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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी ९४: रूप – परिवर्तन

मत्ती १६:२१-१७:१३, मरकुस ८:३१-९:१३, लूका ९:२२-३६

पतरस ने यह घोषणा की कि यीशु, जीवते परमेश्वर का पुत्र है। यह एक साहसिक, अयोग्य बयान था, और वह ऐसा करना चाहता था। यह केवल सच्चाई कि घोषणा नहीं थी, बल्कि यह राज निष्ठा कि भी घोषणा थी। पतरस एक पक्ष का चयन कर रहा था क्यूंकि वह जानता था कि यीशु ही परमेश्वर का अभिषेक किया हुआ है। और वह भीड़ और अपनी भूमि के सबसे शक्तिशाली अगुवों की दुश्मनी और अस्वीकृति के खिलाफ यीशु का चयन कर रहा था।

पतरस दुसरे चेलों कि ओर  से बोल रहा था। वही सबसे साहसी था जो बाकियों के दिल में चल रही बातों को कह देता था। और इस घोषणा के बाद, इन लोगों ने दिखाया कि वे परमेश्वर कि योजनाओं को सुनने के लिए तैयार थे। यीशु अपने चेलों को समझा रहे थे कि वे अब येरूशलेम जाने को तैयार थे, और वो वहाँ दुःख उठाने के लिए जा रहा था। उसने कहा, “यह निश्चित है कि मनुष्य का पुत्र बहुत सी यातनाएँ झेलेगा और वह बुजुर्ग यहूदी नेताओं, याजकों और धर्मशास्त्रियों द्वारा नकारा जाकर मरवा दिया जायेगा। और फिर तीसरे दिन जीवित कर दिया जायेगा।”

यह इतना तो साफ़ था। चेलों की आशंकाएं सच होने जा रही थीं। लेकिन यह कैसे हो सकता है? चेलों ने सुन रखा था कि मसीहा इस्राएल के राष्ट्र के लिए विशाल, शक्तिशाली सैन्य जीत लाने जा रहा था। अब यीशु बता विपरीत होने के जा रहा था। मसीहा वध करने के लिए एक मेमने की तरह मारा  जाने वाला था, और यह यहूदी लोगों के हाथों से होने जा रहा था! वे अपने स्वयं के मसीहा को मारने जा रहे थे! यह निश्चित रूप से शिष्यों के लिए उम्मीद की गई थी दृष्टि नहीं थी!

तब पतरस उसे एक तरफ ले गया और उसकी आलोचना करता हुआ उससे बोला,“हे प्रभु! परमेश्वर तुझ पर दया करे। तेरे साथ ऐसा कभी न हो!”

फिर यीशु उसकी तरफ मुड़ा और बोला,“पतरस, मेरे रास्ते से हट जा। अरे शैतान! तू मेरे लिए एक अड़चन है। क्योंकि तू परमेश्वर की तरह नहीं लोगों की तरह सोचता है।”

जिस व्यक्ति के ऊपर यीशु अपनी कलीसिया को बनाने जा रहे थे वही अब परमेश्वर पिता कि इच्छा कि ओर महान अंधेपन को दिखा रहा था। यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर कि  यह योजना थी कि वह दुःख उठाय और मारा जाये, जाती के पापों को अपने ऊपर लेकर मृत्यु कि सामर्थ को नष्ट कर दे। यह इतना विशाल था कि चेले इस महाकाव्य आशा को अपने दिमाग में समा नही सके। यीशु जब एक इंसान के रूप में  खड़े थे, उसके आसमानी बाप उद्देश्य उसके सामने थे। पतरस यीशु को अपने पिता कि मर्ज़ी करने से दूर हटाना चाहता था। शैतान ने भी ऐसा ही किया जब वह यीशु को जंगल में लुभा रहा था। यीशु पतरस कि गलती को पूरी तरह से स्पष्ट कर रहे थे। पतरस को चाहिए था कि एक बार फिर यीशु के आगे घुटने टेकता।

फिर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,

“यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह अपने आपको भुलाकर, अपना क्रूस स्वयं उठाये और मेरे पीछे हो ले।  जो कोई अपना जीवन बचाना चाहता है, उसे वह खोना होगा। किन्तु जो कोई मेरे लिये अपना जीवन खोयेगा, वही उसे बचाएगा। यदि कोई अपना जीवन देकर सारा संसार भी पा जाये तो उसे क्या लाभ? अपने जीवन को फिर से पाने के लिए कोई भला क्या दे सकता है?मनुष्य का पुत्र दूतों सहित अपने परमपिता की महिमा के साथ आने वाला है। जो हर किसी को उसके कर्मों का फल देगा। मैं तुम से सत्य कहता हूँ यहाँ कुछ ऐसे हैं जो तब तक नहीं मरेंगे जब तक वे मनुष्य के पुत्र को उसके राज्य में आते न देख लें। ‘”

कुछ मायनों में, चेले अभी भी भीड़ की तरह थे। वे अभी भी छह रहे थे कि मसीह उन्हें सांसारिक आशीषों के साथ सांसारिक जीवन का एक हिस्सा भी दे दे। यीशु उन्हें अनंत काल कि बातों कि ओर अपनी आशा को लगाने के लिए दबाव डाल रहे थे। उनका इनाम बहुत महान और उनकी सोच से भी बढ़कर था और वह युगानुयुग के लिए था। परन्तु उन्हें उसके साथ क्रूस तक जाने को तैयार होना होगा और अपने जीवन को  एक भेंट कि तरह पहले यीशु को समर्पित करना होगा। चेलों ने शायद पहले से ही निर्णय ले लिया था कि वे यीशु के लिकए युद्ध में लड़ने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालेंगे। वे दाऊद राजा के समान योद्धा, गौरवशाली और बहादुर होने के लिए तैयार थे। लेकिन यह एक अलग मौत थी। क्या वे अपमान और शर्म को सहने के लिए तैयार थे? क्या वे सांसारिक प्रसिद्धि या महिमा के बगैर अपराधियों की तरह मरने के लिए तैयार थे? क्या वे उसके लिए उस क्रूस के लम्बे, अति पीड़ा देने वाली मौत को सहने के लिए तैयार थे?

यीशु के उग्र मांगों का पालन करने के लिए, उसके चेलों को उसकी अनंतकाल कि सच्चाई कि बैटन पर विश्वास करना होगा, क्यूंकि येही वो इनाम है जो वह उन्हें देना चाहता था।क्या वे उसके पीछे चलेंगे? इसका क्या अर्थ था कि यीशु को उसके राज्य कि सामर्थ में आते देखेंगे? उन्हें जल्द पता चल जाएगा!

चेले यीशु के साथ हर जगह गए जहां वो जाता था। छः दिन बाद यीशु, पतरस, याकूब और उसके भाई यूहन्ना को साथ लेकर एकान्त में ऊँचे पहाड़ पर गया। एक महान और पवित्र रहस्योद्घाटन का एक पल आ रहा था, और केवल यीशु के चेले उसे निकटतम से अनुभव करने वाले थे।

जब वे पहाड़ पर खड़े थे, वहाँ उनके सामने यीशु का रूपान्तरण हुआ। वे अब उसे एक उल्लेखनीय बुद्धि और शक्ति वाले मात्र एक आदमी के रूप में नहीं देख रहे थे।  उन के सामने एक यशस्वी, उज्जवल सर्वशक्तमान परमेश्वर का पुत्र खड़ा था, जिसने पूरी सृष्टि को बनाय और बनाय रखा है! यह वो परमेश्वर का पुत्र था जिसे युगानुयुग से स्वर्गदूत पहचानते थे। उसका मुख सूरज के समान दमक उठा और उसके उस के वस्त्र चमचमा रहे थे। एकदम उजले सफेद! धरती पर कोई भी धोबी जितना उजला नहीं धो सकता, उससे भी अधिक उजले सफेद थे। उसका दृश्य कितना दम भरने वाला रहा होगा!

जब वे वहाँ खड़े थे तब चेलों को नींद आने लगी। फिर अचानक मूसा और एलिय्याह उनके सामने प्रकट हुए। वे यीशु अपने महिमा और स्वर्गीय शरीरों में बात कर रहे थे।वे उससे इस विषय में बात कर रहे थे कि वह कैसे इस दुनिया को छोड़ कर जाएगा और कैसे उससे पहले येरूशलेम में जाकर वो सब कुछ पूरा करना है। स्वर्ग के धर्मी सलाहकार जानते थे कि क्या होने जा रहा है, और परमेश्वर ने पहले से ही अपने कुछ सम्मानित पुरुषों को भेज दिया था ताकि वे यीशु के संग कि पेहचान बना सकें जो वह करने जा रहा था। पतरस कि मूर्ख और अँधा था कि उन बातों को रोकने कि कोशिश कर रहा था जो स्वर्ग में रखी हुई थीं!

