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कहानी १७१: क्रूस पर

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Jesus christ in heaven

यीशु उस पीड़ा के साथ क्रूस पर था, उसके पास बहुत से खड़े जो उसे देख रहे थे। ऐसा लगता था कि कुछ हो जाएगा। क्या वह इस हास्य जनक अनुकरण को अपनी सामर्थ से जीत पाएगा?

पास से जाते हुए लोग अपना सिर मटकाते हुए उसका अपमान कर रहे थे। वे कह रहे थे,“अरे मन्दिर को गिरा कर तीन दिन में उसे फिर से बनाने वाले, अपने को तो बचा। यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो क्रूस से नीचे उतर आ।”

शिक्षक और अगुवे अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे। उसकी हसी उड़ाते हुए उन्होंने कहा,“’दूसरों का उद्धार करने वाला यह अपना उद्धार नहीं कर सकता! यह इस्राएल का राजा है। यह क्रूस से अभी नीचे उतरे तो हम इसे मान लें।'” पुराने नियम से कुछ बातों को लेकर दुसरे यह कहने लगे,”‘यह परमेश्वर में विश्वास करता है। सो यदि परमेश्वर चाहे तो अब इसे बचा ले। आखिर यह तो कहता भी था, ‘मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ।’”

उन लुटेरों ने भी जो उसके साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे, उसकी ऐसे ही हँसी उड़ाई। सिपाहियों ने भी उनके साथ मिलकर हसी उड़ाई और कहा,“यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने आपको बचा ले।”

इन सब दोष लगाने वालों को यीशु ने कुछ नहीं कहा। हज़ारों दूत वहाँ खड़े उसे देख रहे थे जो स्वर्ग का सिंहासन का अधिकारी है और इस कष्ट और मृत्यु को सह रहा है। यीशु एक ही शब्द बोलकर अपने आप को ऊपर लेजा कर हटा सकता था। परन्तु यह उसके पिता कि इच्छा नहीं थी।

वहाँ लटकाये गये अपराधियों में से एक ने उसका अपमान करते हुए कहा,“क्या तू मसीह नहीं है? हमें और अपने आप को बचा ले।” परन्तु दूसरे डाकू का ह्रदय परिवर्तन हो गया था। उसने उन सब अपमानित करने वाली बातों को सुना और उस यीशु को देखा जो शांत था। यह मनुष्य कौन था जो उसके साथ क्रूस पर टंगा हुआ था?

दूसरे ने उस पहले अपराधी को फटकारते हुए कहा,“क्या तू परमेश्वर से नहीं डरता? तुझे भी वही दण्ड मिल रहा है। किन्तु हमारा दण्ड तो न्याय पूर्ण है क्योंकि हमने जो कुछ किया, उसके लिये जो हमें मिलना चाहिये था, वही मिल रहा है पर इस व्यक्ति ने तो कुछ भी बुरा नहीं किया है।”

फिर वह बोला,“यीशु जब तू अपने राज्य में आये तो मुझे याद रखना।”

यह यीशु किस प्रकार का इंसान था कि इस तरह उसका राजसी गौरव क्रूस पर बढ़ा कर दिखाया जा रहा है! यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ से सत्य कहता हूँ, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

अपने पीढ़ा के बीच में भी यीशु कि करुणा दिखाई पड़ती है। उसकी आत्मा कितनी महान थी। अवश्य वह परमेश्वर है!

थोड़े ही थे जो गुलगुता तक उसके साथ गए और वे यीशु से। प्रेम करते थे।  उसकी माँ, मरियम, उसकी बहन मरियम और मरियम मगदिलिनी, वे सब आये थे। उसका चेला यूहन्ना भी उनके साथ क्रूस पर आया। यीशु ने जब अपनी माँ और अपने प्रिय शिष्य को पास ही खड़े देखा तो अपनी माँ से कहा,“प्रिय महिला, यह रहा तेरा बेटा।” फिर वह अपने शिष्य से बोला,“यह रही तेरी माँ।”

यीशु सबसे बड़ा पुत्र था और मरियम एक विधवा थी। परिवार में उसका कर्तव्य था कि वह मरियम का ध्यान रखे। उसके चाहिता चेला यूहन्ना भी उसका चचेरा भाई था, और उसने वह कर्तव्य उसे सौंप दिया। और उसी समय से यूहन्ना मरियम को अपने घर ले गया।

यीशु को क्रूस पर चढ़े तीन घंटे हो गए थे और कुछ अद्भुद होने लगा था। फिर समूची धरती पर दोपहर तक अंधकार छाया रहा। दिन के तीन बजे ऊँचे स्वर में पुकारते हुए यीशु ने कहा,

“’इलोई, इलोई, लमा शबकतनी।’अर्थात,
“’मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों भुला दिया?'”

