धार लाए, अब कुछ भी उसे यह पूरा करने से  नहीं रोकेगी। वो आखरी क्षण तक अपने पिता का पालन करेंगे।

कहानी १६०: आशा का सहायक 

shining dove with rays on a dark

यूहन्ना १६

यीशु ने अपने शिष्यों के लिए एक सहायक भेजने का वायदा किया। यीशु की आत्मा उनके ह्रदय में आकर उसके राज्य के कार्य को करने के लिए उनकी अगुवाई करेगा और सामर्थ देगा।

यीशु ने कहा:
“’जब वह सहायक तुम्हारे पास आयेगा जिसे मैं परम पिता की ओर से भेजूँगा, वह मेरी ओर से साक्षी देगा। और तुम भी साक्षी दोगे क्योंकि तुम आदि से ही मेरे साथ रहे।'” यूहन्ना १५:२६

आत्मा के दूत इस श्रापित दुनिया में बनने का मतलब है कि उसका परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। अन्धकार के लोग और शैतानी ताक़तें ज्योति में चलने वाले लोगों के विरोध में खड़े होंगे। यीशु चाहता था कि उसके चेले तैयार रहें, वे समझ सकें कि यह सब क्या हो रहा है।

उसने कहा:
“’ये बातें मैंने इसलिये तुमसे कही हैं कि तुम्हारा विश्वास न डगमगा जाये। वे तुम्हें आराधनालयों से निकाल देंगे। वास्तव में वह समय आ रहा है जब तुम में से किसी को भी मार कर हर कोई सोचेगा कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है। वे ऐसा इसलिए करेंगे कि वे न तो परम पिता को जानते हैं और न ही मुझे। किन्तु मैंने तुमसे यह इसलिये कहा है ताकि जब उनका समय आये तो तुम्हें याद रहे कि मैंने उनके विषय में तुमको बता दिया था।'” यूहन्ना १६:१-४

चेलों के बारे में सोचिये जब वे यीशु को सुन रहे थे। जो बातें वह उन्हें बता रहा था वे उनसे बहुत भिन्न थीं जो होने वाली थीं। लगभग एक घंटे पहले, वे बहस कर रहे थे कि उनमें से कौन सबसे महान होगा। अब वे इस बात को सीख रहे थे कि भविष्य में उनके लिए कोई भी सम्मान और महिमा नहीं है। यीशु के वचन को फ़ैलाने वालों के लिए बहुत ही चुनौती भरा जीवन होगा जहां विरोध और कष्ट भी सहना होगा। पवित्रा आत्मा चेलों कि अगुवाई करेगा जब गवाही देने के लिए उन्हें सताया जाएगा और मृत्यु भी दी जाएगी।

जब चेलों ने यह समझा कि उनके स्वामी के पीछे चलने कि कीमत क्या होती है, वे यह भी समझ रहे थे कि चाहे वे उसे नहीं देख पाएंगे, उन्हें ऐसे ही उसके पीछे चलते रहना होगा।

यीशु ने कहा:
“‘किन्तु अब मैं उसके पास जा रहा हूँ जिसने मुझे भेजा है और तुममें से मुझ से कोई नहीं पूछेगा,‘तू कहाँ जा रहा है?’ क्योंकि मैंने तुम्हें ये बातें बता दी हैं, तुम्हारे हृदय शोक से भर गये हैं। किन्तु मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ इसमें तुम्हारा भला है कि मैं जा रहा हूँ। क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा। किन्तु यदि मैं चला जाता हूँ तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। और जब वह आयेगा तो पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में जगत के संदेह दूर करेगा। पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ में विश्वास नहीं रखते, धार्मिकता के विषय में इसलिये कि अब मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। और तुम मुझे अब और अधिक नहीं देखोगे। न्याय के विषय में इसलिये कि इस जगत के शासक को दोषी ठहराया जा चुका है।'” यूहन्ना १६:५-११

“’मुझे अभी तुमसे बहुत सी बातें कहनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसको प्रकट करेगा। वह मेरी महिमा करेगा क्योंकि जो मेरा है उसे लेकर वह तुम्हें बतायेगा। हर वस्तु जो पिता की है, वह मेरी है। इसीलिए मैंने कहा है कि जो कुछ मेरा है वह उसे लेगा और तुम्हें बतायेगा।'” यूहन्ना १६:१२-१५

“’कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नहीं देख पाओगे। और थोड़े समय बाद तुम मुझे फिर देखोगे’।’” यूहन्ना १६:१६

चेले नहीं समझ पाये कि यीशु क्या कह रहे हैं, सो वे आपस में चर्चा करने लगे।  तब यीशु ने कहा:

“’क्या तुम मैंने यह जो कहा है, उस पर आपस में सोच-विचार कर रहे हो,‘कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नही देख पाओगे।’ और ‘फिर थोड़े समय बाद तुम मुझे देखोगे?’ मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, तुम विलाप करोगे और रोओगे किन्तु यह जगत प्रसन्न होगा। तुम्हें शोक होगा किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द में बदल जायेगा। जब कोई स्त्री जनने लगती है, तब उसे पीड़ा होती है क्योंकि उसकी पीड़ा की घड़ी आ चुकी होती है। किन्तु जब वह बच्चा जन चुकी होती है तो इस आनन्द से कि एक व्यक्ति इस संसार में पैदा हुआ है वह आनन्दित होती है और अपनी पीड़ा को भूल जाती है। सो तुम सब भी इस समय वैसे ही दुःखी हो किन्तु मैं तुमसे फिर मिलूँगा और तुम्हारे हृदय आनन्दित होंगे। और तुम्हारे आनन्द को तुमसे कोई छीन नहीं सकेगा।  उस दिन तुम मुझसे कोई प्रश्न नहीं पूछोगे। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ मेरे नाम में परम पिता से तुम जो कुछ भी माँगोगे वह उसे तुम्हें देगा। अब तक मेरे नाम में तुमने कुछ नहीं माँगा है। माँगो, तुम पाओगे। ताकि तुम्हें भरपूर आनन्द हो।'” यूहन्ना १६:१९ब-२४

