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कहानी १७४: कब्र और इंतज़ार की घड़ी 

मत्ती २७:५७-२८:८, मरकुस १५:४२-१६:११, लूका २३:५०-२४:११, यूहन्ना १९:३८-४२

Cementary of  Pere Lachaise in Paris

मसीह के शरीर को क्रूस से उतार लिया गया। एक आदमी था जिसका नाम था अरिमथिया का यूसुफ़ था, जो यीशु पर विश्वास करता था और गुप्त में उसका चेला था। वह एक सच्चा शिष्य था, लेकिन वह महासभा का भी सदस्य था। परमेश्वर के खिलाफ यहूदी नेतृत्व की नफरत इतनी ज्यादा थी कि यूसुफ इस बात का खुलासा करने में डरता था। अगर वे उसके खिलाफ हो गए, तो वह सब कुछ खो देगा।

उस दिन के भयानक अन्याय पर उसे कितना शोक हुआ होगा . . ये वह आदमी थे जिसके साथ उसने अपना जीवन बिताया था। वह उस ज़माने के कुलीन वर्ग थे जिसकी वजह से उसने अपने विश्वास को दबा के रखा था। उसे उनके प्रतिघातक व्यवहार से कितनी घृणा होती होगी। मसीह के लिए खड़े होने के लिए बहुत देर हो चुकी थी। कम से कम वो उसकी मौत में उसे सम्मान दे सकता था। सप्ताह की घटनाए ऐसे थी कि यह खबर, कि महासभा का एक सदस्य यीशु को इतना सम्मान दे रहा है, पूरे इस्राएल में फैल जाती। इसको दुश्मन के साथ दोस्ती के रूप में देखा जाता। लेकिन यूसुफ पेंतुस पीलातुस के पास गया और मसीह के शरीर को दफ़नाने के लिए इजाज़त मांगी। एक बार फिर, इस आदमी यीशु के मामले पीलातुस के सामने आए। उसने अपनी सहमती इस आदमी को दे दी जो स्पष्ट रूप से यीशु का भक्त था।

यूसुफ मसीह का शरीर मांगने गया। निकोदेमुस मदद के लिए आया था। वह अपने साथ चौतीस किलो मुसब्बर लोहबान लाया, वो सामग्री जो यहूदी मृत के संरक्षण के लिए परंपरागत रूप से प्रयोग करते थे। निकोदेमुस भी मसीह का एक शिष्य था, और यूसुफ की तरह, उसने भी इसे छिपा रखा था। वो रात में प्रभु से सवाल पूछने के लिए आता था क्यूंकि उसे डर था कि इस बात को जानने के बाद कि वो यीशु पर विश्वास करता है, नेतृत्व उसके साथ कुछ भी कर सकती है। नेतृत्व का रोष कम नहीं हुआ था, लेकिन मसीह के उज्ज्वल पवित्रता के खिलाफ उनके महान अपराधों ने निकोदेमुस को कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा। उनकी मृत्यु में भी, प्रभु यीशु उसकी वफादारी के हकदार थे। वो उन सभी बातों के लिए खड़ा होगा जो यीशु था। वह उसको अब आदर देगा, चाहे उसकी कोई कीमत क्यों न हो।

उन्होंने यीशु का शरीर लिया और उसे चादर के साथ मसाले में बाँधा। जिस जगह यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, उसके पास एक बगीचा था। वहां एक कब्र थी जिसमे किसी को भी पहले दफन नहीं किया गया था। यह जगह जाने माने, अमीर लोगों की अंतिम विश्रामस्थल थी। और क्यूंकि यह कबर क्रूस के पास थी, यह लोग सूर्यास्त और सबत से पहले, यीशु के शरीर को तरीके से दफना सके। एक बार फिर, उन्होंने अनजाने में वचन की पूर्ती की। यशायाह 53:9 में लिखा है: “और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का अपद्रव न किया या और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।”  जब वे कब्र में मसीह को छोड़ कर निकल रहे थे, उन्होंने एक बड़े पत्थर को प्रवेश द्वार पर लुढ़का दिया। मरियम मगदलीनी और याकूब की माता मरियम उनके पीछे आए ताकि वह यह जान सके कि मसीह को कहाँ दफनाया गया था। तब वे मसाले खरीदने के लिए बाहर चली गई। वे यीशु को एक उचित दफन देने साबत के बाद लौटने को थी।

शुक्रवार शाम हो गई, और फसह का सबत शुरू हुआ। इसराइल भर से परिवार जो सफ़र करके आए थे, वो अपने पूर्वजों के परमेश्वर के साथ जश्न मनाने और आराम करने के लिए एक साथ इकट्ठे हुए। शनिवार की बाकी भी ऐसे ही गई। किसी को कोई काम नहीं करना था। पूरा देश अपने परमेश्वर के अद्भुत काम का लुप्त उठाने का अवकाश ले रहा था। यरूशलेम  में एक दिन पहले, शहर को उल्टा करने वाली घटनाओं से उनका दिमाग भरा हुआ था। क्या उनमें से किसी के पास यह देखने के लिए आँखें थी कि यह सब परमेश्वर के सबसे बड़े काम का उत्प्रवाह है?

जबकि इसराइल में बाकी सब सबत का सम्मान कर रहे थे, फरीसी और महायाजक व्यस्त थे।उनके पास कुछ काम था। यीशु ने कब्र से फिर से उठने का दावा किया था। क्या या हो सकता था कि उसके चेले उसके जी उठने की जालसाजी कर रहे हो? इससे उनको यह सब साफ़ करने के लिए एक नया झंझट पैदा होगा! वे सालों के लिए यह विधर्म लड़ते रहेंगे। कैसी विडंबना है कि यह मनहूस नेताओं ने मसीह के शब्दों को याद किया। उसके अपने ही शिष्य यह पूरी तरह से भूल गए थे! वे ऐसी आशा के लिए दु: ख में निगले हुए थे। लेकिन यहूदी नेता यह नहीं जानते थे और वे एक और अनुरोध के साथ पिलातुस के पास वापस गए।

हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमानेवाले ने आपको जीते जी कहा या, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। 
सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहनें लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।  -मत्ती २७:६३-६४

कल्पना कीजिए कि यह अनुरोध सुनके पिलातुस को कैसा लगा होगा। यह यीशु जो एक अदृश्य देश का राजा होने का दावा कर रहा था, वही यीशु मरे हुओं में से जिंदा होने को दावा कर के गया था। वह इस सब से क्या समझे? पिलातुस ने उन्हें देखा और कहा, “‘तुम्हारे पास एक गार्ड है। जाओ और उस जगह को सुरक्षित कर लो, जैसे तुम जानते हो।”

अगर यहूदी नेता सही थे, और चेले एक धोखाधड़ी करना चाहता थे, उन्हें उच्च प्रशिक्षित, भारी हथियारों से लैस रोमन सैनिकों के सामने होकर गुज़ारना होगा। इसकी संभावना नहीं थी। यीशु के चेले वही आदमी थे जो बगीचे में भाग गए थे। क्या वे वास्तव में, सैनिकों को उनके स्वामी को क्रूस पर चढ़ाने के बाद देखकर, इतनी साहस जुटा पाते कि वो उन भयानक पहरेदारों का सामना कर सके? कोई भी आम नागरिकों की टोली, तैनात रोमी सैनिकों के सामने से नहीं गुज़र सकती थी; यह अनसुना था। पिलातुस यह जानता था कि अगर यह एक धोखा था, कब्र खाली होने का कोई रास्ता नहीं था।  दूसरी ओर अगर यीशु वास्तव में वही थे जिसका वो दावा कर रहे थे, तो सभी दांव अमान्य थे। अगर यीशु दिव्य थे, तो कब्र पर तैनात कितने सैनिक थे, इस बात का कोई महत्व नहीं था।

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कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

कहानी १६७: पीलातुस और हेरोदेस के पास 

मत्ती २७:१-२,११-१४; मरकुस १५:१-५; लूका २३:१-१२; यूहन्ना १८:२८-३७

Neuberg and der Murz - paint of Jesus judgment for Pilate (1505)

पेंतुस पीलातुस के जैसे आदमी के लिए, यहूदी महासभा के पुरुष एक हास्यास्पद भीड़ की तरह होंगे। पिलातुस रोमी राज्यपाल था जिसे दुनिया में सबसे शक्तिशाली आदमी द्वारा नियुक्त गया था – रोमी कैसर। रोमी साम्राज्य ने ज्ञात दुनिया पर विजय प्राप्त की और सैकड़ों वर्ष के लिए इतिहास पर प्रभुत्व की। इस्राएल के देश का नक्षा एक तुच्छ धब्बे की तरह लगता था। उनके धार्मिक नेता भी हर रूप में भ्रष्ट, और सत्ता के भूखे थे- ठीक रोमी राजनीति में खेलने वालों की तरह, पर बिना उस आकर्षण और चमक धमक के। वे एक राष्ट्र के रूप में स्वयं के महत्व से भरे थे, जो बाकि दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती थी। रोमियों के लिए इन पर आँखे चड़ाना आसान था, लेकिन पिलातुस के लिए, वे एक वास्तविक खतरा थे। यहूदी नेतृत्व का लोगों पर जबरदस्त प्रभाव था। वे एक विद्रोही उन्माद में भीड़ को उकसा सकते थे। जो आखरी चीज़ पिलातुस चाहता था वो था रोम को एक रिपोर्ट कि वह अपनी सत्ता को कायम नहीं रख सकता है।

जब महासभा यीशु के साथ पहुंची, उन्होंने अंदर कदम रखने से इनकार कर दिया। यह एक बड़ा किला था जहाँ रोमी राज्यपाल रहता था, और इसलिए उसकी भूमि अशुद्ध थी। अगर यहूदी अंदर चले जाते, तो वे अशुद्ध हो जाते। वो फसह के बाकी के पर्व को मनाने के लिए अयोग्य हो जाते। पिलातुस यहूदियों के धार्मिक रीति रिवाजों के प्रति संवेदनशील था, इसलिए वह उनसे मिलने के लिए बाहर चला गया। वहां वो यीशु के सामने खड़ा हो गया, जिसके हाथ पैर एक आम कैदी की तरह बंधे हुए थे। उनका चेहरा चोट के निशान से भरा हुआ था। इस साधारण आदमी ने कैसे इन शक्तिशाली पुरुषों को ऐसे आक्रोश में डाल दिया, और वो भी उनके त्योहार के चरम बिंदु पर? और वे उसे वहां क्यूँ ला रहे थे?

“‘तुम इस आदमी के खिलाफ क्या आरोप लगते हो?'” पिलातुस ने पूछा।

“‘अगर यह आदमी बुराई का कर्ता नहीं होता, हम इसे आप के पास नहीं लाते,” उन्होंने कहा। “‘हमने इस आदमी को हमारे देश को गुमराह करने और कैसर को कर का भुगतान मना करने का, और खुद को मसीह -एक राजा घोषित करने के अपराध में पाया है!'”