सो जब वे जागे तो उन्होंने यीशु की महिमा को देखा और उन्होंने मूसा और एलिय्याह को भी देखा जो उसके साथ खड़े थे। आप कल्पना लगा सकते हैं कि पतरस और यूहन्ना और याकूब को कैसा लगा होगा! वहाँ उनके जीवन के महावीर खड़े थे जिन्होंने उन्हें सारी ज़िन्दगी का आदर करने को सिखाया था। शायद यीशु को उनके समय के धार्मिक अगुवों का समर्थन नहीं मिला हो, लेकिन उन्हें परमेश्वर के महँ सेवकों का समर्थन ज़रूर मिला। ये पुरुष पुराने नियम के समर्थन थे कि यीशु ही मसीहा है!

उन महिमायुक्त संतों के जाने का समय आ गया था, लेकिन पतरस, उत्साह में आकर बोला, “प्रभु, अच्छा है कि हम यहाँ हैं। यदि तू चाहे तो मैं यहाँ तीन मंडप बना दूँ-एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए और एक एलिय्याह के लिए।” बिना सोचे समझे पतरस बोल पड़ा। शायद उसे यह लगा कि यीशु अपनी पूरी महिमा में आ गया है। पतरस अभी बात कर ही रहा था कि एक चमकते हुए बादल ने आकर उन्हें ढक लिया और बादल से आकाशवाणी हुई, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इसकी सुनो!”

बाइबिल में, बादल का होना, परमेश्वर कि तीव्र उपस्थिति को दर्शाती है, जो आवर्धित हो गयी है। पहाड़ पर ये पुरुष परमेश्वर पिता कि उपस्थिति से ढंप गए थे, और केवल नम्रता, शांति और आज्ञाकारिता ही से उससे बात कि जा सकती थी। जब शिष्यों ने यह सुना तो वे इतने सहम गये कि धरती पर औंधे मुँह गिर पड़े।  तब यीशु उनके पास गया और उन्हें छूते हुए बोला, “डरो मत, खड़े होवो।” जब उन्होंने अपनी आँखें उठाई तो वहाँ बस यीशु को ही पाया।

जब वे पहाड़ से उतर रहे थे तो यीशु ने उन्हें आदेश दिया कि जो कुछ उन्होंने देखा है वह किसी को ना बताएं। उसने कहा कि जब तक मनुष्य के पुत्र को मरे हुओं में से फिर जिला न दिया जाये तब तक उन्होंने जो कुछ भी पहाड़ पर दृश्य देखा  किसी से भी ना कहें। फिर उसके शिष्यों ने उससे पूछा कि यहूदी धर्मशास्त्री फिर क्यों कहते हैं, एलिय्याह का पहले आना निश्चित है। उसने उनसे कहा, “एलिय्याह आ रहा है, वह हर वस्तु को व्यवस्थित कर देगा। किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि एलिय्याह तो अब तक आ चुका है। पर लोगों ने उसे पहचाना नहीं। और उसके साथ जैसा चाहा वैसा किया। उनके द्वारा मनुष्य के पुत्र को भी वैसे ही सताया जाने वाला है।”

तब उसके शिष्य समझे कि उसने उनसे बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना के बारे में कहा था। कुछ समय से भ्रमित रह्रने के बाद सारे बातों की पुष्टि हो गयी थी। यही सवाल इस्राएल के यहूदी भी पूछते थे, लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं मिलता था। यीशु के वफादार चेले होने पर, पतरस, याकूब और यूहन्ना ने यीशु कि कही हुई बातों का आदर किया। उनका यह सौभाग्य था कि वे अपनीज़िंदगी इस पृथ्वी पर गवा दें, लेकिन उन्होंने स्वर्गीय दर्शन को पा लिया था। एक हफ्ते के भीतर, यीशु ने वायदा किया था कि उसके कुछ चेले मनुष्य के पुत्र को अपने राज्य में आते देखेंगे, कलीसिया कि पहली भविष्वाणी पूरी हो गयी थी। लेकिन आपस में बात करते थे कि यीशु के क्या मतलब था जब वह यह कहता था कि मनुष्य का पुत्र मुर्दों में जी उठेगा। जब कि चेले अचंबित रहे और लड़खड़के आगे बढ़ रहे थे, परमेश्वर  कि योजनाएं आगे कि ओर बढ़ रही थीं।

कहानी ६९: यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का यीशु से प्रश्न पुछा जाना

मत्ती ११:२-१९, लूका ७:१८-३५

यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला क़ैद में था। आप यह देखिये कि, उसने हेरोदेस राजा से कुछ ऐसे प्रश्न पूछे जो उसे पसंद नहीं आये। हेरोदेस ने अपने ही भाई की पत्नी को लिया और उससे शादी कर ली थी। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने ऐसे घृणित काम कि निंदा कि, और हेरोदेस को बिल्कुल यह अच्छा नहीं लगा। तो उसने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को क़ैद में डाल दिया।

जब यूहन्ना क़ैद में बैठा हुआ था, उसके चेले यीशु कि सेवकाई का बयान देने आये जिस समय वह गलील कि यात्रा कर रहा था। देखिये, यीशु वो नहीं कर रहे थे जो यूहन्ना ने अपेक्षा कि थी।

जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने पुराने नियम के नबियों कि मसीह के बारे में लिखीं भविश्वानियों को पढ़ा, उसने एक को देखा जो क्रोध और न्याय करने को आता है। उसने एक सामर्थी योद्धा को देखा जो इस्राएल के देश को उनके पापों से शुद्ध करेगा और उसके दुश्मनों के ऊपर विजय दिलाएगा। परन्तु यीशु ऐसा बिलकुल नहीं कर रहे थे! वे तो बीमारों को चंगा कर रहे थे और मुर्दों को जिला रहे थे! वे प्रेम, बलिदान और प्रार्थना के विषय में प्रचार कर रहे थे ! वह यह सिखा रहे थे कि कैसे परमेश्वर के नियम का पालन करना है जैसा कि परमेश्वर ने चाहा, लेकिन वह उस देश को शुद्ध नहीं कर रहा था जिसके लोग अनाज्ञाकारी थे! न्याय और क्रोध कहाँ था?

यूहन्ना भ्रमित हो गया था और यह एक विशाल भ्रम था। यह वो था जिसको मसीह के लिए रास्ता तैयार करना था। यूहन्ना के पूरे जीवन का उद्देश्य उसके जन्म सेभी पहले निर्धारित किया गया था। वह निश्चय जानता था कि यही अभिषेक किया हुआ यीशु ही है, परन्तु यीशु कि दृष्टी उससे नहीं मिलती थी। वे प्रभु के दिन को कब देखेंगे?   यीशु के पास सवाल करने के लिए भेजा; “‘क्या तू वही है ‘जो आने वाला था’ या हम किसी और आने वाले की बाट जोएं?”

जिस समय जब वे उसके पास सवाल पूछने पहुँचे, वह बड़े पैमाने पर चंगाई कि सेवकाई से घिरा हुआ था, नेत्रहीन अपनी दृष्टी पा रहे थे, लोगों को उनके रोगों से चंगाई मिल रही थी और दुष्ट आत्माएं राक्षसी ताक़तों से मुक्त हो रहे थे। यह परमेश्वर की आत्मा का उंडेलना था और यह बहुत शक्तिशाली सबूत था कि सर्व शांतिमान परमेश्वर उसके साथ था।

यीशु यूहन्ना कि उलझन को समझ गए थे। वह सब पुराने नियम कि आयतों को जानता था जो परमेश्वर के दिन में मसीह के आने का वर्णन करती हैं। वो एक विजयी राजा होकर आएगा। परन्तु वो यह भी जानता था कि विजय होने का समय नहीं आया है। पुराने नियम कि वे दूसरी आयतें थीं जो मसीह के उस सेवकाई का वर्णन करती हैं जिस समय यीशु इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में आया था। ये वो आयतें थी जिससे यूहन्ना को यह बताती कि यीशु उस समय गलील में क्या कर रहे थे। सो यीशु ने उनमें से कुछ को यूहन्ना के चेलों को बतायीं। उसने कहा:

“जो कुछ तुम सुन रहे हो, और देख रहे हो, जाकर यूहन्ना को बताओ कि,अंधों को आँखें मिल रही हैं, लूले-लंगड़े चल पा रहे हैं, कोढ़ी चंगे हो रहे हैं, बहरे सुन रहे हैं और मरे हुए जिलाये जा रहे हैं। और दीन दुःखियों में सुसमाचार का प्रचार किया जा रहा है।”

भावना के एक शक्तिशाली दिल से बोझ उठाना था, और यह सबसे उच्च भगवान उसके साथ था कि शक्तिशाली सबूत था।

