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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १५४: यीशु के खिलाफ साज़िश 

silver coins - stacked

मत्ती २६:१-१६, मरकुस १४:१-११, लूका २१:३७-२२:६

महासभा रोष से खदबदा रही थी। तीन साल के लिए उन्होंने इस युवा ढोंगी, यीशु नाम की अभिमानी निन्दा सही थी। कैसे उसने जानबूझकर खुद परमेश्वर के चुने हुए देश पर शासन करने के ठहराए नेतृत्व की खिल्ली उड़ाई, और अपने आकर्षण और शैतानी चमत्कार के साथ लोगों को चालाकी से अपने वश में किया। उन्होंने लोगों के विद्रोह को प्रोत्साहित किया, पवित्र आदेशों के तोड़ने को गर्व से दिखाया, और लोगों की कमजोरियों पर हावी होकर, उनका समर्थन हासिल किया। इस्राएल के देश के समक्ष चुनौतियाँ आई थीं, लेकिन इस झूठे नबी ने उन सब को मात दी।

एक बार फिर से,फसह के पर्व पर, उसकी यह हिम्मत थी कि उसने मंदिर में घुसकर, जीवित परमेश्वर के पवित्र महल के आंगनों में अपने झूटों का एह्लान किया। मूर्ख भीड़ मंत्रमुग्ध थे। यहाँ तक कि नेताओं के सदस्यों ने उसकी ओर से बहस करने की कोशिश की; लेकिन वह अब बहुत हद पार कर चुका था। परमेश्वर के वचन का मोड़ना, विश्राम के दिन के लिए उसकी उपेक्षा, हजारों साल की परंपरा के लिए उसका अनुचित अवमानना, उसकी पापियों की पसंद इसके बजाय पवित्रता और वचन शुद्धता वाले लोगों की, उसके दावे कि वह स्वयं परमेश्वर की ओर से बोलता है, और इस राज्य की उसकी बात… वह देश के लिए खतरा था! अफवाहे यह भी थी कि वह राजा बनना चाहता था! रोमी इस को बरदाश्त नहीं करेंगे और न तो उच्च यहूदी अदालत। इस आदमी को मरना ही था। देश को बचाने का यह एक ही रास्ता था।

साजिश और योजनाऐ महीनों से चल रहीं थी। देश भर में यह बात फैल गई कि यीशु कलंकित था। यह आवश्यक था कि यहूदी नेतृत्व उनके खिलाफ कुछ खोजने के लिए एक साथ काम करे। उन्हें यीशु को अपने ही शब्दों में पकड़ना था; उन्हें यीशु को विधर्मी साबित करने के लिए सबूत ढूँढना था। लेकिन यह यीशु चालाक था। ऐसा लगता था कि शैतान खुद इस बढ़ई की आकर्षित शब्दों को प्रेरित कर रहा था। उन्होंने देश में सबसे प्रतिभाशाली वकीलों को हराया और उन्हें चकित छोड़ दिया।

दूसरी समस्या यह थी कि उसे ढूँढना मुश्किल था। उनकी अपनी कोई आराधनालय नहीं थी और वह अपने समय को बेपरवा भीड़ों में घूम कर, उनके झोपड़ियों में सो कर, और नशा करने वालों में प्रचार कर गवा देते थे। वह एक बंजारे की तरह इस्राएल भर में अपने फटे पैर लेकर चलते और अपने छोटे घिसे पिटे झुण्ड के साथ घूमते जिसे वो ‘शिष्य’ कहते थे। उनमें से हर एक वही अज्ञानी किस्म के थे जिनकी शिक्षा की कमी की वजह से वह आसानी से बेवकूफ बन जाते थे। उनके प्रिय शिक्षक के जाने के बाद वे क्या करेंगे? उनमें से किसी एक के भी पास, उस गलील के कपटी बढ़ई जैसा आकर्षण नहीं था। जैसे ही वह मर जाएगा, वे भाग निकलेंगे, और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा।

अब, अंततः यीशु उनकी मुट्ठी में था, लेकिन भीड़ ने उसे गिरफ्तार करना असंभव बना दिया। वह लोकप्रिय था। भीड़ ने वास्तव में इस अफवाह पर विश्वास किया कि उसने यहूदिया में अपने मृत दोस्त को मुर्दों से जिलाया। अन्य कहानियां भी उड़ रही थी, जैसे कि दस कोड़ियों की चंगाई। उसके दावे कितने अविश्वासनीय थे, इसकी कोई बात नहीं थी;  जब तक भीड़ को यह चमत्कार सच लगते थे, उन्हें इंतज़ार करना था। अगर वे उसे गिरफ्तार करने की कोशिश करते, तो एक दंगा तो होना ही होना था। जब फसह की भीड़ छट जाएगी, तब वे आगे बड़ सकते थे। वे उसे चुपके से और बल द्वारा ले जाकर मार सकते थे। वे यह नहीं जानते थे कि इतना सब कैसे होगा, लेकिन उनके यह करने के जुनून ने इसे मुमकिन बना दिया।

फसह का पर्व दो दिन के बाद था। यरूशलेम की सड़कों पर लोगों का तांता लगा हुआ था। यीशु और उनके चेले, उनके बीच दिन के उजाले के घंटे बिताते थे। सुबह में, लोग मंदिर में यीशु को सुनने के लिए उत्सुक, खोजते थे। वह उनकी एक ऐसी भूख मिटाते थे जिसे वह स्वयं ही नहीं जानते थे। शाम को, यीशु किद्रों की छोटी सी घाटी में और ऊपर जैतून के पहाड़ पर यात्रा करते। वे रात को वहां आराम करते पर सुबह फिर लोगों के पास वापस चले जाते।