ज़ाहिर है, यह आरोप झूठे थे। और यह उन आरोपों से काफी अलग थे जो उन्होंने अपने स्वयं की कार्यवाही में घोषित की थी। लेकिन पेंतुस पीलातुस और रोमी साम्राज्य इस बात की परवाह नहीं करते थे कि कौन अपने को यहूदी मसीह बोलता है, और वे इसके लिए मौत की सजा कभी नहीं देते। यहूदी नेतृत्व इस से अच्छी तरह परिचित थी, इसलिए उन्होंने झूठे आरोप बनाए ताकि वो पिलातुस को यीशु को मौत के सजा सुनाने के लिए विश्वास दिला सके। वे यह बोल रहे थे कि यीशु ने अपने को रोमी कैसर की शक्तियों के मुकाबले किया। यह एक इतना हास्यास्पद दावे की तरह लग रहा था कि पिलातुस ने इसे आसानी से खारिज कर दिया। उसने कहा, “‘उसे अपने आप ले जाओ और अपने खुद के कानूनों द्वारा उसका न्याय करो।”

“‘हम कानूनी रूप से किसी को मौत की सज़ा नहीं सुना सकते है,” उन्होंने  उत्तर दिया।

आह। उनके आने का असली कारण पता चल रहा था। वे जंजीरों में इस आदमी को मारना चाहते थे। रोमी लोग अपने न्याय की नीतियों पर गर्व करते थे, और पीलातुस जानता था कि धार्मिक नेताओं को उसे सच बताने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे कोई दूसरे रास्ते से पता लगाना होगा कि असल बात क्या थी। तो उसने यीशु को अंदर बुलाया ताकि वे अकेले में उनसे बात कर सके।

“‘क्या तुम यहूदियों के राजा हो?'” उसने पुछा। अब, रोमी राज्यपाल भी यह सुझाव दे रहा था कि यीशु एक राजा हो सकता है!

“‘क्या आप अपनी स्वयं की पहल पर यह कह रहे हैं, या क्या दूसरों ने आपको मेरे बारे में बताया है?'” यीशु ने उत्तर दिया।

“‘मैं एक यहूदी तो नहीं हूँ, हैना?” पिलातुस ने कहा। “‘तुम्हारे अपने ही देश और महायाजक ने तुमको मुझे सौपा है। तुमने क्या किया है?”

क्या यह दिलचस्प नहीं है कि पिलातुस यहूदियों के बातों से ज्यादा यीशु को सुनना चाहता था? वो प्रभु को उनके भ्रष्ट नेतृत्व के उन्माद के उपरान्त, अपना नाम साफ़ करने का मौका दे रहा था।

यीशु ने उत्तर दिया: “मेरा राज्य इस दुनिया का नहीं है। अगर मेरा राज्य इस दुनिया का होता, तो मेरे दास जंग छेड़ रहे होते ताकि मै यहूदियों को न सौपा जाऊं; लेकिन, मेरा राज्य इस दायरे से नहीं है। ‘”

कल्पना कीजिये कि उनका जवाब पिलातुस को कितना अटपटा लगा होगा। उसने यीशु से पुछा: “‘तो तुम एक राजा हो?”

प्रभु ने उसे बोला: “‘आपने मुझे राजा कहकर सही बोला है। मैं इसलिए पैदा हुआ हूँ, और इसलिए दुनिया में आया हूँ ताकि मैं सच के लिए साक्षी दे सकूं। जो कोई मेरी आवाज सुनता है, सच्चाई सुनता है।'”

“सच्चाई क्या है? ‘” पिलातुस ने कहा।

यह स्पष्ट था कि यीशु रोमी साम्राज्य के लिए कोई वास्तविक खतरा नहीं थे। रोम, दार्शनिकों और शिक्षकों से भरा था जो अपना जीवन उच्च विचारों पर चर्चा करके बिताते थे, और वे एक अहिंसक भीड़ थे। पिलातुस यह नहीं समझा कि यीशु ही वास्तव में सत्य है, जो जिंदा और मनुष्य के रूप में अवतीर्ण हैं, और यह कि वह पिलातुस द्वारा पूछे गए हर गंभीर सवाल का जवाब दे सकते थे। लेकिन वो यह जानता था कि यह आदमी मौत के योग्य नहीं है। वो बाहर महासभा के मंथन गुस्से में चला गया और घोषणा की, “‘मैं उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ।'”

महायाजक और बड़े बहुत कठोरता से यीशु पर आरोप लगाने लगे। उनके उठे हाथों और हिंसक जुनून में उठाए आवाज की कल्पना कीजिये। यीशु उनके व्यंग्य का सामना करते हुए, चुपचाप, पूर्ण संतुलन में खड़े रहे। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। लोगों को सच्चाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पिलातुस चकित था। वह यीशु को वापस अंदर ले गया और उससे कहा: “क्या तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है? देखो वो तुम्हारे खिलाफ कितना दोष लगा रहे हैं!”

पिलातुस यीशु के पास वहाँ खड़े होकर उन्हें कुछ बोलने के लिए उत्साहित कर रहा था ताकि वो यीशु के बचाव में कुछ कह सके। लेकिन यीशु ने पहले से ही सच्चाई पर पिलातुस के सवालों का जवाब दे दिया था, और उन्हें अधिक कहने के लिए कुछ भी नहीं था।

पिलातुस यीशु पर हैरान था। यीशु के शाही, आत्मसमर्पित शान्ति के विपरीत, धार्मिक नेता गंभीर से गंभीर सजा की मांग करते रहे। “‘वह यहूदिया भर में शिक्षण देता है – गलील से शुरू करके और यहाँ इतनी दूर तक वो लोगों को उकसाता है।'”

पिलातुस के आगे एक समस्या बड़ती जा रही थी। वो जानता था कि लोग झूठ बोल रहे थे और आरोप झूठे थे, लेकिन वे इसे जाने के लिए राज़ी नहीं थे। और इस यीशु ने खुद का बचाव करने से इनकार कर दिया था। वह अपने को इस झंझट से बाहर कैसे निकले?

जब उसने सुना कि यीशु गलील से नीचे आया है, उसने पूछा था अगर यीशु  वास्तव में एक गलीली था। क्यूंकि बात असल में यह थी कि हेरोदेस अन्तिपस उस क्षेत्र के उत्तरी भाग पर शासक नियुक्त किया गया था, तो फिर पेंतुस यह मामला उसे सौप देता। हेरोदेस को उसके बजाय इस झंझट को संभालना पड़ता!

हेरोदेस उस समय यरूशलेम में था, तो पिलातुस ने यीशु को उसके पास भेज दिया। हेरोदेस यीशु के आने पर खुश था। उसने उन सब चमत्कारों के बारे में सुना था और चाहता था कि यीशु उसके लिए कोई चिन्ह का प्रदर्शन करें। इस हेरोदेस को लोगों को एक तार पर टंगे कठपुतलियाँ बनाकर इस्तेमाल करने की आदत थी क्यूंकि उसे इससे रोमांच होता था। उसने एक बारअपनी युवा सौतेली बेटी को अपना आधा राज्य देने का वादा किया था क्योंकि उसने अपने नृत्य के साथ उसके मेहमानों को खुश किया। उसकी भयानक इच्छा थी एक थाली पर यूहन्ना बप्तिस्मा देने वाले का सर। राजा हेरोदेस को इस तरह का विद्रोही अनुरोध मना करने का साहस नहीं था, और इसलिए यीशु के चचेरे भाई को उसी दिन मौत का सामना करना पड़ा।

यह सोचना दिलचस्प है यीशु की उन प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिक्रिया क्या थी जो पिता उसके मार्ग में लाए थे। जिनके दिल खुले लेकिन चोट खाए हुए थे, उनके लिए वह चमत्कार और सच्चाई का संदेश लाए। शिष्यों या निकोदेमुस या मार्था और मरियम की तरह विश्वास में उनके साथ खड़े होने वालों के लिए, उन्होंने परमेश्वर के रहस्यों के बारे में गहरे से गहरा खुलासा किया। यीशु ने पीलातुस के सवालों के जवाब इज्ज़त और सम्मान से दिया – अपने उच्च, अनन्त राज्य के बारे में रहस्य एक ऐसे आदमी के साथ बांटा जो अधिकार के स्तरों और दुनिया में शासन के बारे में बहुत समझटा था। परमेश्वर के अपने लोगों के कड़े – दिल, धार्मिक नेताओं के लिए, वह पश्चाताप करने के लिए और परिवर्तन लाने के अवसरों के साथ बार – बार आए। जब उन्हें मारने के लिए कार्यवाही चल रही थी, तो उन्होंने जवाब नहीं देने का कारण यह बताया कि वो नहीं सुनेंगे। यह छोटी सी स्पष्टीकरण भी उनके नेताओं को मन बदलने के लिए एक ‘दरवाजे में एक दरार’ का एक अवसर प्रदान करती थी।

यीशु ने प्रत्येक व्यक्ति से उनके जरूरत के स्थान पर मुलाकात की और खुद को ऐसे दिया जिसको वो समझ नहीं सकते थे, प्रत्येक को उतना उभारा जितनी आत्मा ने उन्हें अनुमति दी। यहाँ तक कि उनकी चेतावनी भी एक दया थी, क्योंकि वह एक दयावंत परमेश्वर की चेतावनियाँ थी। तो यह देखना दिलचस्प है कि जब प्रभु को हेरोदेस के सामने लाया गया था, यीशु ने पत्थर जैसी चुप्पी बनाई रखी।

धार्मिक नेता अपने आरोपों और मांगों के साथ आए थे। हेरोदेस को उनके लिए कोई बड़ा स्नेह नहीं था। उन्होंने एक दूसरे के प्रति आपसी अवमानना ​​में लंबे साल बिताए थे। इसके पश्चात, वह सवाल के बाद सवाल के साथ यीशु की ओर मुड़े, लेकिन यीशु के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था। परमेश्वर का पुत्र, परमेश्वर की शक्ति और सच्चाई का इस्तेमाल इस घृणित आदमी द्वारा अपने खुद के मनोरंजन के लिए अनुमति नहीं देगा। जैसे ही हेरोदेस को यह एहसास हुआ कि उसका यीशु पर कोई बोलबाला नहीं था, उसका मोह उपहास में बदल गया। उसने इस भटकते उपदेशक के साथ मनोरंजन का एक और रास्ता निकल लेगा। वह और उसके साथ सैनिक प्रभु का ठठ्ठा उड़ाने लगे। उन्होंने एक राजा के लायक एक खूबसूरत, शाही वस्त्र लेकर उसके कन्धों एक चारों तरफ बाँध लिया, और इस बढ़ई के शाही सत्ता के योग्य होने के दावे को तिरस्कृत करने लगे। तब उन्होंने यीशु को वापस पिलातुस के पास भेजा। उस समय तक, हेरोदेस और पीलातुस के बीच एक शांत दुश्मनी रही थी। पर जब दोनों को इस शांत उपदेशक के खिलाफ परिहासशील यहूदी नेताओं का सामना मिलकर करना पड़ा लेकिन, उनको एक जुट होने का मौका मिला। वे महासभा से घृणा करते थे, और सच्चा राजा जब आया, तो अपने घुटने झुकाने में विफल रहे। उस दिन से, वे दोस्त बन गए।

