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कहानी १६९: क्रूस की मौत का रास्ता

मत्ती २७:२७-३२; मरकुस १५:१६-२१; लूका २३:२४-३१; यूहन्ना १९:१६

The Flagellation of Christ (stained glass)

यीशु के खिलाफ सज़ा, पिलातुस द्वारा घोषित की गई थी। उन्होंने सैनिकों की पूरी रोमी सेना को अंगना में बुलाया। अपनी बोरियत को दूर करने के लिए,प्रभु के आसपास एकत्र हुए एक सौ से अधिक पुरुष उसका ठट्ठा उड़ाने के लिए वहाँ जमा थे। उन्होंने यीशु का वस्त्र छीन लिया और उन पर एक बैंगनी वस्त्र डाल दिया। उन्होंने उनके सिर पर कांटों का मुकुट रखा और उनके प्रभुत्व का मज़ाक बनाने के लिए उनके दाहिने हाथ में एक ईख डाली। वे नकली श्रद्धा में उनके सामने झुक कर कहने लगे –  “यहूदियों के राजा की जय हो! ‘”तब वे उस ईख से उनके सिर को पीटने और थूकने लगे।

यह सभी के बावजूद, यीशु ने कुछ नहीं कहा। जबकि वह एक पल में अपनी मदद के लिए दस हजार स्वर्गदूतों को बुला सकते थे, वह अपने पिता की इच्छा में पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता में वहाँ खड़े रहे। यह एक शानदार शक्ति, और एक गौरवशाली नम्रता थी। उनकी भक्ति, स्वर्ग के उच्च राजा के लिए थी, और वह जानते थे कि उनके पिता यह सब देख रहे हैं। वह समझते थे कि दूसरी तरफ जीत उनका इंतजार कर रही है, और उन्होंने अपने पिता की ओर आज्ञाकारिता की वजह से होने वाले अपमानित घटनाओं को तुच्छ जाना।

जब सैनिकों ने यीशु का मजाक उड़ा लिया, तो उन्होंने बैंगनी वस्त्र निकाल कर, उन पर वापस उनके कपड़े डाल दिए।उन्होंने उनकी पीठ पर क्रूस का एक छोर रखा, और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए, यरूशलेम में से ले गए। जब वह चल रहे थे, लकड़ी का वजन यीशु के लिए बहुत ज्यादा हो गया। उनका शरीर एक बहुत कमजोर स्थिति में था। तो सैनिकों ने सिरेन नामक स्थान के शमौन नाम के राहगीर को पकड़ लिया। वो फसह उत्सव के लिए देश से यरूशलेम में आया था। वो नहीं जानता था कि परमेश्वर ने उसके लिए क्या रखा है। सैनिकों ने उस पर यीशु का क्रूस उठाने का दबाव डाला। यरूशलेम के पूरे शहर को इन गतिविधियों का ज्ञान हो गया था, और भीड़ सड़कों पर भर गई थी। जैसे यीशु आगे चल रहे थे, शिमौन उनके पीछे भरी भीड़ के साथ पीछे चल रहा था।

राष्ट्र, अपनी सांस यह जानने के लिए पकड़ी हुई थी कि क्या यीशु मसीहा था। शक्तिशाली, चमत्कार काम करने वाले शिक्षक और धार्मिक नेताओं के बीच संघर्ष की स्थापना,  तीन साल के तनाव में उमड़ गई थी। जैसे जैसे यीशु यरूशलेम की ओर जा रहे थे, अफवाहें उड़ने लगी। हर किसी की यह आशा थी कि फसह पर्व पर मामला उलझेगा, लेकिन इस तरह नहीं। यह कैसे हो सकता है? मसीहा को सत्ता में आना था! उन्हें एक लोहे की लाठी से प्रभुत्व के साथ शासन करना था! उन्हें राष्ट्रों को जीतना था!  आधी रात के कार्यवाही, बर्बर पिटाई की कहानियां, हेरोदेस और पीलातुस के महल के दौरे, पागल की तरह राष्ट्र में घूम रहे थे। जब यीशु शहर के बीच से गए, सब कुछ ठहर गया। इस प्रदूषित जुलूस का शोर यरूशलेम भर में सुनाई आ रहा था। भीड़,  क्रूस पर चड़ाए जाने वाले प्रसिद्ध युवा शिक्षक की एक झलक पाने के लिए दौड़ी। वह कितना कमजोर और खून से सना था! वह अपने स्वयं का क्रूस नहीं उठा पा रहा था! क्या यह वास्तव में अंत था? उनकी शिक्षाए कितनी सीधी, सही और सुंदर थी। बहुतों के लिए ऐसा हो रहा होगा जैसे मानो स्वयं अच्छाई ही मर रही है। उन सड़कों में कितने अन्य ने यीशु से चंगाई प्राप्त की होगी? जो यीशु को सुनने के लिए मीलों दूर चल के आते थे, आज उनके जीवन का परिणाम, दहशत में खड़े देख रहे थे। यीशु का अपमान येरूशलेम के साल में एक ऐसे दिन पर था जब ज्यादातर लोग, उस एकलौते, सच्चे मेमने के बलिदान को देखते।

कुछ महिलाए जो यीशु को प्यार करती थी, अपने प्रभु की पीड़ा पर रोते हुए विलाप कर रही थी। यीशु अपने वफादार लोगों के साथ बात करने के लिए मुड़े:

यीशु ने उन की ओर फिरकर कहा; हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिथे मत रोओ; परन्‍तु अपने और अपके बालकों के लिए रोओ। क्‍योंकि देखो, वे दिन आते हैं, जिन में कहेंगे, धन्य हैं वे जो बाँझ हैं, और वे गर्भ जो न जने और वे स्‍तन जिन्‍होंने दूध न पिलाया। उस समय वे पहाड़ों से कहने लगेंगे, कि हम पर गिरो, और टीलों से कि हमें ढाँप लो। क्‍योंकि जब वे हरे पेड़ के साय ऐसा करते हैं, तो सूखे के साय के साथ क्‍या कुछ न किया जाएगा| –लूका २३:२८-३१

बात असल में यह थी कि यीशु जानते थे कि एक ऐसा समय आने वाला था जब यरूशलेम को मसीहा के तिरस्कार के पाप के लिए पूर्ण परिणाम प्राप्त होगा। उसी सुबह, महायाजकों ने रोमी केसर के लिए अपनी वफादारी घोषित की थी, और लोगों ने यीशु का खून अपने खुद के सिर पर और अपने बच्चों के सिर पर होने की अनुमति दी! और परमेश्वर उन्हें अपने रास्ते जाने की अनुमति दे रहे थे। अपने जीवनकाल में, भीड़ जो यीशु के क्रूस के मार्ग के आसपास धूम मच रही थी, यरूशलेम के लोग यह जानेंगे कि भयानक रोमी सेना की दया पर निर्भर होने का मतलब क्या होता है। वहां कोई दया नहीं होगी। रोम, यरूशलेम को घेराबंद कर देगी। दीवारों के भीतर लोग पीड़ा और भुखमरी में महीने गुजारेंगे। वे घृणित पाप में एक दूसरे पर बारी होंगे। फिर रोमी सेना अपने शक्तिशाली हथियार के साथ पूरी ताकत में हमला करेगी। वो सड़कों जहाँ लोग चलते थे और शानदार मंदिर बर्बाद हो जाएगा, और यहूदी राष्ट्र पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।  यीशु जानते थे कि यह भयानक कार्यवाही एक निश्चित अंत लाएगी। तीन दिनों में, वह अनन्त महिमा को फिर से जी उठेंगे। लेकिन कई भयावहता अभी भी यरूशलेम के लोगों के सामने थी। मसीह की आत्मा इतनी महान थी कि यीशु इतनी भयानक यातना के बीच में, कयामत के रास्ते पर चलने वाले लोगों को दया और चेतावनी दे सकते थे|

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कहानी १६७: पीलातुस और हेरोदेस के पास 

मत्ती २७:१-२,११-१४; मरकुस १५:१-५; लूका २३:१-१२; यूहन्ना १८:२८-३७

Neuberg and der Murz - paint of Jesus judgment for Pilate (1505)

पेंतुस पीलातुस के जैसे आदमी के लिए, यहूदी महासभा के पुरुष एक हास्यास्पद भीड़ की तरह होंगे। पिलातुस रोमी राज्यपाल था जिसे दुनिया में सबसे शक्तिशाली आदमी द्वारा नियुक्त गया था – रोमी कैसर। रोमी साम्राज्य ने ज्ञात दुनिया पर विजय प्राप्त की और सैकड़ों वर्ष के लिए इतिहास पर प्रभुत्व की। इस्राएल के देश का नक्षा एक तुच्छ धब्बे की तरह लगता था। उनके धार्मिक नेता भी हर रूप में भ्रष्ट, और सत्ता के भूखे थे- ठीक रोमी राजनीति में खेलने वालों की तरह, पर बिना उस आकर्षण और चमक धमक के। वे एक राष्ट्र के रूप में स्वयं के महत्व से भरे थे, जो बाकि दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखती थी। रोमियों के लिए इन पर आँखे चड़ाना आसान था, लेकिन पिलातुस के लिए, वे एक वास्तविक खतरा थे। यहूदी नेतृत्व का लोगों पर जबरदस्त प्रभाव था। वे एक विद्रोही उन्माद में भीड़ को उकसा सकते थे। जो आखरी चीज़ पिलातुस चाहता था वो था रोम को एक रिपोर्ट कि वह अपनी सत्ता को कायम नहीं रख सकता है।

जब महासभा यीशु के साथ पहुंची, उन्होंने अंदर कदम रखने से इनकार कर दिया। यह एक बड़ा किला था जहाँ रोमी राज्यपाल रहता था, और इसलिए उसकी भूमि अशुद्ध थी। अगर यहूदी अंदर चले जाते, तो वे अशुद्ध हो जाते। वो फसह के बाकी के पर्व को मनाने के लिए अयोग्य हो जाते। पिलातुस यहूदियों के धार्मिक रीति रिवाजों के प्रति संवेदनशील था, इसलिए वह उनसे मिलने के लिए बाहर चला गया। वहां वो यीशु के सामने खड़ा हो गया, जिसके हाथ पैर एक आम कैदी की तरह बंधे हुए थे। उनका चेहरा चोट के निशान से भरा हुआ था। इस साधारण आदमी ने कैसे इन शक्तिशाली पुरुषों को ऐसे आक्रोश में डाल दिया, और वो भी उनके त्योहार के चरम बिंदु पर? और वे उसे वहां क्यूँ ला रहे थे?

“‘तुम इस आदमी के खिलाफ क्या आरोप लगते हो?'” पिलातुस ने पूछा।

“‘अगर यह आदमी बुराई का कर्ता नहीं होता, हम इसे आप के पास नहीं लाते,” उन्होंने कहा। “‘हमने इस आदमी को हमारे देश को गुमराह करने और कैसर को कर का भुगतान मना करने का, और खुद को मसीह -एक राजा घोषित करने के अपराध में पाया है!'”

