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कहानी १८१: मछली पकड़ने की यात्रा

युहन्ना २१:१-१४

The Great Catch of Fish

प्रभु ने अपने चेलों से कहा था कि वह उन्हें गलील में मिलना चाहते हैं, तो चेले वहाँ यात्रा करके गए,और पतरस के पुराने शहर में समुन्दर के किनारे रहने लगे। पतरस, थोमा, नथानिएल , याकूब और युहन्ना, और अन्य दो चेलों सब साथ वहां थे। एक ऐसा क्षण आया जब  पतरस ने कुछ व्यस्त होने का फैसला किया। ‘मैं मछली पकड़ने के लिए जा रहा हूँ,’ उसने कहा। बाकी चेलों ने भी उत्साहित होकर कहा, ‘हम भी आ रहे हैं’।

चेले नौकाओं की और बढ़ने लगे और उन्होंने रात वहां पानी के ऊपर बिताई। स्याही जैसे काले आसमान की कल्पना कीजिये। क्या वहाँ करोरों उज्ज्वल चमकते सितारों थे? या वहाँ बादलों की एक गहरी चादर नीचे अंधेरे, आसपास की पहाड़ों पर मँडरा रही थी? कल्पना कीजिये उस मंद मंद हवा और पानी की आवाज़े को जो नौकाओं को धीरे धीरे झुला रहीं थी, मनो कोई लोरी सुना रही हो। मछली पकड़ने के लिए यह एक शांत रात थी। चेले कुछ भी पकड़ नहीं पाए। रात के लम्बे घंटे बड़ते गए। उन्होंने भोर की किरणों को पानी में चमकते देखा। अभी भी कोई मछली हाथ न आई थी। तब किसी ने देखा है कि वहाँ छोर पर एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन चेलों ने उसे नहीं पहचाना।

‘दोस्तों!’, प्रभु ने आवाज़ लगाईं। ‘क्या तुमने अभी तक कोई मछली नहीं पकड़ी?’ यह बात सुबह सुबह के घंटों में सुनना कितना विचित्र था।

‘नहीं,’ उन्होंने जवाब दिया। यह कितनी निराशाजनक रात थी। उनके जीवन में सब कुछ एक बड़ी प्रतीक्षा की तरह लग रहा था। उस ‘उंडेलने’ की, जिसकी येशु बात कर रहे थे, वो कब होने को था? उन्हें कब तक इंतजार करना था? यीशु कहाँ थे?

तट पर आदमी ने कहा, “‘नाव के दाईं ओर पर अपने जाल फेंको और तुम्हे कुछ मछली मिलेगी’। अब यह वास्तव में एक अजीब बात कहने को थी। आखिरकार, इस आदमी को यह कैसे पता था कि नाव के दाहिनी ओर उन्हें मछली मिलेगी? और अगर मछली उस ओर थी, तो नाव के बाए हाथ की तरफ भी क्यूँ नहीं थी?

लेकिन चेलों ने उस आदमी की सलाह मानी और अपने जाल वहां फेंक  दिए। और ऐसा करने से, वे बहुत धन्य और आशीषित हुए। मछली की एक भारी संख्या पानी में तैर रही थी। जाल मछली से इतना भारी हो गया था कि उसे नाव में वापस ढोना मुश्किल हो गया।

यह कहानी युहन्ना के लिए कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी-  युहन्ना: वही चेला जो यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने पतरस की ओर देखा, जो उसका पुराना मछुआरा साथी था। क्या उसे भी याद था? अंत में युहन्ना ने कहा, ‘यह प्रभु है!’

जैसे ही पतरस ने यह सुना, वह जानता था कि यह सच था। और वो नाव का तट तक पहुँचने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर पाया। उसने अपना वस्त्र निकालकर, अपने कमर के चारों ओर बाँध लिया। और फिर वह बर्फीले पानी में कूद पड़ा!

बाकि चेले तट की ओर अपनी नावों में, अपने पीछे भरी जाल खींचते हुए आए। उन्हें ज्यादा दूर जाना नहीं था। वे तट से केवल सौ गज दूर थे।

जब तक वो पहुंचे, उन्होंने देखा कि एक कैम्प फायर की गंध हवा में थी। यीशु ने लकड़ी के कोयले से एक आग जलाई थी। कुछ मछली उस पर सिक रही थी और वहाँ कुछ रोटी भी थी। यीशु उनके लिए नाश्ता बना रहे थे। वहाँ उनके सामने यीशु थे, अपने पुनर्जीवित शरीर में, और वे रोज़ मर्राह का काम कर रहे थे। अपने दोस्तों के लिए खाना बनाना उनकी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं था। अनंत काल के जीवन में भी, सेवा और काम का जीवन सम्माननीय है। यहां तक ​​कि खुद परमेश्वर के लिए भी। येशु ने क्या पौष्टिक, साधारण भोजन, वहां, समुद्र के तट पर प्रदान किया!

अब, हमें इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प बात जाननी चाहिए। नए नियम के लेखकों ने इसे यूनानी भाषा में लिखा था।अक्सर, वे बहुत ही खास शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे पाठकों को मूल, विशेष बात समझने में मदद मिलती थी।इस शब्द ‘लकड़ी का कोयला’ का इस्तेमाल इस कहानी के अलावा केवल नए नियम के एक अन्य समय में इस्तेमाल किया गया था। पहली बार इसका प्रयोग तब होता है जब पतरस, यीशु के परीक्षण के दौरान, आग से अपने को गरमा रहा था। इस लकड़ी के कोयले की बहुत तगड़ी बू थी, कि वह उस रात की हवा में भर गई होगी। यह वही गंध थी जो पतरस के फेफड़ों भरी होगी, जब उसने अपने प्रभु का इनकार किया था।

दूसरी और केवल यही एक और समय था जब यह शब्द का प्रयोग यहाँ, नए नियम के इस कहानी में होता है; जब यीशु ने अपने चेलों के साथ एक बार फिर से मुलाकात की। वही गंध पतरस के फेफड़ों में भरी, जब वो  मसीह के साथ समुद्र तट पर खड़ा हुआ बाकि चेलों के लिए इंतज़ार कर रहा था। क्या यीशु जानबूझकर यह दर्दनाक यादगार वापस ला रहे थे? क्यों?

जैसे नाव पहुँची, यीशु ने कहा, ‘तुमने जो मछली पकड़ी है, उसमे से कुछ ले आओ।’ पतरस नाव पर चढ़ कर समुद्र तट तक जाल घसीटते हुए लाया। उस जाल में १५३ मछली थी, लेकिन फिर भी, वो नहीं टूटी।

कल्पना कीजिए चेलों को कैसा लगा होगा जब वे नाव से बाहर उतरे होंगे। यह तीसरी बार था जब उन्होंने यीशु को उसके मौत के बाद देखा था। उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसको, उनके जीवनकाल के सबसे भयंकर, सार्वजनिक मौत द्वारा मारा गया था। तो भी, वह उनका अपना प्रभु और स्वामी था। अब वो उनके सामने जीवित था – वो यीशु जिसके पास एक ऐसा विचित्र अधिकार था जो प्रकृति के नियमों को भी लांघ गया।वो परमेश्वर था। उन्होंने उसके आने की कल्पना जीत और सत्ता के साथ की थी, लेकिन इस तरह नहीं! एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख कौन क्या कर सकता है, खासकर जब वह आपके लिए मछली पका रहें हो?

यीशु ने उन्हें कहा, ‘आओ, नाश्ता तैयार है।’ यीशु ने अभी भी अपना परिचय नहीं दिया। चेलों को यकीन था कि वो येशु ही है, पर पूछने का साहस किसी को नहीं था। इस दुनिया की सांसारिक, रोज़ मर्राह की बाते, अनन्त दायरे के उज्ज्वल महिमा के साथ टकरा रहीं थी। यह लगभग वैसे था जैसे जमीन उनके पैरों के नीचे खिसक रही थी और उन्हें अपना संतुलन लाना नहीं आ रहा था। कितने धैर्यपूर्वकता से  परमेश्वर ने यह भद्दापन संभाला। उसने रोटी ली और उनमें से प्रत्येक को दिया। फिर उसने मछली पकड़ाई।

इस्राएल का पूरा राष्ट्र उस सागर तट के छोटे से झुण्ड से मोहित हो जाता। लेकिन यीशु मानव जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए नहीं आए। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे। वह उन्हें बहाल और मजबूत बनाने के लिए और उन्हें तैयार करने के लिए आया था। एक दिन, उनमें से हर एक उसके साथ उसके राज्य में होगा। वे स्वर्ग में मसीह के साथ राज्य करेंगे। लेकिन इससे पहले कि यह शानदार समय आए, आगे एक कार्य था।

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कहानी १६२: गतसमनी का बगीचा-समर्पण की पीड़ा

मत्ती २६ ३०-४६, मरकुस १४:२६-४२, लूका २२:३९-४६, यूहन्ना १८:१

Basilica Our Lady of the Rosary

जब यीशु और उसके चेले फसह मना रहे थे, उसने उन्हें परमेश्वर कि योजना के रहस्य को  उनके आगे स्पष्ट रूप से दिखाया। अभी और भी प्रकाशन आने हैं। ऊपरी कमरे में मिले उपदेशों के बाद, यीशु ने पिता से अपने लिए, अपने चेलों के लिए और उन सभी के लिए जो उस पर विश्वास करेंगे। वे सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रेम और एकता में बंधे हुए थे। उस धन्य रात को यीशु ने जो कुछ अपने चेलों को सिखाया था उसे समझने के लिए उन्हें पूरा जीवन लग जाएगा। परन्तु अब समय था कि उस पर अमल करें। यीशु के आगे अभी एक अंतिम विजय थी और उसे पूरा करने के लिए उसने आगे कदम बढ़ा लिया था।

फसह के बाद उसके चेलों के साथ उसने एक अंतिम भजन गाया। फिर वे जैतून के पहाड़ पर चले गए। चेलों को नहीं पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। जब वे जा रहे थे यीशु उन्हें सावधान कर रहा था। उसने जकर्याह नबी (१३:७) से कहा:
“’तलवार, गड़ेरिये पर चाट कर! मेरे मित्र को मार! गड़ेरिये पर प्रहार करो और भेड़ें भाग खड़ी होंगी और मैं उन छोटों को दण्ड दूँगा। पर फिर से जी उठने के बाद मैं तुमसे पहले ही गलील चला जाऊँगा।’”

आपने देखा कि यीशु को कितना आत्मविश्वास था? इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह फिर से जी उठेगा, और वह चेलों को आने वाली बातों के लिए तैयार कर रहा था। परन्तु पतरस को केवल यही सुनाई दे रहा था कि यीशु अपने परमेश्वर को छोड़ देगा। उसने कहा,“चाहे सब तुझ में से विश्वास खो दें किन्तु मैं कभी नहीं खोऊँगा।”  मत्ती २६:३३