कहानी १६६: सरकारी कार्यवाही 

मत्ति २७:१-१०; मरकुस १४:४८-६५; लूका २२:५२, ६३-७१; यूहन्ना १८:२४-२६

Jesus Faces Pontius Pilate

धार्मिक शासकों ने उनकी गिरफ्तारी की रात से पहले ही यीशु की कार्यवाही के परिणाम का फैसला कर लिया था। उनको यह सुनिश्चित करना था कि यह उनकी मौत के साथ समाप्त होगी।वो बहुत ज्यादा खतरनाक था। लेकिन कैफा के घर में मसीह के साथ गुप्त रूप से धौस जमाना अवैध था। क्यूंकि यह रात के अंधेरे में आयोजित किया गया था, उनके निर्णय में कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं थी। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, उनको पूरे महासभा के सामने, दिन की रोशनी में एक पूर्ण पैमाने पर यह कार्यवाही आयोजित करनी थी। लेकिन दिन के उजाले में, यरूशलेम की सड़कों पर फसह पर्व की भीड़ भी एकत्रित होती। यीशु बेहद लोकप्रिय थे, और उसकी गिरफ्तारी की खबर तेजी से फैल जाती। याजक जानते थे कि अगर लोगों को यह पता चले कि यीशु एक अपराधी ठहराया गया है, तो एक गंभीर विद्रोह हो सकता था। तो सुबह तडके, भीड़ के जागने से पहले, वे इस कार्यवाही को महायाजक के घर से सामान्य वकील कक्ष में ले गए।

महायाजक और पुरनी यीशु की मृत्यु पर चर्चा करने के लिए इकट्ठे हुए। तब वे प्रभु को आगे लाए और उनसे पूछा, “‘अगर तुम मसीह हो, तो हमें बताओ।'”

यीशु ने उत्तर दिया:  “‘अगर मैं आपको बताऊंगा, तो आप यकीन नहीं करेंगे, और अगर मैं एक सवाल पूछू, तो आप जवाब नहीं देंगे।” वह जानते थे कि उनके पास इन लोगों के साथ बात करने के लिए कोई कारण नहीं था। तो उन्हेंने उनके जानलेवा महत्वाकांक्षाओं को औचित्य साबित करने के लिए जानकारी दे दी:
” लेकिन अब से, मनुष्य का पुत्र परमेश्वर की शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठेगा'”

वाह। एक बार फिर, यीशु ने ना केवल यह घोषित किया कि वह दिव्य थे, लेकिन यह कि वह परमेश्वर के सिंहासन से पृथ्वी पर सत्ता में राज करेंगे। क्या उनमे से कोई यह सुन कर काँप उठा? क्या उनमें से किसी ने इसकी सच्चाई के बारे में चिंता नहीं करी? यदि उन्होंने किया भी, तो उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा। “‘हमें आगे और गवाही की क्या जरूरत है?'” उन्होंने डाह से घोषणा की। “‘हमने उसके ही मुंह से अपने आप सुना है।'”

अब, यहूदा अभी भी आसपास छिपा देख रहा था कि क्या होने जा रहा था। जब उसने देखा की कार्यवाही बदतर होती जा रही है, उसे एहसास हुआ कि उसके पूर्व गुरु की मौत जल्दी आ रही है। अचानक, वह पश्चाताप से भर गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था कि बात यहाँ तक पहुँच जाएगी! वह अपने चांदी के तीस टुकड़ों के साथ महायाजक के पास गया। “‘मैंने निर्दोष खून को धोखा देकर पाप किया है।'”

वे अवमानना ​​के साथ यहूदा को देखने लगे। एक निष्पक्ष सुनवाई की गवाही में, इस तरह का एक बदलाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। यह कोई साधारण गवाह नहीं था, यह वही था जिसने यीशु को पकड़वाया था। निश्चित रूप से, उसके शब्दों को भारी वजन मिलते – इसलिए क्यूंकि वो यीशु के आंतरिक चक्र का एक सदस्य था! देशद्रोही अपनी बेगुनाही की घोषणा करने आया था! लेकिन धार्मिक नेता यीशु को मारने की अपनी योजना के रास्ते में आई कोई जानकारी में दिलचस्पी नहीं रखते थे। “‘हमें इससे क्या लेना देना? इसको अपने आप देख लो! ‘”वे बोले।

यहूदा ने मंदिर में ही चांदी के सिक्के फेके और भाग गया। अपने दुख और निराशा में, वह एक खेत में गया और खुद को गर्दन से लटका दिया। दिन की भयावहता फैल रही थी।

नेता जानते थे कि वह यह सिक्के मंदिर के खजाने में नहीं डाल सकता थे। यह खून का पैसा था। यह कलंकित था। उन्होंने इस बात को अनदेखी किया कि वे विश्वासघात खरीदने के लिए पैसे का उपयोग करने से, उस पैसे से ज्यादा कलंकित थे। उन सिक्कों से ज्यादा, परमेश्वर के मंदिर में इन याजकों की कोई जगह नहीं थी। सभी सच्ची धार्मिकता पूरी तरह से त्यागी हुई थी, लेकिन वे, खुद के साथ भी, इस ढोंग को ज़ारी रखते रहे। उन्होंने यहूदा के चांदी के सिक्कों से ‘पॉटर फील्ड’ नामक एक क्षेत्र को खरीदा – यह एक जगह थी जहाँ राष्ट्र के लिए अजनबी को दफन किया जाता था। आने वाले महीनों और वर्षों में, यह “, हकेल्दामा” के नाम से जाना गया, या ‘रक्त का खेत।’

और परमेश्वर का वचन पूरा किया गया। यह वैसे हुआ जैसे यिर्मयाह ने कहा था:
न्‍होंने वे तीस सिक्के अर्थार्थ उस ठहराए हुए मूल्य को (जिसे इस्‍त्राएल की सन्‍तान में से कितनोंने ठहराया था) ले लिए।
और जैसे प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी, वैसे ही उन्‍हें कुम्हार के खेत के मूल्य में दे दिया।।

जैसे यीशु की कार्यवाही का दिन चल रहा था, प्रभु के सच्चे अनुयायी बिखरे हुए थे। महासभा ने उनके परमेश्वर को दोषी ठहराया और उसे बाध्य कर दिया। अब जब उनका खुद का फैसला औपचारिक हो गया था, उन्होंने यीशु को रोमी राज्यपाल के सामने ले जाने का फैसला किया। असल में,  महासभा की शक्ति बहुत सीमित थी। वे वास्तव में अपने देश पर राज नहीं करते थे। रोमी साम्राज्य ने उन्हें राज्य में कुछ आजादी दी थी, लेकिन प्राधिकरण के असली मुद्दों में, वे अप्रासंगिक थे। वे यहूदी लोगों पर हावी हो सकते थे जो परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उनके साथ सम्मानजनक थे। वे अपने प्रतिष्ठा के बल का उपयोग कर उन्हें डरा धमका सकते थे। लकिन सच्चाई यह थी कि जो कुछ भ वो करते थे, उसे रोम के आदेशों के साथ अनुकूल होना था। उनके पास किसी पर मौत की सजा सुनाने की कोई शक्ति नहीं थी। अगर वे चाहते थे कि यीशु को मारा जाए, तो उन्हें उसे रोमी राज्यपाल के पास ले जाना पड़ता था, क्यूंकि यह निर्णय उन्ही के हाथों में था।

जिस रोमी सम्राट को यहूदिया के नेत्रित्व में डाला गया था, उस आदमी का नाम पेंतुस पीलातुस था। वह क्रूर होने के लिए जाना जाता था, और वह यहूदी लोगों से सख्त घृणा करता था। वे एक क्षुद्र, अपरिष्कृत समुदाय था जिसके लोग हमेशा एक दुसरे से छोटी छोटटी बातों में युद्ध करते थे। रोम की भव्यता और उसके शानदार इमारतों, उनके शानदार सेनाओं में प्रदर्शित विशाल शक्ति, साम्राज्य भर में स्थापित अविश्वसनीय सामाजिक आदेश, और उनके राजनीतिक प्रणाली की भव्यता की तुलना में, इसराइल पृथ्वी में एक बेजोड़, पिछड़ा छेद लगता था।

पिलातुस एक ऐसी धूल भरी, फुटपाथ जैसे राज्य पर शासन के सौंपे जाने पर खुश नहीं था –  थिस्सलुनीके या इफिसुस की तरह विशाल महानगरों के मामलों और सुख से इतनी दूर। यह एक अपमान था। लेकिन उसकी जगह उन शक्तिशाली पुरुषों के साथ बहस करने के लिए नहीं थी जिन्होंने उसे वहां रखा। अगर वह उनकी अच्छी तरह से सेवा करता, तो शायद वे उसे एक अधिक सहमत स्थल के लिए उसे बढावा देते – ऐसा जो वास्तविक सत्ता और प्रतिष्ठा की हो। रोम को उसके साथ खुश रहना था, इसलिए यह इसका फ़र्ज़ था कि वह दुनिया के इस कोने में शांति बनाए रखे। तो जब यीशु की कार्यवाही के दिन पूरी महासभा रोमी सेनापति के रियासत में गुस्से से घुसी, उसने इस बात पर ध्यान दिया। यह बात आखिरकार कहाँ तक जएगी?

कहानी १६५: महायाजक के लिए एक अँधेरी रात 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

roman soldier and prisoner

यीशु को अन्नास के घर से कैफा के घर ले जाया गया। पतरस अभी तक पीछे पीछे आ रहा था। जैसे ही यीशु को महासभा के उन सदस्यों के समक्ष लाया जा रहा था जो इतनी रात वहां आए, पतरस आँगन में चला गया। वह अधिकारियों के साथ, आग के पास, बैठ गया ताकि उसे परिणाम पता चले, और उसे अपने प्रभु के साथ खड़ा होने के लिए अवसर मिले।

जब यीशु को लाया गया, तो महासभा ने एक के बाद एक गवाह खड़े किये जो उसके विरुद्ध साक्षी दे। उनकी कहानियाँ झूठी थी, और उनके शब्द एक दूसरे के साथ सहमत नहीं थे। वे इतने असंगत थे कि उन्होंने एक के बाद एक रद्द कर दिया गया। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, एक व्यक्ति दोषी तब पाया जाता जब दो गवाह एक ही आरोप के साथ सामने आए। यह नहीं हो रहा था, तो वे और अधिक गवाह लाए। किसी की गवाही यीशु को मौत की सज़ा सुनाने के लायक नहीं थी, और इस्राएल के शासक इससे कम कुछ नहीं चाहते थे। यीशु को मरना था। अंत में, एक गवाह आगे आया और यह दोष लगाया कि यीशु ने यह घोषणा की थी कि वह परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा। प्रभु ने कहा था कि वह तीन दिनों में मानव हाथ के बिना इसका पुनर्निर्माण करेंगे। हम जानते है कि यीशु अपने शरीर के बारे में बात कर रहे थे। वह नष्ट होने जा रही थी क्यूंकि यीशु ने अपने को परमेश्वर के हाथों सुपुर्ट किया। लेकिन यीशु को तीन दिन में पूर्णतः, जीवते प्रभु के हाथों जिला लिया जाएगा! यीशु के खिलाफ उनकी झूठी गवाही के द्वेष में, उन्होंने उसी रात इस सच्चाई की घोषणा की थी, लेकिन उनकी आँखे देखते हुए भी बहुत अंधी थी!