इस हलचल के बीच, यीशु के शिष्यों में से एक के मन में चुप्पी से कुछ भयावह चल रहा था। उसके विचार अंधेरे में बदल गए थे। लूका कहता है कि शैतान ने खुद उसमे प्रवेश किया था। बाइबल हमें यह नहीं बताती है कि यहूदा ने यह भयानक काम क्यों किया। यह शैतान का उसके दिल के विद्रोह पर अपने बुरे काम की व्याख्या नहीं करता है। यह केवल इस अकल्पनीय विश्वासघात के बारे में बताता है। उस सप्ताह के एक बिंदु पर, वह प्रभु और चेलों और भीड़ से दूर घिसक गया, और उसने अपना रास्ता महायाजक की ओर रेंगा। उसने पूछा: ‘ तुम मुझे उसको तुम्हारे हवाले करने के लिए कितना दोगे?’  उन दुष्ट निगाहों की कल्पना कीजिए जब उन्होंने उसे देने के लिए तीस चांदी के सिक्के तौले होंगे। यह लगभग चार महीने के वेतन के बराबर था।

जमीन को गड़गड़ाना चाहिए था। पृथ्वी में दरार आनी चाहिए थी। सूरज को शोक के साथ अपनी चमक को छिपाना चाहिए था। किसी को विलाप करना था: ” ब्रह्मांड के प्रभु को धोखा दिया गया है!” और शायद स्वर्ग में उन्होंने ऐसा किया हो।

उसने चमत्कार देखे थे। उसने सभी उज्ज्वल, स्पष्ट सबक सुने और अंतहीन यात्रा पर उसके साथ गया था। उसने सख्त धरती को अपना बिस्तर मान कर कई मुश्किल रातें ठंड में बिताई होंगी। वह प्रभु के पीछे हर जगह जाता था और उसे उनके आंतरिक चक्र में आमंत्रित किया गया था! लेकिन जब समय पूरा हुआ, तो वह कपटीपना के लिए रवाना हो गया। वह ऐसा कैसे कर सकता था? वह ऐसा कैसे कर सकता था? वह चंद सिक्कों के लिए प्रभु को धोखा कैसे दे सकता था? हम नहीं जानते है क्यूँ। यह अटपटा है। लेकिन उसने ऐसा किया।

धार्मिक नेताओं के दुष्ट खुशी की कल्पना कीजिए। कल्पना कीजिये कि उन्होंने कैसे मज़ाक बनाया होगा जब उन्होंने यीशु के ही लोगों में से एक के साथ साजिश रची। अचानक, जो काम इतना जटिल लग रहा था, एकाएक सरल हो गया। उनके पास एक भेदी था। उन्हें यीशु को भीड़ के  सामने गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं थी, जहाँ उन्हें जनता का सामना करना पड़ता। वे यीशु को रात में उठाकर, बल से महायाजक के घर लेजाकर, और उससे संख्या में बढ़ सकते थे। जिस समय तक गिरफ्तारी की खबर भीड़ तक पहुँचती, सब कुछ समाप्त हो सकता था। नेता एक घोषणा जारी कर सकते थे, और भीड़ को इसे स्वीकार करना होगा। वे इस उपद्रवी को पक्के रूप से अपमानित और शांत कर सकते थे। कोई भी फिर से उनके अधिकार को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करेगा।

अपने सभी पाप और विद्रोह के बीच में, यह पुरुष यह नहीं देख पा रहे थे कि उनके नापाक इरादों को कैसे परमेश्वर की अकथनीय सुंदर योजना को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। उसने इस बात को ठहराया था कि मसीह फसह के पर्व पर अपने जीवन को दे देंगे। यह पर्व उस समय को मनाता था जब परमेश्वर ने एक भेड़ के बच्चे के लहु और लाल सागर के माध्यम से दमनकारी मिस्र के साम्राज्य से इसराइल को उद्धार लाए थे। अब, परमेश्वर एक नया रास्ता निकाल रहे थे, उद्धार का पूर्ण रूप जो अंतिम, परम जीत होगी। यीशु का रक्त उनके शरीर के टूटने के माध्यम से, उद्धार का रास्ता बनाएगी। धार्मिक नेता भीड़ के चले जाने तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार थे। लेकिन यहूदा के विश्वासघात ने यह सुनिश्चित किया कि यह परमेश्वर के सटीक, नियत दिन पर हो।

कहानी १५३: मसीह न्याय के सिंघासन पर 

मत्ती २५:३१-४६

The sun sets over Jerusalem

जो दूसरी कहानी यीशु बताने जा रहे थे, वो भी भविष्य के बारे में थी। प्रभु पृथ्वी के लोगों का न्याय करने आ रहे है। जिस प्रकार यह लोग अपने जीवन को जीने का चुनाव करेंगे, उससे ही वो जानेंगे कि सही मायने में कौन उनके अपने थे। जैतून के पहाड़ पर अपनी लम्बी  बातचीत के दौरान, उन्होंने यह बात अपने शिष्यों को ऐसे वर्णित की:

” जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और उसके साथ सभी स्वर्गदूत भी, तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर बैठेगा। उनके सामने सभी देशों को इकट्ठा किया जाएगा, और वह लोगों को एक दूसरे से अलग करेगा, जैसे एक चरवाहा बकरियों से भेड़ों को अलग करता है। और वह अपने दाहिनी ओर भेड़ों को रखेगा, लेकिन बकरियों को बाएँ ओर।”

हम खैर यह जानते है कि बाइबल में जिन चीज़ों को परमेश्वर के दाहिने हाथ पर डाला जाता है, उन्हें उनका प्यार और कृपा प्राप्त होता है। उनके बाएं हाथ पर चीज़ों से वह बिल्कुल भी खुश नहीं होते है। बकरियों ने ऐसा क्या किया था जिससे वह बाएँ ओर थे? भेड़ों ने ऐसा क्या किया था जिससे वो दाहिनी ओर थे? यीशु ने यह कहा:

“फिर वह राजा, जो उसके दाहिनी ओर है, उनसे कहेगा, ‘मेरे पिता से आशीष पाये लोगो, आओ और जो राज्य तुम्हारे लिये जगत की रचना से पहले तैयार किया गया है उसका अधिकार लो। यह राज्य तुम्हारा है क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे कुछ खाने को दिया, मैं प्यासा था और तुमने मुझे कुछ पीने को दिया। मैं पास से जाता हुआ कोई अनजाना था, और तुम मुझे भीतर ले गये। मैं नंगा था, तुमने मुझे कपड़े पहनाए। मैं बीमार था, और तुमने मेरी सेवा की। मैं बंदी था, और तुम मेरे पास आये।’ –मत्ती २५:३४-३६

वाह। भेड़ों ने यीशु के लिए कई सुंदर, दयालु चीज़ें की थी। लेकिन इस कहानी में, वे उलझन में थे, तो उन्होंने राजा यीशु से कुछ सवाल पूछे:

“फिर उत्तर में धर्मी लोग उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे कब भूखा देखा और खिलाया या प्यासा देखा और पीने को दिया? तुझे हमने कब पास से जाता हुआ कोई अनजाना देखा और भीतर ले गये या बिना कपड़ों के देखकर तुझे कपड़े पहनाए? और हमने कब तुझे बीमार या बंदी देखा और तेरे पास आये?’ “फिर राजा उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे भोले-भाले भाईयों में से किसी एक के लिए भी कुछ किया तो वह तुमने मेरे ही लिये किया।’ –मत्ती २५:३७-४०

वाह। कितना सुंदर राजा! क्या ही एक अद्भुत दिल! यह राजा अपने लोगों से इतना प्यार करता था कि वह उन्हें भाई बुला रहा था।वह उन्हें इतना प्यार करता था कि वह चोट खाए लोग, या जेल या भूखे लोगों की देखबाल करता था, और खुश होता था जब उसके अपने, किसी भी तरह उनकी मदद करते। वे उनके दयालुता को याद करते जैसे उन्होंने उन के लिए यह किया हो! मसीह में हमारे भाइयों और बहनों की सेवा करना और स्वर्ग के राजा की सेवा करना एक ही बात है! वाह! यीशु हमारे अच्छे कर्मों को याद करके सिंजोते हैं ताकि वो हमें समय के अंत में इनाम दे सके! वाह!

लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि जो कोई खुद को मसीह का चेला बुलाता हो वो अपना जीवन उनके लिए बिताये। यीशु ने इस कहानी में उनके बारे में यह कहा है:

“फिर वह राजा अपनी बाँई ओर वालों से कहेगा, ‘अरे अभागो! मेरे पास से चले जाओ, और जो आग शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गयी है, उस अनंत आग में जा गिरो। यही तुम्हारा दण्ड है क्योंकि मैं भूखा था पर तुमने मुझे खाने को कुछ नहीं दिया, मैं अजनबी था पर तुम मुझे भीतर नहीं ले गये। मैं कपड़ों के बिना नंगा था, पर तुमने मुझे कपड़े नहीं पहनाये। मैं बीमार और बंदी था, पर तुमने मेरा ध्यान नहीं रखा।’ “फिर वे भी उत्तर में उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे भूखा या प्यासा या अनजाना या बिना कपड़ों के नंगा या बीमार या बंदी कब देखा और तेरी सेवा नहीं की।’ “फिर वह उत्तर में उनसे कहेगा, ‘मैं तुमसे सच कह रहा हूँ जब कभी तुमने मेरे इन भोले भाले अनुयायियों में से किसी एक के लिए भी कुछ करने में लापरवाही बरती तो वह तुमने मेरे लिए ही कुछ करने में लापरवाही बरती।’ “फिर ये बुरे लोग अनंत दण्ड पाएँगे और धर्मी लोग अनंत जीवन में चले जायेंगे।” –मत्ती २५:४१-४६

और ये मसीह के वो शब्द थे जो उन्होंने अपने चेलों को अपने महान सबक में दिए; उन्हें इस बात के लिए तैयार करते हुए कि उनके जीवन कैसे होने चाहिए जब वो इस धरती पर उसकी सेवा कर रहे थे। जिस प्रकार वे कमजोर और चोट पहुँचे लोगों के लिए अपने प्यार को दर्शाते, वह परमेश्वर को अपना प्रेम दिखाने के लिए एक रास्ता था। यह परमेश्वर के राज्य की बातें है। दस कुंवारियाँ और तोड़ों वाले पुरुषों की कहानी इसी बारे में थी। और मसीह के प्रेम के विशेष कार्य में, हमारी बुलाहट इसी के लिए है!

कहानी १५०: निर्जनता का द्वेष 

मत्ती २४:१५-२८, मरकुस १३:१४-२३, लूका २१:२०-२४

Earth in fire

प्रभु यीशु ने चेलों को अगले जन्म के जीवन के विषय में वर्णन दिया। राज्यों में युद्ध होंगे। अकाल होगा जहां लोगों और जानवरों को खाने को नहीं होगा। झूठे भविष्यद्वक्ता खड़े होंगे जो कहेंगे कि वे ही यीशु हैं। जिस समय इंसान और सारी पृथ्वी श्राप के कारण क्लेश उठाएगी, यीशु के पीछे चलने वाले वाले उसका सुसमाचार सुनाएंगे। वे यह घोषित करेंगे कि यीशु उद्धार और आज़ादी को जीत कर ले आया है। परन्तु जिस तरह दुष्ट शिक्षक और फरीसियों ने मसीह को अस्वीकार किया जब वे उसे आमने सामने मिले थे, बहुत से उसके सुसमाचार को अस्वीकार करेंगे जो उसके चेलों ने दिया था। वे यीशु के पीछे चलने वालों को सताएंगे और उन्हें नष्ट कर देंगे। परन्तु यीशु ने जब इस सच्चाई को सुनाया, उसने उन्हें उस इनाम के विषय में वायदा दिया जो उन्हें दिया जाएगा जो वफादारी से अंत तक उसके पीछे चलेंगे। वे यीशु कि उपस्थिति में उस अजर को पाएंगे!