यीशु वचनों में यशायाह का उदहारण दे रहे थे। ये आयतें परमेश्वर पिता के कार्यों को जो उसके बेटे यीशु के लिए उस समय के लिए बनायीं गयीं हैं। यशायाह में दूसरी आयतें हैं जो यह बताती हैं कि मसीहा क्या करेगा, लेकिन वो सब बातें आने को हैं। यीशु ने उन आयतों को एक मक़सद से छोड़ दी हैं। एक वह परमेश्वर के प्रतिशोध को उस परमेश्वर के दिन में लेके आएगा और तब वह दुनिया को बदल डालेगा। यशायाह 61 कि एक और आयत है जो यीशु ने छोड़ दी। वह क़ैदियों को उसके क़ैद से मुक्त करने के विषय में बताती है। यूहन्ना क़ैद में था, लेकिन यह यीशु का काम था कि उसे इस पृथ्वी के जीवन में मुक्त करे। यूहन्ना इस पृथ्वी पर के जीवन को स्वतंत्र होते नहीं देखेगा जब तक उसका जीवन खत्म नहीं हो जाता और वह सदा के आनंद और स्वतंत्रता में चला गया।

यीशु के यूहन्ना को उसके आखरी शब्द थे, “वह व्यक्ति धन्य है जिसे मुझे स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं।” यीशु नहीं चाहते थे कि यूहन्ना निराश हो क्यूंकि उसकी सेवकाई उसके सोच के अनुसार नहीं थी। वो उसे अशिक्षित करना चाहता था और चाहता था कि यूहन्ना उस पर निर्भर करे जैसा कि उसने योजना बनाई!

पृथ्वी पर किसी ने भी परमेश्वर के समय को नहीं समझा। वे नहीं जानते थे कि मसीह सबसे पहले बंधी को छुड़ाने आया है और फिर स्वयं दुःख उठाने और मरने के लिए आया। परमेश्वर ने इसे गुप्त रखा था!उसने इस बात को कि प्रभु का दिन हज़ारों साल के बाद आएगा इसे घोषित नहीं किया। हम अभी भी यीशु का इंतज़ार कर रहे हैं कि वो उस दिन को लाने के लिए फिर से आएगा। और वह होगा! हम बेसब्री से बड़ी उम्मीद के साथ उसकी बात जोते हैं। यीशु पहली बार मृत्यु पर जय पाने के लिए आया था, और हम जो उसके मृत्यु और जी उठने पर विश्वास करते हैं उसके आने को लेकर भयभीत नहीं होते। हम उसी के हैं, और हम स्वर्ग में अनन्त जीवन के लिए एक दिन उसमें शामिल हो जाएंगे।

यूहन्ना के चेले जब उसके सन्देश को लेकर गए, यीशु ने उस भीड़ कि तरफ मुड़ कर देखा जो उन दिनों में हमेश उसके साथ रहती थी। उसने उनसे यूहन्ना कि शानदार सेवकाई के विषय में बताया।

“‘तुम बियाबान जंगल में क्या देखने गये थे? क्या हवा में झूलता कोई सरकंडा? नहीं?  फिर तुम क्या देखने गये थे? क्या कोई पुरुष जिसने बहुत उत्तम वस्त्र पहने हों? नहीं, वे लोग जो उत्तम वस्त्र पहनते हैं और जो विलास का जीवन जीते हैं, वे तो राज-भवनों में ही पाये जाते हैं।  किन्तु बताओ तुम क्या देखने गये थे? क्या कोई नबी? हाँ, मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुमने जिसे देखा है, वह किसी नबी से कहीं अधिक है। यह वही है जिसके विषय में लिखा गया है:

‘देख मैं तुझसे पहले ही अपना दूत भेज रहा हूँ, वह तुझसे पहले ही राह तैयार करेगा।’

मैं तुम्हें बताता हूँ कि किसी स्त्री से पैदा हुओं में यूहन्ना से महान् कोई नहीं है। किन्तु फिर भी परमेश्वर के राज्य का छोटे से छोटा व्यक्ति भी उससे बड़ा है।'”

भीड़ जब यीशु को सुन रही थी तो वे पूरे ह्रदय से सहमत थे। यहाँ तक कि चुंगी लेने वाले भी यूहन्ना के पास बपतिस्मा लेने के लिए गए थे, और उन्होंने उसके प्रचार को सुना। उन्होंने पश्चाताप किया और परमेश्वर के कार्य को अपने जीवन में बहने दिया! वे यह मानते थे कि यूहन्ना कोई पुराने नबियों के समान है! वे जानते थे कि उसकी सेवकाई परमेश्वर कि ओर से है।

लेकिन फरीसियों और कानून के शिक्षकों ने यूहन्ना कि सेवकाई को अपने दिलों को छूने की अनुमति नहीं दी। यूहन्ना जब परमेश्वर के वचन को बाँट रहा था, उन्होंने सुनने से इंकार कर दिया और अपने ह्रदय कठोर कर लिए। उन्होंने पश्चाताप करने का और परमेश्वर कि सामर्थ से बदलने का अवसर खो दिया था और बपतिस्मा लेने से भी इंकार कर दिया। परमेश्वर अपनी सामर्थ के द्वारा इस संसार को नए सिरे से तोड़ने जा रहा था, और ये मुर्ख लोग अपने धार्मिक गर्व के कारण, परमेश्वर कि उनके जीवन के लिए योजना को ठुकरा दिया! सब कुछ जो सही है उसका कितना भयंकर उल्लंघन! सब बातों में अपने सृष्टिकर्ता को ठुकरा देना! और कितनी भयंकर शोकपूर्ण घटना! यह मनुष्य जिस मक़सद के लिए बनाय गए थे उसके कारण से चूक गए!

कहानी २९: यूहन्ना बपतिस्मा देने वाली घटना

यूहन्ना ३ः२२-३६

यरूशलेम से जाने के बाद, यीशु और उसके चेले यहूदी पहाड़ी क्षेत्र से बाहर चले गए। यीशु ने वहाँ अपने चेलों के साथ समय बिताया और उन्हें बपतिस्मा दिया जो उनके पास आये। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला लोगों को ऐनोन के क्षेत्र में बपतिस्मा दे रहा था। वहाँ बहुत से लोग उसके पास दूर दूर से आने लगे। उसके चेले आपस में चर्चा करने लगे की कहीं यह एक वास्तविक समस्या है। वे परेशान थे। इसलिए वे यूहन्ना के पास गए। ऐसा लगता था कि लोग यूहन्ना के पास न जाकर अधिक से अधिक यीशु के पास बपतिस्मा लेने के लिए जा रहे थे! उन्होंने कहा,

” ‘ हे रब्बी, जो व्यक्ति यरदन के उस पार तेरे साथ था और जिसके बारे में तूने बताया था, वही लोगों को बपतिस्मा दे रहा है, और हर आदमी उसके पास जा रहा है।”’

यूहन्ना के चेलों को यह नहीं भाया की जो ध्यान और लोकप्रियता यीशु को मिल रहाहै वह उनके अपने अग्वे को नहीं मिल रहा था। वे उसकी सेवकाई की रक्षा करना चाहता थे। लेकिन यूहन्ना अपने ही प्रसिद्धि या लोकप्रियता के बारे में चिंतित नहीं था। परमेश्वर की सेवा के लिए उसने अपने जीवन को समर्पित कर दिया था और वह मसीह के रास्ते को तैयार कर रहा था। यूहन्ना की विनम्रता की शक्ति और सौंदर्य को सुनो;

” जवाब में यूहन्ना ने कहा, “किसी आदमी को तब तक कुछ नहीं मिल सकता जब तक वह उसे स्वर्ग से न दिया गया हो। तुम सब गवाह हो कि मैंने कहा था, ‘मैं मसीह नहीं हूँ बल्कि मैं तो उससे पहले भेजा गया हूँ।’ दूल्हा वही है जिसे दुल्हन मिलती है। पर दूल्हे का मित्र जो खड़ा रहता है और उसकी अगुवाई में जब दूल्हे की आवाज़ को सुनता है, तो बहुत खुश होता है। मेरी यही खुशी अब पूरी हुई है। अब निश्चित है कि उसकी महिमा बढ़े और मेरी घटे। “
यूहन्ना ३ः२७-३०

वाह! क्या आपने इसे समझा? यूहन्ना कहता है की यीशु विवाह के दुल्हे के समान है। हजारों साल से, यीशु उसके लिए एक दुल्हन की तैयारी कर रहा था। दुल्हन इस्राएल का राष्ट्र था! दुल्हे को भेजने से पहले, परमेश्वर ने यूहन्ना को दुल्हन को उसके लिए तैयार करने के लिए पहले भेज दिया जिसका वह इंतज़ार कर रही थी। हर व्यक्ति जिसने पश्चाताप करके बपतिस्मा लिया वह यह दर्शा रहा था की वह तैयार है। और अब वह आ गया था! यीशु के हाथ में यहूदी लोगों को सौंपने के लिए योहन्ना बहुत आनंदित था। यही उसका कार्य था! उसे इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं थी कि सब उसे भूल गए पर यह की सब उस यशस्वी दुल्हे के पीछे हो लिए हैं।