“’मैंने ये बातें तुम्हें दृष्टान्त देकर बतायी हैं। वह समय आ रहा है जब मैं तुमसे दृष्टान्त दे-देकर और अधिक समय बात नहीं करूँगा। बल्कि परम पिता के विषय में खोल कर तुम्हें बताऊँगा। उस दिन तुम मेरे नाम में माँगोगे और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम्हारी ओर से मैं परम पिता से प्रार्थना करूँगा। परम पिता स्वयं तुम्हें प्यार करता है क्योंकि तुमने मुझे प्यार किया है। और यह माना है कि मैं परम पिता से आया हूँ। मैं परम पिता से प्रकट हुआ और इस जगत में आया। और अब मैं इस जगत को छोड़कर परम पिता के पास जा रहा हूँ।’” यूहन्ना १६:२५-२८

इन शब्दों ने उन्हें प्रभावित किया। चेलों के दिमाग में कुछ आने लगा। उन्होंने कहा:
“’देख अब तू बिना किसी दृष्टान्त को खोल कर बता रहा है। अब हम समझ गये हैं कि तू सब कुछ जानता है। अब तुझे अपेक्षा नहीं है कि कोई तुझसे प्रश्न पूछे। इससे हमें यह विश्वास होता है कि तू परमेश्वर से प्रकट हुआ है।’”

अब वे समझ गए थे। परन्तु जो उन्हें वह कोई पद या अधिकार नहीं था। उन्हें अपनी सिद्धता या सिद्ध  नहीं प्राप्त हुई थी। उनके लिए महत्वपूर्ण यह था कि वे यीशु को पाएं। उस पर  सच्चाई से विश्वास करें। और वे जानते हैं कि उन्हें मिला क्यूंकि यीशु उनके साथ सहमत थे।

यीशु ने इस पर उनसे कहा,
“’क्या तुम्हें अब विश्वास हुआ है? सुनो, समय आ रहा है, बल्कि आ ही गया है जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और तुम में से हर कोई अपने-अपने घर लौट जायेगा और मुझे अकेला छोड़ देगा किन्तु मैं अकेला नहीं हूँ क्योंकि मेरा परम पिता मेरे साथ है। मैंने ये बातें तुमसे इसलिये कहीं कि मेरे द्वारा तुम्हें शांति मिले। जगत में तुम्हें यातना मिली है किन्तु साहस रखो, मैंने जगत को जीत लिया है।’” यूहन्ना १६:३१-३३

कहानी १५८: पिता और आत्मा

Spiritual Doves and Salvation Cross / Art symbolic of the salvation of Jesus Christ. Use as background or feature illustration.

यूहन्ना १४

एक बार यीशु ने अपने चेलों के साथ प्रभु-भोज,  वह उनके साथ आने वाले दिनों कि भेद कि बातों को बताने लगा। उसे उन्हें अपनी ही मृत्यु  में तैयार करना था। जो वह अब कहने  जा रहा था वह  उसके चेलों  लिए अलविदा था। जिनके साथ उसने पिछले तीन साल व्यतीत किये थे उन्हें बहुत था। फिर भी सच्चाई में, यह केवल एक शुरुआत थी। उसका जीवन उसके चेलों के साथ बहुत ही सामर्थ्य रूप से आने वाला था और वही उन्हें अनंतकाल के लिए लेकर जाएगा। वह उनके साथ अब शारीरिक रूप से नहीं रहेगा परन्तु उसकी आत्मा उनके भीतर में रहेगी। और एक दिन, जब उनकी सेवा इस पृथ्वी पर समाप्त हो जाएगी, वे उसके साथ अनंकाल में रहेंगे। परन्तु वह इन चेलों को अपने मृत्यु के एक रात पहले कैसे बताता? वे उस महिमा को जो दूसरी ओर है उसे कैसे समझ पाते?

यीशु ने कहा:
“’तुम्हारे हृदय दुःखी नहीं होने चाहिये। परमेश्वर में विश्वास रखो और मुझमें भी विश्वास बनाये रखो। मेरे परम पिता के घर में बहुत से कमरे हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं तुमसे कह देता। मैं तुम्हारे लिए स्थान बनाने जा रहा हूँ। और यदि मैं वहाँ जाऊँ और तुम्हारे लिए स्थान तैयार करूँ तो मैं फिर यहाँ आऊँगा और अपने साथ तुम्हें भी वहाँ ले चलूँगा ताकि तुम भी वहीं रहो जहाँ मैं हूँ। और जहाँ मैं जा रहा हूँ तुम वहाँ का रास्ता जानते हो।’”

