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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १७०: क्रूस पर चढ़ाया गया राजा

मत्ती २७:३३-३८; मरकुस १५:२२-२६; लूका २३:३३,३८; यूहन्ना १९:१६-२२

Holy Week

फिर जब वे गुलगुता (जिसका अर्थ है “खोपड़ी का स्थान।”) नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने यीशु को पित्त मिली दाखरस पीने को दी। किन्तु जब यीशु ने उसे चखा तो पीने से मना कर दिया।

रोमी सिपाहियों ने  क्रूस को ज़मीन पर रख यीशु कपड़े उतार दिए। यीशु ने अपने हाथ उस लकड़ी के पट्टे पर फैला कर अपने आप को पूरी विनम्रता के साथ सौंप दिया। सिपाहियों ने उसके हाथों में कीलें ठोकीं और क्रूस पर चढ़ा दिया। यह कितना भयंकर था। जो उपकरण अच्छी चीज़ों को बनाने के लिए होते हैं, उन्हें एक मनुष्य के शरीर को फाड़ने के लिए इस्तेमाल किये गए।

सिपाहियों ने क्रूस को खड़ा कर दिया। हर एक सांस जब वह लेता था, अपने शरीर को खींचता था ताकि वह सांस अंदर ले सके। उसके लहू लुहान शरीर उस लकड़ी के पत्ते पर रगड़ता था। हर पल उसकी पीड़ा बढ़ती ही जाती थी। परन्तु ये उस पीड़ा के सामने कुछ नहीं थी जो अनदेखी थी। क्यूंकि आप देखिये, आत्मिक क्षेत्र में, उस पवित्र जन ने पाप को अपने ऊपर ले लिया था। वह परमेश्वर के आगे पाप के अवतार को लेकर आया। मनुष्य के पापों के घिनौने अपमान के कारण उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध को उसे अपने ऊपर हाथ फैला कर लेने कि आवश्यकता नहीं थी। उसने परमेश्वर कि इच्छा में होकर उसे पूरे मान सम्मान के साथ लेने कि ठान ली थी। जब वह मनुष्य के हर घिनौने पाप कि सज़ा को अपने ऊपर ले रहा था, परमेश्वर का क्रोध दुष्ट के प्रति भड़का हुआ था। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था ताकि हम आज़ाद हो जाएं। कितना महाप्रतापी परमेश्वर है।

दो डाकू भी उसके साथ चढ़ाये गए, एक दायें और एक बाएं। सिपाही अपने ही दूषी व्यापार में लगे हुए थे। यीशु के कपड़ों का अब क्या करना था? उसके वस्त्र के चार भाग किये और हर एक सिपाही को उसका एक हिस्सा दे दिया। परन्तु यीशु का भीतरी वस्त्र बहुत अनोखा था। वह बहुत विशेषता से बनाया गया था। वे उसे फाड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने पासे फेंके। यूहन्ना प्रेरित ने यह दिखलाया कि यह वचन का पूरा होना हुआ है। भजन सहित २२:१८ कहता है,”वे मेरे कपड़े आपस में बाँट रहे हैं। मेरे वस्त्रों के लिये वे पासे फेंक रहे हैं।'” इसके बाद वे वहाँ बैठ कर उस पर पहरा देने लगे। जब तक उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, सुबह के नौ बज गए थे।

पिलातुस यीशु के विषय में अभी और कुछ कहना चाहता था। उसने इब्रानियों, लातौनी और यहूदी भाषा में कुछ लिखा।

“‘यह यहूदियों का राजा यीशु नासरी है'”

यीशु को शहर के निकट क्रूस पर चढ़ाया था ताकि सारे यहूदी उसे देख सकें। पिलातुस कि घोषणा उस भाषा में लिखी गयी जो अधिकतर पश्चिमी दुनिया में बोली जाती है। रोमी राज में लातौनी भाषा बोलते थे, जो अपने संग्रामिक अधिकार से सब पर हुकुम चलते थे। यह बहुत ही संपन्न विधिपूर्वक भाषा थी जिसे रोम के कुलीन लोग बोलते थे और अपने बच्चों को सिखाते थे। सभी विचार धरणाओं पर यह हावी था। परन्तु इब्रानी भाषा वो भाषा थी जिससे परमेश्वर का वचन मनुष्य के पास आया। यह कितना उचित था कि तीनों ने यीशु के शासन को उसके बलिदान के दिन घोषित किया!

पिलातुस को नहीं मालूम था कि आने वाले सालों में पूरे रोमी राज में सुसमाचार लातौनी भाषा और यहूदी भाषा में सुनाया जाएगा। एक दिन, जिस यीशु को उसने क्रूस पर चढ़ाया था, उसे अनंतकाल के राजा कि तरह उसकी उपासना की जाएगी। रोम के महाराजा यीशु के आगे घुटने टेकेंगे!

लेकिन यह सब भविष्य में होना है। इस बीच, यहूदी अगुवे उस चिन्ह से नाखुश थे जो यीशु के सिर पर लगाया गया था। यह रोमी सरकार द्वारा एक लिखित घोषणा थी। सो वे पिलातुस के पास गए और बोले इस बदल कर ऐसे लिखो: “‘उसने कहा, मैं यहूदियोंका राजा हूँ।'” यह चिन्ह का एक दूसरा हास्यास्पद था लेकिन पिलातुस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला था।

सोचिये पिलातुस के क्या विचार रहे होंगे जब वह उन आराधनालय के दुष्ट सदस्यों को यीशु को क्रूस पर चढाने के लिए लेजाते देख रहा था। इस विचार से हसी आती है कि वे अपने को परमेश्वर के पवित्र लोग मानते थे, और इससे यहूदी अगुवों का गुस्सा और भी अधिक बढ़ जाता था। यदि इन लोगों का कोई भी अनंतकाल का भविष्य है तो वह इन लोगों के जीवन से नहीं दिख सकता था जो परमेश्वर के मंदिर को चलाते थे।

परन्तु यीशु में, पिलातुस ने कुछ भिन्न पाया। उसके किसी भी शिक्षाओं से ऐसा कुछ नहीं था जो उसे स्पष्ट कर सके। पिलातुस दुनिया के सबसे उच्च ज्ञान से शिक्षित था। उसने सभी जगहों में जाकर भिन्न भिन्न धर्मों और संस्कृतियों को। देखा। उसके पास वो अधिकार था जिससे वह शासन चला सकता था। वह उन अगुवों के बीच में रहता था जो मनुष्य जाती से सम्बंधित जटिल सच्चाइयों के हल को लेकर आते थे। युद्ध, अकाल, सामाजिक विश्लेषण आदि, जैसे विषय वे लेकर आते थे। सारे मनुष्य जाती में, केवल ये थे जो मनुष्य के जीवन के भाग को तय करते थे।

जब पिलातुस ने इस महान संकटकाल का सामना किया, तब उसने पुछा,”‘सच्चाई क्या है?'” यूनानी और रोमी दार्शनिकों के समाधान, रोमी फ़ौज में पाये गए समाधान, और ज़बरदस्ती से दी गयी शांति, सब में थोड़ी बहुत सच्चाई थी पर बगैर स्वयं के भीतर कि सच्चाई के। जन पिलातुस ने यीशु के विनम्रता और शुद्धता को देखा, तब उसने जाना कि उसने सच्चाई का सामना किया है।

इस शांत और लहूलुहान मनुष्य कि कोई महानता और सामर्थ थी, जो उस अनदेखी दुनिया का राजा कहलाता था। या तो वह, पागल था या फिर वह सही था। यदि वह सही था, तो फिर उसके चरों ओर चल रहे कोलाहल में पागलपन था। पिलातुस इतने लम्बे समय से था जो जनता था कि छोटी से छोटे से छोटा पद ढोंग था। पर यीशु ने वो सब नष्ट कर दिया। यदि कोई अनन्तकाल का राजा था, तो वह ऐसा होगा जब वह एक स्वार्थी और टूटी दुनिया में प्रवेश करेगा। अपने दुष्ट घृणा के कारण, येरूशलेम के अगुवे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसकी आत्मा उन सब आत्माओं से कहीं अधिक मूलयवान थी।

हम नहीं जानते कि पिलातुस के मन में क्या चल रहा था जब वह अपने महल में बैठा था। परन्तु हम यह जानते हैं कि उसी के हाथों यह घोषणा लिखवाई गयी कि यीशु यहूदियों का राजा है। और सभी यहूदी अगुवों के विरोध करने पर भी उसने यह लिखा,”‘जो मैंने लिख दिया सो लिख दिया।'”

कहानी १६१: परमेश्वर के पुत्र की प्रार्थनाएं 

यूहन्ना १७

Vienna -  Holy Trinity in Altlerchenfelder church

अपने चेलों के साथ उस अंतिम रात्री में, यीशु ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया था। जिस राज्य कि घोषणा वे करने जा रहे थे, वह उनकी कल्पना से बाहर था, परन्तु वे बहुत महान और अद्भुद था। आने वाले दिनों को देखते हुए यीशु अपनी आँखें स्वर्गीय पिता कि ओर उठाकर प्रार्थना की। आइये सुनते हैं कि कैसे परमेश्वर का पुत्र अपने पिता से बात करता है:

“’हे परम पिता, वह घड़ी आ पहुँची है अपने पुत्र को महिमा प्रदान कर ताकि तेरा पुत्र तेरी महिमा कर सके। तूने उसे समूची मनुष्य जाति पर अधिकार दिया है कि वह, हर उसको, जिसको तूने उसे दिया है, अनन्त जीवन दे। अनन्त जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें। जो काम तूने मुझे सौंपे थे, उन्हें पूरा करके जगत में मैंने तुझे महिमावान किया है। इसलिये अब तू अपने साथ मुझे भी महिमावान कर। हे परम पिता! वही महिमा मुझे दे जो जगत से पहले, तेरे साथ मुझे प्राप्त थी।'”  यूहन्ना १७:१-५

