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कहानी १८०: शक्की थोमा 

आठ दिन बीत चुके थे जब मसीह अपने चेलों के सामने प्रकट हुए थे। कई जबरदस्त बातें इस छोटे दौरान हुई थी! वे उसके मौत के सदमे से बाहर भी नहीं आ पाए थे जब अचानक वह मुर्दों में से जी उठा! और तो भी, वह उनके साथ नहीं था, कम से कम पहले की तरह तो नहीं।

कल्पना कीजिये उन आठ दिन इंतेजारी, के जब उन्हें धीरे धीरे इन बातों का एहसास होने लगा। कल्पना कीजिये कि वह चुपके से यरूशलेम की गलियों में खाना खरीदने के लिए और एक दूसरे से मिलने जाते होंगे, हमेशा उस डर में की कोई उन्हें पहचान ना ले।उनके बीच बातचीत और प्रार्थनाओं की कल्पना कीजिये।

उन्हें आगे क्या करना था? वे सही मायने में यीशु के पीछे चलने के लिए सब कुछ छोड़ चुके थे, और अब भविष्य उनके सामने एक खुली खाई की तरह थी – एक अज्ञात क्षेत्र की नई दुनिया की तरह! क्यूंकि अब राजा मुर्दों में से जी उठा था, तो राज्य कैसा दिखेगा? और अब उन्हें उन बचे हुए होने के वास्ते क्या करना था? विशेषकर जब येशु की मृत्यु से जुड़े धार्मिक नेता और राजनीतिक विवाद एक जलता हुआ मुद्दा था!

चेले एक साथ फिर इकट्ठा हुए। इस बार उन्होंने ध्यान से दरवाजा बंद किया और चिटकनी लगा ली। इस समय थोमा भी उनके साथ था। अचानक, यीशु आ के ठीक उनके बीच खड़े हो गए। ‘शांति तुम्हारे साथ हो,”उन्होंने कहा।

यह पहली बार था कि थोमा ने जीवते प्रभु को देखा था। बाकी सब ने कहानियों बताई और विश्वास के साथ भर गए। लेकिन थोमा येशु को पहली बार खोने पर निराशा से भर गया था। वह अपनी आशा को फिर जगाना नहीं चाहता था। वो ऐसी निराशा दोबारा नहीं झेलना चाहता था। यीशु को स्वयं उसके पास आना था और थोमा को उसके हाथों पर कीलों के निशान को छूना था ताकि वो विश्वास कर सके!

थोमा के दिल में गुज़रती हर बात को येशु जनता था। तो वह उसकी तरफ मुड़े और अपना हाथ बड़ाया। ‘यहाँ अपनी उंगली रखो, मेरे हाथ देखो। अपने हाथ से मेरी कमर छुओ। शंका मत करो और विश्वास करो।’ यीशु कितनी उदारता और धीरज से भरे थे!

थोमा ने जैसे वो ज़ख्म देखे, वे बोल पड़ा – ‘मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर!’ यह एक वास्तविक और सच्चे विश्वास की एक घोषणा थी। थोमा ने विश्वास करने में बेशक समय लिया, लेकिन जब उसने किया, तो उसने विश्वास की सबसे ज़ोरदार और मज़बूत घोषणा की। किसी ने अभी तक यह घोषित नहीं किया था कि यीशु परमेश्वर था! और प्रभु ने उसकी भक्ति के शब्दों को प्राप्त किया।

यीशु ने कहा, ‘क्योंकि तुमने मुझे देखा है, तो तुमने विश्वास किया है; धन्य है वो जिन्होंने देखा नहीं पर फिर भी विश्वास किया है।’

और इसी जगह में आप और मैं कहानी में प्रवेश करते है। वो इसलिए, क्यूंकि हम मानते हैं कि यीशु की मृत्यु हो गई और वो फिर मुर्दों में से जी उठा, भले ही हम अपनी आँखों से उनके निशान या उनका पुनरुथान किया हुआ देह नहीं देखा हो! हैना यह एक आश्चर्यजनक बात है कि हम विश्वास के इस लंबे, स्वर्ण श्रृंखला का एक हिस्सा हैं, जो इन पहले चेलों से शुरू हुई।

जब तक युहन्ना ने इन कहानियों को अपने सुसमाचार में लिखी, यीशु के मृत्यु और पुनरुथान को कई दशक गुज़र गए थे। चेलों ने रोमी साम्राज्य में सुसमाचार की घोषणा की थी। थोमा, उद्धार का यह शुभ समाचा,र भारत देश तक भी लाया। दुनिया भर में कलीसिया मज़बूत और फलवन्त होती जा रही थी। जैसे जैसे युहन्ना ने यीशु के शब्दों को कलीसियाओं के लिए लिखा, वैसे वैसे उसे लोगों को येशु के बारे में सिखाने में कई साल लग गए। उसने हजारों को येशु पर विश्वास लाते देखा, हालांकि वे प्रभु से कभी नहीं मिले थे। उसने शायद कईयों को मसीह के नाम के लिए मरते भी देखा होगा। कितना अद्भुत होगा उस व्यक्ति के लिए- जिसने येशु की गिरफ्तारी की रात उसकी छाती पर विश्राम किया होगा – यह देखना कि  कितने लोग उसके प्रभु को प्यार करते थे, भले ही उन्होंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा हो। कल्पना कीजिए कि यह उसके दिल को कितना छुआ होगा! वास्तव में, यही वो कारण है जिसकी वजह से युहन्ना ने यह पुस्तक (युहन्ना) लिखी।

प्रभु यीशु अपने जी उठने के बाद चालीस दिन के लिए अपने चेलों को प्रकट होते रहे। यह शिक्षण और प्रशिक्षण का समय था जब यीशु उन्हें राज्य के काम के लिए तैयार कर रहे थे। युहन्ना ने इसका वर्णन ऐसे किया है:
“यीशु ने और भी बहुत चिह्न चेलोंके साम्हने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए। परंतु थे इसलिथे लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” -युहन्ना २०:३०-३१

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कहनी १२७: लाजर का आश्चर्य

यूहन्ना ११:१७-५४

यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को गया। यह एक खतरनाक निर्णय था, जो वास्तव में नहीं था! यहूदी अगुवे यीशु को मार देना चाहते थे, और येरूशलेम छोड़ कर वह यरदन नदी को चला गया। केवल अभी के लिए, यीशु का मित्र लाज़र मर रहा था, और यीशु उसकी सहायता के लिए जा रहा था। फिर भी यीशु ने जाने से पहले बहुत दिन तक रुका रहा। क्यूँ? यह परमेश्वर कि इच्छा थी कि लाज़र मरे ताकि यीशु उसे कब्र से बाहर निकाल सके। इससे परमेश्वर कि महिमा होगी, और बहुत लोग विश्वास करेंगे, और उसके मित्रों का विश्वास भी बढ़ेगा। परमेश्वर के काम कई बार अनोखे लगते हैं, लेकिन उसका समय और कारण उत्तम होते हैं।

जब यीशु बैतनिय्याह पहुँचा, उन्हें पता चला कि लाज़र मर गया है, जैसा कि यीशु ने कहा था। लाज़र को कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं। बैतनिय्याह यरूशलेम से लगभग तीन किलोमीटर दूर था। भाई की मृत्यु पर मार्था और मरियम को सांत्वना देने के लिये बहुत से यहूदी लोग आये थे। इन स्त्रियों के दुःख कि कल्पना कीजिये। वे कितनी परेशां हो रही होंगी। उनका अपना प्रिया यीशु, जो दूसरों को चंगाई देता था और दूसरों को मुर्दों में से जिलाता था, उसने आने से इंकार कर दिया है। वह लाज़र को बचा सकता था! और अब चार दिन बाद, वह पहले आने वालों में से भी नहीं था जो आकर उनकी सुद्धि लेता।

जब मार्था ने सुना कि यीशु आया है तो वह उससे मिलने गयी। जबकि मरियम घर में ही रही। वहाँ जाकर मारथा ने यीशु से कहा,“हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई मरता नहीं। पर मैं जानती हूँ कि अब भी तू परमेश्वर से जो कुछ माँगेगा वह तुझे देगा।”

यीशु ने उससे कहा,“’तेरा भाई जी उठेगा।”

मार्था ने उससे कहा,“मैं जानती हूँ कि पुनरुत्थान के अन्तिम दिन वह जी उठेगा।” उसने नहीं समझा कि लाज़र उसी दिन जी उठने वाला है! 

यीशु ने उससे कहा,’“मैं ही पुनरुत्थान हूँ और मैं ही जीवन हूँ। वह जो मुझमें विश्वास करता है जियेगा। और हर वह, जो जीवित है और मुझमें विश्वास रखता है, कभी नहीं मरेगा। क्या तू यह विश्वास रखती है।’”

वह यीशु से बोली,“हाँ प्रभु, मैं विश्वास करती हूँ कि तू मसीह है, परमेश्वर का पुत्र जो जगत में आने वाला था।”

उसने घोषित कर दिया था, और इसलिए यह उसके लिए सच्च हो गया था। यह उज्जवल था और अनंतकाल के लिए था। यीशु ने उसके विश्वास को स्वीकार कर लिया था। यह उन धार्मिक अगुवों के बहस और सवालों के सामने कितना सुन्दर और साधारण था।

जब यीशु ने कहा कि वे जो उस पर विश्वास करते हैं वे कभी नहीं मरेंगे, तो क्या उसका मतलब शारीरिक मृत्यु से था? हम जानते हैं कि यह सच नहीं है। सभी चेले मर चुके हैं, और मार्था और मरियम भी। लेकिन उनकी मृत्यु हमेशा के लिए नहीं थी, यह केवल इस श्रापित दुनिया से निकल कर उस दूसरी दुनिया में जाने के लिए था। और वह दूसरी दुनिया, जहां यीशु राज करता है, वह एक शानदार जगह है!

फिर इतना कह कर वह वहाँ से चली गयी और अपनी बहन को अकेले में बुलाकर बोली,“गुरू यहीं है, वह तुझे बुला रहा है।” जब मरियम ने यह सुना तो वह तत्काल उठकर उससे मिलने चल दी।

जब बाकी के लोगों ने उसे ऐसे जल्दी में घर के अंदर जाते देखा, तब वे भी उसके पीछे चल दिए। यीशु अभी भी उसी स्थान में था जहां मार्था उसे मिली थी, और इसलिए वह  गाव में अभी नहीं गया था। मरियम जब वहाँ पहुँची जहाँ यीशु था तो यीशु को देखकर उसके चरणों में गिर पड़ी और बोली,“हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई मरता नहीं।”

इन दोनों मित्रो का दुःख कितना बड़ा था जब वे यीशु का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने कितना दुःख सहा! यीशु ने अपने प्रिया मित्र पर नज़र डाली और श्राप के कारण मौत पर रोया। उसने देखा कि बाकी के परिवार जन लाज़र को खो देने के दुःख से रो रहे हैं, जो कि एक सिद्ध व्यक्ति था। बाइबिल बताती है कि यीशु “कि आत्मा तड़प उठी” उसे उनकी पीड़ा से नफ़रत थी! फिर भी जब वह उनके दुःख को देख कर उस समय के लिए दुखी था, वह जानता था कि आनंद अभी आना है।

इस पर जिन्होंने यीशु के आसूँ देखे वे कहने लगे,“देखो! यह लाज़र को कितना प्यार करता है।” लेकिन दूसरे केवल शिकायत करने लगे।

मगर उनमें से कुछ ने कहा,“यह व्यक्ति जिसने अंधे को आँखें दीं, क्या लाज़र को भी मरने से नहीं बचा सकता?” वे नहीं समझ पाये कि परमेश्वर का एक ऊंची योजना थी जो वह प्रकट करने जा रहा था। जो दुःख लाज़र, मरियम और मार्था को मिला, उसके बाद वे प्रभु को महिमा देने जा रहा हैं!

तब यीशु अपने मन में एक बार फिर बहुत अधिक व्याकुल हुआ और कब्र की तरफ गया। यह एक गुफा थी और उसका द्वार एक चट्टान से ढका हुआ था। लाज़र उसके अंदर था। यीशु ने उन्हीन पत्थर को हटाने को कहा। मार्था बोल उठी। वह अपने भाई कि यादों को अपमानित नहीं करना चाहती थी।

मार्था ने कहा,“हे प्रभु, अब तक तो वहाँ से दुर्गन्ध आ रही होगी क्योंकि उसे दफनाए चार दिन हो चुके हैं।”

यीशु ने उससे कहा,“’क्या मैंने तुझसे नहीं कहा कि यदि तू विश्वास करेगी तो परमेश्वर की महिमा का दर्शन पायेगी।’”

तब उन्होंने उस चट्टान को हटा दिया। और यीशु ने अपनी आँखें ऊपर उठाते हुए कहा,“’परम पिता मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ क्योंकि तूने मेरी सुन ली है। मैं जानता हूँ कि तू सदा मेरी सुनता है किन्तु चारों ओर इकट्ठी भीड़ के लिये मैंने यह कहा है जिससे वे यह मान सकें कि मुझे तूने भेजा है।’” 

यह एक बहुत ही अद्भुद प्रार्थना थी! यीशु जिस वार्तालाप को हमेशा अपने पिता के साथ करता था उसे ऊँची आवाज़ में कहा। यीशु यह दर्शा रहे थे कि लाज़र को जिलाना उसका परमेश्वर के प्रति प्रतिक्रिया थी, और उसे पूरा विश्वास था कि पिता उसे वह करने के लिए पूरी सामर्थ देगा!

उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“’लाज़र, बाहर आ!’” वह व्यक्ति जो मर चुका था बाहर निकल आया। उसके हाथ पैर अभी भी कफ़न में बँधे थे। उसका मुँह कपड़े में लिपटा हुआ था।

यीशु ने लोगों से कहा,“’इसे खोल दो और जाने दो।’”

लाज़र जी उठा था! थोड़े समय का दुःख था, परन्तु वह जी उठा था, और आनंद आ गया था। आप सोच सकते हैं कि मार्था और मरियम कैसे नाची होंगी? मृत्यु के श्राप ने यीशु के मित्रों को दुःख में दाल दिया था, लेकिन यीशु जीवन को वापस ले आया था। जिस समय वह पाप के शक्तिशाली असर को उल्टा कर रहा था, यीशु ने अपने उज्जवल महिमा को इस्राएल को प्रकट किया। यह परमेश्वर का राज्य था! और यीशु के मित्र उनमें से पहले थे जिन्होंने उसके नाम कि खातिर दुःख सहा था।

यीशु अपने आप को बलिदान होने के लिए दे रहा था, और यह स्पष्ट हो गया था कि उसके चेले भी परमेश्वर कि इच्छा के आगे समर्पित होने के लिए बुलाय गए हैं। यह एक ऐसी विनम्रता है जिसमे एक गहरे विश्वास कि आवश्यकता है। एक समय आता है जब लगता है कि बाहरी बातें संसार कि बातों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यह मानना ज़रूरी है कि परमेश्वर सामर्थी है, और इस दुनिया के बाद एक अनंतकाल का जीवन है, और एक आशा कि वह उन्हें बहुतायत से इनाम देगा जो पूरी लगन से उसे खोजते हैं।

जब यीशु ने मार्था से बात की और उससे पूछा की यदि वह विश्वास करती है, तो वह इसलिए नहीं था कि उसे विश्वास नहीं था। वह उसके विश्वास को उसमें और गहराई से खीचने के लिए ऐसा पूछ रहा था। उसे यीशु पर भरोसा करना था चाहे उसकी सबसे कीमती चीज़ कब्र में बंधी हुई थी। और जिस समय पूरा परिवार यीशु कि सामर्थ में मृत्यु से जीवन कि और जा रहा था, उनकी पहचान यीशु कि पहचान के साथ और भी गहरायी से बंध गयी थी। वह उनके लिए जीवन और आशा बन गया था! आशा कि कितनी अद्भुद छवि हम मृतोत्थान में देखते हैं जो एक दिन हमें अनंतकाल में ले जाएगा!

लाज़र अब जीवित और कुशल था। सोचिये इसके विषय में कैसे खबर फैली होगी। जो व्यक्ति वास्तव में मर गया था, वह यीशु के द्वारा जिलाया गया। येरूशलेम के यहूदि इसके सबसे पहले गवाह बने। उसमें कोई दोराय नहीं थी। लाज़र चार दिन से मृत था, और अब वह जीवित था।

राष्ट्र के लोग यहूदी अगुवों से जवाब मांगेंगे। इस यीशु के पास ऐसे सामर्थ कैसे हो सकती थी जब वह परमेश्वर कि ओर से नहीं था? यदि वह परमेश्वर कि ओर से था और मसीहा था, तो फिर इन अगुवों को क्या हुआ है? वे क्यूँ परमेश्वर के सेवक को मारना चाहते थे? क्या वे मनश्शे कि तरह थे जिन्होंने यशाया नबी को मार दिया था? जिस राजा कि स्मरणशक्ति से सारा इस्राएल नफ़रत करता था? जब यहूदी अगुवे यीशु के पास आये उसे शांत करने के लिए, और यीशु एक परमेश्वर के पुत्र कि तरह उस सामर्थ के साथ खड़ा हुआ था और निडर होकर सच्चाई को घोषित कर रहा था, इससे यह प्रकट हो रहा था केवल एक ही पक्ष सही हो सकता था। क्या यहूदी अगुवे पश्चाताप करेंगे? क्या वे इसे स्वीकार करेंगे कि मसीहा वास्तव में आया था? क्या परमेश्वर के पवित्र लोग विश्वास करेंगे?

बहुत से यहूदी जो मरियम और मार्था कि सुद्धि लेने आये थे, उन्होंने विश्वास किया जो उन्होंने देखा। अन्य लोग फरीसियों के पास गए और उसके विषय में बताया। वे येरूशलेम के महायाजक के पास गए और उन सब बातों के विषय में बताया। यह एक गम्भीर समस्या थी। अगर यह आदमी यीशु, सब लोगों को धोखा देता रहेगा, तो उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा। स्पष्ट रूप से, फरीसी उसे रोक नहीं पा रहे थे।

फिर महायाजकों और फरीसियों ने यहूदियों की सबसे ऊँची परिषद बुलाई। और कहा,“हमें क्या करना चाहिये? यह व्यक्ति बहुत से आश्चर्य चिन्ह दिखा रहा है।” यह एक ईमानदार सवाल था। वे चमत्कारों को कैसे समझा सकते थे?

दूसरों ने कहा,”यदि हमने उसे ऐसे ही करते रहने दिया तो हर कोई उस पर विश्वास करने लगेगा और इस तरह रोमी लोग यहाँ आ जायेंगे और हमारे मन्दिर व देश को नष्ट कर देंगे।” वे इस बात का दावा कर रहे थे कि यीशु ज़बरदस्ती करके रोमियों को इस्राएल से निकाल देगा। वे मंदिर को नष्ट कर देंगे और राष्ट्र को खतम करके सब कुछ शांत कर देंगे। अगले कुछ हफ़्तों के अध्ययन में, यह बहुत स्पष्ट हो जाएगा कि यह सब कितना हास्यास्पद था। रोमी लोग यीशु के विषय में इतना नहीं जानते थे और उससे उनको कोई परेशानी नहीं थी। पिलातुस, जो रोम का सरदार था, वह यीशु को नहीं जानता था। लेकिन इन यहूदी अगुवों के पास अच्छा बहन था यीशु को मरवाने का, और वे इसे मानने को तैयार नहीं थे कि वे उससे जलते थे।

फिर कैफा बोल उठा। वह यहूदी कौम का महायाजक था। अपने सत्र पूरे पर वह अठारा साल तक राज कर चूका होगा। उसे यह पद इतने सालों इसलिए नहीं मिला कि वह एक सच्चा अगुवा था या परमेश्वर उसके राज से प्रसन्न था। वह और उसका ससुर अन्नास मंदिर में और आयहूदी धर्म पर एक बहुत राजवंशीय अधिकार सम्भाल रहे थे, अपने अधिकार को पकड़े रहने के लिए भ्रष्टाचार और हेरा फेरी का उपयोग कर रहे थे। उन्होंने परमेश्वर कि ओर से दिए हुए कार्य को जो उसने अपने लोगों के लिए दिया, अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया। यीशु में, उन्हें एक नया दुश्मन मिल गया था जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। वे उस पर अपने पूरे अधिकार को नहीं चला पाये।

महायाजक कैफा ने उनसे कहा,“तुम लोग कुछ भी नहीं जानते। और न ही तुम्हें इस बात की समझ है कि इसी में तुम्हारा लाभ है कि बजाय इसके कि सारी जाति ही नष्ट हो जाये, सबके लिये एक आदमी को मारना होगा।”

कैफा ने पहले ही निर्णय ले लिया था। यीशु को मरना था। उसे एक सिद्द परिक्षण देने का उसका कोई इरादा नहीं था। दोनों पक्ष कि बातों को सुनने का कोई इरादा नही था। जो इस पर अपनी आवाज़ उठाते थे उनको शांत कर दिया जाता था।

जिस प्रकार कैफा ने बोला वह कितना दिलचस्प था। यीशु को मरना आवश्यक था ताकि राष्ट्र बच सके। परन्तु कैफा ने परमेश्वार कि ओर से दी हुई बुद्धि से कहा। सबसे ऊंचे महायाजक ने इस्राएल के महायाजक को इस भविष्यवाणी को घोषित करने के लिए नियमित किया था, चाहे वह यीशु के पीछे चलता है या नहीं। यीशु वास्तव में राष्ट्र के लिए मरने वाला था। जिस समय यूहन्ना इस कहानी को लिख रहा था, वह च्चता था कि हम निश्चित रूप से इसे समझ लें। उसने कहा कि यीशु ना केवल इस्राएल के देश के लिए मरा, परन्तु उन सब परमेश्वर के बच्चों के लिए जो इस संसार में तितर बितर हैं। वह हमारे विषय में कह रहा था!

इस घोषणा का व्यंग्य यह है कि जिस बात को कैफा टालना चाहता था, वही बात सच्च हुई। कई सालों पश्चात्, यूहन्ना इसके विषय में जान जाता जब वह इस कहानी को लिख रहा था। उसे यह बहुत आश्चार्यजनक लगा होगा। 70 AD में, रोमी राज ने येरूशलेम पर कब्ज़ा कर लिया था और उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था, और इस्राएल देश अगले दो सौ साल तक मौजूद नहीं होगा।

यहूदियों के आराधनालय ने अपने महायाजक के साथ निर्णय ले लिया था। उस समय से, वे साज़िश कर रहे थे कि कैसे सब करेंगे। क्यूंकि यह इतना आसान नहीं था। उनके पास कोई भी कानूनी कारण नहीं था यीशु को मरवाने का। उसने कुछ भी गलत नहीं किया था। वे उसे किसी भी प्रकार के धोखे में नहीं पकड़ सकते थे, लेकिन वे फिर भी रुकने वाले नहीं थे। और इस्राएल में बहुत लोग यीशु पर विश्वास करते थे। यदि वे यीशु को लोगों के सामने पकड़ते हैं, तो दंगे हो जाएंगे। फिर भी वह लोगों से घिरा हुआ रहता था। वे उसे बिना जाने कैसे पकड़ सकते थे?

यहूदियों के आराधनालय कि योजना के विषय में सबको पता लग गया था। अचानक सब कुछ बहुत खतरनाक हो गया था। यीशु यहूदी लोगों के बीच में अब नहीं जा सकता था। इस्राएल में बहुत से थे जो इस आराधनालय के पक्ष में होकर कुछ फ़ायदा उठा सकेंगे। यरूशलेम छोड़कर वह निर्जन रेगिस्तान के पास इफ्राईम नगर जा कर अपने शिष्यों के साथ रहने लगा।

कहनी १२४: गरीबो के प्रति रवैया

लूका १६:१-१३

यीशु अपने चेलों को शिक्षा दे रहे थे जब उन्होंने यह दृष्टान्त बताया:

“‘फिर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,“एक धनी पुरुष था। उसका एक प्रबन्धक था उस प्रबन्धक पर लांछन लगाया गया कि वह उसकी सम्पत्ति को नष्ट कर रहा है। सो उसने उसे बुलाया और कहा,‘तेरे विषय में मैं यह क्या सुन रहा हूँ? अपने प्रबन्ध का लेखा जोखा दे क्योंकि अब आगे तू प्रबन्धक नहीं रह सकता।

इस पर प्रबन्धक ने मन ही मन कहा,‘मेरा स्वामी मुझसे मेरा प्रबन्धक का काम छीन रहा है, सो अब मैं क्या करूँ? मुझमें अब इतनी शक्ति भी नहीं रही कि मैं खेतों में खुदाईगुड़ाई का काम तक कर सकूँ और माँगने में मुझे लाज आती है। ठीक, मुझे समझ गया कि मुझे क्या करना चाहिये, जिससे जब मैं प्रबन्धक के पद से हटा दिया जाऊँ तो लोग अपने घरों में मेरा स्वागत सत्कार करें।

सो उसने स्वामी के हर देनदार को बुलाया। पहले व्यक्ति से उसने पूछा,‘तुझे मेरे स्वामी का कितना देना है?’ उसने कहा,‘एक सौ माप जैतून का तेल।इस पर वह उससे बोला,‘यह ले अपनी बही और बैट कर जल्दी से इसे पचास कर दे।

फिर उसने दूसरे से कहा,‘और तुझ पर कितनी देनदारी है?’ उसने बताया, ‘एक सौ भार गेहूँ।वह उससे बोला, ‘यह ले अपनी बही और सौ का अस्सी कर दे।

इस पर उसके स्वामी ने उस बेईमान प्रबन्धक की प्रशंसा की क्योंकि उसने चतुराई से काम लिया था। सांसारिक व्यक्ति अपने जैसे व्यक्तियों से व्यवहार करने में आध्यात्मिक व्यक्तियों से अधिक चतुर है।

मैं तुमसे कहता हूँ सांसारिक धनसम्पत्ति से अपने लियेमित्रबनाओ। क्योंकि जब धनसम्पत्ति समाप्त हो जायेगी, वे अनन्त निवास में तुम्हारा स्वागत करेंगे। वे लोग जिन पर थोड़े से के लिये विश्वास किया जायेगा और इसी तरह जो थोड़े से के लिए बेईमान हो सकता है वह अधिक के लिए भी बेईमान होगा। इस प्रकार यदि तुम सांसारिक सम्पत्ति के लिये ही भरोसे योग्य नहीं रहे तो सच्चे धन के विषय में तुम पर कौन भरोसा करेगाजो किसी दूसरे का है, यदि तुम उसके लिये विश्वास के पात्र नहीं रहे, तो जो तुम्हारा है, उसे तुम्हें कौन देगा?

