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कहानी १०७: शिष्यत्व की कीमत 

लूका १२:१३-३४

यीशु जब यहूदिया में उपदेश दे रहा था, वहीं एक आदमी उठ खड़ा हुआ और उससे एक सवाल पूछा। यह उसके माता पिता से विरासत में मिलने वाली सम्पत्ति के बारे में था। वह चाहता था कि उसके भाई उसके साथ बटवारा करे। आम तौर पर, यहूदी लोगों के लिए, इन प्रश्नों के इन प्रकार के उत्तर परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा दिए जाते थे। यहूदी लोग केवल वही कर सकते थे जो उनका कानून बताता था, और ऐसा करने से आपस में सब सीधे और निष्पक्ष होता था।यह परमेश्वर कि ओर से एक अद्भुत उपहार है। इससे एक व्यवस्थित समाज बनता था। लेकिन कभी कभी, जिसे कानून ढाँपता नहीं था वह एक समस्या बन जाती थी। सो लोग अपने रब्बी या धार्मिक अगुवों के पास जाते थे, जहां निर्णय लेने के लिए उनसे पूछते थे।

फिर वह व्यक्ति यीशु के और भीड़ के सामने खड़ा होकर उसी कहने लगा कि वह उसके भाई से पिता की सम्पत्ति का बँटवारा करने को कह दे। लेकिन यीशु को उसका स्वर्गीय पिता कि ओर से एक कार्य सौंपा गया था और यह मामला उस कार्य का हिस्सा नहीं था। इस पर यीशु ने उससे कहा,“’ओ भले मनुष्य, मुझे तुम्हारा न्यायकर्ता या बँटवारा करने वाला किसने बनाया है?’” यहाँ इस व्यक्ति के सामने जीवते परमेश्वर का बेटा खड़ा था जिसके पास चंगाई करने कि सामर्थ थी, और उसे अपनी सम्पत्ति कि पड़ी थी! यीशु लोगों को परमेश्वर के लिए धनवान बना रहा था और ना कि धन के लिए।

सो यीशु ने उनसे कहा,“’सावधानी के साथ सभी प्रकार के लोभ से अपने आप को दूर रखो। क्योंकि आवश्यकता से अधिक सम्पत्ति होने पर भी जीवन का आधार उसका संग्रह नहीं होता।’”

फिर उसने उन्हें एक दृष्टान्त कथा सुनाई:
“’किसी धनी व्यक्ति की धरती पर भरपूर उपज हुई। वह अपने मन में सोचते हुए कहने लगा,‘मैं क्या करूँ, मेरे पास फ़सल को रखने के लिये स्थान तो है नहीं।’

“फिर उसने कहा, ‘ठीक है मैं यह करूँगा कि अपने अनाज के कोठों को गिरा कर बड़े कोठे बनवाऊँगा और अपने समूचे अनाज को और सामान को वहाँ रख छोड़ूँगा। फिर अपनी आत्मा से कहूँगा, अरे मेरी आत्मा अब बहुत सी उत्तम वस्तुएँ, बहुत से बरसों के लिये तेरे पास संचित हैं। घबरा मत, खा, पी और मौज उड़ा।’

“किन्तु परमेश्वर उससे बोला, ‘अरे मूर्ख, इसी रात तेरी आत्मा तुझसे ले ली जायेगी। जो कुछ तूने तैयार किया है, उसे कौन लेगा?’

“देखो, उस व्यक्ति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है, वह अपने लिए भंडार भरता है किन्तु परमेश्वर की दृष्टि में वह धनी नहीं है।’” –लूका १२:१५-२१

