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कहानी १८२: तट के किनारे सैर 

Sea of Galilee in Israel

युहन्ना २१:१५-२५

चेले नाश्ता खाने के बाद उठकर तट के किनारे चलने लगे। परमेश्वर ने पतरस से कहा, ‘शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तुम सच में मुझे इन से अधिक प्यार करते हो ?”

इसका क्या मतलब था? और उसने ऐसा क्यों पूछा? खैर, पतरस को हाल ही में एक भारी विफलता का सामना करना पड़ा था। उसने सार्वजनिक रूप में प्रभु के साथ विश्वासघात किया था। अब प्रभु पतरस को एक सार्वजनिक तरीके से बहाल करने जा रहे थे।

यीशु की गिरफ्तारी की रात पर जब यीशु आगे होने वाली बातों के बारे में समझा रहे थे, अन्य सभी चेले शांत हो गए। वह केवल पतरस ही था जिसने बड़े साहस से यह घोषणा की कि वह प्रभु का इनकार कभी नहीं करेगा। उसके इस वफादार संकल्प के घोषणा के बाद ही, अन्य चेलों को ऐसा करने के लिए साहस आया। पर पतरस के साड़ी बहादुरी और दृढ़ संकल्प के बावजूद, उसकी अपनी मानव शक्ति पर्याप्त नहीं थी। महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण घंटे में, जब वफादारी सबसे पवित्र गुण था, वह कमजोर पड़ गया और ऐसा करने में विफल हुआ। और मामला इस बात से बदतर हो जाता है कि वह एक रोमन सैनिक के चेहरे में और न मौत की धमकी पर अस्थिर हो गया। उसने ऐसा इनकार एक छोटी गुलाम लड़की के पूछताछ में ही कर दिया। और यह हर कोई जानता था।

यीशु पहले ही समझ गए थे कि क्या होने जा रहा था और उसे चेतावनी दी, लेकिन पतरस इसे सुनना सहन नहीं कर सका। उसने इस बात का विश्वास करने से इनकार किया कि वह ऐसी बात कर सकता है। लेकिन यीशु जानता था कि शैतान, जो परमेश्वर का शक्तिशाली दुश्मन था, वही चालबाज़ साँप जिसने आदम और हव्वा की परीक्षा ली थी, पतरस के पीछे जाने की अनुमति माँगी थी, और परमेश्वर ने “हाँ” भरी थी। स्वर्गीय पिता अपने दुश्मन के नापाक इरादों का उपयोग करने के लिए जा रहा था ताकि वो अपने सेवक की परीक्षा ले सके जो उसके बेटे यीशु के लिए समर्पित था। पतरस को अपने स्वयं की प्रचुरता और गर्व से छुटकारा पाने के लिए एक महान तोड़ने की प्रक्रिया से जाना था।

पतरस को यह कुछ भी समझ में नहीं आया। वह इस भ्रम में था कि वह अपने स्वयं के बल से सब कुछ कर सकता है। लेकिन यह उस आदमी के लिए अतिरिक्त नहीं था जिसे ‘कलीसिया की चट्टान’ बनना था। अगर उसे मार्गदर्शन करना था, तो उसे यह सीखना होगा कि  वह कितना कमजोर है ताकि वह परमप्रधान परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर हो सके।

यह दर्दनाक सबक था,  पर रंग भी लाया। पतरस अपने विश्वासघात के बाद उन भयानक दिनों में खुद के अंत तक आ गया था। यीशु ने अपने जी उठने के बाद अपने को पहले पतरस को प्रकट किया। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उनके बीच क्या वार्तालाप हुई, लेकिन हम केवल कल्पना कर सकते है कि पतरस ने अपने स्वामी की ओर  कितना दु: ख और पश्चाताप प्रकट किया होगा। उन्होंने प्रभु और सेवक जैसे कितना करीबी और पवित्र क्षण गुज़ारा होगा।

अब जैसे वो गलील के सागर के तट पर चल रहे थे, यीशु पतरस से उसके प्रति अपने प्यार की पुन: पुष्टि कर रहे थे। इस बार, यह वार्तालाप अन्य चेलों के सामने हो रहा था और वो यह सब सुन सकते थे। पतरस वास्तव में परमेश्वर का चुन हुआ अगुआ होने को था, लेकिन पतरस के इनकार की कहानी उसके लिए उनके सम्मान को क्षतिग्रस्त कर सकती थी। क्या वह अनुग्रह से गिर गया था? यीशु उसे सम्मान के साथ बहाल करने के लिए सुनिश्चित कर रहे थे।

फिर भी, इस सवाल ने पतरस को भेद होगा। ‘हाँ, प्रभु,’ उसने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस को यह विश्वास था कि यीशु जानता था। अपने महान असफलताओं के बावजूद, उसका प्यार वास्तव था।

यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरे मेमनों को खिलाओ’। पतरस को यीशु के लिए प्यार उसके लोगों की देखरेख करके दिखाना था। यीशु ने अपने आप को ‘भला चरवाहा’ के रूप में वर्णित किया था, और पतरस उनका सेवक था। प्रभु उसे अपनी सबसे क़ीमती संपत्ति को विश्वास समेत सौपने जा रहा था।

प्रभु ने फिर से पूछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?”

यह प्रश्न दो बार पूछने का क्या मतलब हो सकता है? ‘हाँ, प्रभु,’ पतरस ने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस अपने प्यार की सच्चाई का प्रमाण देने के लिए किसी वीर प्रदर्शन या वफादारी की घोषणा पर निर्भर नहीं करने जा रहा था। वो मसीह के बुध्धिमत्ता और ज्ञान पर निर्भर था। वह जानता था कि यीशु जानता था, क्योंकि पतरस को विश्वास था कि यीशु सब कुछ जानता है। यही सबसे मुख्य बात थी।

“मेरी भेड़ों की देखभाल करना, ‘यीशु ने कहा। उनके दूसरे अनुरोध के साथ, पतरस के कार्य का गहरा महत्व दिख रहा था। यह पतरस के लिए एक ऐसी भूमिका थी जो उसके खुद के लिए थी, और उसके चेलों को भी यह मालूम होना था, क्योंकि वे उसके साथ कलीसिया के निर्माण में शामिल होंगे। हालांकि यीशु ने नहीं कहा था, “यह सच है, तुम मुझे इन सब से ज्यादा प्यार करते हो,” उनका मतलब यही था। अगर उनका यह मतलब नहीं होता, तो वह पतरस के आगे ऐसा महत्वपूर्ण काम नहीं रखते। पतरस को अपनी स्वाभाविक प्रतिभा, बल या आकर्षण की वजह से इस कलीसिया का अगुआ नहीं बनाया गया था। उसे यीशु मसीह के प्रति समर्पण, प्यार और भक्ति की वजह से उन्नत किया गया था। यह एक सबसे जरूरी बात है।

एक बार फिर, यीशु ने पतरस से पुछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” तीसरी बार पतरस के लिए एक कड़वे डंक की तरह लगा होगा। यह उस खंडन की संख्या है जिसके बारे में यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वह कितनी बार येशु के महान पीड़ा के समय में उद्धारकर्ता का इनकार करेग। और फिर पतरस बोला, ‘हे प्रभु, आप को सब कुछ पता है। आपको पता है कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस के पास सिर्फ भरोसा था पर यीशु दिव्य था। वह हर झूठ से हर सच जानता था। वह जानता था कि पतरस उससे प्यार करता था।

यीशु ने कहा, ‘मेरी भेड़ों को चराओ। मैं तुम्हे सच बोलता हूँ, जब तुम छोटे थे, तो तुम अपने आप को तैयार करते थे और जहाँ चाहते उधर चले जाते, लेकिन जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो तू अपना हाथ बढाओगे, और कोई और तुम्हे कपड़े पहनाएगा और वहां ले जाएगा जहाँ तुम जाना नहीं चाहते हो’।

वाह। अब मसीह एक और भविष्यवाणी कर रहे थे। पतरस वास्तव में यीशु को प्यार करता था, और एक दिन मौत के मुंह में अपनी वफादारी दिखाएगा। हालांकि पतरस ने अपने प्रारंभिक वर्ष अपने ऊपर खर्च किये, उसके आगे का जीवन, मसीह के राज्य के लिए समर्पित होगा। अंत में, उसके हाथ क्रूस पर चढ़ाने के लिए फैला दिए जाएंगे। उसका जीवन यीशु के जीवन की तरह उसकी पीड़ा में भी होगा। और जैसे  यीशु अपने पिता को महिमा लाए, पतरस को भी मसीह के लिए महिमा लाना होगा। कलीसिया में अगुआ होने के नाते, पतरस के मौत की खबर दूर दूर तक पहुंचेगी। ऐसे निर्बाध और पूर्ण विश्वासयोग्यता को कौन समझा सकता था? उसके बलिदान की सीमा उसका येशु के प्रति प्यार का माप था, और यह उसके उद्धारकर्ता को आदर और प्रतिष्ठा लाएगी।

लेकिन यह कई दशकों के बाद होना था। अभी के लिए यीशु ने कहा, ‘ मेरे पीछे चलो’। कल्पना कीजिये कि आप अपने जीवन के अंत में यह जाने कि आप को क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। कल्पना कीजिये कि इसको जानना परमेश्वर की योजना का हिस्सा था, और उसके बावजूद भी उसके पीछे आपको चलना होगा। इसको पतरस के प्यार की गहराई के अलावा समझने का कोई रास्ता नहीं था। और पतरस इसी उच्च शिष्यत्व का भार उठाने को था।

लेकिन यह बातों पतरस के मन पर नहीं थी, जब उसने यह सुनी। इसके बजाय, उसने मुड़ कर युहन्ना को देखा। ‘हे प्रभु, क्या इस आदमी के बारे में?’ क्या युहन्ना भी दुःख सहेगा? युहन्ना तो यीशु के इतने करीबी था कि गिरफ्तारी की रात वो यीशु के सीने पर टिका हुआ था।जैसे यीशु चेलों को समझा रहे थे कि उनमे से कोई उसे पकड़वाएगा, पतरस को युहन्ना को पीछे टिकने को बोलना पड़ा ताकि वह प्रभु से पूछ सके कि वो गद्दार कौन है। यदि पतरस को पीड़ा सहने के लिए बुलाया गया था, तो युहन्ना को क्या होने जा रहा था?