तब यूहन्ना ने कुछ ऐसा कहा जो यह बताती है की यीशु कौन है और हम कौन हैं:

‘जो ऊपर से आता है वह सबसे महान् है। वह जो धरती से है, धरती से जुड़ा है। इसलिये वह धरती की ही बातें करता है। जो स्वर्ग से उतरा है, सबके ऊपर है;  उसने जो कुछ देखा है, और सुना है, वह उसकी साक्षी देता है पर उसकी साक्षी को कोई ग्रहण नहीं करना चाहता।  जो उसकी साक्षी को मानता है वह प्रमाणित करता है कि परमेश्वर सच्चा है। क्योंकि वह, जिसे परमेश्वर ने भेजा है, परमेश्वर की ही बातें बोलता है। क्योंकि परमेश्वर ने उसे आत्मा का अनन्त दान दिया है।  पिता अपने पुत्र को प्यार करता है। और उसी के हाथों में उसने सब कुछ सौंप दिया है।  इसलिए वह जो उसके पुत्र में विश्वास करता है अनन्त जीवन पाता है पर वह जो परमेश्वर के पुत्र की बात नहीं मानता उसे वह जीवन नहीं मिलेगा। इसके बजाय उस पर परम पिता परमेश्वर का क्रोध बना रहेगा।”’
यूहन्ना ३ः३१-३६

कहानी २६: लड़ाई का शुरू होना

religious scene, Christ and his disciples

यूहन्ना १ः१९-५१

उसके बपतिस्मा के बाद, यीशु,पवित्र आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाया गया की वह शैतान के द्वारा परखा जाए। इस बीच येरूशलेम के सलाहकार जो देश के सबसे सामर्थी धार्मिक अग्वे थे, उन्होंने याजकों को यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के पास सवाल करने के लिए भेजा। किसी ने भी यूहन्ना को प्रचार करने के लिए अधिकार नहीं दिया था। क्या वह परमेश्वर द्वारा भेजा गया मनुष्य था, या वह एक पाखंडी था? क्या वह मसीहा हो सकता था? यूहन्ना ने तुरंत घोषित किया कि वह वो मसीहा नहीं है जिसका उनको इंतज़ार है। उन्होंने उससे बहुत सवाल किये। यदि वह यीशु नहीं था तो कौन था ? एक नबी ? एलिजा ? वे लोगों को क्या जवाब देंगे जिन्होंने उनको भेजा था ?

यूहन्ना ने उनको अपने ज्ञान के बल पर उत्तर दिया “ मैं उसकी आवाज़ हूँ जो जंगल में पुकार रहा है:‘प्रभु के लिये सीधा रास्ता बनाओ।’”जैसे कि यशायाह नबी ने कहा था।
यह वचन परमेश्वर ने उसे और उसके माँ बाप को दर्शाया और वह अपने आप को कम या ज़यादा नही कहता।
अंत में फरीसियों में से कुछ ने उस से पूछा, यदि वह पुराने नियम में के महान नेताओं में से एक नहीं था तो उसे लोगों को बपतिस्मा देने का क्या अधिकार था ?

उसने कहा ‘ मैं जल से बपतिस्मा देता हूँ लेकिन आप के बीच में एक खड़ा है जिसे आप नहीं जानते ,वह मेरे पीछे आता है, जिसका जूता मैं खोलने के योग्य नहीं हूँ। ‘ “

वाह ! उन दिनों में, सड़कें धूल से भरी थीं, और अधिकतर लोग पैदल सब जगह जाया करते थे। जूतों को बांधना और खोलना एक बहुत विनम्र काम हुआ करता था। यूहन्ना को नहीं लगा कि वह इस काम को करने के योग्य है और विशेषकर के जब यीशु के पैरों से उनके जूते खोलने थे। इस परमेश्वर की इच्छा के आगे यूहन्ना कितना सही और शुद्ध था। जो मनुष्य यूहन्ना के पास सवाल करने के लिए आये थे वे समझते थे कि उनके पास उन सवालों का उत्तर पाने का पूरा अधिकार है।परन्तु परमेश्वर ने यूहन्ना को उसके आने के सन्देश के विषय में अधिकार दिया था। परमेश्वर कि योजनाओं के विषय में उन अधिकारीयों कि आँखें बंध थीं और यह दर्शा रहा था कि उनके ह्रदय कितने कठोर थे।

जिस समय धार्मिक अग्वे परमेश्वर कि योजनाओं को अस्वीकार कर रहे थे, बहुत से लोग यूहन्ना के सन्देश पर विश्वास कर के बपतिस्मा ले रहे थे। इन लोगों ने सुना कि पवित्र आत्मा यूहन्ना से क्या  कह रहा है, और वे उसके पीछे चलने को बहुत उत्साहित थे।  अधिकतर लोग उसके चेले बन गए थे। उसकी वचन कि बातों को सुनने के लिए वे बहुत दिन तक नदी के किनारे डेरा लगाकर रहने लगे।

क्या आप ऐसे व्यक्ति नहीं बनना चाहेंगे? यह कितना भयानक विचार है ऐसा सोचना कि हम परमेश्वर कि योजनाओं के विरुद्ध अपने मनों को कठोर कर लें ! सबसे सुरक्षित बात यह होगी कि हम वही करें जैसा यूहन्ना कहता है। हमें परमेश्वर के आगे निरंतर विनम्र और पश्चाताप के ह्रदय के साथ आना चाहिए।

उस समय, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला यरदन शहर के पास बपतिस्मा देता था। जंगल में स्वर्गदूत जब यीशु कि सेवकाई कर चुके, वह बेथनी के डेरे में वापस चला गया। एक दिन, जब यीशु वहाँ से गुज़र रहा था, यूहन्ना ने कुछ चेलों से कहा, “उस परमेश्वर के मेमने को देखो, जो सारी दुनिया का पाप लिये जाता है!” वाह ! यह एक दम भरने वाला विशाल बयान है। उन सब पाप के वषय में सोचो जो श्राप के कारण इस दुनिया में आया। हर झूठ, हर खून, हर स्वार्थ से भरा काम या गंदे मज़ाक, हर चोरी, हर गिरा हुआ पाप, और हर एक व्यक्ति का सबसे भत्तर हिस्सा, यह सब यह एक मनुष्य दूर कर देगा। या तो यह एक विशाल सच है जो एक श्रापित दुनिया ने सुना होगा या फिर यह एक बेतुका झूठ है और यूहन्ना एक बददिमाग इंसान था।

तब यूहन्ना ने कहा कि यीशु है जिसकी जूते वह पकड़ने के योग्य नहीं था। जिसके विषय उसने  बात की वह आ गया था! उसने कहा, “जिस कारण मैं पानी का बपतिस्मा देने के लिए आया था वह इसलिए था कि वह इस्राएल को प्रकट हो सके।  वाह ! यूहन्ना अपने सारे जीवन भर यीशु के विषय में बता सकता था और यह कि यीशु क्या कुछ करने वाला था और वह पूरी पूरी गहराई से उस पर विश्वास करता था जिसका वह प्रचार करता था। स्वर्गदूतों का उसके पिता के सामने प्रकट होना जो पवित्र से भी पवित्र था, उसकी माँ का अद्बुध तरीके से गर्भवती होना, जंगल में बहुत साल तक रहना, यह सब उस यीशु के विषय में था जो गलील में एक बढई था। यूहन्ना कैसे जानता था? वह यह कैसे जान सकता था कि उसका भाई पुराने नबियों में से वो मसीहा था ?