पतरस को अपने आत्मविश्वास पर पूरा भरोसा था जब कि परमेश्वर के पुत्र ने उसे और कुछ बताया था!  यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ में सत्य कहता हूँ आज इसी रात मुर्गे के बाँग देने से पहले तू तीन बार मुझे नकार चुकेगा।” यीशु समझ गया था कि इस मनुष्य के भीतर में क्या है। वह अपने चेले कि कमज़ोरी को समझ गया था। उसने अपने अनुग्रह के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था। उसकी एक ही चिंता थी कि वह उन्हें चेतावनी दे। आने वाले दिन दहशत भरे थे, परन्तु इन सब के बीच, वे यह याद कर पाएंगे की यीशु यह सब बातें पहले से जानता था। यदि वे विश्वास को चुनते हैं, तो वे यह समझ पाएंगे कि सब कुछ परमेश्वर कि योजना के अनुसार हो रहा था।

तब पतरस ने उससे कहा,“यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े तो भी तुझे मैं कभी नहीं नकारूँगा।” बाकी सब शिष्यों ने भी वही कहा।

फिर यीशु उनके साथ उस स्थान पर आया जो गतसमने कहलाता था। और उसने अपने शिष्यों से कहा,“जब तक मैं वहाँ जाऊँ और प्रार्थना करूँ, तुम यहीं बैठो।” फिर यीशु पतरस और जब्दी के दो बेटों को अपने साथ ले गया। फिर उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत दुःखी है, जैसे मेरे प्राण निकल जायेंगे। तुम मेरे साथ यहीं ठहरो और सावधान रहो।” परमेश्वर का पुत्र होने के नाते उसे अपने पिता कि योजना पर पूरा भरोसा था। परन्तु एक मनुष्य होते हुए उसे अपने दोस्तों कि आवश्यकता थी।

फिर थोड़ा आगे बढ़ने के बाद वह धरती पर झुक कर प्रार्थना करने लगा। उसने कहा,“हे मेरे परम पिता यदि हो सके तो यातना का यह प्याला मुझसे टल जाये। फिर भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं बल्कि जैसा तू चाहता है वैसा ही कर।”

स्वर्ग से एक दूत आया और उसने यीशु को सामर्थ दी। यीशु ने, परमेश्वर का क्रोध जो इंसान के पापों के कारण था, अकेला ही सहा। हमारे पापों को क्रूस तक ले जाने के लिए, उसने परमेश्वर कि सामर्थ का सहारा नहीं लिया। उसने परमेश्वर पिता के आगे पूरी आज्ञता में उसे पूरा किया। यह वो आज्ञाकारिता थी जो कोई भी इंसान नहीं कर सकता था। वे अपने पापों के बोझ के नीचे दब जाते। वह जो योग्य था और पूर्ण रूप से पवित्र था, केवल वही पाप और मृत्यु पर जय पा सकता था। उसके महान प्रेम के कारण, वह ऐसा करने में सक्षम था।

यीशु इतना ज़यादा तनाव में था कि उसका शरीर भी उसे सहन नहीं कर पाया। जब वह उस पीड़ा में प्रार्थना कर रहा था, उसका पसीना लहू कि बूँदें बनकर बह रहा था। जब वह अपने पिता से प्रार्थना कर रहा था वे धरती पर गिर रहे थे।

फिर वह अपने शिष्यों के पास गया और उन्हें सोता पाया। वह पतरस से बोला,“सो तुम लोग मेरे साथ एक घड़ी भी नहीं जाग सके? जगते रहो और प्रार्थना करो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो। तुम्हारा मन तो वही करना चाहता है जो उचित है किन्तु, तुम्हारा शरीर दुर्बल है।”

अपने दुःख के बीच में, यीशु ने कितने विनम्रता और समझ के साथ अपने चेलों पर दया दिखाई। एक बार फिर उसने जाकर प्रार्थना की और कहा,“हे मेरे परम पिता, यदि यातना का यह प्याला मेरे पिये बिना टल नहीं सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।” परन्तु परमेश्वर के क्रोध के प्याले को केवल यीशु ही अपने बलिदान के द्वारा संतुष्ट कर सकता था। तब वह आया और उन्हें फिर सोते पाया। वे अपनी आँखें खोले नहीं रख सके। वे नहीं जानते थे कि वे यीशु को अपनी दूसरी असफलता के लिए क्या बोलें।

सो वह उन्हें छोड़कर फिर गया और तीसरी बार भी पहले की तरह उन ही शब्दों में प्रार्थना की। परन्तु और कोई रास्ता नहीं था। इस श्राप कि समस्या का समाधान केवल उसका प्राण था। यदि वह अपने जीवन को बलिदान नहीं करता, तो और कोई भी नहीं कर पाता। सब कुछ नाश हो जाता। केवल वही सबको बंधन से छुड़ा सकता था। और इसलिए उसने अपने पिता कि इच्छा को स्वीकार किया।

हमारे लिए यह समझ बहुत कठिन है कि यीशु ने “हाँ” किसके लिए बोला होगा। उसका शरीर ऐसी कष्टदायी पीड़ा से गुज़रेगा जो कभी किसी मनुष्य ने ना सहा होगा। वह पाप और म्रत्यु के बोझ को उठाएगा क्यूंकि उसने परमेश्वर के क्रोध को अपने ऊपर ले लिया था। उस कष्टदायी पीड़ा को यीशु क्रूस पर तब चढ़ाए रखेगा जब तक वह उसकी पूरी कीमत नहीं। जो हमारे ऊपर अनतकाल तक के लिए आता यीशु ने एक ही दिन में समाप्त कर दिया। हम युगानुयुग तक उसकी उपासना करते रहेंगे उस कीमत के लिए जो उसने हमारे लिए चुकाई है।

कहनी १११: सुंदर सत्य, सुंदर चंगाई 

लुका १३:१-२१

यीशु जब प्रचार करते जा रहे थे,  वे उन भयानक विकृतियों और झूठ को खोलते जा रहे थे जिसने लोगों को भय और झूठे विश्वास में जकड़ा हुआ था। अपने स्वर्गीय पिता के विषय में झूठ सुनकर वह कितना अपमानित महसूस कर रहा होगा!

एक समय में, लोगों ने पेंतुस पीलातुस के विषय में यीशु को बताया कि उसने एक बहुत भयंकर बात करी है।पीलातुस पूरे येरूशलेम का रोमियो सरदर था, और यहूदी उससे घृणा करते थे। वह एक खुनी और दुष्ट आदमी था, और वह यहूदी धर्म का तिरस्कार करता था।  उसका विरोधी शासन मंदिर के सबसे भीतरी आंगनों तक पहुँच गया था। एक दिन, जब गलील के यहूदी परमेश्वर के आगे चढ़ा रहे थे, पिलातुस ने अपने कुछ सिपाहियों को अंदर भेज कर उन्हें मार देने आदेश दिया। बालियों का लहू गलीलियों के लहू के साथ मिलाया गया। परमेश्वर के मंदिर के भीतरी आंगनों में मौत और द्वेष का कितना दुष्ट आक्रमण था यह!

लोग यह आश्चर्य करने लगे कि ऐसा क्यूँ हुआ? उन्होंने सोचा कि शायद जिन लोगों को पिलातुस ने मारा उन्होंने कोई भयंकर पाप किया होगा। उन्होंने इस लायक कोई पाप किया होगा। सो यीशु ने उन से कहा,

“’तुम क्या सोचते हो कि ये गलीली दूसरे सभी गलीलियों से बुरे पापी थे क्योंकि उन्हें ये बातें भुगतनी पड़ीं? नहीं, मैं तुम्हें बताता हूँ, यदि तुम मन नहीं, फिराओगे तो तुम सब भी वैसी ही मौत मरोगे जैसी वे मरे थे। या उन अट्ठारह व्यक्तियों के विषय में तुम क्या सोचते हो जिनके ऊपर शीलोह के बुर्ज ने गिर कर उन्हें मार डाला। क्या सोचते हो, वे यरूशलेम में रहने वाले दूसरे सभी व्यक्तियों से अधिक अपराधी थे? नहीं, मैं तुम्हें बताता हूँ कि यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब भी वैसे ही मरोगे।’”

यीशु ने जब उस छोटे से यहूदी झुण्ड को देखा कि कैसे उन पर यह भयंकर हादसा हुआ है, यह उस तस्वीर उसके समान होगी जब इस्राएल का देश मसीह के आने पर उसके विरुद्ध इंकार करेंगे। जो लोग बच गए थे उनकी हालत उनसे कुछ कम नहीं थी जो मर गए थे, और भविष्य एक चेतावनी थी। ऐसा ही यहूदी राष्ट्र के साथ होने जा रहा था और कोई भी उस भयंकर पीड़ा से बच नहीं पाएगा।

फिर उसने यह दृष्टान्त कथा कही:

“’किसी व्यक्ति ने अपनी दाख की बारी में अंजीर का एक पेड़ लगाया हुआ था सो वह उस पर फल खोजता आया पर उसे कुछ नहीं मिला। इस पर उसने माली से कहा,‘अब देख मैं तीन साल से अंजीर के इस पेड़ पर फल ढूँढ़ता आ रहा हूँ किन्तु मुझे एक भी फल नहीं मिला। सो इसे काट डाल। यह धरती को यूँ ही व्यर्थ क्यों करता रहे?’ माली ने उसे उत्तर दिया,‘हे स्वामी, इसे इस साल तब तक छोड़ दे, जब तक मैं इसके चारों तरफ गढ़ा खोद कर इसमें खाद लगाऊँ। फिर यदि यह अगले साल फल दे तो अच्छा है और यदि नहीं दे तो तू इसे काट सकता है।’” –लूका १३:६-९

इस कहानी में, मनुष्य परमेश्वर के समान है, और यहूदी लोग खजूर के पेड़ के समान हैं। तीन सालों से, यीशु ने लोगों को प्रचार किया, और उस खजूर पेड़ के समान, उनमें कोई फल नहीं आया। उनमें कोई विशेष पश्चाताप या विश्वास नहीं आया। परमेश्वर का न्याय का हाथ बहुत भयंकर था, लेकिन उनके विरुद्ध अभी उठा नहीं था। वह एक और साल के लिए रुक गया। सोचिये उस साल में क्या हुआ होगा। यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया होता। लोगों को उस भयंकर भूकम्प का सामना करना पड़ता। वे जान जाते कि कैसे मंदिर का पर्दा दो हिस्सों में बट गया था। फिर यीशु जी उठता। सैकड़ों यहूदी यीशु को देखते और उसके जी उठने और जीवित होने कि गवाही देते। और फिर उसके आसमान में उठाये जाने के विषय में पूरे इस्राएल में चर्चा होती। दस दिन बाद, पेन्तेकुस्त के महान भोज के समय, येरूशलेम कि सड़कों पर यीशु के लोग भर कर भिन्न भिन्न भाषाओँ में बोलते और स्वर्ग राज्य के सुसमाचार को सुनाते। परमेश्वर कि आत्मा उन पर उतर आती और हज़ारों लोग उस पर विश्वास लाते। पुराने नियम कि भविष्यवाणियां उनके सामने सच्च हो जाती और उन्हें ऐसे समझती जैसे कि पहले उन्होंने कभी नहीं सुना हो। इन सब के बाद भी, क्या यहूदी राष्ट्र परमेश्वर को इंकार करेगा?