कोई भी दास दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से घृणा करेगा और दूसरे से प्रेम या वह एक के प्रति समर्पित रहेगा और दूसरे को तिरस्कार करेगा। तुम धन और परमेश्वर दोनों की उपासना एक साथ नहीं कर सकते।”  –लूका १६:१-१३

जब यीशु इन बातों को अपने चेलों से कह रहे थे, फरीसी भी सुन रहे थे। उन्हें अपने धन से प्रेम था, और जैसे कहानी खुलती जाती है, वे यीशु को घृणा कि दृष्टि से देखने लगे।

इस पर उसने उनसे कहा, 

“’तुम वो हो जो लोगों को यह जताना चाहते हो कि तुम बहुत अच्छे हो किन्तु परमेश्वर तुम्हारे मनों को जानता है। लोग जिसे बहुत मूल्यवान समझते हैं, परमेश्वर के लिए वह तुच्छ है।‘”

 फिर यीशु ने एक और दृष्टान्त बताया:

“’अब देखो, एक व्यक्ति था जो बहुत धनी था। वह बैंगनी रंग की उत्तम मलमल के वस्त्र पहनता था और हर दिन विलासिता के जीवन का आनन्द लेता था। वहीं लाजर नाम का एक दीन दुखी उसके द्वार पर पड़ा रहता था। उसका शरीर घावों से भरा हुआ था।उस धनी पुरुष की जूठन से ही वह अपना पेट भरने को तरसता रहता था। यहाँ तक कि कुत्ते भी आते और उसके घावों को चाट जाते।

और फिर ऐसा हुआ कि वह दीनहीन व्यक्ति मर गया। सो स्वर्गदूतों ने ले जाकर उसे इब्राहीम की गोद में बैठा दिया। फिर वह धनी पुरुष भी मर गया और उसे दफ़ना दिया गया। नरक में तड़पते हुए उसने जब आँखें उठा कर देखा तो इब्राहीम उसे बहुत दूर दिखाई दिया किन्तु उसने लाज़र को उसकी गोद में देखा। तब उसने पुकार कर कहा,‘पिता इब्राहीम, मुझ पर दया कर और लाजर को भेज कि वह पानी में अपनी उँगली डुबो कर मेरी जीभ ठंडी कर दे, क्योंकि मैं इस आग में तड़प रहा हूँ।

किन्तु इब्राहीम ने कहा,‘हे मेरे पुत्र, याद रख, तूने तेरे जीवन काल में अपनी अच्छी वस्तुएँ पा लीं जबकि लाज़र को बुरी वस्तुएँ ही मिलीं। सो अब वह यहाँ आनन्द भोग रहा है और तू यातना। और इस सब कुछ के अतिरिक्त हमारे और तुम्हारे बीच एक बड़ी खाई डाल दी गयी है ताकि यहाँ से यदि कोई तेरे पास जाना चाहे, वह जा सके और वहाँ से कोई यहाँ सके।

उस सेठ ने कहा,‘तो फिर हे पिता, मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि तू लाज़र को मेरे पिता के घर भेज दे,क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं, वह उन्हें चेतावनी देगा ताकि उन्हें तो इस यातना के स्थान पर आना पडे।’

किन्तु इब्राहीम ने कहा,‘उनके पास मूसा है और नबी हैं। उन्हें उनकी सुनने दे।

सेठ ने कहा, ‘नहीं, पिता इब्राहीम, यदि कोई मरे हुओं में से उनके पास जाये तो वे मन फिराएंगे।

“इब्राहीम ने उससे कहा,‘यदि वे मूसा और नबियों की नहीं सुनते तो, यदि कोई मरे हुओं में से उठकर उनके पास जाये तो भी वे नहीं मानेंगे।’”   – लूका १६:१९-३१

कहनी ११३: समर्पण का पर्व : जन्म से अँधा आदमी फरीसियों के साथ 

यूहन्ना ९:८-३४

फिर उसके पड़ोसी और वे लोग जो उसे भीख माँगता देखने के आदी थे, उसे देख कर हैरान हुए। वह उस व्यक्ति के समान दिखता था जिसे वे हर रोज़ देखते थे लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था? उन्होंने एक दूसरे से पुछा,“क्या यह वही व्यक्ति नहीं है जो बैठा हुआ भीख माँगा करता था?”

कुछ ने यकीन किया। दूसरों को लगा कि वह नहीं हो सकता।

कुछ ने कहा,“यह वही है,” दूसरों ने कहा,“नहीं, यह वह नहीं है, उसका जैसा दिखाई देता है।”

इस पर अंधा कहने लगा,“मैं वही हूँ।”

इस पर लोगों ने उससे पूछा,“तुझे आँखों की ज्योति कैसे मिली?”

उसने जवाब दिया,“यीशु नाम के एक व्यक्ति ने मिट्टी सान कर मेरी आँखों पर मली और मुझसे कहा, जा और शीलोह में धो आ और मैं जाकर धो आया। बस मुझे आँखों की ज्योति मिल गयी।”

फिर लोगों ने उससे पूछा कि वह कहाँ है। उस व्यक्ति को जो पहले अंधा था, वे लोग फरीसियों के पास ले गये। यीशु ने जिस दिन मिट्टी सानकर उस अंधे को आँखें दी थीं वह सब्त का दिन था। एक बार फिर धार्मिक अगुवे इतने निरोधक थे कि वे परमेश्वर के पुत्र को भी उसकी इच्छा को उस दिन भी करने दे रहे थे। परन्तु परमेश्वर उन्हें ऐसे ही उसकी व्यव्यस्था के साथ नहीं कुछ करने दे सकता था। उसने फिर भी उस व्यक्ति को चंगाई दी।

जब फरीसियों को पता चला तो वे सोचने लगे कि यीशु को कैसे पकड़ा जाये। वे उसे इस बात के लिए पकड़ सकते थे! सो उन लोगों ने उस व्यक्ति से पूछा कि वो कैसे देख पा रहा था। उसने बताया कि यीशु ने मिटटी उसकी आँखों में लगाई थी।

फिर उस व्यक्ति ने जो अँधा था बताया कि यीशु ने उसे जाकर धोने को कहा और फिर वह देखने लगा।

सो अब यीशु दूसरे लोगों को भी सबत के दिन काम करने को कह रहा था।

जब फरीसियों ने यह सुना, वे आपस में बहस करने लगे। कुछ फ़रीसी कहने लगे कि यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से नहीं है क्योंकि वह सब्त का पालन नहीं करता। दूसरे कहने लगे कि यदि यीशु एक पापी होता, तो वह ऐसे आश्चर्य कर्म कैसे कर सकता था। उनके लिए कोई भी  था क्यूंकि वे सच्चाई को नहीं अपनाना चाहते थे। सो उन्होंने उस अंधे व्यक्ति से पुछा कि वह क्या सोचता है कि यीशु कौन हो सकता है। उसने कहा कि वह नबी है।

अब यहूदी यह नहीं मन्ना चाहते थे कि वास्तव में इस तरह का कोई शानदार चमत्कार हुआ है। यदि यीशु एक नबी था, तो वे परमेश्वर के चुने दूत के खिलाफ लड़ने के दोषी ठहरेंगे! वे कहानी में बुरे लोग थे! वे पुराने नियम की कहानियों में नफ़रत करने वाले दुष्ट लोगों के समान थे। यह असंभव था! इसलिए वे साबित कि वह आदमी झूठ बोल रहा था। वह वास्तव में अँधा नहीं रहा होगा! सवाल करने के लिए वे उसके माता पिता को ले आये।

उन्होंने पुछा,“क्या यही तुम्हारा पुत्र है जिसके बारे में तुम कहते हो कि वह अंधा था। फिर यह कैसे हो सकता है कि वह अब देख सकता है?”

माता-पिता डर गए। ये फरीसी शक्तिशाली आदमी थे। उन्होंने पहले से ही यह घोषित कर दिया था कि जो कोई यह कहेगा कि यीशु मसीह है उसे आराधनालय से बाहर निकाल दिया जाएगा। यदि उस अन्धे के माता पिता यीशु के विषय में कुछ अच्छा कहते हैं तो उन्हें बहिष्कृत घोषित कर दिया जाएगा।धार्मिक नेतृत्व यह मांग करे तो बाकि के यहूदी समुदाय को उन्हें अस्वीकार करना होगा। यह सबके लिए एक धार्मिक फ़र्ज़ बन जाएगा कि वे उस परिवार के साथ ना कोई व्यापार करें और ना ही उनके बच्चों के साथ विवाह की व्यवस्था करें। जब फरीसी किसी एक व्यक्ति या एक परिवार की निंदा करते हैं, तो उन लोगों के साथ खाना खाना भी एक शर्मनाक बात बन जाती है! आप समझ सकते हैं कि क्यूँ उस अंधे आदमी के माता पिता घबरा गए होंगे? इन नेताओं के बुरे पक्ष कि तरफ होना दुनिया की आँखों में एक विनाशकारी बात थी!

इस पर उसके माता पिता ने उत्तर देते हुए कहा,“हम जानते हैं कि यह हमारा पुत्र है और यह अंधा जन्मा था। पर हम यह नहीं जानते कि यह अब देख कैसे सकता है? और न ही हम यह जानते हैं कि इसे आँखों की ज्योति किसने दी है। इसी से पूछो, यह काफ़ी बड़ा हो चुका है। अपने बारे में यह खुद बता सकता है।” 

यीशु ने उनके बेटे को दृष्टि दी थी, लेकिन सामाजिक दबाव की शक्ति बहुत ज़यादा थी। परमेश्वर पर भरोसा करने से अच्छा है कि वे अपने आप को बचाएँ।

यहूदी नेताओं ने उस व्यक्ति को दूसरी बार फिर बुलाया जो अंधा था, और कहा,“सच कहो, और जो तू ठीक हुआ है उसका सिला परमेश्वर को दे। हमें मालूम है कि यह व्यक्ति पापी है।” इसके पहले कि वे केवल यह पूछते कि यीशु कौन है। और अब वे यह घोषित कर रहे थे कि वह एक दुष्ट आदमी है। क्या आप देख सकता हैं कि उनके ह्रदय कितने कठोर होते जा रहे हैं?

इस पर उसने जवाब दिया,“मैं नहीं जानता कि वह पापी है या नहीं, मैं तो बस यह जानता हूँ कि मैं अंधा था, और अब देख सकता हूँ।” उस अंधे व्यक्ति ने यह जान लिया था कि यह फरीसी कितने हास्यास्पद बन चुके थे। यहाँ एक अद्भुद चमत्कार हुआ था और वे केवल बड़बड़ाने में ही लगे हुए थे।

फरीसियों ने उससे फिर से पुछा कि यीशु ने उसे चंगा कैसे किया, और उसने कहा,“मैं तुम्हें बता तो चुका हूँ, पर तुम मेरी बात सुनते ही नहीं। तुम वह सब कुछ दूसरी बार क्यों सुनना चाहते हो? क्या तुम भी उसके अनुयायी बनना चाहते हो?”

इससे फरीसी बहुत क्रोधित हुए। इस पर उन्होंने उसका अपमान किया और कहा,“तू उसका अनुयायी है पर हम मूसा के अनुयायी हैं। हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मूसा से बात की थी पर हम नहीं जानते कि यह आदमी कहाँ से आया है?”

आप सोच सकते हैं कि यदि इन लोगों को पता चलता कि मूसा स्वयं परिवर्तन के पहाड़ पर यीशु के साथ मिलने के लिए आया था? और एलिय्याह भी उसके साथ था!

चर्चा और अधिक से अधिक तीव्र होती जा रही थी। जो अंधा पैदा हुआ था वापस जवाब देने लगा था। यह बहुत ही  उल्लेखनीय है! “आश्चर्य है तुम नहीं जानते कि वह कहाँ से आया है? पर मुझे उसने आँखों की ज्योति दी है। हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता बल्कि वह तो उनकी सुनता है जो समर्पित हैं और वही करते हैं जो परमेश्वर की इच्छा है। कभी सुना नहीं गया कि किसी ने किसी जन्म से अंधे व्यक्ति को आँखों की ज्योति दी हो।यदि यह व्यक्ति परमेश्वर की ओर से नहीं होता तो यह कुछ नहीं कर सकता था।”

यह बहुत ही साहसी था! इस मनुष्य में वो सब करने का साहस था जो औरों में नहीं था। उसने बिना किसी अफ़सोस किये उन यहूदी अगुवों के मूह पर यीशु कि सच्चाई को घोषित कर दिया! उत्तर में उन्होंने कहा,“तू सदा से पापी रहा है। ठीक तब से जब से तू पैदा हुआ। और अब तू हमें पढ़ाने चला है?” वे कितने गलत थे। यह व्यक्ति परमेश्वर को महिमा देने के लिए ही पैदा हुआ था और वह कितना प्रजवलित हो रहा था! अगले हज़ारों सालों से यीशु के प्रति वफादारी के साहस कि इस कहानी को कितनी बार दोहराया गया है और अभी भी दोहराया जा रहा है, जो लोगों को विश्वास कि परीक्षा के लिए सामर्थ देता है। वह यीशु के साथ वफादार रहा और यीशु उसके साथ वफादार रहा।

परन्तु उस समय के लिए, उसे यीशु पर विश्वास करने के लिए। फरीसियों ने उसे आराधनालय से बाहर निकाल दिया था। अपने लिए जब वह नय जीवन को बना रहा था, वह बिना धार्मिक समूह के पूर्ण था, और इस्राएल में जहां सब कुछ शामिल था। वह बहुत कमजोर महसूस करता होगा। यीशु ने सुना कि यहूदी नेताओं ने उसे धकेल कर बाहर निकाल दिया है तो उससे मिलकर उसने कहा,

“’क्या तू मनुष्य के पुत्र में विश्वास करता है?’”