यीशु जब अपने चेलों के साथ जैतून के पहाड़ पर बैठा हुआ था वह उन्हें आने वाली बातों के विषय में समझा रहा था। बाइबिल बताती है कि यह समय तब होगा जब मनुष्य का पुत्र प्रभु के उस को दिन को लेकर आएगा।

“इसलिए जब तुम लोग ‘भयानक विनाशकारी वस्तु को,’ जिसका उल्लेख दानिय्येल नबी द्वारा किया गया था, मन्दिर के पवित्र स्थान पर खड़े देखो।” तब जो लोग यहूदिया में हों उन्हें पहाड़ों पर भाग जाना चाहिये। जो अपने घर की छत पर हों, वह घर से बाहर कुछ भी ले जाने के लिए नीचे न उतरें। और जो बाहर खेतों में काम कर रहें हों, वह पीछे मुड़ कर अपने वस्त्र तक न लें। “उन स्त्रियों के लिये, जो गर्भवती होंगी या जिनके दूध पीते बच्चे होंगे, वे दिन बहुत कष्ट के होंगे। प्रार्थना करो कि तुम्हें सर्दियों के दिनों या सब्त के दिन भागना न पड़े। उन दिनों ऐसी विपत्ति आयेगी जैसी जब से परमेश्वर ने यह सृष्टि रची है, आज तक कभी नहीं आई और न कभी आयेगी।'”

यह समझना कितना कठिन है, है कि नहीं? परमेश्वर “हफ्ते” जैसे शब्द को समय के लिए चिन्ह कि तरह उपयोग करता है जिसे पूर्ण रूप से समझना मुश्किल है। जिस समय यह दुष्ट शासक पृथ्वी पर अपने महान दुष्ट काम करेगा, वे दिन एक साल कि तरह होगा। वह उस बलिदान और भेंट को जो आराधना का चिन्ह है, उसका वह अंत कर देगा। यह दुष्ट शासक जीवते परमेश्वर कि आराधना का अंत कर देगा!

बहुत से यह मानते हैं कि भविष्यवाणी थोड़ी बहुत पूरी हो गयी है। यीशु के जन्म के कई साल पहले, अशकुस नमक राजा जो इस्राएल का दुश्मन था, उसने यूनानी ईश्वर कि मूर्ती को परमेश्वर के पवित्र मंदिर में रखवा दी थी। उसने अपने आदमियों को यह आदेश दिया कि वे यहूदी परमेश्वर को अपवित्र और अपमानित करने के लिए कुछ भी करें। वह यहूदी लोगों को सताता था और इस्राएल का जीवन घिनौना कर दिया था। बहुत से यह मानते हैं कि यह भविष्यवाणी येरूशलेम और मंदिर की बर्बादी है जो 70 AD में हुआ था। परन्तु यह है कि यह भविष्यवाणी होने पर ही पूरी होगी, जब परमेश्वर का विरोधी, शैतान, जो सबसे बुरा भ्रष्टाचार और दुष्टता को लाएगा। हम जानते हैं कि और भी भविष्यवाणी के अनुसार होना है क्यूंकि प्रेरित पौलूस ने उसके विषय में थिस्सलुनिकियों को पत्र में लिखा। यूहन्ना,जो यीशु का चाहिता था, उसने भी प्रकाशितवाक्य कि किताब में लिखा है। यह बाइबिल कि अंतिम किताब है जो बताती है कि कैसे यीशु इस दुनिया का अंत करेगा और एक नया स्वर्ग और पृथ्वी बनाएगा! जब वह समय निकट आएगा, पूरा संसार के महान संकट से गुज़रेगा।

यीशु ने अपने चेलों से कहा:
“’और यदि परमेश्वर ने उन दिनों को घटाने का निश्चय न कर लिया होता तो कोई भी न बचता किन्तु अपने चुने हुओं के कारण वह उन दिनों को कम करेगा। “उन दिनों यदि कोई तुम लोगों से कहे,‘देखो, यह रहा मसीह!’ या ‘वह रहा मसीह’ तो उसका विश्वास मत करना। मैं यह कहता हूँ क्योंकि कपटी मसीह और कपटी नबी खड़े होंगे और ऐसे ऐसे आश्चर्य चिन्ह दिखायेंगे और अदभुत काम करेंगे कि बन पड़े तो वह चुने हुओं को भी चकमा दें। देखो मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है।'”

यीशु अपने चेलों को चेतावनी देने में बहुत सचेत था। वह चाहता था कि वे इसे बाइबिल में लिख दें ताकि हम जान सकें। एक दिन, विश्वासी इसे पढ़ेंगे और अपनी आँखों के सामने उन्हें पूरा होते देखेंगे। हम नहीं जानते कि कब होगा, परन्तु यीशु के पीछे चलने वालों के लिए स्पष्ट है कि वे निश्चिन्त रहे।

यीशु ने कहा:
“’सो यदि वे तुमसे कहें,‘देखो वह जंगल में है’ तो वहाँ मत जाना और यदि वे कहें, ‘देखो वह उन कमरों के भीतर छुपा है’ तो उनका विश्वास मत करना। मैं यह कह रहा हूँ क्योंकि जैसे बिजली पूरब में शुरू होकर पश्चिम के आकाश तक कौंध जाती है वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी प्रकट होगा! जहाँ कहीं लाश होगी वहीं गिद्ध इकट्ठे होंगे।'”

यीशु ने बहुत स्पष्ट कर दिया था। जब वह वापस आएगा, वह इस पृथ्वी पर चलने वाले मनुष्य के समान नहीं होगा। जब वह आएगा तब आकाश में चमकते हुए यशस्वी रौशनी के समान आएगा। गिद्ध वह पक्षी है जो मरे हुए को खाता है। वह किसी जानवर कि लाश के ऊपर आये, वह ऊंचे आकाश में उड़ती रहती है। उसी तरह, जब यीशु पृथ्वी पर पापी मनुष्य के मृत्यु और सर्वनाश का न्याय करने आएगा, वह भी ऊपर उड़ता हुआ आएगा। वह इस प्रकार होगा कि सब कोई उसे देखेंगे। यीशु के विश्वासी यह जान जाएंगे कि जो भी यीशु के नाम से आता है और कहता है कि वही यीशु है, वह झूठा है। हमें उन पर ध्यान देने कि कोई आवश्यकता नहीं है। हमारा प्रभु आकाश में आने वाला है!

