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कहानी १८२: तट के किनारे सैर 

Sea of Galilee in Israel

युहन्ना २१:१५-२५

चेले नाश्ता खाने के बाद उठकर तट के किनारे चलने लगे। परमेश्वर ने पतरस से कहा, ‘शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तुम सच में मुझे इन से अधिक प्यार करते हो ?”

इसका क्या मतलब था? और उसने ऐसा क्यों पूछा? खैर, पतरस को हाल ही में एक भारी विफलता का सामना करना पड़ा था। उसने सार्वजनिक रूप में प्रभु के साथ विश्वासघात किया था। अब प्रभु पतरस को एक सार्वजनिक तरीके से बहाल करने जा रहे थे।

यीशु की गिरफ्तारी की रात पर जब यीशु आगे होने वाली बातों के बारे में समझा रहे थे, अन्य सभी चेले शांत हो गए। वह केवल पतरस ही था जिसने बड़े साहस से यह घोषणा की कि वह प्रभु का इनकार कभी नहीं करेगा। उसके इस वफादार संकल्प के घोषणा के बाद ही, अन्य चेलों को ऐसा करने के लिए साहस आया। पर पतरस के साड़ी बहादुरी और दृढ़ संकल्प के बावजूद, उसकी अपनी मानव शक्ति पर्याप्त नहीं थी। महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण घंटे में, जब वफादारी सबसे पवित्र गुण था, वह कमजोर पड़ गया और ऐसा करने में विफल हुआ। और मामला इस बात से बदतर हो जाता है कि वह एक रोमन सैनिक के चेहरे में और न मौत की धमकी पर अस्थिर हो गया। उसने ऐसा इनकार एक छोटी गुलाम लड़की के पूछताछ में ही कर दिया। और यह हर कोई जानता था।

यीशु पहले ही समझ गए थे कि क्या होने जा रहा था और उसे चेतावनी दी, लेकिन पतरस इसे सुनना सहन नहीं कर सका। उसने इस बात का विश्वास करने से इनकार किया कि वह ऐसी बात कर सकता है। लेकिन यीशु जानता था कि शैतान, जो परमेश्वर का शक्तिशाली दुश्मन था, वही चालबाज़ साँप जिसने आदम और हव्वा की परीक्षा ली थी, पतरस के पीछे जाने की अनुमति माँगी थी, और परमेश्वर ने “हाँ” भरी थी। स्वर्गीय पिता अपने दुश्मन के नापाक इरादों का उपयोग करने के लिए जा रहा था ताकि वो अपने सेवक की परीक्षा ले सके जो उसके बेटे यीशु के लिए समर्पित था। पतरस को अपने स्वयं की प्रचुरता और गर्व से छुटकारा पाने के लिए एक महान तोड़ने की प्रक्रिया से जाना था।

पतरस को यह कुछ भी समझ में नहीं आया। वह इस भ्रम में था कि वह अपने स्वयं के बल से सब कुछ कर सकता है। लेकिन यह उस आदमी के लिए अतिरिक्त नहीं था जिसे ‘कलीसिया की चट्टान’ बनना था। अगर उसे मार्गदर्शन करना था, तो उसे यह सीखना होगा कि  वह कितना कमजोर है ताकि वह परमप्रधान परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर हो सके।

यह दर्दनाक सबक था,  पर रंग भी लाया। पतरस अपने विश्वासघात के बाद उन भयानक दिनों में खुद के अंत तक आ गया था। यीशु ने अपने जी उठने के बाद अपने को पहले पतरस को प्रकट किया। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उनके बीच क्या वार्तालाप हुई, लेकिन हम केवल कल्पना कर सकते है कि पतरस ने अपने स्वामी की ओर  कितना दु: ख और पश्चाताप प्रकट किया होगा। उन्होंने प्रभु और सेवक जैसे कितना करीबी और पवित्र क्षण गुज़ारा होगा।

अब जैसे वो गलील के सागर के तट पर चल रहे थे, यीशु पतरस से उसके प्रति अपने प्यार की पुन: पुष्टि कर रहे थे। इस बार, यह वार्तालाप अन्य चेलों के सामने हो रहा था और वो यह सब सुन सकते थे। पतरस वास्तव में परमेश्वर का चुन हुआ अगुआ होने को था, लेकिन पतरस के इनकार की कहानी उसके लिए उनके सम्मान को क्षतिग्रस्त कर सकती थी। क्या वह अनुग्रह से गिर गया था? यीशु उसे सम्मान के साथ बहाल करने के लिए सुनिश्चित कर रहे थे।

फिर भी, इस सवाल ने पतरस को भेद होगा। ‘हाँ, प्रभु,’ उसने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस को यह विश्वास था कि यीशु जानता था। अपने महान असफलताओं के बावजूद, उसका प्यार वास्तव था।

यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरे मेमनों को खिलाओ’। पतरस को यीशु के लिए प्यार उसके लोगों की देखरेख करके दिखाना था। यीशु ने अपने आप को ‘भला चरवाहा’ के रूप में वर्णित किया था, और पतरस उनका सेवक था। प्रभु उसे अपनी सबसे क़ीमती संपत्ति को विश्वास समेत सौपने जा रहा था।

प्रभु ने फिर से पूछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?”

यह प्रश्न दो बार पूछने का क्या मतलब हो सकता है? ‘हाँ, प्रभु,’ पतरस ने कहा, ‘आप जानते हैं कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस अपने प्यार की सच्चाई का प्रमाण देने के लिए किसी वीर प्रदर्शन या वफादारी की घोषणा पर निर्भर नहीं करने जा रहा था। वो मसीह के बुध्धिमत्ता और ज्ञान पर निर्भर था। वह जानता था कि यीशु जानता था, क्योंकि पतरस को विश्वास था कि यीशु सब कुछ जानता है। यही सबसे मुख्य बात थी।

“मेरी भेड़ों की देखभाल करना, ‘यीशु ने कहा। उनके दूसरे अनुरोध के साथ, पतरस के कार्य का गहरा महत्व दिख रहा था। यह पतरस के लिए एक ऐसी भूमिका थी जो उसके खुद के लिए थी, और उसके चेलों को भी यह मालूम होना था, क्योंकि वे उसके साथ कलीसिया के निर्माण में शामिल होंगे। हालांकि यीशु ने नहीं कहा था, “यह सच है, तुम मुझे इन सब से ज्यादा प्यार करते हो,” उनका मतलब यही था। अगर उनका यह मतलब नहीं होता, तो वह पतरस के आगे ऐसा महत्वपूर्ण काम नहीं रखते। पतरस को अपनी स्वाभाविक प्रतिभा, बल या आकर्षण की वजह से इस कलीसिया का अगुआ नहीं बनाया गया था। उसे यीशु मसीह के प्रति समर्पण, प्यार और भक्ति की वजह से उन्नत किया गया था। यह एक सबसे जरूरी बात है।

एक बार फिर, यीशु ने पतरस से पुछा, “‘शमौन, यूहन्ना के बेटे, क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” तीसरी बार पतरस के लिए एक कड़वे डंक की तरह लगा होगा। यह उस खंडन की संख्या है जिसके बारे में यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वह कितनी बार येशु के महान पीड़ा के समय में उद्धारकर्ता का इनकार करेग। और फिर पतरस बोला, ‘हे प्रभु, आप को सब कुछ पता है। आपको पता है कि मैं आपसे प्यार करता हूँ’।पतरस के पास सिर्फ भरोसा था पर यीशु दिव्य था। वह हर झूठ से हर सच जानता था। वह जानता था कि पतरस उससे प्यार करता था।

यीशु ने कहा, ‘मेरी भेड़ों को चराओ। मैं तुम्हे सच बोलता हूँ, जब तुम छोटे थे, तो तुम अपने आप को तैयार करते थे और जहाँ चाहते उधर चले जाते, लेकिन जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो तू अपना हाथ बढाओगे, और कोई और तुम्हे कपड़े पहनाएगा और वहां ले जाएगा जहाँ तुम जाना नहीं चाहते हो’।

वाह। अब मसीह एक और भविष्यवाणी कर रहे थे। पतरस वास्तव में यीशु को प्यार करता था, और एक दिन मौत के मुंह में अपनी वफादारी दिखाएगा। हालांकि पतरस ने अपने प्रारंभिक वर्ष अपने ऊपर खर्च किये, उसके आगे का जीवन, मसीह के राज्य के लिए समर्पित होगा। अंत में, उसके हाथ क्रूस पर चढ़ाने के लिए फैला दिए जाएंगे। उसका जीवन यीशु के जीवन की तरह उसकी पीड़ा में भी होगा। और जैसे  यीशु अपने पिता को महिमा लाए, पतरस को भी मसीह के लिए महिमा लाना होगा। कलीसिया में अगुआ होने के नाते, पतरस के मौत की खबर दूर दूर तक पहुंचेगी। ऐसे निर्बाध और पूर्ण विश्वासयोग्यता को कौन समझा सकता था? उसके बलिदान की सीमा उसका येशु के प्रति प्यार का माप था, और यह उसके उद्धारकर्ता को आदर और प्रतिष्ठा लाएगी।

लेकिन यह कई दशकों के बाद होना था। अभी के लिए यीशु ने कहा, ‘ मेरे पीछे चलो’। कल्पना कीजिये कि आप अपने जीवन के अंत में यह जाने कि आप को क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। कल्पना कीजिये कि इसको जानना परमेश्वर की योजना का हिस्सा था, और उसके बावजूद भी उसके पीछे आपको चलना होगा। इसको पतरस के प्यार की गहराई के अलावा समझने का कोई रास्ता नहीं था। और पतरस इसी उच्च शिष्यत्व का भार उठाने को था।

लेकिन यह बातों पतरस के मन पर नहीं थी, जब उसने यह सुनी। इसके बजाय, उसने मुड़ कर युहन्ना को देखा। ‘हे प्रभु, क्या इस आदमी के बारे में?’ क्या युहन्ना भी दुःख सहेगा? युहन्ना तो यीशु के इतने करीबी था कि गिरफ्तारी की रात वो यीशु के सीने पर टिका हुआ था।जैसे यीशु चेलों को समझा रहे थे कि उनमे से कोई उसे पकड़वाएगा, पतरस को युहन्ना को पीछे टिकने को बोलना पड़ा ताकि वह प्रभु से पूछ सके कि वो गद्दार कौन है। यदि पतरस को पीड़ा सहने के लिए बुलाया गया था, तो युहन्ना को क्या होने जा रहा था?