उत्तर में वह व्यक्ति बोला,“हे प्रभु, बताइये वह कौन है? ताकि मैं उसमें विश्वास करूँ।”

यीशु ने उससे कहा,“तू उसे देख चुका है और वह वही है जिससे तू इस समय बात कर रहा है।”

फिर वह बोला,“प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ।” और वह नतमस्तक हो गया।

यीशु ने कहा,“मैं इस जगत में न्याय करने आया हूँ, ताकि वे जो नहीं देखते वे देखने लगें और वे जो देख रहे हैं, नेत्रहीन हो जायें।”

वहाँ कुछ फरीसी खड़े वो सब कुछ देख रहे थे। उन्होंने यीशु को ऐसा कहते सुना। वे अपने घुटनों पर नहीं गिरे। उन्होंने उससे पुछा,“निश्चय ही हम अंधे नहीं हैं। क्या हम अंधे हैं?”

यीशु ने उनसे कहा,“यदि तुम अंधे होते तो तुम पापी नहीं होते पर जैसा कि तुम कहते हो कि तुम देख सकते हो तो वास्तव में तुम पाप-युक्त हो।”

आप को समझ में आया? यीशु स्वर्ग कि सच्चाई कि यशस्वी ज्योति से उनके भयंकर झूठ को बदल रहा था। उसने कहा कि यदि फरीसियों कि समस्या उनके आँखों के अंधेपन के कारण है, तो वे पाप के लिए दोषी नहीं ठहरेंगे। श्राप के कारण जो पीड़ा है वे उससे पूर्ण रूप से निर्दोष ठहरेंगे। जो वे लोगों को सिखा रहे थे यह उसके बिलकुल विपरीत था। वे लोगों को यह सिखा रहे थे कि उनके और उनके परिवार के पाप के कारण वे अंधे थे। अपने विचारहीन और गर्व के कारण वे उन लोगों पर झूठे इल्ज़ाम लगा कर उनकी पीड़ा को और बढ़ा रहे थे जो पहले से ही पीड़ित थे। यह शैतान का काम था।

यीशु अपने साफ़ ज्योति को लाया था। जो शारीरिक रूप से अंधे थे वे उस मृत्युदंड से आज़ाद थे। जो वास्तव में दोषी थे वे केवल फरीसी थे। वे सच्च और परमेश्वर के विषय में सशक्त अधिकार को बताने कि घोषणा करते थे। फिर भी उनकी यह शिक्षा किसी भी नम्रता के साथ बह कर नहीं निकलती थी। वे परमेश्वर के लोगों को शर्मनाक झूठ में फसा कर रखते थे, और परमेश्वर का पुत्र बहुत क्रोधित हुआ। क्या आप इस बात से खुश नहीं हैं कि जिस परमेश्वर ने सब सृजा वह एक न्याय और अनुग्रह का परमेश्वर है? वह रक्षा करता है, फटकारता है और बचाता भी है। उसका मार्ग सबसे उत्तम है।

कहनी ११२: समर्पण का पर्व:  यीशु द्वारा जन्म से अंधे आदमी कि चंगाई 

यूहन्ना ९:१-४१

मिलापवाले तम्बू के पर्व के तीन महीने बीत चुके थे और अब समर्पण के पर्व का समय आ गया था।एक बार फिर, सभी तीर्थयात्त्री इस्राएल देश से यरूशलेम को यात्रा के लिए जाएंगे। पिछले पर्व की घटनाएं अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा थीं। यीशु ने ठीक मंदिर के आंगन में, तेजस्वी घोषणाएं कीं। इसके बावजूद कि धार्मिक अगुवे उसे गिरफ्तार करना चाहते थे, कुछ भी ऐसा नहीं हुआ और लोगों को आश्चर्य हुआ।

तब से, वह और उसके चेले परमेश्वर के राज्य के बारे में उपदेश देते रहे और कोई भी उन चमत्कारों के विषय में इनकार नहीं कर सका। येरूशलेम में कितनो ने चंगाई पाई थी। उनके परिवारों में से कितने वहाँ थे?

सारा येरूशलेम यीशु के बारे में बात कर रहा था। लेकिन यीशु भीड़ या धार्मिक अगुवों के बारे में चिंतित नहीं था। उसका निरंतर ध्यान केवल अपने पिता की इच्छा को पूरी करने के लिए था। उसके विरुद्ध लोगों का बहस करना, लोगों कि भीड़ से घिरे रहना, और यहूदी अगुवों कि उसको मरवाने कि साज़िश, इन सब के बीच परमेश्वर ने अपने पुत्र से किया करने को कहा? यह एक ख़ूबसूरत कहानी है।

जब यीशु अपने शिष्यों के साथ यरूशलेम से जा रहा था, उसने एक अंधे आदमी को देखा। उसकी आंखों की आकृति से स्पष्ट था कि वह जन्म से ही अंधा था। क्या आप उसके माता पिता के दु: ख की कल्पना कर सकते हैं? इस आदमी के लिए दैनिक जीवन के संघर्ष महान रहे होंगे।

ना केवल उसे एक गंभीर विकृति से ग्रस्त होना पड़ा, बल्कि उसे अपमान की शर्म को भी सहना पड़ा होगा। हर कोई उसके अंधेपन को इस दृष्टी से देख रहा था कि परमेश्वर कि ओर से उसके परिवार के विरुद्ध न्याय मिला होगा। उनके पड़ोसी, अगुवे और अपने ही परिवार के सदस्य यह सोचते होंगे कि उन्होंने ऐसा क्या किया होगा जिसकी वजह से ऐसा भाग मिला। वे आपस में उनके गुप्त में किये कोई पाप के बारे में चर्चा करते थे। यदि बेटा ऐसा अँधा पैदा हुआ तो उसमें उसका क्या कसूर? नहीं, ज़रूर माँ बाप कि गलती रही होगी। उन्होंने ऐसा क्या किया होगा? और ऐसे ही परिवार कि पीड़ा को उन्होंने गपशप करके अपने द्वेष को ढांपने के लिए धार्मिक चोगा पहन लिया।

सबसे दुःख कि बात यह है कि वह अँधा आदमी और उसके माँ बाप भी उन बातों पर विश्वास करने लग गए थे। बिना जाने कि क्यूँ ऐसा हुआ, वे उस शर्म के बोझ को लिए जी रहे होंगे।उन्होने यह सब अपने ऊपर किसी तरह ली लिया होगा। वे परमेश्वर को बहुत कठोर और ना मॉफ करने वाला चेहरा समझने लगे थे। लेकिन यह परमेश्वर पिता के विषय में सही नहीं था और, यीशु इस झूठ को विपरीत में बदलने जा रहा था।

जब चेलों ने उस व्यक्ति को सड़क पर बैठे देखा, उन्होंने यीशु से पुछा, “हे रब्बी, यह व्यक्ति अपने पापों से अंधा जन्मा है या अपने माता-पिता के?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’न तो इसने पाप किए हैं और न इसके माता-पिता ने बल्कि यह इसलिये अंधा जन्मा है ताकि इसे अच्छा करके परमेश्वर की शक्ति दिखायी जा सके।'”

परमेश्वर की नज़रों में, यह इस आदमी का अंधा होना कोई शर्म की बात नहीं थी। यह एक विशेषाधिकार था! परमेश्वर खुद उसके माध्यम से महिमा और सम्मान को प्राप्त करने जा रहा था ! यही सबसे सर्वोच्च बुलाहट है!

यीशु ने कहा,”उसके कामों को जिसने मुझे भेजा है, हमें निश्चित रूप से दिन रहते ही कर लेना चाहिये क्योंकि जब रात हो जायेगी कोई काम नहीं कर सकेगा। जब मैं जगत में हूँ मैं जगत की ज्योति हूँ।’” 

आपको क्या लगता है जब यीशु ने यह कहा कि रात आ रही है? यदि दिन यीशु के इस पृथ्वी पर रहने के समय को दर्शाता है, तो इस का क्या अर्थ हुआ कि अंधकार आने वाला है? यीशु अपनी क्रूस पर होने वाली मृत्यु के बारे में कह रहे थे। जब तक वह इस पृथ्वी पर था, वह श्राप कि शक्ति को और उन्हें जो इसके कारण पीड़ित हुए, उस शक्ति को तोड़ेगा।

आपने देखा यीशु ने “हम” शब्द का प्रयोग किया? यह कार्य केवल यीशु का ही नहीं है, लेकिन उन सब का भी है जो उसके पीछे चलते हैं। उसके चेले इस योजना का एक हिस्सा थे। वे यीशु के बदलने देने वाली सामर्थ को दर्शाने वाले थे! लेकिन उस एक चेतावनी दी: एक दिन वह चला जाएगा और फिर कार्य करने का वक़्त नहीं रहेगा। यीशु के इस पृथ्वी पर समय समाप्त हो रहा था।

आप उसके उत्साह कि कल्पना कर सकते हैं? उसने ऐसा पहले कुछ भी नहीं देखा था! अचानक, जिन आवाज़ों को उसने जो अब तक सूनी थीं उनकी आवाज़ और चेहरे और आकार और रंग दिखने लगे! उसने देखा कि ना केवल सूरज गर्म है, लेकिन चमकीले पीले और गहरे नीले आकाश के सामने चमकता हुआ दिखा! खोज कि दुनिया अभी उसके सामने रखी हुई थी!

कहानी १०१: मिलापवाले तम्बू का पर्व: यीशु का अपने आप को प्रकट करना

यूहन्ना ८:२१-५९

यरूशलेम के मंदिर के आंगनों में जहां यीशु सिखा रहे थे, वहाँ लोगों ने उस पर विश्वास किया। उसने उनसे कहा,“’यदि तुम लोग मेरे उपदेशों पर चलोगे तो तुम वास्तव में मेरे अनुयायी बनोगे। और सत्य को जान लोगे। और सत्य तुम्हें मुक्त करेगा।’”

अब जब यीशु ने स्वतंत्रता के विषय में बोला, वह पाप के विषय में बोल रहा था। यह उस श्राप का भयंकर परिणाम था जो आदम और हव्वा के परमेश्वर से दूर हो जाने के कारण हुआ। उन्होंने अपनी इच्छा को चुना और धार्मिकता कि रेखा को पार करके दुष्टता कि ओर शैतान कि बातों को सुनकर, कदम रखा। यीशु ने आकर पूरी कीमत चुकाई। वे उन सब के ह्रदय से श्राप के बल को मिटा देगा जो उसके कामों पर विश्वास करेंगे!  वे जिन्होंने यीशु के स्वतंत्र होने के वचन को सुना, क्रोधित हुए,“हम इब्राहीम के वंशज हैं और हमने कभी किसी की दासता नहीं की। फिर तुम कैसे कहते हो कि तुम मुक्त हो जाओगे?”

यीशु ने उत्तर देते हुए कहा,
“’मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। हर वह जो पाप करता रहता है, पाप का दास है। और कोई दास सदा परिवार के साथ नहीं रह सकता। केवल पुत्र ही सदा साथ रह सकता है। अतः यदि पुत्र तुम्हें मुक्त करता है तभी तुम वास्तव में मुक्त हो। मैं जानता हूँ तुम इब्राहीम के वंश से हो। पर तुम मुझे मार डालने का यत्न कर रहे हो। क्योंकि मेरे उपदेशों के लिये तुम्हारे मन में कोई स्थान नहीं है। मैं वही कहता हूँ जो मुझे मेरे पिता ने दिखाया है और तुम वह करते हो जो तुम्हारे पिता से तुमने सुना है।’”

यीशु इन लोगों को झूठ पर विश्वास करने कि अनुमति नहीं देने वाला था। वे यह सोचते थे कि इनके इब्राहिम के वंश के होने से उनको परमेश्वर के आगे विशेष हैसियत मिल गई है। पुराने नियम में लिखा है कि वे परमेश्वर कि संतान हैं। यह सच था, लेकिन अब परमेश्वर का सबसे बड़ा वादा उनके सामने था और वे उससे इंकार कर रहे थे। मसीह हर उस पाप के श्राप को मिटाने आया था जो मनुष्य का एक हिस्सा बन चूका था। केवल यीशु का जीवन सबसे पवित्र और पूर्ण था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे इब्राहिम के वंश के था या उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकार कर दिया था। जो परमेश्वर कि ओर से दिया गया था वह उन्हें दे रहा था, लेकिन यहूदी उसे सुनने से इंकार कर रहे थे। वे अपने सच्चे पिता शैतान कि सुनने में लगे हुए थे।

इस पर उन्होंने यीशु को उत्तर दिया, “हमारे पिता इब्राहीम हैं।”
यीशु ने कहा,“’यदि तुम इब्राहीम की संतान होते तो तुम वही काम करते जो इब्राहीम ने किये थे।'” इब्राहिम अपने विशाल विशवास के लिए जाना जाता था। वह परमेश्वर के वचन को सुनकर उसे मानता था। यहूदी लोग उसके बिलकुल विपरीत थे। वे परमेश्वर के पुत्र से सुनते थे और उसी को मरवाना चाहते थे! यीशु ने कहा,”‘पर तुम तो अब मुझे यानी एक ऐसे मनुष्य को, जो तुमसे उस सत्य को कहता है जिसे उसने परमेश्वर से सुना है, मार डालना चाहते हो। इब्राहीम ने तो ऐसा नहीं किया। तुम अपने पिता के कार्य करते हो।’”

फिर उन्होंने यीशु से कहा,“हम व्यभिचार के परिणाम स्वरूप पैदा नहीं हुए हैं। हमारा केवल एक पिता है और वह है परमेश्वर।”