“’उन दिनों जो मुसीबत पड़ेगी उसके तुरंत बाद,‘सूरज काला पड़ जायेगा, चाँद से उसकी चाँदनी नहीं छिटकेगी आसमान से तारे गिरने लगेंगे और आकाश में महाशक्तियाँ झकझोर दी जायेंगी।’ उस समय मनुष्य के पुत्र के आने का संकेत आकाश में प्रकट होगा। तब पृथ्वी पर सभी जातियों के लोग विलाप करेंगे और वे मनुष्य के पुत्र को शक्ति और महिमा के साथ स्वर्ग के बादलों में प्रकट होते देखेंगे। वह ऊँचे स्वर की तुरही के साथ अपने दूतों को भेजेगा। फिर वे स्वर्ग के एक छोर से दूसरे छोर तक सब कहीं से अपने चुने हुए लोगों को इकट्ठा करेगा।'”

वह कितना शोभामय समय होगा! इतने सालों कि पीड़ा के बाद, यीशु बादलों पर आएगा! आकाशमण्डल के तारे हिल जाएंगे, और सब उस युगानुयुग के राजा को देखेंगे। वह स्वर्ग के राज्य का अधिकार लेगा और राज्य करेगा। जैतून के पहाड़ पर उन चेलों को कैसा लगा होगा। उस ज्योति कि कल्पना कीजिये जो येरूशलेम के शहर से आती है। उन्होंने उस दिन कि कल्पना कैसे की जब यीशु के चेले वहाँ जमा होंगे? क्या आप कल्पना कर सकते हैं?

कहानी १४३: इस्राएल और अंजीर का वृक्ष

मत्ती २१:१८-२२, मरकुस ११:१९-२६

यीशु का येरूशलेम फसह के पर्व में आना हवा के समान था, जिसने सब कुछ उल्टा पुल्टा कर दिया था। उसने दिखावे कि झूठी आराधना को उनके भ्रष्टाचार के द्वेष को हिला कर रख दिया था। लोगों के पक्ष को बुलाया गया। क्या वे मनुष्य के रास्ते को चुनेंगे या परमेश्वर के रास्ते को? क्या वे सच्चे इतिहास कि ओर होंगे? क्या वे परमेश्वर के साथ वफादार रहेंगे?

जिस समय सब यह देख रहे थे कि यीशु अब क्या करेगा, किसी को भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह उनका ही इम्तिहान ले रहा था। यीशु परमेश्वर कि सामर्थ में उन पापी लोगों के विरुद्ध में सिद्ध और निष्कलंक खड़ा रहा। यह सब पर निर्भर करता था कि वे उसके साथ संरेखित हों। जब कोई भयानक खतरे में पड़ता है, तब एक हल्का सुझाव है एक बचाव करने के लिए। यदि आप उनके जीवन को बचाना चाहते हैं, तब आप उनको चिल्ला चिल्ला कर पुकारते हैं। यहूदी बहुत ही भयानक गलती करने जा रहे थे। केवल यीशु ही उनके त्रासदी कि गहराई को समझ सकता था जो वे अपने ऊपर ले कर आ रहे थे। यीशु कि कठोर चेतावनियां उसकी करुणा और अनुग्रह का अधिनियम था।

सोचिये यीशु उन्हें क्या दिखा रहा था। वह अनतकाल का परमेश्वर है, जो युगानुयुग और पवित्र है। इसके बावजूद वह उनका साथ दिया और उनके साथ भोजन भी किया। वह मनुष्यरूप में आया, और जितनो ने उसे सच्चे विश्वास के साथ माना था केवल वे यह समझते थे कि वह परमेश्वर भी है। यदि उस इस्राएल के परमेश्वर को लोगों ने सच्ची भक्ति से प्रेम किया होता, और उसके नियमों से भी, तो वे उसके पुत्र से भी प्रेम करते। यीशु कि भलाई के प्रति उनका अंधापन और घृणा, यह दिखता है कि उनकी आराधना कितनी झूठी है। उन्हें अपने परमेश्वर को पहचान लेना चाहिए था जब वे उनके पास आया था।

परन्तु कुछ लोग थे जो उसे पहचानते थे। फसह का दूसरा हफ्ता आकर चला गया था। यीशु बैतनिय्याह के रास्ते अपने चेलों के साथ गया। यह जैतून के पहाड़ के पास बसा हुआ एक छोटा सा गाँव था। उन्होंने वहाँ रात बिताई। जब सूरज उगा, तब उन्होंने येरूशलेम की दुर्जेयी दीवारों को देखा। और जब सुबह हुई, यीशु वापस मंदिर कि ओर अपने चेलों को लेकर चला गया।

रास्ते में, उन्हें वही अंजीर का पेड़ मिला जिसे यीशु ने श्रापित कर दिया था। केवल अब, उसमें हरी पत्तियां आ गयी थीं। पूरा पेड़, जड़ से सबसे ऊंची टहनी तक पूरा सूख गया था। यह देखना कितना अचंबित था कि एक दिन पहले जो इतना उज्जवल और जीवित था, वह अगले चौबीस घंटे के भीतर ही पूर्ण रूप से मर गया!

उसके चेलों ने पुछा,”‘यह अंजीर का पेड़ एक दम से कैसे सूख गया?'”

तब पतरस ने याद करते हुए यीशु से कहा,“हे रब्बी, देख! जिस अंजीर के पेड़ को तूने शाप दिया था, वह सूख गया है!”