यूहन्ना ने यह माना कि यदि परमेश्वर ने उसे यह नहीं दिखाया होता कि यीशु ही वो है तो वह कभी नहीं जान पाता। जो परमेश्वर ने कहा उसपर उसे पूरा भरोसा था। परमेश्वर ने यूहन्ना को बता दिया था कि जब वह व्यक्ति आएगा तब उसपर पवित्र आत्मा उतरेगा।  यह ठीक वैसा ही हुआ जब उसने यीशु को बपतिस्मा दिया। यूहन्ना को पूरा विश्वास था कि  पिता परमेश्वर ने उसे मसीहा को प्रकट कर दिया था।  और तब वह साहसपूर्व घोषित करने लगा कि,”मैंने परमेश्वर के पुत्र को देखा है और उसकी गवाही देता हुँ। ”

दुसरे दिन जब यूहन्ना दो चेलों के साथ खड़ा था, यीशु दुबारा वहाँ से गुज़रा।  उसने कहा ,”देखो, परमेश्वर का मेमना!” चेले जानते थे कि यूहन्ना सच बोलता है और वे यीशु के पीछे हो लिए। यीशु ने पीछे मुड़ कर उन्हें अपने पीछे आते देखा। “तुम्हें क्या चाहिए ?” उसने पुछा।

उन्होंने कहा, “रब्बी, आप कहाँ रहते हैं ?” अब, यह शब्द “रब्बी” का अर्थ है शिक्षक, परन्तु इसका मतलब कोई भी शिक्षक नहीं। इसका अर्थ है मेरा शिक्षक। योहन्ना के यह चेले चाहते थे कि यीशु उनको अपना बना ले।

“आओ ‘उसने उत्तर दिया, “और तुम देखोगे। “दोपहर के चार बज रहे थे। वे यीशु के साथ चले गए और उसके साथ पूरा दिन बिताया। उनमें से एक का नाम अन्द्रियास था। जैसे ही उसने सुना जो यूहन्ना ने कहा था, वह अपने भाई, जिसका नाम शिमोन था, उसे ढ़ूंढ़ने चला गया। सोचिये, वह कितना खुश हुआ होगा जब उसे यह बताया गया होगा कि “हमें मसीहा मिल गया है! “तब शिमोन को वह यीशु के पास सीधे ले गया। जब यीशु ने शिमोन को देखा तब उसने कहा, “तुम शिमोन हो, यूहन्ना के बेटे।  तुम्हारा नाम केफस होगा ( जिसका अर्थ पतरस भी है।  इसका अर्थ है ‘चट्टान “)

दुसरे दिन यीशु ने गलील जाने की योजना बनाई। वह एक व्यक्ति जिसका नाम फिलिपूस था उसके पास गया और बोला “मेरे पीछे हो ले। फिलिपूस उसी नगर था जहाँ के पतरस और अन्द्रियास थे।  यह गलील के समुन्दर के उतरी भाग के पानी के किनारे पर बसा हुआ एक शहर था।फिलिपूस अपने दोस्त नतनएल को खोजने गया ताकि वह भी उनके साथ आ सके। उसने कहा,”” ‘ हमने उसे खोज लिया है जिसके विषय में मूसा ने नियम में लिखा था, और जिसके विषय में नबियों ने लिखा था – यीशु नासरी, युसूफ का पुत्र। ”

नतनएल ने कहा,” नासरी! क्या नासरी से कुछ अच्छा निकल कर आ सकता है ? ” इस्राएल में तो बहुत से सुन्दर शहर और पसंद आने वाली जगहैं हैं, और नासरी उसमें से एक नहीं हो सकता। नथानियल को यह बहुत अजीब और अद्बुध लगा कि यीशु ऐसे शहर से आया था। लेकिन फिलिपूस का ध्यान ओझल नहीं हो सकता था।  “आओ और देखो !”  उसने ज़ोर दिया।

जब नतनएल यीशु के पास गया, तो यीशु ने कहा, “यहाँ एक सच्चा इस्राएली है जिसके अंदर कोई असत्य नहीं है। ”
“‘आप मुझे कैसे जानते हैं? ‘ नतनएल ने पूछा।”
‘यीशु ने उत्तर दिया, “फिलिपूस के बुलाने से पहले मैंने तुम्हे खजूर के पेड़ के नीचे खड़े देखा था। ”
नथानियल बहुत चौकन्ना हुआ। उसने पुकार के कहा, “रब्बी , आप परमेश्वर के पुत्र् हैं, आप इस्राएल के राजा हैं। ‘”
यीशु ने वापस उत्तर दिया, “तुम विश्वास करते हो क्युंकि मैंने तुम्हे बताया कि मैंने तुम्हे खजूर के पेड़ के नीचे खड़े देखा था।
तुम इससे भी बड़े बड़े काम देखोगे.. मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुम स्वर्ग को खुलते देखोगे, और मनुष्य के पुत्र् पर परमेश्वर के स्वर्गदूतों को उतरते और चढ़ते देखोगे। ”

वाह ! क्या आप चेलों की उत्तेजना को समझ सकते हैं जब वे यीशु के साथ साथ चलेंगे और बातें करेंगे? यह मसीह था, और उसने उनको चुन लिया था !

कहानी २४: (यूहन्ना बतिस्मा देने वाला ) परमेश्वर का बेटा

मत्ती ३; मरकुस १; लूका ३

Baptism of Jesus in stained glass

भीड़ यूहन्ना पर उमड़ती जा रही थी, और उसने यरदन नदी के पानी में सब पश्चाताप करने वालों को बपतिस्मा दिया। लोग उसके परमेश्वर कि आत्मा से भरे हुऐ निडर घोषणाओं को देख सकते थे, और वे आश्चर्य करने लगे कि वह कौन है। क्या वह नबी मीका के भविष्वाणी के अनुसार नबी एलिशा था जो वापस जीवित हुआ? क्या वह मसीहा था? क्या वह आने वाला नबी था जिसके विषय में मूसा ने व्यवस्थाविवरण की किताब में उल्लेख किया है? और इसका क्या अर्थ था कि परमेश्वर नए और शक्तिशाली तरीके से काम कर रहा था?

उनके सभी सवालों का, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला केवल एक ही जवाब देता था। उसने कहा कि जो आ रहा है वह उससे कहीं अधिक महान है। वह इस बात इस बात कि ओर चौकस रहता था की मसीह कि ओर रास्ता दिखाए। उसने कहा;

“मैं तो तुम्हें तुम्हारे मन फिराव के लिये जल से बपतिस्मा देता हूँ किन्तु वह जो मेरे बाद आने वाला है, मुझ से महान है। मैं तो उसके जूतों के तस्मे खोलने योग्य भी नहीं हूँ। वह तुम्हें पवित्र आत्मा और अग्नि से बपतिस्मा देगा।12 उसके हाथों में उसका छाज है जिस से वह अनाज को भूसे से अलग करता है। अपने खलिहान से वह साफ किये समस्त अनाज को उठा, इकट्ठा कर, कोठियों में भरेगा और भूसे को ऐसी आग में झोंक देगा जो कभी बुझाए नहीं बुझेगी।”
मत्ती ३ः११-१२

सुसमाचार सुनाते समय यूहन्ना ने अपनी भूमिका नहीं खोई। उसने यह घोषित किया कि यीशु ही है जो राज्य को लाएगा! उसकी महानता के आगे यूहन्ना ने अपने को नम्र बनाया। इस्राएलियों के मध्य में केवल एक पूर्ण सेवक को किसी की जूती को खोलने और लाने कि आज्ञा थी। इसलिए कि जब यूहन्ना ने यह कहा कि वह उसकी जूती को उठाने के योग्य नहीं है तो वह नम्रता को घोषित कर रहा था। वह यह कह रहा था कि मसीह के पवित्र योग्यता की तुलना में वह छोटे से छोटे सेवक से भी छोटा है। आज के समय के सबसे शक्तिशाली उपदेशक कि ओर से यह आया हुआ बड़ा बयान था। यीशु के आगे ऐसी नम्रता किसी असुरक्षा कि निशानी को संकेत नहीं करता। राज्य के सुसमाचार के मूल्य को लेकर वह निश्चय था। वह जानता था कि जिस प्रकार एक किसान अपने खलिहान में अनमोल,पौष्टिक गेहूं बटोरता है वैसे ही वे जो परमेश्वर की ओर ध्यान देंगे वे उसके राज्य में इकट्ठे किये जाएंगे। यह अवश्य ही एक महत्वपूर्ण संदेश था !

यूहन्ना ने यह घोषित किया कि जो उसकी बातों को अस्वीकार करेंगे वे फूस के सामान होंगे। यह एक गेहूं के पौधे का बेकार हिस्सा है। गेहूं का अनमोल गुठली जब फूस से अलग कर दिया जाता है, उसे आग में फेंक कर जला दिया जाता है। यह कठोर, कठिन शब्द थे। वे गंभीर और डरावने थे ! लेकिन वे सही थे। मानवता के लिए केवल दो विकल्प हैं। विद्रोही की कड़ी हार्दिकता को तोड़ने के लिए इस गंभीरता की जरूरत थी। उनके धोकेपन से उन्हें झंझोरने के लिए और क्या कर सकते है? और विनाश की ओर जाने वाले को क्या दिखा सकते थे ?