यीशु इस दृष्टान्त में क्या कहने की कोशिश कर रहा था क्या आप समझ पाये? क्या आप इसे समझा सकते हैं? इस कहानी में, यह सुनना महत्वपूर्ण है कि यह आदमी क्या कह रहा है ताकि हम उसके ह्रदय के उद्देश्य को समझ पाएं। उसका एक ही उद्देश्य था कि जब तक हो सके वह अपने जीवन को कैसे अच्छा बनाय। उसके जीवन के एक ही उद्देश्य था सुख और चैन। वह अपने स्वार्थ के लालच में डूब चूका था। उसने कभी नहीं यह सोचा कि परमेश्वर को कुछ दे। उसने कभी नहीं सोचा कि गरीबों कि देख भाल में वह परमेश्वर कि सेवा कर सकता है। यीशु ने यह सिखाया था कि गरीबों के लिए करना मतलब परमेश्वर के लिए करना है। क्या परमेश्वर कि दया और करुणा सुंदर नहीं है? क्या एक लालची मनुष्य घृणायोग्य नहीं लगता जब उसके विषय में यह सोचते हैं कि वो अपनी सारी सम्पत्ति से गरीबों कि सेवा कर सकता था?

केवल धन ही नहीं था जिसे यीशु ने अपने चेलों को परमेश्वर कि इच्छा के आगे समर्पण करने को कहा। उन्हें अपने जीवन के सारे अधिकारों को उसके आगे समर्पण करना था! यह एक मौलिक निवेदन था। यीशु जैसे अपने प्रचार को करते जा रहा था, वह जानता था कि इन घोषणाओं के कारण जो उसने धार्मिक अगुवों के विरुद्ध किये वे उसे और खतरे में दाल रहे थे। उसके चेले भी यह जानते थे। हर शहर और गाव में उसके साथ रहने में उनकी यीशु के प्रति निष्ठां दिखती थी, और उनके जीवन जोखिम में पड़ गए थे। जितना अधिक चेले यीशु के साथ साथ चलते थे, उतना ही यह स्पष्ट होता जाता था कि वे संसार को सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। वे वो मनुष्य थे जिनके पास खुद के घर नहीं थे लेकिन वे इस यात्रा में लगे रहे, दुश्मनों का सामना किया, और उस सामर्थी सत्य कि घोषणा करते रहे।

जिस समय यीशु बोलता था, उसका स्वर्ग को लेकर एक स्पष्ट दृश्य था जहाँ स्वर्गीय पिता अपने सम्पूर्ण सामर्थ में अपने सिंहासन पर विराजमान है। मनुष्य रूप में होकर वह पवित्र आत्मा कि सामर्थ के द्वाराअपने पूर्ण भरोसा रख कर, वह वास्तव में अपना स्थान इस पृथ्वी पर जानता था और परमेश्वर कि योजनाओ पर पूरा भरोसा था। वह अपने अनंतकाल के घर को लौट रहा था, और इस पृथ्वी कि परीक्षाएं उस आसमानी बाप के राज्य के उज्जवल बातों के सामने व्यर्थ थे।

लेकिन उसके चेलों के लिए और वे सब जो उसके पीछे चल रहे थे, उनके लिए यह अनंतकाल का दृश्य अभी बढ़ रहा था। इस दुनिया के शान और शौकत, दुसरे लोगों की बातें और पीड़ा और मौत का डर सब उनके ह्रदयों में वास कर रहा था।

यीशु उन्हें स्वर्ग के राज्य के सदस्य बनने के विषय में समझा रहा था। उन्हें इस संसार में अपने जीवन को स्वर्ग में जाने के की तैयारी का स्थान समझना चाहिए। वे इस जीवन को परित्याग और स्वतंत्रता के रूप में जीना चैये, इस बात का विश्वास करते हुए कि परमेश्वर जो सिंहासन पर विराजमान है उनकी सब ज़रूरतों को पूरा करेगा जब तक वे इस संसार में हैं। उसने कहा:

“’इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ, अपने जीवन की चिंता मत करो कि तुम क्या खाओगे अथवा अपने शरीर की चिंता मत करो कि तुम क्या पहनोगे? क्योंकि जीवन भोजन से और शरीर वस्त्रों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कौवों को देखो, न वे बोते हैं, न ही वे काटते है। न उनके पास भंडार है और न अनाज के कोठे। फिर भी परमेश्वर उन्हें भोजन देता है। तुम तो कौवों से कितने अधिक मूल्यवान हो।चिंता करके, तुम में से कौन ऐसा हे, जो अपनी आयु में एक घड़ी भी और जोड़ सकता है। क्योंकि यदि तुम इस छोटे से काम को भी नहीं कर सकते तो शेष के लिये चिन्ता क्यों करते हो?