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया,
“’यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता तो तुम मुझे प्यार करते क्योंकि मैं परमेश्वर में से ही आया हूँ। और अब मैं यहाँ हूँ। मैं अपने आप से नहीं आया हूँ। बल्कि मुझे उसने भेजा है। मैं जो कह रहा हूँ उसे तुम समझते क्यों नहीं? इसका कारण यही है कि तुम मेरा संदेश नहीं सुनते। तुम अपने पिता शैतान की संतान हो। और तुम अपने पिता की इच्छा पर चलना चाहते हो। वह प्रारम्भ से ही एक हत्यारा था। और उसने सत्य का पक्ष कभी नहीं लिया। क्योंकि उसमें सत्य का कोई अंश तक नहीं है। जब वह झूठ बोलता है तो सहज भाव से बोलता है क्योंकि वह झूठा है और सभी झूठों को जन्म देता है।पर क्योंकि मैं सत्य कह रहा हूँ, तुम लोग मुझमें विश्वास नहीं करोगे। तुममें से कौन मुझ पर पापी होने का लांछन लगा सकता है। यदि मैं सत्य कहता हूँ, तो तुम मेरा विश्वास क्यों नहीं करते? वह व्यक्ति जो परमेश्वर का है, परमेश्वर के वचनों को सुनता है। इसी कारण तुम मेरी बात नहीं सुनते कि तुम परमेश्वर के नहीं हो।’”

इस बात को सुनकर यहूदी क्रोधित हुए। यह कौन था जिसने उन्हें मंदिर के आँगन में उनका अपमान किया! उसकी कैसे हिम्मत हुई यह कहकर कि वे शैतान कि संतान हैं! यहूदियों ने उससे कहा,“यह कहते हुए क्या हम सही नहीं थे कि तू सामरी है और तुझ पर कोई दुष्टात्मा सवार है?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’मुझ पर कोई दुष्टात्मा नहीं है। बल्कि मैं तो अपने परम पिता का आदर करता हूँ और तुम मेरा अपमान करते हो। मैं अपनी महिमा नहीं चाहता हूँ पर एक ऐसा है जो मेरी महिमा चाहता है और न्याय भी करता है। मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ यदि कोई मेरे उपदेशों को धारण करेगा तो वह मौत को कभी नहीं देखेगा।’”

इस पर यहूदी नेताओं ने उससे कहा,“अब हम यह जान गये हैं कि तुम में कोई दुष्टात्मा समाया है। यहाँ तक कि इब्राहीम और नबी भी मर गये और तू कहता है यदि कोई मेरे उपदेश पर चले तो उसकी मौत कभी नहीं होगी। निश्चय ही तू हमारे पूर्वज इब्राहीम से बड़ा नहीं है जो मर गया। और नबी भी मर गये। फिर तू क्या सोचता है? तू है क्या?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’यदि मैं अपनी महिमा करूँ तो वह महिमा मेरी कुछ भी नहीं है। जो मुझे महिमा देता है वह मेरा परम पिता है। जिसके बारे में तुम दावा करते हो कि वह तुम्हारा परमेश्वर है। तुमने उसे कभी नहीं जाना। पर मैं उसे जानता हूँ, यदि मैं यह कहूँ कि मैं उसे नहीं जानता तो मैं भी तुम लोगों की ही तरह झूठा ठहरूँगा। मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ, और जो वह कहता है उसका पालन करता हूँ।तुम्हारा पूर्वज इब्राहीम मेरा दिन को देखने की आशा से आनन्द से भर गया था। उसने देखा और प्रसन्न हुआ।'”

फिर यहूदी नेताओं ने उससे कहा,“तू अभी पचास बरस का भी नहीं है और तूने इब्राहीम को देख लिया।”

इस वाक्य को समझना हमारे लिए कठिन है। यीशु अपने आप को परमेश्वर कह रहा था। जब मूसा जलती हुई झाड़ी के पास खड़ा था तो उसने परमेश्वर से उसका नाम पुछा, तो उसने कहा,“‘मैं हूँ।”‘ हर एक यहूदी जानता था कि इसी नाम से सर्वशक्तिमान परमेश्वर को सम्बोधित किया जाता था और वह पवित्र था। यहूदी लोग इस घोषणा को सुनकर इत्यधित क्रोधित हुए कि वे उसे पत्थरवा करना चाहते थे। अपने आप को परमेश्वर कहना उसकी निंदा करना था और उसकी सज़ा मृत्यु थी। अपने आप को परमेश्वर कह कर निंदा तब होती है जब वह झूठ हो। यीशु सत्य कह रहे थे! ये यहूदी अपने आप को इब्राहिम कि संतान कहते थे, लेकिन उसका मतलब यह है कि उन्हें भी इब्राहिम कि तरह होना चाहिए था, और वह एक महान विश्वासी जन था। परमेश्वर ने उसे यह वायदा दिया था कि वह उसे एक महान राष्ट्र बनाएगा, और पचीस साल तक इब्राहिम जंगलों में भटता रहा और परमेश्वर के इस वायदे को पूरा होने का इंतज़ार करता रहा। उसने उस बातों  पर विश्वास किया जिसे उसने देखा ही नहीं था। और अब यीशु भीड़ के सामने खड़े होकर उन्हें कह  रहा था कि वे उन अनंतकाल कि बातों पर विश्वास करें जो उन्होंने अभी तक नहीं देखि हैं। उन्हें यह विश्वास करना था कि ये वचन परमेश्वर कि ओर से हैं और वे उन्हें जीवन देने वाले वचन थे जो उन्हें पाप से स्वतंत्र करते। उन्हें मसीहा के उद्देश्य को जानने के लिए उस पर भरोसा करना था। उन्हें यह विश्वास करना था कि परमेश्वर पिता ने ही उन चमत्कारों करने के लिए शक्ति प्रदान कि थी। विश्वास करने के लिए और कितने तरीके यीशु उन्हें देता, और कितनो को वे अस्वीकार करते इससे पहले उनके पास और अवसर नहीं रहते?

यहूदियों ने मसीहा को सुना था और एक बार फिर उसे अस्वीकार कर दिया। वे उसे उसी समय मारवा देना चाहते थे। यीशु का अपने प्राण को बलिदान करने का समय  अभी नहीं आया था, और उन लोगो के क्रोध के अनुसार नहीं होने वाला था। जब उसका पिता उससे कहेगा तब वह अपना बलिदान दे देगा। वह भीड़ में जा मिला और जब तक छुपा रहा जब तक सारी अव्यवस्था ख़त्म नहीं हो गई

कहानी ९५: विश्वास की कमी

मत्ती १७:१४-२३, मरकुस ९:१४-३२, लूका ९:३७-४५

अगले दिन, यीशु के रूपांतरण होने के बाद वे पहाड़ से पतरस, याकूब और यूहन्ना के साथ जब वापस आये तो, भीड़ बाकी के चेलों को घेरी हुई थी। कुछ शास्त्री, जो धार्मिक अगुवे थे जो उनके साथ बहस कर रहे थे। यीशु को आते देख भीड़ अचरज में पड़ गई। वे उसके पास दौड़ कर गए। यीशु ने चेलों से पूछा कि वे भीड़ के साथ क्या बात कर रहे थे। तभी भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्ला उठा,“गुरु, मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे बेटे पर अनुग्रह-दृष्टि कर। वह मेरी एकलौती सन्तान है। अचानक एक दुष्ट आत्मा उसे जकड़ लेती है और वह चीख उठता है। उसे दुष्टात्मा ऐसे मरोड़ डालती है कि उसके मुँह से झाग निकलने लगता है। वह उसे कभी नहीं छोड़ती और सताए जा रही है।”

क्या आप इस व्यक्ति कि आवाज़ में पीड़ा और दुःख को समझ सकते हैं? यह कितना दर्द्नाक रहा होगा कि अपने एक लौते पुत्र को इस तरह रोज़ ब रोज़ भयानक कष्ट में देखना। इसीलिए वह यीशु के आगे घुटनों के बल गिर गया! उसने उससे कहा, “मैं उसे तेरे शिष्यों के पास लाया, पर वे उसे अच्छा नहीं कर पाये।”

उत्तर में यीशु ने कहा, “अरे भटके हुए अविश्वासी लोगों, मैं कितने समय तुम्हारे साथ और रहूँगा? कितने समय मैं यूँ ही तुम्हारे साथ रहूँगा? उसे यहाँ मेरे पास लाओ।” पूरे सुसमाचारों में केवल यही एक समय था जब यीशु ने उसके आस पास हो रही उन बातों के प्रति बेसब्री दिखाई। वह किसके साथ बेसबर हो रहा था? शायद शास्त्रियों के साथ। वे मसीह कि सेवकाई को नष्ट करने कि साजिश रच रहे थे। वे शायद यह जान चुके थे कि वहाँ केवल नौ चेले हैं, और वे उस व्यक्ति के दुष्ट आत्मा से युक्त बेटे को वहाँ ले आये थे। यदि उन्होंने यीशु के चेलों को और कुछ करते देख लिया होता, तो वे यीशु के भी पीछे पड़ गए होते! ये राष्ट्र के अगुवे उस अतिदुखी व्यक्ति या उसके बेटे कि मदद नहीं कर रहे थे, वे उसे यीशु को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे! इसीलिए यीशु इतने हताश हो गये थे!

तब वे लड़के को उसके पास ले आये और जब दुष्टात्मा ने यीशु को देखा तो उसने तत्काल लड़के को मरोड़ दिया। वह धरती पर जा पड़ा और चक्कर खा गया। उसके मुँह से झाग निकल रहे थे। तब यीशु ने उसके पिता से पूछा कि ऐसा कितने दिनों से है। पिता ने उत्तर दिया,“यह बचपन से ही ऐसा है। दुष्टात्मा इसे मार डालने के लिए कभी आग में गिरा देती है तो कभी पानी में। क्या तू कुछ कर सकता है? हम पर दया कर, हमारी सहायता कर।”

यीशु ने उससे कहा,“तूने कहा,‘क्या तू कुछ कर सकता है?’ विश्वासी व्यक्ति के लिए सब कुछ सम्भव है।”

तुरंत बच्चे का पिता चिल्लाया और बोला, “मैं विश्वास करता हूँ। मेरे अविश्वास को हटा!”

अब तक इस बात कि खबर फ़ैल गयी थी, और लोग सारी दिशाओं से वहाँ आ रहे थे। उसने दुष्टात्मा को ललकारा और उससे कहा,“ओ बच्चे को बहरा गूँगा कर देने वाली दुष्टात्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूँ इसमें से बाहर निकल आ और फिर इसमें दुबारा प्रवेश मत करना!”

तब दुष्टात्मा चिल्लाई। बच्चे पर भयानक दौरा पड़ा। और वह बाहर निकल गयी। बच्चा मरा हुआ सा दिखने लगा।फिर यीशु ने लड़के को हाथ से पकड़ कर उठाया और खड़ा किया। वह खड़ा हो गया। यीशु ने उसे उसके पिता को सौंप दिया, और सब यह देख कर परमेश्वर कि महानता को देख कर अचम्भे और श्रद्धायुक्त भयभीत हुए।

इसके बाद यीशु अपने घर चला गया। अकेले में उसके शिष्यों ने उससे पूछा की वे इस दुष्टात्मा को बाहर क्यों नहीं निकाल सके। दूसरी परिस्थितियों में, वे दुष्ट आत्माएं निकल लिया करते थे। तो इस बार क्या हुआ? यीशु ने उन्हें बताया, “क्योंकि तुममें विश्वास की कमी है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, यदि तुममें राई के बीज जितना भी विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से कह सकते हो ‘यहाँ से हट कर वहाँ चला जा’ और वह चला जायेगा। तुम्हारे लिये असम्भव कुछ भी नहीं होगा।” इस पर यीशु ने उनसे कहा कि ऐसी दुष्टात्मा प्रार्थना के बिना बाहर नहीं निकाली जा सकती थी।

फिर उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया। और जब वे गलील होते हुए जा रहे थे तो वह नहीं चाहता था कि वे कहाँ हैं, इसका किसी को भी पता चले। यीशु अब गलील से होते हुए पेरा से यहूदिया को निकल पड़ा। वह क्रूस के लिए जा रहा था, और उसे चेलों को कुछ महत्पूर्ण बातें सिखानी थी। इस सन्देश में कुछ अत्यावश्यकता थी जो उसके चेले बाद में ही समझ पाएंगे।

“अब जो मैं तुमसे कह रहा हूँ, उन बातों पर ध्यान दो। मनुष्य का पुत्र मनुष्य के हाथों पकड़वाया जाने वाला है।”

यीशु उन्हें आगे आने वाले रास्ते को दर्शा रहे थे। यही कारण था जिसके लिए वो आया था, और परमेश्वर का मसीह के लिए शुरू से यही योजना थी। यह एक मुक्तिदाता-सम्बंधित रहस्य था जो कोई भी इसका अनुमान नहीं लगा सकता था। उसने उनसे कहा,”वे उसे मार डालेंगे। किन्तु तीसरे दिन वह फिर जी उठेगा!” चेलों ने उसे सुना, किन्तु वे इस बात को नहीं समझ सके। यह बात उनसे छुपी हुई थी। सो वे उसे जान नहीं पाये। और वे उस बात के विषय में उससे पूछने से डरते थे।यीशु जानता था कि उसके आने वाली परीक्षाएं उसके मित्रों के लिए कठिन होंगी, और वह जानता था कि वे भयभीत होंगे। लेकिन अगर वे अभी जान जानते कि वो जानता कि आने वाला है, तो एक दिन वे इस बात को समझ जाएंगे कि सब कुछ उसके नियंत्रण में था। मसीह का भविष्य कोई दुर्घटना नहीं थी जो इस लिए हुई कि परमेश्वर ने नियंत्रण खो दिया था। यह बहुत ही दिल टूटने वाला परमेश्वर का विशाल उद्धार के कार्य का एक भाग था।  यीशु जनता था कि उसे क्या करना है, और जिस तरह साहसपूर्वक उसने पिता कि मर्ज़ी को पूरा किया, उसने चेलों के विश्वास को मज़बूत करने में भी सहयोग दिया।

जब यीशु और उसके शिष्य कफ़रनहूम में आये तो मन्दिर का दो दरम कर वसूल करने वाले पतरस के पास आये। यह कर येरूशलेम के मंदिर कि देख भाल के लिए था। हर पुरुष जो बीस साल से ऊपर था उसे कर देना होता था। उन्होंने पतरस से पुछा कि यीशु भी कर देता है। पतरस ने उत्तर दिया,“हाँ, वह देता है।” और घर में चला आया। यीशु ने उससे कहा,“’शमौन, तेरा क्या विचार है? धरती के राजा किससे चुंगी और कर लेते हैं? स्वयं अपने बच्चों से या दूसरों के बच्चों से?’