यीशु ने कहा, ‘अगर मैं उसे अपने वापस आने तक जीवित चाहता हूँ, तो उससे तुम्हे क्या? तुम्हे मेरे पीछे चलना होगा’। यीशु पतरस को कह रहा था, ‘इससे तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है’! क्योंकि बात यह हैं कि  यीशु फिर वापस आएगा, और अगर परमेश्वर ने यह ठहराया कि युहन्ना इतने लंबे समय तक जीवित रहेगा, वो सर्वशक्तिमान ईश्वर का वो सही निर्णय होगा।

अब, क्योंकि यीशु ने यह कहा, अफवाहें फैलने लगी। लोग यह कहने लगे कि युहन्ना कभी नहीं मरेगा। लेकिन यीशु ने यह नहीं कहा था। वह पतरस को यह बता रहा था कि परमेश्वर के चुने हुओं का जीवन और मौत उस पर निर्भर है। पतरस को अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा करना था, न की परमेश्वर की योजना किसी और के जीवन से मापना!

एक दिन पतरस को येशु की तरह क्रूस पर टंगना था। बाइबिल इस बात का विवरण नहीं करती है कि कैसे पतरस ने अपना जीवन यीशु के लिए दे दिया। हम जानते हैं कि यह घटना इस भविष्वाणी के तीन दशकों के बाद हुई, और हम यह जानते हैं कि उसने रोम में एक क्रूस पर यीशु के लिए अपनी जान दे दी। युहन्ना के सुसमाचार लिखने के बाद ही यह घटना घट चुकी थी। जो भी शर्म और खेद पतरस ने अपने प्रभु का इनकार करके महसूस किया, उसके प्रभु सेवा और विनम्रता के जीवन से अभिभूत था।

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कहानी १८१: मछली पकड़ने की यात्रा

युहन्ना २१:१-१४

The Great Catch of Fish

प्रभु ने अपने चेलों से कहा था कि वह उन्हें गलील में मिलना चाहते हैं, तो चेले वहाँ यात्रा करके गए,और पतरस के पुराने शहर में समुन्दर के किनारे रहने लगे। पतरस, थोमा, नथानिएल , याकूब और युहन्ना, और अन्य दो चेलों सब साथ वहां थे। एक ऐसा क्षण आया जब  पतरस ने कुछ व्यस्त होने का फैसला किया। ‘मैं मछली पकड़ने के लिए जा रहा हूँ,’ उसने कहा। बाकी चेलों ने भी उत्साहित होकर कहा, ‘हम भी आ रहे हैं’।

चेले नौकाओं की और बढ़ने लगे और उन्होंने रात वहां पानी के ऊपर बिताई। स्याही जैसे काले आसमान की कल्पना कीजिये। क्या वहाँ करोरों उज्ज्वल चमकते सितारों थे? या वहाँ बादलों की एक गहरी चादर नीचे अंधेरे, आसपास की पहाड़ों पर मँडरा रही थी? कल्पना कीजिये उस मंद मंद हवा और पानी की आवाज़े को जो नौकाओं को धीरे धीरे झुला रहीं थी, मनो कोई लोरी सुना रही हो। मछली पकड़ने के लिए यह एक शांत रात थी। चेले कुछ भी पकड़ नहीं पाए। रात के लम्बे घंटे बड़ते गए। उन्होंने भोर की किरणों को पानी में चमकते देखा। अभी भी कोई मछली हाथ न आई थी। तब किसी ने देखा है कि वहाँ छोर पर एक आदमी खड़ा था। यह यीशु था, लेकिन चेलों ने उसे नहीं पहचाना।

‘दोस्तों!’, प्रभु ने आवाज़ लगाईं। ‘क्या तुमने अभी तक कोई मछली नहीं पकड़ी?’ यह बात सुबह सुबह के घंटों में सुनना कितना विचित्र था।

‘नहीं,’ उन्होंने जवाब दिया। यह कितनी निराशाजनक रात थी। उनके जीवन में सब कुछ एक बड़ी प्रतीक्षा की तरह लग रहा था। उस ‘उंडेलने’ की, जिसकी येशु बात कर रहे थे, वो कब होने को था? उन्हें कब तक इंतजार करना था? यीशु कहाँ थे?

तट पर आदमी ने कहा, “‘नाव के दाईं ओर पर अपने जाल फेंको और तुम्हे कुछ मछली मिलेगी’। अब यह वास्तव में एक अजीब बात कहने को थी। आखिरकार, इस आदमी को यह कैसे पता था कि नाव के दाहिनी ओर उन्हें मछली मिलेगी? और अगर मछली उस ओर थी, तो नाव के बाए हाथ की तरफ भी क्यूँ नहीं थी?

लेकिन चेलों ने उस आदमी की सलाह मानी और अपने जाल वहां फेंक  दिए। और ऐसा करने से, वे बहुत धन्य और आशीषित हुए। मछली की एक भारी संख्या पानी में तैर रही थी। जाल मछली से इतना भारी हो गया था कि उसे नाव में वापस ढोना मुश्किल हो गया।

यह कहानी युहन्ना के लिए कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी-  युहन्ना: वही चेला जो यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने पतरस की ओर देखा, जो उसका पुराना मछुआरा साथी था। क्या उसे भी याद था? अंत में युहन्ना ने कहा, ‘यह प्रभु है!’

जैसे ही पतरस ने यह सुना, वह जानता था कि यह सच था। और वो नाव का तट तक पहुँचने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर पाया। उसने अपना वस्त्र निकालकर, अपने कमर के चारों ओर बाँध लिया। और फिर वह बर्फीले पानी में कूद पड़ा!

बाकि चेले तट की ओर अपनी नावों में, अपने पीछे भरी जाल खींचते हुए आए। उन्हें ज्यादा दूर जाना नहीं था। वे तट से केवल सौ गज दूर थे।

जब तक वो पहुंचे, उन्होंने देखा कि एक कैम्प फायर की गंध हवा में थी। यीशु ने लकड़ी के कोयले से एक आग जलाई थी। कुछ मछली उस पर सिक रही थी और वहाँ कुछ रोटी भी थी। यीशु उनके लिए नाश्ता बना रहे थे। वहाँ उनके सामने यीशु थे, अपने पुनर्जीवित शरीर में, और वे रोज़ मर्राह का काम कर रहे थे। अपने दोस्तों के लिए खाना बनाना उनकी प्रतिष्ठा से नीचे नहीं था। अनंत काल के जीवन में भी, सेवा और काम का जीवन सम्माननीय है। यहां तक ​​कि खुद परमेश्वर के लिए भी। येशु ने क्या पौष्टिक, साधारण भोजन, वहां, समुद्र के तट पर प्रदान किया!

अब, हमें इस कहानी में एक बहुत दिलचस्प बात जाननी चाहिए। नए नियम के लेखकों ने इसे यूनानी भाषा में लिखा था।अक्सर, वे बहुत ही खास शब्दों का प्रयोग करते थे जिससे पाठकों को मूल, विशेष बात समझने में मदद मिलती थी।इस शब्द ‘लकड़ी का कोयला’ का इस्तेमाल इस कहानी के अलावा केवल नए नियम के एक अन्य समय में इस्तेमाल किया गया था। पहली बार इसका प्रयोग तब होता है जब पतरस, यीशु के परीक्षण के दौरान, आग से अपने को गरमा रहा था। इस लकड़ी के कोयले की बहुत तगड़ी बू थी, कि वह उस रात की हवा में भर गई होगी। यह वही गंध थी जो पतरस के फेफड़ों भरी होगी, जब उसने अपने प्रभु का इनकार किया था।

दूसरी और केवल यही एक और समय था जब यह शब्द का प्रयोग यहाँ, नए नियम के इस कहानी में होता है; जब यीशु ने अपने चेलों के साथ एक बार फिर से मुलाकात की। वही गंध पतरस के फेफड़ों में भरी, जब वो  मसीह के साथ समुद्र तट पर खड़ा हुआ बाकि चेलों के लिए इंतज़ार कर रहा था। क्या यीशु जानबूझकर यह दर्दनाक यादगार वापस ला रहे थे? क्यों?