कुछ चीज़ें इतनी सुंदर हैं कि उनकी अच्छाईयां बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। इसे समझने कि आवश्यकता नहीं कि काले आकाश में तारे कैसे चमकते हुए दिखते हैं, और यह कि एक ग़ुलाब कि प्रतिकृति कितनी मनोहर है। जिस व्यक्ति ने कई सालों के बाद दुःख और तक़लीफ से अच्छी सेहत के साथ राहत पाई हो, तो यह अनुभव कितना गहरा होता है। यह बहुत स्पष्ट है। इन बातों में कुछ ऐसा है जो अनंतकाल कि अच्छाई को दर्शाता है और कोई भी चर्चा इसके विरुद्ध में बेकार हो जाती है। केवल वे जिनके ह्रदय उन लोगों के विरुद्ध में हैं उनके ऊपर इन चमत्कारों का कोई असर नहीं होगा।

सब्त के दिन, यीशु आराधनालय में उपदेश दे रहा था। एक दुष्ट आत्मा से अपंग वहां एक महिला आई। उसकी पीठ पर तुला हुआ था और वह सीधे ऊपर खड़ी नहीं हो सकता थी। वह अठारह साल से ऐसी ही स्थिति में थी। उसकी परेशानी और दु: ख की कल्पना कीजिये। वह अपने परिवार की मदद कैसे कर पाती होगी? कौन उसके दर्द में उसकी मदद कर सकता था?

यीशु ने उसे जब देखा तो उसे अपने पास बुलाया और कहा,“हे स्त्री, तुझे अपने रोग से छुटकारा मिला!” यह कहते हुए, उसके सिर पर अपने हाथ रख दिये। और वह तुरंत सीधी खड़ी हो गयी। वह परमेश्वर की स्तुति करने लगी।'”

सोचिये यदि यह छोटी सी टूटी हुई स्त्री आपकी पड़ोसन होती। आप सोच सकते हैं कि उसको ऐसे तक़लीफ़ में देखकर आप कितने दुखी होंगे जिसकी पीठ हर साल झुकती जा रही हो? उसके चारों ओर लोग कितने असहाय महसूस करते होंगे। लेकिन फिर, आपकी आंखों के सामने, यह यीशु, जिसके विषय में सभी अफवाहें फैली थीं उसी ने सब कुछ बदल डाला। एक पल में और एक शब्द के साथ, वह खड़ी होने में सक्षम हो गयी! क्या आप उसकी खुशी कि कल्पना कर सकते हैं? क्या आप यीशु के चेहरे पर मुस्कान की कल्पना कर सकते हैं? यदि आप में उस महिला के लिए कुछ प्यार होता तो अपनी खुशी की गहराई की कल्पना कर सकते हैं? क्या आप उस कमरे में बिजली के समान आये जीवन की कल्पना कर सकते हैं? आप क्या करते? क्या आप चिल्लाते, ताली बजाते या स्तुति करते? क्या आप नाचना नहीं चाहते?

आराधनालय के शासक को ऐसा महसूस नहीं हुआ। वह क्रोधित हुआ कि यीशु ने सब्त के दिन उसे चंगा किया। यह स्त्री शायद उसकी करीबी पड़ोसन थी, फिर भी उसकी चंगी उसके कठोर ह्रदय कि गहराई को नहीं छु पाया। नियमों के बंधन में रहने से उसके दूसरों के लिए कोई करुणा नहीं थी। उसने लोगों से कहा,“काम करने के लिए छः दिन होते हैं सो उन्हीं दिनों में आओ और अपने रोग दूर करवाओ पर सब्त के दिन निरोग होने मत आओ।”

यीशु को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। और हर बार कि तरह वह निडर रहा। उसने उस शासक से कहा,“’ओ कपटियों!'”

क्या आप उसके क्रोध कि शक्ति को अपने ऊपर आते देख सकते हैं? यह देखने लायक दृश्य था! “‘क्या तुममें से हर कोई सब्त के दिन अपने बैल या अपने गधे को बाड़े से निकाल कर पानी पिलाने कहीं नहीं ले जाता?'”

यीशु कि फटकार से उसके विरोधी बहुत अपमानित हुए। उनके निराशाजनक खेल को सब ने देख लिया था। उन्होंने उस ज़रूरतमंद स्त्री कि परवाह नहीं की। वे यह दर्शा रहे थे कि वे परमेश्वर कि व्यव्यस्था और सब्त के प्रति ज़यादा आवेशपूर्ण हैं, लेकिन वे व्यव्यथा को वास्तव में उस व्यक्ति को नष्ट करने के लिए उपयोग कर रहे थे जिससे उनको अपने पद के लिए खतरा था। यह कपट का सबसे ऊंचा दर था।

लेकिन वे लोग जिन्हें इन अगुवों के बुरे नेतृत्व में रहना था, वे यीशु के अद्भुद कामों से बहुत खुश थे जो वह करता था।

कहानी ९५: विश्वास की कमी

मत्ती १७:१४-२३, मरकुस ९:१४-३२, लूका ९:३७-४५

अगले दिन, यीशु के रूपांतरण होने के बाद वे पहाड़ से पतरस, याकूब और यूहन्ना के साथ जब वापस आये तो, भीड़ बाकी के चेलों को घेरी हुई थी। कुछ शास्त्री, जो धार्मिक अगुवे थे जो उनके साथ बहस कर रहे थे। यीशु को आते देख भीड़ अचरज में पड़ गई। वे उसके पास दौड़ कर गए। यीशु ने चेलों से पूछा कि वे भीड़ के साथ क्या बात कर रहे थे। तभी भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्ला उठा,“गुरु, मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे बेटे पर अनुग्रह-दृष्टि कर। वह मेरी एकलौती सन्तान है। अचानक एक दुष्ट आत्मा उसे जकड़ लेती है और वह चीख उठता है। उसे दुष्टात्मा ऐसे मरोड़ डालती है कि उसके मुँह से झाग निकलने लगता है। वह उसे कभी नहीं छोड़ती और सताए जा रही है।”

क्या आप इस व्यक्ति कि आवाज़ में पीड़ा और दुःख को समझ सकते हैं? यह कितना दर्द्नाक रहा होगा कि अपने एक लौते पुत्र को इस तरह रोज़ ब रोज़ भयानक कष्ट में देखना। इसीलिए वह यीशु के आगे घुटनों के बल गिर गया! उसने उससे कहा, “मैं उसे तेरे शिष्यों के पास लाया, पर वे उसे अच्छा नहीं कर पाये।”

उत्तर में यीशु ने कहा, “अरे भटके हुए अविश्वासी लोगों, मैं कितने समय तुम्हारे साथ और रहूँगा? कितने समय मैं यूँ ही तुम्हारे साथ रहूँगा? उसे यहाँ मेरे पास लाओ।” पूरे सुसमाचारों में केवल यही एक समय था जब यीशु ने उसके आस पास हो रही उन बातों के प्रति बेसब्री दिखाई। वह किसके साथ बेसबर हो रहा था? शायद शास्त्रियों के साथ। वे मसीह कि सेवकाई को नष्ट करने कि साजिश रच रहे थे। वे शायद यह जान चुके थे कि वहाँ केवल नौ चेले हैं, और वे उस व्यक्ति के दुष्ट आत्मा से युक्त बेटे को वहाँ ले आये थे। यदि उन्होंने यीशु के चेलों को और कुछ करते देख लिया होता, तो वे यीशु के भी पीछे पड़ गए होते! ये राष्ट्र के अगुवे उस अतिदुखी व्यक्ति या उसके बेटे कि मदद नहीं कर रहे थे, वे उसे यीशु को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे! इसीलिए यीशु इतने हताश हो गये थे!

तब वे लड़के को उसके पास ले आये और जब दुष्टात्मा ने यीशु को देखा तो उसने तत्काल लड़के को मरोड़ दिया। वह धरती पर जा पड़ा और चक्कर खा गया। उसके मुँह से झाग निकल रहे थे। तब यीशु ने उसके पिता से पूछा कि ऐसा कितने दिनों से है। पिता ने उत्तर दिया,“यह बचपन से ही ऐसा है। दुष्टात्मा इसे मार डालने के लिए कभी आग में गिरा देती है तो कभी पानी में। क्या तू कुछ कर सकता है? हम पर दया कर, हमारी सहायता कर।”

यीशु ने उससे कहा,“तूने कहा,‘क्या तू कुछ कर सकता है?’ विश्वासी व्यक्ति के लिए सब कुछ सम्भव है।”

तुरंत बच्चे का पिता चिल्लाया और बोला, “मैं विश्वास करता हूँ। मेरे अविश्वास को हटा!”

अब तक इस बात कि खबर फ़ैल गयी थी, और लोग सारी दिशाओं से वहाँ आ रहे थे। उसने दुष्टात्मा को ललकारा और उससे कहा,“ओ बच्चे को बहरा गूँगा कर देने वाली दुष्टात्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूँ इसमें से बाहर निकल आ और फिर इसमें दुबारा प्रवेश मत करना!”

तब दुष्टात्मा चिल्लाई। बच्चे पर भयानक दौरा पड़ा। और वह बाहर निकल गयी। बच्चा मरा हुआ सा दिखने लगा।फिर यीशु ने लड़के को हाथ से पकड़ कर उठाया और खड़ा किया। वह खड़ा हो गया। यीशु ने उसे उसके पिता को सौंप दिया, और सब यह देख कर परमेश्वर कि महानता को देख कर अचम्भे और श्रद्धायुक्त भयभीत हुए।

इसके बाद यीशु अपने घर चला गया। अकेले में उसके शिष्यों ने उससे पूछा की वे इस दुष्टात्मा को बाहर क्यों नहीं निकाल सके। दूसरी परिस्थितियों में, वे दुष्ट आत्माएं निकल लिया करते थे। तो इस बार क्या हुआ? यीशु ने उन्हें बताया, “क्योंकि तुममें विश्वास की कमी है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, यदि तुममें राई के बीज जितना भी विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से कह सकते हो ‘यहाँ से हट कर वहाँ चला जा’ और वह चला जायेगा। तुम्हारे लिये असम्भव कुछ भी नहीं होगा।” इस पर यीशु ने उनसे कहा कि ऐसी दुष्टात्मा प्रार्थना के बिना बाहर नहीं निकाली जा सकती थी।

फिर उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया। और जब वे गलील होते हुए जा रहे थे तो वह नहीं चाहता था कि वे कहाँ हैं, इसका किसी को भी पता चले। यीशु अब गलील से होते हुए पेरा से यहूदिया को निकल पड़ा। वह क्रूस के लिए जा रहा था, और उसे चेलों को कुछ महत्पूर्ण बातें सिखानी थी। इस सन्देश में कुछ अत्यावश्यकता थी जो उसके चेले बाद में ही समझ पाएंगे।

“अब जो मैं तुमसे कह रहा हूँ, उन बातों पर ध्यान दो। मनुष्य का पुत्र मनुष्य के हाथों पकड़वाया जाने वाला है।”