सच्चाई में, इन आरोपों का वास्तव में कोई मायना नहीं था।यह शासक उसे मारने के लिए उत्सुक थे, और अगर इस आरोप से उनकी बात नहीं बनी, तो वे एक और की खोज करते। तो यीशु ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। उसके आसपास के वातावरण के चेहरे में उनकी शांत, आश्वस्त संकल्प की कल्पना कीजिये।

महायाजक व्यथित था। वह उठ खड़ा हुआ और यीशु के पास गया। “‘क्या तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं हैं? यह क्या है जो यह लोग तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहे है? ”

यीशु चुप रहे। महायाजक ने खिज में आकर कहा: “‘मैं तुम्हें जीवते परमेश्वर से शपथ खा कर पूछता हूँ कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम मसीह, परमेश्वर के पुत्र हो?'”एक बार फिर, यीशु के दुश्मनो ने उसके बारे में सच की घोषणा की –  ठीक उसी कार्यवाही में जिसमे उसे दोषित किया जा रहा था। इस बार, यीशु ने जवाब दिया:

“” आप खुद ही कह चुके हैं, फिर भी, मैं आपको बताता हूँ; इसके बाद आप मनुष्य के पुत्र को शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठे देखेंगे, और आकाश के बादलों पर आते हुए देखेंगे।”

वाह! यीशु ने यह घोषित कर दिया कि वो न केवल मसीहा था। वह मनुष्य का पुत्र भी था! यह शब्द पुराने नियम से था। इसका मतलब यह था कि वह शक्ति और महिमा में दिव्य होने का दावा कर रहे थे! वो परमेश्वर के साथ एक होने का दावा कर रहे थे!

जब महायाजक ने यह सुना, तो वह जान गया कि उसके पास वो था जो वह चाहता था। उसने अपने हाथों से अपने याजकी पहनावे को पकड़ा और उसे फाड़ा। यह उसके चरम अपकार और यीशु के हर शब्द की पूर्ण निंदा की घोषणा थी। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से जो अपने महायाजकों के लिए वस्त्र ठहराया था, उसे कभी फाड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा, जिसके लिए उसे थोड़ा सम्मान भी नहीं था, उसकी परेशानी का कारण नहीं थी।

लेकिन सच में, अब किस बात का मायना था? व्यवस्था जिस पवित्रता को  इन पापी याजकों के द्वारा पूरा नहीं कर सका, वो अब यीशु में पूरी तरह से सफल होने जा रही थी। अपने विद्रोह में, कैफा ने परमेश्वर का यंत्र बनके, कानून का अंत, मंदिर में आराधना, और उस वाचा को परिपूर्ण किया जो इस आदमी को सशक्त कर रही थी। अपने जीवन पर पकड़ रखने के लोभी रोष में, वह उसे खो रहा था।

“‘इसने परमेश्वर के विरुद्ध बोला है!'”उसने पागलों की तरह घोषणा की। “‘हमें आगे गवाहों की क्या ज़रूरत है? देखो, तुमने इसके शब्द सुने है; तुम क्या सोचते हो? ‘”महासभा के बाकी लोग बोल पड़े: “‘ वह मौत के योग्य है!”

फिर अपने शातिर गुस्से में, उन्होंने अपनी मुट्ठी से उसे पीटा, उसके चेहरे पर थूका, और थप्पड़ मार कर उसे अपमानित किया। और जब यह सब हो रहा था, प्रभु अपने सम्मानजनक ताकत में वहां खड़े रहे  – उस प्याले को सहन करते हुए जो उसके पिता ने उसे दिया था।

इस दयनीय अन्याय के बीच में, पतरस आग के पास अपने हाथ, आंगन में सेक रहा था। कैफा की एक नौकरानी ने उसके पास जाकर उसके चेहरे को बारीकी से देखा। “‘क्या तुम भी यीशु गलीली के साथ थे?'” और सब के सामने उसने घोषणा की: “मैं नहीं जानता तुम किस बारे में बात कर रही हो। ‘” फिर वह उठकर  प्रवेश द्वार से बरामदे पर चला गया। क्या वह बच निकलने का रास्ता तलाश रहा था? हालात उसके स्वामी के लिए अच्छा नहीं लग रहे थे। एक और नौकरानी पतरस के पास आई और उससे कहने लगी: “‘तुम भी उनमें से एक हो!’

पतरस ने कहा: “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता!’ उस दबाव की कल्पना कीजिये जो उसने महसूस किया होगा।

एक और घंटा बीत गया, और मसीह की कार्यवाही बदतर होती जा रही थी।  इन भयानक पुरुषों के जब उसके प्रभु को ठूस ठूस कर पीता होगा, तो पतरस का दिल कितना टूटा होगा। वह क्या कर सकता था? वह इसका हल निकालने के लिए क्या कर सकता था? वह अब अपनी वफादारी को कैसे दिखा सकता था? हजारों विचार उसके दिमाग में चले होंगे, लेकिन मानो उसे लकुआ मार गया हो। दासों में से एक ने पतरस को देखा और कहा: “‘निश्चित रूप से आप भी उनमें से एक हैं क्यूंकि आप एक गलीली है।” यह दास यीशु की गिरफ्तारी के लिए बगीचे में मौजूद था। जिसका कान पतरस ने काटा था, यह उसका चचेरा भाई था, और उसे यकीन था कि यह इसी आदमी ने किया था!

पतरस कसम और श्राप के शब्द, झूठे गुस्से के साथ बोलने लगा – ठीक उसी प्रकार जब किसी को एक झूठ में पकड़ा जाता है। “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम बात कर रहे हो!'” तुरंत, एक मुर्गा ने बांग दिया। प्रभु ने भी इसे अच्छी तरह से सुना, और अपने अराजक कार्यवाही के बीच में पतरस की ओर देखा। पतरस को यीशु की बात याद आई जो उन्होंने बस कुछ घंटे पहले ही ऊपरी कक्ष में बोली थी। “‘मुर्गा कौवे से पहले, तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” सबसे खराब विफलता सच हो गई थी। पतरस उठकर बाहर चला गया और फूट फूट कर रोने लगा।

धार्मिक शासक अपने रोष में आगे बड़ते गए। किसी ने यीशु  के आंखों के चारों ओर एक पट्टी बाँधी। तब उन्होंने प्रभु को पीटा और उसे थप्पड़ मारा, और कहा:  “‘भविष्यवाणी कर, तू तो मसीह है, तो बता किसने तुझे मारा?'”

उनके असीम नफरत और शातिर दुष्टता पर ख़ुशी की कल्पना कीजिये। आखिरकार, उनके पास इस लोकप्रिय युवा शिक्षक के प्रति सालों के असंतोष और नफरत व्यक्त करने की शक्ति मिली – और वे अपनी घृणा में इतने एकजुट थे कि किसी को यह काम में शर्म नहीं आई। और जैसे वो उस परमेश्वर की निंदा कर रहे थे जिस पर वो परमेश्वर की निंदा का दोष लगा रहे थे – परमेश्वर वहां शांत बल में खड़े रहे, अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए और उस प्याले को पूर्णता से पीते हुए।

कहानी १६१: परमेश्वर के पुत्र की प्रार्थनाएं 

यूहन्ना १७

Vienna -  Holy Trinity in Altlerchenfelder church

अपने चेलों के साथ उस अंतिम रात्री में, यीशु ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया था। जिस राज्य कि घोषणा वे करने जा रहे थे, वह उनकी कल्पना से बाहर था, परन्तु वे बहुत महान और अद्भुद था। आने वाले दिनों को देखते हुए यीशु अपनी आँखें स्वर्गीय पिता कि ओर उठाकर प्रार्थना की। आइये सुनते हैं कि कैसे परमेश्वर का पुत्र अपने पिता से बात करता है:

“’हे परम पिता, वह घड़ी आ पहुँची है अपने पुत्र को महिमा प्रदान कर ताकि तेरा पुत्र तेरी महिमा कर सके। तूने उसे समूची मनुष्य जाति पर अधिकार दिया है कि वह, हर उसको, जिसको तूने उसे दिया है, अनन्त जीवन दे। अनन्त जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें। जो काम तूने मुझे सौंपे थे, उन्हें पूरा करके जगत में मैंने तुझे महिमावान किया है। इसलिये अब तू अपने साथ मुझे भी महिमावान कर। हे परम पिता! वही महिमा मुझे दे जो जगत से पहले, तेरे साथ मुझे प्राप्त थी।'”  यूहन्ना १७:१-५

क्या आपको समझ आया? पिता और पुत्र इस तरह कार्य कर रहे थे जिससे कि वे एक दूसरे कि महिमा कर सकें। अब मनुष्य ऐसा करता है, तो यह हास्यास्पद होता। एक दुसरे को हम अच्छे शब्दों के साथ उत्तेजित कर सकते हैं, पर क्यूंकि हम सब पापी हैं इसलिए हम एक हद्द तक ही बोल सकते हैं। हम किसी कि सच में महिमा नहीं कर सकते यदि वे उसके योग्य नहीं हैं। परन्तु परमेश्वर इसके योग्य है, और उसका पुत्र भी। उनके लिए केवल एक ही सही बात यह है कि वे भव्यतापूर्वक महिमा दें। हमारे लिए सबसे उत्तम बात यह है कि हम उनके आगे गिरकर दंडवत करें। इसीलिए यीशु को इंकार करना सबसे भयंकर पाप है। यह पूर्ण रूप से गलत है। परमेश्वर का पुत्र और पिता सत्य हैं और वे एक दूसरे कि महिमा करते हैं।

यीशु जानता था कि जो काम उसके पिता ने उसे सौंपा था वह उसने इस पृथ्वी पर पूरा किया। अब केवल क्रूस ही बचा था। और इसलिए उसने प्रार्थना की कि उसके मृत्यु के पश्चात्, पिता उसकी महिमा को जो उसकी उसके पिता के साथ थी वह उसे वापस मिल जाये।