कुछ समय के लिए, यूहन्ना ने बेथनी के शहर के पास यरदन नदी में बपतिस्मा दिया। जिस समय वह वहाँ था, यीशु उससे बपतिस्मा लेने के लिये गलील से आया। इस समय तक, यीशु ने एक बढ़ई के रूप में काम किया था। जो काम उसके पिता ने किया वही काम उसने भी किया। लेकिन समय आ गया था कि वह अपनी सेवकाई को शुरू करे, और इसीलिए वह अपने भाई को मिलने गया जो उसकी राह को तैयार करने में जुटा हुआ था।

जब यूहन्ना ने यीशु को नदी में उसकी ओर बढ़ते देखा उसने उसे रोकने की कोशिश की। ” ‘मुझे आप से बपतिस्मा लेने की आवश्यकता है, और आप मेरे पास आते हो?’ ” यूहन्ना जानता था कि उसे मसीह से शुद्धिकरण की जरूरत है, ना की यीशु को। वह जनता था कि यीशु को पश्चाताप करने की ज़रूरत नहीं थी। उसने पाप कभी नहीं किया था। परन्तु यीशु यह जनता था कि बपतिस्मा परमेश्वर की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।उन्होंने कहा, ” ‘यह ऐसा होने दो; हमारे लिए ऐसा करना उचित  होगा ताकी सारी धार्मिकता पूरी हो।” सो यूहन्ना सहमत हुआ।

यीशु परमेश्वर की इच्छा को विनम्रता से प्रस्तुत करने के लिये पानी में उतरा। जैसे ही वह पानी से ऊपर आया, आकाश खुद-ब-खुद खुला और पवित्र आत्मा कबूतर की नाई यीशु पर उतरा। अभिषेक किया हुआ आ चुका था। स्वर्ग से एक आवाज़ निकली और बोली :

“‘यह मेरा पुत्र है ,जिससे मैं प्रेम करता हूँ, और मैं उससे प्रसन्न हूँ ।’ “

वाह! हमें यहाँ थामना चाहिए। बाइबिल कि कहानियों में कुछ ऐसी बातें होती हैं जो बहुत महान और शानदार हैं और जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हम उस महानता को देख भी नहीं पाते क्यूंकि उसे देखने के लिए हमारी काल्पनिक नज़र बहुत छोटी है। यह एक चींटी की तरह है जो एक सुन्दर झरने के किनारे से जा रही है। चींटी केवल उस लकड़ी को समझ सकती है जो उसके पैरों के नीचे है। उसे उसके चारों ओर गिरने वाली महिमा का कोई अंदाज़ा नहीं है। इस कहानी में, परमेश्वर पिता ने स्वर्ग से अपनी महिमा के सिंहासन से बात की थी!

अपने महान प्रेम और सही योजना से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने उन महान महत्व शब्दों से आकाश को दो भागों में बाटा। उन्होंने कहा कि यह मनुष्य, यीशु, उनका अपना ही पुत्र है। और उन्होंने अपनी खुशी का वर्णन करने के लिए अपने ही पवित्र शास्त्र  के वचनों का प्रयोग किया। बाइबिल का एक अच्छा यहूदी छात्र ये वचन ” ,मैं इससे बहुत खुश हूँ ” को यशायाह की भविष्यवाणी में खोज सकता था।  यह अध्याय ४२ः१-४ से है। अपने बेटे कि सेवकाई के विषय में पिता परमेश्वर संसार को एक शक्तिशाली सन्देश दे रहा था। यशायाह ने यूं कहा है ;

“मेरे दास को देखो! मैं ही उसे सभ्भाला हूँ।
मैंने उसको चुना है, मैं उससे अति प्रसन्न हूँ।
मैं अपनी आत्मा उस पर रखता हूँ।
वह ही सब देशों में न्याय खरेपन से लायेगा।
वह गलियों में जोर से नहीं बोलेगा।
वह नहीं चिल्लायेगा और न चीखेगा।
वह कोमल होगा। कुचली हुई घास का तिनका तक वह नहीं तोड़ेगा।
वह टिमटिमाती हुई लौ तक को नहीं बुझायेगा।
वह सच्चाई से न्याय स्थापित करेगा।
वह कमजोर अथवा कुचला हुआ तब तक नहीं होगा
जब तक वह न्याय को दुनियाँ में न ले आये।
दूर देशों के लोग उसकी शिक्षाओं पर विश्वास करेंगे।”

यूहन्ना के लिए कैसा आश्चर्य भरा दिन था! त्रिएक परमेश्वर  की महिमा  उसकी आंखों के सामने थी। उसके सामने वो परमेश्वर का पुत्र खड़ा था जिसके पिता ने स्वर्ग से बोला था  इस बीच परमेश्वर कि आत्मा कि समर्थ का विशेष अभिषेक इस मनुष्य पर उतरा जो स्वयं भी परमेश्वर था। यह हमारे लिए समझना असम्भव है कि कैसे पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा त्रिएक परमेश्वर है, और फिर भी वे पूरी तरह से एक जुट और पूर्ण रूप से एक हैं। यह रहस्य मानव क्षमता से परे है। हमें पूरी विनम्रतापूर्वक बाइबिल के इस सच्चाई के लिए खुद को प्रस्तुत करना है। और हम आनंद मनाएं कि उस दिव्य प्रेम की पूर्णता से घिरे हुए हैं।

जो हम जानते हैं वह यह है की, यीशु के बपतिस्मे के समय परमेश्वर ने अपने आप को एक साथ त्रिएकता में प्रकट किया था। उन्होंने अपने बेटे को पृथ्वी पर खोये हुओं के उद्धार के लिए सार्वजनिक रूप से अभिषेक किया। यीशु, जो आने वाला था, मानव जाती के इतिहास में उसके शब्द और सेवकाई परमेश्वर कि इच्छा और योजना का एक हिस्सा था। जो काम वह करने वाला था उसकी क्या सामर्थ भरी शुरुआत थी! यूहन्ना की यीशु में आशायें परमेश्वर कि यशस्वी उपस्तिथि से साबित हुईं जो उस दिन यरदन नदी पर दिखीं, और उसने सहसपूर्व यीशु के विषय में प्रचार किया।

कहानी २३: मार्ग को तैयार करना|

मत्ती ३ः७-१०, लूका ३ः७-१४

यूहन्ना कि सेवकाई के विषय में यशायाह नबी की भविष्यवाणी सुनो;

“हर घाटी भर दी जायेगी
और हर पहाड़ और पहाड़ी सपाट हो जायेंगे
टेढ़ी-मेढ़ी और ऊबड़-खाबड़ राहें
समतल कर दी जायेंगी।
और सभी लोग परमेश्वर के उद्धार का दर्शन करेंगे!”
यशायाह ४०ः३-५

क्या आप ऐसे असभ्य और पथरीले राह कि कल्पना कर सकते हैं जो पहाड़ों पर ऊपर और नीचे गहरी घाटियों में मुड़ते हैं? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कितना आसान होता यदि ये गहरे गड्ढे भर दिए हाते और पहाड़ों के रास्ते चिकने कर दिए जाते? यूहन्ना  का सन्देश इसी के लिए था। वह ऐसा था मानो हर एक व्यक्ति के ह्रदय में मसीह के लिए रास्ते उस को तैय्यार किया जा रहा है। जो अपने ह्रदय को मसीह के लिए तैय्यार करते हैं, वे उसके लिए रास्ते को तैय्यार कर रहे हैं।

जब यूहन्ना परमेश्वर के वचन का प्रचार करता था, बहुत भीड़ उसे सुनने के लिए आती थी। उसके अद्भुद सन्देश के विषय में अफ़वाह फैल गई थी। बहुत ही जल्द, येरूशलेम से लोग आने लगे, जो यहूदिया का एक क्षेत्र है, और यरदन नदी के आस पास का क्षेत्र है। वे मीलों दूर से सफ़र कर के आते थे! कल्पना कीजिये कि कैसे गाँव और शहरों के लोग चर्चा करते होंगे। उन अफ़वाहों के बारे में सोचिये जो हेरोदेस राजा के महल में और मंदिर के दरबार में हो रही थीं। यह व्यक्ति इस निर्जन जगह में क्या कर रहा था और उसका क्या मतलब था?

बहुत से पश्चाताप करने के लिए और बपतिस्मा लेने के लिए आये। वे अपने पापों से शुद्ध और परमेश्वर के साथ सिद्ध होना चाहते थे। दूसरे इस सब उत्साह को देखने के लिए आते थे। कुछ धार्मिक अगुवे उस प्रचारक को देखने के लिए आये। क्या उसके वचन परमेश्वर के वचन को सम्मान दे रहे थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई पहले के नबियों में से कोई आ गया हो?