यीशु ने कहा, ‘अगर मैं उसे अपने वापस आने तक जीवित चाहता हूँ, तो उससे तुम्हे क्या? तुम्हे मेरे पीछे चलना होगा’। यीशु पतरस को कह रहा था, ‘इससे तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है’! क्योंकि बात यह हैं कि  यीशु फिर वापस आएगा, और अगर परमेश्वर ने यह ठहराया कि युहन्ना इतने लंबे समय तक जीवित रहेगा, वो सर्वशक्तिमान ईश्वर का वो सही निर्णय होगा।

अब, क्योंकि यीशु ने यह कहा, अफवाहें फैलने लगी। लोग यह कहने लगे कि युहन्ना कभी नहीं मरेगा। लेकिन यीशु ने यह नहीं कहा था। वह पतरस को यह बता रहा था कि परमेश्वर के चुने हुओं का जीवन और मौत उस पर निर्भर है। पतरस को अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा करना था, न की परमेश्वर की योजना किसी और के जीवन से मापना!

एक दिन पतरस को येशु की तरह क्रूस पर टंगना था। बाइबिल इस बात का विवरण नहीं करती है कि कैसे पतरस ने अपना जीवन यीशु के लिए दे दिया। हम जानते हैं कि यह घटना इस भविष्वाणी के तीन दशकों के बाद हुई, और हम यह जानते हैं कि उसने रोम में एक क्रूस पर यीशु के लिए अपनी जान दे दी। युहन्ना के सुसमाचार लिखने के बाद ही यह घटना घट चुकी थी। जो भी शर्म और खेद पतरस ने अपने प्रभु का इनकार करके महसूस किया, उसके प्रभु सेवा और विनम्रता के जीवन से अभिभूत था।

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कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

कहानी १६५: महायाजक के लिए एक अँधेरी रात 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

roman soldier and prisoner

यीशु को अन्नास के घर से कैफा के घर ले जाया गया। पतरस अभी तक पीछे पीछे आ रहा था। जैसे ही यीशु को महासभा के उन सदस्यों के समक्ष लाया जा रहा था जो इतनी रात वहां आए, पतरस आँगन में चला गया। वह अधिकारियों के साथ, आग के पास, बैठ गया ताकि उसे परिणाम पता चले, और उसे अपने प्रभु के साथ खड़ा होने के लिए अवसर मिले।

जब यीशु को लाया गया, तो महासभा ने एक के बाद एक गवाह खड़े किये जो उसके विरुद्ध साक्षी दे। उनकी कहानियाँ झूठी थी, और उनके शब्द एक दूसरे के साथ सहमत नहीं थे। वे इतने असंगत थे कि उन्होंने एक के बाद एक रद्द कर दिया गया। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, एक व्यक्ति दोषी तब पाया जाता जब दो गवाह एक ही आरोप के साथ सामने आए। यह नहीं हो रहा था, तो वे और अधिक गवाह लाए। किसी की गवाही यीशु को मौत की सज़ा सुनाने के लायक नहीं थी, और इस्राएल के शासक इससे कम कुछ नहीं चाहते थे। यीशु को मरना था। अंत में, एक गवाह आगे आया और यह दोष लगाया कि यीशु ने यह घोषणा की थी कि वह परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा। प्रभु ने कहा था कि वह तीन दिनों में मानव हाथ के बिना इसका पुनर्निर्माण करेंगे। हम जानते है कि यीशु अपने शरीर के बारे में बात कर रहे थे। वह नष्ट होने जा रही थी क्यूंकि यीशु ने अपने को परमेश्वर के हाथों सुपुर्ट किया। लेकिन यीशु को तीन दिन में पूर्णतः, जीवते प्रभु के हाथों जिला लिया जाएगा! यीशु के खिलाफ उनकी झूठी गवाही के द्वेष में, उन्होंने उसी रात इस सच्चाई की घोषणा की थी, लेकिन उनकी आँखे देखते हुए भी बहुत अंधी थी!

सच्चाई में, इन आरोपों का वास्तव में कोई मायना नहीं था।यह शासक उसे मारने के लिए उत्सुक थे, और अगर इस आरोप से उनकी बात नहीं बनी, तो वे एक और की खोज करते। तो यीशु ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। उसके आसपास के वातावरण के चेहरे में उनकी शांत, आश्वस्त संकल्प की कल्पना कीजिये।

महायाजक व्यथित था। वह उठ खड़ा हुआ और यीशु के पास गया। “‘क्या तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं हैं? यह क्या है जो यह लोग तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहे है? ”

यीशु चुप रहे। महायाजक ने खिज में आकर कहा: “‘मैं तुम्हें जीवते परमेश्वर से शपथ खा कर पूछता हूँ कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम मसीह, परमेश्वर के पुत्र हो?'”एक बार फिर, यीशु के दुश्मनो ने उसके बारे में सच की घोषणा की –  ठीक उसी कार्यवाही में जिसमे उसे दोषित किया जा रहा था। इस बार, यीशु ने जवाब दिया:

“” आप खुद ही कह चुके हैं, फिर भी, मैं आपको बताता हूँ; इसके बाद आप मनुष्य के पुत्र को शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठे देखेंगे, और आकाश के बादलों पर आते हुए देखेंगे।”

वाह! यीशु ने यह घोषित कर दिया कि वो न केवल मसीहा था। वह मनुष्य का पुत्र भी था! यह शब्द पुराने नियम से था। इसका मतलब यह था कि वह शक्ति और महिमा में दिव्य होने का दावा कर रहे थे! वो परमेश्वर के साथ एक होने का दावा कर रहे थे!

जब महायाजक ने यह सुना, तो वह जान गया कि उसके पास वो था जो वह चाहता था। उसने अपने हाथों से अपने याजकी पहनावे को पकड़ा और उसे फाड़ा। यह उसके चरम अपकार और यीशु के हर शब्द की पूर्ण निंदा की घोषणा थी। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से जो अपने महायाजकों के लिए वस्त्र ठहराया था, उसे कभी फाड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा, जिसके लिए उसे थोड़ा सम्मान भी नहीं था, उसकी परेशानी का कारण नहीं थी।

लेकिन सच में, अब किस बात का मायना था? व्यवस्था जिस पवित्रता को  इन पापी याजकों के द्वारा पूरा नहीं कर सका, वो अब यीशु में पूरी तरह से सफल होने जा रही थी। अपने विद्रोह में, कैफा ने परमेश्वर का यंत्र बनके, कानून का अंत, मंदिर में आराधना, और उस वाचा को परिपूर्ण किया जो इस आदमी को सशक्त कर रही थी। अपने जीवन पर पकड़ रखने के लोभी रोष में, वह उसे खो रहा था।

“‘इसने परमेश्वर के विरुद्ध बोला है!'”उसने पागलों की तरह घोषणा की। “‘हमें आगे गवाहों की क्या ज़रूरत है? देखो, तुमने इसके शब्द सुने है; तुम क्या सोचते हो? ‘”महासभा के बाकी लोग बोल पड़े: “‘ वह मौत के योग्य है!”

फिर अपने शातिर गुस्से में, उन्होंने अपनी मुट्ठी से उसे पीटा, उसके चेहरे पर थूका, और थप्पड़ मार कर उसे अपमानित किया। और जब यह सब हो रहा था, प्रभु अपने सम्मानजनक ताकत में वहां खड़े रहे  – उस प्याले को सहन करते हुए जो उसके पिता ने उसे दिया था।

इस दयनीय अन्याय के बीच में, पतरस आग के पास अपने हाथ, आंगन में सेक रहा था। कैफा की एक नौकरानी ने उसके पास जाकर उसके चेहरे को बारीकी से देखा। “‘क्या तुम भी यीशु गलीली के साथ थे?'” और सब के सामने उसने घोषणा की: “मैं नहीं जानता तुम किस बारे में बात कर रही हो। ‘” फिर वह उठकर  प्रवेश द्वार से बरामदे पर चला गया। क्या वह बच निकलने का रास्ता तलाश रहा था? हालात उसके स्वामी के लिए अच्छा नहीं लग रहे थे। एक और नौकरानी पतरस के पास आई और उससे कहने लगी: “‘तुम भी उनमें से एक हो!’

पतरस ने कहा: “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता!’ उस दबाव की कल्पना कीजिये जो उसने महसूस किया होगा।

एक और घंटा बीत गया, और मसीह की कार्यवाही बदतर होती जा रही थी।  इन भयानक पुरुषों के जब उसके प्रभु को ठूस ठूस कर पीता होगा, तो पतरस का दिल कितना टूटा होगा। वह क्या कर सकता था? वह इसका हल निकालने के लिए क्या कर सकता था? वह अब अपनी वफादारी को कैसे दिखा सकता था? हजारों विचार उसके दिमाग में चले होंगे, लेकिन मानो उसे लकुआ मार गया हो। दासों में से एक ने पतरस को देखा और कहा: “‘निश्चित रूप से आप भी उनमें से एक हैं क्यूंकि आप एक गलीली है।” यह दास यीशु की गिरफ्तारी के लिए बगीचे में मौजूद था। जिसका कान पतरस ने काटा था, यह उसका चचेरा भाई था, और उसे यकीन था कि यह इसी आदमी ने किया था!

पतरस कसम और श्राप के शब्द, झूठे गुस्से के साथ बोलने लगा – ठीक उसी प्रकार जब किसी को एक झूठ में पकड़ा जाता है। “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम बात कर रहे हो!'” तुरंत, एक मुर्गा ने बांग दिया। प्रभु ने भी इसे अच्छी तरह से सुना, और अपने अराजक कार्यवाही के बीच में पतरस की ओर देखा। पतरस को यीशु की बात याद आई जो उन्होंने बस कुछ घंटे पहले ही ऊपरी कक्ष में बोली थी। “‘मुर्गा कौवे से पहले, तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” सबसे खराब विफलता सच हो गई थी। पतरस उठकर बाहर चला गया और फूट फूट कर रोने लगा।

धार्मिक शासक अपने रोष में आगे बड़ते गए। किसी ने यीशु  के आंखों के चारों ओर एक पट्टी बाँधी। तब उन्होंने प्रभु को पीटा और उसे थप्पड़ मारा, और कहा:  “‘भविष्यवाणी कर, तू तो मसीह है, तो बता किसने तुझे मारा?'”