फिर उसने कहा:
“’जगत से जिन मनुष्यों को तूने मुझे दिया, मैंने उन्हें तेरे नाम का बोध कराया है। वे लोग तेरे थे किन्तु तूने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन का पालन किया। अब वे जानते हैं कि हर वह वस्तु जो तूने मुझे दी है, वह तुझ ही से आती है। मैंने उन्हें वे ही उपदेश दिये हैं जो तूने मुझे दिये थे और उन्होंने उनको ग्रहण किया। वे निश्चयपूर्वक जानते हैं कि मैं तुझसे ही आया हूँ। और उन्हें विश्वास हो गया है कि तूने मुझे भेजा है।'” यूहन्ना १७:६-८

आपने देखा कि विश्वास यीशु के लिए कितना महवपूर्ण है? सब कुछ उसी पर निर्भर करता है! यीशु कि प्रार्थना को सुनिये:
“‘मैं उनके लिये प्रार्थना कर रहा हूँ। मैं जगत के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिए कर रहा हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। वह सब कुछ जो मेरा है, वह तेरा है और जो तेरा है, वह मेरा है। और मैंने उनके द्वारा महिमा पायी है। मैं अब और अधिक समय जगत में नहीं हूँ किन्तु वे जगत में है अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। हे पवित्र पिता अपने उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा कर जो तूने मुझे दिया है ताकि जैसे तू और मैं एक हैं, वे भी एक हो सकें। जब मैं उनके साथ था, मैंने तेरे उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा की, जो तूने मुझे दिया था। मैंने रक्षा की और उनमें से कोई भी नष्ट नहीं हुआ सिवाय उसके जो विनाश का पुत्र था ताकि शास्त्र का कहना सच हो।'” यूहन्ना १७:९-१२

“’अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ किन्तु ये बातें मैं जगत में रहते हुए कह रहा हूँ ताकि वे अपने हृदयों में मेरे पूर्ण आनन्द को पा सकें। मैंने तेरा वचन उन्हें दिया है पर संसार ने उनसे घृणा की क्योंकि वे सांसारिक नहीं हैं। वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ।
“’मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ कि तू उन्हें संसार से निकाल ले बल्कि यह कि तू उनकी दुष्ट शैतान से रक्षा कर। वे संसार के नहीं हैं, वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ। सत्य के द्वारा तू उन्हें अपनी सेवा के लिये समर्पित कर। तेरा वचन सत्य है। जैसे तूने मुझे इस जगत में भेजा है, वैसे ही मैंने उन्हें जगत में भेजा है। मैं उनके लिए अपने को तेरी सेवा में अर्पित कर रहा हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा स्वयं को तेरी सेवा में अर्पित करें।   यूहन्ना १७:१३-१९

“’किन्तु मैं केवल उन ही के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिये भी जो इनके उपदेशों द्वारा मुझ में विश्वास करेंगे। वे सब एक हों। वैसे ही जैसे हे परम पिता तू मुझ में है और मैं तुझ में। वे भी हममें एक हों। ताकि जगत विश्वास करे कि मुझे तूने भेजा है। वह महिमा जो तूने मुझे दी है, मैंने उन्हें दी है; ताकि वे भी वैसे ही एक हो सकें जैसे हम एक हों। मैं उनमें होऊँगा और तू मुझमें होगा, जिससे वे पूर्ण एकता को प्राप्त हों और जगत जान जाये कि मुझे तूने भेजा है और तूने उन्हें भी वैसे ही प्रेम किया है जैसे तू मुझे प्रेम करता है।'”  यूहन्ना १७:२०-२३

अब यीशु हमारे लिए प्रार्थना कर रहा था!

“’हे परम पिता। जो लोग तूने मुझे सौंपे हैं, मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ, वे भी मेरे साथ हों ताकि वे मेरी उस महिमा को देख सकें जो तूने मुझे दी है। क्योंकि सृष्टि की रचना से भी पहले तूने मुझसे प्रेम किया है।'” यूहन्ना १७:२५-२६

कहानी १५७: रोटी और प्याला 

मत्ती २८:२६-२९, मरकुस १४:२२-२५, लूका २२:१७-२०, १ कुरिन्थियों ११:२३-२६

Last supper

फसह का भोज यहूदी लोगों के लिए एक उच्च और पवित्र समय था। यह यहूदी लोगों के लिए मुक्ति के महान दिन की स्मृति में मनाया जाता है। यीशु के संसार में आने के पंद्रह सौ साल पहले, परमेश्वर ने मिस्र के फिरौन की भयानक अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त किया और इस्राएल को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाया। परमेश्वर ने अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा का सम्मान किया। उसका वंश आकाश के तारों के समान बढ़े।

जिस प्रकार परमेश्वर अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा को रख रहा था,उसी प्रकार उसने मूसा को एक अस्थायी वाचा दी। उसने उन्हें कुछ नियम दिए जिससे कि वह लोगों कि अगुवाई कर सके और उन्हें अपनी ओर खींच सके। उसने एक ख़ूबसूरत बलिदान कि विधि मांगी ताकि वे अपने पश्चाताप कि भेंट प्रभु के पास ला सकें और देश अपने पापों से शुद्ध हो सके। उसने उनके समाज को इस तरह बनाय जिससे कि वे आस पास के देशों अपमान और अप्रतिष्ठा से बचे रहें। और मूसा के जीवन के अंत में, परमेश्वर के लोगों ने वायदे के देश में प्रवेश किया।

जब वे परमेश्वर के काम करने के पवित्र तरीकों को सम्मान दे रहे थे, वे उसकी पवित्र उपस्थिति को पृथ्वी पर बड़े विशेषता के साथ फासले को रख रहे थे। परमेश्वर कि पवित्र विधि के अनुसार, उन्होंने जो वाचा का संदूक बनाया, उसका ढक्कन परमेश्वर का सिंहासन था। उनका आराधनालय और फिर उनका मंदिर दोनों उसके सिंहासन के महान हिस्सा थे। परमेश्वर कि उपस्थिति और उसके लोगों के बीच एक पर्दा था। वे उसके कीमती खज़ाना थे, परन्तु वे अपने पापों के कारण कलंकित हो गए थे।

अपने पापों से पश्चाताप करने के लिए लोग अपनी भेटें महायाजक के सामने लाते थे। इस्राएल के महायाजक पशु के बलिदान को परमेश्वर की वेदी पर लेकर आते थे। परमेश्वर ने अपने लहू को लोगों के पापों से धोने का प्रतिनिधि नियुक्त किया। रोज़-ब-रोज़ और हफ्ते हफ्ते लोग परमेश्वर कि पवित्र व्यवस्था के लिए अपने आप को जांचने के लिए अपने बलिदान को महायाजक के पास लेकर आते थे। बलिदान प्रणाली द्वारा, हर एक पाप कि घोषणा की जाती थी। जब लोग यह देख पा रहे थे कि उनकी कमज़ोरी और स्वार्थपरता को उन्हें जांचना है, वे यह सीखते थे कि उनके पाप कितने गहरे हैं। परमेश्वर की व्यव्यस्था जो उन्हें यह सिखाता था कि वे अपने टूटेपन को किस तरह परमेश्वर के सम्पूर्णता और प्रेम के द्वारा ठीक कर सकते थे। वे देख पाये कि मनुष्य के पाप के कारण यह कितना असम्भव था कि वे परमेश्वर कि अच्छाई और पूर्णता का आदर कर सकें। उनके पाप कि गम्भीरता और स्पष्ट हो गयी, और परमेश्वर कि पवित्रता प्रकट हुई।

परमेश्वर ने इस्राएल को शुद्ध होने के लिए बुलाया ताकि वे पृथ्वी के लिए एक शाही राष्ट्र बन सके। इतने सालों का राष्ट्र रहने पर भी, वह असफ़ल रहा। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया, और उसके मार्गों में चलने से इंकार किया। उनके राजाओं ने उस परमेश्वर के विरुद्ध में मूर्तियां स्थापित कर दीं

जिसने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और वो अधिकार दिया जो परमेश्वर कि सामर्थ से भी बढ़कर है। राष्ट्र दो भागों में बात गया और अंत में निर्वासित किया गया।

परमेश्वर के पवित्र देश के इन प्रलय सम्बंधित ख़ामियों के बीच कुछ ऐसे थे जो वफ़ादार थे। हमेशा वे होते थे जो परमेश्वर के लिए समर्पित होते थे और उसके आगे अपनी भेटों को लाते थे। जिस प्रेम को यीशु ने अपने चेलों से चाहा था वही प्रेम उनका भी परमेश्वर के प्रति था। परमेश्वर के ह्रदय का अवशेष हमेशा से एक सा रहा है। उनके पश्चाताप के बलिदान उस यशस्वी बलिदान पर केंद्रित करता है जो यीशु देने वाला था। उनके समय में जो परमेश्वर ने उन्हें प्रकट किया था, वे परमेश्वर कि उस आशा कि बाट जो रहे थे यीशु में पूर्ण होती है, और जो उद्धार हमें मिला वही उन्हें भी मिला।

यह अनिश्चित था कि फसह के पर्व पर वह अपनी जान दे देगा। उस राष्ट्र का उसके जीवन का परिणाम और उत्तम उद्देश्य था जो फसह ने स्थापित किया था। इस्राएल देश इसीलिए बनाया गया ताकि इस संसार में लोग अपने मसीह कि प्रतीक्षा करें। श्राप के इतिहास को उस चंगाई के लिए तैयार रहना था जो परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के माध्यम से भेज रहा था।

यीशु अब नए दौर के लिए एक नयी वाचा को बना रहा था। उसका अपने लहू उस अंतिम बलिदान के लिए होगा जो उसके अविनाशी जीवन के सामर्थ पर आधारित था।

फसह कि क्रियाओं को यहूदी देश एक हज़ार पांच सौ साल से मना रहे थे। परमेश्वर के अद्भुद कामों को सारे देशों ने जमा होकर स्मरण किया। फसह के पर्व का हर एक हिस्सा परमेश्वर कि वफादारी का चिन्ह था। अब जब यीशु और चेले उस क्रिया को मान रहे थे, यीशु ने उन्हें एक नयी क्रिया दी। यह परमेश्वर कि ओर से नया नियम था। नयी क्रिया यीशु कोई स्मरण करने और उसकी उपासना करने के लिए दी गयी थी जो उसके बलिदान द्वारा दिया जाएगा।

पुरानी व्यवस्था अब नहीं मानी जाएगी। नई व्यस्था पवित्र आत्मा के रूप में आएगी, और उन सब के ह्रदयों में लिख दी जाएगी जो यीशु पर विश्वास करेंगे। पुराने नियम में इसका चर्चा होता था।

यिर्मयाह ने कहा:
“वह समय आ रहा है जब मैं इस्राएल के परिवार तथा यहूदा के परिवार के साथ नयी वाचा करूँगा। यह उस वाचा की तरह नहीं होगी जिसे मैंने उनके पूर्वजों के साथ की थी। मैंने वह वाचा तब की जब मैंने उनके हाथ पकड़े और उन्हें मिस्र से बाहर लाया। मैं उनका स्वामी था और उन्होंने वाचा तोड़ी।” यह सन्देश यहोवा का है। भविष्य में यह वाचा मैं इस्राएल के लोगों के साथ करूँगा।” यह सन्देश यहोवा का है। मैं अपनी शिक्षाओं को उनके मस्तिष्क में रखूँगा तथा उनके हृदयों पर लिखूँगा। मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।'” –यिर्मयाह ३१:३१-३३