यीशु स्वर्ग के विषय में बोल रहे थे। वह जानता था कि वह मरने वाला है, परन्तु इससे भी बड़ी बात यह थी कि वह फिर से जीवित होने वाला था। वह स्वर्ग वापस अपने पिता के दाहिने हाथ जाकर बैठने जा रहा था। वे इस बात से पूर्ण रूप से निश्चित हो सकते थे कि भले ही आने वाले दिन त्रासदी से भरे हों, परन्तु वास्तव में, एक महान विजय होने जा रही थी। यीशु पूर्ण रूप से योग्य था, बिल्कुल सक्षम, और पूर्ण रूप से निश्चित था।

सबसे अद्भुद बात यह थी कि यीशु उस  जा रहा था जिससे कि कि पूरी सृष्टि बदल जाएगी, उसने उन बारह चेलों कि ओर देखा और कहा,” यह  लिए कर रहा हूँ। तुम मेरे लिए बहुत मायने रखते हो। तुम उस बचाव विशेष कार्य के मूल्य भाग हो क्यूंकि तुम मेरे लिए मूलयवान हो। जब  और पाप के लिए सोच रहा हूँ, मुझे तुम्हारा ध्यान है। और फिर हम साथ होंगे।” यह शब्द उस महान प्रेम के थे जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी।

परन्तु चेले यह समझ नहीं पाए। थोमा ने उससे कहा,“हे प्रभु, हम नहीं जानते तू कहाँ जा रहा है। फिर वहाँ का रास्ता कैसे जान सकते हैं?”
यीशु ने उससे कहा,“मैं ही मार्ग हूँ, सत्य हूँ और जीवन हूँ। बिना मेरे द्वारा कोई भी परम पिता के पास नहीं आता। यदि तूने मुझे जान लिया होता तो तू परम पिता को भी जानता। अब तू उसे जानता है और उसे देख भी चुका है।”

फिलिप्पुस ने उससे कहा, “हे प्रभु, हमे परम पिता का दर्शन करा दे। हमें संतोष हो ज गा।” फिलिप्पुस निश्चित होना चाहता था। वह  विश्वास करने के लिए और कुछ चाहता था। उसे प्रमाण चाहिए था। परन्तु यीशु तो स्वयं प्रमाण था। फिलिप्पुस ने चमत्कार देखे थे, उसने यीशु के उत्तरों को सुना था जो उसने उन धार्मिक अगुवों को उनके झूठ के लिए दिया था। तीन सालों से उसने यीशु कि सच्चाई को देखा था। फिलिप्पुस अपने विश्वास को लेन के लिए उसकी महिमा को देखना चाहता था। परन्तु सच्चा जीवन अनदेखी बातों पर विश्वास करने से ही आता है। उसे अपने स्वंय के शब्दों पर विश्वास करना था।

यीशु के चेलों के पास परेशन होने कि अच्छी वजह थी। चेले समझ गए थे कि जब यीशु अपने पिता के विषय में बोल रहा था, वह उस परमेश्वर के विषय में बोल रहा था जिसने सृष्टि को बनाया है। यहूदी धर्म में, यह मानना कि एक ही सच्चा परमेश्वर है बहुत ही महत्पूर्ण था। पुराने नियम कि सबसे कीमती पद यह है,”इस्राएल के लोगो, ध्यान से सुनो! यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक है! और तुम्हें यहोवा, अपने परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय, आत्मा और शक्ति से प्रेम करना चाहिए।'” (व्यव विव 6:4-5) वे यह जानते थे कि यीशु ने अपने आप को परमेश्वर का पुत्र कहा था, जिसका मतलब यह है कि वह अपने आप को परमेश्वर के बराबर कर रहा है। परन्तु वह अपने आप को मनुष्य का पुत्र भी कहता है। यह सब कैसे हो सकता है? यह सब भेद कि बातें थीं। यीशु ने अपनी पहचान को ढांप कर रखा हुआ था।

चेले यह मानते थे कि यीशु ही मसीहा है, और वे जानते थे कि वह नबी है, और वे उसे राजा बन कर देखना चाहते थे। ये सब माननीय नाम थे, परन्तु इससे बढ़कर वो सच था जिसे उन्हें समझना था। यीशु ही परमेश्वर था। और यीशु ही परमेश्वर है। परमेश्वर कि त्रीएकता पिता और पुत्र कि उत्तम एकता में ही है। अब समय आ गया था जब यीशु को उसे पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देना था:

“’फिलिप्पुस मैं इतने लम्बे समय से तेरे साथ हूँ और अब भी तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है, उसने परम पिता को देख लिया है। फिर तू कैसे कहता है ‘हमें परम पिता का दर्शन करा दे।’ क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मैं परम पिता में हूँ और परम पिता मुझमें है? वे वचन जो मैं तुम लोगों से कहता हूँ, अपनी ओर से ही नहीं कहता। परम पिता जो मुझमें निवास करता है, अपना काम करता है। जब मैं कहता हूँ कि मैं परम पिता में हूँ और परम पिता मुझमें है तो मेरा विश्वास करो और यदि नहीं तो स्वयं कामों के कारण ही विश्वास करो।'”

पर्दा हट चुका था। यीशु अपने चेलों को परमेश्वर के भीतरी कार्यों के विषय में समझा रहा था। परन्तु इतना काफी नहीं था। यीशु वो मार्ग दिखाने आया था। उसने स्वर्ग छोड़ कर मनुष्य रूप धारण किया ताकि उस रिश्ते को वापस स्थापित कर सके जो उसका परमेश्वर के साथ था। वह परमेश्वर के साथ हुए अलगाव को पलटने के लिए आया था जो पाप के कारण मनुष्य पर आ गया था। उसकी मृत्यु के कारण, उनके पापों कि कीमत चुका कर वह उनके जीवन को परमेश्वर के लिए खरीद लेगा। वो महान अलगाव समाप्त हो गया था। वे जो यीशु पर विश्वास करेंगे वे नयी सृष्टि बन। जाएंगे वे अंधकार कि राज्य से ज्योति के राज्य में लाये जाएंगे। और उसके मनुष्यत्व जीवन उन सब के लिए एक उदहारण था जिनको उसने बचाया था। अब उनके जीवन परमेश्वर के लिए जीए जा सकते थे और वे उस काम को आगे करेंगे जो यीशु ने शुरू किया था।