क्या आपको समझ आया? पिता और पुत्र इस तरह कार्य कर रहे थे जिससे कि वे एक दूसरे कि महिमा कर सकें। अब मनुष्य ऐसा करता है, तो यह हास्यास्पद होता। एक दुसरे को हम अच्छे शब्दों के साथ उत्तेजित कर सकते हैं, पर क्यूंकि हम सब पापी हैं इसलिए हम एक हद्द तक ही बोल सकते हैं। हम किसी कि सच में महिमा नहीं कर सकते यदि वे उसके योग्य नहीं हैं। परन्तु परमेश्वर इसके योग्य है, और उसका पुत्र भी। उनके लिए केवल एक ही सही बात यह है कि वे भव्यतापूर्वक महिमा दें। हमारे लिए सबसे उत्तम बात यह है कि हम उनके आगे गिरकर दंडवत करें। इसीलिए यीशु को इंकार करना सबसे भयंकर पाप है। यह पूर्ण रूप से गलत है। परमेश्वर का पुत्र और पिता सत्य हैं और वे एक दूसरे कि महिमा करते हैं।

यीशु जानता था कि जो काम उसके पिता ने उसे सौंपा था वह उसने इस पृथ्वी पर पूरा किया। अब केवल क्रूस ही बचा था। और इसलिए उसने प्रार्थना की कि उसके मृत्यु के पश्चात्, पिता उसकी महिमा को जो उसकी उसके पिता के साथ थी वह उसे वापस मिल जाये।

फिर उसने कहा:
“’जगत से जिन मनुष्यों को तूने मुझे दिया, मैंने उन्हें तेरे नाम का बोध कराया है। वे लोग तेरे थे किन्तु तूने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन का पालन किया। अब वे जानते हैं कि हर वह वस्तु जो तूने मुझे दी है, वह तुझ ही से आती है। मैंने उन्हें वे ही उपदेश दिये हैं जो तूने मुझे दिये थे और उन्होंने उनको ग्रहण किया। वे निश्चयपूर्वक जानते हैं कि मैं तुझसे ही आया हूँ। और उन्हें विश्वास हो गया है कि तूने मुझे भेजा है।'” यूहन्ना १७:६-८

आपने देखा कि विश्वास यीशु के लिए कितना महवपूर्ण है? सब कुछ उसी पर निर्भर करता है! यीशु कि प्रार्थना को सुनिये:
“‘मैं उनके लिये प्रार्थना कर रहा हूँ। मैं जगत के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिए कर रहा हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। वह सब कुछ जो मेरा है, वह तेरा है और जो तेरा है, वह मेरा है। और मैंने उनके द्वारा महिमा पायी है। मैं अब और अधिक समय जगत में नहीं हूँ किन्तु वे जगत में है अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। हे पवित्र पिता अपने उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा कर जो तूने मुझे दिया है ताकि जैसे तू और मैं एक हैं, वे भी एक हो सकें। जब मैं उनके साथ था, मैंने तेरे उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा की, जो तूने मुझे दिया था। मैंने रक्षा की और उनमें से कोई भी नष्ट नहीं हुआ सिवाय उसके जो विनाश का पुत्र था ताकि शास्त्र का कहना सच हो।'” यूहन्ना १७:९-१२

“’अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ किन्तु ये बातें मैं जगत में रहते हुए कह रहा हूँ ताकि वे अपने हृदयों में मेरे पूर्ण आनन्द को पा सकें। मैंने तेरा वचन उन्हें दिया है पर संसार ने उनसे घृणा की क्योंकि वे सांसारिक नहीं हैं। वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ।
“’मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ कि तू उन्हें संसार से निकाल ले बल्कि यह कि तू उनकी दुष्ट शैतान से रक्षा कर। वे संसार के नहीं हैं, वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ। सत्य के द्वारा तू उन्हें अपनी सेवा के लिये समर्पित कर। तेरा वचन सत्य है। जैसे तूने मुझे इस जगत में भेजा है, वैसे ही मैंने उन्हें जगत में भेजा है। मैं उनके लिए अपने को तेरी सेवा में अर्पित कर रहा हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा स्वयं को तेरी सेवा में अर्पित करें।   यूहन्ना १७:१३-१९

“’किन्तु मैं केवल उन ही के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिये भी जो इनके उपदेशों द्वारा मुझ में विश्वास करेंगे। वे सब एक हों। वैसे ही जैसे हे परम पिता तू मुझ में है और मैं तुझ में। वे भी हममें एक हों। ताकि जगत विश्वास करे कि मुझे तूने भेजा है। वह महिमा जो तूने मुझे दी है, मैंने उन्हें दी है; ताकि वे भी वैसे ही एक हो सकें जैसे हम एक हों। मैं उनमें होऊँगा और तू मुझमें होगा, जिससे वे पूर्ण एकता को प्राप्त हों और जगत जान जाये कि मुझे तूने भेजा है और तूने उन्हें भी वैसे ही प्रेम किया है जैसे तू मुझे प्रेम करता है।'”  यूहन्ना १७:२०-२३

अब यीशु हमारे लिए प्रार्थना कर रहा था!

“’हे परम पिता। जो लोग तूने मुझे सौंपे हैं, मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ, वे भी मेरे साथ हों ताकि वे मेरी उस महिमा को देख सकें जो तूने मुझे दी है। क्योंकि सृष्टि की रचना से भी पहले तूने मुझसे प्रेम किया है।'” यूहन्ना १७:२५-२६

कहानी १६०: आशा का सहायक 

shining dove with rays on a dark

यूहन्ना १६

यीशु ने अपने शिष्यों के लिए एक सहायक भेजने का वायदा किया। यीशु की आत्मा उनके ह्रदय में आकर उसके राज्य के कार्य को करने के लिए उनकी अगुवाई करेगा और सामर्थ देगा।

यीशु ने कहा:
“’जब वह सहायक तुम्हारे पास आयेगा जिसे मैं परम पिता की ओर से भेजूँगा, वह मेरी ओर से साक्षी देगा। और तुम भी साक्षी दोगे क्योंकि तुम आदि से ही मेरे साथ रहे।'” यूहन्ना १५:२६

आत्मा के दूत इस श्रापित दुनिया में बनने का मतलब है कि उसका परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। अन्धकार के लोग और शैतानी ताक़तें ज्योति में चलने वाले लोगों के विरोध में खड़े होंगे। यीशु चाहता था कि उसके चेले तैयार रहें, वे समझ सकें कि यह सब क्या हो रहा है।

उसने कहा:
“’ये बातें मैंने इसलिये तुमसे कही हैं कि तुम्हारा विश्वास न डगमगा जाये। वे तुम्हें आराधनालयों से निकाल देंगे। वास्तव में वह समय आ रहा है जब तुम में से किसी को भी मार कर हर कोई सोचेगा कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है। वे ऐसा इसलिए करेंगे कि वे न तो परम पिता को जानते हैं और न ही मुझे। किन्तु मैंने तुमसे यह इसलिये कहा है ताकि जब उनका समय आये तो तुम्हें याद रहे कि मैंने उनके विषय में तुमको बता दिया था।'” यूहन्ना १६:१-४

चेलों के बारे में सोचिये जब वे यीशु को सुन रहे थे। जो बातें वह उन्हें बता रहा था वे उनसे बहुत भिन्न थीं जो होने वाली थीं। लगभग एक घंटे पहले, वे बहस कर रहे थे कि उनमें से कौन सबसे महान होगा। अब वे इस बात को सीख रहे थे कि भविष्य में उनके लिए कोई भी सम्मान और महिमा नहीं है। यीशु के वचन को फ़ैलाने वालों के लिए बहुत ही चुनौती भरा जीवन होगा जहां विरोध और कष्ट भी सहना होगा। पवित्रा आत्मा चेलों कि अगुवाई करेगा जब गवाही देने के लिए उन्हें सताया जाएगा और मृत्यु भी दी जाएगी।

जब चेलों ने यह समझा कि उनके स्वामी के पीछे चलने कि कीमत क्या होती है, वे यह भी समझ रहे थे कि चाहे वे उसे नहीं देख पाएंगे, उन्हें ऐसे ही उसके पीछे चलते रहना होगा।

यीशु ने कहा:
“‘किन्तु अब मैं उसके पास जा रहा हूँ जिसने मुझे भेजा है और तुममें से मुझ से कोई नहीं पूछेगा,‘तू कहाँ जा रहा है?’ क्योंकि मैंने तुम्हें ये बातें बता दी हैं, तुम्हारे हृदय शोक से भर गये हैं। किन्तु मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ इसमें तुम्हारा भला है कि मैं जा रहा हूँ। क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा। किन्तु यदि मैं चला जाता हूँ तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। और जब वह आयेगा तो पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में जगत के संदेह दूर करेगा। पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ में विश्वास नहीं रखते, धार्मिकता के विषय में इसलिये कि अब मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। और तुम मुझे अब और अधिक नहीं देखोगे। न्याय के विषय में इसलिये कि इस जगत के शासक को दोषी ठहराया जा चुका है।'” यूहन्ना १६:५-११

“’मुझे अभी तुमसे बहुत सी बातें कहनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसको प्रकट करेगा। वह मेरी महिमा करेगा क्योंकि जो मेरा है उसे लेकर वह तुम्हें बतायेगा। हर वस्तु जो पिता की है, वह मेरी है। इसीलिए मैंने कहा है कि जो कुछ मेरा है वह उसे लेगा और तुम्हें बतायेगा।'” यूहन्ना १६:१२-१५

“’कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नहीं देख पाओगे। और थोड़े समय बाद तुम मुझे फिर देखोगे’।’” यूहन्ना १६:१६

चेले नहीं समझ पाये कि यीशु क्या कह रहे हैं, सो वे आपस में चर्चा करने लगे।  तब यीशु ने कहा:

“’क्या तुम मैंने यह जो कहा है, उस पर आपस में सोच-विचार कर रहे हो,‘कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नही देख पाओगे।’ और ‘फिर थोड़े समय बाद तुम मुझे देखोगे?’ मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, तुम विलाप करोगे और रोओगे किन्तु यह जगत प्रसन्न होगा। तुम्हें शोक होगा किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द में बदल जायेगा। जब कोई स्त्री जनने लगती है, तब उसे पीड़ा होती है क्योंकि उसकी पीड़ा की घड़ी आ चुकी होती है। किन्तु जब वह बच्चा जन चुकी होती है तो इस आनन्द से कि एक व्यक्ति इस संसार में पैदा हुआ है वह आनन्दित होती है और अपनी पीड़ा को भूल जाती है। सो तुम सब भी इस समय वैसे ही दुःखी हो किन्तु मैं तुमसे फिर मिलूँगा और तुम्हारे हृदय आनन्दित होंगे। और तुम्हारे आनन्द को तुमसे कोई छीन नहीं सकेगा।  उस दिन तुम मुझसे कोई प्रश्न नहीं पूछोगे। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ मेरे नाम में परम पिता से तुम जो कुछ भी माँगोगे वह उसे तुम्हें देगा। अब तक मेरे नाम में तुमने कुछ नहीं माँगा है। माँगो, तुम पाओगे। ताकि तुम्हें भरपूर आनन्द हो।'” यूहन्ना १६:१९ब-२४