जैसे नाव पहुँची, यीशु ने कहा, ‘तुमने जो मछली पकड़ी है, उसमे से कुछ ले आओ।’ पतरस नाव पर चढ़ कर समुद्र तट तक जाल घसीटते हुए लाया। उस जाल में १५३ मछली थी, लेकिन फिर भी, वो नहीं टूटी।

कल्पना कीजिए चेलों को कैसा लगा होगा जब वे नाव से बाहर उतरे होंगे। यह तीसरी बार था जब उन्होंने यीशु को उसके मौत के बाद देखा था। उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसको, उनके जीवनकाल के सबसे भयंकर, सार्वजनिक मौत द्वारा मारा गया था। तो भी, वह उनका अपना प्रभु और स्वामी था। अब वो उनके सामने जीवित था – वो यीशु जिसके पास एक ऐसा विचित्र अधिकार था जो प्रकृति के नियमों को भी लांघ गया।वो परमेश्वर था। उन्होंने उसके आने की कल्पना जीत और सत्ता के साथ की थी, लेकिन इस तरह नहीं! एक पवित्र परमेश्वर के सम्मुख कौन क्या कर सकता है, खासकर जब वह आपके लिए मछली पका रहें हो?

यीशु ने उन्हें कहा, ‘आओ, नाश्ता तैयार है।’ यीशु ने अभी भी अपना परिचय नहीं दिया। चेलों को यकीन था कि वो येशु ही है, पर पूछने का साहस किसी को नहीं था। इस दुनिया की सांसारिक, रोज़ मर्राह की बाते, अनन्त दायरे के उज्ज्वल महिमा के साथ टकरा रहीं थी। यह लगभग वैसे था जैसे जमीन उनके पैरों के नीचे खिसक रही थी और उन्हें अपना संतुलन लाना नहीं आ रहा था। कितने धैर्यपूर्वकता से  परमेश्वर ने यह भद्दापन संभाला। उसने रोटी ली और उनमें से प्रत्येक को दिया। फिर उसने मछली पकड़ाई।

इस्राएल का पूरा राष्ट्र उस सागर तट के छोटे से झुण्ड से मोहित हो जाता। लेकिन यीशु मानव जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए नहीं आए। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे। वह उन्हें बहाल और मजबूत बनाने के लिए और उन्हें तैयार करने के लिए आया था। एक दिन, उनमें से हर एक उसके साथ उसके राज्य में होगा। वे स्वर्ग में मसीह के साथ राज्य करेंगे। लेकिन इससे पहले कि यह शानदार समय आए, आगे एक कार्य था।

कहानी १६५: महायाजक के लिए एक अँधेरी रात 

मत्ति २६:५५-७५; मरकुस १४:४८-७२; लूका २२:५२-७१; यूहन्ना १८:१२-२७

roman soldier and prisoner

यीशु को अन्नास के घर से कैफा के घर ले जाया गया। पतरस अभी तक पीछे पीछे आ रहा था। जैसे ही यीशु को महासभा के उन सदस्यों के समक्ष लाया जा रहा था जो इतनी रात वहां आए, पतरस आँगन में चला गया। वह अधिकारियों के साथ, आग के पास, बैठ गया ताकि उसे परिणाम पता चले, और उसे अपने प्रभु के साथ खड़ा होने के लिए अवसर मिले।

जब यीशु को लाया गया, तो महासभा ने एक के बाद एक गवाह खड़े किये जो उसके विरुद्ध साक्षी दे। उनकी कहानियाँ झूठी थी, और उनके शब्द एक दूसरे के साथ सहमत नहीं थे। वे इतने असंगत थे कि उन्होंने एक के बाद एक रद्द कर दिया गया। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, एक व्यक्ति दोषी तब पाया जाता जब दो गवाह एक ही आरोप के साथ सामने आए। यह नहीं हो रहा था, तो वे और अधिक गवाह लाए। किसी की गवाही यीशु को मौत की सज़ा सुनाने के लायक नहीं थी, और इस्राएल के शासक इससे कम कुछ नहीं चाहते थे। यीशु को मरना था। अंत में, एक गवाह आगे आया और यह दोष लगाया कि यीशु ने यह घोषणा की थी कि वह परमेश्वर के मंदिर को नष्ट करेगा। प्रभु ने कहा था कि वह तीन दिनों में मानव हाथ के बिना इसका पुनर्निर्माण करेंगे। हम जानते है कि यीशु अपने शरीर के बारे में बात कर रहे थे। वह नष्ट होने जा रही थी क्यूंकि यीशु ने अपने को परमेश्वर के हाथों सुपुर्ट किया। लेकिन यीशु को तीन दिन में पूर्णतः, जीवते प्रभु के हाथों जिला लिया जाएगा! यीशु के खिलाफ उनकी झूठी गवाही के द्वेष में, उन्होंने उसी रात इस सच्चाई की घोषणा की थी, लेकिन उनकी आँखे देखते हुए भी बहुत अंधी थी!

सच्चाई में, इन आरोपों का वास्तव में कोई मायना नहीं था।यह शासक उसे मारने के लिए उत्सुक थे, और अगर इस आरोप से उनकी बात नहीं बनी, तो वे एक और की खोज करते। तो यीशु ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। उसके आसपास के वातावरण के चेहरे में उनकी शांत, आश्वस्त संकल्प की कल्पना कीजिये।

महायाजक व्यथित था। वह उठ खड़ा हुआ और यीशु के पास गया। “‘क्या तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं हैं? यह क्या है जो यह लोग तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहे है? ”

यीशु चुप रहे। महायाजक ने खिज में आकर कहा: “‘मैं तुम्हें जीवते परमेश्वर से शपथ खा कर पूछता हूँ कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम मसीह, परमेश्वर के पुत्र हो?'”एक बार फिर, यीशु के दुश्मनो ने उसके बारे में सच की घोषणा की –  ठीक उसी कार्यवाही में जिसमे उसे दोषित किया जा रहा था। इस बार, यीशु ने जवाब दिया:

“” आप खुद ही कह चुके हैं, फिर भी, मैं आपको बताता हूँ; इसके बाद आप मनुष्य के पुत्र को शक्ति के दाहिने हाथ पर बैठे देखेंगे, और आकाश के बादलों पर आते हुए देखेंगे।”

वाह! यीशु ने यह घोषित कर दिया कि वो न केवल मसीहा था। वह मनुष्य का पुत्र भी था! यह शब्द पुराने नियम से था। इसका मतलब यह था कि वह शक्ति और महिमा में दिव्य होने का दावा कर रहे थे! वो परमेश्वर के साथ एक होने का दावा कर रहे थे!

जब महायाजक ने यह सुना, तो वह जान गया कि उसके पास वो था जो वह चाहता था। उसने अपने हाथों से अपने याजकी पहनावे को पकड़ा और उसे फाड़ा। यह उसके चरम अपकार और यीशु के हर शब्द की पूर्ण निंदा की घोषणा थी। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से जो अपने महायाजकों के लिए वस्त्र ठहराया था, उसे कभी फाड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन परमेश्वर की इच्छा, जिसके लिए उसे थोड़ा सम्मान भी नहीं था, उसकी परेशानी का कारण नहीं थी।

लेकिन सच में, अब किस बात का मायना था? व्यवस्था जिस पवित्रता को  इन पापी याजकों के द्वारा पूरा नहीं कर सका, वो अब यीशु में पूरी तरह से सफल होने जा रही थी। अपने विद्रोह में, कैफा ने परमेश्वर का यंत्र बनके, कानून का अंत, मंदिर में आराधना, और उस वाचा को परिपूर्ण किया जो इस आदमी को सशक्त कर रही थी। अपने जीवन पर पकड़ रखने के लोभी रोष में, वह उसे खो रहा था।

“‘इसने परमेश्वर के विरुद्ध बोला है!'”उसने पागलों की तरह घोषणा की। “‘हमें आगे गवाहों की क्या ज़रूरत है? देखो, तुमने इसके शब्द सुने है; तुम क्या सोचते हो? ‘”महासभा के बाकी लोग बोल पड़े: “‘ वह मौत के योग्य है!”

फिर अपने शातिर गुस्से में, उन्होंने अपनी मुट्ठी से उसे पीटा, उसके चेहरे पर थूका, और थप्पड़ मार कर उसे अपमानित किया। और जब यह सब हो रहा था, प्रभु अपने सम्मानजनक ताकत में वहां खड़े रहे  – उस प्याले को सहन करते हुए जो उसके पिता ने उसे दिया था।

इस दयनीय अन्याय के बीच में, पतरस आग के पास अपने हाथ, आंगन में सेक रहा था। कैफा की एक नौकरानी ने उसके पास जाकर उसके चेहरे को बारीकी से देखा। “‘क्या तुम भी यीशु गलीली के साथ थे?'” और सब के सामने उसने घोषणा की: “मैं नहीं जानता तुम किस बारे में बात कर रही हो। ‘” फिर वह उठकर  प्रवेश द्वार से बरामदे पर चला गया। क्या वह बच निकलने का रास्ता तलाश रहा था? हालात उसके स्वामी के लिए अच्छा नहीं लग रहे थे। एक और नौकरानी पतरस के पास आई और उससे कहने लगी: “‘तुम भी उनमें से एक हो!’