उनके असीम नफरत और शातिर दुष्टता पर ख़ुशी की कल्पना कीजिये। आखिरकार, उनके पास इस लोकप्रिय युवा शिक्षक के प्रति सालों के असंतोष और नफरत व्यक्त करने की शक्ति मिली – और वे अपनी घृणा में इतने एकजुट थे कि किसी को यह काम में शर्म नहीं आई। और जैसे वो उस परमेश्वर की निंदा कर रहे थे जिस पर वो परमेश्वर की निंदा का दोष लगा रहे थे – परमेश्वर वहां शांत बल में खड़े रहे, अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए और उस प्याले को पूर्णता से पीते हुए।

कहानी १६४: अन्नास के घर में प्रभु 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

Accusation of Jesus on Good Friday

रात की शांति में, उसके चेलों थके हुए नींद में गिर गए। यीशु प्रार्थना में अपने पिता के पास चले गए। तीन बार उन्होंने वह बोझ हटा देने को माँगा। क्या पिता इस काम को हटा सकते थे? क्या यीशु किसी तरह आने वाली पीड़ा को आने से रोक सकते थे? क्या उन्हें परमेश्वर का वह प्रकोप का प्याला पीना ही पड़ा था? क्या यह सुचमुच मनुष्य के उद्धार एक ही रास्ता था? कल्पना कीजिये पिता के अस्सेम प्यार की जब उन्होंने मानव जाति के उद्धार को अपने बेटे से आगे रखा और कहा: “तुम एक ही रास्ता हो।” पुत्र की दिल से, परिपूर्ण प्रेम और समर्पण की कल्पना कीजिये जब उसने अपने ऊपर उस दंड को ले लिया जो हम सब को लेना था।

महायाजक और सिपाही जब यीशु को गिरफ्तार करने के लिए आए, लड़ाई पहले ही जीती हुई थी। परमेश्वर के पुत्र ने पहले से ही अपने आप को दीन किया और परमेश्वर के सामने अपने आप को शून्य किया। उनको पूरी तरह से दूसरी तरफ महिमा का आश्वासन था, और वो इस अंधेरे में पिता की सेवा करेंगे। परमेश्वर उन्हें सर्वोच्च स्थान पर, स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान करेंगे। यीशु का नाम हर नाम से ऊपर होगा, और स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हर घुटना उसके सामने झुकेगा, और हर एक जीभ इस बात का अंगीकार करेगी कि यीशु मसीह हर बात पर प्रभु है। और पुत्र को दिया यह भव्य सम्मान उनके महान प्रेम के पिता को सम्मान और गौरव देगा।

जब यीशु ने क्रूस का सामना किया, उन्हें पता था की यह सब बाते दूसरी ओर है। उसे गिरफ्तार करने जो पुरुष बगीचे में आए थे, वे इस गलत सोच में थे कि वह आने वाली घटनाओं को साकार करना उनकी शक्ति में था। यीशु ने जब अपने को उन विषैली हमलों और शारीरिक शोषण के पीड़ा में खुद को सौप दिया, वह सभी पर प्रभु बने रहे।

शमौन पतरस और शिष्य अपने विश्वास में बढ़ रहे थे, लेकिन उनके पास उस पल की घटनाओं से परे देखने की दृष्टि नहीं थी। जब शमौन पतरस तलवार के साथ आगे बड़ा, उसने एक पल के लिए हिंसा की भयावहता को आमंत्रित किया, जो एक समर्पण का पल था। यीशु ने संघर्ष के अंत की आज्ञा दी और उस आदमी के कान को चंगाई दी जिस पर पतरस ने हमला किया।

फिर वह गिरफ्तार करने वाले आदमियों के ओर मुड़े और बोले: ‘क्या तुम मुझे गिरफ्तार करने के लिए तलवार और लाठियों के साथ आए हो, जैसे कि मै कोई चोर उचक्का हूँ? हर दिन मैं मंदिर में शिक्षण देते तुम्हारे साथ था, और तुमने मुझे गिरफ्तार नहीं किया; लेकिन यह इसलिए हुआ है ताकि इंजील पूरी हो सके। इस समय और अंधेरे की शक्ति तुम्हारी हैं।”

जब चेलों ने यीशु को सुना और देखा कि वह आत्मसमर्पण कर रहे है, वे घबरा कर भाग गए। कल्पना कीजिये कि धार्मिक शासकों ने कैसे उसका ठठ्ठा उड़ाया होगा जब सैनिकों ने यीशु के हाथों और पैरों पर बेड़ी डाली होगी। जब वे उसे ले जा रहे थे, तो एक जवान आदमी उसके पीछे आया था। उसने एक चादर को छोड़कर कोई कपड़े नहीं पहने थे। जब सैनिकों ने देखा कि वो यीशु का एक दोस्त था, उन्होंने उसे गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन वह चादर पीछे छोड़कर भाग गया। वह उस ठंडी रात में नग्न चला गया – अपने प्रभु के हाल देख कर तहस – नहस।

भीड़ अंधेरे में अन्नास के घर की ओर बड़ी, जो इस्राएल पर एक पूर्व महायाजक था। वो कैफा का ससुर था – कैफा एक महायाजक था। वो कैफा ही था जिसने यह घोषणा की कि देश को बचाने के लिए, मसीह के लिए मरना बेहतर था। अगर रोमी यीशु के बढ़ाए हुए उत्तेजना से थक जाते, तो वे अपनी स्वतंत्रता के सभी पहलों पर रोक टोक लगाते। यह, ज़ाहिर है, हास्यास्पद था। रोमियों ने न तो मसीह की यात्राओं न उनके सन्देश पर कोई चिंता दिखाई थी। लेकिन यह एक अच्छा बहाना था। इस महायाजक को क्या पता कि उसकी विषैली घोषणा वास्तव में परमेश्वर से एक भविष्यवाणी थी।

कैफा का मसीह के प्रति द्वेष का असली कारण ज्यादा निजी था। वह ईर्षापूर्ण था। वह एक लम्बे समय से प्रतिष्ठा और प्रभाव के एक परिवार से आता था। उन्हें सत्ता चलाने और देश की दिशा को नियंत्रित करने की आदत थी। यह युवा उपदेशक उनके इस कार्यवाली में एक खतरा था – और इसे रस्ते से हटाना था। अब उसे और राष्ट्र की घाटियों और दरारें में आसपास चुपके, अज्ञानी भीड़ में घुलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उसे आखिरकार उन लोगों का सामना करना था जिसके नेतृत्व की अवहेलना उसने अपने शर्तों पर करने की हिम्मत की थी। कितनी दुष्टतापूर्वक कैफा और उसके साथी शासकों ने उनको अपमानित करने के चस्के का स्वाद लिया होगा।

शमौन पतरस अपने प्रारंभिक आतंक से बाहर निकल गया था। उसने भीड़ का पीछा किया ताकि वो आने वाली घटनाओं के खुलासे पर नजर रखे। यूहन्ना भी साथ आया था। वो अन्नास के घर में जाना जाता था, तो जब  यीशु को पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा था, उसे रियासत पर आने की अनुमति दी गई थी। पतरस को बाहर इंतजार करना पड़ा, लेकिन यूहन्ना को  उसके लिए द्वारपाल के पास जाना पड़ा। जब पतरस उसके लिए बाहर इंतजार कर रहा था, वहीं दरवाजे पर काम करने वाली एक छोटी गुलाम लड़की उसके पास आई और कहने लगी, “‘क्या आप भी इस आदमी के शिष्यों में से एक नहीं हैं, हैना?” क्षण भर की प्रतिक्रिया में पतरस ने कहा:  “मैं नहीं हूँ। ‘”उसने सोचने से पहले ही, पहली बार अपने प्रभु का इनकार किया था।

यूहन्ना पतरस को दरवाज़े के अंदर ले जा पाया, तो पतरस आंगन में चला गया और दास और सैनिकों के साथ खुद को गर्म करने के लिए कोयले की  आग के पास खड़ा हो गया।

इस बीच, अन्नास ने यीशु से उसके चेलों और उसके सिखाए संदेशों के बारे में पूछताछ करने की कोशिश की। यीशु ने उसे वापस देखा और तथ्य प्रदान किये:  मैंने हमेशा खुल कर स्पष्टता से बोला है, मैंने सभाओं में पढ़ाया है, और मंदिर में, जहाँ सभी यहूदी एकत्रित होते हैं, और मैंने कुछ गुप्त में नहीं बोला है। आप मुझसे सवाल क्यूँ करते हैं? उनसे सवाल करिए जिन्होंने वो सुना जो मैंने  कहा। उन्हें पता है जो मैंने कहा।”

इस पर एक अधिकारी ने यीशु को मारा और भोहे चडाकर कहा: “‘क्या तुम इस तरह से महायाजक को जवाब देते हो?”

यीशु ने साहसपूर्वक उत्तर दिया: ‘अगर मैंने गलत तरीके से बात की है, तो गलत की गवाही मानो; पर अगर सही, तो तुम मुझ पर क्यूँ हाथ उठाते हो? यीशु ने पुराने नियम के शब्दों से जवाब दिया। निर्गमन २२:२८ में, परमेश्वर इस्राएल के देश को बताते है कि आत्मरक्षा में सच्चाई बोलना धार्मिकता है। जाहिर है, अधिकारी परमेश्वर के वचन के धर्मी आदेशों का सम्मान करने से ज्यादा, महायाजक की सुरक्षा के बारे में चिंतित था।

यीशु नैतिक अधिकार के उत्तम बल के साथ अन्नास के सामने खड़े था। अन्नास को कहने के लिए कुछ भी नहीं था। शायद वह थोड़ा परेशान हो गया था। यह स्पष्ट था कि उसके पास यीशु को भयभीत करने के लिए कोई क्षमता थी। उसने उसे वहां से जाने दिया और अपने दामाद के यहाँ भेजा जहाँ महासभा और इसराइल की सर्वोच्च अदालत से लोग पहले से ही एकत्र हुए थे। यह सब समय से पहले साजिश रची गई थी। रात के गहरे अंधेरे में, वे अपने मंदिर की अदालतों में इस तरह के क्रुद्ध करनेवाला संदेशों को उपदेश देने वाले जन की पूछताछ और निंदा की अध्यक्षता करने के लिए आए थे।

कहानी १६२: गतसमनी का बगीचा-समर्पण की पीड़ा

मत्ती २६ ३०-४६, मरकुस १४:२६-४२, लूका २२:३९-४६, यूहन्ना १८:१

Basilica Our Lady of the Rosary

जब यीशु और उसके चेले फसह मना रहे थे, उसने उन्हें परमेश्वर कि योजना के रहस्य को  उनके आगे स्पष्ट रूप से दिखाया। अभी और भी प्रकाशन आने हैं। ऊपरी कमरे में मिले उपदेशों के बाद, यीशु ने पिता से अपने लिए, अपने चेलों के लिए और उन सभी के लिए जो उस पर विश्वास करेंगे। वे सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रेम और एकता में बंधे हुए थे। उस धन्य रात को यीशु ने जो कुछ अपने चेलों को सिखाया था उसे समझने के लिए उन्हें पूरा जीवन लग जाएगा। परन्तु अब समय था कि उस पर अमल करें। यीशु के आगे अभी एक अंतिम विजय थी और उसे पूरा करने के लिए उसने आगे कदम बढ़ा लिया था।