यीशु ने कहा:
“’मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, जो मुझमें विश्वास करता है, वह भी उन कार्यों को करेगा जिन्हें मैं करता हूँ। वास्तव में वह इन कामों से भी बड़े काम करेगा। क्योंकि मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। और मैं वह सब कुछ करूँगा जो तुम लोग मेरे नाम से माँगोगे जिससे पुत्र के द्वारा परम पिता महिमावान हो। यदि तुम मुझसे मेरे नाम में कुछ माँगोगे तो मैं उसे करूँगा।'” यूहन्ना १४ ९-१४

ये कुछ बहुत ही अद्भुद वायदे हैं।  फिर यीशु ने कहा:
“‘यदि तुम मुझे प्रेम करते हो, तो मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे। मैं परम पिता से विनती करूँगा और वह तुम्हें एक दूसरा सहायक देगा ताकि वह सदा तुम्हारे साथ रह सके। यानी सत्य का आत्मा जिसे जगत ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह उसे न तो देखता है और न ही उसे जानता है। तुम लोग उसे जानते हो क्योंकि वह आज तुम्हारे साथ रहता है और भविष्य में तुम में रहेगा। “मैं तुम्हें अनाथ नहीं छोड़ूँगा। मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ।'”

अब यीशु अपने चेलों को तीसरे रहस्य के विषय में बता रहे थे। यीशु ही पुत्र है, और वही है जो पिता के साथ है। परन्तु इस उत्तम एकता में एक तीसरा व्यक्ति भी है। वह पवित्र आत्मा है, और पिता और पुत्र को मिला कर वे पवित्र त्रिएकता को बनाते हैं। जब यीशु इस संसार को छोड़ने कि तैयारी कर रहे थे, उसका पिता आत्मा को पृथ्वी पर भेजने कि तैयारी कर रहा था। आत्मा उन सब के भीतर आएगा जो उस पर विश्वास करेंगे, ताकि उन्हें पिता कि ओर से वो शक्ति और अगुवाई और तसल्ली मिल सके।

यीशु अपने चेलों को बताना चाहता था कि वे जानें कि वह उन्हें छोड़ कर नहीं जा रहा है। उसके पास योजना थी उन्हें अपने पास परमेश्वर के सिंहासन के पास बैठने की। यीशु और आत्मा एक हैं, और जिस किसी के पास भी आत्मा है वह यीशु में एक है! परन्तु केवल वे जो यीशु पर विश्वास करते हैं उन्हें वह आत्मा दी जाएगी। वह परमेश्वर के बच्चों के लिए एक कीमती खज़ाना है।

यीशु ने कहा:
“‘कुछ ही समय बाद जगत मुझे और नहीं देखेगा किन्तु तुम मुझे देखोगे क्योंकि मैं जीवित हूँ और तुम भी जीवित रहोगे। उस दिन तुम जानोगे कि मैं परम पिता में हूँ, तुम मुझ में हो और मैं तुझमें। वह जो मेरे आदेशों को स्वीकार करता है और उनका पालन करता है, मुझसे प्रेम करता है। जो मुझमें प्रेम रखता है उसे मेरा परम पिता प्रेम करेगा। मैं भी उसे प्रेम करूँगा और अपने आप को उस पर प्रकट करूँगा।’”  –यूहन्ना १४:१५-२२

सोचिये किस प्रकार यीशु के पीछे चलने वाले उसके साथ और त्रिएकता में बंध जाएंगे! क्यूंकि वह जीवित है, इसलिए हम भी जीवित हैं। वह पिता में है और हम उस में, इसलिए हम भी पिता में हैं! यीशु जी, स्वर्ग में उठाया जाने वला था, और फिर युगानुयुग कि विजय में रहने वाला था, और वे जो उसके पीछे चलते हैं और उसके आज्ञाकारी हैं, उसके साथ अनंतकाल में रहेंगे। यह इतनी महान आशा है कि या समझना कितना कठिन है। यह किसी भी मनुष्य कि समझ से परे है!

इसीलिए चेले बहुत व्याकुल थे। उनकी आशा उस पर टिकी हुई थी कि पृथ्वी पर क्या होने जा रहा था। इस्राएल देश से यीशु क्यूँ अपने आप को क्यूँ गुप्त रखा हुआ था? परमेश्वर के राज्य को क्या वह जल्द लाने वाला नहीं था? क्या सब यह जान नहीं जाएंगे? उनमें से एक चेले ने कहा,“हे प्रभु, ऐसा क्यों है कि तू अपने आपको हम पर प्रकट करना चाहता है और जगत पर नहीं?”

