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कहानी १७०: क्रूस पर चढ़ाया गया राजा

मत्ती २७:३३-३८; मरकुस १५:२२-२६; लूका २३:३३,३८; यूहन्ना १९:१६-२२

Holy Week

फिर जब वे गुलगुता (जिसका अर्थ है “खोपड़ी का स्थान।”) नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने यीशु को पित्त मिली दाखरस पीने को दी। किन्तु जब यीशु ने उसे चखा तो पीने से मना कर दिया।

रोमी सिपाहियों ने  क्रूस को ज़मीन पर रख यीशु कपड़े उतार दिए। यीशु ने अपने हाथ उस लकड़ी के पट्टे पर फैला कर अपने आप को पूरी विनम्रता के साथ सौंप दिया। सिपाहियों ने उसके हाथों में कीलें ठोकीं और क्रूस पर चढ़ा दिया। यह कितना भयंकर था। जो उपकरण अच्छी चीज़ों को बनाने के लिए होते हैं, उन्हें एक मनुष्य के शरीर को फाड़ने के लिए इस्तेमाल किये गए।

सिपाहियों ने क्रूस को खड़ा कर दिया। हर एक सांस जब वह लेता था, अपने शरीर को खींचता था ताकि वह सांस अंदर ले सके। उसके लहू लुहान शरीर उस लकड़ी के पत्ते पर रगड़ता था। हर पल उसकी पीड़ा बढ़ती ही जाती थी। परन्तु ये उस पीड़ा के सामने कुछ नहीं थी जो अनदेखी थी। क्यूंकि आप देखिये, आत्मिक क्षेत्र में, उस पवित्र जन ने पाप को अपने ऊपर ले लिया था। वह परमेश्वर के आगे पाप के अवतार को लेकर आया। मनुष्य के पापों के घिनौने अपमान के कारण उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध को उसे अपने ऊपर हाथ फैला कर लेने कि आवश्यकता नहीं थी। उसने परमेश्वर कि इच्छा में होकर उसे पूरे मान सम्मान के साथ लेने कि ठान ली थी। जब वह मनुष्य के हर घिनौने पाप कि सज़ा को अपने ऊपर ले रहा था, परमेश्वर का क्रोध दुष्ट के प्रति भड़का हुआ था। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था ताकि हम आज़ाद हो जाएं। कितना महाप्रतापी परमेश्वर है।

दो डाकू भी उसके साथ चढ़ाये गए, एक दायें और एक बाएं। सिपाही अपने ही दूषी व्यापार में लगे हुए थे। यीशु के कपड़ों का अब क्या करना था? उसके वस्त्र के चार भाग किये और हर एक सिपाही को उसका एक हिस्सा दे दिया। परन्तु यीशु का भीतरी वस्त्र बहुत अनोखा था। वह बहुत विशेषता से बनाया गया था। वे उसे फाड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने पासे फेंके। यूहन्ना प्रेरित ने यह दिखलाया कि यह वचन का पूरा होना हुआ है। भजन सहित २२:१८ कहता है,”वे मेरे कपड़े आपस में बाँट रहे हैं। मेरे वस्त्रों के लिये वे पासे फेंक रहे हैं।'” इसके बाद वे वहाँ बैठ कर उस पर पहरा देने लगे। जब तक उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, सुबह के नौ बज गए थे।

पिलातुस यीशु के विषय में अभी और कुछ कहना चाहता था। उसने इब्रानियों, लातौनी और यहूदी भाषा में कुछ लिखा।

“‘यह यहूदियों का राजा यीशु नासरी है'”

यीशु को शहर के निकट क्रूस पर चढ़ाया था ताकि सारे यहूदी उसे देख सकें। पिलातुस कि घोषणा उस भाषा में लिखी गयी जो अधिकतर पश्चिमी दुनिया में बोली जाती है। रोमी राज में लातौनी भाषा बोलते थे, जो अपने संग्रामिक अधिकार से सब पर हुकुम चलते थे। यह बहुत ही संपन्न विधिपूर्वक भाषा थी जिसे रोम के कुलीन लोग बोलते थे और अपने बच्चों को सिखाते थे। सभी विचार धरणाओं पर यह हावी था। परन्तु इब्रानी भाषा वो भाषा थी जिससे परमेश्वर का वचन मनुष्य के पास आया। यह कितना उचित था कि तीनों ने यीशु के शासन को उसके बलिदान के दिन घोषित किया!