“’मैंने ये बातें तुम्हें दृष्टान्त देकर बतायी हैं। वह समय आ रहा है जब मैं तुमसे दृष्टान्त दे-देकर और अधिक समय बात नहीं करूँगा। बल्कि परम पिता के विषय में खोल कर तुम्हें बताऊँगा। उस दिन तुम मेरे नाम में माँगोगे और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम्हारी ओर से मैं परम पिता से प्रार्थना करूँगा। परम पिता स्वयं तुम्हें प्यार करता है क्योंकि तुमने मुझे प्यार किया है। और यह माना है कि मैं परम पिता से आया हूँ। मैं परम पिता से प्रकट हुआ और इस जगत में आया। और अब मैं इस जगत को छोड़कर परम पिता के पास जा रहा हूँ।’” यूहन्ना १६:२५-२८

इन शब्दों ने उन्हें प्रभावित किया। चेलों के दिमाग में कुछ आने लगा। उन्होंने कहा:
“’देख अब तू बिना किसी दृष्टान्त को खोल कर बता रहा है। अब हम समझ गये हैं कि तू सब कुछ जानता है। अब तुझे अपेक्षा नहीं है कि कोई तुझसे प्रश्न पूछे। इससे हमें यह विश्वास होता है कि तू परमेश्वर से प्रकट हुआ है।’”

अब वे समझ गए थे। परन्तु जो उन्हें वह कोई पद या अधिकार नहीं था। उन्हें अपनी सिद्धता या सिद्ध  नहीं प्राप्त हुई थी। उनके लिए महत्वपूर्ण यह था कि वे यीशु को पाएं। उस पर  सच्चाई से विश्वास करें। और वे जानते हैं कि उन्हें मिला क्यूंकि यीशु उनके साथ सहमत थे।

यीशु ने इस पर उनसे कहा,
“’क्या तुम्हें अब विश्वास हुआ है? सुनो, समय आ रहा है, बल्कि आ ही गया है जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और तुम में से हर कोई अपने-अपने घर लौट जायेगा और मुझे अकेला छोड़ देगा किन्तु मैं अकेला नहीं हूँ क्योंकि मेरा परम पिता मेरे साथ है। मैंने ये बातें तुमसे इसलिये कहीं कि मेरे द्वारा तुम्हें शांति मिले। जगत में तुम्हें यातना मिली है किन्तु साहस रखो, मैंने जगत को जीत लिया है।’” यूहन्ना १६:३१-३३

कहानी १५६: विश्वासघात और इंकार 

मत्ती २६:२१-२४, मरकुस १४:१८-२१, लूका २२:२१-३४, यूहन्ना १३:१८-३८

Ultima cena

यीशु और उसके चेले फसह का भोज कर रहे थे। यीशु जानता था कि यह उसका अपने चेलों के साथ अंतिम भिज होगा। उन्होंने उसके साथ भीड़ में रहकर परिश्रम किया और अपने घरों को छोड़ कर पूरी भक्ति के साथ उसकी सेवा में लगे रहे। और फिर यीशु जानता था उनमें से एक है जो उसके साथ विश्वासघात करेगा और आगे भी करेगा। सो उसने अपने चेलों को उस आशीष के विषय में बताया जो उन्हें एक दुसरे के पाँव धोने से मिलेगी वहीं उसने उन्हें उस श्राप के बारे में बताय जो उनमें से एक को मिलेगा:

“‘मैं उन्हें जानता हूँ जिन्हें मैंने चुना है। किन्तु मैंने उसे इसलिये चुना है ताकि शास्त्र का यह वचन सत्य हो:
“वही जिसने मेरी रोटी खायी मेरे विरोध में हो गया।”
“‘अब यह घटित होने से पहले ही मैं तुम्हें इसलिये बता रहा हूँ कि जब यह घटित हो तब तुम विश्वास करो कि वह मैं हूँ।'”  यह कहने के बाद यीशु बहुत व्याकुल हुआ और साक्षी दी, “मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम में से एक मुझे धोखा देकर पकड़वायेगा।”

यीशु कि बात को सुनकर क्या यहूदा कांपा?  तब उसके शिष्य एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे। वे निश्चय ही नहीं कर पा रहे थे कि वह किसके बारे में कह रहा है। उन्होंने कहा,”प्रभु, निश्चय वो मैं तो नहीं!” वे मासूम थे, फिर भी वे भयभीत थे और उस पाप से डरते थे कि कहीं उनसे ना हो जाये। वे वफादार रहना चाहते थे। यीशु को कितना छुआ होगा। उस ऊपरी कमरे के बाहर वे शक्तिशाली लोग उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे। परन्तु ये चेले, चाहे कितने भी कमज़ोर क्यूँ ना थे, वे वफादार रहे। उनका प्रेम और विश्वास सच्चा था।                                                                                                                          तब यीशु ने उत्तर दिया,“’वही जो मेरे साथ एक थाली में खाता है मुझे धोखे से पकड़वायेगा। मनुष्य का पुत्र तो जायेगा ही, जैसा कि उसके बारे में शास्त्र में लिखा है। पर उस व्यक्ति को धिक्कार है जिस व्यक्ति के द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जा रहा है। उस व्यक्ति के लिये कितना अच्छा होता कि उसका जन्म ही न हुआ होता।’”

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, यूहन्ना यीशु कि छाती पर टिका हुआ था। कितना महान था उनका प्रेम। उसका एक शिष्य यीशु के निकट ही बैठा हुआ था। इसे यीशु बहुत प्यार करता था। तब शमौन पतरस ने उसे इशारा किया कि पूछे वह कौन हो सकता है जिस के विषय में यीशु बता रहा था।  यीशु के प्रिय शिष्य ने सहज में ही उसकी छाती पर झुक कर उससे पूछा,“हे प्रभु, वह कौन है?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबो कर जिसे मैं दूँगा, वही वह है।” फिर यीशु ने रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबोया और उसे उठा कर शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा को दिया। जैसे ही यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया उसमें शैतान समा गया। फिर यीशु ने उससे कहा,“जो तू करने जा रहा है, उसे तुरन्त कर।”  इसलिए यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया। और तत्काल चला गया। यह रात का समय था। किन्तु वहाँ बैठे हुओं में से किसी ने भी यह नहीं समझा कि यीशु ने उससे यह बात क्यों कही। कुछ ने सोचा कि रुपयों की थैली यहूदा के पास रहती है इसलिए यीशु उससे कह रहा है कि पर्व के लिये आवश्यक सामग्री मोल ले आओ या कह रहा है कि गरीबों को वह कुछ दे दे।

जब वे भोजन कर ही रहे थे, यीशु के चेले आपस में बहस कर रहे थे उनमें से कौन सबसे महान होगा। जब यीशु उन्हें परमेश्वर के राज्य में पैर धोने के विषय में बता रहा था, वे केवल यही सुन रहे थे कि एक राज्य आने वाला है। वे केवल यही जानना चाहते थे कि कौन सबसे महान और प्रभावशाली होगा। वे स्वयं के लिए पद ढूंढ रहे थे। वे फरीसियों और शास्त्रियों के समान व्यवहार कर रहे थे। एक तरीके से, वे यीशु के सन्देश को धोखा दे रहे थे। वे नहीं सुन रहे थे। उन्हें नहीं मालूम था कि आगे क्या होने जा रहा है। यीशु के उत्तर को सुनिये:

“गैर यहूदियों के राजा उन पर प्रभुत्व रखते हैं और वे जो उन पर अधिकार का प्रयोग करते हैं,‘स्वयं को लोगों का उपकारक’ कहलवाना चाहते हैं। किन्तु तुम वैसै नहीं हो बल्कि तुममें तो सबसे बड़ा सबसे छोटे जैसा होना चाहिये और जो प्रमुख है उसे सेवक के समान होना चाहिए। क्योंकि बड़ा कौन है: वह जो खाने की मेज़ पर बैठा है या वह जो उसे परोसता है? क्या वही नहीं जो मेज पर है किन्तु तुम्हारे बीच मैं वैसा हूँ जो परोसता है। किन्तु तुम वे हो जिन्होंने मेरी परिक्षाओं में मेरा साथ दिया है। और मैं तुम्हे वैसे ही एक राज्य दे रहा हूँ जैसे मेरे परम पिता ने इसे मुझे दिया था। ताकि मेरे राज्य में तुम मेरी मेज़ पर खाओ और पिओ और इस्राएल की बारहों जनजातियों का न्याय करते हुए सिंहासनों पर बैठो।'” –लूका २२:२५-३२

स्वर्ग राज्य में हर एक चेले को ना केवल सम्मानित भूमिका निभाने को मिलेगा, उन्हें परमेश्वर के राज्यों को न्याय करने का अधिकार दिया जाएगा। यीशु उन्हें अपने राजकीय अधिकार का एक हिस्सा भी देगा। यीशु एक नया राज्य स्थापित कर रहा था और ये चेले उसके अगुवे होंगे! परन्तु उन्हें उसे हासिल करने के लिए प्रतीक्षा करना होगा। वे उन्हें इस पृथ्वी पर रहते हुए मिलेंगे। उन्हें यीशु के उस अनंतकाल के राज्य कि ओर ताकना होगा।

यीशु उस दिन कि घोषणा के लिए अपने चेलों को तैयार कर रहा था।

“’मनुष्य का पुत्र अब महिमावान हुआ है। और उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है। यदि उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है तो परमेश्वर अपने द्वारा उसे महिमावान करेगा। और वह उसे महिमा शीघ्र ही देगा।”
“’हे मेरे प्यारे बच्चों, मैं अब थोड़ी ही देर और तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे ढूँढोगे और जैसा कि मैंने यहूदी नेताओं से कहा था, तुम वहाँ नहीं आ सकते, जहाँ मैं जा रहा हूँ, वैसा ही अब मैं तुमसे कहता हूँ।
“’मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो। जैसा मैंने तुमसे प्यार किया है वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम करो। यदि तुम एक दूसरे से प्रेम रखोगे तभी हर कोई यह जान पायेगा कि तुम मेरे अनुयायी हो।’” –यूहन्ना १३:३१-३८

अब चेले परेशान हो गये। वह उन्हें क्यूँ छोड़ रहा था? शमौन पतरस ने उससे पूछा, “हे प्रभु, तू कहाँ जा रहा है?”