पवित्र आत्मा उन सब के लिए उद्धार का मोहर होगा जो विश्वास करते हैं। परमेश्वर कि उपस्थिति हर एक ह्रदय में होगी जो यीशु के लहू से धोया गया है। यीशु कि आत्मा हर एक विश्वास करने वाले ह्रदय में वास करेगी।

ये सब महान बातें मनुष्य के इतिहास में जब से हो रही थीं जब से यीशु अपने जीवन के अंतिम दिनों में येरूशलेम में था।और अब वह अपने उन चेलों के साथ ऊपर के कमरे में था जो जाकर सुसमाचार को सुनाएंगे।

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, उसने थोड़ी रोटी ली और धन्यवाद दिया। उसने उसे तोड़ा और उन्हें देते हुए कहा,“यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिये दी गयी है। मेरी याद में ऐसा ही करना।”

यह कितना पवित्र और ख़ूबसूरत पल था। यह यीशु का कितना शांत अनुष्ठान था जो यीशु ने अपने चेलों को दिया ताकि वे मिलकर उद्धारकर्ता के कामों को याद कर सकें। यीशु ऐसा राजा था जैसा और कोई भी नहीं। वह उन सब के लिए अपने लहू और प्राण को देने जा रह था जो उसके राज्य के वारिस थे। वह एक सच्चा फसह का मेमना बनने जा रहा था।हज़ारों सालों के लिए यह नयी क्रिया परमेश्वर के राज्य के लिए एक शक्तिशाली चिन्ह बनने जा रहा था।

जो चेले यीशु के साथ में मेज़ पर बैठे थे वे उसके दूत होंगे जो उसके जय कि घोषणा करेंगे जिसे यीशु इस संसार के लिए क्रूस पर जीतने जा रहा था। जब वे उसकी कलीसिया को बनाने जा रहे थे, वे यीशु कि  आज्ञाओं को याद करके उन्हें नए विश्वासियों को सिखाएंगे।  दो हज़ार साल बाद,  उनकी शिक्षाएं हम तक पहुँच गयीं हैं। यीशु के बलिदान को हम रोटी और प्याले को लेकर स्मरण करते हैं। उसकी उपस्थिति कलीसिया के साथ एक विशेष रीति से है। हमारा पवित्र मेज़ में भाग लेना उस समय को बंधता है जिस रात यीशु मरने वाला था।

कहानी १४५: मंदिर के अहास में 

मत्ती २३:१-१२, मरकुस १२:३८-३९, लूका २०:४५-४६

Segnender Jesus Christus Glasfenster

परमेश्वर के पुत्र का इस्राएल के अगुवों के विरुद्ध परमेश्वर  का अभियोग

धार्मिक बहुत क्रोधित थे। और वे डर गए थे। किसी को भी, यहाँ तक के सबसे बुद्धिमान इंसान भी यीशु के विरुद्ध में खड़े होने कि हिम्मत नहीं कर पा रहा था। वह उनके लिए बहुत तेज़ था। जिस अधिकार और सामर्थ के साथ वह बोलता था, वे उसका उत्तर नहीं दे पाते थे, और अपनी योजनाओं को गुप्त स्थान में ले जाते थे जहां कोई उन्हें देख नहीं सकता था।वे गुप्त में साज़िश करते थे ताकि उन्हें स्वयं सेवकों को जवाब ना देना पड़े। वे अपने छुपाते हुए बंद दरवाज़ों में योजनाएं बनाते थे। परमेश्वर के पुत्र को मरने के लिए वे हर तरीका सोच रहे थे।

संसार के सभी लोगों में से जो चुना हुआ राष्ट्र था जिसे परमेश्वर ने अपना कीमती खज़ाना बनाया, उस शानदार उद्धार को मना रहे थे जो यीशु ने उन्हें पहले फसह पर दिया था, और उनके अगुवे उस परम उद्धार को पाने के लिए रास्ता बना रहे थे जो यीशु ने उन्हें दिया था। परमेश्वर उनके द्वेष और पाप का उपयोग कर के इस संसार में अपने बेटे के द्वारा उद्धार लाएगा।

मनुष्य के इतिहास के लिए परमेश्वर का गौरवशाली उद्देश्य जो उन पर बड़े ही सामर्थी रूप से बह कर आ रहा था, ये लोग उन में से आज्ञाकारी हो सकते थे। वे परमेश्वर कि विजय का हिस्सा हो सकते थे। उन्हें उस विजय का हिस्सा होना ही था। उन्हें इस्राएल देश को पश्चाताप करने के लिए अगुवाई करनी थी जिस समय मसीह आया था। उन्हें स्वर्ग के राज्य का अभिनन्दन करना था! परन्तु, उन्होंने अपने लिए एक रेंगने वाले सांप कि छोटा सी भूमिका निभाई। और हमेशा कि तरह, परमेश्वर उनके कपटी पाप को एक महान अच्छाई के लिए उपयोग करने जा रहा था। यीशु पवित्र आत्मा कि सामर्थ में पिता के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में अटल रहा। वह जानता था कि वे क्या करने जा रहे हैं, और उसे निश्चय था कि क्या होने जा रहा है। वह ख़ुशी से गया, यह जानते हुए कि अंत में वह सब कुछ नया कर देगा।

यीशु जानता था कि उसे अपनी जान देनी है, और उस फसह के हफ्ते में उसे बहुत सी महत्वपूर्ण बातें बतानी थीं। मंदिर कि सीढ़ियों में, उसने उन धार्मिक कुलीन लोगों निष्फल कोशिशों को, उन्हें फ़साने के लिए नाश कर दिया था वे बुरी तरह से शांत हो गए। अब उसकी बरी थी बात करने कि। यह कोई हल्का फुल्का सन्देश नहीं होने जा रहा था। यीशु ने उन्हें उनकी प्रतिकारक दुष्टता के लिए उन्हें बहुत गुस्से से डांटा। उसने उनकि आकांशाओं के लिए और धोखेपन के लिए और छलयोजना के लिए डाटा। अब समय आ गया था कि मसीह उन अगुवों के विरुद्ध जिन्होंने परमेश्वर के पुत्र का इंकार किया था, परमेश्वर के न्याय के लिए सौंप दे। उसने ऐसे आरम्भ किया: “’यहूदी धर्म शास्त्री और फ़रीसी मूसा के विधान की व्याख्या के अधिकारी हैं। इसलिए जो कुछ वे कहें उस पर चलना और उसका पालन करना। किन्तु जो वे करते हैं वह मत करना। मैं यह इसलिए कहता हूँ क्योंकि वे बस कहते हैं पर करते नहीं हैं।'”

मूसा कि व्यवस्था के अधिकारी होने से यीशु का क्या मतलब था? मूसा इस्राएल का महान अगुवा था जिसने सीनै पहाड़ पर जाकर परमेश्वर से बात की। वह इस्राएल के लिए दस आज्ञाओं को लेकर आया। उनके भयंकर पाप के बावजूद, उनके शास्त्री और फरीसी प्राधिकरण के पद पर होते हुए परमेश्वर के वसाहन का प्रचार कर रहे थे। उनके कार्यों उनके उन अच्छी बातों से जो वे सिखाते थे उनसे बहुत भिन्न थे। उन्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार बनने के लिए चुनना था और उन बातों को छोड़ना था जो उनके अगुवों ने उन्हें सिखाईं!

फिर यीशु ने उन अगुवों के कर्मों का वर्णन किया:

 “’वे अच्छे कर्म इसलिए करते हैं कि लोग उन्हें देखें। वास्तव में वे अपने ताबीज़ों और पोशाकों की झालरों को इसलिये बड़े से बड़ा करते रहते हैं ताकि लोग उन्हें धर्मात्मा समझें। वे उत्सवों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान पाना चाहते हैं। आराधनालयों में उन्हें प्रमुख आसन चाहिये। बाज़ारों में वे आदर के साथ नमस्कार कराना चाहते हैं। और चाहते हैं कि लोग उन्हें ‘रब्बी’ कहकर संबोधित करें।'”

इन घमंडी लोगों कि कल्पना कीजिये, जो सड़कों पर इस तरह चलते हैं जैसे कि वे बहुत पवित्र और दूसरों से बढ़कर योग्य हैं। उनकी दिखावटी धर्मनिष्ठा चमड़े के थे जिनमें वचन के कुछ हिस्से थे। वे उन्हें अपने गले में पहनकर यह दिखाते थे कि वे कितने धर्मी हैं और दूसरों कि निंदा करते थे।

पुराने नियम के अनुसार यह गुच्छा उनके वस्त्र का एक हिस्सा था। परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों को यह आज्ञा दी थी कि वे चार गुच्छे अपने वस्त्रों में सीएं ताकि वे अपने आप को पवित्र और परमेश्वर के अलग किये हुए लोग दिख सकें। (गिनती १५:४०) यीशु ने भी वे गुच्छे पहने! परन्तु इन लोगो ने परमेश्वर का आदर करने के लिए नहीं पहना था। उन्होंने उसे अपनी महिमा के लिए पहना था, और आम लोगों से अपने लिए प्रशंसा और महिमा कि मांग की। वे उस उपासना और आदर कि मांग कर रहे थे जो केवल परमेश्वर के लिए है! यीशु इससे बहुत अपमानित हुआ।

उसने कहा:

“’किन्तु तुम लोगों से अपने आप को ‘रब्बी’ मत कहलवाना क्योंकि तुम्हारा सच्चा गुरु तो बस एक है। और तुम सब केवल भाई बहन हो। धरती पर लोगों को तुम अपने में से किसी को भी ‘पिता’ मत कहने देना। क्योंकि तुम्हारा पिता तो बस एक ही है, और वह स्वर्ग में है। न ही लोगों को तुम अपने को स्वामी कहने देना क्योंकि तुम्हारा स्वामी तो बस एक ही है और वह मसीह है। तुममें सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही होगा जो तुम्हारा सेवक बनेगा। जो अपने आपको उठायेगा, उसे नीचा किया जाएगा और जो अपने आपको नीचा बनाएगा, उसे उठाया जायेगा।'”

यीशु के चेलों को इस्राएल के अगुवों से बहुत भिन्न होना था।

सोचिये यदि हर कोई अपने तरीके से चलने लगे? यह कितना अच्छा होगा उन लोगों के बीच में रहना जो विनम्रता और नम्रता से भरे हुए हैं। यीशु अपने चेलों को एक बिलकुल भिन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बुला रहा था! वह स्वर्ग राज्य का मार्ग था!