“कुमुदिनियों को देखो, वे कैसे उगती हैं? न वे श्रम करती है, न कताई, फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि सुलैमान अपने सारे वैभव के साथ उन में से किसी एक के समान भी नहीं सज सका। इसीलिये जब मैदान की घास को, जो आज यहाँ है और जिसे कल ही भाड़ में झोक दिया जायेगा, परमेश्वर ऐसे वस्त्रों से सजाता है तो ओ अल्प विश्वासियो, तुम्हें तो वह और कितने ही अधिक वस्त्र पहनायेगा।

“और चिन्ता मत करो कि तुम क्या खाओगे और क्या पीओगे। इनके लिये मत सोचो। क्योंकि जगत के और सभी लोग इन वस्तुओं के पीछे दौड़ रहे हैं पर तुम्हारा पिता तो जानता ही है कि तुम्हें इन वस्तुओं की आवश्यकता है। बल्कि तुम तो उसके राज्य की ही चिन्ता करो। ये वस्तुएँ तो तुम्हें दे ही दी जायेंगी।'”

इन विचारों में से कुछ परिचित लग रहा है? ये शब्द लूका की किताब से हैं, लेकिन मत्ती ने भी बहुत सी बातों को पर्वत पर उपदेश में भी डाली हैं। ये विचार यीशु के लिए इतने महत्वपूर्ण थे कि वह उनका प्रचार करता रहा। उसे मालूम था कि मनुष्य के लिए दुनियावी बातों को छोड़ कर परमेश्वर कि आशा को अपनाना कितना कठिन था। उसके उज्जवल राज्य कि सच्चाई को अपनाने के लिए बहुत समय और बढ़ते हुए विश्वास कि ज़रुरत होती है।

परमेश्वर जानता है कि उसके बच्चों को इस जीवन में भोजन और कपड़े की जरूरत है। लेकिन वह चाहता है कि उसके बच्चे सब चीज़ों के लिए केवल उस पर भरोसा करें। वो ह्रदय कितना सुन्दर है जो गरीबों कि आवश्यक्ताओं के लिए सोचता है। वो ह्रदय कितना सम्पूर्ण और दृढ़ है जो परमेश्वर पर भरोसा करता है कि वो उसके लिए सब कुछ करेगा! यीशु कि कितनी इच्छा थी कि उसके चेले उसे अपना सबसे बहुमूल्य खज़ाना बना लें! एक मात्र महत्वपूर्ण केवल वही है!

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कहानी ८४: शिष्यों का भेजा जाना 

मत्ती ९:३५-१०:४२, मरकुस ६:६b-११, लूका ९ १-५

यीशु के जीवन के विषय में पढ़ते समय आपनी ध्यान दिया होगा कि, मत्ती के अध्याय पूरी तरह से मिल गए हैं। उद्धारण के लिये, हमने पांचवे अध्याय से लेकर सांतवे अध्याय को पड़ने से पहले आठवे अध्याय को पढ़ा। ऐसा इसलिए है क्यूंकि हम चारों सुसमाचारों कि कहानियों को एक साथ कर रहे हैं। सुसमाचारों के लेखक का यीशु के जीवन के विषय में लिखने का अपना ही अंदाज़ था। हम यह मानते हैं कि मत्ती ने कहानी को इस तरह लिखा कि अपने चेलों को सिखा सके कि यीशु के लिए कैसे जीना है। यह थोडा पाठ्यपुस्तक कि तरह थी। उसने अपने लिखे हुए काम को इस तरह व्यवस्थित किया ताकि दूसरों को सीखने में आसानी हो। उस व्यवस्थित कार्य को उसने पांच भागों में बात जो यीशु ने सिखाय थे। पहला भाग पहाड़ पर सन्देश का है, जो यह सिखाता है कि कैसे परमेश्वर के राज्य में जीना है। अगला भाग वो है जिसे हम अभी पढ़ने वाले हैं। वह मत्ती 10 से है, और उसमें, यीशु अपने चेलों को सिखाते हैं कि कैसे उन्हें स्वर्गराज्य के लिए सुसमाचार का प्रचार करना है।