यीशु ने उसे उत्तर दिया, “तू अब मेरे पीछे नहीं आ सकता। पर तू बाद में मेरे पीछे आयेगा।”

फिर जो यीशु ने कहा उसे सुनकर पतरस बेचैन हो गया:

“’शमौन, हे शमौन, सुन, तुम सब को गेहूँ की तरह फटकने के लिए शैतान ने चुन लिया है। किन्तु मैंने तुम्हारे लिये प्रार्थना की है कि तुम्हारा विश्वास न डगमगाये और जब तू वापस आये तो तेरे बंधुओं की शक्ति बढ़े।’”

पतरस ने उससे पूछा, “’हे प्रभु, अभी भी मैं तेरे पीछे क्यों नहीं आ सकता? मैं तो तेरे लिये अपने प्राण तक त्याग दूँगा।’” और यह सच था। पतरस बहुत समय था इस पर विचार करने के लिए। धार्मिक अगुवों कि नफरत जितनी अधिक बढ़ती जा रही थी उतना ही यीशु के मित्र बनना खतरनाक होता जा रहा था। परन्तु यीशु पतरस को वो बातें बता रहा था जो वह अपने आप के विषय में नहीं जानता था।

पतरस अधिकतर बातें उसके स्वयं के विषय में थीं ना के यीशु के प्रति उसकी भक्ति की। अब शैतान उसके पीछे था, उस चेले को नाश करने के लिए जो उस दुष्ट के लिए एक खतरा बन चुका था। परन्तु यीशु शैतान के द्वारा पतरस के फटकनेको उसे शुद्ध करने के लिए उपयोग करेगा। यीशु ने कहा,“‘मैं तुझे सत्य कहता हूँ कि जब तक तू तीन बार इन्कार नहीं कर लेगा तब तक मुर्गा बाँग नहीं देगा।’”

जब समय आता, तब पतरस यीशु के लिए अपनी जान नहीं देने वाला था। वह अपनी जान उस घड़ी के लिए बचाना चाहता जब वह यीशु को पकड़वाएगा। यीशु निश्चित रूप से जानते थे कि पतरस क्या करने जा रहा है, और फिर भी यीशु उससे प्रेम करते रहे। क्यूंकि, पतरस का इंकार स्वयं यीशु के लिए नहीं था। वे पतरस के विषय में थे और वो काम जिसके लिए परमेश्वर उसे कलीसिया का चट्टान बनाने के लिए तैयार कर रहा था।

पतरस अपने ही विचार लगा रहा था कि कैसे यीशु कि सेवा करनी चाहिए। वह अपनी ही क़ाबलियत से प्रबावित था कि वह वफादार और दृढ़ रहेगा। परमेश्वर उससे उन सब बातों को छीन लेगा। एक बार जब पतरस इस भयंकर समय से निकल जाएगा, वह एक भीतरी ताक़त के साथ बाहर निकलेगा। इस अपमान और दुःख के बाद, पतरस परमेश्वर पर निर्भर करना सीख जाएगा।

यीशु जानता था कि पतरस उसका इंकार करेगा, परन्तु वह जानता था कि अंत में वह उसके पीछे चलता जाएगा। वह अपने जीवन भर परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को फैलाएगा, उसके लिए सताया जाएगा और यीशु के लिए जेल में भेजा जाएगा। और फिर एक दिन, वह यीशु के नाम के वास्ते मर जाएगा।

कहानी १५५: यीशु का अंतिम भोज-भाग 1 

मत्ती २६:१७-१९; मरकुस १४:१२-१६; लूका २२:७-१३; यूहन्ना १३:१-१७

The Washing of the Feet
गुरुवार आया। यह अखमीरी रोटी का दिन था। मिस्र में उस दिन की याद में शासकीय फसह के मेमने को बलिदान किया जाएगा।बेदाग भेड़ के बच्चे के रक्त को हर एक इस्राएली घर के चौखट पर लगाना था। इससे उनका पहलौठा पुत्र बच गया और स्वतंत्रता के द्वार को खोल दिया गया। वह पहला बलिदान और उद्धार केवल एक रूप था और यीशु अपने ही लहू से खरीदने वाला था।

चेलों ने उससे पुछा कि तैयारी के लिए वह क्या चाहता था कि कहाँ की जाये।

उसने यूहन्ना और पतरस से कहा,
“’तुम जैसे ही नगर में प्रवेश करोगे तुम्हें पानी का घड़ा ले जाते हुए एक व्यक्ति मिलेगा, उसके पीछे हो लेना और जिस घर में वह जाये तुम भी चले जाना। और घर के स्वामी से कहना,‘गुरु ने तुझसे पूछा है कि वह अतिथि-कक्ष कहाँ है जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ फ़सह पर्व का भोजन कर सकूँ।’ फिर वह व्यक्ति तुम्हें सीढ़ियों के ऊपर सजा-सजाया एक बड़ा कमरा दिखायेगा, वहीं तैयारी करना।’”

वे चल पड़े और वैसा ही पाया जैसा उसने उन्हें बताया था। फिर उन्होंने फ़सह भोज तैयार किया। यीशु के अपने पिता के आज्ञाकारी होने के साथ ही उस पवित्र योजनाओं का खुलासा हो गया। हर एक पल परमेश्वर कि ओर से नियुक्त था और यीशु उसे पूरी श्रेष्ठा से प्रदर्शित कर रहे थे।

संध्या काल में,यीशु अपने शिष्यों के साथ भोजन पर बैठा। उसने उनसे कहा,“’यातना उठाने से पहले यह फ़सह का भोजन तुम्हारे साथ करने की मेरी प्रबल इच्छा थी। क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक परमेश्वर के राज्य में यह पूरा नहीं हो लेता तब तक मैं इसे दुबारा नहीं खाऊँगा।’”

इसे समझिये, यीशु परमेश्वर था और परमेश्वर उससे असीम प्यार करता था।  फिर भी जब यीशु उस पाप के ढेर को उठाये हुए था, वह उन स्वार्थी चेलों के साथ ही रहना चाहता था। उसका प्रेम उनके प्रति गुणवत्ता के अनुसार नहीं था। उसके प्रेम कि महानता उसके प्रेम करने कि योग्ता के कारण था। जब हम उन बातों को पढ़ते हैं जो उसने अपने चेलों के साथ बांटीं, हम उसके वचन को बहुत ही व्यक्तिगत तरीके से ले सकते हैं। वे हमारे भी हैं।

जब यीशु भोजन कर रहा था, वह जानता था कि यह उसके कष्ट उठाने से पहले का अंतिम भोज है। फिर भी उसका उद्देश्य क्रूस पर से नहीं हटा। वह क्रूस के माध्यम से उस विजय कि ओर देख रहा था। एक बहुत जश्न जिसे मेमने के विवाह का भोज कहा जाता है, आ रहा था। वे जो यीशु कि मृत्यु और जी उठने के कारण बचाय गए वे एक बार फिर उसकी यशस्वी  दुल्हन बनकर उसके साथ भोजन करेगी। वह जानता था कि वह परमेश्वर कि ओर से आया है और अपने पिता के पास वापस चला जाएगा। वह जानता था कि उसके पिता ने उसे उसके हाथ में सब कुछ दे दिया है। अभी वह गया नहीं था और अंत तक अपनों से प्रेम करता रहेगा।

यीशु  उठा और अपने बाहरी वस्त्र उतार दिये और एक अँगोछा अपने चारों ओर लपेट लिया। फिर एक घड़े में जल भरा और अपने शिष्यों के पैर धोने लगा और उस अँगोछे से जो उसने लपेटा हुआ था, उनके पाँव पोंछने लगा। अपने स्वामी को ऐसे करते देख वे अचंबित हुए। यह एक बहुत नीच और गन्दा काम था। इस्राएल में, केवल वे जो यहूदी नहीं हैं वे ही यह काम करते थे। लेकिन यहं यीशु यह सब काम कर रहा था।

फिर जब वह शमौन पतरस के पास पहुँचा तो पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, क्या तू मेरे पाँव धो रहा है।”

उत्तर में यीशु ने उससे कहा,“अभी तू नहीं जानता कि मैं क्या कर रहा हूँ पर बाद में जान जायेगा।”

पतरस ने उससे कहा,“तू मेरे पाँव कभी भी नहीं धोयेगा।”

यीशु ने उत्तर दिया,“यदि मैं न धोऊँ तो तू मेरे पास स्थान नहीं पा सकेगा।”

शमौन पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, केवल मेरे पैर ही नहीं, बल्कि मेरे हाथ और मेरा सिर भी धो दे।”

यीशु ने उससे कहा,“जो नहा चुका है उसे अपने पैरों के सिवा कुछ भी और धोने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि पूरी तरह शुद्ध होता है। तुम लोग शुद्ध हो पर सबके सब नहीं।” वह उसे जानता था जो उसे धोखे से पकड़वाने वाला है। इसलिए उसने कहा था,“तुम में से सभी शुद्ध नहीं हैं।”

यीशु ने यही रात क्यूँ चुनी चेलों के पैर धोने के लिए? वह उसके मरने के पहले की अंतिम घड़ी थी। वे अपने जीवन भर उस समय को याद रखेंगे। वह उस रात जो कुछ भी कहता वह बहुत महत्वपूर्ण होता।

उनके पैर धोना उस बात का चिन्ह था जो यीशु अपनी मृत्यु के समय उनके लिए करने जा रहा था। वह श्राप के बंधन को तोड़ने जा रहा था।  के पाप से मृत्यु आई, यीशु कि मृत्यु उन सब के लिए जीवन को लाएगा जो उस पर विश्वास करते हैं (रोमियो 4और5) वह पाप में गिरे संसार को समाप्त करके एक नए दौर को लेकर आ रहा था। नेही विधि के अनुसार, जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह पूर्ण रूप से साफ़ किया जाएगा और परमेश्वर के साथ सिद्ध होगा। उन्हें यीशु कि धार्मिकता दी जाएगी। उसी समय से, वे नए हो जाएंगे। उनके हिरदय बदल जाएंगे, और वे फिर कभी इस दुनिया के नहीं होंगे। जब व पाप करेंगे, वे परमेश्वर के सामने खोये हुए नहीं होंगे। उन्हें केवल पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। वह उनके उन गंदे क्षेत्रों को साफ़ करेगा जिस प्रकार उसने चेलों के पैरों को धोया था। जो कोई यीशु पर विश्वास करता है वह यह विश्वास कर सकता है कि परमेश्वर ने उसे साफ़ किया है। फिर भी उसके चेलों को आवश्यकता है कि वे रोज़ अपने पापों को शुद्ध करने के लिए उसके पास आयें जब तक वे इस शार्पित संसार में जी रहे हैं।