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया,
“‘परमेश्वर में विश्वास रखो।मैं तुमसे सत्य कहता हूँ: यदि कोई इस पहाड़ से यह कहे, ‘तू उखड़ कर समुद्र में जा गिर’ और उसके मन में किसी तरह का कोई संदेह न हो बल्कि विश्वास हो कि जैसा उसने कहा है, वैसा ही हो जायेगा तो उसके लिये वैसा ही होगा। इसीलिये मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम प्रार्थना में जो कुछ माँगोगे, विश्वास करो वह तुम्हें मिल गया है, वह तुम्हारा हो गया है। और जब कभी तुम प्रार्थना करते खड़े होते हो तो यदि तुम्हें किसी से कोई शिकायत है तो उसे क्षमा कर दो ताकि स्वर्ग में स्थित तुम्हारा परम पिता तुम्हारे पापों के लिए तुम्हें भी क्षमा कर दे।”” —मत्ती २१:२-२२ और मरकुस ११:२२-२६

यीशु के अपने चेलों के साथ बात करने का ढंग और भीड़ के साथ बात करने के ढंग में अंतर देखिये। यीशु को उनके ह्रदयों कि बातों को समझने के लिए आत्मा के द्वारा शक्ति मिली। उसके चेले उसके पीछे विश्वास के साथ चल रहे थे। वे वफादार थे। परन्तु उन्हें और विश्वास कि आवश्यकता थी। वे परमेश्वर को संसार कि स्थितियों को बदलते हुए देखेंगे। महासागर दूर से कितना चमकदार दिख रहा होगा। उनके स्वामी ने उनसे कहा कि वे विश्वास के साथ उस विशाल पहाड़ को पानी में जाने का आदेश दे।

परमेश्वर के लिए उस पर विश्वास करना कितना उल्लेखनीय है। उसे अपने बच्चों के साथ प्रेम का सम्बन्ध चाहिए जब वे उसके पास सच्चे विश्वास के साथ आते हैं। विश्वास और किसी भी चीज़ से बहुत बहुमूल्य है क्यूंकि इसके द्वारा हम अपने परमेश्वर के साथ बांध जाते हैं। परमेश्वर अपने बच्चों से ह्रदय की नज़दीकी और विश्वास को चाहता है। वह चाहता है कि वे पूरे दिल से यह विश्वास करें कि यीशु ही सबसे आवश्यक है! ऐसे प्रेम और विश्वास के स्थापित होने से परमेश्वर के बच्चे उसकी इच्छा में और गहराइ में उतरेंगे। यदि उनकी बिनती परमेश्वर कि ओर से है तो पवित्र आत्मा उन्हें आश्वासन देगा, और जब परमेश्वर उन्हें स्पष्ट कर देगा कि वे सही हैं तो वे यह पूर्ण रूप से विश्वास कर सकते हैं कि परमेश्वर उनकी प्रार्थना का आदर करेगा। कभी कभी प्रार्थना में समय लगता है। कभी कभी उसकी अगवाई के लिए ह्रदय को शांत करना पड़ता है और पूरे दिल से उसे खोजना पड़ता है। परन्तु जिस ख़ूबसूरत प्रक्रिया में चेले यीशु के पीछे गहराई से चले, उस प्रक्रिया से परमेश्वर अपनी इच्छा को संसार में प्रकट करता है! जो कुछ उसके बच्चे विश्वास के साथ मांगे वह उसे उन्हें देने के लिए कुछ भी करेगा!

एक चिंता कि बात यह है कि वह सब मांगते हैं जो उसकी इच्छा के विरुद्ध है। परमेश्वर वही देना चाहता है जो सच्ची आशीष लाता है, और ना कि वह जो अच्छा नहीं है। यह अधिकतर समय सच होता है कि जो मांगते हैं ऐसा लगता है कि परमेश्वर उनकी नहीं सुनता। परन्तु वह हमेशा सुनता है। कभी तो वह “हाँ” बोलता है और कभी “ना।” और कभी तो वह इंतज़ार करने को कहता है। अपने प्रेम और विश्वास में और बढ़ने का मतलब है कि यीशु में उसकी सुनना और उसकी मर्ज़ी को जानने के लिए रुके रहना।

बहुत सालों बाद, पतरस अपनी कलीसिया को अपने विश्वास के विषय में लिखेगा। उन में से एक यह है:

“हमारे प्रभु यीशु मसीह का परम पिता परमेश्वर धन्य हो। मरे हुओं में से यीशु मसीह के पुनरुत्थान के द्वारा उसकी अपार करुणा में एक सजीव आशा पा लेने कि लिए उसने हमें नया जन्म दिया है।ताकि तुम तुम्हारे लिए स्वर्ग में सुरक्षित रूप से रखे हुए अजर-अमर दोष रहित अविनाशी उत्तराधिकार को पा लो। जो विश्वास से सुरक्षित है, उन्हें वह उद्धार जो समय के अंतिम छोर पर प्रकट होने को है, प्राप्त हो। इस पर तुम बहुत प्रसन्न हो। यद्यपि अब तुमको थोड़े समय के लिए तरह तरह की परीक्षाओं में पड़कर दुखी होना बहुत आवश्यक है।  ताकि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास जो आग में परखे हुए सोने से भी अधिक मूल्यवान है, उसे जब यीशु मसीह प्रकट होगा तब परमेश्वर से प्रशंसा, महिमा और आदर प्राप्त हो।” -१पतरस १:३-७

यह बहुत दिलचस्प है कि इसी पाठ में, यीशु ने क्षमा करने कि बताई। यदि परमेश्वर का बच्चा अपने पिता के पास आना चाहता है, उन्हें दूसरों के प्रति घृणा और प्रतिशोध को छोड़ना होगा। परमेश्वर हमारे पापों कि क्षमा को दूसरों कि क्षमा और अनुग्रह जो हम दूसरों को दिखाते हैं, उससे बांध देता है। हमें अपने ह्रदय को दूसरों के प्रति जांचना है कि हमारे अंदर कोई द्वेष या कठोरता तो नहीं! हमारे परमेश्वर के साथ के साथ के रिश्ते कि खातिर, हमें इन बातों को पूर्णरूप से छोड़ देना चाहिए! पतरस ने क्षमा के विषय में कुछ इस तरह लिखा जो हमने इससे पहले पढ़ा:

“अब देखो जब तुमने सत्य का पालन करते हुए, सच्चे भाईचारे के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए अपने आत्मा को पवित्र कर लिया है…इसलिए सभी बुराइयों, छल-छद्मों, पाखण्ड तथा वैर-विरोधों और परस्पर दोष लगाने से बचे रहो।नवजात बच्चों के समान शुद्ध आध्यात्मिक दूध के लिए लालायित रहो ताकि उससे तुम्हारा विकास और उद्धार हो।” —पतरस १:२२; २:१-२

सूखा हुआ अंजीर का पेड़ इस्राएल देश के लिए उस मृत्यु का उदहारण है जो आने वाली है, परन्तु नया जीवन जो यीशु के कार्य के द्वारा आएगा, वही संसार के लिए उद्धार लाएगा!