पिलातुस को नहीं मालूम था कि आने वाले सालों में पूरे रोमी राज में सुसमाचार लातौनी भाषा और यहूदी भाषा में सुनाया जाएगा। एक दिन, जिस यीशु को उसने क्रूस पर चढ़ाया था, उसे अनंतकाल के राजा कि तरह उसकी उपासना की जाएगी। रोम के महाराजा यीशु के आगे घुटने टेकेंगे!

लेकिन यह सब भविष्य में होना है। इस बीच, यहूदी अगुवे उस चिन्ह से नाखुश थे जो यीशु के सिर पर लगाया गया था। यह रोमी सरकार द्वारा एक लिखित घोषणा थी। सो वे पिलातुस के पास गए और बोले इस बदल कर ऐसे लिखो: “‘उसने कहा, मैं यहूदियोंका राजा हूँ।'” यह चिन्ह का एक दूसरा हास्यास्पद था लेकिन पिलातुस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला था।

सोचिये पिलातुस के क्या विचार रहे होंगे जब वह उन आराधनालय के दुष्ट सदस्यों को यीशु को क्रूस पर चढाने के लिए लेजाते देख रहा था। इस विचार से हसी आती है कि वे अपने को परमेश्वर के पवित्र लोग मानते थे, और इससे यहूदी अगुवों का गुस्सा और भी अधिक बढ़ जाता था। यदि इन लोगों का कोई भी अनंतकाल का भविष्य है तो वह इन लोगों के जीवन से नहीं दिख सकता था जो परमेश्वर के मंदिर को चलाते थे।

परन्तु यीशु में, पिलातुस ने कुछ भिन्न पाया। उसके किसी भी शिक्षाओं से ऐसा कुछ नहीं था जो उसे स्पष्ट कर सके। पिलातुस दुनिया के सबसे उच्च ज्ञान से शिक्षित था। उसने सभी जगहों में जाकर भिन्न भिन्न धर्मों और संस्कृतियों को। देखा। उसके पास वो अधिकार था जिससे वह शासन चला सकता था। वह उन अगुवों के बीच में रहता था जो मनुष्य जाती से सम्बंधित जटिल सच्चाइयों के हल को लेकर आते थे। युद्ध, अकाल, सामाजिक विश्लेषण आदि, जैसे विषय वे लेकर आते थे। सारे मनुष्य जाती में, केवल ये थे जो मनुष्य के जीवन के भाग को तय करते थे।

जब पिलातुस ने इस महान संकटकाल का सामना किया, तब उसने पुछा,”‘सच्चाई क्या है?'” यूनानी और रोमी दार्शनिकों के समाधान, रोमी फ़ौज में पाये गए समाधान, और ज़बरदस्ती से दी गयी शांति, सब में थोड़ी बहुत सच्चाई थी पर बगैर स्वयं के भीतर कि सच्चाई के। जन पिलातुस ने यीशु के विनम्रता और शुद्धता को देखा, तब उसने जाना कि उसने सच्चाई का सामना किया है।

इस शांत और लहूलुहान मनुष्य कि कोई महानता और सामर्थ थी, जो उस अनदेखी दुनिया का राजा कहलाता था। या तो वह, पागल था या फिर वह सही था। यदि वह सही था, तो फिर उसके चरों ओर चल रहे कोलाहल में पागलपन था। पिलातुस इतने लम्बे समय से था जो जनता था कि छोटी से छोटे से छोटा पद ढोंग था। पर यीशु ने वो सब नष्ट कर दिया। यदि कोई अनन्तकाल का राजा था, तो वह ऐसा होगा जब वह एक स्वार्थी और टूटी दुनिया में प्रवेश करेगा। अपने दुष्ट घृणा के कारण, येरूशलेम के अगुवे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसकी आत्मा उन सब आत्माओं से कहीं अधिक मूलयवान थी।