जब यीशु ने कहा कि सरे उसके चेले साफ़ नहीं थे, तो उसका किसकी ओर निशाना था? क्या यहूदा जानता था कि यीशु को मालूम है? जब यीशु उसके पाँव धो रहे थे तब उसे कैसा लग रहा होगा? उस समय, और पूरे हफ्ते भर, यहूदा के पास पश्चाताप करने का पूरा समय था। परन्तु जिस समय यीशु उसके पाँव के मेल को धो रहे थे, उसके हिरदय के मेल को वह पकड़ा हुआ था। और इसीलिए वह अपने पाप में स्थायी था।

जब यीशु उनके पाँव धो चुका , तब उसने उनसे कहा,
“’क्या तुम जानते हो कि मैंने तुम्हारे लिये क्या किया है? तुम लोग मुझे ‘गुरु’ और ‘प्रभु’ कहते हो। और तुम उचित हो। क्योंकि मैं वही हूँ। इसलिये यदि मैंने प्रभु और गुरु होकर भी जब तुम्हारे पैर धोये हैं तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोना चाहिये। मैंने तुम्हारे सामने एक उदाहरण रखा है ताकि तुम दूसरों के साथ वही कर सको जो मैंने तुम्हारे साथ किया है। मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ एक दास स्वामी से बड़ा नहीं है और न ही एक संदेशवाहक उससे बड़ा है जो उसे भेजता है यदि तुम लोग इन बातों को जानते हो और उन पर चलते हो तो तुम सुखी होगे।'”  –यूहन्ना १३:१२-१७

यीशु ने अपने चेलो को समझाया कि अब जब उनके पाप धूल चुके हैं, उन्हें आगे बढ़ना है। यीशु पाप और मृत्यु पर विजयी होगा और एक नया दौर शुरू होगा। जो कुछ यीशु ने किया था वे उसके दूत थे, जो उसके सन्देश को संसार में फैलाएंगे। परमेश्वर का राज्य अंधकार के राज्य में के समान घुसेगा और लोग अपने जीवन को यीशु को देंगे। वे भी साफ़ किये जाएंगे और जिस प्रेम कि समिति उन्होंने बनाई है वह इस पृथ्वी के राज्य के लिए ढाल बन कर खड़ी होगी। वे एक दुसरे के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? क्या वे फरीसियों के समान लालची होंगे जो अपने पद के लिए लड़ते थे? या वे अपने स्वामी के समान वैसा ह्रद्य रखेंगे? क्या वे विनम्रता और शांति बनाने वाले बनकर एक दुसरे पाँव को धोएंगे? इस पवित्र समय में जब यीशु ने पने चेलों के पाव धोये, वह उस शारीरिक प्रदर्शन को दिखाता है कि कैसे स्वर्गराज के नागरिकों को एक दुसरे के प्रति अपने ह्रदय को रखना है।

कहानी १५३: मसीह न्याय के सिंघासन पर 

मत्ती २५:३१-४६

The sun sets over Jerusalem

जो दूसरी कहानी यीशु बताने जा रहे थे, वो भी भविष्य के बारे में थी। प्रभु पृथ्वी के लोगों का न्याय करने आ रहे है। जिस प्रकार यह लोग अपने जीवन को जीने का चुनाव करेंगे, उससे ही वो जानेंगे कि सही मायने में कौन उनके अपने थे। जैतून के पहाड़ पर अपनी लम्बी  बातचीत के दौरान, उन्होंने यह बात अपने शिष्यों को ऐसे वर्णित की:

” जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और उसके साथ सभी स्वर्गदूत भी, तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा। उनके सामने सभी देशों को इकट्ठा किया जाएगा, और वह लोगों को एक दूसरे से अलग करेगा, जैसे एक चरवाहा बकरियों से भेड़ों को अलग करता है। और वह अपने दाहिनी ओर भेड़ों को रखेगा, लेकिन बकरियों को बाएँ ओर।”

हम खैर यह जानते है कि बाइबल में जिन चीज़ों को परमेश्वर के दाहिने हाथ पर डाला जाता है, उन्हें उनका प्यार और कृपा प्राप्त होता है। उनके बाएं हाथ पर चीज़ों से वह बिल्कुल भी खुश नहीं होते है। बकरियों ने ऐसा क्या किया था जिससे वह बाएँ ओर थे? भेड़ों ने ऐसा क्या किया था जिससे वो दाहिनी ओर थे? यीशु ने यह कहा:

“फिर वह राजा, जो उसके दाहिनी ओर है, उनसे कहेगा, ‘मेरे पिता से आशीष पाये लोगो, आओ और जो राज्य तुम्हारे लिये जगत की रचना से पहले तैयार किया गया है उसका अधिकार लो। यह राज्य तुम्हारा है क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे कुछ खाने को दिया, मैं प्यासा था और तुमने मुझे कुछ पीने को दिया। मैं पास से जाता हुआ कोई अनजाना था, और तुम मुझे भीतर ले गये। मैं नंगा था, तुमने मुझे कपड़े पहनाए। मैं बीमार था, और तुमने मेरी सेवा की। मैं बंदी था, और तुम मेरे पास आये।’ –मत्ती २५:३४-३६

वाह। भेड़ों ने यीशु के लिए कई सुंदर, दयालु चीज़ें की थी। लेकिन इस कहानी में, वे उलझन में थे, तो उन्होंने राजा यीशु से कुछ सवाल पूछे:

“फिर उत्तर में धर्मी लोग उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे कब भूखा देखा और खिलाया या प्यासा देखा और पीने को दिया? तुझे हमने कब पास से जाता हुआ कोई अनजाना देखा और भीतर ले गये या बिना कपड़ों के देखकर तुझे कपड़े पहनाए? और हमने कब तुझे बीमार या बंदी देखा और तेरे पास आये?’ “फिर राजा उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे भोले-भाले भाईयों में से किसी एक के लिए भी कुछ किया तो वह तुमने मेरे ही लिये किया।’ –मत्ती २५:३७-४०

वाह। कितना सुंदर राजा! क्या ही एक अद्भुत दिल! यह राजा अपने लोगों से इतना प्यार करता था कि वह उन्हें भाई बुला रहा था।वह उन्हें इतना प्यार करता था कि वह चोट खाए लोग, या जेल या भूखे लोगों की देखबाल करता था, और खुश होता था जब उसके अपने, किसी भी तरह उनकी मदद करते। वे उनके दयालुता को याद करते जैसे उन्होंने उन के लिए यह किया हो! मसीह में हमारे भाइयों और बहनों की सेवा करना और स्वर्ग के राजा की सेवा करना एक ही बात है! वाह! यीशु हमारे अच्छे कर्मों को याद करके सिंजोते हैं ताकि वो हमें समय के अंत में इनाम दे सके! वाह!

लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि जो कोई खुद को मसीह का चेला बुलाता हो वो अपना जीवन उनके लिए बिताये। यीशु ने इस कहानी में उनके बारे में यह कहा है:

“फिर वह राजा अपनी बाँई ओर वालों से कहेगा, ‘अरे अभागो! मेरे पास से चले जाओ, और जो आग शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गयी है, उस अनंत आग में जा गिरो। यही तुम्हारा दण्ड है क्योंकि मैं भूखा था पर तुमने मुझे खाने को कुछ नहीं दिया, मैं अजनबी था पर तुम मुझे भीतर नहीं ले गये। मैं कपड़ों के बिना नंगा था, पर तुमने मुझे कपड़े नहीं पहनाये। मैं बीमार और बंदी था, पर तुमने मेरा ध्यान नहीं रखा।’ “फिर वे भी उत्तर में उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे भूखा या प्यासा या अनजाना या बिना कपड़ों के नंगा या बीमार या बंदी कब देखा और तेरी सेवा नहीं की।’ “फिर वह उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सच कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे इन भोले भाले अनुयायियों में से किसी एक के लिए भी कुछ करने में लापरवाही बरती तो वह तुमने मेरे लिए ही कुछ करने में लापरवाही बरती।’ “फिर ये बुरे लोग अनंत दण्ड पाएँगे और धर्मी लोग अनंत जीवन में चले जायेंगे।” –मत्ती २५:४१-४६

और ये मसीह के वो शब्द थे जो उन्होंने अपने चेलों को अपने महान सबक में दिए; उन्हें इस बात के लिए तैयार करते हुए कि उनके जीवन कैसे होने चाहिए जब वो इस धरती पर उसकी सेवा कर रहे थे। जिस प्रकार वे कमजोर और चोट पहुँचे लोगों के लिए अपने प्यार को दर्शाते, वह परमेश्वर को अपना प्रेम दिखाने के लिए एक रास्ता था। यह परमेश्वर के राज्य की बातें है। दस कुंवारियाँ और तोड़ों वाले पुरुषों की कहानी इसी बारे में थी। और मसीह के प्रेम के विशेष कार्य में, हमारी बुलाहट इसी के लिए है!