पतरस ने कहा: “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता!’ उस दबाव की कल्पना कीजिये जो उसने महसूस किया होगा।

एक और घंटा बीत गया, और मसीह की कार्यवाही बदतर होती जा रही थी।  इन भयानक पुरुषों के जब उसके प्रभु को ठूस ठूस कर पीता होगा, तो पतरस का दिल कितना टूटा होगा। वह क्या कर सकता था? वह इसका हल निकालने के लिए क्या कर सकता था? वह अब अपनी वफादारी को कैसे दिखा सकता था? हजारों विचार उसके दिमाग में चले होंगे, लेकिन मानो उसे लकुआ मार गया हो। दासों में से एक ने पतरस को देखा और कहा: “‘निश्चित रूप से आप भी उनमें से एक हैं क्यूंकि आप एक गलीली है।” यह दास यीशु की गिरफ्तारी के लिए बगीचे में मौजूद था। जिसका कान पतरस ने काटा था, यह उसका चचेरा भाई था, और उसे यकीन था कि यह इसी आदमी ने किया था!

पतरस कसम और श्राप के शब्द, झूठे गुस्से के साथ बोलने लगा – ठीक उसी प्रकार जब किसी को एक झूठ में पकड़ा जाता है। “‘मैं उस आदमी को नहीं जानता जिसके बारे में तुम बात कर रहे हो!'” तुरंत, एक मुर्गा ने बांग दिया। प्रभु ने भी इसे अच्छी तरह से सुना, और अपने अराजक कार्यवाही के बीच में पतरस की ओर देखा। पतरस को यीशु की बात याद आई जो उन्होंने बस कुछ घंटे पहले ही ऊपरी कक्ष में बोली थी। “‘मुर्गा कौवे से पहले, तुम तीन बार मेरा इनकार करोगे।” सबसे खराब विफलता सच हो गई थी। पतरस उठकर बाहर चला गया और फूट फूट कर रोने लगा।

धार्मिक शासक अपने रोष में आगे बड़ते गए। किसी ने यीशु  के आंखों के चारों ओर एक पट्टी बाँधी। तब उन्होंने प्रभु को पीटा और उसे थप्पड़ मारा, और कहा:  “‘भविष्यवाणी कर, तू तो मसीह है, तो बता किसने तुझे मारा?'”

उनके असीम नफरत और शातिर दुष्टता पर ख़ुशी की कल्पना कीजिये। आखिरकार, उनके पास इस लोकप्रिय युवा शिक्षक के प्रति सालों के असंतोष और नफरत व्यक्त करने की शक्ति मिली – और वे अपनी घृणा में इतने एकजुट थे कि किसी को यह काम में शर्म नहीं आई। और जैसे वो उस परमेश्वर की निंदा कर रहे थे जिस पर वो परमेश्वर की निंदा का दोष लगा रहे थे – परमेश्वर वहां शांत बल में खड़े रहे, अपने पिता की इच्छा का आदर करते हुए और उस प्याले को पूर्णता से पीते हुए।

कहानी १६२: गतसमनी का बगीचा-समर्पण की पीड़ा

मत्ती २६ ३०-४६, मरकुस १४:२६-४२, लूका २२:३९-४६, यूहन्ना १८:१

Basilica Our Lady of the Rosary

जब यीशु और उसके चेले फसह मना रहे थे, उसने उन्हें परमेश्वर कि योजना के रहस्य को  उनके आगे स्पष्ट रूप से दिखाया। अभी और भी प्रकाशन आने हैं। ऊपरी कमरे में मिले उपदेशों के बाद, यीशु ने पिता से अपने लिए, अपने चेलों के लिए और उन सभी के लिए जो उस पर विश्वास करेंगे। वे सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रेम और एकता में बंधे हुए थे। उस धन्य रात को यीशु ने जो कुछ अपने चेलों को सिखाया था उसे समझने के लिए उन्हें पूरा जीवन लग जाएगा। परन्तु अब समय था कि उस पर अमल करें। यीशु के आगे अभी एक अंतिम विजय थी और उसे पूरा करने के लिए उसने आगे कदम बढ़ा लिया था।

फसह के बाद उसके चेलों के साथ उसने एक अंतिम भजन गाया। फिर वे जैतून के पहाड़ पर चले गए। चेलों को नहीं पता था कि आगे क्या होने जा रहा है। जब वे जा रहे थे यीशु उन्हें सावधान कर रहा था। उसने जकर्याह नबी (१३:७) से कहा:
“’तलवार, गड़ेरिये पर चाट कर! मेरे मित्र को मार! गड़ेरिये पर प्रहार करो और भेड़ें भाग खड़ी होंगी और मैं उन छोटों को दण्ड दूँगा। पर फिर से जी उठने के बाद मैं तुमसे पहले ही गलील चला जाऊँगा।’”

आपने देखा कि यीशु को कितना आत्मविश्वास था? इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह फिर से जी उठेगा, और वह चेलों को आने वाली बातों के लिए तैयार कर रहा था। परन्तु पतरस को केवल यही सुनाई दे रहा था कि यीशु अपने परमेश्वर को छोड़ देगा। उसने कहा,“चाहे सब तुझ में से विश्वास खो दें किन्तु मैं कभी नहीं खोऊँगा।”  मत्ती २६:३३

पतरस को अपने आत्मविश्वास पर पूरा भरोसा था जब कि परमेश्वर के पुत्र ने उसे और कुछ बताया था!  यीशु ने उससे कहा,“मैं तुझ में सत्य कहता हूँ आज इसी रात मुर्गे के बाँग देने से पहले तू तीन बार मुझे नकार चुकेगा।” यीशु समझ गया था कि इस मनुष्य के भीतर में क्या है। वह अपने चेले कि कमज़ोरी को समझ गया था। उसने अपने अनुग्रह के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था। उसकी एक ही चिंता थी कि वह उन्हें चेतावनी दे। आने वाले दिन दहशत भरे थे, परन्तु इन सब के बीच, वे यह याद कर पाएंगे की यीशु यह सब बातें पहले से जानता था। यदि वे विश्वास को चुनते हैं, तो वे यह समझ पाएंगे कि सब कुछ परमेश्वर कि योजना के अनुसार हो रहा था।

तब पतरस ने उससे कहा,“यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े तो भी तुझे मैं कभी नहीं नकारूँगा।” बाकी सब शिष्यों ने भी वही कहा।

फिर यीशु उनके साथ उस स्थान पर आया जो गतसमने कहलाता था। और उसने अपने शिष्यों से कहा,“जब तक मैं वहाँ जाऊँ और प्रार्थना करूँ, तुम यहीं बैठो।” फिर यीशु पतरस और जब्दी के दो बेटों को अपने साथ ले गया। फिर उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत दुःखी है, जैसे मेरे प्राण निकल जायेंगे। तुम मेरे साथ यहीं ठहरो और सावधान रहो।” परमेश्वर का पुत्र होने के नाते उसे अपने पिता कि योजना पर पूरा भरोसा था। परन्तु एक मनुष्य होते हुए उसे अपने दोस्तों कि आवश्यकता थी।

फिर थोड़ा आगे बढ़ने के बाद वह धरती पर झुक कर प्रार्थना करने लगा। उसने कहा,“हे मेरे परम पिता यदि हो सके तो यातना का यह प्याला मुझसे टल जाये। फिर भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं बल्कि जैसा तू चाहता है वैसा ही कर।”

स्वर्ग से एक दूत आया और उसने यीशु को सामर्थ दी। यीशु ने, परमेश्वर का क्रोध जो इंसान के पापों के कारण था, अकेला ही सहा। हमारे पापों को क्रूस तक ले जाने के लिए, उसने परमेश्वर कि सामर्थ का सहारा नहीं लिया। उसने परमेश्वर पिता के आगे पूरी आज्ञता में उसे पूरा किया। यह वो आज्ञाकारिता थी जो कोई भी इंसान नहीं कर सकता था। वे अपने पापों के बोझ के नीचे दब जाते। वह जो योग्य था और पूर्ण रूप से पवित्र था, केवल वही पाप और मृत्यु पर जय पा सकता था। उसके महान प्रेम के कारण, वह ऐसा करने में सक्षम था।

यीशु इतना ज़यादा तनाव में था कि उसका शरीर भी उसे सहन नहीं कर पाया। जब वह उस पीड़ा में प्रार्थना कर रहा था, उसका पसीना लहू कि बूँदें बनकर बह रहा था। जब वह अपने पिता से प्रार्थना कर रहा था वे धरती पर गिर रहे थे।

फिर वह अपने शिष्यों के पास गया और उन्हें सोता पाया। वह पतरस से बोला,“सो तुम लोग मेरे साथ एक घड़ी भी नहीं जाग सके? जगते रहो और प्रार्थना करो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो। तुम्हारा मन तो वही करना चाहता है जो उचित है किन्तु, तुम्हारा शरीर दुर्बल है।”