कहानी १००: मिलापवाले तम्बू का पर्व: अंतिम दिन

यूहन्ना ७:५३-८:११

इस्राएल के देश का यह तनाव और सोच विचार से भरा जश्न का अंतिम दिन था। क्या वे इस बात को स्वीकारते कि यीशु के पास परमेश्वर के द्वारा दी गयी सामर्थ और अधिकार है, जैसा कि वह कहता था? क्या वे उसे मसीह के रूप में स्वीकार करेंगे? सभी कि दिमाग में इन बातों को लेकर चिंता थी जब वे वापस अपने घरों को लौट रहे थे। इस बीच, यीशु जैतून के पहाड़ी पर जाकर विश्राम करने लगा। यह उस पहाड़ी पर था जिस पर येरूशलेम टिका हुआ था।

अलख सवेरे वह फिर मन्दिर में गया। सभी लोग उसके पास आये। यीशु बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा। उन लोगों कीकल्पना कीजिये जो यीशु को सुनने के लिए वहाँ जमा हुए। यीशु से उन वचनों को सुनना जो स्वयं परमेश्वर कह रहे थे। तभी यहूदी धर्मशास्त्रि और फ़रीसी लोग व्यभिचार के अपराध में एक स्त्री को वहाँ पकड़ लाये। और उसे लोगों के सामने खड़ा कर दिया। और यीशु से बोले,“हे गुरु, यह स्त्री व्यभिचार करते रंगे हाथों पकड़ी गयी है। मूसा की व्यवस्था हमें आज्ञा देता है कि ऐसी स्त्री को पत्थर मारने चाहियें। अब बता तेरा क्या कहना है?”

यीशु को जाँचने के लिये यह पूछ रहे थे ताकि उन्हें कोई ऐसा बहाना मिल जाये जिससे उसके विरुद्ध कोई अभियोग लगाया जा सके। वे जानते थे यीशु चुंगी लेने वाले और पापियों के साथ उठता बैठता है। यह स्त्री पापिन थी। अब यीशु क्या करेगा? क्या वह साधारण रूप से दया दिखाएगा या परमेश्वर की व्यवस्था का आदर करेगा? लेकिन ये लोग यह नहीं समझ सके कि परमेश्वर की व्यवस्था और यीशु की करुणा दोनों एक ही आत्मा के द्वारा हैं। वे उस पर दोष लगाना चाहते थे। कुछ सवाल हम भी पूछ सकते हैं: यदि इस स्त्री ने व्यभिचार किया था तो वह आदमी कहाँ था जिसके साथ उसने वह पाप किया? वो भी वहाँ क्यूँ नहीं था और उन्ही दोषों को सहता? और उस स्त्री को सबके सामने लाकर दोषी क्यूँ ठहराया गया?

एक बार फिर, उनके प्रवंचना काम नहीं आएंगे।

इस समय तक, यीशु उठ खड़ा हुआ। यीशु नीचे झुका और अपनी उँगली से धरती पर लिखने लगा। क्योंकि वे पूछते ही जा रहे थे।

यीशु सीधा तन कर खड़ा हो गया और उनसे बोला,“तुम में से जो पापी नहीं है वही सबसे पहले इस औरत को पत्थर मारे।” और वह फिर झुककर धरती पर लिखने लगा। भीड़ यह सब कुछ देख रही थी। वह स्त्री शायद दर और शर्म के कारण वहाँ खड़ी हुई थी। धार्मिक अगुवे भी गुस्से से यीशु को देखते रहे जब वह नीचे झुक कर कुछ लिख रहा था। एक एक कर के यहूदी अगुवे वहाँ से चले गए।

आपको क्या लगता है कि यीशु ने क्या लिखा होगा? बाइबिल हमें नहीं बताती, लेकिन इन धार्मिक अगुवों पर इसका गहरा असर हुआ और वे यीशु को फसाकर उस स्त्री को मृत्युदंड देना चाहते थे। क्या यीशु ने उनके ही पापों के नाम लिखें होंगे? उनकी अपनी ही कमियां उन्हें याद आने लगे थे? दोषी तेरे जाने का दर कहीं उन्हें तो नहीं सता रहा था? उस पल में जो कुछ भी हुआ, वह बहुत शक्तिशाली था।सबसे पहले बूढ़े लोग और फिर और भी एक-एक करके वहाँ से खिसकने लगे। सबके जाने यीशु खड़ा हुआ और उस स्त्री से बोला,“हे स्त्री, वे सब कहाँ गये? क्या तुम्हें किसी ने दोषी नहीं ठहराया?”

