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कहानी १८१: मछली पकड़ने की यात्रा

युहन्ना २१:१-१४

The Great Catch of Fish

प्रभु ने अपने चेलों से कहा था कि वह उन्हें गलील में मिलना चाहते हैं, तो चेले वहाँ यात्रा करके गए,और पतरस के पुराने शहर में समुन्दर के किनारे रहने लगे। पतरस, थोमा, नथानिएल , याकूब और युहन्ना, और अन्य दो चेलों सब साथ वहां थे। एक ऐसा क्षण आया जब  पतरस ने कुछ व्यस्त होने का फैसला किया। ‘मैं मछली पकड़ने के लिए जा रहा हूँ,’ उसने कहा। बाकी चेलों ने भी उत्साहित होकर कहा, ‘हम भी आ रहे हैं’।

चेले नौकाओं की और बढ़ने लगे और उन्होंने रात वहां पानी के ऊपर बिताई। स्याही जैसे काले आसमान की कल्पना कीजिये। क्या वहाँ करोरों उज्ज्वल चमकते सितारों थे? या वहाँ बादलों की एक गहरी चादर नीचे अंधेरे, आसपास की पहाड़ों पर मँडरा रही थी? कल्पना कीजिये उस मंद मंद हवा और पानी की आवाज़े को जो नौकाओं को धीरे धीरे झुला रहीं थी, मनो कोई लोरी सुना रही हो। मछली पकड़ने के लिए यह एक शांत रात थी। चेले कुछ भी पकड़ नहीं पाए। रात के लम्बे घंटे बड़ते गए। उन्होंने भोर की किरणों को पानी में चमकते देखा। अभी भी कोई मछली हाथ न आई थी। तब किसी ने देखा है कि वहाँ छोर पर एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन चेलों ने उसे नहीं पहचाना।

‘दोस्तों!’, प्रभु ने आवाज़ लगाईं। ‘क्या तुमने अभी तक कोई मछली नहीं पकड़ी?’ यह बात सुबह सुबह के घंटों में सुनना कितना विचित्र था।

‘नहीं,’ उन्होंने जवाब दिया। यह कितनी निराशाजनक रात थी। उनके जीवन में सब कुछ एक बड़ी प्रतीक्षा की तरह लग रहा था। उस ‘उंडेलने’ की, जिसकी येशु बात कर रहे थे, वो कब होने को था? उन्हें कब तक इंतजार करना था? यीशु कहाँ थे?

तट पर आदमी ने कहा, “‘नाव के दाईं ओर पर अपने जाल फेंको और तुम्हे कुछ मछली मिलेगी’। अब यह वास्तव में एक अजीब बात कहने को थी। आखिरकार, इस आदमी को यह कैसे पता था कि नाव के दाहिनी ओर उन्हें मछली मिलेगी? और अगर मछली उस ओर थी, तो नाव के बाए हाथ की तरफ भी क्यूँ नहीं थी?

लेकिन चेलों ने उस आदमी की सलाह मानी और अपने जाल वहां फेंक  दिए। और ऐसा करने से, वे बहुत धन्य और आशीषित हुए। मछली की एक भारी संख्या पानी में तैर रही थी। जाल मछली से इतना भारी हो गया था कि उसे नाव में वापस ढोना मुश्किल हो गया।

यह कहानी युहन्ना के लिए कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी-  युहन्ना: वही चेला जो यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने पतरस की ओर देखा, जो उसका पुराना मछुआरा साथी था। क्या उसे भी याद था? अंत में युहन्ना ने कहा, ‘यह प्रभु है!’

जैसे ही पतरस ने यह सुना, वह जानता था कि यह सच था। और वो नाव का तट तक पहुँचने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर पाया। उसने अपना वस्त्र निकालकर, अपने कमर के चारों ओर बाँध लिया। और फिर वह बर्फीले पानी में कूद पड़ा!

बाकि चेले तट की ओर अपनी नावों में, अपने पीछे भरी जाल खींचते हुए आए। उन्हें ज्यादा दूर जाना नहीं था। वे तट से केवल सौ गज दूर थे।

जब तक वो पहुंचे, उन्होंने देखा कि एक कैम्प फायर की गंध हवा में थी। यीशु ने लकड़ी के कोयले से एक आग जलाई थी। कुछ मछली उस पर सिक रही थी और वहाँ कुछ रोटी भी थी। यीशु उनके लिए नाश्ता बना रहे थे। वहाँ उनके सामने यीशु थे, अपने पुनर्जीवित शरीर में, और वे रोज़ मर्राह का काम कर रहे थे। अपने दोस्तों के लिए खाना बनाना उनकी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं था। अनंत काल के जीवन में भी, सेवा और काम का जीवन सम्माननीय है। यहां तक ​​कि खुद परमेश्वर के लिए भी। येशु ने क्या पौष्टिक, साधारण भोजन, वहां, समुद्र के तट पर प्रदान किया!