हम नहीं जानते कि पिलातुस के मन में क्या चल रहा था जब वह अपने महल में बैठा था। परन्तु हम यह जानते हैं कि उसी के हाथों यह घोषणा लिखवाई गयी कि यीशु यहूदियों का राजा है। और सभी यहूदी अगुवों के विरोध करने पर भी उसने यह लिखा,”‘जो मैंने लिख दिया सो लिख दिया।'”

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कहानी १६९: क्रूस की मौत का रास्ता

मत्ती २७:२७-३२; मरकुस १५:१६-२१; लूका २३:२४-३१; यूहन्ना १९:१६

The Flagellation of Christ (stained glass)

यीशु के खिलाफ सज़ा, पिलातुस द्वारा घोषित की गई थी। उन्होंने सैनिकों की पूरी रोमी सेना को अंगना में बुलाया। अपनी बोरियत को दूर करने के लिए,प्रभु के आसपास एकत्र हुए एक सौ से अधिक पुरुष उसका ठट्ठा उड़ाने के लिए वहाँ जमा थे। उन्होंने यीशु का वस्त्र छीन लिया और उन पर एक बैंगनी वस्त्र डाल दिया। उन्होंने उनके सिर पर कांटों का मुकुट रखा और उनके प्रभुत्व का मज़ाक बनाने के लिए उनके दाहिने हाथ में एक ईख डाली। वे नकली श्रद्धा में उनके सामने झुक कर कहने लगे –  “यहूदियों के राजा की जय हो! ‘”तब वे उस ईख से उनके सिर को पीटने और थूकने लगे।

यह सभी के बावजूद, यीशु ने कुछ नहीं कहा। जबकि वह एक पल में अपनी मदद के लिए दस हजार स्वर्गदूतों को बुला सकते थे, वह अपने पिता की इच्छा में पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता में वहाँ खड़े रहे। यह एक शानदार शक्ति, और एक गौरवशाली नम्रता थी। उनकी भक्ति, स्वर्ग के उच्च राजा के लिए थी, और वह जानते थे कि उनके पिता यह सब देख रहे हैं। वह समझते थे कि दूसरी तरफ जीत उनका इंतजार कर रही है, और उन्होंने अपने पिता की ओर आज्ञाकारिता की वजह से होने वाले अपमानित घटनाओं को तुच्छ जाना।

जब सैनिकों ने यीशु का मजाक उड़ा लिया, तो उन्होंने बैंगनी वस्त्र निकाल कर, उन पर वापस उनके कपड़े डाल दिए।उन्होंने उनकी पीठ पर क्रूस का एक छोर रखा, और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए, यरूशलेम में से ले गए। जब वह चल रहे थे, लकड़ी का वजन यीशु के लिए बहुत ज्यादा हो गया। उनका शरीर एक बहुत कमजोर स्थिति में था। तो सैनिकों ने सिरेन नामक स्थान के शमौन नाम के राहगीर को पकड़ लिया। वो फसह उत्सव के लिए देश से यरूशलेम में आया था। वो नहीं जानता था कि परमेश्वर ने उसके लिए क्या रखा है। सैनिकों ने उस पर यीशु का क्रूस उठाने का दबाव डाला। यरूशलेम के पूरे शहर को इन गतिविधियों का ज्ञान हो गया था, और भीड़ सड़कों पर भर गई थी। जैसे यीशु आगे चल रहे थे, शिमौन उनके पीछे भरी भीड़ के साथ पीछे चल रहा था।