ज़ाहिर है, यह आरोप झूठे थे। और यह उन आरोपों से काफी अलग थे जो उन्होंने अपने स्वयं की कार्यवाही में घोषित की थी। लेकिन पेंतुस पीलातुस और रोमी साम्राज्य इस बात की परवाह नहीं करते थे कि कौन अपने को यहूदी मसीह बोलता है, और वे इसके लिए मौत की सजा कभी नहीं देते। यहूदी नेतृत्व इस से अच्छी तरह परिचित थी, इसलिए उन्होंने झूठे आरोप बनाए ताकि वो पिलातुस को यीशु को मौत के सजा सुनाने के लिए विश्वास दिला सके। वे यह बोल रहे थे कि यीशु ने अपने को रोमी कैसर की शक्तियों के मुकाबले किया। यह एक इतना हास्यास्पद दावे की तरह लग रहा था कि पिलातुस ने इसे आसानी से खारिज कर दिया। उसने कहा, “‘उसे अपने आप ले जाओ और अपने खुद के कानूनों द्वारा उसका न्याय करो।”

“‘हम कानूनी रूप से किसी को मौत की सज़ा नहीं सुना सकते है,” उन्होंने  उत्तर दिया।

आह। उनके आने का असली कारण पता चल रहा था। वे जंजीरों में इस आदमी को मारना चाहते थे। रोमी लोग अपने न्याय की नीतियों पर गर्व करते थे, और पीलातुस जानता था कि धार्मिक नेताओं को उसे सच बताने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे कोई दूसरे रास्ते से पता लगाना होगा कि असल बात क्या थी। तो उसने यीशु को अंदर बुलाया ताकि वे अकेले में उनसे बात कर सके।

“‘क्या तुम यहूदियों के राजा हो?'” उसने पुछा। अब, रोमी राज्यपाल भी यह सुझाव दे रहा था कि यीशु एक राजा हो सकता है!

“‘क्या आप अपनी स्वयं की पहल पर यह कह रहे हैं, या क्या दूसरों ने आपको मेरे बारे में बताया है?'” यीशु ने उत्तर दिया।

“‘मैं एक यहूदी तो नहीं हूँ, हैना?” पिलातुस ने कहा। “‘तुम्हारे अपने ही देश और महायाजक ने तुमको मुझे सौपा है। तुमने क्या किया है?”

क्या यह दिलचस्प नहीं है कि पिलातुस यहूदियों के बातों से ज्यादा यीशु को सुनना चाहता था? वो प्रभु को उनके भ्रष्ट नेतृत्व के उन्माद के उपरान्त, अपना नाम साफ़ करने का मौका दे रहा था।

यीशु ने उत्तर दिया: “मेरा राज्य इस दुनिया का नहीं है। अगर मेरा राज्य इस दुनिया का होता, तो मेरे दास जंग छेड़ रहे होते ताकि मै यहूदियों को न सौपा जाऊं; लेकिन, मेरा राज्य इस दायरे से नहीं है। ‘”

कल्पना कीजिये कि उनका जवाब पिलातुस को कितना अटपटा लगा होगा। उसने यीशु से पुछा: “‘तो तुम एक राजा हो?”

प्रभु ने उसे बोला: “‘आपने मुझे राजा कहकर सही बोला है। मैं इसलिए पैदा हुआ हूँ, और इसलिए दुनिया में आया हूँ ताकि मैं सच के लिए साक्षी दे सकूं। जो कोई मेरी आवाज सुनता है, सच्चाई सुनता है।'”

“सच्चाई क्या है? ‘” पिलातुस ने कहा।

यह स्पष्ट था कि यीशु रोमी साम्राज्य के लिए कोई वास्तविक खतरा नहीं थे। रोम, दार्शनिकों और शिक्षकों से भरा था जो अपना जीवन उच्च विचारों पर चर्चा करके बिताते थे, और वे एक अहिंसक भीड़ थे। पिलातुस यह नहीं समझा कि यीशु ही वास्तव में सत्य है, जो जिंदा और मनुष्य के रूप में अवतीर्ण हैं, और यह कि वह पिलातुस द्वारा पूछे गए हर गंभीर सवाल का जवाब दे सकते थे। लेकिन वो यह जानता था कि यह आदमी मौत के योग्य नहीं है। वो बाहर महासभा के मंथन गुस्से में चला गया और घोषणा की, “‘मैं उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ।'”

महायाजक और बड़े बहुत कठोरता से यीशु पर आरोप लगाने लगे। उनके उठे हाथों और हिंसक जुनून में उठाए आवाज की कल्पना कीजिये। यीशु उनके व्यंग्य का सामना करते हुए, चुपचाप, पूर्ण संतुलन में खड़े रहे। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। लोगों को सच्चाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पिलातुस चकित था। वह यीशु को वापस अंदर ले गया और उससे कहा: “क्या तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है? देखो वो तुम्हारे खिलाफ कितना दोष लगा रहे हैं!”

पिलातुस यीशु के पास वहाँ खड़े होकर उन्हें कुछ बोलने के लिए उत्साहित कर रहा था ताकि वो यीशु के बचाव में कुछ कह सके। लेकिन यीशु ने पहले से ही सच्चाई पर पिलातुस के सवालों का जवाब दे दिया था, और उन्हें अधिक कहने के लिए कुछ भी नहीं था।

पिलातुस यीशु पर हैरान था। यीशु के शाही, आत्मसमर्पित शान्ति के विपरीत, धार्मिक नेता गंभीर से गंभीर सजा की मांग करते रहे। “‘वह यहूदिया भर में शिक्षण देता है – गलील से शुरू करके और यहाँ इतनी दूर तक वो लोगों को उकसाता है।'”

पिलातुस के आगे एक समस्या बड़ती जा रही थी। वो जानता था कि लोग झूठ बोल रहे थे और आरोप झूठे थे, लेकिन वे इसे जाने के लिए राज़ी नहीं थे। और इस यीशु ने खुद का बचाव करने से इनकार कर दिया था। वह अपने को इस झंझट से बाहर कैसे निकले?

जब उसने सुना कि यीशु गलील से नीचे आया है, उसने पूछा था अगर यीशु  वास्तव में एक गलीली था। क्यूंकि बात असल में यह थी कि हेरोदेस अन्तिपस उस क्षेत्र के उत्तरी भाग पर शासक नियुक्त किया गया था, तो फिर पेंतुस यह मामला उसे सौप देता। हेरोदेस को उसके बजाय इस झंझट को संभालना पड़ता!

हेरोदेस उस समय यरूशलेम में था, तो पिलातुस ने यीशु को उसके पास भेज दिया। हेरोदेस यीशु के आने पर खुश था। उसने उन सब चमत्कारों के बारे में सुना था और चाहता था कि यीशु उसके लिए कोई चिन्ह का प्रदर्शन करें। इस हेरोदेस को लोगों को एक तार पर टंगे कठपुतलियाँ बनाकर इस्तेमाल करने की आदत थी क्यूंकि उसे इससे रोमांच होता था। उसने एक बारअपनी युवा सौतेली बेटी को अपना आधा राज्य देने का वादा किया था क्योंकि उसने अपने नृत्य के साथ उसके मेहमानों को खुश किया। उसकी भयानक इच्छा थी एक थाली पर यूहन्ना बप्तिस्मा देने वाले का सर। राजा हेरोदेस को इस तरह का विद्रोही अनुरोध मना करने का साहस नहीं था, और इसलिए यीशु के चचेरे भाई को उसी दिन मौत का सामना करना पड़ा।

यह सोचना दिलचस्प है यीशु की उन प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिक्रिया क्या थी जो पिता उसके मार्ग में लाए थे। जिनके दिल खुले लेकिन चोट खाए हुए थे, उनके लिए वह चमत्कार और सच्चाई का संदेश लाए। शिष्यों या निकोदेमुस या मार्था और मरियम की तरह विश्वास में उनके साथ खड़े होने वालों के लिए, उन्होंने परमेश्वर के रहस्यों के बारे में गहरे से गहरा खुलासा किया। यीशु ने पीलातुस के सवालों के जवाब इज्ज़त और सम्मान से दिया – अपने उच्च, अनन्त राज्य के बारे में रहस्य एक ऐसे आदमी के साथ बांटा जो अधिकार के स्तरों और दुनिया में शासन के बारे में बहुत समझटा था। परमेश्वर के अपने लोगों के कड़े – दिल, धार्मिक नेताओं के लिए, वह पश्चाताप करने के लिए और परिवर्तन लाने के अवसरों के साथ बार – बार आए। जब उन्हें मारने के लिए कार्यवाही चल रही थी, तो उन्होंने जवाब नहीं देने का कारण यह बताया कि वो नहीं सुनेंगे। यह छोटी सी स्पष्टीकरण भी उनके नेताओं को मन बदलने के लिए एक ‘दरवाजे में एक दरार’ का एक अवसर प्रदान करती थी।

यीशु ने प्रत्येक व्यक्ति से उनके जरूरत के स्थान पर मुलाकात की और खुद को ऐसे दिया जिसको वो समझ नहीं सकते थे, प्रत्येक को उतना उभारा जितनी आत्मा ने उन्हें अनुमति दी। यहाँ तक कि उनकी चेतावनी भी एक दया थी, क्योंकि वह एक दयावंत परमेश्वर की चेतावनियाँ थी। तो यह देखना दिलचस्प है कि जब प्रभु को हेरोदेस के सामने लाया गया था, यीशु ने पत्थर जैसी चुप्पी बनाई रखी।

धार्मिक नेता अपने आरोपों और मांगों के साथ आए थे। हेरोदेस को उनके लिए कोई बड़ा स्नेह नहीं था। उन्होंने एक दूसरे के प्रति आपसी अवमानना ​​में लंबे साल बिताए थे। इसके पश्चात, वह सवाल के बाद सवाल के साथ यीशु की ओर मुड़े, लेकिन यीशु के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था। परमेश्वर का पुत्र, परमेश्वर की शक्ति और सच्चाई का इस्तेमाल इस घृणित आदमी द्वारा अपने खुद के मनोरंजन के लिए अनुमति नहीं देगा। जैसे ही हेरोदेस को यह एहसास हुआ कि उसका यीशु पर कोई बोलबाला नहीं था, उसका मोह उपहास में बदल गया। उसने इस भटकते उपदेशक के साथ मनोरंजन का एक और रास्ता निकल लेगा। वह और उसके साथ सैनिक प्रभु का ठठ्ठा उड़ाने लगे। उन्होंने एक राजा के लायक एक खूबसूरत, शाही वस्त्र लेकर उसके कन्धों एक चारों तरफ बाँध लिया, और इस बढ़ई के शाही सत्ता के योग्य होने के दावे को तिरस्कृत करने लगे। तब उन्होंने यीशु को वापस पिलातुस के पास भेजा। उस समय तक, हेरोदेस और पीलातुस के बीच एक शांत दुश्मनी रही थी। पर जब दोनों को इस शांत उपदेशक के खिलाफ परिहासशील यहूदी नेताओं का सामना मिलकर करना पड़ा लेकिन, उनको एक जुट होने का मौका मिला। वे महासभा से घृणा करते थे, और सच्चा राजा जब आया, तो अपने घुटने झुकाने में विफल रहे। उस दिन से, वे दोस्त बन गए।

कहानी १६६: सरकारी कार्यवाही 

मत्ति २७:१-१०; मरकुस १४:४८-६५; लूका २२:५२, ६३-७१; यूहन्ना १८:२४-२६

Jesus Faces Pontius Pilate

धार्मिक शासकों ने उनकी गिरफ्तारी की रात से पहले ही यीशु की कार्यवाही के परिणाम का फैसला कर लिया था। उनको यह सुनिश्चित करना था कि यह उनकी मौत के साथ समाप्त होगी।वो बहुत ज्यादा खतरनाक था। लेकिन कैफा के घर में मसीह के साथ गुप्त रूप से धौस जमाना अवैध था। क्यूंकि यह रात के अंधेरे में आयोजित किया गया था, उनके निर्णय में कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं थी। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, उनको पूरे महासभा के सामने, दिन की रोशनी में एक पूर्ण पैमाने पर यह कार्यवाही आयोजित करनी थी। लेकिन दिन के उजाले में, यरूशलेम की सड़कों पर फसह पर्व की भीड़ भी एकत्रित होती। यीशु बेहद लोकप्रिय थे, और उसकी गिरफ्तारी की खबर तेजी से फैल जाती। याजक जानते थे कि अगर लोगों को यह पता चले कि यीशु एक अपराधी ठहराया गया है, तो एक गंभीर विद्रोह हो सकता था। तो सुबह तडके, भीड़ के जागने से पहले, वे इस कार्यवाही को महायाजक के घर से सामान्य वकील कक्ष में ले गए।