फसह के बाद उसके चेलों के साथ उसने एक अंतिम भजन गाया। फिर वे जैतून के पहाड़ पर चले गए। चेलों को नहीं पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। जब वे जा रहे थे यीशु उन्हें सावधान कर रहा था। उसने जकर्याह नबी (१३:७) से कहा:
“’तलवार, गड़ेरिये पर चाट कर! मेरे मित्र को मार! गड़ेरिये पर प्रहार करो और भेड़ें भाग खड़ी होंगी और मैं उन छोटों को दण्ड दूँगा। पर फिर से जी उठने के बाद मैं तुमसे पहले ही गलील चला जाऊँगा।’”

आपने देखा कि यीशु को कितना आत्मविश्वास था? इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह फिर से जी उठेगा, और वह चेलों को आने वाली बातों के लिए तैयार कर रहा था। परन्तु पतरस को केवल यही सुनाई दे रहा था कि यीशु अपने परमेश्वर को छोड़ देगा। उसने कहा,“चाहे सब तुझ में से विश्वास खो दें किन्तु मैं कभी नहीं खोऊँगा।”  मत्ती २६:३३

पतरस को अपने आत्मविश्वास पर पूरा भरोसा था जब कि परमेश्वर के पुत्र ने उसे और कुछ बताया था!  यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ में सत्य कहता हूँ आज इसी रात मुर्गे के बाँग देने से पहले तू तीन बार मुझे नकार चुकेगा।” यीशु समझ गया था कि इस मनुष्य के भीतर में क्या है। वह अपने चेले कि कमज़ोरी को समझ गया था। उसने अपने अनुग्रह के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था। उसकी एक ही चिंता थी कि वह उन्हें चेतावनी दे। आने वाले दिन दहशत भरे थे, परन्तु इन सब के बीच, वे यह याद कर पाएंगे की यीशु यह सब बातें पहले से जानता था। यदि वे विश्वास को चुनते हैं, तो वे यह समझ पाएंगे कि सब कुछ परमेश्वर कि योजना के अनुसार हो रहा था।

तब पतरस ने उससे कहा,“यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े तो भी तुझे मैं कभी नहीं नकारूँगा।” बाकी सब शिष्यों ने भी वही कहा।

फिर यीशु उनके साथ उस स्थान पर आया जो गतसमने कहलाता था। और उसने अपने शिष्यों से कहा,“जब तक मैं वहाँ जाऊँ और प्रार्थना करूँ, तुम यहीं बैठो।” फिर यीशु पतरस और जब्दी के दो बेटों को अपने साथ ले गया। फिर उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत दुःखी है, जैसे मेरे प्राण निकल जायेंगे। तुम मेरे साथ यहीं ठहरो और सावधान रहो।” परमेश्वर का पुत्र होने के नाते उसे अपने पिता कि योजना पर पूरा भरोसा था। परन्तु एक मनुष्य होते हुए उसे अपने दोस्तों कि आवश्यकता थी।

फिर थोड़ा आगे बढ़ने के बाद वह धरती पर झुक कर प्रार्थना करने लगा। उसने कहा,“हे मेरे परम पिता यदि हो सके तो यातना का यह प्याला मुझसे टल जाये। फिर भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं बल्कि जैसा तू चाहता है वैसा ही कर।”

स्वर्ग से एक दूत आया और उसने यीशु को सामर्थ दी। यीशु ने, परमेश्वर का क्रोध जो इंसान के पापों के कारण था, अकेला ही सहा। हमारे पापों को क्रूस तक ले जाने के लिए, उसने परमेश्वर कि सामर्थ का सहारा नहीं लिया। उसने परमेश्वर पिता के आगे पूरी आज्ञता में उसे पूरा किया। यह वो आज्ञाकारिता थी जो कोई भी इंसान नहीं कर सकता था। वे अपने पापों के बोझ के नीचे दब जाते। वह जो योग्य था और पूर्ण रूप से पवित्र था, केवल वही पाप और मृत्यु पर जय पा सकता था। उसके महान प्रेम के कारण, वह ऐसा करने में सक्षम था।

यीशु इतना ज़यादा तनाव में था कि उसका शरीर भी उसे सहन नहीं कर पाया। जब वह उस पीड़ा में प्रार्थना कर रहा था, उसका पसीना लहू कि बूँदें बनकर बह रहा था। जब वह अपने पिता से प्रार्थना कर रहा था वे धरती पर गिर रहे थे।

फिर वह अपने शिष्यों के पास गया और उन्हें सोता पाया। वह पतरस से बोला,“सो तुम लोग मेरे साथ एक घड़ी भी नहीं जाग सके? जगते रहो और प्रार्थना करो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो। तुम्हारा मन तो वही करना चाहता है जो उचित है किन्तु, तुम्हारा शरीर दुर्बल है।”

अपने दुःख के बीच में, यीशु ने कितने विनम्रता और समझ के साथ अपने चेलों पर दया दिखाई। एक बार फिर उसने जाकर प्रार्थना की और कहा,“हे मेरे परम पिता, यदि यातना का यह प्याला मेरे पिये बिना टल नहीं सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।” परन्तु परमेश्वर के क्रोध के प्याले को केवल यीशु ही अपने बलिदान के द्वारा संतुष्ट कर सकता था। तब वह आया और उन्हें फिर सोते पाया। वे अपनी आँखें खोले नहीं रख सके। वे नहीं जानते थे कि वे यीशु को अपनी दूसरी असफलता के लिए क्या बोलें।

सो वह उन्हें छोड़कर फिर गया और तीसरी बार भी पहले की तरह उन ही शब्दों में प्रार्थना की। परन्तु और कोई रास्ता नहीं था। इस श्राप कि समस्या का समाधान केवल उसका प्राण था। यदि वह अपने जीवन को बलिदान नहीं करता, तो और कोई भी नहीं कर पाता। सब कुछ नाश हो जाता। केवल वही सबको बंधन से छुड़ा सकता था। और इसलिए उसने अपने पिता कि इच्छा को स्वीकार किया।

हमारे लिए यह समझ बहुत कठिन है कि यीशु ने “हाँ” किसके लिए बोला होगा। उसका शरीर ऐसी कष्टदायी पीड़ा से गुज़रेगा जो कभी किसी मनुष्य ने ना सहा होगा। वह पाप और म्रत्यु के बोझ को उठाएगा क्यूंकि उसने परमेश्वर के क्रोध को अपने ऊपर ले लिया था। उस कष्टदायी पीड़ा को यीशु क्रूस पर तब चढ़ाए रखेगा जब तक वह उसकी पूरी कीमत नहीं। जो हमारे ऊपर अनतकाल तक के लिए आता यीशु ने एक ही दिन में समाप्त कर दिया। हम युगानुयुग तक उसकी उपासना करते रहेंगे उस कीमत के लिए जो उसने हमारे लिए चुकाई है।

कहानी १६१: परमेश्वर के पुत्र की प्रार्थनाएं 

यूहन्ना १७

Vienna -  Holy Trinity in Altlerchenfelder church

अपने चेलों के साथ उस अंतिम रात्री में, यीशु ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया था। जिस राज्य कि घोषणा वे करने जा रहे थे, वह उनकी कल्पना से बाहर था, परन्तु वे बहुत महान और अद्भुद था। आने वाले दिनों को देखते हुए यीशु अपनी आँखें स्वर्गीय पिता कि ओर उठाकर प्रार्थना की। आइये सुनते हैं कि कैसे परमेश्वर का पुत्र अपने पिता से बात करता है:

“’हे परम पिता, वह घड़ी आ पहुँची है अपने पुत्र को महिमा प्रदान कर ताकि तेरा पुत्र तेरी महिमा कर सके। तूने उसे समूची मनुष्य जाति पर अधिकार दिया है कि वह, हर उसको, जिसको तूने उसे दिया है, अनन्त जीवन दे। अनन्त जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें। जो काम तूने मुझे सौंपे थे, उन्हें पूरा करके जगत में मैंने तुझे महिमावान किया है। इसलिये अब तू अपने साथ मुझे भी महिमावान कर। हे परम पिता! वही महिमा मुझे दे जो जगत से पहले, तेरे साथ मुझे प्राप्त थी।'”  यूहन्ना १७:१-५

क्या आपको समझ आया? पिता और पुत्र इस तरह कार्य कर रहे थे जिससे कि वे एक दूसरे कि महिमा कर सकें। अब मनुष्य ऐसा करता है, तो यह हास्यास्पद होता। एक दुसरे को हम अच्छे शब्दों के साथ उत्तेजित कर सकते हैं, पर क्यूंकि हम सब पापी हैं इसलिए हम एक हद्द तक ही बोल सकते हैं। हम किसी कि सच में महिमा नहीं कर सकते यदि वे उसके योग्य नहीं हैं। परन्तु परमेश्वर इसके योग्य है, और उसका पुत्र भी। उनके लिए केवल एक ही सही बात यह है कि वे भव्यतापूर्वक महिमा दें। हमारे लिए सबसे उत्तम बात यह है कि हम उनके आगे गिरकर दंडवत करें। इसीलिए यीशु को इंकार करना सबसे भयंकर पाप है। यह पूर्ण रूप से गलत है। परमेश्वर का पुत्र और पिता सत्य हैं और वे एक दूसरे कि महिमा करते हैं।

यीशु जानता था कि जो काम उसके पिता ने उसे सौंपा था वह उसने इस पृथ्वी पर पूरा किया। अब केवल क्रूस ही बचा था। और इसलिए उसने प्रार्थना की कि उसके मृत्यु के पश्चात्, पिता उसकी महिमा को जो उसकी उसके पिता के साथ थी वह उसे वापस मिल जाये।

फिर उसने कहा:
“’जगत से जिन मनुष्यों को तूने मुझे दिया, मैंने उन्हें तेरे नाम का बोध कराया है। वे लोग तेरे थे किन्तु तूने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन का पालन किया। अब वे जानते हैं कि हर वह वस्तु जो तूने मुझे दी है, वह तुझ ही से आती है। मैंने उन्हें वे ही उपदेश दिये हैं जो तूने मुझे दिये थे और उन्होंने उनको ग्रहण किया। वे निश्चयपूर्वक जानते हैं कि मैं तुझसे ही आया हूँ। और उन्हें विश्वास हो गया है कि तूने मुझे भेजा है।'” यूहन्ना १७:६-८

आपने देखा कि विश्वास यीशु के लिए कितना महवपूर्ण है? सब कुछ उसी पर निर्भर करता है! यीशु कि प्रार्थना को सुनिये:
“‘मैं उनके लिये प्रार्थना कर रहा हूँ। मैं जगत के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिए कर रहा हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। वह सब कुछ जो मेरा है, वह तेरा है और जो तेरा है, वह मेरा है। और मैंने उनके द्वारा महिमा पायी है। मैं अब और अधिक समय जगत में नहीं हूँ किन्तु वे जगत में है अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। हे पवित्र पिता अपने उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा कर जो तूने मुझे दिया है ताकि जैसे तू और मैं एक हैं, वे भी एक हो सकें। जब मैं उनके साथ था, मैंने तेरे उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा की, जो तूने मुझे दिया था। मैंने रक्षा की और उनमें से कोई भी नष्ट नहीं हुआ सिवाय उसके जो विनाश का पुत्र था ताकि शास्त्र का कहना सच हो।'” यूहन्ना १७:९-१२