अपने दुःख के बीच में, यीशु ने कितने विनम्रता और समझ के साथ अपने चेलों पर दया दिखाई। एक बार फिर उसने जाकर प्रार्थना की और कहा,“हे मेरे परम पिता, यदि यातना का यह प्याला मेरे पिये बिना टल नहीं सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।” परन्तु परमेश्वर के क्रोध के प्याले को केवल यीशु ही अपने बलिदान के द्वारा संतुष्ट कर सकता था। तब वह आया और उन्हें फिर सोते पाया। वे अपनी आँखें खोले नहीं रख सके। वे नहीं जानते थे कि वे यीशु को अपनी दूसरी असफलता के लिए क्या बोलें।

सो वह उन्हें छोड़कर फिर गया और तीसरी बार भी पहले की तरह उन ही शब्दों में प्रार्थना की। परन्तु और कोई रास्ता नहीं था। इस श्राप कि समस्या का समाधान केवल उसका प्राण था। यदि वह अपने जीवन को बलिदान नहीं करता, तो और कोई भी नहीं कर पाता। सब कुछ नाश हो जाता। केवल वही सबको बंधन से छुड़ा सकता था। और इसलिए उसने अपने पिता कि इच्छा को स्वीकार किया।

हमारे लिए यह समझ बहुत कठिन है कि यीशु ने “हाँ” किसके लिए बोला होगा। उसका शरीर ऐसी कष्टदायी पीड़ा से गुज़रेगा जो कभी किसी मनुष्य ने ना सहा होगा। वह पाप और म्रत्यु के बोझ को उठाएगा क्यूंकि उसने परमेश्वर के क्रोध को अपने ऊपर ले लिया था। उस कष्टदायी पीड़ा को यीशु क्रूस पर तब चढ़ाए रखेगा जब तक वह उसकी पूरी कीमत नहीं। जो हमारे ऊपर अनतकाल तक के लिए आता यीशु ने एक ही दिन में समाप्त कर दिया। हम युगानुयुग तक उसकी उपासना करते रहेंगे उस कीमत के लिए जो उसने हमारे लिए चुकाई है।

कहानी १५६: विश्वासघात और इंकार 

मत्ती २६:२१-२४, मरकुस १४:१८-२१, लूका २२:२१-३४, यूहन्ना १३:१८-३८

Ultima cena

यीशु और उसके चेले फसह का भोज कर रहे थे। यीशु जानता था कि यह उसका अपने चेलों के साथ अंतिम भिज होगा। उन्होंने उसके साथ भीड़ में रहकर परिश्रम किया और अपने घरों को छोड़ कर पूरी भक्ति के साथ उसकी सेवा में लगे रहे। और फिर यीशु जानता था उनमें से एक है जो उसके साथ विश्वासघात करेगा और आगे भी करेगा। सो उसने अपने चेलों को उस आशीष के विषय में बताया जो उन्हें एक दुसरे के पाँव धोने से मिलेगी वहीं उसने उन्हें उस श्राप के बारे में बताय जो उनमें से एक को मिलेगा:

“‘मैं उन्हें जानता हूँ जिन्हें मैंने चुना है। किन्तु मैंने उसे इसलिये चुना है ताकि शास्त्र का यह वचन सत्य हो:
“वही जिसने मेरी रोटी खायी मेरे विरोध में हो गया।”
“‘अब यह घटित होने से पहले ही मैं तुम्हें इसलिये बता रहा हूँ कि जब यह घटित हो तब तुम विश्वास करो कि वह मैं हूँ।'”  यह कहने के बाद यीशु बहुत व्याकुल हुआ और साक्षी दी, “मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम में से एक मुझे धोखा देकर पकड़वायेगा।”

यीशु कि बात को सुनकर क्या यहूदा कांपा?  तब उसके शिष्य एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे। वे निश्चय ही नहीं कर पा रहे थे कि वह किसके बारे में कह रहा है। उन्होंने कहा,”प्रभु, निश्चय वो मैं तो नहीं!” वे मासूम थे, फिर भी वे भयभीत थे और उस पाप से डरते थे कि कहीं उनसे ना हो जाये। वे वफादार रहना चाहते थे। यीशु को कितना छुआ होगा। उस ऊपरी कमरे के बाहर वे शक्तिशाली लोग उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे। परन्तु ये चेले, चाहे कितने भी कमज़ोर क्यूँ ना थे, वे वफादार रहे। उनका प्रेम और विश्वास सच्चा था।                                                                                                                          तब यीशु ने उत्तर दिया,“’वही जो मेरे साथ एक थाली में खाता है मुझे धोखे से पकड़वायेगा। मनुष्य का पुत्र तो जायेगा ही, जैसा कि उसके बारे में शास्त्र में लिखा है। पर उस व्यक्ति को धिक्कार है जिस व्यक्ति के द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जा रहा है। उस व्यक्ति के लिये कितना अच्छा होता कि उसका जन्म ही न हुआ होता।’”

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, यूहन्ना यीशु कि छाती पर टिका हुआ था। कितना महान था उनका प्रेम। उसका एक शिष्य यीशु के निकट ही बैठा हुआ था। इसे यीशु बहुत प्यार करता था। तब शमौन पतरस ने उसे इशारा किया कि पूछे वह कौन हो सकता है जिस के विषय में यीशु बता रहा था।  यीशु के प्रिय शिष्य ने सहज में ही उसकी छाती पर झुक कर उससे पूछा,“हे प्रभु, वह कौन है?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबो कर जिसे मैं दूँगा, वही वह है।” फिर यीशु ने रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबोया और उसे उठा कर शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा को दिया। जैसे ही यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया उसमें शैतान समा गया। फिर यीशु ने उससे कहा,“जो तू करने जा रहा है, उसे तुरन्त कर।”  इसलिए यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया। और तत्काल चला गया। यह रात का समय था। किन्तु वहाँ बैठे हुओं में से किसी ने भी यह नहीं समझा कि यीशु ने उससे यह बात क्यों कही। कुछ ने सोचा कि रुपयों की थैली यहूदा के पास रहती है इसलिए यीशु उससे कह रहा है कि पर्व के लिये आवश्यक सामग्री मोल ले आओ या कह रहा है कि गरीबों को वह कुछ दे दे।

जब वे भोजन कर ही रहे थे, यीशु के चेले आपस में बहस कर रहे थे उनमें से कौन सबसे महान होगा। जब यीशु उन्हें परमेश्वर के राज्य में पैर धोने के विषय में बता रहा था, वे केवल यही सुन रहे थे कि एक राज्य आने वाला है। वे केवल यही जानना चाहते थे कि कौन सबसे महान और प्रभावशाली होगा। वे स्वयं के लिए पद ढूंढ रहे थे। वे फरीसियों और शास्त्रियों के समान व्यवहार कर रहे थे। एक तरीके से, वे यीशु के सन्देश को धोखा दे रहे थे। वे नहीं सुन रहे थे। उन्हें नहीं मालूम था कि आगे क्या होने जा रहा है। यीशु के उत्तर को सुनिये:

“गैर यहूदियों के राजा उन पर प्रभुत्व रखते हैं और वे जो उन पर अधिकार का प्रयोग करते हैं,‘स्वयं को लोगों का उपकारक’ कहलवाना चाहते हैं। किन्तु तुम वैसै नहीं हो बल्कि तुममें तो सबसे बड़ा सबसे छोटे जैसा होना चाहिये और जो प्रमुख है उसे सेवक के समान होना चाहिए। क्योंकि बड़ा कौन है: वह जो खाने की मेज़ पर बैठा है या वह जो उसे परोसता है? क्या वही नहीं जो मेज पर है किन्तु तुम्हारे बीच मैं वैसा हूँ जो परोसता है। किन्तु तुम वे हो जिन्होंने मेरी परिक्षाओं में मेरा साथ दिया है। और मैं तुम्हे वैसे ही एक राज्य दे रहा हूँ जैसे मेरे परम पिता ने इसे मुझे दिया था। ताकि मेरे राज्य में तुम मेरी मेज़ पर खाओ और पिओ और इस्राएल की बारहों जनजातियों का न्याय करते हुए सिंहासनों पर बैठो।'” –लूका २२:२५-३२

स्वर्ग राज्य में हर एक चेले को ना केवल सम्मानित भूमिका निभाने को मिलेगा, उन्हें परमेश्वर के राज्यों को न्याय करने का अधिकार दिया जाएगा। यीशु उन्हें अपने राजकीय अधिकार का एक हिस्सा भी देगा। यीशु एक नया राज्य स्थापित कर रहा था और ये चेले उसके अगुवे होंगे! परन्तु उन्हें उसे हासिल करने के लिए प्रतीक्षा करना होगा। वे उन्हें इस पृथ्वी पर रहते हुए मिलेंगे। उन्हें यीशु के उस अनंतकाल के राज्य कि ओर ताकना होगा।

यीशु उस दिन कि घोषणा के लिए अपने चेलों को तैयार कर रहा था।

“’मनुष्य का पुत्र अब महिमावान हुआ है। और उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है। यदि उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है तो परमेश्वर अपने द्वारा उसे महिमावान करेगा। और वह उसे महिमा शीघ्र ही देगा।”
“’हे मेरे प्यारे बच्चों, मैं अब थोड़ी ही देर और तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे ढूँढोगे और जैसा कि मैंने यहूदी नेताओं से कहा था, तुम वहाँ नहीं आ सकते, जहाँ मैं जा रहा हूँ, वैसा ही अब मैं तुमसे कहता हूँ।
“’मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो। जैसा मैंने तुमसे प्यार किया है वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम करो। यदि तुम एक दूसरे से प्रेम रखोगे तभी हर कोई यह जान पायेगा कि तुम मेरे अनुयायी हो।’” –यूहन्ना १३:३१-३८

अब चेले परेशान हो गये। वह उन्हें क्यूँ छोड़ रहा था? शमौन पतरस ने उससे पूछा, “हे प्रभु, तू कहाँ जा रहा है?”