राष्ट्र, अपनी सांस यह जानने के लिए पकड़ी हुई थी कि क्या यीशु मसीहा था। शक्तिशाली, चमत्कार काम करने वाले शिक्षक और धार्मिक नेताओं के बीच संघर्ष की स्थापना,  तीन साल के तनाव में उमड़ गई थी। जैसे जैसे यीशु यरूशलेम की ओर जा रहे थे, अफवाहें उड़ने लगी। हर किसी की यह आशा थी कि फसह पर्व पर मामला उलझेगा, लेकिन इस तरह नहीं। यह कैसे हो सकता है? मसीहा को सत्ता में आना था! उन्हें एक लोहे की लाठी से प्रभुत्व के साथ शासन करना था! उन्हें राष्ट्रों को जीतना था!  आधी रात के कार्यवाही, बर्बर पिटाई की कहानियां, हेरोदेस और पीलातुस के महल के दौरे, पागल की तरह राष्ट्र में घूम रहे थे। जब यीशु शहर के बीच से गए, सब कुछ ठहर गया। इस प्रदूषित जुलूस का शोर यरूशलेम भर में सुनाई आ रहा था। भीड़,  क्रूस पर चड़ाए जाने वाले प्रसिद्ध युवा शिक्षक की एक झलक पाने के लिए दौड़ी। वह कितना कमजोर और खून से सना था! वह अपने स्वयं का क्रूस नहीं उठा पा रहा था! क्या यह वास्तव में अंत था? उनकी शिक्षाए कितनी सीधी, सही और सुंदर थी। बहुतों के लिए ऐसा हो रहा होगा जैसे मानो स्वयं अच्छाई ही मर रही है। उन सड़कों में कितने अन्य ने यीशु से चंगाई प्राप्त की होगी? जो यीशु को सुनने के लिए मीलों दूर चल के आते थे, आज उनके जीवन का परिणाम, दहशत में खड़े देख रहे थे। यीशु का अपमान येरूशलेम के साल में एक ऐसे दिन पर था जब ज्यादातर लोग, उस एकलौते, सच्चे मेमने के बलिदान को देखते।

कुछ महिलाए जो यीशु को प्यार करती थी, अपने प्रभु की पीड़ा पर रोते हुए विलाप कर रही थी। यीशु अपने वफादार लोगों के साथ बात करने के लिए मुड़े:

यीशु ने उन की ओर फिरकर कहा; हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिथे मत रोओ; परन्‍तु अपने और अपके बालकों के लिए रोओ। क्‍योंकि देखो, वे दिन आते हैं, जिन में कहेंगे, धन्य हैं वे जो बाँझ हैं, और वे गर्भ जो न जने और वे स्‍तन जिन्‍होंने दूध न पिलाया। उस समय वे पहाड़ों से कहने लगेंगे, कि हम पर गिरो, और टीलों से कि हमें ढाँप लो। क्‍योंकि जब वे हरे पेड़ के साय ऐसा करते हैं, तो सूखे के साय के साथ क्‍या कुछ न किया जाएगा| –लूका २३:२८-३१

बात असल में यह थी कि यीशु जानते थे कि एक ऐसा समय आने वाला था जब यरूशलेम को मसीहा के तिरस्कार के पाप के लिए पूर्ण परिणाम प्राप्त होगा। उसी सुबह, महायाजकों ने रोमी केसर के लिए अपनी वफादारी घोषित की थी, और लोगों ने यीशु का खून अपने खुद के सिर पर और अपने बच्चों के सिर पर होने की अनुमति दी! और परमेश्वर उन्हें अपने रास्ते जाने की अनुमति दे रहे थे। अपने जीवनकाल में, भीड़ जो यीशु के क्रूस के मार्ग के आसपास धूम मच रही थी, यरूशलेम के लोग यह जानेंगे कि भयानक रोमी सेना की दया पर निर्भर होने का मतलब क्या होता है। वहां कोई दया नहीं होगी। रोम, यरूशलेम को घेराबंद कर देगी। दीवारों के भीतर लोग पीड़ा और भुखमरी में महीने गुजारेंगे। वे घृणित पाप में एक दूसरे पर बारी होंगे। फिर रोमी सेना अपने शक्तिशाली हथियार के साथ पूरी ताकत में हमला करेगी। वो सड़कों जहाँ लोग चलते थे और शानदार मंदिर बर्बाद हो जाएगा, और यहूदी राष्ट्र पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।  यीशु जानते थे कि यह भयानक कार्यवाही एक निश्चित अंत लाएगी। तीन दिनों में, वह अनन्त महिमा को फिर से जी उठेंगे। लेकिन कई भयावहता अभी भी यरूशलेम के लोगों के सामने थी। मसीह की आत्मा इतनी महान थी कि यीशु इतनी भयानक यातना के बीच में, कयामत के रास्ते पर चलने वाले लोगों को दया और चेतावनी दे सकते थे|