यीशु उन्हें आगे आने वाले रास्ते को दर्शा रहे थे। यही कारण था जिसके लिए वो आया था, और परमेश्वर का मसीह के लिए शुरू से यही योजना थी। यह एक मुक्तिदाता-सम्बंधित रहस्य था जो कोई भी इसका अनुमान नहीं लगा सकता था। उसने उनसे कहा,”वे उसे मार डालेंगे। किन्तु तीसरे दिन वह फिर जी उठेगा!” चेलों ने उसे सुना, किन्तु वे इस बात को नहीं समझ सके। यह बात उनसे छुपी हुई थी। सो वे उसे जान नहीं पाये। और वे उस बात के विषय में उससे पूछने से डरते थे।यीशु जानता था कि उसके आने वाली परीक्षाएं उसके मित्रों के लिए कठिन होंगी, और वह जानता था कि वे भयभीत होंगे। लेकिन अगर वे अभी जान जानते कि वो जानता कि आने वाला है, तो एक दिन वे इस बात को समझ जाएंगे कि सब कुछ उसके नियंत्रण में था। मसीह का भविष्य कोई दुर्घटना नहीं थी जो इस लिए हुई कि परमेश्वर ने नियंत्रण खो दिया था। यह बहुत ही दिल टूटने वाला परमेश्वर का विशाल उद्धार के कार्य का एक भाग था।  यीशु जनता था कि उसे क्या करना है, और जिस तरह साहसपूर्वक उसने पिता कि मर्ज़ी को पूरा किया, उसने चेलों के विश्वास को मज़बूत करने में भी सहयोग दिया।

जब यीशु और उसके शिष्य कफ़रनहूम में आये तो मन्दिर का दो दरम कर वसूल करने वाले पतरस के पास आये। यह कर येरूशलेम के मंदिर कि देख भाल के लिए था। हर पुरुष जो बीस साल से ऊपर था उसे कर देना होता था। उन्होंने पतरस से पुछा कि यीशु भी कर देता है। पतरस ने उत्तर दिया,“हाँ, वह देता है।” और घर में चला आया। यीशु ने उससे कहा,“’शमौन, तेरा क्या विचार है? धरती के राजा किससे चुंगी और कर लेते हैं? स्वयं अपने बच्चों से या दूसरों के बच्चों से?’

पतरस ने कहा कि वे दूसरों से कर लेते हैं। यीशु ने कहा,“‘यानी उसके बच्चों को छूट रहती है। पर हम उन लोगों को नाराज़ न करें इसलिये झील पर जा और अपना काँटा फेंक और फिर जो पहली मछली पकड़ में आये उसका मुँह खोलना तुझे चार दरम का सिक्का मिलेगा। उसे लेकर मेरे और अपने लिए उन्हें दे देना।’”

यीशु और उसके चेले परमेश्वर के शाही घराने के सदस्य थे। नास्तिक यहूदी के घराने दुसरे किस्म के थे, और इनके पास येरूशलेम के मंदिर के ऊपर अधिकार था जो कर लिया करते थे। यह स्वाभाविक था कि वे उनसे कर लेते थे जो परिवार के बाहर के थे और यीशु ऐसे कर को देने में खुश थे जिसमें कि अंतर दिखे।

कहानी ९२: चार हज़ार लोगों को खिलाना

मत्ती १५:३२-१६:१२, मरकुस ८:१-१२

यीशु और उसके चेले गलील के सागर के किनारे थे, लेकिन वे दिकापुलिस में थे। यह दस शहरों का अन्यजातियों का शहर था। इस यहूदी क्षेत्र के बाहर था। वहाँ के लोग ऐसे थे जिनके साथ यहूदी बैठ कर भोजन नहीं करेंगे! फिर भी बड़ी भीड़ यीशु को देखने के लिए उमड़ रही थी। तीन दिन के बाद, यीशु को भीड़ पर तरस आया। उनके पास कुछ खाने को नहीं था! वह उनको भूखे पेट वापस नहीं भेजना चाहता था। वे बेहोश हो सकते थे! बहुत से लोग दूर दिशा से उसके पास आये थे।

तब यीशु के चेलों ने उससे पुछा कि इतनी बड़ी भीड़ के लिए ऐसी बियाबान जगह में इतना खाना कहाँ से मिलेगा। यह एक साधारण सा सवाल था लेकिन जीवन अब साधारण नहीं रहे। वे मसीहा के चेले थे! क्या उन्हें याद नहीं था कि यीशु ने 5000 को खिलाया था?

तब यीशु ने उनसे पूछा कि उनके पास कितनी रोटियाँ हैं। इस बार, सात रोटियां और थोड़ी सी मछलियां थीं। यीशु ने भीड़ से धरती पर बैठने को कहा और उन सात रोटियों और मछलियों को लेकर उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया और रोटियाँ तोड़ीं और अपने शिष्यों को देने लगा। फिर उसके शिष्यों ने उन्हें आगे लोगों में बाँट दिया।

लोग तब तक खाते रहे जब तक थक न गये। फिर उसके शिष्यों ने बचे हुए टुकड़ों से सात टोकरियाँ भरीं। मसीह कि अधिकता आशीषें यहूदियों के लिए फिर से बेह कर निकलने लगीं थीं, और अब अन्यजातियों पर भी बहने लगा था! औरतों और बच्चों को छोड़कर वहाँ चार हज़ार पुरुषों ने यीशु के सन्देश को उस दिन सुना।

ऐसे मंदबुद्धि चेलों के लिए यीशु में कितना सबर था! यह कितना सुन्दर रूप था जिस पर उनको अपने शेष जीवन को बिताना था। केवल यीशु ही के पास परमेश्वर कि दी हुई सामर्थ थी जो श्रापित दुनिया कि और सब ज़रूरतमंद लोगों कि आवश्यकताओं को पूरा करता है, परन्तु वह इन लोगों को अपनी सामर्थ देगा ताकि उसके जाने के बाद, वे लोगों को उस जीवन कि रोटी को बात सकें!

भीड़ को विदा करके यीशु नाव में आ गया और मगदन को चला गया। यह एक यहूदी क्षेत्र था। यदि हम गलील के किनारे खड़े होकर देखें तो चारों ओर है हरी घास और चमकता हुआ नीला आकाश का ख़ूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है। लेकिन यहूदियों और अन्यजातियों कि नज़र में, उन दोनों गुट के बीच एक ऊंची दिवार थी। ये अनदेखी दीवारें हज़ारों सालों से बनी हुई थीं, परन्तु जब यीशु और उनके चेले अपनी कश्ती से उस समुन्द्र के उस पार गए जहाँ उनका आसमानी बाप उन्हें ले जा रहा था, उन्होंने उन सीमाओं को पार कर लिया था। नयी दुनिया के लिए वे नए रास्तों को बना रहे थे।

जब यीशु और उके चेले यहूदी क्षेत्र में पहुँचे,तो फ़रीसी और सदूकी उनका इंतज़ार कर रहे थे। वे उनको आज़माना चाहते थे और उसके साथ बहस करना चाहते थे। सुसमाचारों में हम पहली बार हमें यह पड़ने को मिलता है कि फरीसी और सदूकी एक साथ कामकर रहे हैं। आम तौर पर वे एक दुसरे को दुश्मन ही समझते थे। वे परमेष्वर और बाइबिल के विषय में फर्क विचार धारा रखते थे, और यहूदी विश्वास में उनके बीच मेंदरार पैदा होती थी। लेकिन अब, उन्हें एक सामान्य दुश्मन मिल गया था। वे इस सेवक कि खिलाफ जाने के लिए एक साथ हो गए थे। उनके जो भी मतभेद हों, वे इस नए खतरे के सामने महत्पूर्ण नहीं था। उन्हें इस यीशु के विषय में कुछ करना था।

फिर फ़रीसी आये और उससे प्रश्न करने लगे, उन्होंने उससे कोई स्वर्गीय आश्चर्य चिन्ह प्रकट करने को कहा। क्यूंकि, पुराने नियम में लिखा है कि मसीहा लौकिक स्थल पर कार्य करेगा, और परमेश्वर ने मूसा और एलिजाह के द्वारा बहुत से चमत्कार किये थे। यदि यीशु परमेश्वर कि ओर से है, वो वह स्वयं इन कार्यों को क्यूँ नहीं करता? उन्हें ऐसा लगा कि उसे उन्हें सबूत देना होगा।

यीशु के शिष्य कुछ खाने को लाना भूल गये थे। एक रोटी के सिवाय उनके पास और कुछ नहीं था।

यीशु ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा, “सावधान! फरीसियों और हेरोदेस के ख़मीर से बचे रहो।” उसने हेरोदेस के खिलाफ उन्हें चेतावनी दी।

यीशु के चेले आपस में यह बातें करने लगे कि उसका क्या कहने का मतलब था। उन्हें लगा कि यीशु शायद उनसे नाराज़ है क्यूंकि वे सफर के लिए रोटी लाना भूल गए थे। खमीर रोटी बनाने के लिए आटे के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, इसे आटे में मिलाया जाता था और फिर फैला दिया जाता है जिससे कि उसमें छोटे छोटे बुलबुले आ जाते हैं। जब इसे पकाया जाता है, एक चपटी रोटी के बजाय, यह थोड़ा सा हल्का और फूला हुआ होता है। लेकिन यहूदी लोगों के लिए, खमीर बुरी चीज़ों का प्रतीक है। यीशु इसे यहाँ ऐसे ही उपयोग कर रहा है। फरीसी और सदूकी इस खमीर कि तरह थे, और इस्राएल का देश आटे के समान। जिस तरह खमीर आटे में मिलकर उसे बदल देता है, झूठी शिक्षाएं और धार्मिक अगुवों कि नफरत ने यहूदी लोगों के दिमाग को यीशु के विरुद्ध कर दिया है।

यीशु जानता था कि चेले नहीं समझ पाये कि वह क्या कह रहा है। वह जानता था कि वे सोच रहे हैं कि वह उस खाने कि बात कर रहा है जो वे खरीदना भूल गए। उन्हें किस बात कि चिंता थी? क्या वे नहीं जानते थे कि वह उस एक छोटी सी रोटी से कितनी सारी टोकरियाँ भरने में सक्षम है? क्या वे सब चमत्कार भूल गए थे?

उसने उनसे कहा,“‘ओ अल्प विश्वासियों, तुम आपस में अपने पास रोटी नहीं होने के बारे में क्यों सोच रहे हो? क्या तुम अब भी नहीं समझते या याद करते कि पाँच हज़ार लोगों के लिए वे पाँच रोटियाँ और फिर कितनी टोकरियाँ भर कर तुमने उठाई थीं? और क्या तुम्हें याद नहीं चार हज़ार के लिए वे सात रोटियाँ और फिर कितनी टोकरियाँ भर कर तुमने उठाई थीं? क्यों नहीं समझते कि मैंने तुमसे रोटियों के बारे में नहीं कहा? मैंने तो तुम्हें फरीसियों और सदूकियों के ख़मीर से बचने को कहा है।”

तब वे समझ गये कि रोटी के ख़मीर से नहीं बल्कि उसका मतलब फरीसियों और सदूकियों की शिक्षाओं से बचे रहने से है। चेले भी यीशु कि आत्मिक बातों को ना समझने से परेशान हुए। कल्पना कीजिये सरे दिन पूरे यहूदी देश में ऐसे चर्चा होती रही। जब लोग यीशु कि बातों को दोहरा रहे थे, वे उन धार्मिक अगुवों के विषय में भी बात करते थे जो यीशु के विरुद्ध में थे। उनके वाद विवाद लोगों के ह्रदय में भय दाल रहा था। फरीसी यीशु के विरुद्ध में ऐसा कहने लगे कि परमेश्वर का राज्य कानूनी परम्पराओं के आधार पर बनना चाहिए। सदूकी राज्य के विषय में अलग ही टिपणी कर रहे थे। वे ऐसा कहते थे कि वो कभी नहीं आएगा! हेरोदेसी यह मानते थे कि मसीहा हेरोदेस के परिवार से ही आएगा। इन में से कोई भी अब्राहिम के परमेश्वर कि ओर नहीं फिर रहा था। यदि वे ऐसा करते हैं तो, वे मसीह को पहचान लेते जब वह आया था! अब वह उनके बीच में था, और धार्मिक अगुवे जिनको लोगों कि अगुवाई करनी थी, वे परमेश्वर के राज्य के सन्देश के विषय में आशंकाएं पैदा कर रहे थे। वे एक खतरनाक खेल खेल रहे थे।

जब चेलों ने इन झूठे शिक्षाओं को छोड़ा, तब उनकी आँखें और अधिक साफ़ देखने लगीं। वे और भी अधिक राज्य कि सच्चाई को समझने लगे, और एक सच्चा मसीहा कैसा होगा। और अगली कहानी में, उनमें से एक उसके विषय में प्रचार करेगा!