कहानी १४४: यंत्रणा सप्ताह : तीसरा दिन ( मंगलवार)

मत्ती २१:२३-४६, मरकुस ११:२७-३३, लूका २०:१-१८

Vineyard, San Vicente de la Sonsierra as background, La Rioja

सुबह हो गयी थी, यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को जैतून के पहाड़ पर येरूशलेम के उस पार चला गया। यीशु उन्हें स्वर्गीय पिता के विषय में सिखा रहा था। चेले परमेश्वर के बेटे पर विश्वास करते थे, और इसीलिए उनके परमेश्वर ने इच्छापूर्वक उनकी प्रार्थना को सुना। उसके पास उनके लिए वह सामर्थ थी जिससे वे एक क्षण में एक पेड़ को सुख सकते थे और पहाड़ को समुन्दर में जाने का आदेश दे सकते थे। जब वह बोलता था, क्या वे जैतून के पहाड़ पर गए? क्या उन्होंने उस मार्ग को ढूँढा जो महासागर को जाता है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर उनके साथ था, जो अपने सेवकों कि प्रार्थनाओं को सुनने को तैयार था। आशा रखनी कि एक बहुत बड़ी वजह थी। और फिर भी उन्हें दूसरों को क्षमा करने का ह्रदय रखना था। यीशु मनुष्य के ह्रदय कि बातों को कितने नम्रता पूर्वक निपटता था।

जब वे मंदिर पहुँचे, यीशु ने प्रचार करना शुरू कर दिया। जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रमुख याजक, धर्मशास्त्री और बुजुर्ग यहूदी नेता उसके पास आये। और बोले,“तू इन कार्यों को किस अधिकार से करता है? इन्हें करने का अधिकार तुझे किसने दिया है?”

यह कितना अपमानित है। वे सब के सामने कह रहे थे, “तुम होते कौन हो?” ये लोग देश के प्रभारी थे, इस उग्र को उनके मंदिर के साथ उलझने का क्या अधिकार? वह कौन होता है उनके व्यापार को निकलने का या मंदिर में घुसने का? अपनी चँगाइयों से और शिक्षाओं से मंदिर ओ भ्रष्ट कैसे किया? राष्ट्र के वे अभिषिक्त धार्मिक अगुवे थे। एक बढ़ई को देश कि व्यवस्था के साथ उलझने कि क्या ज़रुरत?

और यदि यीशु के पास अधिकार है, तो वह किसने दिया? उन्हें उसके उत्तर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनकी अपनी मुख्य

इच्छाएं उनके अपने ही स्वार्थ में छुपा हुआ था। वे यीशु को फ़साना चाहते थे। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए उकसाते थे। यीशु ने अपनी सच्चाई से उनके झूठ को दबा दिया।

“मैं तुमसे एक प्रश्न पूछता हूँ, यदि मुझे उत्तर दे दो तो मैं तुम्हें बता दूँगा कि मैं यह कार्य किस अधिकार से करता हूँ। जो बपतिस्मा यूहन्ना दिया करता था, वह उसे स्वर्ग से प्राप्त हुआ था या मनुष्य से? मुझे उत्तर दो!”
मरकुस ११:२७-३३

यीशु ने उन्हें एक प्रस्ताव दिया। यदि वे उसे उत्तर देते हैं, वह उन्हें अपनी असली पेहचान बता देगा। यह बहुत ही मोहक होगा। वे उसके सवाल का जवाब नहीं दे पाये। जब धार्मिक अगुवे उसे उत्तर देने के लिए जमा हुए, उन्होंने कहा:  “यदि हम कहते हैं ‘परमेश्वर से’ तो यह हमसे पूछेगा ‘फिर तुम उस पर विश्वास क्यों नहीं करते?’ किन्तु यदि हम कहते हैं ‘मनुष्य से’ तो हमें लोगों का डर है क्योंकि वे यूहन्ना को एक नबी मानते हैं।” मत्ती २१:२५-२६

एक बार फिर, यीशु ने उनकी ही छलयोजना और धोकेपन में उन्हें फसा दिया। उसने परिस्थिति को घुमा दिया। अचानक, धार्मिक अगुवों को परमेश्वर के नबी को इंकार करने का जवाब देना पड़ा। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने उन्हें सांप के बच्चे कहा था और उन्होंने पश्चाताप करने से इंकार कर दिया और अब वे परमेश्वर के लोगों के साथ भी उसी तरह व्यवहार कर रहे थे। वे परमेश्वर को अपमानित करके  नहीं हो रहे थे बल्कि लोगों को अपमानित करने से डर रहे थे। उनका मुख्य सम्बन्ध उनके अपने पद और अधिकार से था। इसलिये उन्होंने यीशु को उत्तर दिया,“हम नहीं जानते।”

इस पर यीशु ने उनसे कहा,हूँ।”तो फिर मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगा कि मैं ये कार्य किस अधिकार से करता हूँ।
यदि वे यूहन्ना कि सेवकाई को आदर नहीं देते तो वे यीशु कि सच्चाई को भी कभी नहीं जान पाऐंगे, क्योंकि यह दोनों परमेश्वर कि ओर से है।

यीशु ने उन्हे एक और दृष्टान्त बताया जिससे कि सच्च और स्पष्ट हो जाता। पहली कहानी में उसने कहा:
अच्छा बताओ तुम लोग इसके बारे में क्या सोचते हो? एक व्यक्ति के दो पुत्र थे। वह बड़े के पास गया और बोला,‘पुत्र आज मेरे अंगूरों के बगीचे में जा और काम कर।किन्तु पुत्र ने उत्तर दिया, ‘मेरी इच्छा नहीं हैपर बाद में उसका मन बदल गया और वह चला गया। फिर वह पिता दूसरे बेटे के पास गया और उससे भी वैसे ही कहा। उत्तर में बेटे ने कहा, ‘जी हाँ,’ मगर वह गया नहीं।
बताओ इन दोनों में से जो पिता चाहता था, किसने किया?”
लोगों ने कहा कि पहला पुत्र आज्ञाकारी था।

यीशु ने उनसे कहा,
“’मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कर वसूलने वाले और वेश्याएँ परमेश्वर के राज्य में तुमसे पहले जायेंगे।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना तुम्हें जीवन का सही रास्ता दिखाने आया और तुमने उसमें विश्वास नहीं किया। किन्तु कर वसूलने वालों और वेश्याओं ने उसमें विश्वास किया। तुमने जब यह देखा तो भी बाद में न मन फिराया और न ही उस पर विश्वास किया।'”

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यीशु ने क्या कहा? उसने घोषित किया कि व्यभिचार करने वाली और भ्रष्टाचार करने वाले और एक लालची कर चुकाने वाला, ये धार्मिक अगुवों से कहीं अधिक अच्छे थे। वे यह घोषित कर थे कि यीशु को अपनी सेवकाई का प्रमाण देना होगा जबकि यीशु ने सब बातों को उल्टा कर दिया और यह घोषित किया कि उन्हें स्वयं पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। उन्होंने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का आदर नहीं किया था, जिसे परमेश्वर ने यह अधिकार दिया था कि वह देश को सच्चाई बताये। यीशु ने उनकी लज्जा को स्पष्ट कर दिया था। परन्तु यीशु ने यहाँ समाप्त नहीं किया था।

“एक और दृष्टान्त सुनो: एक ज़मींदार था। उसने अंगूरों का एक बगीचा लगाया और उसके चारों ओर बाड़ लग दी। फिर अंगूरों का रस निकालने का गरठ लगाने को एक गडढ़ा खोदा और रखवाली के लिए एक मीनार बनायी। फिर उसे बटाई पर देकर वह यात्रा पर चला गया। जब अंगूर उतारने का समय आया तो बगीचे के मालिक ने किसानों के पास अपने दास भेजे ताकि वे अपने हिस्से के अंगूर ले आयें।
“किन्तु किसानों ने उसके दासों को पकड़ लिया। किसी की पिटाई की, किसी पर पत्थर फेंके और किसी को तो मार ही डाला। एक बार फिर उसने पहले से और अधिक दास भेजे। उन किसानों ने उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया। बाद में उसने उनके पास अपने बेटे को भेजा। उसने कहा, ‘वे मेरे बेटे का तो मान रखेंगे ही।’
“किन्तु उन किसानों ने जब उसके बेटे को देखा तो वे आपस में कहने लगे, ‘यह तो उसका उत्तराधिकारी है, आओ इसे मार डालें और उसका उत्तराधिकार हथिया लें।’ सो उन्होंने उसे पकड़ कर बगीचे के बाहर धकेल दिया और मार डाला।
“तुम क्या सोचते हो जब वहाँ अंगूरों के बगीचे का मालिक आयेगा तो उन किसानों के साथ क्या करेगा?” मत्ती २१:३३-४०

आपने देखा कि कैसे ठेकेदार भी उन धार्मिक अगुवों के समान हैं? परमेश्वर के राष्ट्र पर उनको कुछ समय के लिए अधिकार दिया गया था। कुछ सेवक परमेश्वर के नबी थे, जैसे यशायाह और यर्मियाह, एलिया और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला। उन्होंने आकर इस पापी देश को परमेश्वर के विषय सच्चाई सुनाई, और इसीलिए इस्राएल के राजा और अगुवे उनसे घृणा करते थे। परमेश्वर ने एकलौते पुत्र को भेजा, और धार्मिक अगुवे उसे मार डालने कि साज़िश कर रहा थे। वे इस्राएल के इतिहास के विपरीत थे। वे परमेश्वर कि योजना के विपरीत थे! क्या इस फटकार से वे परिवर्तित होंगे? क्या परमेश्वर का भय उनके भीतर काम करेगा?

दृष्टान्त में यीशु ने इस बात का वर्णन किया कि परमेश्वर उन लोगों के साथ क्या करने जा रहा था जिन्होंने उसके सेवकों को सताया है। वे पूर्णरूप से नष्ट हो जाएंगे, और अंगूर कि बाड़ी किसी और को दे दी जाएगी।

फिर यीशु ने कहा:
“’क्या तुमने शास्त्र का वह वचन नहीं पढ़ा:

जिस पत्थर को मकान बनाने वालों ने बेकार समझा, वही कोने का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पत्थर बन गया?
ऐसा प्रभु के द्वारा किया गया जो हमारी दृष्टि में अद्भुत है।

“इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ परमेश्वर का राज्य तुमसे छीन लिया जायेगा और वह उन लोगों को दे दिया जायेगा जो उसके राज्य के अनुसार बर्ताव करेंगे। जो इस चट्टान पर गिरेगा, टुकड़े टुकड़े हो जायेगा और यदि यह चट्टान किसी पर गिरेगी तो उसे रौंद डालेगी।’” मत्ती २१:४३-४४

जब फरीसी और महायाजक उसके दृष्टान्त को सुन रहे थे, वे जानते थे कि यीशु उन्हें कोई सन्देश देना चाह रहा है। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए कितने उत्सुक थे! लेकिन वे कर नहीं पा रहे थे! भीड़ बीच में आ रही थी। यदि वे उसे गिरफ्तार करने कि कोशिश करते तो दंगा हो जाता! भीड़ जानती थी कि यीशु एक नबी है।

कहानी १४३: इस्राएल और अंजीर का वृक्ष

मत्ती २१:१८-२२, मरकुस ११:१९-२६

यीशु का येरूशलेम फसह के पर्व में आना हवा के समान था, जिसने सब कुछ उल्टा पुल्टा कर दिया था। उसने दिखावे कि झूठी आराधना को उनके भ्रष्टाचार के द्वेष को हिला कर रख दिया था। लोगों के पक्ष को बुलाया गया। क्या वे मनुष्य के रास्ते को चुनेंगे या परमेश्वर के रास्ते को? क्या वे सच्चे इतिहास कि ओर होंगे? क्या वे परमेश्वर के साथ वफादार रहेंगे?