“’अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ किन्तु ये बातें मैं जगत में रहते हुए कह रहा हूँ ताकि वे अपने हृदयों में मेरे पूर्ण आनन्द को पा सकें। मैंने तेरा वचन उन्हें दिया है पर संसार ने उनसे घृणा की क्योंकि वे सांसारिक नहीं हैं। वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ।
“’मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ कि तू उन्हें संसार से निकाल ले बल्कि यह कि तू उनकी दुष्ट शैतान से रक्षा कर। वे संसार के नहीं हैं, वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ। सत्य के द्वारा तू उन्हें अपनी सेवा के लिये समर्पित कर। तेरा वचन सत्य है। जैसे तूने मुझे इस जगत में भेजा है, वैसे ही मैंने उन्हें जगत में भेजा है। मैं उनके लिए अपने को तेरी सेवा में अर्पित कर रहा हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा स्वयं को तेरी सेवा में अर्पित करें।   यूहन्ना १७:१३-१९

“’किन्तु मैं केवल उन ही के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिये भी जो इनके उपदेशों द्वारा मुझ में विश्वास करेंगे। वे सब एक हों। वैसे ही जैसे हे परम पिता तू मुझ में है और मैं तुझ में। वे भी हममें एक हों। ताकि जगत विश्वास करे कि मुझे तूने भेजा है। वह महिमा जो तूने मुझे दी है, मैंने उन्हें दी है; ताकि वे भी वैसे ही एक हो सकें जैसे हम एक हों। मैं उनमें होऊँगा और तू मुझमें होगा, जिससे वे पूर्ण एकता को प्राप्त हों और जगत जान जाये कि मुझे तूने भेजा है और तूने उन्हें भी वैसे ही प्रेम किया है जैसे तू मुझे प्रेम करता है।'”  यूहन्ना १७:२०-२३

अब यीशु हमारे लिए प्रार्थना कर रहा था!

“’हे परम पिता। जो लोग तूने मुझे सौंपे हैं, मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ, वे भी मेरे साथ हों ताकि वे मेरी उस महिमा को देख सकें जो तूने मुझे दी है। क्योंकि सृष्टि की रचना से भी पहले तूने मुझसे प्रेम किया है।'” यूहन्ना १७:२५-२६

कहानी १५९: त्रिएकता के प्रेम में 

यूहन्ना १५

Jerusalem - Jesus and God the Father mosaic.

यीशु जब ऊपरी कक्ष में अपने चेलों के साथ बैठे थे, वह क्रूस पर जाने से पहले उन्हें अपना अंतिम सन्देश दे।  बार बार  वह उन्हें यीशु और पिता के बीच उस बंधन के विषय में सिखाता था जो पवित्रके द्वारा होता है। यह जानना इतना महत्वपूर्ण था की वह उन्हें बार बार समझाता था। इस बार, वह यह  कल्पना करता था कि वह दाखलता है और उसके चेले उसकी टहनियाँ।

उसने कहा:
“’सच्ची दाखलता मैं हूँ। और मेरा परम पिता देख-रेख करने वाला माली है। मेरी हर उस शाखा को जिस पर फल नहीं लगता, वह काट देता है। और हर उस शाखा को जो फलती है, वह छाँटता है ताकि उस पर और अधिक फल लगें। तुम लोग तो जो उपदेश मैंने तुम्हें दिया है, उसके कारण पहले ही शुद्ध हो। तुम मुझमें रहो और मैं तुममें रहूँगा। वैसे ही जैसे कोई शाखा जब तक दाखलता में बनी नहीं रहती, तब तक अपने आप फल नहीं सकती वैसे ही तुम भी तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक मुझमें नहीं रहते।'” यूहन्ना १५:१८-२५

जब यीशु अपने  पिता के पास वापस जा रहा था, वह जनता था कि वह अपने चेलों को एक ऐसी परिस्थिति में छोड़ कर जा रहा है जिसके साथ उन्हें रहना पड़ेगा। चेलों के साथ भी व्यवहार हो सकता है जो यीशु के साथ वे लोग क्रूस पर चढ़ाएंगे।

धार्मिक अगुवे और वे जो उनके चलते थे अपने पाप के कारण शर्मिंदा थे जो उन्होंने किये। उन्हें चमत्कारों को देखने के बहुत से मौके मिले। वे पुराने नियम को जानते थे और नबियों को भी समझा। यीशु ने जब परमेश्वर के वचन को परमेश्वर कि दृष्टी से समझाया तो वे उसके द्वारा अपने राह को और गहरायी से समझ सकते थे। इन फरीसियों और महायाजकों को परमेश्वर के देश को चलने का महान सम्मान मिला था परन्तु जब परमेश्वर उनके पास आया तो उन्होंने उसे मार डाला। जब उन्होंने यीशु के वचन के प्रति घृणा दिखाई, उन्होंने यह दिखाया कि वे परमेश्वर पिता से घृणा करते हैं। जब वे परमेश्वर से इतनी घृणा कर सकते थे तो वे यीशु के चेलों से  क्यूँ नहीं नफरत करेंगे जो उसके सुसमाचार को सुनते हैं?

यीशु के पीछे चलने वाले वही घृणा भरे विरोध का सामना करेंगे जो उनके अपने वंश के हैं। यीशु ज्योति के राज्य को  अन्धकार के राज्य में लेकर आ रहा था, और वे जो परमेश्वर के विरोधी से नफरत करेंगे वे हमेशा उसके कार्य के लिए उससे विरोध करते रहेंगे।

कहानी १५८: पिता और आत्मा

Spiritual Doves and Salvation Cross / Art symbolic of the salvation of Jesus Christ. Use as background or feature illustration.

यूहन्ना १४

एक बार यीशु ने अपने चेलों के साथ प्रभु-भोज,  वह उनके साथ आने वाले दिनों कि भेद कि बातों को बताने लगा। उसे उन्हें अपनी ही मृत्यु  में तैयार करना था। जो वह अब कहने  जा रहा था वह  उसके चेलों  लिए अलविदा था। जिनके साथ उसने पिछले तीन साल व्यतीत किये थे उन्हें बहुत था। फिर भी सच्चाई में, यह केवल एक शुरुआत थी। उसका जीवन उसके चेलों के साथ बहुत ही सामर्थ्य रूप से आने वाला था और वही उन्हें अनंतकाल के लिए लेकर जाएगा। वह उनके साथ अब शारीरिक रूप से नहीं रहेगा परन्तु उसकी आत्मा उनके भीतर में रहेगी। और एक दिन, जब उनकी सेवा इस पृथ्वी पर समाप्त हो जाएगी, वे उसके साथ अनंकाल में रहेंगे। परन्तु वह इन चेलों को अपने मृत्यु के एक रात पहले कैसे बताता? वे उस महिमा को जो दूसरी ओर है उसे कैसे समझ पाते?

यीशु ने कहा:
“’तुम्हारे हृदय दुःखी नहीं होने चाहिये। परमेश्वर में विश्वास रखो और मुझमें भी विश्वास बनाये रखो। मेरे परम पिता के घर में बहुत से कमरे हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं तुमसे कह देता। मैं तुम्हारे लिए स्थान बनाने जा रहा हूँ। और यदि मैं वहाँ जाऊँ और तुम्हारे लिए स्थान तैयार करूँ तो मैं फिर यहाँ आऊँगा और अपने साथ तुम्हें भी वहाँ ले चलूँगा ताकि तुम भी वहीं रहो जहाँ मैं हूँ। और जहाँ मैं जा रहा हूँ तुम वहाँ का रास्ता जानते हो।’”

यीशु स्वर्ग के विषय में बोल रहे थे। वह जानता था कि वह मरने वाला है, परन्तु इससे भी बड़ी बात यह थी कि वह फिर से जीवित होने वाला था। वह स्वर्ग वापस अपने पिता के दाहिने हाथ जाकर बैठने जा रहा था। वे इस बात से पूर्ण रूप से निश्चित हो सकते थे कि भले ही आने वाले दिन त्रासदी से भरे हों, परन्तु वास्तव में, एक महान विजय होने जा रही थी। यीशु पूर्ण रूप से योग्य था, बिल्कुल सक्षम, और पूर्ण रूप से निश्चित था।

सबसे अद्भुद बात यह थी कि यीशु उस  जा रहा था जिससे कि कि पूरी सृष्टि बदल जाएगी, उसने उन बारह चेलों कि ओर देखा और कहा,” यह  लिए कर रहा हूँ। तुम मेरे लिए बहुत मायने रखते हो। तुम उस बचाव विशेष कार्य के मूल्य भाग हो क्यूंकि तुम मेरे लिए मूलयवान हो। जब  और पाप के लिए सोच रहा हूँ, मुझे तुम्हारा ध्यान है। और फिर हम साथ होंगे।” यह शब्द उस महान प्रेम के थे जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी।

परन्तु चेले यह समझ नहीं पाए। थोमा ने उससे कहा,“हे प्रभु, हम नहीं जानते तू कहाँ जा रहा है। फिर वहाँ का रास्ता कैसे जान सकते हैं?”
यीशु ने उससे कहा,“मैं ही मार्ग हूँ, सत्य हूँ और जीवन हूँ। बिना मेरे द्वारा कोई भी परम पिता के पास नहीं आता। यदि तूने मुझे जान लिया होता तो तू परम पिता को भी जानता। अब तू उसे जानता है और उसे देख भी चुका है।”

फिलिप्पुस ने उससे कहा, “हे प्रभु, हमे परम पिता का दर्शन करा दे। हमें संतोष हो ज गा।” फिलिप्पुस निश्चित होना चाहता था। वह  विश्वास करने के लिए और कुछ चाहता था। उसे प्रमाण चाहिए था। परन्तु यीशु तो स्वयं प्रमाण था। फिलिप्पुस ने चमत्कार देखे थे, उसने यीशु के उत्तरों को सुना था जो उसने उन धार्मिक अगुवों को उनके झूठ के लिए दिया था। तीन सालों से उसने यीशु कि सच्चाई को देखा था। फिलिप्पुस अपने विश्वास को लेन के लिए उसकी महिमा को देखना चाहता था। परन्तु सच्चा जीवन अनदेखी बातों पर विश्वास करने से ही आता है। उसे अपने स्वंय के शब्दों पर विश्वास करना था।