महायाजक और पुरनी यीशु की मृत्यु पर चर्चा करने के लिए इकट्ठे हुए। तब वे प्रभु को आगे लाए और उनसे पूछा, “‘अगर तुम मसीह हो, तो हमें बताओ।'”

यीशु ने उत्तर दिया:  “‘अगर मैं आपको बताऊंगा, तो आप यकीन नहीं करेंगे, और अगर मैं एक सवाल पूछू, तो आप जवाब नहीं देंगे।” वह जानते थे कि उनके पास इन लोगों के साथ बात करने के लिए कोई कारण नहीं था। तो उन्हेंने उनके जानलेवा महत्वाकांक्षाओं को औचित्य साबित करने के लिए जानकारी दे दी:
” लेकिन अब से, मनुष्य का पुत्र परमेश्वर की शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठेगा'”

वाह। एक बार फिर, यीशु ने ना केवल यह घोषित किया कि वह दिव्य थे, लेकिन यह कि वह परमेश्वर के सिंहासन से पृथ्वी पर सत्ता में राज करेंगे। क्या उनमे से कोई यह सुन कर काँप उठा? क्या उनमें से किसी ने इसकी सच्चाई के बारे में चिंता नहीं करी? यदि उन्होंने किया भी, तो उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा। “‘हमें आगे और गवाही की क्या जरूरत है?'” उन्होंने डाह से घोषणा की। “‘हमने उसके ही मुंह से अपने आप सुना है।'”

अब, यहूदा अभी भी आसपास छिपा देख रहा था कि क्या होने जा रहा था। जब उसने देखा की कार्यवाही बदतर होती जा रही है, उसे एहसास हुआ कि उसके पूर्व गुरु की मौत जल्दी आ रही है। अचानक, वह पश्चाताप से भर गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था कि बात यहाँ तक पहुँच जाएगी! वह अपने चांदी के तीस टुकड़ों के साथ महायाजक के पास गया। “‘मैंने निर्दोष खून को धोखा देकर पाप किया है।'”

वे अवमानना ​​के साथ यहूदा को देखने लगे। एक निष्पक्ष सुनवाई की गवाही में, इस तरह का एक बदलाव बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। यह कोई साधारण गवाह नहीं था, यह वही था जिसने यीशु को पकड़वाया था। निश्चित रूप से, उसके शब्दों को भारी वजन मिलते – इसलिए क्यूंकि वो यीशु के आंतरिक चक्र का एक सदस्य था! देशद्रोही अपनी बेगुनाही की घोषणा करने आया था! लेकिन धार्मिक नेता यीशु को मारने की अपनी योजना के रास्ते में आई कोई जानकारी में दिलचस्पी नहीं रखते थे। “‘हमें इससे क्या लेना देना? इसको अपने आप देख लो! ‘”वे बोले।

यहूदा ने मंदिर में ही चांदी के सिक्के फेके और भाग गया। अपने दुख और निराशा में, वह एक खेत में गया और खुद को गर्दन से लटका दिया। दिन की भयावहता फैल रही थी।

नेता जानते थे कि वह यह सिक्के मंदिर के खजाने में नहीं डाल सकता थे। यह खून का पैसा था। यह कलंकित था। उन्होंने इस बात को अनदेखी किया कि वे विश्वासघात खरीदने के लिए पैसे का उपयोग करने से, उस पैसे से ज्यादा कलंकित थे। उन सिक्कों से ज्यादा, परमेश्वर के मंदिर में इन याजकों की कोई जगह नहीं थी। सभी सच्ची धार्मिकता पूरी तरह से त्यागी हुई थी, लेकिन वे, खुद के साथ भी, इस ढोंग को ज़ारी रखते रहे। उन्होंने यहूदा के चांदी के सिक्कों से ‘पॉटर फील्ड’ नामक एक क्षेत्र को खरीदा – यह एक जगह थी जहाँ राष्ट्र के लिए अजनबी को दफन किया जाता था। आने वाले महीनों और वर्षों में, यह “, हकेल्दामा” के नाम से जाना गया, या ‘रक्त का खेत।’

और परमेश्वर का वचन पूरा किया गया। यह वैसे हुआ जैसे यिर्मयाह ने कहा था:
न्‍होंने वे तीस सिक्के अर्थार्थ उस ठहराए हुए मूल्य को (जिसे इस्‍त्राएल की सन्‍तान में से कितनोंने ठहराया था) ले लिए।
और जैसे प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी, वैसे ही उन्‍हें कुम्हार के खेत के मूल्य में दे दिया।।

जैसे यीशु की कार्यवाही का दिन चल रहा था, प्रभु के सच्चे अनुयायी बिखरे हुए थे। महासभा ने उनके परमेश्वर को दोषी ठहराया और उसे बाध्य कर दिया। अब जब उनका खुद का फैसला औपचारिक हो गया था, उन्होंने यीशु को रोमी राज्यपाल के सामने ले जाने का फैसला किया। असल में,  महासभा की शक्ति बहुत सीमित थी। वे वास्तव में अपने देश पर राज नहीं करते थे। रोमी साम्राज्य ने उन्हें राज्य में कुछ आजादी दी थी, लेकिन प्राधिकरण के असली मुद्दों में, वे अप्रासंगिक थे। वे यहूदी लोगों पर हावी हो सकते थे जो परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उनके साथ सम्मानजनक थे। वे अपने प्रतिष्ठा के बल का उपयोग कर उन्हें डरा धमका सकते थे। लकिन सच्चाई यह थी कि जो कुछ भ वो करते थे, उसे रोम के आदेशों के साथ अनुकूल होना था। उनके पास किसी पर मौत की सजा सुनाने की कोई शक्ति नहीं थी। अगर वे चाहते थे कि यीशु को मारा जाए, तो उन्हें उसे रोमी राज्यपाल के पास ले जाना पड़ता था, क्यूंकि यह निर्णय उन्ही के हाथों में था।

जिस रोमी सम्राट को यहूदिया के नेत्रित्व में डाला गया था, उस आदमी का नाम पेंतुस पीलातुस था। वह क्रूर होने के लिए जाना जाता था, और वह यहूदी लोगों से सख्त घृणा करता था। वे एक क्षुद्र, अपरिष्कृत समुदाय था जिसके लोग हमेशा एक दुसरे से छोटी छोटटी बातों में युद्ध करते थे। रोम की भव्यता और उसके शानदार इमारतों, उनके शानदार सेनाओं में प्रदर्शित विशाल शक्ति, साम्राज्य भर में स्थापित अविश्वसनीय सामाजिक आदेश, और उनके राजनीतिक प्रणाली की भव्यता की तुलना में, इसराइल पृथ्वी में एक बेजोड़, पिछड़ा छेद लगता था।

पिलातुस एक ऐसी धूल भरी, फुटपाथ जैसे राज्य पर शासन के सौंपे जाने पर खुश नहीं था –  थिस्सलुनीके या इफिसुस की तरह विशाल महानगरों के मामलों और सुख से इतनी दूर। यह एक अपमान था। लेकिन उसकी जगह उन शक्तिशाली पुरुषों के साथ बहस करने के लिए नहीं थी जिन्होंने उसे वहां रखा। अगर वह उनकी अच्छी तरह से सेवा करता, तो शायद वे उसे एक अधिक सहमत स्थल के लिए उसे बढावा देते – ऐसा जो वास्तविक सत्ता और प्रतिष्ठा की हो। रोम को उसके साथ खुश रहना था, इसलिए यह इसका फ़र्ज़ था कि वह दुनिया के इस कोने में शांति बनाए रखे। तो जब यीशु की कार्यवाही के दिन पूरी महासभा रोमी सेनापति के रियासत में गुस्से से घुसी, उसने इस बात पर ध्यान दिया। यह बात आखिरकार कहाँ तक जएगी?

कहानी १६४: अन्नास के घर में प्रभु 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

Accusation of Jesus on Good Friday

रात की शांति में, उसके चेलों थके हुए नींद में गिर गए। यीशु प्रार्थना में अपने पिता के पास चले गए। तीन बार उन्होंने वह बोझ हटा देने को माँगा। क्या पिता इस काम को हटा सकते थे? क्या यीशु किसी तरह आने वाली पीड़ा को आने से रोक सकते थे? क्या उन्हें परमेश्वर का वह प्रकोप का प्याला पीना ही पड़ा था? क्या यह सुचमुच मनुष्य के उद्धार एक ही रास्ता था? कल्पना कीजिये पिता के अस्सेम प्यार की जब उन्होंने मानव जाति के उद्धार को अपने बेटे से आगे रखा और कहा: “तुम एक ही रास्ता हो।” पुत्र की दिल से, परिपूर्ण प्रेम और समर्पण की कल्पना कीजिये जब उसने अपने ऊपर उस दंड को ले लिया जो हम सब को लेना था।

महायाजक और सिपाही जब यीशु को गिरफ्तार करने के लिए आए, लड़ाई पहले ही जीती हुई थी। परमेश्वर के पुत्र ने पहले से ही अपने आप को दीन किया और परमेश्वर के सामने अपने आप को शून्य किया। उनको पूरी तरह से दूसरी तरफ महिमा का आश्वासन था, और वो इस अंधेरे में पिता की सेवा करेंगे। परमेश्वर उन्हें सर्वोच्च स्थान पर, स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान करेंगे। यीशु का नाम हर नाम से ऊपर होगा, और स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हर घुटना उसके सामने झुकेगा, और हर एक जीभ इस बात का अंगीकार करेगी कि यीशु मसीह हर बात पर प्रभु है। और पुत्र को दिया यह भव्य सम्मान उनके महान प्रेम के पिता को सम्मान और गौरव देगा।

जब यीशु ने क्रूस का सामना किया, उन्हें पता था की यह सब बाते दूसरी ओर है। उसे गिरफ्तार करने जो पुरुष बगीचे में आए थे, वे इस गलत सोच में थे कि वह आने वाली घटनाओं को साकार करना उनकी शक्ति में था। यीशु ने जब अपने को उन विषैली हमलों और शारीरिक शोषण के पीड़ा में खुद को सौप दिया, वह सभी पर प्रभु बने रहे।

शमौन पतरस और शिष्य अपने विश्वास में बढ़ रहे थे, लेकिन उनके पास उस पल की घटनाओं से परे देखने की दृष्टि नहीं थी। जब शमौन पतरस तलवार के साथ आगे बड़ा, उसने एक पल के लिए हिंसा की भयावहता को आमंत्रित किया, जो एक समर्पण का पल था। यीशु ने संघर्ष के अंत की आज्ञा दी और उस आदमी के कान को चंगाई दी जिस पर पतरस ने हमला किया।