यीशु ने कहा,
“’यदि कोई मुझमें प्रेम रखता है तो वह मेरे वचन का पालन करेगा। और उससे मेरा परम पिता प्रेम करेगा। और हम उसके पास आयेंगे और उसके साथ निवास करेंगे। जो मुझमें प्रेम नहीं रखता, वह मेरे उपदेशों पर नहीं चलता। यह उपदेश जिसे तुम सुन रहे हो, मेरा नहीं है, बल्कि उस परम पिता का है जिसने मुझे भेजा है।'”

एक बार फिर, यीशु ने अपने चेलों को सीधा जवाब नहीं दिया। सुनने के बजाय वे उससे गलत सवाल पूछ रहे थे। उनके स्वयं कि आशाएं और अकांक्षाएं उनके कानों को बंद कर रहे थे। वह चाहते कि यीशु उन्हें बताय कि यहूदी नेतृत्व पर कैसे विजय पाया जा सकता है, रोमी राज को कैसे हराया जा सकता है और अपने जीवन भर में स्वर्ग राज्य को कैसे स्थापित किया जा सकता है। वे चाहते कि वह उन्हें उसकी योजना को उनके सामने प्रकट करे, और वे जानना चाहते थे कि स्वर्ग राज्य में उनका क्या पद होगा।

चेलों के पास यह अच्छी वजह थी मानने के लिए कि यीशु येरूशलेम में राजा बनके राज करेगा। उनकी आशा बाइबिल पढ़ने से आई। एक दिन, उनकी सब आशाएं सच्च में बदल जाएंगी, परन्तु उनके समय के हिसाब से नहीं। हम उस समय के लिए रुके हैं जब परमेश्वर यीशु के राज को इस पृथ्वी पर पूरे सामर्थ के साथ लेकर आएगा।

यीशु ने अपने चेलों के गलत सवालों के लिए उनके पास वापस आकर उन्हें इस जीवन कि सच्ची आशा को बताता रहा। यह दुनियावी ताक़त या धन और पद से नहीं मिल सकता था। उनका जीवन केवल उस आत्मिक क्षेत्र में और परमेश्वर कि नज़दीकी में पाया जा सकता था।

यीशु ने कहा:
“’ये बातें मैंने तुमसे तभी कही थीं जब मैं तुम्हारे साथ था। किन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे परम पिता मेरे नाम से भेजेगा, तुम्हें सब कुछ बतायेगा। और जो कुछ मैंने तुमसे कहा है उसे तुम्हें याद दिलायेगा।'”

पवित्र आत्मा हर उसके भीतर भेजा जाएगा जो यीशु पर अपना विश्वास डालेंगे। हर एक विश्वासी जो परमेश्वर का सम्मान करता है उसे पवित्र आत्मा अगुवाई करेगा और तसल्ली और विजय होने के लिए समर्थ भी देगा। परमेश्वर पिता और परमेश्वर का पुत्र आत्मा के द्वारा अपने आप को प्रकट करेंगे। यीशु के चेले होते हुए उस आत्मा का सहयोग दीजिये और उस पर ही निर्भर रहिये।

अंधकार का राज्य इन जीत से खुश नहीं होगा, और परमेश्वर के बच्चों के लिए बहुत सी परीक्षाएं आएंगी। अंत में, यह सब लायक होगा। इस संसार कि चीज़ें उन बातों के सामने बिल्कुल बेकार हैं जो स्वर्ग में हमें मिलेंगी। परन्तु यीशु उन चुनौतियों को जानता था जो उसके चेलों के सामने आने वाली थीं।

उसने कहा:
“’मैं तुम्हारे लिये अपनी शांति छोड़ रहा हूँ। मैं तुम्हें स्वयं अपनी शांति दे रहा हूँ पर तुम्हें इसे मैं वैसे नहीं दे रहा हूँ जैसे जगत देता है। तुम्हारा मन व्याकुल नहीं होना चाहिये और न ही उसे डरना चाहिये। तुमने मुझे कहते सुना है कि मैं जा रहा हूँ और तुम्हारे पास फिर आऊँगा। यदि तुमने मुझसे प्रेम किया होता तो तुम प्रसन्न होते क्योंकि मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। क्योंकि परम पिता मुझ से महान है। और अब यह घटित होने से पहले ही मैंने तुम्हें बता दिया है ताकि जब यह घटित हो तो तुम्हें विश्वास हो। “और मैं अधिक समय तक तुम्हारे साथ बात नहीं करूँगा क्योंकि इस जगत का शासक आ रहा है। मुझ पर उसका कोई बस नहीं चलता। किन्तु ये बातें इसलिए घट रहीं हैं ताकि जगत जान जाये कि मैं परम पिता से प्रेम करता हूँ। और पिता ने जैसी आज्ञा मुझे दी है, मैं वैसा ही करता हूँ। –यूहन्ना १४:२७-३१

यीशु जानता था कि शैतान अपना कार्य कर रहा है, और उसके बलिदान का समय आ गया था। परमेश्वर पिता ने इतिहास को रचा ताकि शैतान उस महान विजय को लेन में सहभागी हो सके। यीशु क्रूस पर जाने से परमेश्वर के दुश्मन के आगे झुक नहीं रहा था, वह अपने पिता के प्रति प्रेम के कारण कष्ट उठा रहा था। जब शैतान उसने परमेश्वर पिता के प्रति अगयकर्ता को देखेगा तब वह उसके प्रेम कि सामर्थ को इंकार नहीं कर पाएगा। जहां हर इंसान असफल रहा, जहाँ शैतान और उसके साथ के दुष्ट ताक़तें असफल रहीं, यीशु कि विजय होने वाली थी, और वह उन सब को विजय में लेने वाला था जो उस पर विश्वास करते हैं।