कहानी १६८: वापस पिलातुस के पास 

Jerusalem - Jesus judgment for Pilate ceramic tiled cross way station

मत्ती २७:१५-२६; मरकुस १५:६-२०; लूका २३:१३-२४; यूहन्ना १८:३८-१९:१६

हेरोदेस, मसीह के मामले में, किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने में सक्षम नहीं था, इसलिए उसने यीशु को पिलातुस के पास वापस भेज दिया। अब, पिलातुस की यहूदी लोगों के साथ एक परंपरा थी। हर फसह के पर्व पर, वह उनसे किसी एक कैदी की रिहाई का अनुरोध लेता, और वह उसे मुक्त कर देता। उस समय, रोमीयों ने बरब्बा नाम के एक खुख्यात अपराधी को कैदी बनाया था। वह एक यहूदी विरोध आंदोलन का हिस्सा था जो यहूदिया पर रोमन सरकार की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था। उन्होंने पिलातुस के खिलाफ विद्रोह छेड़ी हुई थी। बरब्बा ने इस प्रक्रिया में हत्या और डकैती भी की थी। लेकिन यहूदी लोगों को उसके कारण से सहानुभूति थी। वे रोमी शासन से नफरत करते थे, और इसलिए बरब्बा अपने साहसी, घातक कारनामे के लिए उनके लिए एक हीरो था।

यहूदी इस फसह के कैदी को रिहा करवाने के लिए, पिलातुस से मांग करने के लिए एकत्र हुए। इस बीच, पिलातुस ने धार्मिक नेताओं और महायाजकों को बुलाया और यीशु के विषय में कहा, “‘तुम इस आदमी को लाए हो, यह कहते हुए कि यह विद्रोह करने के लिए लोगों को उकसाता है; और तुम्हारे सामने इसे जांचने के बाद, देखो, मैं इस आदमी को तुम्हारे आरोपों के बल पर, दोषी नहीं पाता हूँ। और न तो हेरोदेस ने, क्यूंकि उसने हमें इसे वापस भेजा। ेदेखो, इसने मौत के योग्य कुछ नहीं किया है।” पिलातुस को इस बात का एहसास था कि इन लोगों का यीशु को उनके समक्ष लाने का एक ही कारण था – ईर्ष्या। उनकी ईर्ष्या एक निर्दोष आदमी को मारने के लिए कोई कारण नहीं था।

पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और अपने सिंघासन पर बैठ गया। उसने पूछा: “तुम रिहाई के लिए किसे चाहते हो? बरब्बा या यीशु, जो मसीह कहलाता है?” निश्चित रूप से भीड़ उपदेशक के पक्ष पर होगी!

जब पिलातुस वहां बैठा हुआ था, उसे अपनी पत्नी से एक संदेश प्राप्त हुआ। “‘उस धर्मी आदमी के साथ कुछ नहीं करना, क्यूंकि कल रात मैंने उसकी वजह से एक सपने में काफी पीड़ा उठाई।'”

इस बीच, महायाजक और पुरनी, भीड़ के बीच में बाहर जा कर, उन्हें यीशु के बजाय बरब्बा की रिहाई के लिए उकसा रहे थे। वे यीशु को मार डालने की मांग के लिए उकसा रहे थे। उनकी शातिर नफरत कैसी सक्रिय थी!

पिलातुस ने कहा: “‘इन दोनों में से तुम किसे रिहा चाहते हो?'”

“‘इस आदमी को दूर कर दो!'” भीड़ बोल उठी, “और हमें बरब्बा रिहा कर दो!'”