कहानी ९१: सुरुफ़िनीकी जाती कि स्त्री का विश्वास

मत्ती १५:२१-३१, मरकुस ७:२४-३७

फिर यीशु ने वह स्थान छोड़ दिया और सूर के आस-पास के प्रदेश को चल पड़ा। सूर भूमध्य सागर के किनारे बसा एक बड़ा शहर था। यह एक अन्यजातियों का शहर था। वह यहूदी दुश्मनो से अपने आप को दूर रख रहा था। वहाँ वह एक घर में गया। वह नहीं चाहता था कि किसी को भी उसके आने का पता चले।

एक कनानी स्त्री जिसकी लड़की में दुष्ट आत्मा का निवास था, यीशु के बारे में सुन कर तत्काल उसके पास आई। यीशु के विषय में सुनकर उसे आशा मिली। वह यहूदी नहीं थी फिर भी वह उसकी आशीष को पाना चाहती थी। जब उसे यीशु मिल गए तो चिल्लाने लगी,“हे प्रभु, दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया कर। मेरी पुत्री पर दुष्ट आत्मा बुरी तरह सवार है।” उसके पास कितना साहस था!

यीशु ने उससे एक शब्द भी नहीं कहा, सो उसके शिष्य उसके पास आये और विनती करने लगे, “यह हमारे पीछे चिल्लाती हुई आ रही है, इसे दूर हटा।”

यीशु ने उत्तर दिया, “मुझे केवल इस्राएल के लोगों की खोई हुई भेड़ों के अलावा किसी और के लिये नहीं भेजा गया है।”

यीशु पहले यहूदियों के लिए सुसमाचार लेकर आये थे। यीशु के उंडेलते हुए चमत्कार परमेश्वर के वाचा बंधे हुए लोगों के लिए आशीषें थीं। एक अन्यजाति होने के कारण, उसे कोई अधिकार नहीं था कि वह उसके महान अनुग्रह को मांग सके। वह परमेश्वर के परिवार का सदस्य नहीं थी!

तब उस स्त्री ने यीशु के सामने झुक कर विनती की, “हे प्रभु, मेरी रक्षा कर!”
उत्तर में यीशु ने कहा, “यह उचित नहीं है कि बच्चों का खाना लेकर उसे घर के कुत्तों के आगे डाल दिया जाये।”

यीशु उससे कह रहे थे कि उनके तोहफे यहूदी लोगों के लिए थे और ना कि उसके जैसी अन्यजाति स्त्री के लिए। वह यीशु से बोली,“यह ठीक है प्रभु, किन्तु अपने स्वामी की मेज़ से गिरे हुए चूरे में से थोड़ा बहुत तो घर के कुत्ते ही खा ही लेते हैं।” उसने यह माना कि परमेश्वर कि आशीषें उसके इस्राएल देश के द्वारा बह कर अन्यजातियों पर भी आती हैं। यह उसे रोक नहीं पाया!

तब यीशु ने कहा, “स्त्री, तेरा विश्वास बहुत बड़ा है। जो तू चाहती है, पूरा हो।” और तत्काल उसकी बेटी अच्छी हो गयी।

इस स्त्री के और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के विश्वास के व्यवहार में कितना अंतर था! क्या यह अचंबित नहीं कि परमेश्वर के लोगों को उसकी मेज़ से जीवन कि रोटी दी गयी फिर भी उन्होंने उसे अस्वीकार किया? यह अन्यजाति स्त्री उस रोटी को लेने को तैयार थी, इसके बावजूद कि उसे यहूदी लोगों के बचे हुए टुकड़े मिल रहे थे। अंत में, उन्हें यह उन्होंने वह महान खज़ाना खो दिया है।

यीशु सुर से निकल कर गलील के समुन्द्र कि ओर वापस चला गया। उसे उत्तर कि ओर पच्चीस मील दूर चलना पड़ा, और फिर हेरोदेस के भाई फिलिपुस के क्षेत्र से निकला।  यीशु गलील में नहीं जाना चाहता था। हेरोदेस राजा इस यीशु के आने को यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले कि वापसी को समझ रहा था जिसका भय उसके भीतर समाया हुआ था। भीड़ में से कुछ उसे राजा बनाना चाहते थे, और धार्मिक अगुवे उसे मरवाना चाहते थे। सो उसने अपने चेलों के साथ, उन सब सवालों और भीड़ के पागलपन से बचने के लिए पैदल लंबी यात्रा की। उन्हें आपस में बात चीत करने का मौका मिल गया। क्या आप सोच सकते हैं कि उन्होंने क्या बातें की होंगी?

फिर वह सूर के इलाके से वापस आ गया और दिकपुलिस यानी दस-नगर के रास्ते सिदोन होता हुआ झील गलील पहुँचा। यह वो स्थान जहां वो आदमी रहता था जिसके अंदर दुष्ट आत्माओं कि सेना थी। उसे उसके बंधन से आज़ाद करने के बाद, वह दिकपुलिस को जाकर वो सब बातों को  यीशु ने की थीं। उसने उनके बीच जाकर सुसमाचार सुनाया और परमेश्वर के लिए उन अविश्वासी ह्रदयों को तैयार किया।

फिर यीशु वहाँ से चल पड़ा और झील गलील के किनारे पहुँचा। वह एक पहाड़ पर चढ़ कर उपदेश देने बैठ गया। बड़ी-बड़ी भीड़ लँगड़े-लूलों, अंधों, अपाहिजों, बहरे-गूंगों और ऐसे ही दूसरे रोगियों को लेकर उसके पास आने लगी। भीड़ ने उन्हें उसके चरणों में धरती पर डाल दिया। और यीशु ने उन्हें चंगा कर दिया। यह कितना अद्भुद परमेश्वर है! ऐसे परिवर्तन को देखना कितना यशस्वी है। भीड़ ने यीशु कि सामर्थ को देखा और अचंबित हुई। जब कि वे अन्यजाति थे, उन्होंने ने उस अच्छाई को देख कर उसकी ओर प्रतिक्रिया की, और इस्राएल के परमेश्वर कि महिमा की।

वहाँ कुछ लोग यीशु के पास एक व्यक्ति को लाये जो बहरा था और ठीक से बोल भी नहीं पाता था। लोगों ने यीशु से प्रार्थना की कि वह उस पर अपना हाथ रख दे। यीशु उसे भीड़ से दूर एक तरफ़ ले गया। यीशु ने अपनी उँगलियाँ उसके कानों में डालीं और फिर उसने थूका और उस व्यक्ति की जीभ छुई।फिर स्वर्ग की ओर ऊपर देख कर गहरी साँस भरते हुए उससे कहा,“इप्फतह।”अर्थात् “खुल जा!” और उसके कान खुल गए, और उसकी जीभ की गांठ भी खुल गई, और वह साफ साफ बोलने लगा।

फिर यीशु ने उन्हें आज्ञा दी कि वे किसी को कुछ न बतायें। वह चेलों को शिक्षण देने के लिए और समय बिताना चाहता था, लेकिन लोक-प्रसिद्धि और शहरत रास्ते में आ रही थीं। लेकिन यीशु कि विनती इस मनुष्य को उसके महान उपहार के विषय जो उसे मिला था,बताने से रोक नहीं पाई। बल्कि, जितना वह उन्हें कप रहने को कहता था, वे उतना ही उसका प्रचार करते थे। उसके विषय में सूचना दूर दूर तक फ़ैल गयी। यह कितना अचंबित है कि जिन लोगों को यीशु ने इतना सिखाया, इतना प्रेमा और करुणा दिखाई, उन्होंने उसकी आज्ञाओं को नहीं माना। उनकी कृतज्ञता कहाँ गयी? वे उस व्यक्ति का आदर क्यूँ नहीं करना चाहते थे जिसने उनके लिए इतना महान कार्य किया?

कहानी ९०: फरीसियों, सदूकियों, और हेरोदेस का खमीर

मत्ती १५:१-२०, मरकुस ७ १-२३, यूहन्ना ७:१

यीशु ने जीवन की रोटी होने का दावा किया था, और इसके विषय में शब्द जल्दी से फैल गया। उनके शिक्षण की खबर यरूशलेम पहुंच गयी और यहूदी अगुवों को क्रोधित कर दिया।लेकिन वे क्या कर सकता थे? उसने हर बहस के ऊपर विजय पाई, और भीड़ ने उसकी चँगाइयों को पसन्द किया। लेकिन धार्मिक अगुवे उसे रोकने के  प्रयास में थे। वे उसे मारने कि योजना बना रहे थे। यहूदी क्षेत्र जो येरूशलेम के चरों ओर घिरा हुआ है, यीशु के लिए एक खतरनाक जगह बन चूका था।

धार्मिक अगुवों ने कुछ फरीसी और शास्त्रियों को यीशु से मिलने के लिए येरूशलेम भेजा। वे उसे पाप में रंगे हाथ पकड़ना चाहते थे ताकि उसको सज़ा दे सकें। उन्होंने यीशु के चेलों को बगैर हाथ धोये रोटी को खाया। पुरखों की रीति पर चलते हुए फ़रीसी और दूसरे यहूदी जब तक सावधानी के साथ पूरी तरह अपने हाथ नहीं धो लेते भोजन नहीं करते। ऐसे ही बाज़ार से लाये खाने को वे बिना धोये नहीं खाते। ऐसी ही और भी अनेक रुढ़ियाँ हैं, जिनका वे पालन करते हैं। जैसे कटोरों, कलसों, ताँबे के बर्तनों को माँजना, धोना आदि। इसलिये फरीसियों और धर्मशास्त्रियों ने यीशु से पूछा, “तुम्हारे शिष्य पुरखों की परम्परा का पालन क्यों नहीं करते? बल्कि अपना खाना बिना हाथ धोये ही खा लेते हैं।”

यीशु ने उनसे कहा,

“यशायाह ने तुम जैसे कपटियों के बारे में ठीक ही भविष्यवाणी की थी। जैसा कि लिखा है:

ये मेरा आदर केवल होठों से करते है,
पर इनके मन मुझसे सदा दूर हैं।
मेरे लिए उनकी उपासना व्यर्थ है,
क्योंकि उनकी शिक्षा केवल लोगों द्वारा बनाए हुए सिद्धान्त हैं।’