फिर वह गिरफ्तार करने वाले आदमियों के ओर मुड़े और बोले: ‘क्या तुम मुझे गिरफ्तार करने के लिए तलवार और लाठियों के साथ आए हो, जैसे कि मै कोई चोर उचक्का हूँ? हर दिन मैं मंदिर में शिक्षण देते तुम्हारे साथ था, और तुमने मुझे गिरफ्तार नहीं किया; लेकिन यह इसलिए हुआ है ताकि इंजील पूरी हो सके। इस समय और अंधेरे की शक्ति तुम्हारी हैं।”

जब चेलों ने यीशु को सुना और देखा कि वह आत्मसमर्पण कर रहे है, वे घबरा कर भाग गए। कल्पना कीजिये कि धार्मिक शासकों ने कैसे उसका ठठ्ठा उड़ाया होगा जब सैनिकों ने यीशु के हाथों और पैरों पर बेड़ी डाली होगी। जब वे उसे ले जा रहे थे, तो एक जवान आदमी उसके पीछे आया था। उसने एक चादर को छोड़कर कोई कपड़े नहीं पहने थे। जब सैनिकों ने देखा कि वो यीशु का एक दोस्त था, उन्होंने उसे गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन वह चादर पीछे छोड़कर भाग गया। वह उस ठंडी रात में नग्न चला गया – अपने प्रभु के हाल देख कर तहस – नहस।

भीड़ अंधेरे में अन्नास के घर की ओर बड़ी, जो इस्राएल पर एक पूर्व महायाजक था। वो कैफा का ससुर था – कैफा एक महायाजक था। वो कैफा ही था जिसने यह घोषणा की कि देश को बचाने के लिए, मसीह के लिए मरना बेहतर था। अगर रोमी यीशु के बढ़ाए हुए उत्तेजना से थक जाते, तो वे अपनी स्वतंत्रता के सभी पहलों पर रोक टोक लगाते। यह, ज़ाहिर है, हास्यास्पद था। रोमियों ने न तो मसीह की यात्राओं न उनके सन्देश पर कोई चिंता दिखाई थी। लेकिन यह एक अच्छा बहाना था। इस महायाजक को क्या पता कि उसकी विषैली घोषणा वास्तव में परमेश्वर से एक भविष्यवाणी थी।

कैफा का मसीह के प्रति द्वेष का असली कारण ज्यादा निजी था। वह ईर्षापूर्ण था। वह एक लम्बे समय से प्रतिष्ठा और प्रभाव के एक परिवार से आता था। उन्हें सत्ता चलाने और देश की दिशा को नियंत्रित करने की आदत थी। यह युवा उपदेशक उनके इस कार्यवाली में एक खतरा था – और इसे रस्ते से हटाना था। अब उसे और राष्ट्र की घाटियों और दरारें में आसपास चुपके, अज्ञानी भीड़ में घुलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उसे आखिरकार उन लोगों का सामना करना था जिसके नेतृत्व की अवहेलना उसने अपने शर्तों पर करने की हिम्मत की थी। कितनी दुष्टतापूर्वक कैफा और उसके साथी शासकों ने उनको अपमानित करने के चस्के का स्वाद लिया होगा।

शमौन पतरस अपने प्रारंभिक आतंक से बाहर निकल गया था। उसने भीड़ का पीछा किया ताकि वो आने वाली घटनाओं के खुलासे पर नजर रखे। यूहन्ना भी साथ आया था। वो अन्नास के घर में जाना जाता था, तो जब  यीशु को पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा था, उसे रियासत पर आने की अनुमति दी गई थी। पतरस को बाहर इंतजार करना पड़ा, लेकिन यूहन्ना को  उसके लिए द्वारपाल के पास जाना पड़ा। जब पतरस उसके लिए बाहर इंतजार कर रहा था, वहीं दरवाजे पर काम करने वाली एक छोटी गुलाम लड़की उसके पास आई और कहने लगी, “‘क्या आप भी इस आदमी के शिष्यों में से एक नहीं हैं, हैना?” क्षण भर की प्रतिक्रिया में पतरस ने कहा:  “मैं नहीं हूँ। ‘”उसने सोचने से पहले ही, पहली बार अपने प्रभु का इनकार किया था।

यूहन्ना पतरस को दरवाज़े के अंदर ले जा पाया, तो पतरस आंगन में चला गया और दास और सैनिकों के साथ खुद को गर्म करने के लिए कोयले की  आग के पास खड़ा हो गया।

इस बीच, अन्नास ने यीशु से उसके चेलों और उसके सिखाए संदेशों के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की। यीशु ने उसे वापस देखा और तथ्य प्रदान किये:  मैंने हमेशा खुल कर स्पष्टता से बोला है, मैंने सभाओं में पढ़ाया है, और मंदिर में, जहाँ सभी यहूदी एकत्रित होते हैं, और मैंने कुछ गुप्त में नहीं बोला है। आप मुझसे सवाल क्यूँ करते हैं? उनसे सवाल करिए जिन्होंने वो सुना जो मैंने  कहा। उन्हें पता है जो मैंने कहा।”

इस पर एक अधिकारी ने यीशु को मारा और भोहे चडाकर कहा: “‘क्या तुम इस तरह से महायाजक को जवाब देते हो?”

यीशु ने साहसपूर्वक उत्तर दिया: ‘अगर मैंने गलत तरीके से बात की है, तो गलत की गवाही मानो; पर अगर सही, तो तुम मुझ पर क्यूँ हाथ उठाते हो? यीशु ने पुराने नियम के शब्दों से जवाब दिया। निर्गमन २२:२८ में, परमेश्वर इस्राएल के देश को बताते है कि आत्मरक्षा में सच्चाई बोलना धार्मिकता है। जाहिर है, अधिकारी परमेश्वर के वचन के धर्मी आदेशों का सम्मान करने से ज्यादा, महायाजक की सुरक्षा के बारे में चिंतित था।

यीशु नैतिक अधिकार के उत्तम बल के साथ अन्नास के सामने खड़े था। अन्नास को कहने के लिए कुछ भी नहीं था। शायद वह थोड़ा परेशान हो गया था। यह स्पष्ट था कि उसके पास यीशु को भयभीत करने के लिए कोई क्षमता थी। उसने उसे वहां से जाने दिया और अपने दामाद के यहाँ भेजा जहाँ महासभा और इसराइल की सर्वोच्च अदालत से लोग पहले से ही एकत्र हुए थे। यह सब समय से पहले साजिश रची गई थी। रात के गहरे अंधेरे में, वे अपने मंदिर की अदालतों में इस तरह के क्रुद्ध करनेवाला संदेशों को उपदेश देने वाले जन की पूछताछ और निंदा की अध्यक्षता करने के लिए आए थे।

कहानी १३९: विजयी प्रवेश

मत्ती २६:६-१३, मरकुस १४:३-९, यूहन्ना ११:५५-१२:११

यहूदियों का फ़सह पर्व आने को था। बहुत से लोग अपने गाँवों से यरूशलेम चले गये थे ताकि वे फ़सह पर्व से पहले अपने को पवित्र कर लें। वे यीशु को खोज रहे थे। इसलिये जब वे मन्दिर में खड़े थे तो उन्होंने आपस में एक दूसरे से पूछना शुरू किया,कि आने वाले दिनों में क्या होगा।

महायाजक और फरीसी उन बातों से सचेत थे जो लोग आपस में कह रहे थे। वे अत्यंत क्रोधित हुए! उच्च सलाहकारों के स्थान में वे यह साज़िश कर रहे थे कि वे यीशु को कैसे पकड़वाएंगे। वे जानते थे कि भीड़ के सामने वे उसे नहीं पकड़ सकेंगे। वह बहुत ही प्रसिद्ध था और उत्तर देने में भी बहुत तेज़ था। वह उन्हें चतुरता में मात दे देता था और बातों तो घुमा देता था। वे लोगों के सामने उसके सवालों का उत्तर देने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। उन्हें और कोई रास्ता ढूंढना था जब भीड़ ना हो। एक बार यदि वह गिरफ्तार हो गया और उसका परिक्षण हो गया तब तक बहुत देर हो जाएगी। साधारण लोग उस सच को ग्रहण कर लेंगे और आराधनालय को अनुमति दे देंगे कि यीशु को क्या सज़ा मिले। आदेश दे दिए गए। यदि किसी को मालूम हो कि यीशु कहाँ है तो उन्हें धार्मिल अगुवों को सूचित करना होगा।

इस बीच, यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को रवाना हो गया, जो दाऊद के शहर से कुछ ही मीलों दूर था। यह मरियम, मार्था और लाज़र का शहर था और वहीं लाज़र रहता था जिसे यीशु ने मृतकों में से जीवित किया था। वहाँ यीशु के लिये उन्होंने भोजन तैयार किया। इस कहानी के दिन, वे सब शमौन कोढ़ी के घर पर थे।

लाज़र उनके साथ था। मरियम उसकी बहन ने जटामाँसी से तैयार किया हुआ कोई आधा लीटर बहुमूल्य इत्र ले कर आई। यह शायद मरियम के दहेज़ का था जो उसे अपने पति को विवाह के ख़ज़ाने कि तरह देना था। मरियम ने तो अपना खज़ाना यीशु में पा लिया था। उसने उस बोतल को खोला और उसे उसके सिर पर उँडेल दिया। मरियम ने जटामाँसी से तैयार किया हुआ कोई आधा लीटर बहुमूल्य इत्र यीशु के पैरों पर लगाया और फिर अपने केशों से उसके चरणों को पोंछा।

उसके मधुर विनम्रता को देखिये जो उसने अपने प्रभु के प्रति अपनी भक्ति के साथ दिखाया। वह उस पर अपने सबसे महान तोहफे को उंडेल रही थी।

जब उसके शिष्यों ने यह देखा तो वे क्रोध में भर कर बोले, “इत्र की ऐसी बर्बादी क्यों की गयी? यह इत्र अच्छे दामों में बेचा जा सकता था और फिर उस धन को दीन दुखियों में बाँटा जा सकता था।” इससे आपको मरियम के महान तोहफे के बारे में पता चलता है। एक मज़दूर को पूरे साल के लिए तीन सौ दिनार मिलते हैं। उसने यह बात इसलिये नहीं कही थी कि उसे गरीबों की बहुत चिन्ता थी बल्कि वह तो स्वयं एक चोर था। और रूपयों की थैली उसी के पास रहती थी। उसमें जो डाला जाता उसे वह चुरा लेता था।

चेले यहूदा कि बात पर यकीन कर रहे थे। मरियम इतनी तुच्छ हरकत कैसे कर सकती थी? वे उसे डाटने लगे लेकिन यीशु ने उन्हें रोका। उसने कहा, “‘तुम इस स्त्री को क्यूँ तंग करते हो?'”

“‘उसने तो मेरे लिए एक सुन्दर काम किया है क्योंकि दीन दुःखी तो सदा तुम्हारे पास रहेंगे पर मैं तुम्हारे साथ सदा नहीं रहूँगा। उसने मेरे शरीर पर यह सुगंधित इत्र छिड़क कर मेरे गाड़े जाने की तैयारी की है। मैं तुमसे सच कहता हूँ समस्त संसार में जहाँ कहीं भी सुसमाचार का प्रचार-प्रसार किया जायेगा, वहीं इसकी याद में, जो कुछ इसने किया है, उसकी चर्चा होगी।’”  मत्ती २६:१०-१३ और मरकुस १४:८

कितना दयालू प्रभु है! और सबसे अचंबित बात यह है कि, हम पीछे मुड़ कर देख सकते हैं कि उसकी भविष्यवाणी पूरी हुई है। मरियम कि महान भक्ति के वर्णन तीनो सुसमाचारों में दिए हुए हैं। इसके विषय में पूरे संसार में बता दिया गया है!