पतरस ने कहा कि वे दूसरों से कर लेते हैं। यीशु ने कहा,“‘यानी उसके बच्चों को छूट रहती है। पर हम उन लोगों को नाराज़ न करें इसलिये झील पर जा और अपना काँटा फेंक और फिर जो पहली मछली पकड़ में आये उसका मुँह खोलना तुझे चार दरम का सिक्का मिलेगा। उसे लेकर मेरे और अपने लिए उन्हें दे देना।’”

यीशु और उसके चेले परमेश्वर के शाही घराने के सदस्य थे। नास्तिक यहूदी के घराने दुसरे किस्म के थे, और इनके पास येरूशलेम के मंदिर के ऊपर अधिकार था जो कर लिया करते थे। यह स्वाभाविक था कि वे उनसे कर लेते थे जो परिवार के बाहर के थे और यीशु ऐसे कर को देने में खुश थे जिसमें कि अंतर दिखे।

कहानी ९३: एक अंधा आदमी

मत्ती १६:१३-२०, मरकुस ८:२२-३०, लूका ९:१८-२१

चेले यीशु के संग बैतसैदा चले आये। वहाँ कुछ लोग यीशु के पास एक अंधे को लाये और उससे प्रार्थना की कि वह उसे छू दे। उसने अंधे व्यक्ति का हाथ पकड़ा और उसे गाँव के बाहर ले गया। उसने उसकी आँखों पर थूका, अपने हाथ उस पर रखे और उससे पूछा,“तुझे कुछ दिखता है?” ऊपर देखते हुए उसने कहा,“मुझे लोग दिख रहे हैं। वे आसपास चलते पेड़ों जैसे लग रहे हैं।” कल्पन कीजिये कि यह व्यक्ति अपनी सारे ज़िन्दगी ऐसे ही पेड़ों से टटकराता रहा होगा। अब वह उन लम्बे, पतले पेड़ों को जिन्हें वह देख रहा था वे चल फिर रहे थे! वे इंसान थे!

तब यीशु ने उसकी आँखों पर जैसे ही फिर अपने हाथ रखे, उसने अपनी आँखें पूरी खोल दीं। उसे ज्योति मिल गयी थी। वह सब कुछ साफ़ साफ़ देख रहा था।

घर जाकर जब अपनी पत्नी और माँ बाप को उसने बताय होगा तो कैसा रहा होगा? पड़ोसियों ने क्या कहा होगा जब उन्होंने देखा होगा कि वह अँधा नहीं था? क्या आप कल्पना कर सकते हैं जब आराधनालय के अगुवों को यह पता चला होगा कि यीशु ने उस चंगा किया है तब उन्होंने क्या कहा होगा? यीशु ने उसे घर वापास भेज दिया लेकिन उसे गाव से जाने को मन किया था। अगर सबको पता लग जाता कि यीशु ने क्या किया है, तो एक और बवाल खड़ा हो जाएगा। यहूदी लोग नहीं जानते थे कि उसकी सामर्थ को लेकर किस तरह सही प्रतिक्रिया करें। वे या तो उसे राजा बनाना चाहते थे या फिर उसे मार देना चाहते थे!

यीशु ने इस व्यक्ति को दो चरणों में क्यूँ चंगा किया? बाइबिल में केवल यही एक कहानी है जहां इसका वर्णन किया गया है, और हम जानते हैं कि यीशु ने यह जानबूझकर किया है। और हम जानते हैं कि यीशु ने ऐसा अच्छे कारण के लिए किया है। सब कुछ जो वह करता था वह अच्छे कारण के लिए ही करता था! हम यह भी जानते हैं कि उस मनुष्य को एक साथ चंगा करने कि सामर्थ थी उसमें! वह एक सबक सिखाना चाहता था! शायद यीशु ने इस तरह किया ताकि हम रुक करके उसके चमत्कार के विषय में सोचें। शायद यीशु अपने चेलों को यह सिखाना चाहता था कि सेवकाई में कुछ चमत्कार औरों कि तरह एक दम नहीं होते हैं। कुछ चंगइयां समय लेती हैं। या फिर उनके लिए यह ऐसी तस्वीर थी जो यह बताती है कि आध्यामिक दृष्टी साफ़ होने में समय लेती है।

यीशु में विश्वासी जन विश्वास को अलग अलग चरणो में सीखते हैं, और हर एक चरण उद्धारकर्ता के विषय में स्पष्ट विचार दर्शाता है। यह उसके चेलों के लिए सत्य था। यीशु के साथ चलने में, उन्हें उसके पीछे नज़दीकी से चलते रहना है। उसकी शिक्षाओं ने जब राजाओं और धार्मिक अगुवों को क्रोधित किया, उन्हें इस बात का सामना करना था कि वास्तव में यीशु वही है जो वह अपने बारे में कहता है। क्या उनके अपने जीवन उसके जोखिम उठाने लायक था? भीड़ जब उसे अस्वीकार कर रही थी और पश्चाताप करने से इंकार कर रही थी, उन्हें यह निर्णय लेना था कि उनको भी अस्वीकृति का सामना करना होगा। उन्होंने इस बात का प्रमाण दे दिया था कि वे गलील में जाकर सुसमाचार सुनाएंगे। वे इस सन्देश में और चमत्कार में विश्वास करते थे। उनकी आँखें साफ़ होती जा रही थीं। परन्तु क्या वे स्वयं यीशु पर विश्वास करेंगे?

और फिर यीशु और उसके शिष्य कैसरिया फिलिप्पी के आसपास के गाँवों को चल दिये। यह हेरोदेस राजा के क्षेत्र के बाहर था। यहाँ अन्यजातियों के देवता का मंदिर था, और लोग सर्व उच्च परमेश्वर कि आराधना करते थे। यह एक अन्यजातियों का क्षेत्र था, इसलिए चेलों को वहाँ सिखाना यीशु के लिए सुरक्षित था।

रास्ते में यीशु ने अपने शिष्यों से पूछा,“’लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?'” यह एक विषय था जिसके विषय में पूरा इस्राएल बात करता था।

उन्होंने उत्तर दिया कि कुछ लोग उसे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना समझते हैं पर कुछ लोग एलिय्याह और दूसरे उसे भविष्यवक्ताओं में से कोई एक को कहते हैं। बहुत सारे अनुमान और अफवाहें थीं लेकिन कोई भी निश्चित नहीं था।यीशु जानना चाहता था कि उसके चेले उसके विषय में क्या सोचते हैं। यीशु ने उनसे पूछा,“’और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ।’”

पतरस ने उसे उत्तर दिया,“तू मसीह है।” यह एक साधारण सा वाकया था। यह एक घोषणा थी। पतरस एक दिशसिद्धि के कारण बोल रहा था क्यूंकि उसके जीवन दाव पर लगा हुआ था! वह अपने विश्वास में इस बात को लेकर बढ़ गया था कि जिसके साथ वह सब जगह जाया करता था वही परमेश्वर है! या तो वह सही था, या फिर वह एक मूर्ख था!

जब पहली बार पतरस ने अपने विश्वास कि घोषणा कि, तब वह यहूदियों के नगर में था जहां यीशु के बहुत से चेलों ने उसे छोड़ दिया था। परमेश्वर का पुत्र संसार में आ गया था। पतरस युगानुयुग कि सच्चाई से उत्तेजित था जो मसीह में उपस्थित थी, और वह परिवर्तित हो रहा था।

आपको याद है कि पतरस के साथ कब यह सब घटा? क्या आपको वो कहानी याद है जिसमें पतरस अपने भाई के साथ यरदन नदी पर था जहां यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला सुसमाचार सुना रहा था। वे विश्वास का कदम उठाते हुए परमेश्वर के पीछे चल रहे थे। यहाँ उनकी मुलावत यीशु वे वापस अपने घर गलील उसके साथ चले गए। क्या वे उस वक़्त  अपना जीवन उसको समर्पित करेंगे? फिर एक दिन, जब वे जाल धो रहे थे, यीशु ने उन्हें पुकारा। वे मछुए थे, और वे उसका को बहुत ईमानदारी से कर रहे थे उन्हें सौंपा था। लेकिन जब यीशु ने पुकारा, उन्होंने ने सब कुछ छोड़ कर उस विश्वास के कदम को उठाया जो परमेश्वर ने उन्हें उपलब्ध् कराया था।

परमेश्वर इन लोगों के ह्रदयों में कार्य करने के लिए समय और परिस्थितियों का इस्तेमाल कर रहा था। फिर एक दिन, यीशु ने  मछलियों से भरने के लिए एक अद्भुद  चमत्कार किया। पतरस ने पूरी रात मछली पकड़ने का प्रयास किया पर उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। उसने सारी ज़िन्दगी गलील के समुंद पर मछली पकड़ी, और वह समझ गया था कि कैसे एक चमत्कार के द्वारा इतनी सारी चमकदार, चिकनी मछलियां पकड़ी जा सकती हैं। परमेश्वर के आगे घुटनो पर आकर उस चमत्कार के प्रति उसकी प्रतिक्रिया थी। यीशु के पीछे चलते हुए उमड़ते भय के साथ पतरस अपने विश्वास में बना रहा। जब उसने ऐसा किया, वह इस आश्वस्त आश्वासन में बढ़ता गया कि यीशु उसके भरोसे के लायक था। उसके बदले में, यीशु पतरस और दुसरे चेलों को सुसमाचार के सन्देश को और चंगाई कि सामर्थ को सौंप रहा था, जिससे कि  उनका विश्वास और बढ़ गया!

पतरस इस बात को समझ गया था कि जिस शिक्षक के पीछे वो चल रहा था वह परमेश्वर का चुना हुआ, एक अभिषेक किया हुआ राजा था। उसे विश्वास था कि यीशु के पास वो सब करने कि सामर्थ थी जिसका कि वह प्रचार करता था। पतरस को पूरा विश्वास था कि जो मसीहा उसके  परमेश्वर के राज्य को स्थापित करेगा। पतरस के जीवन के यह कुछ पल थे जो उसके ह्रदय में बढ़ते हुए विश्वास को दर्शा रहे थे, और वह उभरता हुआ विश्वास परमेश्वर कि नज़र में अनमोल था। जो परमेश्वर को खोजते हैं वह उन्हें इनाम देता है।

यीशु ने उससे कहा,“’योना के पुत्र शमौन! तू धन्य है क्योंकि तुझे यह बात किसी मनुष्य ने नहीं, बल्कि स्वर्ग में स्थित मेरे परम पिता ने दर्शाई है। मैं कहता हूँ कि तू पतरस है। और इसी चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा। मृत्यु की शक्ति उस पर प्रबल नहीं होगी।'”

स्वर्गीय पिता ने ही पतरस को वह यशस्वी सच्चाई दिखाई। जब इस्राएल के लोग वचन को लेकर आपस में बड़बड़ा रहे थे, पतरस परमेश्वर कि ओर से सीख चुका था। और परमेश्वर पतरस को अपनी कलीसिया को स्थापित करने के लिए सामर्थी तरीकों से इस्तेमाल करने वाला था।

कलीसिया नई वाचा के बने हुए लोगों से  बनी होगी, जो अपने विश्वास प्रभु यीशु पर रखेंगे। उनकी मृत्यु और जी उठने के बाद, यीशु स्वर्ग में उठा लिया जाएगा जहां वह अपने पिता के दाहिने हाथ जाकर बैठेगा। वह अपनी पवित्र आत्मा उन सब पर भेजेगा जो अपने विश्वास उस पर रखेंगे। वे अपने विश्वास को पतरस और अन्य चेलों के साथ बाटेंगे, जो पूरे येरूशलेम में पूरी सामर्थ के साथ उसका प्रचार करेंगे, और वे एक साथ जीवते परमेश्वर कि कलीसिया बनके आएंगे। वे परमेश्वर के राज्य को इस पृथ्वी पर प्रतुत करेंगे!