यीशु ने उसे उत्तर दिया, “तू अब मेरे पीछे नहीं आ सकता। पर तू बाद में मेरे पीछे आयेगा।”

फिर जो यीशु ने कहा उसे सुनकर पतरस बेचैन हो गया:

“’शमौन, हे शमौन, सुन, तुम सब को गेहूँ की तरह फटकने के लिए शैतान ने चुन लिया है। किन्तु मैंने तुम्हारे लिये प्रार्थना की है कि तुम्हारा विश्वास न डगमगाये और जब तू वापस आये तो तेरे बंधुओं की शक्ति बढ़े।’”

पतरस ने उससे पूछा, “’हे प्रभु, अभी भी मैं तेरे पीछे क्यों नहीं आ सकता? मैं तो तेरे लिये अपने प्राण तक त्याग दूँगा।’” और यह सच था। पतरस बहुत समय था इस पर विचार करने के लिए। धार्मिक अगुवों कि नफरत जितनी अधिक बढ़ती जा रही थी उतना ही यीशु के मित्र बनना खतरनाक होता जा रहा था। परन्तु यीशु पतरस को वो बातें बता रहा था जो वह अपने आप के विषय में नहीं जानता था।

पतरस अधिकतर बातें उसके स्वयं के विषय में थीं ना के यीशु के प्रति उसकी भक्ति की। अब शैतान उसके पीछे था, उस चेले को नाश करने के लिए जो उस दुष्ट के लिए एक खतरा बन चुका था। परन्तु यीशु शैतान के द्वारा पतरस के फटकनेको उसे शुद्ध करने के लिए उपयोग करेगा। यीशु ने कहा,“‘मैं तुझे सत्य कहता हूँ कि जब तक तू तीन बार इन्कार नहीं कर लेगा तब तक मुर्गा बाँग नहीं देगा।’”

जब समय आता, तब पतरस यीशु के लिए अपनी जान नहीं देने वाला था। वह अपनी जान उस घड़ी के लिए बचाना चाहता जब वह यीशु को पकड़वाएगा। यीशु निश्चित रूप से जानते थे कि पतरस क्या करने जा रहा है, और फिर भी यीशु उससे प्रेम करते रहे। क्यूंकि, पतरस का इंकार स्वयं यीशु के लिए नहीं था। वे पतरस के विषय में थे और वो काम जिसके लिए परमेश्वर उसे कलीसिया का चट्टान बनाने के लिए तैयार कर रहा था।

पतरस अपने ही विचार लगा रहा था कि कैसे यीशु कि सेवा करनी चाहिए। वह अपनी ही क़ाबलियत से प्रबावित था कि वह वफादार और दृढ़ रहेगा। परमेश्वर उससे उन सब बातों को छीन लेगा। एक बार जब पतरस इस भयंकर समय से निकल जाएगा, वह एक भीतरी ताक़त के साथ बाहर निकलेगा। इस अपमान और दुःख के बाद, पतरस परमेश्वर पर निर्भर करना सीख जाएगा।

यीशु जानता था कि पतरस उसका इंकार करेगा, परन्तु वह जानता था कि अंत में वह उसके पीछे चलता जाएगा। वह अपने जीवन भर परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को फैलाएगा, उसके लिए सताया जाएगा और यीशु के लिए जेल में भेजा जाएगा। और फिर एक दिन, वह यीशु के नाम के वास्ते मर जाएगा।

कहानी १५५: यीशु का अंतिम भोज-भाग 1 

मत्ती २६:१७-१९; मरकुस १४:१२-१६; लूका २२:७-१३; यूहन्ना १३:१-१७

The Washing of the Feet
गुरुवार आया। यह अखमीरी रोटी का दिन था। मिस्र में उस दिन की याद में शासकीय फसह के मेमने को बलिदान किया जाएगा।बेदाग भेड़ के बच्चे के रक्त को हर एक इस्राएली घर के चौखट पर लगाना था। इससे उनका पहलौठा पुत्र बच गया और स्वतंत्रता के द्वार को खोल दिया गया। वह पहला बलिदान और उद्धार केवल एक रूप था और यीशु अपने ही लहू से खरीदने वाला था।

चेलों ने उससे पुछा कि तैयारी के लिए वह क्या चाहता था कि कहाँ की जाये।

उसने यूहन्ना और पतरस से कहा,
“’तुम जैसे ही नगर में प्रवेश करोगे तुम्हें पानी का घड़ा ले जाते हुए एक व्यक्ति मिलेगा, उसके पीछे हो लेना और जिस घर में वह जाये तुम भी चले जाना। और घर के स्वामी से कहना,‘गुरु ने तुझसे पूछा है कि वह अतिथि-कक्ष कहाँ है जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ फ़सह पर्व का भोजन कर सकूँ।’ फिर वह व्यक्ति तुम्हें सीढ़ियों के ऊपर सजा-सजाया एक बड़ा कमरा दिखायेगा, वहीं तैयारी करना।’”

वे चल पड़े और वैसा ही पाया जैसा उसने उन्हें बताया था। फिर उन्होंने फ़सह भोज तैयार किया। यीशु के अपने पिता के आज्ञाकारी होने के साथ ही उस पवित्र योजनाओं का खुलासा हो गया। हर एक पल परमेश्वर कि ओर से नियुक्त था और यीशु उसे पूरी श्रेष्ठा से प्रदर्शित कर रहे थे।

संध्या काल में,यीशु अपने शिष्यों के साथ भोजन पर बैठा। उसने उनसे कहा,“’यातना उठाने से पहले यह फ़सह का भोजन तुम्हारे साथ करने की मेरी प्रबल इच्छा थी। क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक परमेश्वर के राज्य में यह पूरा नहीं हो लेता तब तक मैं इसे दुबारा नहीं खाऊँगा।’”

इसे समझिये, यीशु परमेश्वर था और परमेश्वर उससे असीम प्यार करता था।  फिर भी जब यीशु उस पाप के ढेर को उठाये हुए था, वह उन स्वार्थी चेलों के साथ ही रहना चाहता था। उसका प्रेम उनके प्रति गुणवत्ता के अनुसार नहीं था। उसके प्रेम कि महानता उसके प्रेम करने कि योग्ता के कारण था। जब हम उन बातों को पढ़ते हैं जो उसने अपने चेलों के साथ बांटीं, हम उसके वचन को बहुत ही व्यक्तिगत तरीके से ले सकते हैं। वे हमारे भी हैं।

जब यीशु भोजन कर रहा था, वह जानता था कि यह उसके कष्ट उठाने से पहले का अंतिम भोज है। फिर भी उसका उद्देश्य क्रूस पर से नहीं हटा। वह क्रूस के माध्यम से उस विजय कि ओर देख रहा था। एक बहुत जश्न जिसे मेमने के विवाह का भोज कहा जाता है, आ रहा था। वे जो यीशु कि मृत्यु और जी उठने के कारण बचाय गए वे एक बार फिर उसकी यशस्वी  दुल्हन बनकर उसके साथ भोजन करेगी। वह जानता था कि वह परमेश्वर कि ओर से आया है और अपने पिता के पास वापस चला जाएगा। वह जानता था कि उसके पिता ने उसे उसके हाथ में सब कुछ दे दिया है। अभी वह गया नहीं था और अंत तक अपनों से प्रेम करता रहेगा।

यीशु  उठा और अपने बाहरी वस्त्र उतार दिये और एक अँगोछा अपने चारों ओर लपेट लिया। फिर एक घड़े में जल भरा और अपने शिष्यों के पैर धोने लगा और उस अँगोछे से जो उसने लपेटा हुआ था, उनके पाँव पोंछने लगा। अपने स्वामी को ऐसे करते देख वे अचंबित हुए। यह एक बहुत नीच और गन्दा काम था। इस्राएल में, केवल वे जो यहूदी नहीं हैं वे ही यह काम करते थे। लेकिन यहं यीशु यह सब काम कर रहा था।

फिर जब वह शमौन पतरस के पास पहुँचा तो पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, क्या तू मेरे पाँव धो रहा है।”

उत्तर में यीशु ने उससे कहा,“अभी तू नहीं जानता कि मैं क्या कर रहा हूँ पर बाद में जान जायेगा।”

पतरस ने उससे कहा,“तू मेरे पाँव कभी भी नहीं धोयेगा।”

यीशु ने उत्तर दिया,“यदि मैं न धोऊँ तो तू मेरे पास स्थान नहीं पा सकेगा।”

शमौन पतरस ने उससे कहा,“प्रभु, केवल मेरे पैर ही नहीं, बल्कि मेरे हाथ और मेरा सिर भी धो दे।”