कहानी १४५: मंदिर के अहास में 

मत्ती २३:१-१२, मरकुस १२:३८-३९, लूका २०:४५-४६

Segnender Jesus Christus Glasfenster

परमेश्वर के पुत्र का इस्राएल के अगुवों के विरुद्ध परमेश्वर  का अभियोग

धार्मिक बहुत क्रोधित थे। और वे डर गए थे। किसी को भी, यहाँ तक के सबसे बुद्धिमान इंसान भी यीशु के विरुद्ध में खड़े होने कि हिम्मत नहीं कर पा रहा था। वह उनके लिए बहुत तेज़ था। जिस अधिकार और सामर्थ के साथ वह बोलता था, वे उसका उत्तर नहीं दे पाते थे, और अपनी योजनाओं को गुप्त स्थान में ले जाते थे जहां कोई उन्हें देख नहीं सकता था।वे गुप्त में साज़िश करते थे ताकि उन्हें स्वयं सेवकों को जवाब ना देना पड़े। वे अपने छुपाते हुए बंद दरवाज़ों में योजनाएं बनाते थे। परमेश्वर के पुत्र को मरने के लिए वे हर तरीका सोच रहे थे।

संसार के सभी लोगों में से जो चुना हुआ राष्ट्र था जिसे परमेश्वर ने अपना कीमती खज़ाना बनाया, उस शानदार उद्धार को मना रहे थे जो यीशु ने उन्हें पहले फसह पर दिया था, और उनके अगुवे उस परम उद्धार को पाने के लिए रास्ता बना रहे थे जो यीशु ने उन्हें दिया था। परमेश्वर उनके द्वेष और पाप का उपयोग कर के इस संसार में अपने बेटे के द्वारा उद्धार लाएगा।

मनुष्य के इतिहास के लिए परमेश्वर का गौरवशाली उद्देश्य जो उन पर बड़े ही सामर्थी रूप से बह कर आ रहा था, ये लोग उन में से आज्ञाकारी हो सकते थे। वे परमेश्वर कि विजय का हिस्सा हो सकते थे। उन्हें उस विजय का हिस्सा होना ही था। उन्हें इस्राएल देश को पश्चाताप करने के लिए अगुवाई करनी थी जिस समय मसीह आया था। उन्हें स्वर्ग के राज्य का अभिनन्दन करना था! परन्तु, उन्होंने अपने लिए एक रेंगने वाले सांप कि छोटा सी भूमिका निभाई। और हमेशा कि तरह, परमेश्वर उनके कपटी पाप को एक महान अच्छाई के लिए उपयोग करने जा रहा था। यीशु पवित्र आत्मा कि सामर्थ में पिता के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में अटल रहा। वह जानता था कि वे क्या करने जा रहे हैं, और उसे निश्चय था कि क्या होने जा रहा है। वह ख़ुशी से गया, यह जानते हुए कि अंत में वह सब कुछ नया कर देगा।

यीशु जानता था कि उसे अपनी जान देनी है, और उस फसह के हफ्ते में उसे बहुत सी महत्वपूर्ण बातें बतानी थीं। मंदिर कि सीढ़ियों में, उसने उन धार्मिक कुलीन लोगों निष्फल कोशिशों को, उन्हें फ़साने के लिए नाश कर दिया था वे बुरी तरह से शांत हो गए। अब उसकी बरी थी बात करने कि। यह कोई हल्का फुल्का सन्देश नहीं होने जा रहा था। यीशु ने उन्हें उनकी प्रतिकारक दुष्टता के लिए उन्हें बहुत गुस्से से डांटा। उसने उनकि आकांशाओं के लिए और धोखेपन के लिए और छलयोजना के लिए डाटा। अब समय आ गया था कि मसीह उन अगुवों के विरुद्ध जिन्होंने परमेश्वर के पुत्र का इंकार किया था, परमेश्वर के न्याय के लिए सौंप दे। उसने ऐसे आरम्भ किया: “’यहूदी धर्म शास्त्री और फ़रीसी मूसा के विधान की व्याख्या के अधिकारी हैं। इसलिए जो कुछ वे कहें उस पर चलना और उसका पालन करना। किन्तु जो वे करते हैं वह मत करना। मैं यह इसलिए कहता हूँ क्योंकि वे बस कहते हैं पर करते नहीं हैं।'”

मूसा कि व्यवस्था के अधिकारी होने से यीशु का क्या मतलब था? मूसा इस्राएल का महान अगुवा था जिसने सीनै पहाड़ पर जाकर परमेश्वर से बात की। वह इस्राएल के लिए दस आज्ञाओं को लेकर आया। उनके भयंकर पाप के बावजूद, उनके शास्त्री और फरीसी प्राधिकरण के पद पर होते हुए परमेश्वर के वसाहन का प्रचार कर रहे थे। उनके कार्यों उनके उन अच्छी बातों से जो वे सिखाते थे उनसे बहुत भिन्न थे। उन्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार बनने के लिए चुनना था और उन बातों को छोड़ना था जो उनके अगुवों ने उन्हें सिखाईं!

फिर यीशु ने उन अगुवों के कर्मों का वर्णन किया:

 “’वे अच्छे कर्म इसलिए करते हैं कि लोग उन्हें देखें। वास्तव में वे अपने ताबीज़ों और पोशाकों की झालरों को इसलिये बड़े से बड़ा करते रहते हैं ताकि लोग उन्हें धर्मात्मा समझें। वे उत्सवों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान पाना चाहते हैं। आराधनालयों में उन्हें प्रमुख आसन चाहिये। बाज़ारों में वे आदर के साथ नमस्कार कराना चाहते हैं। और चाहते हैं कि लोग उन्हें ‘रब्बी’ कहकर संबोधित करें।'”

इन घमंडी लोगों कि कल्पना कीजिये, जो सड़कों पर इस तरह चलते हैं जैसे कि वे बहुत पवित्र और दूसरों से बढ़कर योग्य हैं। उनकी दिखावटी धर्मनिष्ठा चमड़े के थे जिनमें वचन के कुछ हिस्से थे। वे उन्हें अपने गले में पहनकर यह दिखाते थे कि वे कितने धर्मी हैं और दूसरों कि निंदा करते थे।

पुराने नियम के अनुसार यह गुच्छा उनके वस्त्र का एक हिस्सा था। परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों को यह आज्ञा दी थी कि वे चार गुच्छे अपने वस्त्रों में सीएं ताकि वे अपने आप को पवित्र और परमेश्वर के अलग किये हुए लोग दिख सकें। (गिनती १५:४०) यीशु ने भी वे गुच्छे पहने! परन्तु इन लोगो ने परमेश्वर का आदर करने के लिए नहीं पहना था। उन्होंने उसे अपनी महिमा के लिए पहना था, और आम लोगों से अपने लिए प्रशंसा और महिमा कि मांग की। वे उस उपासना और आदर कि मांग कर रहे थे जो केवल परमेश्वर के लिए है! यीशु इससे बहुत अपमानित हुआ।

उसने कहा:

“’किन्तु तुम लोगों से अपने आप को ‘रब्बी’ मत कहलवाना क्योंकि तुम्हारा सच्चा गुरु तो बस एक है। और तुम सब केवल भाई बहन हो। धरती पर लोगों को तुम अपने में से किसी को भी ‘पिता’ मत कहने देना। क्योंकि तुम्हारा पिता तो बस एक ही है, और वह स्वर्ग में है। न ही लोगों को तुम अपने को स्वामी कहने देना क्योंकि तुम्हारा स्वामी तो बस एक ही है और वह मसीह है। तुममें सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही होगा जो तुम्हारा सेवक बनेगा। जो अपने आपको उठायेगा, उसे नीचा किया जाएगा और जो अपने आपको नीचा बनाएगा, उसे उठाया जायेगा।'”

यीशु के चेलों को इस्राएल के अगुवों से बहुत भिन्न होना था।

सोचिये यदि हर कोई अपने तरीके से चलने लगे? यह कितना अच्छा होगा उन लोगों के बीच में रहना जो विनम्रता और नम्रता से भरे हुए हैं। यीशु अपने चेलों को एक बिलकुल भिन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बुला रहा था! वह स्वर्ग राज्य का मार्ग था!

कहानी १४४: यंत्रणा सप्ताह : तीसरा दिन ( मंगलवार)

मत्ती २१:२३-४६, मरकुस ११:२७-३३, लूका २०:१-१८

Vineyard, San Vicente de la Sonsierra as background, La Rioja

सुबह हो गयी थी, यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को जैतून के पहाड़ पर येरूशलेम के उस पार चला गया। यीशु उन्हें स्वर्गीय पिता के विषय में सिखा रहा था। चेले परमेश्वर के बेटे पर विश्वास करते थे, और इसीलिए उनके परमेश्वर ने इच्छापूर्वक उनकी प्रार्थना को सुना। उसके पास उनके लिए वह सामर्थ थी जिससे वे एक क्षण में एक पेड़ को सुख सकते थे और पहाड़ को समुन्दर में जाने का आदेश दे सकते थे। जब वह बोलता था, क्या वे जैतून के पहाड़ पर गए? क्या उन्होंने उस मार्ग को ढूँढा जो महासागर को जाता है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर उनके साथ था, जो अपने सेवकों कि प्रार्थनाओं को सुनने को तैयार था। आशा रखनी कि एक बहुत बड़ी वजह थी। और फिर भी उन्हें दूसरों को क्षमा करने का ह्रदय रखना था। यीशु मनुष्य के ह्रदय कि बातों को कितने नम्रता पूर्वक निपटता था।

जब वे मंदिर पहुँचे, यीशु ने प्रचार करना शुरू कर दिया। जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रमुख याजक, धर्मशास्त्री और बुजुर्ग यहूदी नेता उसके पास आये। और बोले,“तू इन कार्यों को किस अधिकार से करता है? इन्हें करने का अधिकार तुझे किसने दिया है?”

यह कितना अपमानित है। वे सब के सामने कह रहे थे, “तुम होते कौन हो?” ये लोग देश के प्रभारी थे, इस उग्र को उनके मंदिर के साथ उलझने का क्या अधिकार? वह कौन होता है उनके व्यापार को निकलने का या मंदिर में घुसने का? अपनी चँगाइयों से और शिक्षाओं से मंदिर ओ भ्रष्ट कैसे किया? राष्ट्र के वे अभिषिक्त धार्मिक अगुवे थे। एक बढ़ई को देश कि व्यवस्था के साथ उलझने कि क्या ज़रुरत?