यीशु बैतनिय्याह को रवाना हो गया, जहां वह लाज़र के साथ था और जिसे यीशु ने मृतकों में से जीवित किया था।

यीशु और लाज़र को देखने के लिए विशाल भीड़ इकट्ठा हो गयी। जो पर्व के लिए येरूशलेम जा रहे थे  उन्होंने बैतनिय्याह

जाने कि योजना बना ली। जो लाज़र को देखने गए थे उन्होंने यीशु पर विश्वास किया।

जब महायाजक के पास इसकी सूचना पहुँची तो उन्होंने सलाहकारों को बुला लिया। जब वे उस नयी परिस्थिति के विषय में चर्चा कर रहे थे, उन्होंने यह एहसास हुआ कि लाज़र उस महान चमत्कार का जीवित सबूत है। आज तक किसने सुना था कि किसी ने मौत के ऊपर भी अधिकार पाया हो? उनके पास उसे अस्वीकार करने और कोई रास्ता भी नहीं था।

वहाँ बहुत सारे लोग थे जिन्होंने अपनी आँखों से देखा था।

यह बहुत दिलचस्प है कि इससे धार्मिक अगुवे एक पल के लिए भी नहीं रुके। क्या वे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसने एक मृतक को जीवित किया? क्या वे उसके साथ उलझना चाहते थे जिसके पास अकल्पनीय सामर्थ थी? उन्हें यह साबित करने के लिए कि वह मसीहा है वह और क्या कर सकता था? परन्तु धार्मिक अगुवों के अपने ईर्षा के कारण वे समझदार नहीं थे। नहीं, उन्होंने निर्णय लिया। इस यीशु का मरना अवश्य है और साथ में उसके साथी का भी।

कहनी १३२: पवित्र विवाह 

मत्ती १९:१-१२, मरकुस १०:१-१२

यीशु ने जब प्रार्थना के विषय में अपनी आश्चर्यजनक लेकिन उज्ज्वल, स्वच्छ शिक्षाओं को समाप्त किया, वे उत्तर के क्षेत्र से पेरी कि ओर गए। उन्होंने यरदन के उस पार, यहूदिया के क्षेत्र में सफ़र किया। फिर भीड़ उसे घेरी रही और वह उन्हें एक एक कर के चंगाई देता गया। कल्पना कीजिये, कि कैसे लोग उसके अद्भुद चमत्कारों को देखकर अचंबित हुए होंगे, और चंगाई पा कर कैसे आनंद मना रहे होंगे! वे उसकी शिक्षा को ध्यानपूर्वक सुनते रहते होंगे। हज़ारों सालों में इस्राइल में ऐसा देखने को नहीं मिला होगा। यह व्यक्ति कौन हो सकता है?

उसके उज्जवल, राज्य के कार्य के बीच, कुछ फरीसी यीशु के पास आये। उन्होंने बहुत चतुरतापूर्वक ऐसे सवाल पूछने के लिए तैयार जिससे कि वे उसे फसा सकें। यदि वे यीशु को व्यवस्था के विरुद्ध को बोलने के लिए उक्सा सकते हैं तो उन्हें उसे पकड़ने का अच्छा कारण मिल जाएगा। सो उन्होंने उससे पुछा,“क्या यह उचित है कि कोई अपनी पत्नी को किसी भी कारण से तलाक दे सकता है?”

यीशु ने उत्तर दिया;
“’क्या तुमने शास्त्र में नहीं पढ़ा कि जगत को रचने वाले ने प्रारम्भ में,‘उन्हें एक स्त्री और एक पुरुष के रूप में रचा था?’ और कहा था ‘इसी कारण अपने माता-पिता को छोड़ कर पुरुष अपनी पत्नी के साथ दो होते हुए भी एक शरीर होकर रहेगा।’ सो वे दो नहीं रहते बल्कि एक रूप हो जाते हैं। इसलिए जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे किसी भी मनुष्य को अलग नहीं करना चाहिये।’”

यह कितना शुद्ध और पवित्र कल्पनीय है। कितना ख़ूबसूरत सच है! यह सीधे सृष्टि कि कहानी से लिया गया है! विवाह समय के शुरू में ही दो आत्माओं के संगम कि शुरुआत थी। परमेश्वर के उत्तम बगीचे में, उसने आदम और हव्वा को सिद्ध प्रेम में बाँध दिया था। परमेश्वर निरंतर अपने बच्चों को उस सिधत्ता के प्रति प्रयास करने के लिए बुलाता रहता है जो स्वर्ग के लिए बनाई गयी है।

लेकिन फरीसियों को परमेश्वर कि अच्छी बातों में दिलचस्पी नहीं थी। वे बस यीशु को किसी गलत इलज़ाम में फ़साने के प्रयास में लगे रहते थे। सोचिये उस भीड़ के बारे में जो अपने कुलीन अगुवों को यह कहते सुनते रहते हैं कि कैसे वे यीशु को फिर से कैसे गिराएंगे! वे बोले,“फिर मूसा ने यह क्यों निर्धारित किया है कि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। शर्त यह है कि वह उसे तलाक नामा लिख कर दे।”

यीशु ने उनसे कहा,
“’मूसा ने यह विधान तुम लोगों के मन की जड़ता के कारण दिया था। किन्तु प्रारम्भ में ऐसी रीति नहीं थी।तो मैं तुमसे कहता हूँ कि जो व्यभिचार को छोड़कर अपनी पत्नी को किसी और कारण से त्यागता है और किसी दूसरी स्त्री की ब्याहता है तो वह व्यभिचार करता है।’”

एक बार फिर से यीशु ने उन फरीसियों के टेढ़े शब्दों को लेकर सब कुछ सीधा कर दिया। फरीसी व्यवस्थाविवरण २४:१-४ के विषय में बात कर रहे थे। उस आज्ञा में, मूसा कहता है कि, यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को विश्वासघाती पाता है और वह दूसरे पुरुष से विवाह करती है और फिर वह उसे तलाक देता है, उसके पहला पाती दुबारा विवाह नहीं कर सकता है। यह परमेश्वर द्वारा स्थापित विवाह के विरुद्ध एक बहुत ही घिनौना पाप है। जो व्यव्यस्था यहूदियों को तलाक से दूर रहने के लिए बनाई गयी थी, वे उसे तलाक को उचित सही साबित करने के लिए उपयोग कर रहे थे। एक बार फिर, यीशु ने अन्धकार के श्राप को शुद्ध ज्योति से ढांप दिया।

फिर भी यहूदी लोगों में फरीसियों कि शिक्षाएँ बहुत गहरायी से उतर रही थीं। बाद में, जब वे भीड़ के बीच से अपने घर को चले गए, वे चर्चा करते रहे। उन्होंने कहा,”यदि यही दशा पति पत्नी के बीच रही, तो विवाह ना करना ही अच्छा है!”

फिर यीशु ने उनसे कहा,
“’हर कोई तो इस उपदेश को ग्रहण नहीं कर सकता। इसे बस वे ही ग्रहण कर सकते हैं जिनको इसकी क्षमता प्रदान की गयी है। कुछ ऐसे हैं जो अपनी माँ के गर्भ से ही नपुंसक पैदा हुए हैं। और कुछ ऐसे हैं जो लोगों द्वारा नपुंसक बना दिये गये हैं। और अंत में कुछ ऐसे हैं जिन्होंने स्वर्ग के राज्य के कारण विवाह नहीं करने का निश्चय किया है। जो इस उपदेश को ले सकता है ले।’”

यीशु एक चेतावनी दे रहे थे। जब चेलों ने कहा कि “इससे बेहतर है विवाह ना करें” तब यीशु ने कहा,”तुम ठीक कहते हो!” अदन के बगीचे में, विवाह परमेश्वर का अपनी रूप को प्रदर्शित करने कि परम योजना थी। परन्तु पाप के कारण बहुत सी चीज़ें टूट गयीं। इस श्राप के समय में, परमेश्वर के विशेष  युद्ध करने वाले सेवकों को बुलाया गया है। वे विवाह के के अद्भुद ख़ज़ाने को एक तरफ रख कर परमेश्वर के राज्य के प्रति पूर्ण सेवा करने के लिए उनका त्याग कर देते हैं। परन्तु मनुष्य विवाह के प्रति जोश और भावना से भरे होता है जिन्हें परमेश्वर ने विवाह को सम्पूर्ण करने के लिए बनाया है। हमें साझेदारी के लिए  बनाया गया है, अपने पति या पत्नी के साथ एक मन होने के लिए बनाये गए हैं। बहुत से लोग विवाह में समर्पित होने के लिए तैयार नहीं होते हैं। विवाह से हट कर उस जीवन को अपनाने कि सामर्थ ही परमेश्वर का एक पवित्र। तोहफा है। यह उस उच्च और पवित्र बुलाहट है!

जब हम यीशु के चेलों के जीवन कि ओर देखते हैं, हम उस सामर्थी तोहफे को देखते हैं! जब उनके जीवन जोखिम में थे, और जब उन पर पथराव हो रहा था, और जब वे अनजान जगाहों में जाया करते थे, उन्हें अपने बाल बच्चे पीछे छोड़ने में कोई भय नहीं था। उन्होंने इस संसार कि सब अच्छी चीज़ों का त्याग कर दिया था क्यूंकि उन्हें स्वर्ग कि उन उत्तम चीज़ों का स्वर्गीय दर्शन मिला हुआ था। यीशु के लिए आत्माओं को जीतना और उस महान महिमा को पाने के लिए वे इस संसार कि चीज़ों को तुच्छ समझते थे!

कहनी १२७: लाजर का आश्चर्य

यूहन्ना ११:१७-५४

यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को गया। यह एक खतरनाक निर्णय था, जो वास्तव में नहीं था! यहूदी अगुवे यीशु को मार देना चाहते थे, और येरूशलेम छोड़ कर वह यरदन नदी को चला गया। केवल अभी के लिए, यीशु का मित्र लाज़र मर रहा था, और यीशु उसकी सहायता के लिए जा रहा था। फिर भी यीशु ने जाने से पहले बहुत दिन तक रुका रहा। क्यूँ? यह परमेश्वर कि इच्छा थी कि लाज़र मरे ताकि यीशु उसे कब्र से बाहर निकाल सके। इससे परमेश्वर कि महिमा होगी, और बहुत लोग विश्वास करेंगे, और उसके मित्रों का विश्वास भी बढ़ेगा। परमेश्वर के काम कई बार अनोखे लगते हैं, लेकिन उसका समय और कारण उत्तम होते हैं।

जब यीशु बैतनिय्याह पहुँचा, उन्हें पता चला कि लाज़र मर गया है, जैसा कि यीशु ने कहा था। लाज़र को कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं। बैतनिय्याह यरूशलेम से लगभग तीन किलोमीटर दूर था। भाई की मृत्यु पर मार्था और मरियम को सांत्वना देने के लिये बहुत से यहूदी लोग आये थे। इन स्त्रियों के दुःख कि कल्पना कीजिये। वे कितनी परेशां हो रही होंगी। उनका अपना प्रिया यीशु, जो दूसरों को चंगाई देता था और दूसरों को मुर्दों में से जिलाता था, उसने आने से इंकार कर दिया है। वह लाज़र को बचा सकता था! और अब चार दिन बाद, वह पहले आने वालों में से भी नहीं था जो आकर उनकी सुद्धि लेता।

जब मार्था ने सुना कि यीशु आया है तो वह उससे मिलने गयी। जबकि मरियम घर में ही रही। वहाँ जाकर मारथा ने यीशु से कहा,“हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई मरता नहीं। पर मैं जानती हूँ कि अब भी तू परमेश्वर से जो कुछ माँगेगा वह तुझे देगा।”

यीशु ने उससे कहा,“’तेरा भाई जी उठेगा।”

मार्था ने उससे कहा,“मैं जानती हूँ कि पुनरुत्थान के अन्तिम दिन वह जी उठेगा।” उसने नहीं समझा कि लाज़र उसी दिन जी उठने वाला है! 