यीशु ने सभी शहरों और गांवों में जाकर प्रचार किया। उसे भीड़ पर बहुत दया आई जो उसके पास आती थी। वे जीवन के सभी दबावों और जीवन की पीड़ा से दुखी थे। वे चरवाहे के बिना उस भेड़ के समान थे, और उस नाज़ुक जानवर जो शातिर दुश्मन के द्वारा शिकार किया जाता और ज़ख़्मी किया जाता है।तब यीशु ने अपनेचेलों से कहा,“तैयार खेत तो बहुत हैं किन्तु मज़दूर कम हैं।'” एक खेत में, समय आता है जब फल और अनाज को जमा किया जाता है। यह परिश्रम और उत्सव मनाने का समय होगा जब बहुतायत से फसल को लाया जाएगा। जब यीशु ने भीड़ को देखा जो उसके पीछे आती थी, उसने देखा कि बहुतों के ह्रदय स्वर्ग के राज्य के लिए तैयार थे।  तब यीशु ने अपने चेलों से कहा,“तैयार खेत तो बहुत हैं किन्तु मज़दूर कम हैं। इसलिए फसल के प्रभु से प्रार्थना करो कि, वह अपनी फसल को काटने के लिये मज़दूर भेजे।”

जैसे ही यीशु ने उस ज़बरदस्त आवश्यकता को देखा, उन्होंने चेलों को प्रार्थना करने के लिए कहा।यह एक बहुत ही असरदार कार्य था जो वे लोगों कि आवश्यकताओं को मिलाने के लिए कर सकते थे। क्यूंकि आप देखिये, फसल जो है वह परमेश्वर कि फसल है, और लोग उसके लोग हैं। वही है जो उनके प्रति ज़िम्मेदार था और रहेगा। चेलों कि ज़िम्मेदारी थी कि वे उन के लिए प्रार्थना करें जो परमेश्वर के महान फसल कि कटाई के सहभागी थे।

यह कितना दिलचस्प है कि कैसे परमेश्वर प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। मत्ती के अगले ही कहानी में, यीशु ने कुछ दिलचस्प किया। उसने अपने चेलों को फसल काटने के लिए अच्छी तरह तैयार कर दिया था।

यीशु ने सबसे पहले अपने बारह चेलों के जोड़े बनाय। शमौन पतरस को उसके भाई अंद्रियास के साथ रखा। उसके बाद याकूब और यूहन्ना,फिर फिलिप्पुस और बरतुल्मै। फिर यीशु ने थोमा और मत्ती को मिलाया, और फिर हलफै और तद्दै का बेटा याकूब। आखिर में शमौन जिलौत जो यहूदा इस्करियोती के साथ रखा गया। यही वह है जो यीशु को धोखे से पकड़वाएगा। इन जोड़ों को बाहर जाकर स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा जा रहा था। यीशु ने उन्हें दुष्ट आत्माओं को निकलने कि सामर्थ और अधिकार दिया था। उसने उनको सब प्रकार कि बीमारियों को चंगा करने कि शक्ति दी थी।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि चेलों को कैसा लग रहा होगा? यीशु के साथ सब जगह यात्रा करके और उसे अद्भुद कार्यों को करते देखने के बाद उन्हें भी निमंत्रण दिया गया था कि वे भी उसी सन्देश को उसी सामर्थ के साथ बाटें! उनका नया अधिकार इतना ऊपर तक पहुँच गया था कि जो गिरे हुए दूत थे वे भी इन चेलों के आधीन होगये थे! वे चेले के पद से प्रेरित बन चुके थे। उन्हें एक विशेष कार्य से भेजा जा रहा था, और यह उनके आगे के जीवन को तैयार करने के लिए परमेश्वर का महत्वपूर्ण भाग था!