यीशु के चेलों के पास परेशन होने कि अच्छी वजह थी। चेले समझ गए थे कि जब यीशु अपने पिता के विषय में बोल रहा था, वह उस परमेश्वर के विषय में बोल रहा था जिसने सृष्टि को बनाया है। यहूदी धर्म में, यह मानना कि एक ही सच्चा परमेश्वर है बहुत ही महत्पूर्ण था। पुराने नियम कि सबसे कीमती पद यह है,”इस्राएल के लोगो, ध्यान से सुनो! यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक है! और तुम्हें यहोवा, अपने परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय, आत्मा और शक्ति से प्रेम करना चाहिए।'” (व्यव विव 6:4-5) वे यह जानते थे कि यीशु ने अपने आप को परमेश्वर का पुत्र कहा था, जिसका मतलब यह है कि वह अपने आप को परमेश्वर के बराबर कर रहा है। परन्तु वह अपने आप को मनुष्य का पुत्र भी कहता है। यह सब कैसे हो सकता है? यह सब भेद कि बातें थीं। यीशु ने अपनी पहचान को ढांप कर रखा हुआ था।

चेले यह मानते थे कि यीशु ही मसीहा है, और वे जानते थे कि वह नबी है, और वे उसे राजा बन कर देखना चाहते थे। ये सब माननीय नाम थे, परन्तु इससे बढ़कर वो सच था जिसे उन्हें समझना था। यीशु ही परमेश्वर था। और यीशु ही परमेश्वर है। परमेश्वर कि त्रीएकता पिता और पुत्र कि उत्तम एकता में ही है। अब समय आ गया था जब यीशु को उसे पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देना था:

“’फिलिप्पुस मैं इतने लम्बे समय से तेरे साथ हूँ और अब भी तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है, उसने परम पिता को देख लिया है। फिर तू कैसे कहता है ‘हमें परम पिता का दर्शन करा दे।’ क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मैं परम पिता में हूँ और परम पिता मुझमें है? वे वचन जो मैं तुम लोगों से कहता हूँ, अपनी ओर से ही नहीं कहता। परम पिता जो मुझमें निवास करता है, अपना काम करता है। जब मैं कहता हूँ कि मैं परम पिता में हूँ और परम पिता मुझमें है तो मेरा विश्वास करो और यदि नहीं तो स्वयं कामों के कारण ही विश्वास करो।'”

पर्दा हट चुका था। यीशु अपने चेलों को परमेश्वर के भीतरी कार्यों के विषय में समझा रहा था। परन्तु इतना काफी नहीं था। यीशु वो मार्ग दिखाने आया था। उसने स्वर्ग छोड़ कर मनुष्य रूप धारण किया ताकि उस रिश्ते को वापस स्थापित कर सके जो उसका परमेश्वर के साथ था। वह परमेश्वर के साथ हुए अलगाव को पलटने के लिए आया था जो पाप के कारण मनुष्य पर आ गया था। उसकी मृत्यु के कारण, उनके पापों कि कीमत चुका कर वह उनके जीवन को परमेश्वर के लिए खरीद लेगा। वो महान अलगाव समाप्त हो गया था। वे जो यीशु पर विश्वास करेंगे वे नयी सृष्टि बन। जाएंगे वे अंधकार कि राज्य से ज्योति के राज्य में लाये जाएंगे। और उसके मनुष्यत्व जीवन उन सब के लिए एक उदहारण था जिनको उसने बचाया था। अब उनके जीवन परमेश्वर के लिए जीए जा सकते थे और वे उस काम को आगे करेंगे जो यीशु ने शुरू किया था।

यीशु ने कहा:
“’मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, जो मुझमें विश्वास करता है, वह भी उन कार्यों को करेगा जिन्हें मैं करता हूँ। वास्तव में वह इन कामों से भी बड़े काम करेगा। क्योंकि मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। और मैं वह सब कुछ करूँगा जो तुम लोग मेरे नाम से माँगोगे जिससे पुत्र के द्वारा परम पिता महिमावान हो। यदि तुम मुझसे मेरे नाम में कुछ माँगोगे तो मैं उसे करूँगा।'” यूहन्ना १४ ९-१४

ये कुछ बहुत ही अद्भुद वायदे हैं।  फिर यीशु ने कहा:
“‘यदि तुम मुझे प्रेम करते हो, तो मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे। मैं परम पिता से विनती करूँगा और वह तुम्हें एक दूसरा सहायक देगा ताकि वह सदा तुम्हारे साथ रह सके। यानी सत्य का आत्मा जिसे जगत ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह उसे न तो देखता है और न ही उसे जानता है। तुम लोग उसे जानते हो क्योंकि वह आज तुम्हारे साथ रहता है और भविष्य में तुम में रहेगा। “मैं तुम्हें अनाथ नहीं छोड़ूँगा। मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ।'”

अब यीशु अपने चेलों को तीसरे रहस्य के विषय में बता रहे थे। यीशु ही पुत्र है, और वही है जो पिता के साथ है। परन्तु इस उत्तम एकता में एक तीसरा व्यक्ति भी है। वह पवित्र आत्मा है, और पिता और पुत्र को मिला कर वे पवित्र त्रिएकता को बनाते हैं। जब यीशु इस संसार को छोड़ने कि तैयारी कर रहे थे, उसका पिता आत्मा को पृथ्वी पर भेजने कि तैयारी कर रहा था। आत्मा उन सब के भीतर आएगा जो उस पर विश्वास करेंगे, ताकि उन्हें पिता कि ओर से वो शक्ति और अगुवाई और तसल्ली मिल सके।

यीशु अपने चेलों को बताना चाहता था कि वे जानें कि वह उन्हें छोड़ कर नहीं जा रहा है। उसके पास योजना थी उन्हें अपने पास परमेश्वर के सिंहासन के पास बैठने की। यीशु और आत्मा एक हैं, और जिस किसी के पास भी आत्मा है वह यीशु में एक है! परन्तु केवल वे जो यीशु पर विश्वास करते हैं उन्हें वह आत्मा दी जाएगी। वह परमेश्वर के बच्चों के लिए एक कीमती खज़ाना है।

यीशु ने कहा:
“‘कुछ ही समय बाद जगत मुझे और नहीं देखेगा किन्तु तुम मुझे देखोगे क्योंकि मैं जीवित हूँ और तुम भी जीवित रहोगे। उस दिन तुम जानोगे कि मैं परम पिता में हूँ, तुम मुझ में हो और मैं तुझमें। वह जो मेरे आदेशों को स्वीकार करता है और उनका पालन करता है, मुझसे प्रेम करता है। जो मुझमें प्रेम रखता है उसे मेरा परम पिता प्रेम करेगा। मैं भी उसे प्रेम करूँगा और अपने आप को उस पर प्रकट करूँगा।’”  –यूहन्ना १४:१५-२२

सोचिये किस प्रकार यीशु के पीछे चलने वाले उसके साथ और त्रिएकता में बंध जाएंगे! क्यूंकि वह जीवित है, इसलिए हम भी जीवित हैं। वह पिता में है और हम उस में, इसलिए हम भी पिता में हैं! यीशु जी, स्वर्ग में उठाया जाने वला था, और फिर युगानुयुग कि विजय में रहने वाला था, और वे जो उसके पीछे चलते हैं और उसके आज्ञाकारी हैं, उसके साथ अनंतकाल में रहेंगे। यह इतनी महान आशा है कि या समझना कितना कठिन है। यह किसी भी मनुष्य कि समझ से परे है!

इसीलिए चेले बहुत व्याकुल थे। उनकी आशा उस पर टिकी हुई थी कि पृथ्वी पर क्या होने जा रहा था। इस्राएल देश से यीशु क्यूँ अपने आप को क्यूँ गुप्त रखा हुआ था? परमेश्वर के राज्य को क्या वह जल्द लाने वाला नहीं था? क्या सब यह जान नहीं जाएंगे? उनमें से एक चेले ने कहा,“हे प्रभु, ऐसा क्यों है कि तू अपने आपको हम पर प्रकट करना चाहता है और जगत पर नहीं?”

यीशु ने कहा,
“’यदि कोई मुझमें प्रेम रखता है तो वह मेरे वचन का पालन करेगा। और उससे मेरा परम पिता प्रेम करेगा। और हम उसके पास आयेंगे और उसके साथ निवास करेंगे। जो मुझमें प्रेम नहीं रखता, वह मेरे उपदेशों पर नहीं चलता। यह उपदेश जिसे तुम सुन रहे हो, मेरा नहीं है, बल्कि उस परम पिता का है जिसने मुझे भेजा है।'”

एक बार फिर, यीशु ने अपने चेलों को सीधा जवाब नहीं दिया। सुनने के बजाय वे उससे गलत सवाल पूछ रहे थे। उनके स्वयं कि आशाएं और अकांक्षाएं उनके कानों को बंद कर रहे थे। वह चाहते कि यीशु उन्हें बताय कि यहूदी नेतृत्व पर कैसे विजय पाया जा सकता है, रोमी राज को कैसे हराया जा सकता है और अपने जीवन भर में स्वर्ग राज्य को कैसे स्थापित किया जा सकता है। वे चाहते कि वह उन्हें उसकी योजना को उनके सामने प्रकट करे, और वे जानना चाहते थे कि स्वर्ग राज्य में उनका क्या पद होगा।

चेलों के पास यह अच्छी वजह थी मानने के लिए कि यीशु येरूशलेम में राजा बनके राज करेगा। उनकी आशा बाइबिल पढ़ने से आई। एक दिन, उनकी सब आशाएं सच्च में बदल जाएंगी, परन्तु उनके समय के हिसाब से नहीं। हम उस समय के लिए रुके हैं जब परमेश्वर यीशु के राज को इस पृथ्वी पर पूरे सामर्थ के साथ लेकर आएगा।

यीशु ने अपने चेलों के गलत सवालों के लिए उनके पास वापस आकर उन्हें इस जीवन कि सच्ची आशा को बताता रहा। यह दुनियावी ताक़त या धन और पद से नहीं मिल सकता था। उनका जीवन केवल उस आत्मिक क्षेत्र में और परमेश्वर कि नज़दीकी में पाया जा सकता था।

यीशु ने कहा:
“’ये बातें मैंने तुमसे तभी कही थीं जब मैं तुम्हारे साथ था। किन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे परम पिता मेरे नाम से भेजेगा, तुम्हें सब कुछ बतायेगा। और जो कुछ मैंने तुमसे कहा है उसे तुम्हें याद दिलायेगा।'”

पवित्र आत्मा हर उसके भीतर भेजा जाएगा जो यीशु पर अपना विश्वास डालेंगे। हर एक विश्वासी जो परमेश्वर का सम्मान करता है उसे पवित्र आत्मा अगुवाई करेगा और तसल्ली और विजय होने के लिए समर्थ भी देगा। परमेश्वर पिता और परमेश्वर का पुत्र आत्मा के द्वारा अपने आप को प्रकट करेंगे। यीशु के चेले होते हुए उस आत्मा का सहयोग दीजिये और उस पर ही निर्भर रहिये।