परमेश्वर जानता था कि शैतान कलीसिया के विरुद्ध खड़ा होएगा, उन सब के विरुद्ध लड़ाई करेगा जो उद्धारकर्ता के प्रति निष्ठा रखते हैं। लेकिन यीशु ने पतरस से यह वायदा किया कि, जिस इंसान ने परमेश्वर के पुत्र का सबसे पहले प्रचार किया, अंत में, शैतान ही हारेगा। परमेश्वर अपनी कलीसिया को सच्चाई कि मज़बूत चट्टान पर अपनी कलीसिया को बनाएगा, जो जीवते परमेश्वर के पुत्र, यीशु ने घोषित किया है! यीशु के लिए उन सब ईमानदारों कि विजय निश्चित है।

यीशु ने आगे कहा:

“‘मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दे रहा हूँ। ताकि धरती पर जो कुछ तू बाँधे, वह परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग में बाँधा जाये और जो कुछ तू धरती पर छोड़े, वह स्वर्ग में परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया जाये।’”

यीशु का इससे क्या मतलब था? आपको क्या लगता है स्वर्ग कि कुंजी क्या है? क्या कोई सोने के ताले के साथ सोने कि चाबी है? नहीं। बिलकुल नहीं। यीशु आत्मिक बातों के विषय में कह रहे हैं। स्वर्ग राज्य के लिए कौन सी कुंजी है? यदि  हम देखें जो यीशु ने पतरस को अपनी सारी ज़िन्दगी करने को, हम देखते हैं कि कुंजी परमेश्वर के राज्य के सुसमॅधर को प्रचार काने का चिन्ह है. जन सुसमाचार सुनाया जाता है, तब खोये हुओं के लिए द्वार खुल जाते हैं! वे परमेश्वर के वाचा में बंधे हुए परिवार के हिस्सा बन जाते हैं, याने कि कलीसिया, और यीशु में जीवन बिताते हैं। शास्त्री और फरीसी इसके विपरीत कर रहे थे। यीशु उनके साथ साथ चल रहा था लेकिन वे स्वर्ग राज्य के द्वार को बंद कर रहे थे! मत्ती 23 में, यीशु उन्हें विश्वास के दरवाज़े के सामने खड़े होने के लिए बड़ी कठोरता के साथ डाटा है जो दूसरों के अंदर आने के लिए रास्ता बंद कर रहे हैं। लेकिन यीशु के वफादार लोग उन दरवाज़ों को खोलते रहेंगे ताकि दुसरे उनमें पूरी आज़ाद के साथ आ सकें।

प्रेरित पौलूस, जो यीशु का एक और महान सेवक था, उसने भी कई वर्षों पहले इसका वर्णन किया था। पहले उसने समझाया कि परमेश्वर का वचन विश्वास के साथ आता है। फिर उसने कहा: कि यदि तू अपने मुँह से कहे,“यीशु मसीह प्रभु है,” और तू अपने मन में यह विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जीवित किया तो तेरा उद्धार हो जायेगा।'” -रोमियों १०:९

लेकिन एक समस्या है। कोई बगैर यीशु के बारे में सुने कैसे पश्चाताप कर सकता है? पौलूस ने इस तरह स्वायल किया:
“‘किन्तु वे जो उसमें विश्वास नहीं करते, उसका नाम कैसे पुकारेंगे? और वे जिन्होंने उसके बारे में सुना ही नहीं, उसमें विश्वास कैसे कर पायेंगे? और फिर भला जब तक कोई उन्हें उपदेश देने वाला न हो, वे कैसे सुन सकेंगे? और उपदेशक तब तक उपदेश कैसे दे पायेंगे जब तक उन्हें भेजा न गया हो? जैसा कि शास्त्रों में कहा है: “सुसमाचार लाने वालों के चरण कितने सुन्दर हैं।'” -रोमियों १०:१४-१५

अद्भुद बात यह है कि पतरस के अंत में सुंदर पैर ही होंगे! यीशु के मरने और जी उठने के बाद, पतरस ही वो चेला होगा जो सबसे पहले परमेश्वर के सुसमाचार को पवित्र आत्मा के द्वारा यहूदियों को प्रचार करेगा (प्रेरितों के काम 2), सामरियों को (प्रेरितों के काम 8), और अन्यजातियों को (प्रेरितों के काम 10)  स्वार्ग के राज्य के द्वार को उसने सबके लिए खोल दिया है, सुसमाचार को पूरे संसार में प्रचार करने के लिए उसने रास्ता बना दिया है!

लेकिन यीशु ने और भी कुछ कहा। उसका क्या मतलब था जब उसने ऐसा कहा कि जो पतरस इस पृथ्वी पर बंधेगा वो स्वर्ग में  खोला जाएगा, और जो चीज़ें उसने पृथ्वी में खोई हैं वे स्वर्ग में खोली जाएंगी? इस पूरी कहानी में, पतरस आशीषित हुआ क्यूंकि उसने माना कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है। यही विश्वास स्वर्ग के राज्य के जीवन के द्वार को खोलता है। पतरस को यह दर्शा कर परमेश्वर पिता ने उसे अशिक्षित किया। अब पतरस को प्रचार करने का अधिकार दिया गया था कि कैसे कलीसिया में सिखाय कि पाप कैसे क्षमा हो सकते हैं और किसी के पश्चाताप न करने पर कलीसिया में क्या होता है उस व्यक्ति को निर्वासित कर दिया जाता है। यह बुद्धि और अधिकार पतरस कि अपनी सामर्थ में नहीं था। यह परमेश्वर कि ओर से दी हुई आशीष और ज्ञान था!

पतरस उस दिन इन सब बातों को नहीं समझ पाया। लेकिन उसने यीशु से उन सब बातों को लिया और विश्वास में आगे कदम बढ़ाया, और इन ही सब बातों से अंतर आया। यीशु ने अपने चेलों कोई चेतावनी दी कि वे किसी को ना बताएं कि वह कौन था। जो संदेश विश्वास में बढ़ने वालों के लिए प्रदर्शित हुआ वही उनके लिए जिन्होंने अस्वीकार किया उनसे वह छिप जाएगा।

कहानी ८२: दो अन्धे और एक गूंगे कि चंगाई

मत्ती ९:२७-३४

यीशु ने लोगों की कड़ी हार्दिकता के बावजूद गलील में सुसमाचार को सुनाता रहा। वो पश्चाताप जिससे परमेश्वर के लोगों को उनके उद्धारकर्ता के आने पर चिह्नित होना चाहिए था? पवित्र आत्मा के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की दुश्मनी ने उनके ह्रदय को कठोरता में ढकेल दिया था जिससे उनका अनंतकाल का भाग्य बंद हो गया था। अब सुसमाचार का सन्देश राष्ट्र को नहीं दिया जाएगा। यह उन व्यक्तियों को दिया जाएगा जो दृष्टान्तों से ढके हुए हैं। चमत्कार धार्मिक नेताओं के शक्तिशाली आवाज के खिलाफ सच्ची श्रद्धा से चलने वाले उन लोगों के लिए निजी क्षेत्र में किया जाएगा।

यीशु जब वहाँ से जाने लगा तो दो अन्धे व्यक्ति उसके पीछे हो लिये। वे पुकार रहे थे,“हे दाऊद के पुत्र, हम पर दया कर।”

उन्होंने उसे दाऊद कि संतान ख कर क्यूँ पुकारा? वे यह घोषणा कर रहे थे कि यीशु ने परमेश्वर के उस दिव्य वायदे को जो दाऊद राजा के लिए किया था उसे पूरा कर रहा है। वे विश्वास करते थे कि वही मसीहा है, और वो पराक्रमी योद्धा है जो उसके सुनहरे साल के लिए इस्राएल के राष्ट्र को बहाल करेगा! यह लोग यह नहीं समझ पाये कि मसीह युद्ध करने नहीं आया था, लेकिन वे यह मानते थे कि परमेश्वर ने उसे भेजा है!

यीशु जब घर के भीतर पहुँचा तो वे अन्धे उसके पास आये। तब यीशु ने उनसे कहा,“क्या तुम्हें विश्वास है कि मैं, तुम्हें फिर से आँखें दे सकता हूँ?” उन्होंने उत्तर दिया, “हाँ प्रभु!”

इस पर यीशु ने उन की आँखों को छूते हुए कहा, “तुम्हारे लिए वैसा ही हो जैसा तुम्हारा विश्वास है।”

और अंधों को दृष्टि मिल गयी। उनके श्रद्धायुक्त भय कि कल्पना कीजिये जब वे पतरस के घर में खड़े अपने चारों ओर देख रहे थे। उस क्षण ने उनके जीवन को कैसे परिवर्तित कर दिया था! उनके लिए पूर्ण रूप से सुनहरे अवसर खुल गए थे। आपको कैसा लगेगा जब आपके साथ ऐसा हो तो? फिर यीशु ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा,“इसके विषय में किसी को पता नहीं चलना चाहिये।”

जैसा कि आप देख सकते हैं, यहूदी दुनिया पहले से ही उसके खिलाफ शत्रुतापूर्ण थी। अगुवों ने पहले से ही जीवित परमेश्वर की आत्मा को अपमानित किया था। प्रभु यीशु उन्हें अपने पिता के खिलाफ और पाप करने के लिए और मौके नहीं देना चाहता था। आपको लगेगा कि वे उसकी सुनते हैं जिसे वे “‘प्रभु'” कहकर पुकारते हैं। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके जाने के बाद, उन्होंने गलील के क्षेत्र में चारों ओर जाकर सबको बताया कि यीशु ने उनके लिए क्या किया।

जब वे दोनों वहाँ से जा रहे थे तो कुछ लोग यीशु के पास एक गूँगे को लेकर आये। गूँगे में दुष्ट आत्मा समाई हुई थी और इसीलिए वह कुछ बोल नहीं पाता था। जब दुष्ट आत्मा को निकाल दिया गया तो वह गूँगा, जो पहले कुछ भी नहीं बोल सकता था, बोलने लगा। तब भीड़ के लोगों ने अचरज से भर कर कहा, “इस्राएल में ऐसी बात पहले कभी नहीं देखी गयी।” किन्तु फ़रीसी कह रहे थे,“वह दुष्टात्माओं को शैतान की सहायता से बाहर निकालता है।”

यह इन धार्मिक नेताओं का पवित्र आत्मा के काम की निन्दा करते जान कितना लुभावनी बात है! परमेश्वर पिता अपने बेटे के माध्यम से अद्भुत चमत्कार कर रहा था। एक मिनट के लिए यहाँ उस बड़ी तस्वीर की समीक्षा करते हैं। यह इन धार्मिक शासकों के द्वारा बनाय भयानक और विनाशकारी त्रुटि की भयावहता को देखने के लिए हमें मदद करेगा।

जहां कहीं भी यीशु गया, हर जगह उसने शाप के भयानक प्रभाव को पूर्ववत करने के लिए शानदार शक्ति का प्रदर्शन किया। यह अभिशाप मानवता पर बहुत जल्द आ गया था। आदम और हव्वा के पाप, जो हर इंसान के माता- पिता हैं, परमेश्वर के खिलाफ बलवा किया, और इसलिए उन्होंने दुनिया में और सभी वंशजों के जीवन में पाप और मृत्यु को आमंत्रित किया। हजारों साल से मानव जाति ने परमप्रधान परमेश्वर के विरुद्ध पाप करके यह प्रमाण दे दिया कि मनुष्य का ह्रदय कितना दुष्ट है।

मानव इतिहास को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि सब समाप्त हो गया है। सबसे शातिर शासकों ने कमजोरों  की पीठ पर जीत के लिए उनके मार्ग प्रशस्त किया है। खाने के लिए पर्याप्त भोजन विकसित करने के लिए उन्हें सूर्य के तहत कड़ी मेहनत के रूप में अब आदन के बगीचे कि शांति और पूर्णता मानव जाति की स्मृति में एक मीठी कल्पना से अधिक नहीं था। इस तूफान और सूखे और अकाल में जो श्राप इस दुनिया में लेकर आया, उसमें जीवित रहने के लिए हम इतना ही कर सकते थे। पाप ने मानवता के दिल की गहराई को अच्छी तरह से विकृत क्र दिया था। एक पुरुष और स्त्री के बीच में विवाह का अचंबित रूप, इंसान के लगातार पाप और भृष्ट, विकृत कर देने वाला परमेश्वर कि ओर उसके सच्चे प्रेम को त्यागना, लगातार उल्लंघन कर रहा था। राष्ट्र राष्ट्र के खिलाफ लड़ रहा था, और पड़ोसी दुसरे पडोसी से स्वार्थ के लिए एक कभी नहीं समाप्त होने वाले चक्र में फसे थे। पाप वो भार था जिसने मनुष्य को पाप कि गंदगी में खींच लिया था और जिसके अपमान को आदम और हव्वा कभी कल्पना नहीं कर सकते थे जो उन्होंने अच्छे और बुरे कि समझ को पाने के लिए उस फल को खाया।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने सृष्टि को उस अंधकार के त्रासदी में नहीं छोड़ेगा जो शैतान उसे नष्ट करने के इरादे से बना रहा था। उन्होंने एक राष्ट्र को चुना जो पूरे संसार को सही जीने के तरीके को प्रदर्शित कर के दिखा सके। उन्होंने पवित्र और कीमती लोग इब्राहीम के वंश से चुने। वे नियम के माध्यम से पाप और मृत्यु को नष्ट नहीं करेंगे, लेकिन वे पाप और मृत्यु से दागी दुनिया को सबसे उच्च परमेश्वर के पीछे चलने का रास्ता दिखाएंगे।