अब, हमें इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प बात जाननी चाहिए। नए नियम के लेखकों ने इसे यूनानी भाषा में लिखा था।अक्सर, वे बहुत ही खास शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे पाठकों को मूल, विशेष बात समझने में मदद मिलती थी।इस शब्द ‘लकड़ी का कोयला’ का इस्तेमाल इस कहानी के अलावा केवल नए नियम के एक अन्य समय में इस्तेमाल किया गया था। पहली बार इसका प्रयोग तब होता है जब पतरस, यीशु के परीक्षण के दौरान, आग से अपने को गरमा रहा था। इस लकड़ी के कोयले की बहुत तगड़ी बू थी, कि वह उस रात की हवा में भर गई होगी। यह वही गंध थी जो पतरस के फेफड़ों भरी होगी, जब उसने अपने प्रभु का इनकार किया था।

दूसरी और केवल यही एक और समय था जब यह शब्द का प्रयोग यहाँ, नए नियम के इस कहानी में होता है; जब यीशु ने अपने चेलों के साथ एक बार फिर से मुलाकात की। वही गंध पतरस के फेफड़ों में भरी, जब वो  मसीह के साथ समुद्र तट पर खड़ा हुआ बाकि चेलों के लिए इंतज़ार कर रहा था। क्या यीशु जानबूझकर यह दर्दनाक यादगार वापस ला रहे थे? क्यों?

जैसे नाव पहुँची, यीशु ने कहा, ‘तुमने जो मछली पकड़ी है, उसमे से कुछ ले आओ।’ पतरस नाव पर चढ़ कर समुद्र तट तक जाल घसीटते हुए लाया। उस जाल में १५३ मछली थी, लेकिन फिर भी, वो नहीं टूटी।

कल्पना कीजिए चेलों को कैसा लगा होगा जब वे नाव से बाहर उतरे होंगे। यह तीसरी बार था जब उन्होंने यीशु को उसके मौत के बाद देखा था। उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसको, उनके जीवनकाल के सबसे भयंकर, सार्वजनिक मौत द्वारा मारा गया था। तो भी, वह उनका अपना प्रभु और स्वामी था। अब वो उनके सामने जीवित था – वो यीशु जिसके पास एक ऐसा विचित्र अधिकार था जो प्रकृति के नियमों को भी लांघ गया।वो परमेश्वर था। उन्होंने उसके आने की कल्पना जीत और सत्ता के साथ की थी, लेकिन इस तरह नहीं! एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख कौन क्या कर सकता है, खासकर जब वह आपके लिए मछली पका रहें हो?

यीशु ने उन्हें कहा, ‘आओ, नाश्ता तैयार है।’ यीशु ने अभी भी अपना परिचय नहीं दिया। चेलों को यकीन था कि वो येशु ही है, पर पूछने का साहस किसी को नहीं था। इस दुनिया की सांसारिक, रोज़ मर्राह की बाते, अनन्त दायरे के उज्ज्वल महिमा के साथ टकरा रहीं थी। यह लगभग वैसे था जैसे जमीन उनके पैरों के नीचे खिसक रही थी और उन्हें अपना संतुलन लाना नहीं आ रहा था। कितने धैर्यपूर्वकता से  परमेश्वर ने यह भद्दापन संभाला। उसने रोटी ली और उनमें से प्रत्येक को दिया। फिर उसने मछली पकड़ाई।

इस्राएल का पूरा राष्ट्र उस सागर तट के छोटे से झुण्ड से मोहित हो जाता। लेकिन यीशु मानव जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए नहीं आए। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे। वह उन्हें बहाल और मजबूत बनाने के लिए और उन्हें तैयार करने के लिए आया था। एक दिन, उनमें से हर एक उसके साथ उसके राज्य में होगा। वे स्वर्ग में मसीह के साथ राज्य करेंगे। लेकिन इससे पहले कि यह शानदार समय आए, आगे एक कार्य था।

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