अंधकार का राज्य इन जीत से खुश नहीं होगा, और परमेश्वर के बच्चों के लिए बहुत सी परीक्षाएं आएंगी। अंत में, यह सब लायक होगा। इस संसार कि चीज़ें उन बातों के सामने बिल्कुल बेकार हैं जो स्वर्ग में हमें मिलेंगी। परन्तु यीशु उन चुनौतियों को जानता था जो उसके चेलों के सामने आने वाली थीं।

उसने कहा:
“’मैं तुम्हारे लिये अपनी शांति छोड़ रहा हूँ। मैं तुम्हें स्वयं अपनी शांति दे रहा हूँ पर तुम्हें इसे मैं वैसे नहीं दे रहा हूँ जैसे जगत देता है। तुम्हारा मन व्याकुल नहीं होना चाहिये और न ही उसे डरना चाहिये। तुमने मुझे कहते सुना है कि मैं जा रहा हूँ और तुम्हारे पास फिर आऊँगा। यदि तुमने मुझसे प्रेम किया होता तो तुम प्रसन्न होते क्योंकि मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। क्योंकि परम पिता मुझ से महान है। और अब यह घटित होने से पहले ही मैंने तुम्हें बता दिया है ताकि जब यह घटित हो तो तुम्हें विश्वास हो। “और मैं अधिक समय तक तुम्हारे साथ बात नहीं करूँगा क्योंकि इस जगत का शासक आ रहा है। मुझ पर उसका कोई बस नहीं चलता। किन्तु ये बातें इसलिए घट रहीं हैं ताकि जगत जान जाये कि मैं परम पिता से प्रेम करता हूँ। और पिता ने जैसी आज्ञा मुझे दी है, मैं वैसा ही करता हूँ। –यूहन्ना १४:२७-३१

यीशु जानता था कि शैतान अपना कार्य कर रहा है, और उसके बलिदान का समय आ गया था। परमेश्वर पिता ने इतिहास को रचा ताकि शैतान उस महान विजय को लेन में सहभागी हो सके। यीशु क्रूस पर जाने से परमेश्वर के दुश्मन के आगे झुक नहीं रहा था, वह अपने पिता के प्रति प्रेम के कारण कष्ट उठा रहा था। जब शैतान उसने परमेश्वर पिता के प्रति अगयकर्ता को देखेगा तब वह उसके प्रेम कि सामर्थ को इंकार नहीं कर पाएगा। जहां हर इंसान असफल रहा, जहाँ शैतान और उसके साथ के दुष्ट ताक़तें असफल रहीं, यीशु कि विजय होने वाली थी, और वह उन सब को विजय में लेने वाला था जो उस पर विश्वास करते हैं।

कहानी १५७: रोटी और प्याला 

मत्ती २८:२६-२९, मरकुस १४:२२-२५, लूका २२:१७-२०, १ कुरिन्थियों ११:२३-२६

Last supper

फसह का भोज यहूदी लोगों के लिए एक उच्च और पवित्र समय था। यह यहूदी लोगों के लिए मुक्ति के महान दिन की स्मृति में मनाया जाता है। यीशु के संसार में आने के पंद्रह सौ साल पहले, परमेश्वर ने मिस्र के फिरौन की भयानक अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त किया और इस्राएल को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाया। परमेश्वर ने अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा का सम्मान किया। उसका वंश आकाश के तारों के समान बढ़े।

जिस प्रकार परमेश्वर अब्राहिम के साथ बंधी हुई वाचा को रख रहा था,उसी प्रकार उसने मूसा को एक अस्थायी वाचा दी। उसने उन्हें कुछ नियम दिए जिससे कि वह लोगों कि अगुवाई कर सके और उन्हें अपनी ओर खींच सके। उसने एक ख़ूबसूरत बलिदान कि विधि मांगी ताकि वे अपने पश्चाताप कि भेंट प्रभु के पास ला सकें और देश अपने पापों से शुद्ध हो सके। उसने उनके समाज को इस तरह बनाय जिससे कि वे आस पास के देशों अपमान और अप्रतिष्ठा से बचे रहें। और मूसा के जीवन के अंत में, परमेश्वर के लोगों ने वायदे के देश में प्रवेश किया।

जब वे परमेश्वर के काम करने के पवित्र तरीकों को सम्मान दे रहे थे, वे उसकी पवित्र उपस्थिति को पृथ्वी पर बड़े विशेषता के साथ फासले को रख रहे थे। परमेश्वर कि पवित्र विधि के अनुसार, उन्होंने जो वाचा का संदूक बनाया, उसका ढक्कन परमेश्वर का सिंहासन था। उनका आराधनालय और फिर उनका मंदिर दोनों उसके सिंहासन के महान हिस्सा थे। परमेश्वर कि उपस्थिति और उसके लोगों के बीच एक पर्दा था। वे उसके कीमती खज़ाना थे, परन्तु वे अपने पापों के कारण कलंकित हो गए थे।

अपने पापों से पश्चाताप करने के लिए लोग अपनी भेटें महायाजक के सामने लाते थे। इस्राएल के महायाजक पशु के बलिदान को परमेश्वर की वेदी पर लेकर आते थे। परमेश्वर ने अपने लहू को लोगों के पापों से धोने का प्रतिनिधि नियुक्त किया। रोज़-ब-रोज़ और हफ्ते हफ्ते लोग परमेश्वर कि पवित्र व्यवस्था के लिए अपने आप को जांचने के लिए अपने बलिदान को महायाजक के पास लेकर आते थे। बलिदान प्रणाली द्वारा, हर एक पाप कि घोषणा की जाती थी। जब लोग यह देख पा रहे थे कि उनकी कमज़ोरी और स्वार्थपरता को उन्हें जांचना है, वे यह सीखते थे कि उनके पाप कितने गहरे हैं। परमेश्वर की व्यव्यस्था जो उन्हें यह सिखाता था कि वे अपने टूटेपन को किस तरह परमेश्वर के सम्पूर्णता और प्रेम के द्वारा ठीक कर सकते थे। वे देख पाये कि मनुष्य के पाप के कारण यह कितना असम्भव था कि वे परमेश्वर कि अच्छाई और पूर्णता का आदर कर सकें। उनके पाप कि गम्भीरता और स्पष्ट हो गयी, और परमेश्वर कि पवित्रता प्रकट हुई।

परमेश्वर ने इस्राएल को शुद्ध होने के लिए बुलाया ताकि वे पृथ्वी के लिए एक शाही राष्ट्र बन सके। इतने सालों का राष्ट्र रहने पर भी, वह असफ़ल रहा। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया, और उसके मार्गों में चलने से इंकार किया। उनके राजाओं ने उस परमेश्वर के विरुद्ध में मूर्तियां स्थापित कर दीं

जिसने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और वो अधिकार दिया जो परमेश्वर कि सामर्थ से भी बढ़कर है। राष्ट्र दो भागों में बात गया और अंत में निर्वासित किया गया।

परमेश्वर के पवित्र देश के इन प्रलय सम्बंधित ख़ामियों के बीच कुछ ऐसे थे जो वफ़ादार थे। हमेशा वे होते थे जो परमेश्वर के लिए समर्पित होते थे और उसके आगे अपनी भेटों को लाते थे। जिस प्रेम को यीशु ने अपने चेलों से चाहा था वही प्रेम उनका भी परमेश्वर के प्रति था। परमेश्वर के ह्रदय का अवशेष हमेशा से एक सा रहा है। उनके पश्चाताप के बलिदान उस यशस्वी बलिदान पर केंद्रित करता है जो यीशु देने वाला था। उनके समय में जो परमेश्वर ने उन्हें प्रकट किया था, वे परमेश्वर कि उस आशा कि बाट जो रहे थे यीशु में पूर्ण होती है, और जो उद्धार हमें मिला वही उन्हें भी मिला।

यह अनिश्चित था कि फसह के पर्व पर वह अपनी जान दे देगा। उस राष्ट्र का उसके जीवन का परिणाम और उत्तम उद्देश्य था जो फसह ने स्थापित किया था। इस्राएल देश इसीलिए बनाया गया ताकि इस संसार में लोग अपने मसीह कि प्रतीक्षा करें। श्राप के इतिहास को उस चंगाई के लिए तैयार रहना था जो परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के माध्यम से भेज रहा था।

यीशु अब नए दौर के लिए एक नयी वाचा को बना रहा था। उसका अपने लहू उस अंतिम बलिदान के लिए होगा जो उसके अविनाशी जीवन के सामर्थ पर आधारित था।

फसह कि क्रियाओं को यहूदी देश एक हज़ार पांच सौ साल से मना रहे थे। परमेश्वर के अद्भुद कामों को सारे देशों ने जमा होकर स्मरण किया। फसह के पर्व का हर एक हिस्सा परमेश्वर कि वफादारी का चिन्ह था। अब जब यीशु और चेले उस क्रिया को मान रहे थे, यीशु ने उन्हें एक नयी क्रिया दी। यह परमेश्वर कि ओर से नया नियम था। नयी क्रिया यीशु कोई स्मरण करने और उसकी उपासना करने के लिए दी गयी थी जो उसके बलिदान द्वारा दिया जाएगा।

पुरानी व्यवस्था अब नहीं मानी जाएगी। नई व्यस्था पवित्र आत्मा के रूप में आएगी, और उन सब के ह्रदयों में लिख दी जाएगी जो यीशु पर विश्वास करेंगे। पुराने नियम में इसका चर्चा होता था।

यिर्मयाह ने कहा:
“वह समय आ रहा है जब मैं इस्राएल के परिवार तथा यहूदा के परिवार के साथ नयी वाचा करूँगा। यह उस वाचा की तरह नहीं होगी जिसे मैंने उनके पूर्वजों के साथ की थी। मैंने वह वाचा तब की जब मैंने उनके हाथ पकड़े और उन्हें मिस्र से बाहर लाया। मैं उनका स्वामी था और उन्होंने वाचा तोड़ी।” यह सन्देश यहोवा का है। भविष्य में यह वाचा मैं इस्राएल के लोगों के साथ करूँगा।” यह सन्देश यहोवा का है। मैं अपनी शिक्षाओं को उनके मस्तिष्क में रखूँगा तथा उनके हृदयों पर लिखूँगा। मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।'” –यिर्मयाह ३१:३१-३३

पवित्र आत्मा उन सब के लिए उद्धार का मोहर होगा जो विश्वास करते हैं। परमेश्वर कि उपस्थिति हर एक ह्रदय में होगी जो यीशु के लहू से धोया गया है। यीशु कि आत्मा हर एक विश्वास करने वाले ह्रदय में वास करेगी।