अन्य अगुवे इसीलिए आये क्यूंकि यूहन्ना के शक्तिशाली सन्देश से उनकी अपनी सत्ता खतरे में दिख रही थी। वे उस प्रतियोगिता पर नज़र रखना चाहते थे। उनके ह्रदय परमेश्वर की बातों की ओर नहीं थे। ये धार्मिक अगुवे परमेश्वर कि पवित्र वस्तुओं से अपने लिए दुसरे मनुष्यों कि दुनिया में अपने आप को स्थापित करना चाहते थे, और यूहन्ना उनके लिए बाधा बना हुआ था।

हर एक जन जो उसके सन्देश को सुनने के लिए आता था, यूहन्ना उन्हें उनके पापों के लिए ताड़ना देता था। हर एक के पास पश्चताप करने का महत्वपूर्ण वजह थी, और वे जानते थे कि परमेश्वर उनसे कौन से पाप को इंकार करने को कह रहा है। बहुतों के ह्रदय गहरायी से चीर गए। उन्होंने यूहन्ना को अपने पापों से पश्चाताप करने के लिए पुकारा। उन्होंने उससे पूछा कि उन्हें बदलने के लिए क्या करना चाहिए। वे उन सब बातों को इंकार कर देना चाहते थे जो परमेश्वर कि ओर से नहीं थे। यीशु के लिए मार्ग उनके ह्रदय में तैय्यार हो रहा था।

जब वे यरदन नदी के किनारे खड़े थे, यूहन्ना लोगों को उन वास्तविक बातों को बता रहा था जिससे कि वे परमेश्वर कि महिमा कर सकें। पहले उसने बताया कि जिस किसी के पास दो वस्त्र हों, वह उनमें एक किसी ऐसे को देदे जिसके पास एक भी ना हो। वाह। परमेश्वर अपने बच्चों को बहुतायत से देने के लिए बुला रहा था। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह दुनिया कैसी होती यदि सब इसी तरह रहते?

जब कुछ कर लेने वाले बपतिस्मा लेने के लिए उसके पास आये, उसने उन्हें लोगों से अधिक कर लेने से मन किया। उस समय के कर लेने वाले इस बात के लिए प्रसिद्ध थे कि वे लोगों से ज़रुरत से ज़यादा धन लेते थे और अतिरिक्त धन अपने लिए रख लेते थे। उन्होंने इसी तरह अतिरिक्त धन बटोर कर अपने आप धनवान बना लिया था। यह एक बहुत भयंकर पाप था, परन्तु यह उनके जीने का तरीका था। यूहन्ना ने उनसे यह मांग की कि वे अपने पूरे व्यवसाय को करने के ढंग को बदल डालें। इसका अर्थ यह था कि उन्हें बहुत सारे धन संपत्ति को दे देना होगा। इसका मतलब था कि उन्हें उन सब चीज़ों को त्याग कर जिनसे वे अधिक प्रेम करते थे, परमेश्वर और उसकी धार्मिकता से अधिक प्रेम करना होगा। परन्तु वे और भी अनमोल ख़ज़ाने को पाएंगे। ह्रदय कि पवित्रता और परमेश्वर के साथ उनका और भी सिद्ध रिश्ता होगा और जो ऐसे अमूल्य दान हैं जिसे धन से नहीं खरीदा जा सकता। धार्मिकता में खड़े होने के लिए उन्हें गहरायी से सामर्थ और आनंद प्राप्त होगा। वे अपने आप को सम्मानित पाएंगे और यह कि बुद्धि से जीवन मिलता है!

यरदन में बपतिस्मा लेने के लिए जब सिपाही आये, यूहन्ना ने उन्हें बताया कि उन्हें अपने अधिकार को छोड़ना होगा जिससे कि वे लोगों से धन कि मांग करते हैं। रोमी सिपाही लोगों को बिना किसी अपराध किये उन पर आरोप लगते थे। कई बार, निर्दोष लोगों को सज़ा मिलने कि धमकी दी जाती थी। यह एक बहुत शर्मनाक तरीका था, और यहूदी लोगों के पास और कोई रास्ता नहीं था जिससे कि वे अपने आपको बचा सकते। झूठे आरोपों से बचने के लिए वे सिपाहियों को पैसे दे देते थे। यूहन्ना ने सिपाहियों से कहा कि उन्हें पश्चताप करना होगा और लोगों से जबरन वसूली करना बंद करना होगा।

सोचिये सिपाहियों के लिए यह कितना असुखद और कष्ट देने वाला होगा कि उनके पापों का खुलासा हो रहा है। सोचिये यह कितनी शुधता पूर्वक सामर्थ होगी परिवर्तित होने के लिए! सोचिये यहूदी लोगों को कैसा लगा होगा जब उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को उनके दुष्कर्मों के प्रति सुना! परमेश्वर सब देख रहा था, और वह निर्दोष को हमेशा बचाता है। उसके अद्भुद अनुग्रह के द्वारा, वह यूहन्ना के द्वारा सिपाहियों के पास आया और उन्हें परिवर्तित होने का अवसर दिया। और जैसे जैसे लोग अपने पापों से पश्चाताप करते थे, यूहन्ना उन्हें पानी में बपतिस्मा देता जाता था।

कहानी २२: यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला

John the Baptist

क्या आपको यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के जन्म की कहानी याद है? परमेश्वर ने जकर्याह और एलिजाबेथ को एक बेटा उस समय दिया जब वे बहुत वृद्ध हो गए थे। वे इतने वृद्ध थे कि सबने यह सोचा कि यह बालक परमेश्वर कि ओर से एक दान है। हर बच्चा अनमोल होता है, परन्तु इसके लिए एक बहुत विशेष बुलाहट थी। परमेश्वर ने उसे उसकी माँ के गर्भ धारण करने से पहले ही उन्हें दे दिया था!

गेब्रिएल, जो परमेश्वर का सबसे शक्तिशाली दूत था, उसने परमेश्वर के मंदिर में, जो पृथ्वी का सबसे पवित्र स्थान है, इस बालक के जन्म होने कि घोषणा की! परमेश्वर ने यह घोषणा की, कि यह बालक एलिय्याह नामक महान नबी कि आत्मा में आएगा। उसने यूहन्ना के पिता को विशेष नेतृत्व दिए जिसके आधार पर उसके जीवन को चलाना है। उसके पवित्र बुलाहट के कारण कुछ बातें थी जिसे करने कि उसे अनुमति नहीं थी। वह मद्य नहीं पी सकता था। बल्कि उसे जीवते परमेश्वर की आत्मा से परिपूर्ण होना था!

यूहन्ना जब बड़ा होता गया, तब परमेश्वर ने उसे जंगल में रहने के लिए बुलाया, पुराने नियम में एलिय्याह कि कहानियों कि तरह। और एलिय्याह कि तरह, यूहन्ना ने उस मनुष्य के समान बहुत ही साधारण वस्त्र पहने जो कि परमेश्वर के लिए अलग किया गया था। वह ऊँठ के खुरखुरे बालों से बनाया गया था। वह अपनी कमर पर चमड़े का पट्टा बांधता था, और भोजन के लिए शहद और टिड्डियाँ खाता था। उसके लम्बे और नीरस दिनों कि कल्पना कीजिये जो उसने परमेश्वर के वचन पर मनन करने के लिए बिताय होंगे। उन अँधेरे और सर्द रातों कि कल्पना कीजिये जो यूहन्ना ने रात के उन चमकते हुए तारों के नीचे बिताकर प्रार्थना में लगा रहा और अपने ह्रदय से परमेश्वर कि इच्छा पर चला।

समय आ गया था कि इस्राएल के देश में यूहन्ना जाए। परमेश्वर के लोगों को उसे एक महत्वपूर्ण सन्देश देना था। यशायाह ने यीशु के आने के सात सौ साल पहले यूहन्ना के आने कि घोषणा कर दी थी। परमेश्वर ने नबी के द्वारा यह घोषित किया;

“’देखो मैं अपना दूत भेज रहा हूँ।
वह मेरे लिए मार्ग तैयार करेगा।
जंगल में किसी पुकारने वाले का शब्द सुनाई दे रहा है:
‘प्रभु के लिये मार्ग तैयार करो।
और उसके लिये राहें सीधी बनाओ।’”

वाह। यह पद यशायाह ४०ः३-५ से लिया गया है। यशायाह में यह अध्याय उन महान नबियों कि शुरुआत है जो मसीह के विषय में बताते हैं। यशायाह ने यह घोषित किया कि इस्राएल के भविष्य में कभी, एक व्यक्ति आएगा जो मसीह के आने कि घोषणा करेगा। यह दूत परमेश्वर के द्वारा भेजा हुआ सामर्थ और अधिकार के साथ बोलने वाला होगा। वह इस्राएल का अंतिम महान नबी होगा। परन्तु यूहन्ना और अन्य नबियों में यह अंतर था कि वह उन लोगों में प्रचार कर रहा था जो स्वयं मसीह से भेंट करेंगे। उनके ह्रदय अपने राजा को मिलने के लिए तैयार होने थे! क्या यह देश इस परमेश्वर के दूत कि सुनेंगे? क्या वे अपने पापों से पश्चाताप करेंगे?