पिलातुस ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे यीशु को लेजाकर चाबुक के साथ कोड़े लगाए। अगर धार्मिक नेता यीशु को अपमानित और दंडित होते देखते, तो शायद वे संतुष्ट हो जाते।

सैनिक पूरे दिन इस यीशु की अफवाहें सुन रहे थे। जब तक उन्हें सैनिकों के पास लाया गया था, यह आरोप अच्छी तरह से जाना जा चुका था कि वह राजा होने का दावा कर रहे थे। यह एक नीच, छोटे यहूदी के लिए इतनी हास्यास्पद बात थी, कि वे उसके बारे में ठठ्ठा उड़ाने के प्रलोभन को रोक नहीं सके। अपने अंधेरे आत्माओं की हिंसा और द्वेष में, उन्हें यीशु को चाबुक से मारने में इतनी प्रसन्नता मिली कि  यीशु का रक्त उनकी पीठ से नीचे बह गया। जब तक वो यह सब कर चुके थे, यीशु की पीठ पर मांसपेशियों, हड्डियों से अलग होकर फट गई थी। लेकिन रोमी सैनिकों की क्रूर बर्बरता अभी तक संतुष्ट नहीं हुई थी। उनमें से कुछ लम्बे कांटों के साथ शाखाए काटने चले गए। उन्होंने उसका मुकुट बुना और उनके सिर पर उसे कुचल दिया। तब उन्होंने एक शाही बैंगनी रंग का एक वस्त्र उसके नुचे, लहू-लुहान पीठ पर डाल दिया। “जय हो, यहूदियों के राजा!” उन्होंने कहा और उन्हें उग्र अवमानना ​​के साथ चेहरे पर मारने लगे।

सैनिक यीशु को पिलातुस के पास वापस लाए। जो यातना मसीह ने सही, वो स्पष्ट थी। निश्चित रूप, से यह पर्याप्त होगा। पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और कहने लगा: “‘सुनो, मैं उसको तुम्हारे सामने वापस ला रहा हूँ, ताकि तुम जानो कि मै उसमे कोई दोष नहीं पाता हूँ।” तब यीशु को लोगों के सामने बाहर लाया गया। रक्त उनके सिर पर कांटों के ताज से बह रहा था, और बैंगनी वस्त्र उनके खूनी पीठ से चिपक गया था। पिलातुस ने कहा: “‘देखो इस आदमी को'”। उसकी यह आशा थी कि यीशु को इस तरह की भयानक स्तिथि में  देखने के सदमे के बाद, वे नरम होंगे और उनकी रिहाई के लिए मांग करेंगे। लेकिन भीड़ ने ऐसा नहीं किया। “‘मैं यीशु अर्थार्त, यहूदियों का राजा के साथ क्या करू?'” उन्होंने पूछा।

महायाजक चिल्लाने लगे, “उसे क्रूस पर चढ़ा दो, उसे क्रूस पर चढ़ा दो! ‘” भीड़  भी शामिल हुई। लोगों का रोष बड़ता जा रहा था।

” क्यों? इसने क्या दुष्कर्म किया है? मैंने उस में मौत की मांग लायक कोई दोष नहीं पाया है, इसलिए मैं उसे सज़ा देकर उसे रिहा कर दूंगा,'”पिलातुस ने कहा। लेकिन भीड़ काबू से बाहर हो गई। “‘उसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” वे चीखने लगे।

इस अव्यवस्था के बीच में, कुछ यहूदियों ने बताया: “‘हमारा एक कानून है, और उस कानून के अंतर्गत, उसे मरना चाहिए क्यूंकि उसने खुद को परमेश्वर का बेटा बोला है।'”

इसने पिलातुस को और डरा दिया। यीशु ने पहले से ही उसको बोला था कि वो किसी और जगह का एक राजा था, और उसकी पत्नी को उसके बारे में सपने आ रहे थे। वो वहां गया जहाँ यीशु को रखा जा रहा था और उनसे पूछा: “‘तुम कहां से हो?'”