ये सब महान बातें मनुष्य के इतिहास में जब से हो रही थीं जब से यीशु अपने जीवन के अंतिम दिनों में येरूशलेम में था।और अब वह अपने उन चेलों के साथ ऊपर के कमरे में था जो जाकर सुसमाचार को सुनाएंगे।

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, उसने थोड़ी रोटी ली और धन्यवाद दिया। उसने उसे तोड़ा और उन्हें देते हुए कहा,“यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिये दी गयी है। मेरी याद में ऐसा ही करना।”

यह कितना पवित्र और ख़ूबसूरत पल था। यह यीशु का कितना शांत अनुष्ठान था जो यीशु ने अपने चेलों को दिया ताकि वे मिलकर उद्धारकर्ता के कामों को याद कर सकें। यीशु ऐसा राजा था जैसा और कोई भी नहीं। वह उन सब के लिए अपने लहू और प्राण को देने जा रह था जो उसके राज्य के वारिस थे। वह एक सच्चा फसह का मेमना बनने जा रहा था।हज़ारों सालों के लिए यह नयी क्रिया परमेश्वर के राज्य के लिए एक शक्तिशाली चिन्ह बनने जा रहा था।

जो चेले यीशु के साथ में मेज़ पर बैठे थे वे उसके दूत होंगे जो उसके जय कि घोषणा करेंगे जिसे यीशु इस संसार के लिए क्रूस पर जीतने जा रहा था। जब वे उसकी कलीसिया को बनाने जा रहे थे, वे यीशु कि  आज्ञाओं को याद करके उन्हें नए विश्वासियों को सिखाएंगे।  दो हज़ार साल बाद,  उनकी शिक्षाएं हम तक पहुँच गयीं हैं। यीशु के बलिदान को हम रोटी और प्याले को लेकर स्मरण करते हैं। उसकी उपस्थिति कलीसिया के साथ एक विशेष रीति से है। हमारा पवित्र मेज़ में भाग लेना उस समय को बंधता है जिस रात यीशु मरने वाला था।

कहानी १४८: विधवा का छोटा सिक्का : एक कहानी

मरकुस १२:४१-४४, लूका २१:१-४

elderly lady begging in Morocco

उसके पास काफी नहीं था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसने कुछ ऐसा सबक सीखा जिससे उसे साधारण परन्तु शानदार स्वतंत्रता मिली। उसके जीवन में काफी कड़ा समय आया। चाहे वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी, परमेश्वर ने उसे बहुत जल्द उठा लिया था और वह लम्बे समय से एक विधवा का जीवन व्यतीत कर रही थी। वह धीरे धीरे गरीब होती गयी। कई दिन ऐसा होता था कि उसके पास खाने को भी नहीं होता था। कई  रातों उसके पास काफी गरम ओढ़ने को भी नहीं होता था। उसके बावजूद परमेश्वर उसके साथ वफादार रहा। उसने परमेश्वर के सुरक्षा कवज को महसूस किया था जो उसे पंखों कि आड़ में छुपाये हुए था। परमेश्वर उसके बहुत करीब था। वह उससे कितना प्रेम करता था! उसके पास ज़यादा कुछ भी नहीं था, परन्तु उसके पास जो भी था वह उसके लिए था। अपने अंतिम दो सिक्कों के साथ, वह मंदिर में गयी।

फसह का पर्व एक बार फिर आ गया था, और हमेशा कि तरह वह अपना दान प्रभु को देना चाहती थी। जब उसने प्रवेश किया, तब मंदिर पर फरीसी खड़े अपनी प्रतिष्ठित आवाज़ों में बात कर रहे थे। जो लोग मंदिर में अपनी भेटों को परमेश्वर के लिए चढ़ाने के लिए लाते थे, यह लोग उनके प्रति घृणा को ढांपते नहीं थे। वह विधवा स्त्री वहाँ से गुज़री और उन्होंने ने उसे देखा तक नहीं। जब उसने उनकी ओर दृष्टी की, तो उसने उनमें से एक को पहचान लिया। वह एक फरीसी का पुत्र था जिसके घर में वह अपने परिवार के साथ किराय पर रहती थी। यह स्थान कितना प्रेम से भरा हुआ था। लेकिन वे उस जगह उसके पति के चले जाने के बाद वहां नहीं रह सकते थे।

जब वह पिछले महीने का किराया नहीं दे पाई तो उसे बहुत बुरा लगा। फरीसी उससे बहुत क्रोधित था। उसके अनुसार उसका क्रोध जायज़ था जबकि उसने उसका सारा सामान ले लिया था। परन्तु यह परमेश्वर के साथ का पहला कदम था। वह उसके सुरक्षा के लिए अपने चारों ओर महसूस कर सकती थी। अजनबी उससे असामान्य दया दिखाते थे। दिन प्रति दिन उसका प्रभु उसके साथ वफादार था। वह कितना सामर्थी और पराक्रमी था। कितना प्रेमी और अच्छा परमेश्वर। जब वह मंदिर कि ओर जा रही तो यही सब सोचती हुई जा रही थी। उसने बहुत सालों तक परमेश्वर पर भरोसा करना और उस पर निर्भर करने को चुना था। वह अपने जीवन भर प्रशंसा करती रही और उसके विचार भी वैसे ही थे। उसका ह्रदय हर समय आनंदित रहता था।

जब वह मंदिर के भंडार कि ओर लाइन में बढ़ रही थी, वह धनवान लोगों के सिक्कों कि आवाज़ सुन रही थी। उसने सोचा,”निश्चय ही, वे परमेश्वर को महान दान देते हैं।” उसने अपने हाथों कि ओर उन सिक्कों को देखा। वे हास्यास्पद और हलके थे। उनका मूल्य कुछ भी नहीं था लेकिन वही सब कुछ थे। उसके विश्वास के इतने सालों के कारण, उसने परमेश्वर को वह सब कुछ दे दिया जो उसके पास था। वह उन्हें उसी तरह स्वीकार करेगा जिस प्रकार वह उसे स्वीकार करता है। उसने यह प्रार्थना की:
“‘जो लोग, याकूब के परमेश्वर से अति सहायता माँगते, वे अति प्रसन्न रहते हैं।
वे लोग अपने परमेश्वर यहोवा के भरोसे रहा करते हैं,'”

उसके भीतर एक उज्जवल उम्मीद जागी और उसने अपने ह्रदय में कहा:

यहोवा ने स्वर्ग और धरती को बनाया है।
यहोवा ने सागर और उसमें की हर वस्तु बनाई है।
यहोवा उनको सदा रक्षा करेगा।
जिन्हें दु:ख दिया गया, यहोवा ऐसे लोगों के संग उचित बात करता है।
यहोवा भूखे लोगों को भोजन देता है।
यहोवा बन्दी लोगों को छुड़ा दिया करता है।
यहोवा के प्रताप से अंधे फिर देखने लग जाते हैं।
यहोवा उन लोगों को सहारा देता जो विपदा में पड़े हैं।
यहोवा सज्जन लोगों से प्रेम करता है।
यहोवा उन परदेशियों की रक्षा किया करता है जो हमारे देश में बसे हैं।
यहोवा अनाथों और विधवाओं का ध्यान रखता है किन्तु यहोवा दुर्जनों के कुचक्र को नष्ट करता हैं।
यहोवा सदा राज करता रहे!
सिय्योन तुम्हारा परमेश्वर पर सदा राज करता रहे!
यहोवा का गुणगान करो!

वह उसे जानती थी। वह जानती थी कि उसकी भेंट काफी थी। परमेश्वर का प्रेम बहुत महान था। वह उसके पंखों कि आड़ में रहती थी। उसके भीतरी जीवन में वह बहुतायत का जीवन था जो सब लोगों कि इस पृथ्वी पर से परे थी। क्यूंकि यह गरीब विधवा अपने विश्वास में बहुत धनवान थी।

यीशु के लिए मंदिर में वह दिन बहुत व्यस्त था। वह भविष्य के लिए बहुत ही उज्जवल और आकर्षक बातें सिखा रहा था। उसने येरूशलेम के अगुवों को फटकारा जो लोगों के विश्वास को अपने लिए उपयोग करते थे कि उनसे वे कमाँ सकें और अपने हुक्म उन पर चलाते थे। परन्तु वह यह भी जानता था कि इस्राएल में सब विरोधी नहीं थे। बहुत से परमेश्वर कि आराधना ह्रदय कि गहराई से करते थे। जिस समय वह मंदिर में पिता कि मर्ज़ी को पूरा करता था उसने देखा कि वे भी वैसा ही करते हैं।

एक दिन यीशु अपने चेलों के साथ मंदिर के भंडार के सामने खड़ा हुआ। लोग अपने दान परमेश्वर के लिए दे रहे थे। जो अमीर थे वे वहाँ अधिक दान लाते थे। ऐसा लगता था मानो वे परमेश्वर को बहुतायत से देना चाहते हैं। इस जीवन में वे बहुत अशिक्षित थे! बहुत से यहूदी यह मानते थे कि परमेश्वर को अधिक देने से वह प्रसन्न होता है। वास्तव में, इस्राएल में बहुत से यह मानते थे कि परमेश्वर धनवान लोगों को अधिक आशीष देता है क्यूंकि वे गरीबों से अधिक धार्मिक थे।

गरीबों को कितना अपमान सहना पड़ता था। ना केवल वे दुखी होते थे और गरीबी के साथ संघर्ष करते थे, उन्हें निंदा के साथ जीना पड़ता था क्यूंकि वे गरीब थे। एक बार फिर, यीशु ने आकर विनाशकारी झूठ के विरुद्ध एक उज्जवल और खुबसूरत सच सुनाया।

यीशु दान-पात्र के सामने बैठा हुआ देख रहा था कि लोग दान पात्र में किस तरह धन डाल रहे हैं। बहुत से धनी लोगों ने बहुत सा धन डाला। फिर वहाँ एक गरीब विधवा आई और उसने उसमें दो दमड़ियाँ डालीं जो एक पैसे के बराबर भी नहीं थीं।

यीशु उसके इतने करीब नहीं था परन्तु उसने पवित्र आत्मा कि सुनी। यहाँ एक स्त्री थी पूरे इस्राएल में जिसकी भक्ति सच्ची थी। परमेश्वर का पुत्र यह देख कर अचंबित हुआ। फिर उसने अपने चेलों को पास बुलाया और उनसे कहा, “मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, धनवानों द्वारा दान-पात्र में डाले गये प्रचुर दान से इस निर्धन विधवा का यह दान कहीं महान है।”

उस विधवा के आनंद कि कल्पना कीजिये! उन सब प्रभावशाली लोगों में इस विधवा का ज़बरदस्त विश्वास था जिससे परमेश्वर का पुत्र आनंदित हुआ।