और यदि यीशु के पास अधिकार है, तो वह किसने दिया? उन्हें उसके उत्तर में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनकी अपनी मुख्य

इच्छाएं उनके अपने ही स्वार्थ में छुपा हुआ था। वे यीशु को फ़साना चाहते थे। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए उकसाते थे। यीशु ने अपनी सच्चाई से उनके झूठ को दबा दिया।

“मैं तुमसे एक प्रश्न पूछता हूँ, यदि मुझे उत्तर दे दो तो मैं तुम्हें बता दूँगा कि मैं यह कार्य किस अधिकार से करता हूँ। जो बपतिस्मा यूहन्ना दिया करता था, वह उसे स्वर्ग से प्राप्त हुआ था या मनुष्य से? मुझे उत्तर दो!”
मरकुस ११:२७-३३

यीशु ने उन्हें एक प्रस्ताव दिया। यदि वे उसे उत्तर देते हैं, वह उन्हें अपनी असली पेहचान बता देगा। यह बहुत ही मोहक होगा। वे उसके सवाल का जवाब नहीं दे पाये। जब धार्मिक अगुवे उसे उत्तर देने के लिए जमा हुए, उन्होंने कहा:  “यदि हम कहते हैं ‘परमेश्वर से’ तो यह हमसे पूछेगा ‘फिर तुम उस पर विश्वास क्यों नहीं करते?’ किन्तु यदि हम कहते हैं ‘मनुष्य से’ तो हमें लोगों का डर है क्योंकि वे यूहन्ना को एक नबी मानते हैं।” मत्ती २१:२५-२६

एक बार फिर, यीशु ने उनकी ही छलयोजना और धोकेपन में उन्हें फसा दिया। उसने परिस्थिति को घुमा दिया। अचानक, धार्मिक अगुवों को परमेश्वर के नबी को इंकार करने का जवाब देना पड़ा। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने उन्हें सांप के बच्चे कहा था और उन्होंने पश्चाताप करने से इंकार कर दिया और अब वे परमेश्वर के लोगों के साथ भी उसी तरह व्यवहार कर रहे थे। वे परमेश्वर को अपमानित करके  नहीं हो रहे थे बल्कि लोगों को अपमानित करने से डर रहे थे। उनका मुख्य सम्बन्ध उनके अपने पद और अधिकार से था। इसलिये उन्होंने यीशु को उत्तर दिया,“हम नहीं जानते।”

इस पर यीशु ने उनसे कहा,हूँ।”तो फिर मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगा कि मैं ये कार्य किस अधिकार से करता हूँ।
यदि वे यूहन्ना कि सेवकाई को आदर नहीं देते तो वे यीशु कि सच्चाई को भी कभी नहीं जान पाऐंगे, क्योंकि यह दोनों परमेश्वर कि ओर से है।

यीशु ने उन्हे एक और दृष्टान्त बताया जिससे कि सच्च और स्पष्ट हो जाता। पहली कहानी में उसने कहा:
अच्छा बताओ तुम लोग इसके बारे में क्या सोचते हो? एक व्यक्ति के दो पुत्र थे। वह बड़े के पास गया और बोला,‘पुत्र आज मेरे अंगूरों के बगीचे में जा और काम कर।किन्तु पुत्र ने उत्तर दिया, ‘मेरी इच्छा नहीं हैपर बाद में उसका मन बदल गया और वह चला गया। फिर वह पिता दूसरे बेटे के पास गया और उससे भी वैसे ही कहा। उत्तर में बेटे ने कहा, ‘जी हाँ,’ मगर वह गया नहीं।
बताओ इन दोनों में से जो पिता चाहता था, किसने किया?”
लोगों ने कहा कि पहला पुत्र आज्ञाकारी था।

यीशु ने उनसे कहा,
“’मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कर वसूलने वाले और वेश्याएँ परमेश्वर के राज्य में तुमसे पहले जायेंगे।यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना तुम्हें जीवन का सही रास्ता दिखाने आया और तुमने उसमें विश्वास नहीं किया। किन्तु कर वसूलने वालों और वेश्याओं ने उसमें विश्वास किया। तुमने जब यह देखा तो भी बाद में न मन फिराया और न ही उस पर विश्वास किया।'”

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यीशु ने क्या कहा? उसने घोषित किया कि व्यभिचार करने वाली और भ्रष्टाचार करने वाले और एक लालची कर चुकाने वाला, ये धार्मिक अगुवों से कहीं अधिक अच्छे थे। वे यह घोषित कर थे कि यीशु को अपनी सेवकाई का प्रमाण देना होगा जबकि यीशु ने सब बातों को उल्टा कर दिया और यह घोषित किया कि उन्हें स्वयं पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। उन्होंने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का आदर नहीं किया था, जिसे परमेश्वर ने यह अधिकार दिया था कि वह देश को सच्चाई बताये। यीशु ने उनकी लज्जा को स्पष्ट कर दिया था। परन्तु यीशु ने यहाँ समाप्त नहीं किया था।

“एक और दृष्टान्त सुनो: एक ज़मींदार था। उसने अंगूरों का एक बगीचा लगाया और उसके चारों ओर बाड़ लग दी। फिर अंगूरों का रस निकालने का गरठ लगाने को एक गडढ़ा खोदा और रखवाली के लिए एक मीनार बनायी। फिर उसे बटाई पर देकर वह यात्रा पर चला गया। जब अंगूर उतारने का समय आया तो बगीचे के मालिक ने किसानों के पास अपने दास भेजे ताकि वे अपने हिस्से के अंगूर ले आयें।
“किन्तु किसानों ने उसके दासों को पकड़ लिया। किसी की पिटाई की, किसी पर पत्थर फेंके और किसी को तो मार ही डाला। एक बार फिर उसने पहले से और अधिक दास भेजे। उन किसानों ने उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया। बाद में उसने उनके पास अपने बेटे को भेजा। उसने कहा, ‘वे मेरे बेटे का तो मान रखेंगे ही।’
“किन्तु उन किसानों ने जब उसके बेटे को देखा तो वे आपस में कहने लगे, ‘यह तो उसका उत्तराधिकारी है, आओ इसे मार डालें और उसका उत्तराधिकार हथिया लें।’ सो उन्होंने उसे पकड़ कर बगीचे के बाहर धकेल दिया और मार डाला।
“तुम क्या सोचते हो जब वहाँ अंगूरों के बगीचे का मालिक आयेगा तो उन किसानों के साथ क्या करेगा?” मत्ती २१:३३-४०

आपने देखा कि कैसे ठेकेदार भी उन धार्मिक अगुवों के समान हैं? परमेश्वर के राष्ट्र पर उनको कुछ समय के लिए अधिकार दिया गया था। कुछ सेवक परमेश्वर के नबी थे, जैसे यशायाह और यर्मियाह, एलिया और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला। उन्होंने आकर इस पापी देश को परमेश्वर के विषय सच्चाई सुनाई, और इसीलिए इस्राएल के राजा और अगुवे उनसे घृणा करते थे। परमेश्वर ने एकलौते पुत्र को भेजा, और धार्मिक अगुवे उसे मार डालने कि साज़िश कर रहा थे। वे इस्राएल के इतिहास के विपरीत थे। वे परमेश्वर कि योजना के विपरीत थे! क्या इस फटकार से वे परिवर्तित होंगे? क्या परमेश्वर का भय उनके भीतर काम करेगा?

दृष्टान्त में यीशु ने इस बात का वर्णन किया कि परमेश्वर उन लोगों के साथ क्या करने जा रहा था जिन्होंने उसके सेवकों को सताया है। वे पूर्णरूप से नष्ट हो जाएंगे, और अंगूर कि बाड़ी किसी और को दे दी जाएगी।

फिर यीशु ने कहा:
“’क्या तुमने शास्त्र का वह वचन नहीं पढ़ा:

जिस पत्थर को मकान बनाने वालों ने बेकार समझा, वही कोने का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पत्थर बन गया?
ऐसा प्रभु के द्वारा किया गया जो हमारी दृष्टि में अद्भुत है।

“इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ परमेश्वर का राज्य तुमसे छीन लिया जायेगा और वह उन लोगों को दे दिया जायेगा जो उसके राज्य के अनुसार बर्ताव करेंगे। जो इस चट्टान पर गिरेगा, टुकड़े टुकड़े हो जायेगा और यदि यह चट्टान किसी पर गिरेगी तो उसे रौंद डालेगी।’” मत्ती २१:४३-४४

जब फरीसी और महायाजक उसके दृष्टान्त को सुन रहे थे, वे जानते थे कि यीशु उन्हें कोई सन्देश देना चाह रहा है। वे उसे गिरफ्तार करने के लिए कितने उत्सुक थे! लेकिन वे कर नहीं पा रहे थे! भीड़ बीच में आ रही थी। यदि वे उसे गिरफ्तार करने कि कोशिश करते तो दंगा हो जाता! भीड़ जानती थी कि यीशु एक नबी है।

कहनी १३५: येरूशलेम के रास्ते

मत्ती २०:१७-२८, मरकुस १०:३५-४५

यीशु येरुशलेम कि ओर जा रहा था। जब वे जा रहे थे, वह उनके आगे आगे चल रहा था क्यूंकि उसे अपने कार्य के प्रति उत्सुकता थी। चेले अचंबित हुए और भय से भर गए। सब आराधनालये के मंसूबों को जानते थे। यीशु के लिए येरूशलेम एक खतरनाक जगह थी। जब वे दाऊद के शहर के पास पहुँच रहे थे उन्हें कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था। पूरे राष्ट्र में बहुत तनाव फैला हुआ था कि कैसे सब कुछ होगा। इन सब के बीच, यीशु उन बातों के बीच चमकते हुए पत्थर के समान बना रहा। वह इतनी दृढ़ता के साथ कैसे खतरे का सामना कर सकता था?

उनके सफ़र के बीच, यीशु उन बारह चेलों को एक तरफ ले गया। एक बार फिर उसने आने वाली बातों के विषय में चेतावनी दी। उसके लिए यह सब बहुत स्पष्ट था। उसने कहा,
“’सुनो, हम यरूशलेम पहुँचने को हैं। मनुष्य का पुत्र वहाँ प्रमुख याजकों और यहूदी धर्म शास्त्रियों के हाथों सौंप दिया जायेगा। वे उसे मृत्यु दण्ड के योग्य ठहरायेंगे। फिर उसका उपहास करवाने और कोड़े लगवाने को उसे गै़र यहूदियों को सौंप देंगे। फिर उसे क्रूस पर चढ़ा दिया जायेगा किन्तु तीसरे दिन वह फिर जी उठेगा।’”

यीशु वास्तव में जानते थे कि क्या होने वाला था। कैसे? उसने वचन को पढ़ा और जान गया। वह भविष्यवाणियों को समझ गया। और पवित्र आत्मा उसकी अगुवाई करने के लिए था। पवित्र आत्मा ने पिता कि योजनाओं को उसे प्रकट किया और उन्हें पूरा करने के लिए उसे अपने पिता पर पूरा भरोसा था। परमेश्वर ने सब कुछ अपने नियंत्रण में किया हुआ था। आराधनालय और सभी पात्र परमेश्वर कि इच्छा को पूरी कर रहे थे चाहे वे ऐसा करना चाहते थे या नहीं। यीशु उन लोगों के ह्रदय कि दुष्ट बातों को भी अपने सिद्ध योजना को पूरा करने के लिए उपयोग करने वाला था।

परन्तु जब वह आने वाली बातों के विषय में विस्तार से बता रहा था, यीशु के चेले समझ नहीं पाये। क्या यीशु के मृत्यु के बारे में सोचना इतना भयंकर था? या उसके जी उठने कि घोषणा को समझना इतना अनोखा था? चेले केवल इतना ही समझ पा रहे थे कि मसीहा आकर राज करेगा। और वे इसी उद्देश्य से जुड़ना चाहते थे! वे यीशु को ऐसा ही मनुष्य के पुत्र के समान देखना चाहते थे। वे और कुछ नहीं सोच पा रहे थे।

चेलों और उन वफादार लोगों के बीच चल रही बात चीत कि कल्पना कीजिये जो वे यीशु के साथ साथ रह्कर कर रहे थे।

क्या वे अपेक्षा कर रहे थे कि याशु अपनी अधिकार कि कुर्सी कैसे लेगा? क्या वे अद्भुद चमत्कारों कि अपेक्षा कर रहे थे? वे यह सोच रहे थे कि वह रोमी राज को कैसे समाप्त करेगा? वे कैसे अद्भुद चमत्कारों को देखने कि आशा कर रहे थे? क्या यह आकर्षक नहीं होगा उस समय में वापस जा कर उनके साथ एक  दो मील येरूशलेम कि ओर चलने में?