उसने उनसे कहा,
तुमने परमेश्वर का आदेश उठाकर एक तरफ रख दिया है और तुम मनुष्यों की परम्परा का सहारा ले रहे हो। तुम परमेश्वर के आदेशों को टालने में बहुत चतुर हो गये हो ताकि तुम अपनी रूढ़ियों की स्थापना कर सको! उदाहरण के लिये मूसा ने कहा, ‘अपने माता-पिता का आदर कर’ और ‘जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, उसे निश्चय ही मार डाला जाये।’ पर तुम कहते हो कि यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता से कहता है कि ‘मेरी जिस किसी वस्तु से तुम्हें लाभ पहुँच सकता था, मैंने परमेश्वर को समर्पित कर दी है।’ तो तुम उसके माता-पिता के लिये कुछ भी करना समाप्त कर देने की अनुमति देते हो। इस तरह तुम अपने बनाये रीति-रिवाजों से परमेश्वर के वचन को टाल देते हो। ऐसी ही और भी बहुत सी बातें तुम लोग करते हो।’”

आपने देखा कि यीशु क्या कह रहे थे? धार्मिक अगुवों ने कुछ नियम बना लिए थे, और यहूदी लोगों को बता रहे थे कि उन्हें कुरबान नामक तोहफे को चढ़ाना है। उन्होंने ने लोगों के पैसे ले लिए थे जिससे कि लोग अपने माता पिता का ध्यान नहीं रख सके। दस आज्ञाओं में ऐसा लिखा है कि, “‘अपनी माता और पिता का आदर करो।'” धार्मिक अगुवों ने लोगों को कुरबान देना सिखाया था ताकि उससे उन्हें पैसे मिलें, लेकिन ऐसा कर के मूसा कि विधियों का उलंघन हो रहा था! वे धार्मिक अगुवों के संस्कारों को परमेश्वर के वचनों से अधिक महत्व दे रहे थे, और वे दूसरों को भी ऐसा सिखा रहे थे। यह स्पष्ट था कि आत्मा के विधियों के अनुसार यहूदियों को अपने माता पिता का ध्यान रखना था, और वे लोगों को उसका विपरीत करना सिखा रहे थे।  यीशु ने कहा कि यह उनमें से एक उदहारण था जहां वे पूरे राष्ट्र के लिए प्रति दिन के लिए अपने ही बनाय हुए विधियों को बनाकर परमेश्वर की सच्चे विधियों का अनादर कर रहे थे। वे लोगों पर कुरबान देने का दबाव डालते थे चाहे उन्हें अपने माता पिता का ध्यान ना रखना पड़े।

यीशु ने भीड़ को फिर अपने पास बुलाया और कहा,
“’हर कोई मेरी बात सुने और समझे। ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो बाहर से मनुष्य के भीतर जा कर उसे अशुद्ध करे, बल्कि जो वस्तुएँ मनुष्य के भीतर से निकलतीं हैं, वे ही उसे अशुद्ध कर सकती हैं।’”

यीशु के चेले उसकी बातों को लेकर परेशन हो गए। पुराने नियम में. परमेश्वर ने खाने को लेकर सारे नियम दिये थे कि किस प्रकार का भोजन खाना चाहिए और कैसा नहीं। जिस खाने कि वस्तु से उन्हें दूर रहना था वह “अशुद्ध” कहलाता था। अब यीशु कह रहा था कि कोई भी खाने कि वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं होती। वह यहूदी लोगों को खाने कि वस्तु के बारे में एक नया तरीका बता रहा था! पंद्रह हज़ार सालों से, उन्होंने ने मूसा कि विधियों का पालन किया था, लेकिन अब वह यह घोषित कर रहा था कि उन विधियों का कोई असर नहीं रहा। वे मूसा कि वाचा का एक भाग था जो मसीह के रास्ते कि ओर ले जाता था। अब मसीह आ चूका था, और वह एक नयी वाचा और नयी आशा को ले कर आ रहा था। परमेश्वर के विश्वासियों के लिए नए नियमों का संग्रह मिला था जिसे उन्हें मानना था, जब कि गहराई में वे दोनों एक सामान थे क्यूंकि वे परमेश्वर के चरित्र को दर्शाते थे। जिस तरह मूसा कि विधियां यहूदी लोगों को यह बताती थीं कि उन्हें अपने माता पिता का आदर प्रेम दिखा कर करना था, और नयी विधियां यह आदेश देती थीं कि यीशु के चेलों को एक दुसरे से प्रेम करना है। ये विचार वही थे जो यीशु के भीतर से आते थे। लेकिन चेलों को ये समझ नहीं आए।

तब उसने उनसे कहा,

“क्या तुम भी कुछ नहीं समझे? क्या तुम नहीं देखते कि कोई भी वस्तु जो किसी व्यक्ति में बाहर से भीतर जाती है, वह उसे दूषित नहीं कर सकती।क्योंकि वह उसके हृदय में नहीं, पेट में जाती है और फिर पखाने से होकर बाहर निकल जाती है।”  फिर उसने कहा, “मनुष्य के भीतर से जो निकलता है, वही उसे अशुद्ध बनाता है क्योंकि मनुष्य के हृदय के भीतर से ही बुरे विचार और अनैतिक कार्य, चोरी, हत्या, व्यभिचार, लालच, दुष्टता, छल-कपट, अभद्रता, ईर्ष्या, चुगलखोरी, अहंकार और मूर्खता बाहर आते हैं।  ये सब बुरी बातें भीतर से आती हैं और व्यक्ति को अशुद्ध बना देती हैं।”

कहानी ८९: जीवन कि रोटी (भाग II)

यूहन्ना ६:४३-७१

जब लोगों ने यीशु को सुना, वे बड़बड़ाने लगे और शिकायत करने लगे। वह कौन था ऐसा कहने वाला कि वह स्वर्ग से नीचे उतर के आया है? वे सब जानते थे कि वह नासरी से एक बढ़ई यूसुफ का पुत्र है। वे सब उसके माता और पिता। वह ऐसा कैसे दावा कर सकता था कि वह स्वर्ग से आया है?

यदि आप इसके बारे में सोचें, यह किसी भी सामान्य मानव के लिए ऐसा कहना एक हास्यास्पद बात होगी। वास्तव में, यह उससे भी बढ़कर होगा। यह एक भयानक झूठ होगा। किसी भी मनुष्य के लिए झूठ और यह दावा करना कि वह सारी सृष्टि का परमेश्वर बनके स्वर्ग से आया है तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा। यह उसका अपमान होगा जो पूर्ण रूप से अच्छा और पवित्र है। इसीलिए दुनिया के झूठे धर्म भीषण रूप से गलत हैं। वे उसके विषय में कुटिल, विकृत झूठ बताते हैं जो सीधा और सच्चा है! वे शैतान के झूठ का साथ देते हैं और मानव जाती को सृष्टिकर्ता कि खूबसूरती को समझने से रोकते हैं।

यदि यीशु वास्तव में स्वर्ग से था, तो गलील के क्षेत्र में कुछ शानदार हो रहा था। इसका मतलब था कि परमेश्वर पृथ्वी पर आ गया था, और गलील के लोगों को जो सबसे बड़ा निर्णय लेना था वो था कि वे यीशु के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यही सबसे महवपूर्ण निर्णय है जो हम और आप ले सकते हैं।

यीशु जानते थे कि भीड़ उनके खिलाफ कैसे बड़बड़ा रही थी। वे यह भी जानते थे कि परमेश्वर पिता अपनी पवित्र आत्मा के द्वारा उसके शिक्षण में कार्य कर रहा है। गलीली लोग आत्मा के कार्य जिस तरह अस्वीकार कर रहे थे वे यीशु के कार्यों को भी अस्वीकार कर रहे थे। यह पाप उसी पाप के सामान था जब धार्मिक अगुवों ने यीशु को बताया कि वह शैतान का सहभागी है! यीशु ने उत्तर दिया:

“’आपस में बड़बड़ाना बंद करो, मेरे पास तब तक कोई नहीं आ सकता जब तक मुझे भेजने वाला परम पिता उसे मेरे प्रति आकर्षित न करे।'” 

यीशु बता रहे हैं कि जब तक परमेश्वर शुरू ना करे और पीछे ना हो, कोई उस पर विश्वास नहीं कर सकता। यदि हम में से कोई भी यीशु का चेला है, वह इसिलिय कि परमेशर ने हमें कीचड कि दलदल से निकाला ताकि हम पश्चाताप कर सकें। लकिन केवल यही नहीं है जो वह उनके लिए करेगा जो यीशु पर विश्वास करते हैं:

“‘मैं अंतिम दिन उसे पुनर्जीवित करूँगा। नबियों ने लिखा है, ‘और वे सब परमेश्वर के द्वारा सिखाए हुए होंगे।’ हर वह व्यक्ति जो परम पिता की सुनता है और उससेसिखता है मेरे पास आता है। किन्तु वास्तव में परम पिता को सिवाय उसके जिसे उसने भेजा है, किसी ने नहीं देखा। परम पिता को बस उसी ने देखा है|“मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, जो विश्वासी है, वह अनन्त जीवन पाता है। मैं वह रोटी हूँ जो जीवन देती है। तुम्हारे पुरखों ने रेगिस्तान में मन्ना खाया था तो भी वे मर गये। जबकि स्वर्ग से आयी इस रोटी को यदि कोई खाए तो मरेगा नहीं।  मैं ही वह जीवित रोटी हूँ जो स्वर्ग से उतरी है। यदि कोई इस रोटी को खाता है तो वह अमर हो जायेगा। और वह रोटी जिसे मैं दूँगा, मेरा शरीर है। इसी से संसार जीवित रहेगा।’”

यीशु ने वास्तव में उनके बहस को उन्ही पर डाल दिया था। वे क्यूँ उसी मन्ना को चाहते थे जो परमेश्वर ने मूसा के समय में भेजा था, और सब जंगल में मर गए थे? विशेष करके जब कि यीशु ही वो रोटी है जो स्वर्ग से भेजा गया है, और उनके लिए अपने आप को बलिदान कर दिया है? अनंत जीवन को पाने के लिए उन्हें केवल विश्वास करना था!