यीशु ने उससे कहा,’“मैं ही पुनरुत्थान हूँ और मैं ही जीवन हूँ। वह जो मुझमें विश्वास करता है जियेगा। और हर वह, जो जीवित है और मुझमें विश्वास रखता है, कभी नहीं मरेगा। क्या तू यह विश्वास रखती है।’”

वह यीशु से बोली,“हाँ प्रभु, मैं विश्वास करती हूँ कि तू मसीह है, परमेश्वर का पुत्र जो जगत में आने वाला था।”

उसने घोषित कर दिया था, और इसलिए यह उसके लिए सच्च हो गया था। यह उज्जवल था और अनंतकाल के लिए था। यीशु ने उसके विश्वास को स्वीकार कर लिया था। यह उन धार्मिक अगुवों के बहस और सवालों के सामने कितना सुन्दर और साधारण था।

जब यीशु ने कहा कि वे जो उस पर विश्वास करते हैं वे कभी नहीं मरेंगे, तो क्या उसका मतलब शारीरिक मृत्यु से था? हम जानते हैं कि यह सच नहीं है। सभी चेले मर चुके हैं, और मार्था और मरियम भी। लेकिन उनकी मृत्यु हमेशा के लिए नहीं थी, यह केवल इस श्रापित दुनिया से निकल कर उस दूसरी दुनिया में जाने के लिए था। और वह दूसरी दुनिया, जहां यीशु राज करता है, वह एक शानदार जगह है!

फिर इतना कह कर वह वहाँ से चली गयी और अपनी बहन को अकेले में बुलाकर बोली,“गुरू यहीं है, वह तुझे बुला रहा है।” जब मरियम ने यह सुना तो वह तत्काल उठकर उससे मिलने चल दी।

जब बाकी के लोगों ने उसे ऐसे जल्दी में घर के अंदर जाते देखा, तब वे भी उसके पीछे चल दिए। यीशु अभी भी उसी स्थान में था जहां मार्था उसे मिली थी, और इसलिए वह  गाव में अभी नहीं गया था। मरियम जब वहाँ पहुँची जहाँ यीशु था तो यीशु को देखकर उसके चरणों में गिर पड़ी और बोली,“हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई मरता नहीं।”

इन दोनों मित्रो का दुःख कितना बड़ा था जब वे यीशु का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने कितना दुःख सहा! यीशु ने अपने प्रिया मित्र पर नज़र डाली और श्राप के कारण मौत पर रोया। उसने देखा कि बाकी के परिवार जन लाज़र को खो देने के दुःख से रो रहे हैं, जो कि एक सिद्ध व्यक्ति था। बाइबिल बताती है कि यीशु “कि आत्मा तड़प उठी” उसे उनकी पीड़ा से नफ़रत थी! फिर भी जब वह उनके दुःख को देख कर उस समय के लिए दुखी था, वह जानता था कि आनंद अभी आना है।

इस पर जिन्होंने यीशु के आसूँ देखे वे कहने लगे,“देखो! यह लाज़र को कितना प्यार करता है।” लेकिन दूसरे केवल शिकायत करने लगे।

मगर उनमें से कुछ ने कहा,“यह व्यक्ति जिसने अंधे को आँखें दीं, क्या लाज़र को भी मरने से नहीं बचा सकता?” वे नहीं समझ पाये कि परमेश्वर का एक ऊंची योजना थी जो वह प्रकट करने जा रहा था। जो दुःख लाज़र, मरियम और मार्था को मिला, उसके बाद वे प्रभु को महिमा देने जा रहा हैं!

तब यीशु अपने मन में एक बार फिर बहुत अधिक व्याकुल हुआ और कब्र की तरफ गया। यह एक गुफा थी और उसका द्वार एक चट्टान से ढका हुआ था। लाज़र उसके अंदर था। यीशु ने उन्हीन पत्थर को हटाने को कहा। मार्था बोल उठी। वह अपने भाई कि यादों को अपमानित नहीं करना चाहती थी।

मार्था ने कहा,“हे प्रभु, अब तक तो वहाँ से दुर्गन्ध आ रही होगी क्योंकि उसे दफनाए चार दिन हो चुके हैं।”

यीशु ने उससे कहा,“’क्या मैंने तुझसे नहीं कहा कि यदि तू विश्वास करेगी तो परमेश्वर की महिमा का दर्शन पायेगी।’”

तब उन्होंने उस चट्टान को हटा दिया। और यीशु ने अपनी आँखें ऊपर उठाते हुए कहा,“’परम पिता मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ क्योंकि तूने मेरी सुन ली है। मैं जानता हूँ कि तू सदा मेरी सुनता है किन्तु चारों ओर इकट्ठी भीड़ के लिये मैंने यह कहा है जिससे वे यह मान सकें कि मुझे तूने भेजा है।’” 

यह एक बहुत ही अद्भुद प्रार्थना थी! यीशु जिस वार्तालाप को हमेशा अपने पिता के साथ करता था उसे ऊँची आवाज़ में कहा। यीशु यह दर्शा रहे थे कि लाज़र को जिलाना उसका परमेश्वर के प्रति प्रतिक्रिया थी, और उसे पूरा विश्वास था कि पिता उसे वह करने के लिए पूरी सामर्थ देगा!

उसने ऊँचे स्वर में पुकारा,“’लाज़र, बाहर आ!’” वह व्यक्ति जो मर चुका था बाहर निकल आया। उसके हाथ पैर अभी भी कफ़न में बँधे थे। उसका मुँह कपड़े में लिपटा हुआ था।

यीशु ने लोगों से कहा,“’इसे खोल दो और जाने दो।’”

लाज़र जी उठा था! थोड़े समय का दुःख था, परन्तु वह जी उठा था, और आनंद आ गया था। आप सोच सकते हैं कि मार्था और मरियम कैसे नाची होंगी? मृत्यु के श्राप ने यीशु के मित्रों को दुःख में दाल दिया था, लेकिन यीशु जीवन को वापस ले आया था। जिस समय वह पाप के शक्तिशाली असर को उल्टा कर रहा था, यीशु ने अपने उज्जवल महिमा को इस्राएल को प्रकट किया। यह परमेश्वर का राज्य था! और यीशु के मित्र उनमें से पहले थे जिन्होंने उसके नाम कि खातिर दुःख सहा था।

यीशु अपने आप को बलिदान होने के लिए दे रहा था, और यह स्पष्ट हो गया था कि उसके चेले भी परमेश्वर कि इच्छा के आगे समर्पित होने के लिए बुलाय गए हैं। यह एक ऐसी विनम्रता है जिसमे एक गहरे विश्वास कि आवश्यकता है। एक समय आता है जब लगता है कि बाहरी बातें संसार कि बातों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यह मानना ज़रूरी है कि परमेश्वर सामर्थी है, और इस दुनिया के बाद एक अनंतकाल का जीवन है, और एक आशा कि वह उन्हें बहुतायत से इनाम देगा जो पूरी लगन से उसे खोजते हैं।

जब यीशु ने मार्था से बात की और उससे पूछा की यदि वह विश्वास करती है, तो वह इसलिए नहीं था कि उसे विश्वास नहीं था। वह उसके विश्वास को उसमें और गहराई से खीचने के लिए ऐसा पूछ रहा था। उसे यीशु पर भरोसा करना था चाहे उसकी सबसे कीमती चीज़ कब्र में बंधी हुई थी। और जिस समय पूरा परिवार यीशु कि सामर्थ में मृत्यु से जीवन कि और जा रहा था, उनकी पहचान यीशु कि पहचान के साथ और भी गहरायी से बंध गयी थी। वह उनके लिए जीवन और आशा बन गया था! आशा कि कितनी अद्भुद छवि हम मृतोत्थान में देखते हैं जो एक दिन हमें अनंतकाल में ले जाएगा!

लाज़र अब जीवित और कुशल था। सोचिये इसके विषय में कैसे खबर फैली होगी। जो व्यक्ति वास्तव में मर गया था, वह यीशु के द्वारा जिलाया गया। येरूशलेम के यहूदि इसके सबसे पहले गवाह बने। उसमें कोई दोराय नहीं थी। लाज़र चार दिन से मृत था, और अब वह जीवित था।

राष्ट्र के लोग यहूदी अगुवों से जवाब मांगेंगे। इस यीशु के पास ऐसे सामर्थ कैसे हो सकती थी जब वह परमेश्वर कि ओर से नहीं था? यदि वह परमेश्वर कि ओर से था और मसीहा था, तो फिर इन अगुवों को क्या हुआ है? वे क्यूँ परमेश्वर के सेवक को मारना चाहते थे? क्या वे मनश्शे कि तरह थे जिन्होंने यशाया नबी को मार दिया था? जिस राजा कि स्मरणशक्ति से सारा इस्राएल नफ़रत करता था? जब यहूदी अगुवे यीशु के पास आये उसे शांत करने के लिए, और यीशु एक परमेश्वर के पुत्र कि तरह उस सामर्थ के साथ खड़ा हुआ था और निडर होकर सच्चाई को घोषित कर रहा था, इससे यह प्रकट हो रहा था केवल एक ही पक्ष सही हो सकता था। क्या यहूदी अगुवे पश्चाताप करेंगे? क्या वे इसे स्वीकार करेंगे कि मसीहा वास्तव में आया था? क्या परमेश्वर के पवित्र लोग विश्वास करेंगे?

बहुत से यहूदी जो मरियम और मार्था कि सुद्धि लेने आये थे, उन्होंने विश्वास किया जो उन्होंने देखा। अन्य लोग फरीसियों के पास गए और उसके विषय में बताया। वे येरूशलेम के महायाजक के पास गए और उन सब बातों के विषय में बताया। यह एक गम्भीर समस्या थी। अगर यह आदमी यीशु, सब लोगों को धोखा देता रहेगा, तो उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा। स्पष्ट रूप से, फरीसी उसे रोक नहीं पा रहे थे।

फिर महायाजकों और फरीसियों ने यहूदियों की सबसे ऊँची परिषद बुलाई। और कहा,“हमें क्या करना चाहिये? यह व्यक्ति बहुत से आश्चर्य चिन्ह दिखा रहा है।” यह एक ईमानदार सवाल था। वे चमत्कारों को कैसे समझा सकते थे?