लेकिन यीशु ने उसे जवाब नहीं दिया। पिलातुस क्रोध के साथ बोला: “‘तुम मुझसे बात नहीं करते? क्या तुम नहीं जानते कि मेरे पास तुम्हे रिहा करने का अधिकार है या क्रूस पर चढाने का अधिकार है? ”

यीशु ने उससे कहा: “यह अधिकार आपको ऊपर से दिया गया था, नहीं तो आपका मेरे ऊपर कोई अधिकार नहीं होता; इस कारणवश, जिसने मुझे पकड़वाया है, उसका पाप ज्यादा महान है।”

वाह। मसीह की आश्वास विश्वास की लहर उनके हर शब्द में थी। यह लहर उनकी चुप्पी में भी थी। पिलातुस का यह गलत मानना था कि वह उस दिन का सबसे उच्च अधिकारी था।  यीशु ने उसे बताया कि वास्तव में, पिलातुस ने अपना अधिकार परमेश्वर से प्राप्त किया था।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो उसने यीशु को बचाने के लिए और अधिक से अधिक प्रयास करना शुरू किया। लेकिन यहूदियों का रोष अधिक बढ़ रहा था और वो नियंत्रण से बाहर हो रहे थे। उसे इस बात का एहसास हो गया था कि वो एक दंगा शुरू करने वाले है। कुछ यहूदियों ने कहा: “‘अगर आप इस आदमी को रिहा करते हैं, तो आप कैसर के कोई दोस्त नहीं हैं। जो कोई भी खुद को राजा प्रतीत करवाता है, वो कैसर का विरोध करता है।”

उनके शब्दों रोम के कैसर के प्रति वफादारी के शब्द नहीं थे। यहूदी, सम्राट से उतनी नफरत करते थे जितनी वे पीलातुस और हेरोदेस से करते थे। वे एक खतरा बन रहे थे। अगर पिलातुस ने यीशु को क्रूस पर नहीं चड़ाया , वे इसका एक मामला बना कर रोम तक खीचते। वे उस पर सम्राट के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगाते।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो वह बाहर जा कर सिंघासन पर फिर से बैठ गया। इस समय तक, सुबह के शुरुआती घंटे बीत गए थे और दोपहर हो रही थी। मंदिर में फसह उत्सव का जश्न पूरे जोर शोर था। दोपहर में, फसह के भेड़, पंद्रह सौ साल पहले मिस्र में उस अंधेरी रात में इस्राएल के पहलौठे बेटों को बचाए जाने खून की याद में कुर्बान कर दिए जाएंगे। यह राष्ट्र के लिए के लिए रास्ता बनी। अब परमेश्वर का पहलौठा पुत्र, सभी राष्ट्रों के उद्धार को लाने के लिए अपने खून को भेट कर देंगे।

पिलातुस ने यीशु को लोगों के सामने बाहर बुलाया – “‘देखो, तुम्हारा राजा!'” उसने कहा।

“‘इसको हमारे से दूर कर दो, इसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” लोग चीखने लगे। भीड़ का उन्माद बहुत बड़ गया था।

“‘क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चड़ा दूँ?” पिलातुस ने पूछा।

महायाजकों ने कहा – “‘हमारा, केसर को छोड़, कोई राजा नहीं है!”

वाह। इस्राएल के देश के महायाजकों ने परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकृत घोषित कर दिया। उनकी आवाज, पिलातुस की निर्दोष आदमी को मौत की सज़ा सुनाने की अनिच्छा पर विजय प्राप्त करने लगी। यह स्पष्ट था कि अब कुछ नहीं किया जा सकता था। पिलातुस ने थोड़ा पानी लिया और उस अराजक, उग्र भीड़ के सामने अपने हाथ धोए। “‘मैं इस आदमी के रक्त से निर्दोष हूँ'” उसने घोषणा की। “‘अब इस मामले को खुद ही देख लो।'”

भीड़ वापस चिल्लाई – “‘उसका खून हम पर और हमारे बच्चों पर हो!'”

तब पिलातुस ने यीशु के खिलाफ, मौत की सज़ा सुनाई। धार्मिक नेताओं और भीड़ की मांगों को स्वीकृत किया जा रहा था। बरब्बा को स्वतंत्र कर दिया गया, लेकिन यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए दे दिया गया।