उसका चिल्लाना पीड़ा से भरा हुआ था, जो उन लोगों को याद करके था जो क्रूस के पास थे। यीशु ने ऐसा क्यूँ कहा? क्या उसे याद नहीं था कि वह क्रूस पर किस वजह से गया है? क्या वह नहीं जानता था कि यह अलगाव मनुष्य के पापों को सहने के लिए था। क्या उसने वास्तव में विश्वास कर लिया था कि परमेश्वर ने उसे सदा के लिए छोड़ दिया है?

गुलगुता पर जो यहूदी जमा थे, वे यीशु कि वाणी को पहचान सकते थे क्यूंकि उसने पुराने नियम से लिया था। महान विपत्ति के समय दाऊद राजा ने भजन सहित में लिखा था। फिर उन सब्दों में कोई संदेह नहीं था। दाऊद का विश्वास डगमगाने वाला नहीं था, वह प्रभु में मज़बूत होता जाता था। वह विश्वास में स्थिर था और किसी और कि ओर नहीं देखता था। वह पाप कि समस्या के हल के लिए किसी मनुष्य कि ओर नहीं देखता था और संकट के समय में परमेश्वर को कोस्ता नहीं था। इस भजन सहित में, दाऊद राजा ने अपनी आशा को परमेश्वर के छुटकारे पर केंद्रित किया हुआ था एयर केवल उसी को पुकारता था। यह परमेश्वर में गहरायी कि एक तस्वीर है। आइये इस भजन सहित से और पढ़ते हैं :

हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर!
तूने मुझे क्यों त्याग दिया है? मुझे बचाने के लिये तू क्यों बहुत दूर है?
मेरी सहायता की पुकार को सुनने के लिये तू बहुत दूर है।
हे मेरे परमेश्वर, मैंने तुझे दिन में पुकारा
किन्तु तूने उत्तर नहीं दिया,
और मैं रात भर तुझे पुकाराता रहा।
हे परमेश्वर, तू पवित्र है।
तू राजा के जैसे विराजमान है। इस्राएल की स्तुतियाँ तेरा सिंहासन हैं।                                  
हमारे पूर्वजों ने तुझ पर विश्वस किया।
हाँ! हे परमेश्वर, वे तेरे भरोसे थे! और तूने उनको बचाया।                                        
हे परमेश्वर, हमारे पूर्वजों ने तुझे सहायता को पुकारा और वे अपने शत्रुओं से बच निकले।
उन्होंने तुझ पर विश्वास किया और वे निराश नहीं हुए। –भजन सहित  22:1-5

आपने देखा कैसे दाऊद राजा ने परमेश्वर कि स्तुति करने में देरी नहीं की, जिस समय वह छुटकारे के लिए रुका हुआ था?

यीशु परमेश्वर से नहीं पूछ रहा था कि उसने उसे क्यूँ छोड़ दिया। वह एक मनुष्य कि तरह उसे जो परमेश्वर कि आज्ञाकारिता के प्रति दुःख उठा रहा था। अब तक, यीशु को क्रूस पर छे घंटे हो चुके थे। परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के पाप के कारण आया था। यीशु ने अपने ही शरीर में उस भयानक संघर्ष को सहा। वह जानता था कि यह असीम क्लेश हमेशा के लिए नहीं है। एक यशस्वी विजय दूसरी और थी। अपने मनुष्य स्वभाव में होकर उसने पुछा,”‘और कितनी देर प्रभु?'”

यीशु ने जब अपने महान पूर्वजों के शब्दों को पुकारा, उसने उस भविष्यवाणी को पूरा किया जो भजन सहित में भी दी गई है। यह दोनों, दाऊद कि व्यक्तिगत प्रार्थना भी थी और मसीह के आने का सन्देश था!