यीशु ने इन बारहों को बाहर भेजते हुए आज्ञा दी कि क्या करना है और क्या नहीं। उसने कहा,
“‘गैर यहूदियों के क्षेत्र में मत जाओ तथा किसी भी सामरी नगर में प्रवेश मत करो। बल्कि इस्राएल के परिवार की खोई हुई भेड़ों के पास ही जाओ और उन्हें उपदेश दो,‘स्वर्ग का राज्य निकट है।’बीमारों को ठीक करो, मरे हुओं को जीवन दो, कोढ़ियों को चंगा करो और दुष्टात्माओं को निकालो। तुमने बिना कुछ दिये प्रभु की आशीष और शक्तियाँ पाई हैं, इसलिये उन्हें दूसरों को बिना कुछ लिये मुक्त भाव से बाँटो। अपने पटुके में सोना, चाँदी या ताँबा मत रखो। यात्रा के लिए कोई झोला तक मत लो। कोई फालतू कुर्ता, चप्पल और छड़ी मत रखो क्योंकि मज़दूर का उसके खाने पर अधिकार है।'”

“तुम लोग जब कभी किसी नगर या गाँव में जाओ तो पता करो कि वहाँ विश्वासयोग्य कौन है। फिर तब तक वहीं ठहरे रहो जब तक वहाँ से चल न दो। जब तुम किसी घर-बार में जाओ तो परिवार के लोगों का सत्कार करते हुए कहो, ‘तुम्हें शांति मिले।’ यदि घर-बार के लोग योग्य होंगे तो तुम्हारा आशीर्वाद उनके साथ साथ रहेगा और यदि वे इस योग्य न होंगे तो तुम्हारा आशीर्वाद तुम्हारे पास वापस आ जाएगा।  यदि कोई तुम्हारा स्वागत न करे या तुम्हारी बात न सुने तो उस घर या उस नगर को छोड़ दो। और अपने पाँव में लगी वहाँ की धूल वहीं झाड़ दो। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब न्याय होगा, उस दिन उस नगर की स्थिति से सदोम और अमोरा नगरों की स्थिति कहीं अच्छी होगी। मैं तुम्हें ऐसे ही बाहर भेज रहा हूँ जैसे भेड़ों को भेड़ियों के बीच में भेजा जाये। सो साँपों की तरह चतुर और कबूतरों के समान भोले बनो।'”

“‘लोगों से सावधान रहना क्योंकि वे तुम्हें बंदी बनाकर यहूदी पंचायतों को सौंप देंगे और वे तुम्हें अपने आराधनालयों में कोड़ों से पिटवायेंगे। तुम्हें शासकों और राजाओं के सामने पेश किया जायेगा, क्योंकि तुम मेरे अनुयायी हो। तुम्हें अवसर दिया जायेगा कि तुम उनकी और ग़ैर यहूदियों को मेरे बारे में गवाही दो। जब वे तुम्हें पकड़े तो चिंता मत करना कि, तुम्हें क्या कहना है और कैसे कहना है। क्योंकि उस समय तुम्हें बता दिया जायेगा कि तुम्हें क्या बोलना है। याद रखो बोलने वाले तुम नहीं हो, बल्कि तुम्हारे परम पिता की आत्मा तुम्हारे भीतर बोलेगी।'”

“भाई अपने भाईयों को पकड़वा कर मरवा डालेंगे, माता-पिता अपने बच्चों को पकड़वायेंगे और बच्चे अपने माँ-बाप के विरुद्ध हो जायेंगे। वे उन्हें मरवा डालेंगे। मेरे नाम के कारण लोग तुमसे घृणा करेंगे किन्तु जो अंत तक टिका रहेगा उसी का उद्धार होगा। वे जब तुम्हें एक नगर में सताएँ तो तुम दूसरे में भाग जाना। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि इससे पहले कि तुम इस्राएल के सभी नगरों का चक्कर पूरा करो, मनुष्य का पुत्र दुबारा आ जाएगा।'”