यीशु ने उससे कहा,“जो नहा चुका है उसे अपने पैरों के सिवा कुछ भी और धोने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि पूरी तरह शुद्ध होता है। तुम लोग शुद्ध हो पर सबके सब नहीं।” वह उसे जानता था जो उसे धोखे से पकड़वाने वाला है। इसलिए उसने कहा था,“तुम में से सभी शुद्ध नहीं हैं।”

यीशु ने यही रात क्यूँ चुनी चेलों के पैर धोने के लिए? वह उसके मरने के पहले की अंतिम घड़ी थी। वे अपने जीवन भर उस समय को याद रखेंगे। वह उस रात जो कुछ भी कहता वह बहुत महत्वपूर्ण होता।

उनके पैर धोना उस बात का चिन्ह था जो यीशु अपनी मृत्यु के समय उनके लिए करने जा रहा था। वह श्राप के बंधन को तोड़ने जा रहा था।  के पाप से मृत्यु आई, यीशु कि मृत्यु उन सब के लिए जीवन को लाएगा जो उस पर विश्वास करते हैं (रोमियो 4और5) वह पाप में गिरे संसार को समाप्त करके एक नए दौर को लेकर आ रहा था। नेही विधि के अनुसार, जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह पूर्ण रूप से साफ़ किया जाएगा और परमेश्वर के साथ सिद्ध होगा। उन्हें यीशु कि धार्मिकता दी जाएगी। उसी समय से, वे नए हो जाएंगे। उनके हिरदय बदल जाएंगे, और वे फिर कभी इस दुनिया के नहीं होंगे। जब व पाप करेंगे, वे परमेश्वर के सामने खोये हुए नहीं होंगे। उन्हें केवल पश्चाताप करने कि ज़रुरत है। वह उनके उन गंदे क्षेत्रों को साफ़ करेगा जिस प्रकार उसने चेलों के पैरों को धोया था। जो कोई यीशु पर विश्वास करता है वह यह विश्वास कर सकता है कि परमेश्वर ने उसे साफ़ किया है। फिर भी उसके चेलों को आवश्यकता है कि वे रोज़ अपने पापों को शुद्ध करने के लिए उसके पास आयें जब तक वे इस शार्पित संसार में जी रहे हैं।

जब यीशु ने कहा कि सरे उसके चेले साफ़ नहीं थे, तो उसका किसकी ओर निशाना था? क्या यहूदा जानता था कि यीशु को मालूम है? जब यीशु उसके पाँव धो रहे थे तब उसे कैसा लग रहा होगा? उस समय, और पूरे हफ्ते भर, यहूदा के पास पश्चाताप करने का पूरा समय था। परन्तु जिस समय यीशु उसके पाँव के मेल को धो रहे थे, उसके हिरदय के मेल को वह पकड़ा हुआ था। और इसीलिए वह अपने पाप में स्थायी था।

जब यीशु उनके पाँव धो चुका , तब उसने उनसे कहा,
“’क्या तुम जानते हो कि मैंने तुम्हारे लिये क्या किया है? तुम लोग मुझे ‘गुरु’ और ‘प्रभु’ कहते हो। और तुम उचित हो। क्योंकि मैं वही हूँ। इसलिये यदि मैंने प्रभु और गुरु होकर भी जब तुम्हारे पैर धोये हैं तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोना चाहिये। मैंने तुम्हारे सामने एक उदाहरण रखा है ताकि तुम दूसरों के साथ वही कर सको जो मैंने तुम्हारे साथ किया है। मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ एक दास स्वामी से बड़ा नहीं है और न ही एक संदेशवाहक उससे बड़ा है जो उसे भेजता है यदि तुम लोग इन बातों को जानते हो और उन पर चलते हो तो तुम सुखी होगे।'”  –यूहन्ना १३:१२-१७

यीशु ने अपने चेलो को समझाया कि अब जब उनके पाप धूल चुके हैं, उन्हें आगे बढ़ना है। यीशु पाप और मृत्यु पर विजयी होगा और एक नया दौर शुरू होगा। जो कुछ यीशु ने किया था वे उसके दूत थे, जो उसके सन्देश को संसार में फैलाएंगे। परमेश्वर का राज्य अंधकार के राज्य में के समान घुसेगा और लोग अपने जीवन को यीशु को देंगे। वे भी साफ़ किये जाएंगे और जिस प्रेम कि समिति उन्होंने बनाई है वह इस पृथ्वी के राज्य के लिए ढाल बन कर खड़ी होगी। वे एक दुसरे के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? क्या वे फरीसियों के समान लालची होंगे जो अपने पद के लिए लड़ते थे? या वे अपने स्वामी के समान वैसा ह्रद्य रखेंगे? क्या वे विनम्रता और शांति बनाने वाले बनकर एक दुसरे पाँव को धोएंगे? इस पवित्र समय में जब यीशु ने पने चेलों के पाव धोये, वह उस शारीरिक प्रदर्शन को दिखाता है कि कैसे स्वर्गराज के नागरिकों को एक दुसरे के प्रति अपने ह्रदय को रखना है।

कहनी ११५: अच्छा चरवाहा–भाग २ 

यूहन्ना १०:११-१८

यीशु अपने चेलों को समझा रहे थे कि इस्राएल के देश में क्या हो रहा था। यदि यीशु ही मसीहा है, तो उसके और धार्मिक अगुवों के बीच क्यूँ ऐसा युद्ध था? क्या उन्हें एक साथ मिलकर काम नहीं करना चाहिए? यीशु ने समझाया कि, वे जो उसके हैं और अपने स्वर्गीय पिता कि आवाज़ को सुनते हैं, तो उन्हें पश्चाताप करके उसके पीछे चलना चाहिए। सात सौ साल पहले यीशु के इस पृथ्वी पर आने के पहले, इस्राएल के अगुवे भयंकर पाप करते थे। परमेश्वर ने उन्हें अपने लोगों के बुरे चरवाहा घोषित करके उन्हें फटकारा। यिर्मयाह के द्वारा परमेश्वर ने कहा:

“’यहूदा के गडरियों के लिये यह बहुत बुरा होगा। वे गडेरिये भेड़ों को नष्ट कर रहें हैं। वे भेड़ों को मेरी चरागाह से चारों ओर भगा रहे हैं।” यह सन्देश यहोवा का है। वे गडेरिये मेरे लोगों के लिये उत्तरदायी हैं, और इस्राएल का परमेश्वर यहोवा उन गडेरियों से यह कहता है,“गडेरियों, तुमने मेरी भेड़ों को चारों ओर भगाया है। तुमने उन्हें चले जाने को विवश किया है। तुमने उनकी देखभाल नहीं रखी है। किन्तु मैं तुम लोगों को देखूँगा, मैं तुम्हें उन बुरे कामों के लिये दण्ड दूँगा जो तुमने किये हैं।” यह सन्देश यहोवा के यहाँ से है। “मैंने अपनी भेड़ों  को विभिन्न देशों में भेजा। किन्तु मैं अपनी उन भेड़ों को एक साथ इकट्ठी करुँगा जो बची रह गई हैं और मैं उन्हें उनकी चरागाह  में लाऊँगा। जब मेरी भेड़ें अपनी चरागाह में वापस आएंगी तो उनके बहुत बच्चे होंगे और उनकी संख्या बढ़ जाएगी। मैं अपनी भेड़ों के लिये नये गडेरिये रखूँगा वे गडेरिये मेरी भेड़ों  की देखभाल करेंगे और मेरी भेड़ें  भयभीत या डरेंगी नहीं। मेरी भेड़ों में से कोई खोएगी नहीं।” यह सन्देश यहोवा का है।'” –यिर्मयाह २३:१-४  

यीशु यह घोषित कर रहे थे कि इस्राएल के अगुवे पुराने समय के भयानक चरवाहों के समान थे। वह यह घोषित कर रहे थे कि उनका पक्ष लेने का मतलब है परमेश्वर के दुश्मनो का पक्ष लेना। वह इस बात को साबित कर रहे थे कि जो उसके पीछे चलते हैं वे यहूदी इतिहास के महान वीरों के समान है जो परमेश्वर के लिए वफादार खड़े रहते हैं चाहे उनके चारों ओर कितना भी झूठ क्यूँ न चल रहा हो!

यीशु समझा रहे थे कि एक अच्छा चरवाहा कैसा होता है। ना केवल वह चोरों और लुटेरों के विरुद्ध सच्चाई बताता है, वह एक उत्तम और हानिकर प्रेम से प्रेम करता है। उसकी भेड़ उसकी है, और वह उनके लिए कुछ भी करने को तैयार है, चाहे उनके लिए जान भी देनी पड़े!