दूसरों ने कहा,”यदि हमने उसे ऐसे ही करते रहने दिया तो हर कोई उस पर विश्वास करने लगेगा और इस तरह रोमी लोग यहाँ आ जायेंगे और हमारे मन्दिर व देश को नष्ट कर देंगे।” वे इस बात का दावा कर रहे थे कि यीशु ज़बरदस्ती करके रोमियों को इस्राएल से निकाल देगा। वे मंदिर को नष्ट कर देंगे और राष्ट्र को खतम करके सब कुछ शांत कर देंगे। अगले कुछ हफ़्तों के अध्ययन में, यह बहुत स्पष्ट हो जाएगा कि यह सब कितना हास्यास्पद था। रोमी लोग यीशु के विषय में इतना नहीं जानते थे और उससे उनको कोई परेशानी नहीं थी। पिलातुस, जो रोम का सरदार था, वह यीशु को नहीं जानता था। लेकिन इन यहूदी अगुवों के पास अच्छा बहन था यीशु को मरवाने का, और वे इसे मानने को तैयार नहीं थे कि वे उससे जलते थे।

फिर कैफा बोल उठा। वह यहूदी कौम का महायाजक था। अपने सत्र पूरे पर वह अठारा साल तक राज कर चूका होगा। उसे यह पद इतने सालों इसलिए नहीं मिला कि वह एक सच्चा अगुवा था या परमेश्वर उसके राज से प्रसन्न था। वह और उसका ससुर अन्नास मंदिर में और आयहूदी धर्म पर एक बहुत राजवंशीय अधिकार सम्भाल रहे थे, अपने अधिकार को पकड़े रहने के लिए भ्रष्टाचार और हेरा फेरी का उपयोग कर रहे थे। उन्होंने परमेश्वर कि ओर से दिए हुए कार्य को जो उसने अपने लोगों के लिए दिया, अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया। यीशु में, उन्हें एक नया दुश्मन मिल गया था जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। वे उस पर अपने पूरे अधिकार को नहीं चला पाये।

महायाजक कैफा ने उनसे कहा,“तुम लोग कुछ भी नहीं जानते। और न ही तुम्हें इस बात की समझ है कि इसी में तुम्हारा लाभ है कि बजाय इसके कि सारी जाति ही नष्ट हो जाये, सबके लिये एक आदमी को मारना होगा।”

कैफा ने पहले ही निर्णय ले लिया था। यीशु को मरना था। उसे एक सिद्द परिक्षण देने का उसका कोई इरादा नहीं था। दोनों पक्ष कि बातों को सुनने का कोई इरादा नही था। जो इस पर अपनी आवाज़ उठाते थे उनको शांत कर दिया जाता था।

जिस प्रकार कैफा ने बोला वह कितना दिलचस्प था। यीशु को मरना आवश्यक था ताकि राष्ट्र बच सके। परन्तु कैफा ने परमेश्वार कि ओर से दी हुई बुद्धि से कहा। सबसे ऊंचे महायाजक ने इस्राएल के महायाजक को इस भविष्यवाणी को घोषित करने के लिए नियमित किया था, चाहे वह यीशु के पीछे चलता है या नहीं। यीशु वास्तव में राष्ट्र के लिए मरने वाला था। जिस समय यूहन्ना इस कहानी को लिख रहा था, वह च्चता था कि हम निश्चित रूप से इसे समझ लें। उसने कहा कि यीशु ना केवल इस्राएल के देश के लिए मरा, परन्तु उन सब परमेश्वर के बच्चों के लिए जो इस संसार में तितर बितर हैं। वह हमारे विषय में कह रहा था!

इस घोषणा का व्यंग्य यह है कि जिस बात को कैफा टालना चाहता था, वही बात सच्च हुई। कई सालों पश्चात्, यूहन्ना इसके विषय में जान जाता जब वह इस कहानी को लिख रहा था। उसे यह बहुत आश्चार्यजनक लगा होगा। 70 AD में, रोमी राज ने येरूशलेम पर कब्ज़ा कर लिया था और उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था, और इस्राएल देश अगले दो सौ साल तक मौजूद नहीं होगा।

यहूदियों के आराधनालय ने अपने महायाजक के साथ निर्णय ले लिया था। उस समय से, वे साज़िश कर रहे थे कि कैसे सब करेंगे। क्यूंकि यह इतना आसान नहीं था। उनके पास कोई भी कानूनी कारण नहीं था यीशु को मरवाने का। उसने कुछ भी गलत नहीं किया था। वे उसे किसी भी प्रकार के धोखे में नहीं पकड़ सकते थे, लेकिन वे फिर भी रुकने वाले नहीं थे। और इस्राएल में बहुत लोग यीशु पर विश्वास करते थे। यदि वे यीशु को लोगों के सामने पकड़ते हैं, तो दंगे हो जाएंगे। फिर भी वह लोगों से घिरा हुआ रहता था। वे उसे बिना जाने कैसे पकड़ सकते थे?

यहूदियों के आराधनालय कि योजना के विषय में सबको पता लग गया था। अचानक सब कुछ बहुत खतरनाक हो गया था। यीशु यहूदी लोगों के बीच में अब नहीं जा सकता था। इस्राएल में बहुत से थे जो इस आराधनालय के पक्ष में होकर कुछ फ़ायदा उठा सकेंगे। यरूशलेम छोड़कर वह निर्जन रेगिस्तान के पास इफ्राईम नगर जा कर अपने शिष्यों के साथ रहने लगा।

कहनी १२६: लाज़र की यात्रा

यूहन्ना ११:१-१६

यहूदी अगुवे यीशु को गिरफ्तार करने और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। हालात हाथ से बाहर हो रहे थे। इस दुष्ट उपदेशक की लोकप्रियता खतरनाक होती जा रही थी। येरूशलेम के अगुवे अपने अधिकार और प्रभाव को जाते देख रहे थे जब सारी भीड़ यीशु की बातों पर पूरा ध्यान लगा रहे थे। उसे रोकने के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। येरूशलेम में तनाव इतना बढ़ गया था कि यीशु को वहाँ से जाना पड़ा। वह और उसके चेले यरदन कि घाटी को चले गए। यह वह स्थान था जहां यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने अपनी सेवकाई पहली बार शुरू की थी। जब लोग यीशु के पास आ रहे थे, वे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को स्मरण कर रहे थे। यूहन्ना के आने से उत्साह तो था लेकिन उसने यीशुकी तरह चमत्कार नहीं किये थे। लोग आपस में यह बात कर रहे थे कि कैसे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने यीशु के विषय में जो बातें उन्हें बताईं थीं वे सच थीं। बहुत से लोगों ने उस पर विश्वास किया। इससे येरूशलेम के अगुवे और भी अधिक क्रोधित हो गये।

बैतनिय्याह का लाज़र नाम का एक व्यक्ति बीमार था। यह वह नगर था जहाँ मरियम और उसकी बहन मारथा रहती थीं, और वे यीशु से बहुत प्यार करती थीं।

लाज़र और बीमार होता गया और फिर इन बहनों ने यीशु के पास समाचार भेजा,“हे प्रभु, जिसे तू प्यार करता है, वह बीमार है।” जब यीशु यह सुना, वह उनके भेजे हुए सन्देश से ज़यादा समझ गया था। वे स्त्रीयां और सन्देश लाने वाले केवल इसे इंसान की नज़र से ही देख सकते थे। यीशु ने आत्मा में होकर सुना, और परमेश्वर कि इच्छा को पूर्ण रूप से समझ लिया। यीशु ने जब यह सुना तो वह बोला,“’यह बीमारी जान लेवा नहीं है। बल्कि परमेश्वर की महिमा को प्रकट करने के लिये है। जिससे परमेश्वर के पुत्र को महिमा प्राप्त होगी।’”

बाइबिल बताती है कि यीशु, मारथा, उसकी बहन और लाज़र को प्यार करता था। इसलिए जब उसने सुना कि लाज़र बीमार हो गया है तो जहाँ वह ठहरा था, दो दिन और रुका। अपने बीमार मित्र के पास जाने बजाय वह यरदन नदी के निकट ही ठहर गया। यह कितना अनोखा लगता है। यदि वह उनसे इतना प्रेम करता था तो फिर वह उनके पास एक दम क्यूँ नहीं गया? उसने लाज़र को क्यूँ नहीं चंगा किया? वह दूर क्यूँ रुक गया?

दो दिन के पश्चात्, यीशु ने अपने चेलों को बताय कि वे यहूदिया को जाएंगे। वे अपने बीमार मित्र से मिलने के लिए जा रहे थे। केवल एक समस्या थी, वे वापस येरूशलेम को जा रहे थे। उसके सभी दुश्मन वहाँ थे जो उसे मार देना चाहते थे! यह बहुत खतरनाक था। क्या खतरे से बचने के लिए यीशु दूर नहीं रुका था? और यदि ऐसा था, तो अब क्यूँ? उसके चेलों ने कहा,“हे रब्बी, कुछ ही दिन पहले यहूदी नेता तुझ पर पथराव करने का यत्न कर रहे थे और तू फिर वहीं जा रहा है।” यह पागलपन था! वे सब अपनी जान जोखिम में डालेंगे यदि वे उसके साथ जाते हैं। सोचिये यह कितना भयानक होगा। क्या आप कल्पना कर सकते हैं? आप क्या करते?

यीशु ने उत्तर दिया,“’क्या एक दिन में बारह घंटे नहीं होते हैं। यदि कोई व्यक्ति दिन के प्रकाश में चले तो वह ठोकर नहीं खाता क्योंकि वह इस जगत के प्रकाश को देखता है।पर यदि कोई रात में चले तो वह ठोकर खाता है क्योंकि उसमें प्रकाश नहीं है।’”

यीशु का क्या मतलब था? स्मरण कीजिये, यीशु अधिकतर समय अपना वर्णन ज्योति के साथ देता है। यदि चेले उसपर भरोसा करते थे,इसका मतलब उनमें भी वही ज्योति थी। वे कहीं भी जा सकते यह जानते हुए कि वे कभी भी ठोकर नहीं खाएंगे। धार्मिक अगुवे यीशु से अलग जी रहे थे, और इसलिए वे उनके समान थे जो अँधेरे में ठोकर खा कर गिरते हैं। यीशु और उसके चेलों को उनसे डरने कि ज़रुरत नहीं थी। उन्हें केवल परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने का भय होना चाहिए था। परमेश्वर चाहता था कि यहूदिया जाकर लाज़र को देख लें! सो यीशु ने कहा,“हमारा मित्र लाज़र सो गया है पर मैं उसे जगाने जा रहा हूँ।”

क्यूंकि आप देखिये, यीशु जानता था कि लाज़र मर चुका है। परमेश्वर ने यीशु के लिए एक बड़ा चमत्कार करने के लिए तैयार किया हुआ था। वह लाज़र को मुर्दों में जिलाएगा। यीशु जानता था कि परमेश्वर ने सब कुछ आयोजित कर रखा था, और उसे विश्वास था कि वह अपने समय में उसे पूरा करेगा। लेकिन उसके चेले नहीं समझ पाये। फिर उसके शिष्यों ने उससे कहा,“हे प्रभु, यदि उसे नींद आ गयी है तो वह अच्छा हो जायेगा।” वे यह सोच ही नहीं पाये कि लाज़र नहीं रहा। इतने चमत्कार देखने के बाद भी वे समझ नहीं पाये। इसलिये फिर यीशु ने उनसे स्पष्ट कहा,“’लाज़र मर चुका है। मैं तुम्हारे लिये प्रसन्न हूँ कि मैं वहाँ नहीं था। क्योंकि अब तुम मुझमें विश्वास कर सकोगे। आओ अब हम उसके पास चलें।’”

यीशु ने ऐसा क्यूँ कहा कि वह खुश था कि वह वहाँ नहीं था? यदि वह वहाँ होता, उसने लाज़र को मरने से पहले ही ठीक कर दिया होता, और फिर यह चमत्कार इस हद तक नहीं हो पाता।

ऐसा नहीं था कि चेले यीशु पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे। वे अपनी जान उसके लीए जोखिम में डालने को तैयार थे! परन्तु सच्चा विश्वास वो होता है जो गहरा होता जाता है। परमेश्वर कि शिष्यत्व में, वह परिस्थितियों को उन लोगो के लिए बनाता है जो उसके पीछे चलना चाहते हैं, ताकि और बढे।

थोमा जब यीशु को सुन रहा था, वह फिर भी नहीं समझ पाया। वह जानता था कि वापस येरूशलेम जाना खतरनाक था। वह यह भी जानता था कि वह यीशु के लिए अपनी जान को जोखिम दाल रहा है।फिर थोमा दूसरे शिष्यों से कहा,“आओ हम भी प्रभु के साथ वहाँ चलें ताकि हम भी उसके साथ मर सकें।”

चेले मान गए कि वापस जाना एक किसम से मृत्यु ही है! फिर भी यीशु के संग जाने को तैयार हो गए। उनके पास फिर भी यह विश्वास नहीं था उसे मानने का कि समय और जीवन उसके नियंत्रण में है! उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया जब उसने कहा कि उन्हें चिंता करने कि ज़रुरत नहीं है। लेकिन वे उस पर इतना विश्वास ज़रूर करते थे कि उसके लिए अपनी जान दे सकते थे। जब समय आया, क्या वे वास्तव में वैसा कर पाएंगे? क्या उनका साहस स्थिर रहेगा या फिर गिर जाएगा?