जो पास में खड़े थे, उनमें से कुछ ने जब यह सुना तो वे बोले,“सुनो! यह एलिय्याह को पुकार रहा है।” दूसरे बोले,“ठहरो, देखते हैं कि इसे नीचे उतारने के लिए एलिय्याह आता है कि नहीं।” वे अभी यह सोच रहे थे कि यह व्यक्ति कौन है।

यीशु जानता था कि उसका समय आ गया है। उसने वो सब पूरा कर दिया था जिस काम से पिता ने उसे भेजा था। एक और वचन था जिसे पूरा होना था, सो उसने कहा,“‘मैं प्यास हूँ।'”

सिरके में डुबोया हुआ स्पंज एक छड़ी पर टाँग कर लाया गया और उसे यीशु को चूसने के लिए दिया। भजन सहित 69:21 के वचन पूरे हुए “…उन्होंने मुझे विष दिया, भोजन नहीं दिया। सिरका मुझे दे दिया, दाखमधु नहीं दिया।'”

जब यीशु पी चुका, उसने कहा,“पूरा हुआ।”

उन शांत शब्दों में यीशु ने घोषित किया कि समाप्त हुआ। जय मिल गई थी। सब कुछ बदल गया था। आदम के पाप से, इंसानियत ने परमेश्वर के विरुद्ध आवाज़ उठाकर शैतान के प्रति वफ़ादारी दिखायी, जिसका अंजाम पाप और मृत्यु था। परन्तु यीशु मनुष्य रूप में आया और दोनों पर विजय प्राप्त की और जीवन के मार्ग को दिखाया। उसके पृथ्वी पर जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ और उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये।

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कहानी ६८: एक विधवा के लिए करुणा