जब यहूदियों ने यीशु को ऐसा कहते सुना, वे आपस में बहस करने लगे। उन्होंने कहा,”‘यह व्यक्ति अपना शरीर हमें कैसे खाने के लिए दे सकता है?'” स्वर्ग कि अनन्तकाल कि बातें जो यीशु बता रहा है, उसे समझने के बजाय वे शारीरिक बातों पर अधिक ध्यान दे रहे थे।

यीशु ने यह स्पष्ट करने की कोशिश नहीं की। वह जानता था कि उनके ह्रदय कितने कठोर हैं। वह जानता था कि वे जो उसके पास सच्चे विश्वास के साथ आएंगे, वे उसके चेलों के समान विश्वास और भक्ति के साथ प्रतिक्रिया करेंगे। जिनके पास सुनने के लिए कान थे उनके लिए उसके शब्द स्पष्ट थे, लेकिन ये कठोर ह्रदय वाले विद्रोही लोग उन्हें भ्रम में बदल रहे थे। वह बोलता रहा यह जानते हुए भी कि वे समझने से इंकार करेंगे:

“‘मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का शरीर नहीं खाओगे और उसका लहू नहीं पिओगे तब तक तुममें जीवन नहीं होगा। जो मेरा शरीर खाता रहेगा और मेरा लहू पीता रहेगा, अनन्त जीवन उसी का है। अन्तिम दिन मैं उसे फिर जीवित करूँगा। मेरा शरीर सच्चा भोजन है और मेरा लहू ही सच्चा पेय है।  जो मेरे शरीर को खाता रहता है, और लहू को पीता रहता है वह मुझमें ही रहता है, और मैं उसमें। बिल्कुल वैसे ही जैसे जीवित पिता ने मुझे भेजा है और मैं परम पिता के कारण ही जीवित हूँ, उसी तरह वह जो मुझे खाता रहता है मेरे ही कारण जीवित रहेगा। यही वह रोटी है जो स्वर्ग से उतरी है। यह वैसी नहीं है जैसी हमारे पूर्वजों ने खायी थी। और बाद में वे मर गये थे। जो इस रोटी को खाता रहेगा, सदा के लिये जीवित रहेगा।’”

ऐसा लगता था मनो यीशु कोई कठोर ह्रदय वाली भीड़ को पहेलियों में बात कर रहा हो। वह उन्ही कठिन विचारों का उपयोग कर रहा था जिस प्रकार वह दृष्टान्तों। जिनका सच्चा विश्वास था केवल वे ही समझ सकते थे। यीशु क्रूस पर अपनी जान देने के लिए उत्सुक था। अपने शरीर और लहू के द्वारा, वह मानवजाति के लिए उद्धार को प्राप्त कर लेगा। यह परमेश्वर का विशेष बलिदान होगा।

जब लोग सुन रहे थे, तब चेले उससे परेशान हो रहे थे। उन्होंने कहा,”‘यह शिक्षा बहुत कठिन है, इसे कौन सुन सकता है?””
यीशु को अपने आप ही पता चल गया था कि उसके अनुयायियों को इसकी शिकायत है। इसलिये वह उनसे बोला,

“क्या तुम इस शिक्षा से परेशान हो? यदि तुम मनुष्य के पुत्र को उपर जाते देखो जहाँ वह पहले था तो क्या करोगे? आत्मा ही है जो जीवन देता है, देह का कोई उपयोग नहीं है। वचन, जो मैंने तुमसे कहे हैं, आत्मा है और वे ही जीवन देते हैं।किन्तु तुममें कुछ ऐसे भी हैं जो विश्वास नहीं करते।”

यीशु शुरू से ही जानता था कि वे कौन हैं जो विश्वासी नहीं हैं और वे कौन हैं जो उसे धोखा देगा। यीशु ने आगे कहा, “इसीलिये मैंने तुमसे कहा है कि मेरे पास तब तक कोई नहीं आ सकता जब तक परम पिता उसे मेरे पास आने की अनुमति नहीं दे देता।”

इसी कारण यीशु के बहुत से अनुयायी वापस चले गये। और फिर कभी उसके पीछे नहीं चले। फिर यीशु ने अपने बारह शिष्यों से कहा, “क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?”

शमौन पतरस ने उत्तर दिया,“‘हे प्रभु, हम किसके पास जायेंगे? वे वचन तो तेरे पास हैं जो अनन्त जीवन देते हैं। अब हमने यह विश्वास कर लिया है और जान लिया है कि तू ही वह पवित्रतम है जिसे परमेश्वर ने भेजा है।’”

फिर से इसे पढ़ें। क्या आप पतरस के विश्वास और महानता को देख सकते हैं! एक विश्वासी का निपुर्ण उदाहरण उसके शब्द हैं। यीशु ने कहा कि जिन्हें परमेश्वर पिता अपनी ओर खीँच लेता है, वे फिर कभी नहीं खोते, पतरस उसके सही उदाहरण था। पूरी भीड़े, धार्मिक अगुवे, और असफल चेलों में ये कुछ ही थे जिनका विश्वास साफ़ और सच्चा था। मसीह के सन्देश को सुनने के लिए उनके पास कान थे सुनने के लिए और देखने के लिए आँखें थीं।

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम बारहों को मैंने नहीं चुना है? फिर भी तुममें से एक शैतान है।”

यीशु जानता था कि उसके ग्यारह चेलों के पास सच्चा विश्वास था, जब कि सारा यहूदी देश उसके खिलाफ जा रहा था। वह शमौन इस्करियोती के बेटे यहूदा के बारे में बात कर रहा था क्योंकि वह यीशु के खिलाफ़ होकर उसे धोखा देने वाला था।

कहानी ८८: जीवन कि सच्ची रोटी

यूहन्ना ६:२२-५९

यीशु ने पंद्रह हजार लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन में पांच रोटियां और दो ​​मछली खिलाईं। वे सभी उस दिन तृप्त होकर अपने घर को गए। उन्होंने जितना उसके शिक्षण कि बातों को लिया उतना ही भोजन पर भी किया। उन्होंने उन शानदार चमत्कारों को भी देखा जिससे कि बंधी आज़ाद हुए, अंग मज़बूत किये गए, और आँखें खुल गईं। जब यीशु ने उन्हें घर वापस भेजा, वे बाकि के मानवजाति जिन्होंने यह सब नहीं देखा था, उनसे अधिक देख लिया था। क्या उनके ह्रदय आखिरकार पश्चाताप करेंगे?

भीड़ ने यह भी देखा कि यीशु अपने चेलों के साथ नाव में नहीं जा रहा है। वह प्रार्थना करने के लिए ऊपर पहाड़ पर जा रहा था। अगले दिन उन्होंने देखा कि, यीशु गलील के दूसरी छोर पहुँच गया है। अब वह अपने चेलों के साथ कफरनहूम के आराधनालय में है। ऐसा कैसे हुआ?

उन्होंने ने पुछा,“हे रब्बी, तू यहाँ कब आया?”
“मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ, तुम मुझे इसलिए नहीं खोज रहे हो कि तुमने आश्चर्यपूर्ण चिन्ह देखे हैं बल्कि इसलिए कि तुमने भर पेट रोटी खायी थी।'” यीशु जानता था कि यह लोग उसके पास एक सच्चे ह्रदय से नहीं आये हैं। उसे कितना दुःख हुआ होगा जबकि वह उन पर रोज़-ब-रोज़ अनुग्रह और परमेश्वर कि सामर्थ को उन पर उंडेलता था। वे केवल रोमांचकारी चमत्कारों को देखना चाहते थे, वे उन बातों से आज़ाद होना चाहते थे जो उनके जीवन को कष्ट देती थीं, और वे उस भोजन का आनंद उठाना चाहते थे जो चमत्कार के द्वारा प्राप्त हुआ था। उनके ह्रदय यीशु से इन बातों को लेने को तैयार थे, परन्तु उसको अपना विश्वास नहीं देना चाहते थे। उन्हें स्वर्ग राज्य के तोहफे पसंद थे, लेकिन वे उस प्रायश्चित जीवन को नहीं जीना चाहते थे जो स्वर्ग के राज्य के लिए अपेक्षित था। वे स्वर्ग के जीवित परमेश्वर के योग्य प्रजा नहीं थे। यीशु ने फिर कहा:

“‘उस खाने के लिये परिश्रम मत करो जो सड़ जाता है बल्कि उसके लिये जतन करो जो सदा उत्तम बना रहता है और अनन्त जीवन देता है, जिसे तुम्हें मानव-पुत्र देगा। क्योंकि परमपिता परमेश्वर ने अपनी मोहर उसी पर लगायी है।” यह भीड़ अपनी ख़ुशी और आशा के लिए केवल संसार कि ऊपरी चीज़ों पर भरोसा करती थी। यीशु उनको खोज रहा था जो उस पर भरोसा करेंगे। परमेश्वर के राज्य की कुंजी यह है कि स्वयं यीशु पर भरोसा करना है, और ना कि जो वह तुम्हारे लिए कर सकता है।

लोग अस्तव्यस्त हो गए थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि यह शिक्षक क्या चाहता है। सो उन्होंने पुछा,“जिन कामों को परमेश्वर चाहता है, उन्हें करने के लिए हम क्या करें?”’

उत्तर में यीशु ने उनसे कहा,“’परमेश्वर जो चाहता है, वह यह है कि जिसे उसने भेजा है उस पर विश्वास करो।’”

लोगों ने पूछा,“’तू कौन से आश्चर्य चिन्ह प्रकट करेगा जिन्हें हम देखें और तुझमें विश्वास करें? तू क्या कार्य करेगा? हमारे पूर्वजों ने रेगिस्तान में मन्ना खाया था जैसा कि पवित्र शास्त्रों में लिखा है। उसने उन्हें खाने के लिए, स्वर्ग से रोटी दी।’”

मन्ना वह चमत्कारी भोजन था जो परमेश्वर ने इस्राएल के देश के लोगों को दिया जब वे मूसा के साथ जंगल के सफर में थे। चालीस साल तक हर सुबह, इस्राएल के लोग बाहर जाकर मन्ना जमा करते थे। यह परमेश्वर के निरंतर देखभाल का एक खूबसूरत चिन्ह था। यहूदियों का एक विश्वास था कि परमेश्वर एक बार फिर मसीह के दुसरे आगमन में मन्ना भेजेगा। यीशु ने 5000 लोगों को भोजन खिलाया। लेकिन मूसा के समय में, परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए प्रति दिन मन्ना भेजा। उन्होंने यीशु के किये हुए कामों को अस्वीकार किया और अधिक से अधिक पाने कि चाहत रखी।

यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ वह मूसा नहीं था जिसने तुम्हें खाने के लिए स्वर्ग से रोटी दी थी बल्कि यह मेरा पिता है जो तुम्हें स्वर्ग से सच्ची रोटी देता है। वह रोटी जिसे परम पिता देता है वह स्वर्ग से उतरी है और जगत को जीवन देती है।”

आपको यह समझ में आया? परमेश्वर यह बता रहे थे कि वे उन्हें अब वह रोटी नहीं दे रहे थे जो आटे से बनी थी। वह एक व्यक्ति था। स्वर्ग कि रोटी कौन है? जब इस्राएली रेगिस्थान में थे, परमेश्वर ने उनकी ज़रूरतों को पूरा कर के उनकी जान बचाई थी। अब वह उनको उससे भी बढ़कर कुछ दे रहा था। यीशु अनंत का जीवन दे रहा था! क्या वे उसे स्वीकार करेंगे?