समय आ गया था जब परमेश्वर ने यूहन्ना को जंगल को छोड़ कर अपनी सेवकाई को शुरू करना था। जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला प्रचार करता था, तब वह यशायाह 40 कि मदद से यहूदी लोगों को समझाता था कि वह कौन है। जिस तरह हैम समय को नापते हैं, यह शायद 26 AD में हुआ होगा। परन्तु उन दिनों में समय को इस तरह नहीं नापा जाता था। उस समय, रोम के सम्राट जितने साल राज करते थे उस हिसाब से सालों को नापा जाता था।

लूका इस बात को लिखता है कि यह रोम के टिबेरियस कैसर के राज के पन्द्रहवां साल था। उस समय, पॉतिउस पिलातुस रोम का अधिकारी था जो यहोदिय के ऊपर राज करता था। ऐसे यहूदी अगुवे भी थे जो रोमी राज के आधीन में थे। जन हेरोदेस राजा मरा, तब रोमी राज के अगुवों ने तय किया कि इजराइल को उसके दो बेटों के बीच बाँट देंगे। उसका पहलौठा पुत्र जिसका नाम भी हेरोदेस था, उसे गलील पर राज करने को दिया गया। उसके भाई, फिलिपुस और लिसनियस को बाकि के क्षेत्रों के शासक बना दिया।

इस बीच, येरूशलेम में, कैफ़ा और हनन्याह येरूशलेम के मंदिर के महायाजक थे। हेरोदेस राजा ने उन्हें नियुक्त किया था। उन्हें अपनी नियुक्ति आदर और सम्मान के साथ नहीं मिली थी। उन्होंने इस्राएल के उच्च धार्मिक अधिकार को राजनितिक तरीकों के द्वारा हासिल करने कि आज्ञा दी। यह एक बहुत ही भयंकर तरीका था महायाजक बनने का, जो पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के मध्यस्थ होने के लिए बनाय जाते हैं। परन्तु येरूशलेम में महायाजक बनना एक बहुत ही ज़बरदस्त अधिकार होता है, और यह उन लोगों को अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए आकर्षित करता था। उन्हें परमेश्वर के बच्चों के लिए धार्मिक अगुवे बन कर रहना था परन्तु उनके ह्रदय उसकी इच्छा को पूरी करने से बहुत दूर थे।

यह वही लोग थे यूहन्ना के समय और यीशु के जीवन के समय में राज करते थे। उन सभी के पास संसारिक अधिकार थे, परन्तु यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला परमेश्वर कि आत्मा में आया, और वह परमेश्वर के राज्य के लिए जीया। सदनसार के अगुवे परमेश्वर कि सामर्थ के विरुद्ध उसके सेवक के द्वारा आते थे, और उन्हें चुनाव करना पड़ता था। क्या वे परमेश्वर की उन योजनाओं के आगे समर्पण कर सकते थे जिन्हें रोका नहीं जा सकता?

यूहन्ना ग्रामशेत्रों में लोगों को प्रचार करते हुए उन्हें बपतिस्मा देता रहा। उसने उनसे कहा,”पश्चाताप करो, क्यूंकि परमेश्वर का राज्य निकट है।”

यह वाक्य बहुत ही महत्पूर्ण है। यह यूहन्ना कि पूरी सेवकाई का सम्पूर्ण विचार है। आइये कुछ समय लगा कर इसके अर्थ को समझते हैं!

“पश्चाताप” शब्द से उसका क्या मतलब था? यूहन्ना के भीतर एक नबी का उत्साह था। उसके लिए, पश्चाताप ह्रदय का सम्पूर्ण रीति से परिवर्तन होना। इसका मतलब उन सब बातों से दूर होना जो परमेश्वर के विरुद्ध था। इसका मतलब उन सब बातों का इंकार करना जो उसके लिए अशुद्ध और आक्रामक हैं। जब यूहन्ना लोगों को बपतिस्मा देता था, उन्हें उन पापों का पश्चाताप करना था जिनसे उनका कोई वास्ता नहीं था। फिर उनके पूरे शरीर को पानी में डुबाया जाता था, जिस प्रकार पानी का तेज़ बहाव उन सब गन्दगी को बहा ले जाता है। यह एक प्रभावशाली और प्रतीकात्मक क्रिया थी, जो संसार को यह बताती थी कि वे जीवन के एक रूप में मर चुके हैं और दुसरे में उठ रहे हैं!

परमेश्वर अपने पूरे वचन में यह कहता है कि वह हर एक पश्चाताप करने वाली आत्मा से प्रेम करता है। वह यह वादा करता है कि वह उन सभी को स्वीकारेगा जो सच्ची नम्रता के साथ उसके पास आएंगे। वह यह वादा करता है कि वह उनके सभी पाप और अपमान को लेकर उन्हें शुद्ध और साफ़ करेगा। वह वादा करता है कि वह उन सभी को जो उस पर भरोसा रखते हैं और धार्मिक जीवन जीने कि खोज करते हैं, उन्हें सामर्थ देगा। इस्राएल के लोगों के लिए यूहन्ना के ह्रदय कि यही इच्छा थी। क्या यह सुन्दर नहीं है?

आपको क्या लगता है यूहन्ना का क्या मतलब था “स्वर्ग के राज्य” से? जब एक यहूदी व्यक्ति इस वाक्यांश को सुनता था, या जब वे “परमेश्वर के राज्य” शब्द को सुनते थे, उनके भीतर कई विचार आ जाते थे। वे यह समझते थे कि उनका परमेश्वर, यहोवा, युगानुयुग है। उसका कोई आरम्भ नहीं था और वह सदा के लिए था। अनंत काल में, कहीं ना कहीं, परमेश्वर कार्य कर रहा था। उसने पूरी सृष्टि को रचा, पूरे आकाशमण्डल से लेकर सबसे छोटे कीड़े तक। यह सब परमेश्वर का ही है, और इसलिए यह सब उसके महान विश्व राज्य का एक हिस्सा है।

परमेश्वर ने मनुष्य जाती को उसके राज्य कि देख भाल करने का एक सोच से बाहर अवसर दिया। हमें उसके शक्तिशाली सेवक हो कर, उसकी सिद्ध इच्छा को पूरा करते हुए उसकी सृष्टि पर राज करना है। जब मनुष्य ने शैतान के प्रति निष्ठा दिखायी और परमेश्वर से बढ़कर उस पर विश्वास किया, तब इस संसार में हम उस भयंकर श्राप ले आये। हमने उसे अंधकार में डाल दिया, पाप, बीमारी, संघर्ष, क्लेश और मृत्यु रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गए। हमारे पहले पिता, आदम ने इसे चुना था, और एक मनुष्य के परिवार का पिता होते हुए उसने हम सब के लिए यही चुना। पाप और अपमान का रोग हम मनुष्य के जीवन को पीड़ित करता है।

परन्तु परमेश्वर इस कहानी को यहाँ समाप्त नहीं करने वाला था! प्रारम्भ से ही परमेश्वर कि यह योजना थी कि ज्योति के राज्य को अंधकार में ले आएगा। यहूदी देश परमेश्वर का महत्वपूर्ण हिस्सा था जिसे वह अपने रूप से और शिक्षाओं के द्वारा ला रहा था। उनके नबी उन्हें परमेश्वर के अद्भुद योजना को बताएंगे ताकि मसीह के द्वारा उसके राज्य आनंद और शांति के साथ स्थापित हो सके। यही वह राज्य है जिसका इस्राएल को इंतज़ार था।

यूहन्ना जानता था कि पुराने नियम में मसीह के आने कि घोषणा के साथ साथ, परमेश्वर का वह महान दिन आने वाला था। धर्मी जन जो प्रभु पर विश्वास करते थे और और उसकी आज्ञाकारिता में जीते थे, वे बचाय जाएंगे। परन्तु कठोर मन वाले और पापी नष्ट किये जाएंगे। दुष्टता से दूर होने से इंकार करने से वे स्वर्ग के राज्य के लिए अयोग्य हो गए हैं। यह दिखता था कि परमेश्वर उनका सच्चा राजा नहीं है। उनके अपने ही निर्णय उन्हें परमेश्वर के क्रोध और न्याय के लिए योग्य ठहराते हैं।

यूहन्ना जानता था कि यह उसका काम था कि वह इस्राएल के लोगों के लिए चुनाव बनाने का रास्ता दिखाय। फिर भी वह भविष्य के विषय में विस्तार से नहीं जानता था। वह नहीं जानता था कि सब कुछ कैसे होगा। वह विश्वास के साथ परमेश्वर के वचन को प्रचार करने के लिए निकल गया जो परमेश्वर ने उसे एक चेतावनी के तौर दिया था ताकि लोगों को अपने उद्धारकर्ता और उसके राज्य का उस ह्रदय के साथ स्वागत कर सकें जो पश्चाताप से साफ़ किया गया!