फिर जब्दी के बेटों की माँ अपने बेटों समेत यीशु के पास पहुँची। यह स्त्री ना केवल यीशु के दो चेलों कि रिश्तेदार थी, वे यीशु कि चाची थी! जब वह अपने दो बेटों के साथ यीशु के पास आयी, उसने उसके आगे झुक कर दण्डवत किया। यह एक अनुरोध करने का तरीका था। क्यूंकि वह कुछ मांगने जा रही थी। उसके बेटों ने कहा,”गुरु, हम चाहते हैं कि तू वही करे जो हम चाहते हैं।”

उन्होंने बहुत साहस दिखाया। उन्हें क्या चाहिए था? यीशु ने उससे पूछा,“’तू क्या चाहती है?’”
वह बोली,“मुझे वचन दे कि मेरे ये दोनों बेटे तेरे राज्य में एक तेरे दाहिनी ओर और दूसरा तेरे बाई ओर बैठे।”

तो यह उनका लक्ष्य था! एक बार यीशु अपने राज को स्थापित कर लेता वे  अपनी सम्मान के स्थान को सुरक्षित करना चाहते थे। यीशु जब अपने राज्य के विषय में बोल रहे थे, वे समझ रहे थे कि वह उस दिन कि बात कर रहा है जब वह दाऊद के सिंहासन पर बैठेगा। और यीशु ने इसका इंकार नहीं किया क्यूंकि एक दिन ऐसा होने जा रहा था। वह उन सब भविष्यवाणियों को पूरा करेगा जो उस दिन के लिए की गयी हैं जब दाऊद का वंशज उस युगानुयुग के सिंहासन पर बैठेगा। परन्तु यह भविष्य में हज़ारों सालों के लिए होने जा रहा था! इस बीच बहुत काम है करने को!

यूहन्ना और याकूब और उनकी माँ उन बातों को नहीं देख पा रहे थे जो यीशु के पूर्ण राज्य के आने से पहले आने वाली थीं। वे केवल इतना जानते थे कि यदि वो बारह चेले जी सिंहासन पर बैठ कर इस्राएल के राष्ट्र का न्याय करेंगे, ये दोनों भी सिंहासन के सबसे उच्च स्थान में बैठना चाहते थे।

निश्चय ही यूहन्ना और याकूब के पास यह मानने का अच्छा कारण था कि उन्हें अवश्य चुन लिया जाएगा। आखिरकार, वे उसके चचेरे भाई थे! और जिस समय यीशु के पास बारह चेले थे, उसका तीन के साथ एक गहरा सम्बन्ध था और ये दो भाई उसका हिस्सा थे। फिर भी यह सुरक्षित अभिलाषा यीशु कि राह से बहुत दूर था। उन्होंने यीशु को यह कहते नहीं सुना कि आखिर वाले पहले हो जाएंगे और पहले आखिर हो जाएंगे!

यीशु ने उत्तर दिया,“’तुम नहीं जानते कि तुम क्या माँग रहे हो। क्या तुम यातनाओं का वह प्याला पी सकते हो, जिसे मैं पीने वाला हूँ?’” बाइबिल परमेश्वर के स्वर्गीय कामों को प्याले के चिन्ह के स्वररूप में वर्णन करती है। प्याला परमेश्वर कि योजना को दर्शाता है जो एक व्यक्ति या एक समूह के लिए है, जो वह उन पर उंडेलता है। कभी यह आशीष का प्याला होता है। और दूसरे समय यह परमेश्वर के क्रोध को दर्शाता है जो उसका पाप के विरुद्ध में उठता है। यीशु जानता था कि  आगे क्रूस के लिए क्या होने जा रहा है। परमेश्वर के राज्य कि मुकुट महिमा के पहले, वह परमेश्वर के उस महान दुःख के प्याले से पियेगा। उस पूर्ण विजय के लिए परमेश्वर कि स्वर्गीय योजना उस विनाशकारी पराजय के सामान दिखेगी। क्या याकूब और यूहन्ना उसके पीछे जाना चाहेंगे?

उन्होंने उत्तर दिया,“हाँ, हम कर सकते हैं।”

यीशु उनकी कमज़ोरियों को जानता था। लेकिन वह जानता था कि उसके विजय के बाद क्या होगा। उसकी मृत्यु और जी उठना पवित्र आत्मा के लिए रास्ता बनाएगा ताकि वह याकूब और यूहन्ना के ऊपर उंडेला जाये। उन्हें उन बातों का बलिदान करने कि सामर्थ दी जाएगी जो इस संसार कि हैं ताकि वे परमेश्वर के साथ युगानुयुग के लिए रह सकें। वह उनके लिए मार्ग तैयार करेगा ताकि वे उसके समान बन सकें।

यीशु उनसे बोला,“’निश्चय ही तुम वह प्याला पीयोगे। किन्तु मेरे दाएँ और बायें बैठने का अधिकार देने वाला मैं नहीं हूँ। यहाँ बैठने का अधिकार तो उनका है, जिनके लिए यह मेरे पिता द्वारा सुरक्षित किया जा चुका है।’”

यीशु जानता था कि उसके जीना और मरना उसके चेलों के लिए इस संसार में जीने के लिए क्या माएने रखेगा। वे उसके दुःख के प्याले को पियेंगे। नए नियम के अंत तक, हम पढ़ेंगे कि कैसे याकूब जो सबसे पहला चेला है यीशु के नाम के लिए मारा जाएगा। उसके बाद यूहन्ना भी सताया जाएगा। जिस समय बाकि चेले सुसमाचार के लिए अपनी जान गवा देंगे, यूहन्ना कलीसिया को बढ़ते हुए देखेगा। यूहन्ना को यीशु के प्रति वफादार होने कि सज़ा में एक टापू पर निर्वासित कर दिया जाएगा। इसके पहले कि परमेश्वर उसे वापस लाये, वह बाइबिल की पांच पुस्तक लिख चुका होगा।

जब आप यीशु के वचन को पढ़ते हैं, क्या आपको एहसास होता है कि उसकी तस्वीर औरों से अधिक विशाल थी? जो उनके समय में हो रही थीं, वे उन बातों में ही सीमित थे। परन्तु पवित्र आत्मा कि सामर्थ से, यीशु सब समय कि योजनाओं को समझ पा रहे थे। वह इस जागरूकता में जी रहा था कि भविष्य में अनंत जीवन का एक बेहतर जीवन है। वह अपने पिता के पास वापस उस सिंहासन पर बैठने के लिए जा रहा था, और उसके चेले उसके साथ होंगे। उसके पिता के पास उन सब के जीवन के लिए योजना थी। उसकी योजना उनके लिए अनंतकाल के जीवन के लिए है, परन्तु वह योजनाएं उसकी अद्भुद इच्छा में छुपी हुई थीं। सबसे अद्भुद बात यह है कि हम भी उन बातों को  देखने के लिए वहाँ होंगे!

जब दूसरे चेलों को पता चला कि याकूब और यूहन्ना ने क्या माँगा, वे बहुत क्रोधित हुए। उनका घमंड और  प्रतियागिता करने कि भावना सब कुछ नीचे आ गया। स्वर्ग राज्य में याकूब और यूहन्ना ऊंचा दर्जा पा रहे थे, और वे यीशु को पाने के लिए घरेलु रिश्तों का उपयोग कर रहे थे। चेलों ने कितनी जल्दी पापी मनुष्य के रास्तों को अपना लिया। यदि परमेश्वर पर पूरे भरोसे करने के योग्य था, तो उसे इस बात के लिए भरोसा किया जा  सकता था। फिर भी उन्हें भरोसा नहीं था। क्या परमेश्वर के अगुवों को इस तरह से व्यवहार  करना चाहिए था? वे फरीसियों कि तरह दिख रहे थे!

यीशु ने उनसे कहा:
“’तुम जानते हो कि गैर यहूदी राजा, लोगों पर अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं और उनके महत्वपूर्ण नेता, लोगों पर अपना अधिकार जताना चाहते हैं। किन्तु तुम्हारे बीच ऐसा नहीं होना चाहिये। बल्कि तुम में जो बड़ा बनना चाहे, तुम्हारा सेवक बने। और तुम में से जो कोई पहला बनना चाहे, उसे तुम्हारा दास बनना होगा। तुम्हें मनुष्य के पुत्र जैसा ही होना चाहिये जो सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के छुटकारे के लिये अपने प्राणों की फिरौती देने आया है।’”  -मत्ती २०:२५b-२८

परमेश्वर के राज्य में सब कुछ उल्टा पुल्टा था। वास्तव में, परमेश्वर के राज्य में सब कुछ सही है, और इस संसार कि चीज़ें उलटी पुल्टी हैं! अधिकतर समाज में, दास और बंधी दूसरों कि देखभाल में लगे रहते हैं, परन्तु उन्हें सबसे कम दर्जा और दयालुता मिलती हैं। जो कोई भी परमेश्वर के राज्य के लिए ऐसी ही विनम्रता से जीयेगा वह सबसे महान होगा। और जिस समय यीशु अपनी जान देने के लिए तैयार हो रहा था, उसने साबित किया कि वह सबसे महान सेवक है।