लोगों ने उससे कहा, “हे प्रभु, अब हमें वह रोटी दे और सदा देता रह।”

यीशु ने उनसे कहा, “’मैं ही वह रोटी हूँ जो जीवन देती है। जो मेरे पास आता है वह कभी भूखा नहीं रहेगा और जो मुझमें विश्वास करता है कभी भी प्यासा नहीं रहेगा।'”

यह शब्द “मैं हूँ ” बहुत ही शक्तिशाली हैं। यह वही शब्द हैं जो यीशु ने मूसा को उस जलती हुई झाड़ी से बोले थे। यीशु जानता था इस बात को कि जब वह यह कहेगा “मैं हूँ” तो वह यह बता रहा था कि वही परमेश्वर है। वह उस भूख के विषय में बोल रहा था जो अच्छे खाने से मिट जाती है या वो प्यास जो पानी पीने से चली जाती है। यीशु उन्हें यह बता रहा था कि वही है जो ह्रदयों कि गहरी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है। मानव आत्मा पाप के कारण टूट चुकी है। हर एक व्यक्ति परमेश्वर का टूटा हुआ रूप है! हर एक व्यक्ति के अंदर एक विशाल, खाली आवश्यकता है। केवल यीशु ही है जो उसे भर सकता है, और वह केवल उनके लिए कर सकता है जो उस पर विश्वास करेंगे। आगे वह कहता है:

“‘मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि तुमने मुझे देख लिया है, फिर भी तुम मुझमें विश्वास नहीं करते। हर वह व्यक्ति जिसे परम पिता ने मुझे सौंपा है, मेरे पास आयेगा।  जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी नहीं लौटाऊँगा। क्योंकि मैं स्वर्ग से अपनी इच्छा के अनुसार काम करने नहीं आया हूँ बल्कि उसकी इच्छा पूरी करने आया हूँ जिसने मुझे भेजा है। और मुझे भेजने वाले की यही इच्छा है कि मैं जिनको परमेश्वर ने मुझे सौंपा है, उनमें से किसी को भी न खोऊँ और अन्तिम दिन उन सबको जिला दूँ। यही मेरे परम पिता की इच्छा है कि हर वह व्यक्ति जो पुत्र को देखता है और उसमें विश्वास करता है, अनन्त जीवन पाये और अंतिम दिन मैं उसे जिला उठाऊँगा।”

यह कितने खूबसूरत और अद्भुद वायदे हैं। जिस किसी को भी परमेश्वर ने यीशु को सौंपा है कि वह उद्धार पाये, उसे निश्चय ही अनंत का जीवन मिलेगा। इस बात पर ध्यान कीजिये कि उद्धार परमेश्वर के कार्यों से शुरू होता है, और वह पूर्ण रूप से उसी कि ओर से आता है। उनमें एक भी जिसे उसने यीशु को सौंपा है, नाश न होगा। उन सब के पास फिर से जी उठने कि आशा होगी और यीशु के संग उस अनंत जीवन का नित्य और यशस्वी आनंद प्राप्त करेंगे। जो परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बचाय गए हैं, वे अपने विश्वास में बने रहेंगे क्यूंकि वे यीशु के लोग हैं।

युगानुयुग के जीवन को अनंत जीवन भी कहते हैं। यह युगानुयुग तक चलता रहेगा। अधिकतर लोग इस पृथ्वी पर सत्तर साल के करीब जीते हैं। यह सत्तर साल अभी के लिए हमारे लिए बहुत लम्बा समय लगता है, लेकिन यह उन हज़ारों साल जिसमें हम ह्मेशा के अद्भुद आशा में रहेंगे उसके सामने ये कितने छोटे लगेंगे। इस जीवन के क्लेश और दुःख उस भव्यता और आनंद के सामने एक क्षण कि तरह होगे। और सबसे अद्भुद बात यह होगी कि हमें उसके खत्म होने कि चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हमारी उज्जवल प्रतिभाशाली ख़ुशी निरंतर चलती रहेगी जिसका अंत कभी नहीं दिखेगा। हम उस अत्यधिक सुरक्षा में हमेशा के लिए रह सकते हैं जो हमें स्वर्ग के राजा के संतान होने के लिए देती है। यही वह अविश्वसनीय भेंट थी जो यीशु गलील के पूरे क्षेत्र को देना चाहता था, और उन्हें केवल अपने दुष्ट कामों से परमेश्वर के विरुद्ध किये पापों से पश्चाताप करना था!

कहानी ८७: एक प्रकार का राजा

मत्ती १४:२४-३३, मरकुस ६:४७-५२, यूहन्ना ६:१६-२१

मत्ती कि किताब को जब आप पढ़ेंगे, आप देखेंगे कि पतरस को अधिक ध्यान दिया जा रहा था। वह इस प्रकार से कहानियों को बयान करता है कि उससे लगता है कि वह यीशु के करीबी मित्र है और चेलों का अगुवा भी। पतरस का यीशु कि ओर सम्पूर्ण भक्ति कि कहानियां भी हैं। परन्तु उसकी जयवंत कहानियों के साथ साथ उसकी असफलताओं के विषय में भी लिखा है। जब मत्ती ने इस किताब को लिखा, वह यह दिखाना चाहता था कि एक शिष्य का ह्रदय कैसा होना चाहिए जब वह यीशु के पीछे चल रहा है। यह हमारे लिए बहुत तसल्ली देने वाली बात है जो परमेश्वर को महिमा देना चाहते हैं, लेकिन कई बार हम ठोकर खा कर गिर जाते हैं। अगली कहानी में, हम पतरस को यशस्वी, और एक मज़बूत विश्वास के साथ देखते हैं।

कल्पना कीजिए कि आप पतरस हैं। यरदन नदी पर यीशु से मिले करीब दो साल के बाद आप उसे देख रहे हैं। आप यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को मिलने के लिए यात्रा करते हैं, और वह आपको यीशु कि ओर दर्शाता है कि वही है। आप अपने सारे काम काज को छोड़ कर यीशु को खोजने के लिए शहरों और गाँव बस्तियों में जाते हैं।

कल्पना कीजिये कि आप इस आकर्षित कर देने वाले शिक्षक को अपने घर में ले आते हैं और आपका घर उस भीड़ से भर जाता है जो लगातार यीशु के पीछे चल रही है। उन दिनों कि कलपना कीजिये जब आप उसके गहरे, प्रतिभाशाली सच्चाई को सुनते थे कि सब अचंबित हो जाते थे। उस भयंकर विरोध कि कलपना कीजिये जो शक्तिशाली अगुवों के साथ हुई और आपके स्वंय का वो अत्यधिक आत्मविश्वास जिससे उसने उन्हें जो उस पर गलत इलज़ाम लगाते थे उनके मूह बंद कर दिए।

यह तो साफ़ था कि, आपकी यीशु के साथ मित्रता आपके शहर के अगुवों के साथ प्रसिद्धि नहीं देने वाला था। लेकिन आप उसके साथ खड़े रहे। आप ये अफवाह सुनते हैं कि वे उसे मरवा देना चाहते हैं। यीशु के रोज़ आप यात्रा करते हैं और यह और भी अधिक खतरनाक होता जा रहा है, लेकिन फिर भी आप ऐसा करते ही हैं। आपने काफी देख भी लिया और सुन भी लिया। आप इस व्यक्ति पर विश्वास करते हैं, और जो कुछ वह दावा करता है आप उस पर अपने जीवन को दावं पर लगा देते हैं। आपने अपने विश्वास उस पर डाला है। आप नहीं जानते थे कि यह यात्रा कहाँ को ले जाएगी। लेकिन आपको अपने प्रेम और लगन पर पूरा भरोसा था जो केवल आप उसके लिए ले जा रहे थे जो आपको वहाँ ले जा रहा है। इस मनुष्य ने परमेश्वर के राज्य के विषय में सब सत्य बताया। यदि वो नहीं था तो फिर और कोई नहीं है जिससे उसकी तुलना की जाये।

यदि इस कहानी में आप पतरस होते, तो आप अपने भाई के साथ गलील के क्षेत्र में घूमने जाते। आपके स्वामी ने आपको वो सारी अविश्वसनीय बातें करने का अधिकार दिया है जो आपने उसे पिछले डेढ़ साल से करते देखा है। अब आपकी बारी है कि आप स्वर्ग के राज्य के सन्देश को सुनाएं। अब आप हैं जिसे वो अद्भुद चमत्कार करने हैं। परमेश्वर कि आत्मा जैसे आपके भीतर से यह सब कार्य कर रही है, आपको इस बात का एहसास होता है कि यीशु ने आपको एक सेवक से भी बढ़ कर चुन लिया है। आपको अपने स्वामी के उच्च परमेश्वर के प्रति सामर्थ और आज्ञाकारिता के अधिकार में सहभागी होने के लिए जिलाया गया है। क्या आपको कभी सोचते हैं कि यीशु ने आपको क्यूँ चुना है? पूरी भीड़ में से और पूरे क्षेत्र के धार्मिल अगुवों में से आपको उन बारह में चुन लिया गया। आप अगुवे भी थे!

इस कहानी के दिन, पतरस ने यीशु को पांच रोटी और दो मछलियों से पांच हज़ार लोगों को खिलते देखा था। वह कितना अपरिहार्य ख़ुशी थी भोजन को ख़त्म ना होने तक सबको खिलाना जब तक सब तृप्त नहीं हो गये!

जब तक सब समाप्त हुआ, शाम के छे बज गए थे। यीशु ने उन्हें कफरनहूम को एक कश्ती में बैठा कर भेज दिया। फिर वह एक पहाड़ी पर एकांत समय बिताने के लिए चला गया।

इस बीच, यीशु ने अपने चेलों को समुन्द्र में देखा, और वह उनकी ओर जा रहा था। वह पानी पर पूरे विश्वास और निडरता से चला क्यूंकि वह उनका स्वंय था। जब उसके शिष्यों ने उसे उनकी ओर आते देखा तो वे घबराकर चिल्लाने लगे। उन्हें लगा कि वह कोई भूत है। लेकिन यीशु ने कहा ,“हिम्मत रखो! यह मैं हूँ! अब और मत डरो।”

पतरस ने उत्तर देते हुए उससे कहा,“प्रभु, यदि यह तू है, तो मुझे पानी पर चलकर अपने पास आने को कह।”

यीशु ने कहा, “चला आ।”

पतरस नाव से निकल कर पानी पर यीशु की तरफ चल पड़ा।वह पानी पर निकल पड़ा! वह एक एक कदम यीशु कि ओर बढ़ाने लगा। पुराने नियम में किसी ने भी ऐसा नहीं किया होगा! पतरस यीशु के नज़दीक एक एक कदम लेकर आया। यह कितना यशस्वी क्षण था!

लेकिन जब उसके पैरों के नीचे से पानी हिलने लगा, उसने नीचे देखा। उसने जब तेज हवा देखी तो वह घबराया। वह डूबने लगा और चिल्लाया, “प्रभु, मेरी रक्षा कर।”

यीशु ने तत्काल उसके पास पहुँच कर उसे सँभाल लिया और उससे बोला, “ओ अल्पविश्वासी, तूने संदेह क्यों किया?”यह मैं भी डर नहीं है है . ‘ ”

और वे नाव पर चढ़ आये। हवा थम गयी। नाव पर के लोगों ने यीशु की उपासना की और कहा, “तू सचमुच परमेश्वर का पुत्र है।”

वह भूत उनका स्वंय का स्वामी ही निकला। सो झील पार करके वे गन्नेसरत के तट पर उतर गये।  जब वहाँ रहने वालों ने यीशु को पहचाना तो उन्होंने उसके आने का समाचार आसपास सब कहीं भिजवा दिया। जिससे लोग-जो रोगी थे, उन सब को वहाँ ले आये। हर जगह जहाँ यीशु गए, लोग अपने बिमारों को सड़क के किनारे बैठा देते थे ताकि वे उसके वस्त्र को छु सकें। हर कोई जो यीशु के वस्त्र को छूटा था वह चंगा हो जाता था।