कहानी १५५: यीशु का अंतिम भोज-भाग 1 

मत्ती २६:१७-१९; मरकुस १४:१२-१६; लूका २२:७-१३; यूहन्ना १३:१-१७

The Washing of the Feet
गुरुवार आया। यह अखमीरी रोटी का दिन था। मिस्र में उस दिन की याद में शासकीय फसह के मेमने को बलिदान किया जाएगा।बेदाग भेड़ के बच्चे के रक्त को हर एक इस्राएली घर के चौखट पर लगाना था। इससे उनका पहलौठा पुत्र बच गया और स्वतंत्रता के द्वार को खोल दिया गया। वह पहला बलिदान और उद्धार केवल एक रूप था और यीशु अपने ही लहू से खरीदने वाला था।

चेलों ने उससे पुछा कि तैयारी के लिए वह क्या चाहता था कि कहाँ की जाये।

उसने यूहन्ना और पतरस से कहा,
“’तुम जैसे ही नगर में प्रवेश करोगे तुम्हें पानी का घड़ा ले जाते हुए एक व्यक्ति मिलेगा, उसके पीछे हो लेना और जिस घर में वह जाये तुम भी चले जाना। और घर के स्वामी से कहना,‘गुरु ने तुझसे पूछा है कि वह अतिथि-कक्ष कहाँ है जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ फ़सह पर्व का भोजन कर सकूँ।’ फिर वह व्यक्ति तुम्हें सीढ़ियों के ऊपर सजा-सजाया एक बड़ा कमरा दिखायेगा, वहीं तैयारी करना।’”

वे चल पड़े और वैसा ही पाया जैसा उसने उन्हें बताया था। फिर उन्होंने फ़सह भोज तैयार किया। यीशु के अपने पिता के आज्ञाकारी होने के साथ ही उस पवित्र योजनाओं का खुलासा हो गया। हर एक पल परमेश्वर कि ओर से नियुक्त था और यीशु उसे पूरी श्रेष्ठा से प्रदर्शित कर रहे थे।

संध्या काल में,यीशु अपने शिष्यों के साथ भोजन पर बैठा। उसने उनसे कहा,“’यातना उठाने से पहले यह फ़सह का भोजन तुम्हारे साथ करने की मेरी प्रबल इच्छा थी। क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक परमेश्वर के राज्य में यह पूरा नहीं हो लेता तब तक मैं इसे दुबारा नहीं खाऊँगा।’”

इसे समझिये, यीशु परमेश्वर था और परमेश्वर उससे असीम प्यार करता था।  फिर भी जब यीशु उस पाप के ढेर को उठाये हुए था, वह उन स्वार्थी चेलों के साथ ही रहना चाहता था। उसका प्रेम उनके प्रति गुणवत्ता के अनुसार नहीं था। उसके प्रेम कि महानता उसके प्रेम करने कि योग्ता के कारण था। जब हम उन बातों को पढ़ते हैं जो उसने अपने चेलों के साथ बांटीं, हम उसके वचन को बहुत ही व्यक्तिगत तरीके से ले सकते हैं। वे हमारे भी हैं।

जब यीशु भोजन कर रहा था, वह जानता था कि यह उसके कष्ट उठाने से पहले का अंतिम भोज है। फिर भी उसका उद्देश्य क्रूस पर से नहीं हटा। वह क्रूस के माध्यम से उस विजय कि ओर देख रहा था। एक बहुत जश्न जिसे मेमने के विवाह का भोज कहा जाता है, आ रहा था। वे जो यीशु कि मृत्यु और जी उठने के कारण बचाय गए वे एक बार फिर उसकी यशस्वी  दुल्हन बनकर उसके साथ भोजन करेगी। वह जानता था कि वह परमेश्वर कि ओर से आया है और अपने पिता के पास वापस चला जाएगा। वह जानता था कि उसके पिता ने उसे उसके हाथ में सब कुछ दे दिया है। अभी वह गया नहीं था और अंत तक अपनों से प्रेम करता रहेगा।

यीशु  उठा और अपने बाहरी वस्त्र उतार दिये और एक अँगोछा अपने चारों ओर लपेट लिया। फिर एक घड़े में जल भरा और अपने शिष्यों के पैर धोने लगा और उस अँगोछे से जो उसने लपेटा हुआ था, उनके पाँव पोंछने लगा। अपने स्वामी को ऐसे करते देख वे अचंबित हुए। यह एक बहुत नीच और गन्दा काम था। इस्राएल में, केवल वे जो यहूदी नहीं हैं वे ही यह काम करते थे। लेकिन यहं यीशु यह सब काम कर रहा था।

फिर जब वह शमौन पतरस के पास पहुँचा तो पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, क्या तू मेरे पाँव धो रहा है।”

उत्तर में यीशु ने उससे कहा,“अभी तू नहीं जानता कि मैं क्या कर रहा हूँ पर बाद में जान जायेगा।”

पतरस ने उससे कहा,“तू मेरे पाँव कभी भी नहीं धोयेगा।”

यीशु ने उत्तर दिया,“यदि मैं न धोऊँ तो तू मेरे पास स्थान नहीं पा सकेगा।”

शमौन पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, केवल मेरे पैर ही नहीं, बल्कि मेरे हाथ और मेरा सिर भी धो दे।”

यीशु ने उससे कहा,“जो नहा चुका है उसे अपने पैरों के सिवा कुछ भी और धोने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि पूरी तरह शुद्ध होता है। तुम लोग शुद्ध हो पर सबके सब नहीं।” वह उसे जानता था जो उसे धोखे से पकड़वाने वाला है। इसलिए उसने कहा था,“तुम में से सभी शुद्ध नहीं हैं।”