जिस समय सब यह देख रहे थे कि यीशु अब क्या करेगा, किसी को भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह उनका ही इम्तिहान ले रहा था। यीशु परमेश्वर कि सामर्थ में उन पापी लोगों के विरुद्ध में सिद्ध और निष्कलंक खड़ा रहा। यह सब पर निर्भर करता था कि वे उसके साथ संरेखित हों। जब कोई भयानक खतरे में पड़ता है, तब एक हल्का सुझाव है एक बचाव करने के लिए। यदि आप उनके जीवन को बचाना चाहते हैं, तब आप उनको चिल्ला चिल्ला कर पुकारते हैं। यहूदी बहुत ही भयानक गलती करने जा रहे थे। केवल यीशु ही उनके त्रासदी कि गहराई को समझ सकता था जो वे अपने ऊपर ले कर आ रहे थे। यीशु कि कठोर चेतावनियां उसकी करुणा और अनुग्रह का अधिनियम था।

सोचिये यीशु उन्हें क्या दिखा रहा था। वह अनतकाल का परमेश्वर है, जो युगानुयुग और पवित्र है। इसके बावजूद वह उनका साथ दिया और उनके साथ भोजन भी किया। वह मनुष्यरूप में आया, और जितनो ने उसे सच्चे विश्वास के साथ माना था केवल वे यह समझते थे कि वह परमेश्वर भी है। यदि उस इस्राएल के परमेश्वर को लोगों ने सच्ची भक्ति से प्रेम किया होता, और उसके नियमों से भी, तो वे उसके पुत्र से भी प्रेम करते। यीशु कि भलाई के प्रति उनका अंधापन और घृणा, यह दिखता है कि उनकी आराधना कितनी झूठी है। उन्हें अपने परमेश्वर को पहचान लेना चाहिए था जब वे उनके पास आया था।

परन्तु कुछ लोग थे जो उसे पहचानते थे। फसह का दूसरा हफ्ता आकर चला गया था। यीशु बैतनिय्याह के रास्ते अपने चेलों के साथ गया। यह जैतून के पहाड़ के पास बसा हुआ एक छोटा सा गाँव था। उन्होंने वहाँ रात बिताई। जब सूरज उगा, तब उन्होंने येरूशलेम की दुर्जेयी दीवारों को देखा। और जब सुबह हुई, यीशु वापस मंदिर कि ओर अपने चेलों को लेकर चला गया।

रास्ते में, उन्हें वही अंजीर का पेड़ मिला जिसे यीशु ने श्रापित कर दिया था। केवल अब, उसमें हरी पत्तियां आ गयी थीं। पूरा पेड़, जड़ से सबसे ऊंची टहनी तक पूरा सूख गया था। यह देखना कितना अचंबित था कि एक दिन पहले जो इतना उज्जवल और जीवित था, वह अगले चौबीस घंटे के भीतर ही पूर्ण रूप से मर गया!

उसके चेलों ने पुछा,”‘यह अंजीर का पेड़ एक दम से कैसे सूख गया?'”

तब पतरस ने याद करते हुए यीशु से कहा,“हे रब्बी, देख! जिस अंजीर के पेड़ को तूने शाप दिया था, वह सूख गया है!”

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया,
“‘परमेश्वर में विश्वास रखो।मैं तुमसे सत्य कहता हूँ: यदि कोई इस पहाड़ से यह कहे, ‘तू उखड़ कर समुद्र में जा गिर’ और उसके मन में किसी तरह का कोई संदेह न हो बल्कि विश्वास हो कि जैसा उसने कहा है, वैसा ही हो जायेगा तो उसके लिये वैसा ही होगा। इसीलिये मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम प्रार्थना में जो कुछ माँगोगे, विश्वास करो वह तुम्हें मिल गया है, वह तुम्हारा हो गया है। और जब कभी तुम प्रार्थना करते खड़े होते हो तो यदि तुम्हें किसी से कोई शिकायत है तो उसे क्षमा कर दो ताकि स्वर्ग में स्थित तुम्हारा परम पिता तुम्हारे पापों के लिए तुम्हें भी क्षमा कर दे।”” —मत्ती २१:२-२२ और मरकुस ११:२२-२६

यीशु के अपने चेलों के साथ बात करने का ढंग और भीड़ के साथ बात करने के ढंग में अंतर देखिये। यीशु को उनके ह्रदयों कि बातों को समझने के लिए आत्मा के द्वारा शक्ति मिली। उसके चेले उसके पीछे विश्वास के साथ चल रहे थे। वे वफादार थे। परन्तु उन्हें और विश्वास कि आवश्यकता थी। वे परमेश्वर को संसार कि स्थितियों को बदलते हुए देखेंगे। महासागर दूर से कितना चमकदार दिख रहा होगा। उनके स्वामी ने उनसे कहा कि वे विश्वास के साथ उस विशाल पहाड़ को पानी में जाने का आदेश दे।

परमेश्वर के लिए उस पर विश्वास करना कितना उल्लेखनीय है। उसे अपने बच्चों के साथ प्रेम का सम्बन्ध चाहिए जब वे उसके पास सच्चे विश्वास के साथ आते हैं। विश्वास और किसी भी चीज़ से बहुत बहुमूल्य है क्यूंकि इसके द्वारा हम अपने परमेश्वर के साथ बांध जाते हैं। परमेश्वर अपने बच्चों से ह्रदय की नज़दीकी और विश्वास को चाहता है। वह चाहता है कि वे पूरे दिल से यह विश्वास करें कि यीशु ही सबसे आवश्यक है! ऐसे प्रेम और विश्वास के स्थापित होने से परमेश्वर के बच्चे उसकी इच्छा में और गहराइ में उतरेंगे। यदि उनकी बिनती परमेश्वर कि ओर से है तो पवित्र आत्मा उन्हें आश्वासन देगा, और जब परमेश्वर उन्हें स्पष्ट कर देगा कि वे सही हैं तो वे यह पूर्ण रूप से विश्वास कर सकते हैं कि परमेश्वर उनकी प्रार्थना का आदर करेगा। कभी कभी प्रार्थना में समय लगता है। कभी कभी उसकी अगवाई के लिए ह्रदय को शांत करना पड़ता है और पूरे दिल से उसे खोजना पड़ता है। परन्तु जिस ख़ूबसूरत प्रक्रिया में चेले यीशु के पीछे गहराई से चले, उस प्रक्रिया से परमेश्वर अपनी इच्छा को संसार में प्रकट करता है! जो कुछ उसके बच्चे विश्वास के साथ मांगे वह उसे उन्हें देने के लिए कुछ भी करेगा!

एक चिंता कि बात यह है कि वह सब मांगते हैं जो उसकी इच्छा के विरुद्ध है। परमेश्वर वही देना चाहता है जो सच्ची आशीष लाता है, और ना कि वह जो अच्छा नहीं है। यह अधिकतर समय सच होता है कि जो मांगते हैं ऐसा लगता है कि परमेश्वर उनकी नहीं सुनता। परन्तु वह हमेशा सुनता है। कभी तो वह “हाँ” बोलता है और कभी “ना।” और कभी तो वह इंतज़ार करने को कहता है। अपने प्रेम और विश्वास में और बढ़ने का मतलब है कि यीशु में उसकी सुनना और उसकी मर्ज़ी को जानने के लिए रुके रहना।

बहुत सालों बाद, पतरस अपनी कलीसिया को अपने विश्वास के विषय में लिखेगा। उन में से एक यह है:

“हमारे प्रभु यीशु मसीह का परम पिता परमेश्वर धन्य हो। मरे हुओं में से यीशु मसीह के पुनरुत्थान के द्वारा उसकी अपार करुणा में एक सजीव आशा पा लेने कि लिए उसने हमें नया जन्म दिया है।ताकि तुम तुम्हारे लिए स्वर्ग में सुरक्षित रूप से रखे हुए अजर-अमर दोष रहित अविनाशी उत्तराधिकार को पा लो। जो विश्वास से सुरक्षित है, उन्हें वह उद्धार जो समय के अंतिम छोर पर प्रकट होने को है, प्राप्त हो। इस पर तुम बहुत प्रसन्न हो। यद्यपि अब तुमको थोड़े समय के लिए तरह तरह की परीक्षाओं में पड़कर दुखी होना बहुत आवश्यक है।  ताकि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास जो आग में परखे हुए सोने से भी अधिक मूल्यवान है, उसे जब यीशु मसीह प्रकट होगा तब परमेश्वर से प्रशंसा, महिमा और आदर प्राप्त हो।” -१पतरस १:३-७

यह बहुत दिलचस्प है कि इसी पाठ में, यीशु ने क्षमा करने कि बताई। यदि परमेश्वर का बच्चा अपने पिता के पास आना चाहता है, उन्हें दूसरों के प्रति घृणा और प्रतिशोध को छोड़ना होगा। परमेश्वर हमारे पापों कि क्षमा को दूसरों कि क्षमा और अनुग्रह जो हम दूसरों को दिखाते हैं, उससे बांध देता है। हमें अपने ह्रदय को दूसरों के प्रति जांचना है कि हमारे अंदर कोई द्वेष या कठोरता तो नहीं! हमारे परमेश्वर के साथ के साथ के रिश्ते कि खातिर, हमें इन बातों को पूर्णरूप से छोड़ देना चाहिए! पतरस ने क्षमा के विषय में कुछ इस तरह लिखा जो हमने इससे पहले पढ़ा:

“अब देखो जब तुमने सत्य का पालन करते हुए, सच्चे भाईचारे के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए अपने आत्मा को पवित्र कर लिया है…इसलिए सभी बुराइयों, छल-छद्मों, पाखण्ड तथा वैर-विरोधों और परस्पर दोष लगाने से बचे रहो।नवजात बच्चों के समान शुद्ध आध्यात्मिक दूध के लिए लालायित रहो ताकि उससे तुम्हारा विकास और उद्धार हो।” —पतरस १:२२; २:१-२

सूखा हुआ अंजीर का पेड़ इस्राएल देश के लिए उस मृत्यु का उदहारण है जो आने वाली है, परन्तु नया जीवन जो यीशु के कार्य के द्वारा आएगा, वही संसार के लिए उद्धार लाएगा!