“शिष्य अपने गुरु से बड़ा नहीं होता और न ही कोई दास अपने स्वामी से बड़ा होता है। शिष्य को गुरु के बराबर होने में और दास को स्वामी के बराबर होने में ही संतोष करना चाहिये। जब वे घर के स्वामी को ही बैल्जा़बुल कहते हैं, तो उसके घर के दूसरे लोगों के साथ तो और भी बुरा व्यवहार करेंगे! इसलिये उनसे डरना मत क्योंकि जो कुछ छिपा है, सब उजागर होगा। और हर वह वस्तु जो गुप्त है, प्रकट की जायेगी।  मैं अँधेरे में जो कुछ तुमसे कहता हूँ, मैं चाहता हूँ, उसे तुम उजाले में कहो। मैंने जो कुछ तुम्हारे कानों में कहा है, तुम उसकी मकान की छतों पर चढ़कर, घोषणा करो। उनसे मत डरो जो तुम्हारे शरीर को नष्ट कर सकते हैं किन्तु तुम्हारी आत्मा को नहीं मार सकते। बस उस परमेश्वर से डरो जो तुम्हारे शरीर और तुम्हारी आत्मा को नरक में डालकर नष्ट कर सकता है।'”

“‘एक पैसे की दो चिड़ियाओं में से भी एक तुम्हारे परम पिता के जाने बिना और उसकी इच्छा के बिना धरती पर नहीं गिर सकती। अरे तुम्हारे तो सिर का एक एक बाल तक गिना हुआ है। इसलिये डरो मत तुम्हारा मूल्य तो वैसी अनेक चिड़ियाओं से कहीं अधिक है।

“’जो कोई मुझे सब लोगों के सामने अपनायेगा, मैं भी उसे स्वर्ग में स्थित अपने परम-पिता के सामने अपनाऊँगा। किन्तु जो कोई मुझे सब लोगों के सामने नकारेगा, मैं भी उसे स्वर्ग में स्थित परम-पिता के सामने नकारूँगा।'”

“यह मत सोचो कि मैं धरती पर शांति लाने आया हूँ। शांति नहीं बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ।  मैं यह करने आया हूँ:

‘पुत्र, पिता के विरोध में,
पुत्री, माँ के विरोध में,
बहू, सास के विरोध में होंगे।
मनुष्य के शत्रु, उसके अपने घर के ही लोग होंगे।’

“जो अपने माता-पिता को मुझसे अधिक प्रेम करता है, वह मेरा होने के योग्य नहीं है। जो अपने बेटे बेटी को मुझसे ज्या़दा प्यार करता है, वह मेरा होने के योग्य नहीं है। वह जो यातनाओं का अपना क्रूस स्वयं उठाकर मेरे पीछे नहीं हो लेता, मेरा होने के योग्य नहीं है। वह जो अपनी जान बचाने की चेष्टा करता है, अपने प्राण खो देगा। किन्तु जो मेरे लिये अपनी जान देगा, वह जीवन पायेगा।'”

“जो तुम्हें अपनाता है, वह मुझे अपनाता है और जो मुझे अपनाता है, वह उस परमेश्वर को अपनाता है, जिसने मुझे भेजा है। जो किसी नबी को इसलिये अपनाता है कि वह नबी है, उसे वही प्रतिफल मिलेगा जो कि नबी को मिलता है। और यदि तुम किसी भले आदमी का इसलिये स्वागत करते हो कि वह भला आदमी है, उसे सचमुच वही प्रतिफल मिलेगा जो किसी भले आदमी को मिलना चाहिए। और यदि कोई मेरे इन भोले-भाले शिष्यों में से किसी एक को भी इसलिये एक गिलास ठंडा पानी तक दे कि वह मेरा अनुयायी है, तो मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि उसे इसका प्रतिफल, निश्चय ही, बिना मिले नहीं रहेगा।’”

कहानी ७६: फसल का दृष्टान्त

मत्ती १३: २४-३०; ३६-४३

Timilia wheat

यीशु स्वर्ग के राज्य के बारे में दृष्टान्तों में अपने चेलों से बात करने लगा था। बाकि कि भीड़ वहाँ थी जब यीशु नाव से प्रचार कर ही रहे थे, परन्तु अधिकतर लोगों के लिए यह कहानियां रहस्मय थीं। यीशु ने इस तरह सिखाया:

“स्वर्ग का राज्य उस व्यक्ति के समान है जिसने अपने खेत में अच्छे बीज बोये थे। पर जब लोग सो रहे थे, उस व्यक्ति का शत्रु आया और गेहूँ के बीच जंगली बीज बोया गया। जब गेहूँ में अंकुर निकले और उस पर बालें आयीं तो खरपतवार भी दिखने लगी।  तब खेत के मालिक के पास आकर उसके दासों ने उससे कहा, ‘मालिक, तूने तो खेत में अच्छा बीज बोया था, बोया था ना? फिर ये खरपतवार कहाँ से आई?’

 “तब उसने उनसे कहा, ‘यह किसी शत्रु का काम है।’

“उसके दासों ने उससे पूछा, ‘क्या तू चाहता है कि हम जाकर खरपतवार उखाड़ दें?’

“वह बोला, ‘नहीं, क्योंकि जब तुम खरपतवार उखाड़ोगे तो उनके साथ, तुम गेहूँ भी उखाड़ दोगे। जब तक फसल पके दोनों को साथ-साथ बढने दो, फिर कटाई के समय में फसल काटने वालों से कहूँगा कि पहले खरपतवार की पुलियाँ बना कर उन्हें जला दो, और फिर गेहूँ को बटोर कर मेरे खते में रख दो।’”

इस दृष्टान्त का मतलब क्या हो सकता है उसकी कल्पना कर सकते हैं आप? खैर, चेले सुनिश्चित नहीं थे, इसलिए भीड़ के जाने के बाद उन्होंने यीशु से पूछा। उन्होंने कहा :

“‘जिसने उत्तम बीज बोया था, वह है मनुष्य का पुत्र। और खेत यह संसार है। अच्छे बीज का अर्थ है, स्वर्ग के राज्य के लोग। खरपतवार का अर्थ है, वे व्यक्ति जो शैतान की संतान हैं।  वह शत्रु जिसने खरपतवार बीजे थे, शैतान है और कटाई का समय है, इस जगत का अंत और कटाई करने वाले हैं स्वर्गदूत। ठीक वैसे ही जैसे खरपतवार को इकट्ठा करके आग में जला दिया गया, वैसे ही सृष्टि के अंत में होगा। मनुष्य का पुत्र अपने दूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य से सभी पापियों को और उनको, जो लोगों को पाप के लिये प्रेरित करते हैं, इकट्ठा करके धधकते भाड़ में झोंक देंगे जहाँ बस दाँत पीसना और रोना ही रोना होगा। तब धर्मी अपने परम पिता के राज्य में सूरज की तरह चमकेंगे। जो सुन सकता है, सुन ले!'”

आप देखा कैसे यीशु ने मानव इतिहास में होने जा रहेबातों को समझाने के लिए एक खेत पर कि चीजों को इस्तेमाल किया? यह एक महत्वपूर्ण सन्देश था क्यूंकि यह हमें दुनिया के बारे में बहुत कुछ सिखाता है और कैसे परमेश्वर अपने समय में कार्य कर रहा है। जब यूहन्ना ने स्वर्ग के राज्य के बारे में सिखाया और जब यीशु आये और पहली बार प्रचार किया, उन्होंने सब को पश्चाताप करने कि चेतावनी दी थी। प्रभु का दिन आ रहा था। हर एक सुनने वाले को जो इन वचनों को सुनता है, उसे बदलाहट लाने का अद्भुद मौका दिया जाता था। उनका निर्णय यह दर्शाता कि यदि वे परमेश्वर के लिए जमा किये जाने वाले कीमती गेहूं हैं, वे बेकार जंगली पौधे हैं जो जला दिए जाएंगे। इनका कोई विकल्प नहीं है।