अपने पवित्र देश के बीच से, पमेश्वर ने अपने ही बेटे को इस दुनिया के लिए एक उद्धारकर्ता के रूप में भेजा। वह इस पृथ्वी पर चले फिरेगा और एक सिद्ध और पाप से मुक्त जीवन व्यतीत करेगा। वह वैसा जीवन व्यतीत करेगा जैसा कि आदन में मनुष्य को जीना चाहिए था, एक परिपूर्ण परमेश्वर के साथ का सम्मिलित जीवन जो उसके लिए पूर्ण रूप से आज्ञाकारिता में हो। उसके द्वारा, परमेश्वर की अच्छाई प्रवाह करेगी, और भयानक दर्द और लाया हुआ शाप वापस स्वास्थ्य और पूर्णता में बदल जाएगा।

यह मसीहा के पुराने नियम का वादा था। यह यहूदियों देखना चाहिए था जो यीशु ने चमत्कार कर के दिखाय थे। जहां कहीं भी यीशु गए, शानदार चमत्कार हुए और शैतानी ताकतों की शक्ति से बंदी मुक्त किये गए। लंगड़े चलने लगे, सूखा हाथ पूर्ण रूप से चंगे हुए, मृत जिले गए,और लंबे समय से चलने वाले रोग थके हुए शरीर से भाग गए। जब यीशु गलील में महीनों गलील से यात्रा करते रहे, उन चमत्कारिक बातों के बारे में सोचने का समय उन लोगों को मिला। वे वचन को खोज कर यह देख सकते कि कैसे यीशु नबियों के वचन को पूरा कर पते हैं। यह इन धार्मिक अगुवों को दिए हुए अद्भुत, महाकाव्य, शानदार भूमिका थी जो यीशु ने उन्हें दिए थे। उन्हें यीशु के काम को देखना चाहिए था और सारी दुनिया को घोषणा करनी चाहिए थी कि,” यह ही है वो! उसके पास आओ!'” और उन्हों उसके पास आकर श्रद्धालु श्रद्धा से उसके चरणों में झुकना चाहिए था, जिस तरह पतरस नि उस कश्ती में किया था जब उसने वो पहला चमत्कार देखा था।

बहुतों ने किया भी। हम उस शांत निकुदेमुस की कहानी को जानते हैं जब वह रात केअँधेरे में यीशु से मिलने को गया। परमेश्वर कि आत्मा शांत शद्धालुओं के मध्य में कार्य कर रही थी। परन्तु उन लोगों द्वारा स्थापित पद निर्धारित किये हुए थे। उनकी घोषणा यह थी कि यीशु शैतान की शक्ति से बाहर कार्य कर रहा था, और वे उस शक्ति को आराधनालय से परमेश्वर के लोगों को उससे दूर करने के लिए उपयोग करेंगे।

घरों और गांवों और नियमित रूप से यहूदी परिवारों के शहरों में इस यीशु और गलील के बाहर चल रहीं उन अद्भुत कहानियों कि चर्चा जब हो रही थी, वे उसके बारे में अपनी ही राय बनाने में लगे हुए थे। और परमेश्वर पिता ने जो हर एक ह्रदय को जांचता है, वह हर एक बुलाय हुओं के विश्वास कि गहराई को समझ पाया। अपने बेटे के माध्यम से उस शानदार अनुग्रह और दया को जो वह दे रहा था, परमेश्वर उन्हें वह बेहतरीन उपहार भेंट में दे रहा था। देश के अगुवों ने पहले से ही अपने निर्णय ले लिए थे। उनके ह्रदय उनके गर्व के कारण कठोर हो गए थे। लेकिन इस्राएल के लोगों निर्णय लेना होगा कि किस राह पर चलना है। क्या वे येरूशलेम के मंदिर और आराधनालय के नेतृत्व में चलकर मसीह को अस्वीकार करेंगे? या वे परमेश्वर कि आत्मा को अनुमति देंगे कि वह बोले और यीशु कि महानता को प्रदर्शित करे? आप क्या निर्णय लेंगे?

कहानी ७९: यीशु का तूफान को शांत करना

मत्ती १३:५३, ८:१८, २३-२७; मरकुस ४:३५-४१; लूका ८:२२-२५

यीशु ने जब दृष्टान्तों को बताना समाप्त किया, वह समुद्र तट से चला गया, लेकिन भीड़ ने उसका पीछा करना जारी रखा। वह अवश्य कितना थक गया होगा। एक दिन में उसने इतने शक्तिशाली कार्य किये। उसने उस अंधे और गूंगे को चंगा किया, उसने शैतान के साथ भागीदारी होने के आरोपों को खारिज किया, उसने अपने ही परिवार को ठुकराया क्यूंकि उन्होंने उसे पागल समझा, और उसने राज्य के बारे में अपने पूरे संदेश को जो परमेश्वर के राज्य के विषय में था स्थानांतरित करके दृष्टान्त में बातें करने लगा।

शाम हो गयी, और यीशु थक गया था। यीशु पूर्ण रूप से परमेश्वर था, लेकिन वह पूरी तरह से इंसान था, और वह हर उस बात को महसूस करता था जो दूसरे इंसान करते थे। भारी भीड़ उसके आसपास आती रही और उसका पीछा करती रही। वह कैसे आकर्षित करने वाला था! कफरनहूम में उनसे नहीं बच सकते थे। इसलिए यीशु ने सागर के दूसरे तरफ जाने का फैसला किया। वह अपने शिष्यों के साथ एक नाव में बैठ कर दूर के शोर को निकल गए। वहाँ और भी कश्तियाँ थी जो यीशु के वफादार विश्वासियों से भरी हुई थी।

यीशु नाव की कड़ी पर चला गया और एक तकिया पर लेट कर गहरी नींद में सो गया। लेकिन फिर एक हवा चलनी शुरू हो गयी। यह एक भयंकर हवा में तब्दील हो गयी, और एक जबरदस्त तूफान उन पर आ गया था! बड़ी लहरें नाव को मार रही थी, और उसे पानी के साथ भर दिया। यह खतरनाक होता जा रहा था।

जब चेलों ने यीशु को देखा कि वह क्या कर रहा है, उन्होंने देखा कि वह अभी भी गहरी नींद में था! क्यों वह नाव को किनारे करने में मदद नहीं कर रहा था? सो उन्होंने उसे उठाया जौर कहा, “‘गुरु, क्या तुझे परवाह नहीं कि हम डूब रहे हैं!'”

यीशु चेलों के घबराय हुए चेहरों को देख कर, हवा कि तेज़ आवाज़ और कश्ती पर पानी के टकराने से वह उठ गया। वह खड़ा हुआ, चारों ओर पानी को देखा, हवा और पानी को डांटते हुए कहा, “शांत हो जा।'” उसी समय हवा थम गयी और पानी भी वापस थम गया। क्या आप उस शानदार षण कि कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उस हिला देने वाली सामर्थ और अधिकार कि कल्पना कर सकते हैं जो यीशु के शक्तिशाली आत्मविश्वास के पीछे है? जीवते परमेश्वर के पुत्र होने हुए उसे अपने काम में पूरा भरोसा था।

एक पल के लिए, जिस इंसान के साथ चेले रोज़ चलते थे, उसकी पहचान इस दुनिया कि सब शक्तियों से बढ़कर थी, और एक ही आज्ञा से सब पर नियंत्रण रखने कि क्षमता थी। अपने चेलो कि ओर मुड़ कर वह बोला, “‘तुम इतने डरे हुए क्यूँ हो? कहाँ गया तुम्हारा विश्वास?'”

चेले अचंभित हो गए। आप क्या करेंगे यदि आपके शिक्षक आपके सामने खड़े होकर प्रकृति के ज़ोर के आगे अपनी कला दिखाए? उसने उस भयंकर तूफ़ान को पूरे अधिकार के साथ कहा, जिस प्रकार एक अच्छा पिता अपने बिगड़े हुए बालक से बोलता है! चेले एक दुसरे कि ओर अचंभित होकर और एक गहरे श्रद्धा के साथ देखने लगे। उसके अंदर वो अधिकार था जिसके विषय में वे सोच भी नहीं सकते थे। “आखिर यह है कौन जो हवा और पानी दोनों को आज्ञा देता है और वे उसे मानते हैं?” चेलों ने यीशु में ऐसा विश्वास दिखाया, लेकिन वह जिसके साथ उन्होंने यात्रा कि उसकी महानता अपरम्पार है। उन्होंने यीशु के साथ कश्ती में जाने का निर्णय उस समय लिया जब शक्तिशाली धार्मिक अगुवे उसके विरुद्ध में खड़े हो रहे थे। लेकिन उसने उनको अपना परिवार माना था, उसने उनको अपने भाई कहा और वे उसके पीछे दुनिया के अंत तक चलने वाले थे। चेलों को बहुत कुछ दिया जा चूका था। पवित्र आत्मा ने उनको देखने के लिए आखें दी और उनके बीच होने वाली महीना के विषय में सुनने के लिए कान भी दिए। और चूंकि वे उसके पीछे चलते रहे,उन्होंने उस बात को देखा जो किसी और ने नहीं देखि थी। यह यीशु हवा और तूफ़ान का अधिकारी था!

जब यीशु नाव पर चढ़ गया, उसने धार्मिक नेताओं के साथ एक महान संघर्ष को समाप्त किया था। उसने कहा कि जो अकल्पनीय उपहार यीशु ने परमेश्वर के परिवार में होने के लिए उन्हें दिया था वह उनसे निकाला जा रहा था। वह दृष्टान्त को कपटवेश में केवल उन्हें समझा रहा था जो सच्ची श्रद्धा के साथ आये थे।

फिर भी यहूदी, अविश्वासी भीड़ आती रही, और इसलिए यीशु और उसके चेले नाव में बैठ कर गलीली सागर के दूसरे ओर चले गए। अब, शायद यह एक छोटी सी बात की तरह लग सकती है। यीशु उपदेश और बेरहम भीड़ के बीच महान , अद्भुत चमत्कार करते हुए, गलील में चारों ओर गया।फिर वह गिरासेनियों के क्षेत्र में गया। इस इलाके में बहुत से अन्यजाति रहते थे। ये इस्राएल देश का हिस्सा नहीं थे, और यहूदी इन्हें अशुद्ध मानते थे। वे उनके साथ बैठ कर भोजन भी नहीं करते थे।

अब, पुराने नियम में, परमेश्वर ने इस्राएल के राष्ट्र को आसपास के देश से अलग रहने की आज्ञा दी थी। परमेश्वर चाहता था कि उसके लोग मूर्ति पूजा और दुष्टता से उनके जीवन को प्रदूषण करने वाली बातों से शुद्ध रहे। परन्तु उसने अपने लोगों को बताया कि कैसे अपने देश में रहने वाले परदेसियों के साथ बर्ताव करना चाहिए। जिस देश में एक अलग भाषा बोली जाये वहाँ पर्दिसियों के साथ आसानी से भेद भाव होता है और पक्षपात और कट्टरता दमनकारी ताकतें हैं। लेकिन पुराने नियम के अनुसार, इस्राएल में रहने वाले परदेसी परमेश्वर के संरक्षण में थे।

इब्राहीम के साथ पहले वाचा के शुरुआत से, इस्राएल सभी देशों के लिए आशीष था। उन्हें दुनिया के लिए याजक के समान होना था, श्रापित और बोझ से दबे हुओं को सिखाना और प्रशिक्षण देना और उद्धार का रास्ता दिखाना। अब जब कि उन्होंने मसीह को और उद्धार को अस्वीकार कर दिया था, यीशु अब उद्धार के सन्देश को स्वयं ही अन्यजातियों के बीच ले जा रहे थे! परमेश्वर के लोग असफल हो गए थे, परन्तु इससे परमेश्वर कि जो योजना है कि मनुष्य को छुटकारा मिले, वह रुक नहीं सकता था।

यीशु और उसके शिष्य जब नाव में गए, वे दूर यहूदी तट से रवाना हुए और अन्यजातियों के क्षेत्र की ओर चले गए। यीशु खोये हुओं के लिए सन्देश को ले जा रहा था, मूसा के माध्यम से इस्राएल के राष्ट्र में और एक नए युग में, उन सब के लिए उद्धार था जो परमहस्वर पिता कि इच्छा के अनुसार जी रहे थे। जब वे जा रहे थे, एक तेज़ तूफ़ान ने उन्हें घेर लिया, लेकिन उसमें कोई असली सामर्थ नहीं थी। यीशु उससे कहीं अधिक शक्तिशाली था। उसे केवल बोलना था, लेकिन उसके समक्ष अशिकर से, तूफ़ान थम गया।

यह अद्भुत है, लेकिन इसके दूसरी ओर और भी आश्चर्यजनक है। यदि यीशु वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था और हर समय सभी प्रकृति पर, सब बिमारियों पर, सब दुष्ट आत्माओं कि ताक़तों पर और दिष्ट मनुष्य पर यह अविश्वसनीय शक्तियों के द्वारा उन पर अधिकार से बोलता था, तो सोचिये कि कितनी विनम्रता से वह उन्हें उपयोग में लाता था। जिस प्रकार फरीसी उस पर आरोप लगाते थे और भीड़ के सामने उसे अपमानित करते थे, यीशु अपने स्वर्गीय पिता के समक्ष आज्ञाकारी होकर खड़ा रहा। उसने परमेश्वर का पुत्र होते हुए उन अकल्पनीय शक्तियों का प्रयोग नहीं किया। उसने हमारी तरह जीवन के सीमाओं और कमज़ोरियों के बीच अपना जीवन व्यतीत किया। जब वह पवित्र आत्मा द्वारा शक्ति को प्राप्त करता था तभी उसने अपनी अद्भुद शक्ति का प्रदर्शन किया, और वह भी परमेश्वर पिता के पूर्ण आज्ञाकारी होकर।

क्या होता यदि यीशु अन्यजातियों के ओर चला जाता? क्या वे परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकार कर देते?