कहनी १२५: प्रभु की क्षमाशीलता

लूका १७:१-१०

यीशु जब पेरी से जा रहे थे, उसने अपने चेलों को और सिखाया कि उसके पीछे चलने का मतलब क्या है। उसका समय निकट आ रहा था, और वह जानता था कि ये चेले उसके सन्देश को आगे लेकर जाएंगे। जो यीशु उन्हें  दिखाना चाहते थे वो यह था कि उसके राज्य कि शिक्षाएं धार्मिक अगुवों से बहुत भिन्न थीं जैसा कि वे इस्राएल में रह कर जताते थे। सो उसने उन्हें चेतावनियां दीं जिससे कि वे समझ सकें। उसने कहा :

यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,

“’जिनसे लोग भटकते हैं, ऐसी बातें तो होंगी ही किन्तु धिक्कार है उस व्यक्ति को जिसके द्वारा वे बातें हों। उसके लिये अधिक अच्छा यह होता कि बजाय इसके कि वह इन छोटों में से किसी को पाप करने को प्रेरित कर सके, उसके गले में चक्की का पाट लटका कर उसे सागर में धकेल दिया जाता। सावधान रहो!

“यदि तुम्हारा भाई पाप करे तो उसे डाँटो और यदि वह अपने किये पर पछताये तो उसे क्षमा कर दो। यदि हर दिन वह तेरे विरुद्ध सात बार पाप करे और सातों बार लौटकर तुझसे कहे कि मुझे पछतावा है तो तू उसे क्षमा कर दे।’” -लूका १७:१-४

इस पर शिष्यों ने प्रभु से कहा,“हमारे विश्वास की बढ़ोतरी करा।” वे जानते थे कि इन बातों को मानना कितना कठिन होगा!

इस पर यीशु ने कहा,

“’यदि तुममें सरसों के दाने जितना भी विश्वास होता तो तुम इस शहतूत के पेड़ से कह सकते ‘उखड़ जा और समुद्र में जा लग।’ और वह तुम्हारी बात मान लेता।

“मान लो तुममें से किसी के पास एक दास है जो हल चलाता या भेड़ों को चराता है। वह जब खेत से लौट कर आये तो क्या उसका स्वामी उससे कहेगा,‘तुरन्त आ और खाना खाने को बैठ जा?’ किन्तु बजाय इसके क्या वह उससे यह नहीं कहेगा,‘मेरा भोजन तैयार कर, अपने वस्त्र पहन और जब तक मैं खा-पी न लूँ, मेरी सेवा कर; तब इसके बाद तू भी खा पी सकता है?’ अपनी आज्ञा पूरी करने पर क्या वह उस सेवक का धन्यवाद करता है। तुम्हारे साथ भी ऐसा ही है। जो कुछ तुमसे करने को कहा गया है, उसे कर चुकने के बाद तुम्हें कहना चाहिये,‘हम दास हैं, हम किसी बड़ाई के अधिकारी नहीं हैं। हमने तो बस अपना कर्तव्य किया है।’” -लूका १७:६-१०

कहनी ११९: राज्य पद 

लूका १४:१-२४

फरीसी यीशु पर दोष लगाने के रास्ते ढूंढ रहे थे। वे इस ताक में थे कि वह ऐसा कुछ करे और वे उसके विरुद्ध में उस चीज़ को इस्तेमाल करें! बस उससे कोई नियम तुड़वा सकते। फिर वे उसे पूरे देश के सामने नीचा दिखाते और उसकी आवाज़ को शांत कर देते। सो उन्होंने साज़िश रची कि यीशु सबत के दिन आये। और अवश्य है कि किसी व्यक्ति को लाया जाये जिसे चंगाई कि आवश्यकता है, वो वह उसे चंगाई देने से रुकेगा नहीं। उसमें ऐसी कुछ बात थी कि वह टूटे हुए को ठीक करने से अपने आप को रोक नहीं सकता।

एक बार सब्त के दिन प्रमुख फरीसियों में से किसी के घर यीशु भोजन पर गया। उधर वे बड़ी निकटता से उस पर आँख रखे हुए थे। वे बहुत ही सुंदर कपड़ों में आकर मेज़ पर अपने ऊंचे पद को दिखाने के लिए बैठ गए।

सोचिए यीशु उन सब के सामने कितना साधारण और तुच्छ लग रहा होगा अपने बढई के कपड़ों में? उसके बिगड़े पाँव और साधारण तरीको से कितने क्रोधित हो रहे थे। यह एक साधारण सा आदमी लोगों में इतना प्रसिद्द कैसे हो सकता था? उसे चंगाई कि सामर्थ कहाँ से मिली और उसने ऐसा बोलना कहाँ से सीखा? यह देखकर बहुत गुस्सा आता था कि यह व्यक्ति इज़ज़तदार लोगों का आदर नहीं करता था जो नियम इस्राएल में ज़माने से स्थापित था।

जैसे ही यीशु अंदर आया, वहाँ एक व्यक्ति जो जलोदर से पीड़ित था, उसके सामने आया। यीशु ने यहूदी धर्मशास्त्रियों और फरीसियों से पूछा,“’सब्त के दिन किसी को निरोग करना उचित है या नहीं?’” किन्तु वे चुप रहे। उन्हें सबक मिल गया था। यीशु के साथ बहस करने से अच्छा वे स्वयं जान गए थे। जीत हमेशा उसी कि होती थी।

सो यीशु ने उस आदमी को लेकर चंगा कर दिया। और फिर उसे भेज दिया। यह कितनी घिनौनी बात है कि वे अगुवे लोगों को यीशु के पास चंगाई के लिए इसलिए ताकि वे चंगाई देने वाले को नष्ट कर सकें! अपने लोगों के लिए प्रेम और दया कहाँ थी? वे इस बात से खुश क्यूँ नहीं हुए कि किसी ने छुटकारा पाया है? उनके ह्रदय यीशु के प्रति और अन्य बातों के लिए भी बहुत कठोर थे!

फिर उसने उनसे पूछा,“’यदि तुममें से किसी के पास अपना बेटा है या बैल है, वह कुँए में गिर जाता है तो क्या सब्त के दिन भी तुम उसे तत्काल बाहर नहीं निकालोगे?’” वे इस पर उससे तर्क नहीं कर सके। वह उन्हें बहुत सब्र के साथ समझाता रहा। ये कितने कठोर मन के थे!

भोजन के लिए जब वे बैठ रहे थे, हर एक जन स्वयं के लिए सम्मानपूर्ण स्थान को ढूंढ रहा था। यहूदी लोगों में, आप जिस स्थान में बैठते हैं वह मेज़बान और समाज कि दृष्टी में आपके सम्मान को दिखाता है। हर एक व्यक्ति अपने लिए सम्मानतपूर्ण स्थान को चुनना चाहता था। उनके ह्रदय कितन टूटे और कमज़ोर थे! वे कितने अंधे थे! यह लोग अपने ही स्वार्थ में कितने उलझे हुए थे।

उनकी अंधी आँखें यह नहीं देख पाईं कि वहाँ उपस्थित परमेश्वर का पुत्र इस बात से बिलकुल बेपरवाह था कि वह किस स्थान में बैठेगा। यीशु यह बात जानता था कि वह परमेश्वर पिता के सिंहासन पर उसके दाहिने हाथ पर जाकर बैठेगा! यदि इन लोगों कि आत्मिक आँखें होती तो वे यीशु को सबसे ऊँचें स्थान पर बैठाते। वे उसके हर एक शब्द को पूरे नम्रता पूर्वक सुनते।

यीशु ने यह देखा कि अतिथि जन अपने लिये बैठने को कोई सम्मानपूर्ण स्थान खोज रहे थे, सो उसने उन्हें एक दृष्टान्त कथा सुनाई। वह बोला:

“’जब तुम्हें कोई विवाह भोज पर बुलाये तो वहाँ किसी आदरपूर्ण स्थान पर मत बैठो। क्योंकि हो सकता है वहाँ कोई तुमसे अधिक बड़ा व्यक्ति उसके द्वारा बुलाया गया हो। फिर तुम दोनों को बुलाने वाला तुम्हारे पास आकर तुमसे कहेगा,‘अपना यह स्थान इस व्यक्ति को दे दो।’ और फिर लज्जा के साथ तुम्हें सबसे नीचा स्थान ग्रहण करना पड़ेगा।
“सो जब तुम्हे बुलाया जाता है तो जाकर सबसे नीचे का स्थान ग्रहण करो जिससे जब तुम्हें आमंत्रित करने वाला आएगा तो तुमसे कहेगा, ‘हे मित्र, उठ ऊपर बैठ।’ फिर उन सब के सामने, जो तेरे साथ वहाँ अतिथि होंगे, तेरा मान बढ़ेगा। क्योंकि हर कोई जो अपने आपको उठायेगा, उसे नीचा किया जायेगा और जो अपने आपको नीचा बनाएगा, उसे उठाया जायेगा।”‘”   –लूका १४:८-११

उन लोगों को कितना ही विनम्र और अनुग्रकारी तरीका था उन लोगों को समझाना। फिर यीशु मेज़बान कि तरफ मुड़े। वह दूसरे प्रभावशाली लोगों से घिरा हुआ था। वह इनको अधिक महत्व दे रहा था। वह इसी दुनिया में जीना चाहता था। लेकिन यह परमेश्वर का राज्य कि दुनिया नहीं थी। यीशु ने कहा:

“’जब कभी तू कोई दिन या रात का भोज दे तो अपने मित्रों, भाई बंधों, संबधियों या धनी मानी पड़ोसियों को मत बुला क्योंकि बदले में वे तुझे बुलायेंगे और इस प्रकार तुझे उसका फल मिल जायेगा। बल्कि जब तू कोई भोज दे तो दीन दुखियों, अपाहिजों, लँगड़ों और अंधों को बुला।'” —लूका १४:१२-१४

यीशु का यह दृष्टांत स्पष्ट रूप से एक फटकार थी। कमरे में सब कितने असुविधाजनक महसूस कर रहे होंगे। उनके अपने स्वार्थ कि इच्छा और लालच उस व्यक्ति के सामने लाना पड़ा जिसे वे मारने कि कोशिश में थे। परन्तु वे शुद्ध किये जा सकते थे। वे पश्चाताप कर सकते थे! वे मुड़ कर अपने आप को बदल सकते थे, केवल उसके पीछे चल कर! वे गरीबों के लिए दरवाज़ों को खोल कर के परमेश्वर के प्रेम को चमका सकते थे! वे अपने राष्ट्र को बदल सकते थे! वे अपने मसीहा को अपना सकते थे!