जब यीशु ने और यूहन्ना ने स्वर्ग राज्य के विषय में पहला प्रचार किया, उन्होंने कहा कि स्वर्ग का राज्य निकट है। अब यीशु बता रहे थे कि वह इस युग के खत्म होने पर आ जाएगा। यह तो बहुत लम्बा समय मालूम होता है! इसका क्या अर्थ था? इस दृष्टान्त में, यीशु बता रहे थे कि जब गेहूं उगेगा। एक किसान जानता है कि फसल उगने में कई महीने लग जाते हैं। गेहूं के उगने में बहुत से खतरे आते हैं, और यीशु ने इस कहानी में यीशु ने जंगली पौधों का उद्धारण लेते हुए बताया कि फसल को कौन नष्ट करता है। उस समय, शैतान राज्य को तोड़ने के लिए पापी और विद्रोही लोगों को प्रभु के लोगों के बीच में लेकर आएगा। परमेश्वर ऐसा होने देगा ताकि वे जो वफादार हैं उन्हें चोट लग सकती है। सो वह उस महान दिन के लिए रुकेगा जब गेहूं और जंगली पौधों को अलग किया जाएगा।

जो समय गेहूं उगने का है वह समय यह है जिसमें हम हैं! यीशु ने आकर सुसमाचार के बीज को संसार में उगाया। उसके मृत्यु और जी उठने के बाद, उसके उगने में उसके चेले मदद करेंगे। हम उस उगने के समय में हैं! यह दृष्टान्त हमारे बारे में है। हम में से जिन्होंने यीशु पर विश्वास किया है, हम समझ सकेंगे कि क्यूँ दुष्ट लोगों को परमेश्वर के राज्य में लोगों के बीच में कार्य करने दिया जा रहा है।

जब भीड़ और धार्मिक अगुवों ने यह कहानी सुनी, वे केवल किसान कि बात तक ही समझ पाते हैं। उसके पीछे का सामर्थी अर्थ उनसे छुपा रहेगा। केवल चेले और जो यीशु के करीब हैं वही समझ सकते हैं। जब उन्हें यीशु के चमत्कारों और शिक्षण के द्वारा परमेश्वर के महान विश्वास के विषय में बताया गया, उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। उनके ह्रदय कठोर थे, और जितना सत्य वे सुनते उनके ह्रदय और कठोर होते जाते। इसलिए यीशु ने अपने उपदेश को सीखने के लिए उसका तरीका ही बदल डाला। लेकिन कुछ तरीकों में, उन्होंने सन्देश को ही बदल डाला।

जब यीशु राज्य के विषय में सन्देश लेकर आये, वे एक अद्भुद प्रस्ताव लेकर आये। वे उन महान भविष्वाणियों को पूरा करेंगे, अपने मसीहा को अपनाएंगे और एक विजयी राष्ट्र बनेगा जो पूरे संसार के लिए आशीष का कारण बनेगा। लेकिन अपने पापों कि गहराई में, उन्होंने मुक्तिदाता को ही अस्वीकार कर दिया। उन्होंने परमेश्वर के ज्ञान के विषय में सुना था, तो उसे अपने पॉव के नीचे कुचल डाला। जैसे आदान के बाग़ का पाप था ठीक वैसा ही यह भी था। उन्होंने परमेश्वर कि ना सुनकर शैतान कि सुनी।

अब, मानवता के इतिहास में इस जबरदस्त मोड़ पर, प्रभु का अनुग्रह प्रस्ताव एक राष्ट्र के रूप में इसराइल से दूर किया जा रहा था। यह दूसरों को, जिनके मन शक्तिशाली पवित्रता और दुनिया के उद्धारकर्ता के प्यार को स्वीकार करेंगे उन लोगों के लिए दिया जा रहा था। मसीह को इस दुनिया में लाने के लिए परमेश्वर ने जो कार्य किया उन्होंने अब्राहिम के वंश के द्वारा कार्य किया और एक महान राष्ट्र बनाया। सरे विश्वके लिए वे आशीष का कारण होने जा रहे थे।इस्राएल के पापों और असफलता के बावजूद परमेश्वर संसार को अशिक्षित करने के लिए अपनी योजनाओं को जारी रखेगा। यीशु के नय राज्य के विषय में सन्देश उसके चेलों को सिखाएगा कि परमेश्वर ने कैसे यह सब करने कि योजना बनाई है।