यीशु ने यही रात क्यूँ चुनी चेलों के पैर धोने के लिए? वह उसके मरने के पहले की अंतिम घड़ी थी। वे अपने जीवन भर उस समय को याद रखेंगे। वह उस रात जो कुछ भी कहता वह बहुत महत्वपूर्ण होता।

उनके पैर धोना उस बात का चिन्ह था जो यीशु अपनी मृत्यु के समय उनके लिए करने जा रहा था। वह श्राप के बंधन को तोड़ने जा रहा था।  के पाप से मृत्यु आई, यीशु कि मृत्यु उन सब के लिए जीवन को लाएगा जो उस पर विश्वास करते हैं (रोमियो 4और5) वह पाप में गिरे संसार को समाप्त करके एक नए दौर को लेकर आ रहा था। नेही विधि के अनुसार, जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह पूर्ण रूप से साफ़ किया जाएगा और परमेश्वर के साथ सिद्ध होगा। उन्हें यीशु कि धार्मिकता दी जाएगी। उसी समय से, वे नए हो जाएंगे। उनके हिरदय बदल जाएंगे, और वे फिर कभी इस दुनिया के नहीं होंगे। जब व पाप करेंगे, वे परमेश्वर के सामने खोये हुए नहीं होंगे। उन्हें केवल पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। वह उनके उन गंदे क्षेत्रों को साफ़ करेगा जिस प्रकार उसने चेलों के पैरों को धोया था। जो कोई यीशु पर विश्वास करता है वह यह विश्वास कर सकता है कि परमेश्वर ने उसे साफ़ किया है। फिर भी उसके चेलों को आवश्यकता है कि वे रोज़ अपने पापों को शुद्ध करने के लिए उसके पास आयें जब तक वे इस शार्पित संसार में जी रहे हैं।

जब यीशु ने कहा कि सरे उसके चेले साफ़ नहीं थे, तो उसका किसकी ओर निशाना था? क्या यहूदा जानता था कि यीशु को मालूम है? जब यीशु उसके पाँव धो रहे थे तब उसे कैसा लग रहा होगा? उस समय, और पूरे हफ्ते भर, यहूदा के पास पश्चाताप करने का पूरा समय था। परन्तु जिस समय यीशु उसके पाँव के मेल को धो रहे थे, उसके हिरदय के मेल को वह पकड़ा हुआ था। और इसीलिए वह अपने पाप में स्थायी था।

जब यीशु उनके पाँव धो चुका , तब उसने उनसे कहा,
“’क्या तुम जानते हो कि मैंने तुम्हारे लिये क्या किया है? तुम लोग मुझे ‘गुरु’ और ‘प्रभु’ कहते हो। और तुम उचित हो। क्योंकि मैं वही हूँ। इसलिये यदि मैंने प्रभु और गुरु होकर भी जब तुम्हारे पैर धोये हैं तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोना चाहिये। मैंने तुम्हारे सामने एक उदाहरण रखा है ताकि तुम दूसरों के साथ वही कर सको जो मैंने तुम्हारे साथ किया है। मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ एक दास स्वामी से बड़ा नहीं है और न ही एक संदेशवाहक उससे बड़ा है जो उसे भेजता है यदि तुम लोग इन बातों को जानते हो और उन पर चलते हो तो तुम सुखी होगे।'”  –यूहन्ना १३:१२-१७

यीशु ने अपने चेलो को समझाया कि अब जब उनके पाप धूल चुके हैं, उन्हें आगे बढ़ना है। यीशु पाप और मृत्यु पर विजयी होगा और एक नया दौर शुरू होगा। जो कुछ यीशु ने किया था वे उसके दूत थे, जो उसके सन्देश को संसार में फैलाएंगे। परमेश्वर का राज्य अंधकार के राज्य में के समान घुसेगा और लोग अपने जीवन को यीशु को देंगे। वे भी साफ़ किये जाएंगे और जिस प्रेम कि समिति उन्होंने बनाई है वह इस पृथ्वी के राज्य के लिए ढाल बन कर खड़ी होगी। वे एक दुसरे के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? क्या वे फरीसियों के समान लालची होंगे जो अपने पद के लिए लड़ते थे? या वे अपने स्वामी के समान वैसा ह्रद्य रखेंगे? क्या वे विनम्रता और शांति बनाने वाले बनकर एक दुसरे पाँव को धोएंगे? इस पवित्र समय में जब यीशु ने पने चेलों के पाव धोये, वह उस शारीरिक प्रदर्शन को दिखाता है कि कैसे स्वर्गराज के नागरिकों को एक दुसरे के प्रति अपने ह्रदय को रखना है।

कहानी १५३: मसीह न्याय के सिंघासन पर 

मत्ती २५:३१-४६

The sun sets over Jerusalem

जो दूसरी कहानी यीशु बताने जा रहे थे, वो भी भविष्य के बारे में थी। प्रभु पृथ्वी के लोगों का न्याय करने आ रहे है। जिस प्रकार यह लोग अपने जीवन को जीने का चुनाव करेंगे, उससे ही वो जानेंगे कि सही मायने में कौन उनके अपने थे। जैतून के पहाड़ पर अपनी लम्बी  बातचीत के दौरान, उन्होंने यह बात अपने शिष्यों को ऐसे वर्णित की:

” जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और उसके साथ सभी स्वर्गदूत भी, तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा। उनके सामने सभी देशों को इकट्ठा किया जाएगा, और वह लोगों को एक दूसरे से अलग करेगा, जैसे एक चरवाहा बकरियों से भेड़ों को अलग करता है। और वह अपने दाहिनी ओर भेड़ों को रखेगा, लेकिन बकरियों को बाएँ ओर।”

हम खैर यह जानते है कि बाइबल में जिन चीज़ों को परमेश्वर के दाहिने हाथ पर डाला जाता है, उन्हें उनका प्यार और कृपा प्राप्त होता है। उनके बाएं हाथ पर चीज़ों से वह बिल्कुल भी खुश नहीं होते है। बकरियों ने ऐसा क्या किया था जिससे वह बाएँ ओर थे? भेड़ों ने ऐसा क्या किया था जिससे वो दाहिनी ओर थे? यीशु ने यह कहा:

“फिर वह राजा, जो उसके दाहिनी ओर है, उनसे कहेगा, ‘मेरे पिता से आशीष पाये लोगो, आओ और जो राज्य तुम्हारे लिये जगत की रचना से पहले तैयार किया गया है उसका अधिकार लो। यह राज्य तुम्हारा है क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे कुछ खाने को दिया, मैं प्यासा था और तुमने मुझे कुछ पीने को दिया। मैं पास से जाता हुआ कोई अनजाना था, और तुम मुझे भीतर ले गये। मैं नंगा था, तुमने मुझे कपड़े पहनाए। मैं बीमार था, और तुमने मेरी सेवा की। मैं बंदी था, और तुम मेरे पास आये।’ –मत्ती २५:३४-३६

वाह। भेड़ों ने यीशु के लिए कई सुंदर, दयालु चीज़ें की थी। लेकिन इस कहानी में, वे उलझन में थे, तो उन्होंने राजा यीशु से कुछ सवाल पूछे:

“फिर उत्तर में धर्मी लोग उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे कब भूखा देखा और खिलाया या प्यासा देखा और पीने को दिया? तुझे हमने कब पास से जाता हुआ कोई अनजाना देखा और भीतर ले गये या बिना कपड़ों के देखकर तुझे कपड़े पहनाए? और हमने कब तुझे बीमार या बंदी देखा और तेरे पास आये?’ “फिर राजा उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे भोले-भाले भाईयों में से किसी एक के लिए भी कुछ किया तो वह तुमने मेरे ही लिये किया।’ –मत्ती २५:३७-४०

वाह। कितना सुंदर राजा! क्या ही एक अद्भुत दिल! यह राजा अपने लोगों से इतना प्यार करता था कि वह उन्हें भाई बुला रहा था।वह उन्हें इतना प्यार करता था कि वह चोट खाए लोग, या जेल या भूखे लोगों की देखबाल करता था, और खुश होता था जब उसके अपने, किसी भी तरह उनकी मदद करते। वे उनके दयालुता को याद करते जैसे उन्होंने उन के लिए यह किया हो! मसीह में हमारे भाइयों और बहनों की सेवा करना और स्वर्ग के राजा की सेवा करना एक ही बात है! वाह! यीशु हमारे अच्छे कर्मों को याद करके सिंजोते हैं ताकि वो हमें समय के अंत में इनाम दे सके! वाह!

लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि जो कोई खुद को मसीह का चेला बुलाता हो वो अपना जीवन उनके लिए बिताये। यीशु ने इस कहानी में उनके बारे में यह कहा है:

“फिर वह राजा अपनी बाँई ओर वालों से कहेगा, ‘अरे अभागो! मेरे पास से चले जाओ, और जो आग शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गयी है, उस अनंत आग में जा गिरो। यही तुम्हारा दण्ड है क्योंकि मैं भूखा था पर तुमने मुझे खाने को कुछ नहीं दिया, मैं अजनबी था पर तुम मुझे भीतर नहीं ले गये। मैं कपड़ों के बिना नंगा था, पर तुमने मुझे कपड़े नहीं पहनाये। मैं बीमार और बंदी था, पर तुमने मेरा ध्यान नहीं रखा।’ “फिर वे भी उत्तर में उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे भूखा या प्यासा या अनजाना या बिना कपड़ों के नंगा या बीमार या बंदी कब देखा और तेरी सेवा नहीं की।’ “फिर वह उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सच कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे इन भोले भाले अनुयायियों में से किसी एक के लिए भी कुछ करने में लापरवाही बरती तो वह तुमने मेरे लिए ही कुछ करने में लापरवाही बरती।’ “फिर ये बुरे लोग अनंत दण्ड पाएँगे और धर्मी लोग अनंत जीवन में चले जायेंगे।” –मत्ती २५:४१-४६

और ये मसीह के वो शब्द थे जो उन्होंने अपने चेलों को अपने महान सबक में दिए; उन्हें इस बात के लिए तैयार करते हुए कि उनके जीवन कैसे होने चाहिए जब वो इस धरती पर उसकी सेवा कर रहे थे। जिस प्रकार वे कमजोर और चोट पहुँचे लोगों के लिए अपने प्यार को दर्शाते, वह परमेश्वर को अपना प्रेम दिखाने के लिए एक रास्ता था। यह परमेश्वर के राज्य की बातें है। दस कुंवारियाँ और तोड़ों वाले पुरुषों की कहानी इसी बारे में थी। और मसीह के प्रेम के विशेष कार्य में, हमारी बुलाहट इसी के लिए है!