स्त्री बोली,“हे, महोदय! किसी ने नहीं।”

यीशु ने कहा,“’मैं भी तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा। जाओ और अब फिर कभी पाप मत करना।’”

एक बार फिर यीशु उपदेश देने लगे। इस बार, वह मंदिर के भंडार में था। वहाँ तेरह संग्रह बक्से जो तुरही के आकार में थे, लोगों के दान प्राप्त करने के लिए रखे थे। ख़ज़ाने को, दोनों यहूदी पुरुषों और महिलाओं को इकट्ठा करने के लिए अनुमति दी गई थी। यीशु दोनों पुरुषों और महिलाओं के लिए उपदेश दे रहा था, क्यूंकि वहाँ प्रचार करने कि अनुमति थी।

भंडार उस कमरे के बगल के कमरे में रखा हुआ था जहां यहूदी अगुवे मिलते थे। वह यहूदियों के धर्म का सरकारी सलहकार था। यह बड़े बड़े धार्मिक यहूदी अगुवों के द्वारा चलाया जाने वाला समूह था जो यहूदी देश के सब निर्णय लेते थे। उन्होंने यीशु को हटा देने का फैसला और फिर भी वह उनके बीच खड़े होकर परमेश्वर का वचन सुना रहा था। जब आप इसे पड़ते हैं, उसके साहस के विषय में सोचिये जो उसने उनके सामने दिखाया।

यीशु ने कहा,

“’मैं जगत का प्रकाश हूँ। जो मेरे पीछे चलेगा कभी अँधेरे में नहीं रहेगा। बल्कि उसे उस प्रकाश की प्राप्ति होगी जो जीवन देता है।’”

यह कितनी ख़ूबसूरत बात है! यीशु ज्योति है! वह परमेश्वर कि ज्योति को दिखता है। जो कोई यीशु कि ज्योति में चलता है वह ना केवल उसकी ज्योति में होता है बल्कि उसे उसकी ज्योति दी जाएगी! वे इस जीवन कि ज्योति कि अपने अंदर चलेंगे। इसे सुनकर कितनों के ह्रदय में कार्य हुआ होगा। उनके अपने मसीहा इस अनमोल उपहार को दे रहे थे! लेकिन इस उल्लेखनीय, उज्जवल आशा को सुनने के लिए सब के कान नहीं लगे थे।

फरीसी उसके विरुद्ध में बहस करने लगे। यीशु अपने ही अधिकार को लेकर कैसे गवाही दे सकता था? यहूदी केवल एक व्यक्ति दुसरे के प्रति गवाही दे सकता था। पुरुष अपने ही गवाह नहीं बन सकते थे! लेकिन यीशु परमेश्वर था, और उसी ने नियम को दिया था! वह उन नियमों से बंधा हुआ नहीं था। इसलिए वह तुरंत उन्हें जवाब देकर उन्हें उस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए सफाई देता था। यीशु एक साधारण मनुष्य नहीं था। वह परमेष्वर का पुत्र र्थ और इसलिए वह व्यवस्था से ऊपर था जिसके आधीन में फरीसियों को रहना था।

उत्तर में यीशु ने उनसे कहा,“’यदि मैं अपनी साक्षी स्वयं अपनी तरफ से दे रहा हूँ तो भी मेरी साक्षी उचित है क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। किन्तु तुम लोग यह नहीं जानते कि मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। तुम लोग इंसानी सिद्धान्तों पर न्याय करते हो, मैं किसी का न्याय नहीं करता।'”

पहले यीशु ने इस बात को लेकर बहस की कि अपने स्वयं कि गवाही देने का अधिकार था क्यूँ वह यह पूर्ण रूप से समझता था कि उसका अस्तित्व महाकाव्य वास्तविकता कहाँ से है। कोई भी मनुष्य यीशु की महानता और भव्यता के विषय में नहीं बता सकता। उनके विचार बहुत ही छोटे थे। परन्तु यीशु परमेश्वर कि दृष्टी से देखता था जो युगानुयुग के लिए थी। फरीसी सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विरुद्ध एक बहुत ही ज़बरदस्त अज्ञानता, भ्रम और अकल्पनीय हेकड़ी को प्रदर्शित कर रहे थे।

“‘किन्तु यदि मैं न्याय करूँ भी तो मेरा न्याय उचित होगा। क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि परम पिता,जिसने मुझे भेजा है वह और मैं मिलकर न्याय करते हैं। तुम्हारे विधान में लिखा है कि दो व्यक्तियों की साक्षी न्याय संगत है। मैं अपनी साक्षी स्वयं देता हूँ और परम पिता भी, जिसने मुझे भेजा है, मेरी ओर से साक्षी देता है।’”

यीशु को किसी और कि साक्षी कि ज़रुरत नहीं थी कि वे इस बात कि गवाही दें कि वह परमेश्वर का पुत्र है। परमेश्वर पिता ने स्वयं इसकी गवाही दे दी थी। किसी और ऊंचे अधिकारी के पास जाने कि आवश्यकता नहीं थी। इस शृष्टि का कर्ता और यीशु एक ही थे।

धार्मिक अगुवे फिर से उस सामर्थ और महिमा जो उनके समक्ष में थी, नहीं ले पाये। जो कुछ भी यीशु करते थे, वे परमेश्वर पिता के साथ खड़े होते थे जो स्वर्ग में विराजमान है और पूरे सामर्थ और बल के साथ राज कर रहा है। यीशु ने परमेश्वर कि इच्छा को हर पल और हर वचन में दर्शाया। यहूदी पीढ़ी को यह कितना विशाल तोहफा मिला जो सोच से बाहर है! लेकिन अगले ही प्रश्न से उन्होंने यह साबित किया कि वे कितने कठोर थे। उन्होंने उससे पुछा,

“तेरा पिता कहाँ है?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’न तो तुम मुझे जानते हो, और न मेरे पिता को। यदि तुम मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जान लेते।’”

अच्छा होता कि फरीसी और अन्य धार्मिक अगुवे इस विश्वास में अपने कदम को उठाते जो उनके लिए ही था! वे जान जाते कि यीशु परमेश्वर पिता को उन के लिए दर्शा रहा था! पिता को जानने का मतलब था बेटे को जानना और बेटे को इंकार करने का मतलब था पिता को इंकार करना। फरीसियों ने काय अपनी गलती को माना? क्या वे परमेश्वर को अनुमति देते कि वह उन्हें बदल दे?

यीशु के इतने साहसी घोषणाओं के बाद भी जो उसने अपने दुश्मनो के सामने ही किये कि वो और परमेश्वर एक ही हैं, उसे कोई नहीं पकड़ पाया। उसका समय अभी नहीं आया था।