लूका ७:११-१७

यीशु सुसमाचार सुनाने और बीमारों को चंगाई देने के लिए ग्रामशेत्र के इलाकों में यात्रा कि। उन्होंने नव नियुक्त चेलों के साथ नाइन नामक एक शहर की यात्रा की। उनके पीछे एक बड़ी भीर चली आ रही थी।वे इस कट्टरपंथी, चिकित्सा शिक्षक के लिए पर्याप्त नहीं हो पा रहे थे। वह जैसे ही नगर-द्वार के निकट आया तो वहाँ से एक मुर्दे को ले जाया जा रहा था। वह अपनी विधवा माँ का एकलौता बेटा था। सो नगर के अनगिनत लोगों की भीड़ उसके साथ थी। जब प्रभु ने उसे देखा तो उसे उस पर बहुत दया आयी। वह बोला, “रो मत।” फिर वह आगे बढ़ा और उसने ताबूत को छुआ वे लोग जो ताबूत को ले जा रहे थे, निश्चल खड़े थे। यीशु ने कहा, “नवयुवक, मैं तुझसे कहता हूँ, खड़ा हो जा!” यीशु के बोलते ही, जो बेटा मारा हुआ था वह ताबूत में जीवित हो गया! वह लोगों से बातें करने लगा! आप समझ सकते हैं कि उस भीड़ को कैसा झटका लगा? उस विध्वा के चकित होने के षण को क्या आप समझ सकते हैं, और फिर उसका सम्पूर्ण आनंद? क्या आप उसके चेहरे के रोशन हुए आनंद को देख सकते हैं? सो वह मरा हुआ लड़का उठ बैठा और बोलने लगा। यीशु ने उसे उसकी माँ को वापस लौटा दिया।अविश्वसनीय चमत्कार को होते हुए बहुत सी भीड़ यह देख रही थी। जो भीड़ यीशु के पीछे चली आ रही थी उन्होंने उसे ताबूत को छूटे देखा। सभी लोग जो शहर से निकल के आ रहे थे उन्होंने भी देखा। जैसे ही यह दोनों झुण्ड आपस में मिले, वे अचंभित हो गए। वे भी बहुत डर गए। यह कौन मनुष्य है जो हमारे शहर में इस तरह आया है? यह तो होना ही नहीं चाहिए था। मृत मृत ही रहने वाले थे। यह कौन अजनबी था जिसके पास मौत के ऊपर भी शक्ति थी? चमत्कार इतना महान था कि उसे मानना मुश्किल था! और यह कहते हुए परमेश्वर की महिमा करने लगे कि “हमारे बीच एक महान नबी प्रकट हुआ है।” और कहने लगे,“परमेश्वर अपने लोगों की सहायता के लिये आ गया है।” कितनी आश्चर्यजनक घटना थी, क्या नयी उम्मीदें उनके दिल में भर गईं। यह कितना दिलचस्प है कि जब लूका ने यह कहानी सुनाई तो उसने यह सुनिश्चित किया कि यीशु ने ताबूत को छुआ था। यहूदी धर्म के अनुसार, किसी मृत को चूना अशुद्ध माना जाता था। एक वफादार यहूदी व्यक्ति को फिर से साफ होने के लिए एक विशेष अनुष्ठानों के माध्यम से जाना होता है। उन्हें अपने परिवार के बाकी हिस्सों से अलग समय बिताना था और कुछ खास नियमों का पालन करना था।पुराने नियम कि पुस्तिक में परमेश्वर ने अपने लोगों को यह एक पवित्र नियम दिया था। ये अपने परमेश्वर के साथ इस्राएल देश के पवित्र वाचा का एक हिस्सा था। यहूदी लोग इनको अपने दिल के करीब इन नियमों का आयोजन करते थे। यह उनके परमेश्वर के प्रति उनकी भक्ति थी। लेकिन उन नियमों के लिए समय समाप्त हो चुका था। वह कानून और नियम उनके परमेश्वर कि और से दिया हुआ तोहफा था जो उनके देश को पवित्र करता और उनके जीवन की एक संरचना देता जिससे सारे देशों में उसकी महिमा होती। उनको उसकी धार्मिकता का एक नमूना बनना था और उसके याजक भी। परमेश्वर किसी भी तरह उनके माध्यम से पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना करने वाला था। लेकिन अब एक सच्चा याजक आ गया था। जहां बाकि के याजकों को नियम के आधीन खड़े रहना था और लोगों को उन्हें मानने के लिए लागू करना था, यीशु उस नियम से ऊपर था। वह एक नया दौर को लेकर आ रहा था जबकि नियम के लागू होने और उसकी शक्ति समाज में आवश्यक नहीं था। वो एक नयी वाचा को लेकर आ रहा था। जब यीशु ने ताबूत को छुआ, वह अशुद्ध नहीं हुआ! वह तो परमेश्वर का पुत्र था! यीशु ना केवल नियम को त्याग रहा था, वह नियम के महत्पूर्ण कारणों को भी त्याग रहा था। यह समाज के लिए अच्छा है कि वह एक मृत को न पूजे। यह एक राष्ट्र के लिए अच्छा है कि एक मृत शरीर को ना छुए और ना ही उसका अपमान करे। जो चीज़ें विनाशमान हैं उन्हें ना चूना ठीक है। परन्तु यीशु मृत्यु को नाश करने वाला था! उसने उस विद्वा औरत के बेटे के द्वारा यह दिखाया कि उसके पास मृत्यु पर जय पाने कि सामर्थ है! इस शक्तिशाली चमत्कार का समाचार सारे यहूदिया और यरूशलेम और सभी आसपास के क्षेत्र में फ़ैल गयी थी। गलील, दस नगर, यरूशलेम, यहूदिया और यर्दन नदी पार के लोगों की बड़ी भीड़ उसका अनुसरण करने लगी। यह कितना सामर्थ्य हो यदि एक सूखा हाथ या एक लकवाग्रस्त के साथ एक अंधा आदमी या यीशु को देखने बाद घर कि उनकी वापसी कि यात्रा से आना और मुर्दों में से जी उठने कि कहानियों को बताना! गलील के आराधनालय में यहूदियों का यीशु से मिलने के बाद कुलबुलाना। येरूशलेम के मंदिर में उन धार्मिक याजकों कि बात चीत क्या रही होगी? उन परिवारों कि कल्पना कीजिये जिनके बचे बीमार थे या कोई वृद्ध माता पिता जो मर रहे हों। इस व्यक्ति के अंदर क्या उम्मीद थी! यीशु संसार के उज्जवल और महिमायुक्त झलक दिखा रहा था जिसे परमेश्वर ने बनाया था। जो खो गया था उसे लौटा रहा था और जो श्राप के कारण टूट गया था उसे पूर्ण और सही और उत्तम बना रहा था। वह उस सामर्थी काम को करते रहेगा और एक दिन वह पूरा होगा। यीशु अपने स्वर्गय राज में राजा बन के राज करेगा और वह नया बनाया जाएगा! क्या उसके लोग विश्वास करेंगे? क्या वे उस पर विश्वास करेंगे?