उसने कहा,
“’अच्छा चरवाहा मैं हूँ! अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपनी जान दे देता है। किन्तु किराये का मज़दूर क्योंकि वह चरवाहा नहीं होता, भेड़ें उसकी अपनी नहीं होतीं, जब भेड़िये को आते देखता है, भेडों को छोड़कर भाग जाता है। और भेड़िया उन पर हमला करके उन्हें तितर-बितर कर देता है। किराये का मज़दूर, इसलिये भाग जाता है क्योंकि वह दैनिक मज़दूरी का आदमी है और इसीलिए भेड़ों की परवाह नहीं करता।'” –यूहन्ना १०:११-१३

इस कहानी में, भेड़िया स्वयं शैतान है। ऐसे लोग भी हैं जो भेड़ों के लिए किराय के चरवाहा बनके आते हैं। उनके ह्रदय में भेड़ के लिए प्रेम नहीं है, वे केवल धन कमाने के लिए हैं। जब कभी वास्तव में दुश्मन के आने कि आशंका होती है तो वे किराय के टट्टू भाग निकलते हैं। उनके अंदर जानवरों के लिए कोई भक्ति या दया नहीं है। लेकिन यीशु बिलकुल भिन्न है। वह उनके लिए अपनी जान देने को तैयार है! उसने कहा:

“’अच्छा चरवाहा मैं हूँ। अपनी भेड़ों को मैं जानता हूँ और मेरी भेड़ें मुझे वैसे ही जानती हैं जैसे परम पिता मुझे जानता है और मैं परम पिता को जानता हूँ। अपनी भेड़ों के लिए मैं अपना जीवन देता हूँ। मेरी और भेड़ें भी हैं जो इस बाड़े की नहीं हैं। मुझे उन्हें भी लाना होगा। वे भी मेरी आवाज सुनेगीं और इसी बाड़े में आकर एक हो जायेंगी। फिर सबका एक ही चरवाहा होगा। परम पिता मुझसे इसीलिये प्रेम करता है कि मैं अपना जीवन देता हूँ। मैं अपना जीवन देता हूँ ताकि मैं उसे फिर वापस ले सकूँ। इसे मुझसे कोई लेता नहीं है। बल्कि मैं अपने आप अपनी इच्छा से इसे देता हूँ। मुझे इसे देने का अधिकार है। यह आदेश मुझे मेरे परम पिता से मिला है।’” —यूहन्ना १०:१४-१८

क्या आपने यीशु कि वाणी को सुना ? क्या आप उसका अर्थ समझते हैं?

यीशु कि वाणी को सुनने का मतलब है कि जो कुछ सत्य वह कहता है आप उस पर विश्वास करते हैं। उस अंधे व्यक्ति ने यीशु कि वाणी को सुना और उसकी आँखों को चंगा करते महसूस किया। पतरस, याकूब और यूहन्ना ने भी यीशु को कहते सुना,“’मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम्हें मनुष्य का पकड़ने वाला बनाऊंगा।'” जब हमारे माँ बाप और दोस्त हमें उसके सामर्थी प्रेम के विषय में बताते हैं तब हम उससे सुन पाते हैं। जब हम अपनी बाइबिल को पढ़ते हैं तब उसको सुन पाते हैं। और जब हम प्रार्थना के लिए अपने मानों को शांत करते हैं तब हम उसे सुनते हैं। इस तरह से यीशु कि आत्मा हमारे पास आकर हमें सिखाती है। प्रेरित पतरस ने हमारे विषय में एक पत्री में लिखा। उसने कहा,”यद्यपि तुमने उसे देखा नहीं है, फिर भी तुम उसे प्रेम करते हो। यद्यपि तुम अभी उसे देख नहीं पा रहे हो, किन्तु फिर भी उसमें विश्वास रखते हो और एक ऐसे आनन्द से भरे हुए हो जो अकथनीय एवं महिमामय है।और तुम अपने विश्वास के परिणामस्वरूप अपनी आत्मा का उद्धार कर रहे हो।”
(१पतरस १: ८-९)

इतिहास में जितनो ने भी उसकी आवाज़ को सुना और उसके पीछे चलने का निर्णय लिया वे उसके बुलाये हुए थे। जो भेड़ उसके पीछे नहीं चलती वे कभी भी उसके थे ही नहीं। यह उनके लिए बहुत बड़ी दुःख कि बात है, सबसे बड़ी त्रासदी। यदि हम ऐसे किसी को जानते हैं जो यीशु के पीछे नहीं चलता, तो हमें उसके लिए अफ़सोस करना चाहिए, क्यूंकि उनका बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है। उनके पास उद्धारकर्ता नहीं है, और उनके पास उसका उद्धार भी नहीं है! लेकिन हम उन्हें उसके बारे में बता सकते हैं और हम यह प्रार्थना कर सकते हैं कि वे भी उसकी वाणी को सुनें।

यीशु का क्या अर्थ था जब उसने कहा कि “ये मेरे बाड़े कि भेड़ें नहीं हैं “? इस “बाड़े कि भेड़ें” का मतलब ही क्या है? यह इस्राएल देश है! परमेश्वर ने इस्राएल देश को अपने कीमती खज़ाना कह कर पुकारा था, और उस बाड़े कि भेड़ें उसके लिए बहुत कीमती थी। लेकिन अब, परमेश्वर इस बात का ऐलान कर रहे थे कि उद्धार यहूदी लोगों से और बढ़कर है। वह भेड़ों को अन्य देशों से भी लाएगा। वास्तव में, दुनिए के दूसरे कौम, राष्ट्र और भाषाओँ से भेड़ों को लाया जाएगा! यीशु ने अपननी जान उन सब के लिए दी जिन्होंने उसकी वाणी को सुना और आने वाले विश्वास कि प्रतिक्रिया की!

अब हमें थोड़ा रुक कर सोचने कि ज़रुरत है। यीशु ने ऐसा कुछ कहा जो केवल एक वाक्य कि तरह है। लेकिन यदि हमें एहसास होगा, तो हमें हैरानी होगी। वह हमें रोने और उसको दंडवत करने के लिए घुटनों पर आने पर मजबूर करेगा। यदि हम उस वाक्य कि भव्यता को समझेंगे, हम उसके चरणों को श्रद्धापूर्वक और विनम्रतापूर्वक चूमना चाहेंगे। उसने ऐसा कहना शुरू किया कि उसका स्वर्गीय पिता उससे बहुत प्यार करता है क्यूंकि वह उसके लिए अपनी जान देगा और फिर उसे ऊपर उठा भी लेगा। वह अपने मृत्यु और जी उठने के विषय में बात कर रहा है। यह काफी विशाल है! लेकिन उसने ऐसा कुछ कहा जिससे कि हमारी सांस ही रुक जाये। उसने कहा, “इसे मुझसे कोई लेता नहीं है। बल्कि मैं अपने आप अपनी इच्छा से इसे देता हूँ।”

यीशु जब इस श्रापित दुनिया में पापियों के साथ रहा, उन्हें चंगा किया, उनसे प्रेम किया और सच्चाई के विषय में सिखाता रहा, वह लगातार क्रूस कि ओर जाने के लिए तैयार रहा। वह समझ गया था जिस देश के लोगों के लिए वह उद्धार को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करता रहा, वे ही उसे मरवा देंगे। वह उनके झूठ के साथ जीता रहा, उनके बच्चों को चंगा किया, बहुत महीनों और सालों तक वह उनको स्वर्ग राज्य के सन्देश को देता रहा। पूरे समय, वह उनके पाप और लज्जा के बोझ को उठाय रहा। वह लोगों कि सज़ा के अत्यधिक पीड़ा को परमेश्वर के क्रोध के अनंतकाल के न्याय के नीचे लाने कि तैयारी कर रहा था। अपनी भेड़ों को बचने के उपाय के साथ आया था, और ना केवल अपनी जान को देने कि सामर्थ उसमें बल्कि उसे वापस जिलाने कि भी शक्ति थी। और यह सब उसके पिता के पूर्ण आज्ञाकारिता में होकर था।

कहानी ९५: विश्वास की कमी

मत्ती १७:१४-२३, मरकुस ९:१४-३२, लूका ९:३७-४५

अगले दिन, यीशु के रूपांतरण होने के बाद वे पहाड़ से पतरस, याकूब और यूहन्ना के साथ जब वापस आये तो, भीड़ बाकी के चेलों को घेरी हुई थी। कुछ शास्त्री, जो धार्मिक अगुवे थे जो उनके साथ बहस कर रहे थे। यीशु को आते देख भीड़ अचरज में पड़ गई। वे उसके पास दौड़ कर गए। यीशु ने चेलों से पूछा कि वे भीड़ के साथ क्या बात कर रहे थे। तभी भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्ला उठा,“गुरु, मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे बेटे पर अनुग्रह-दृष्टि कर। वह मेरी एकलौती सन्तान है। अचानक एक दुष्ट आत्मा उसे जकड़ लेती है और वह चीख उठता है। उसे दुष्टात्मा ऐसे मरोड़ डालती है कि उसके मुँह से झाग निकलने लगता है। वह उसे कभी नहीं छोड़ती और सताए जा रही है।”

क्या आप इस व्यक्ति कि आवाज़ में पीड़ा और दुःख को समझ सकते हैं? यह कितना दर्द्नाक रहा होगा कि अपने एक लौते पुत्र को इस तरह रोज़ ब रोज़ भयानक कष्ट में देखना। इसीलिए वह यीशु के आगे घुटनों के बल गिर गया! उसने उससे कहा, “मैं उसे तेरे शिष्यों के पास लाया, पर वे उसे अच्छा नहीं कर पाये।”

उत्तर में यीशु ने कहा, “अरे भटके हुए अविश्वासी लोगों, मैं कितने समय तुम्हारे साथ और रहूँगा? कितने समय मैं यूँ ही तुम्हारे साथ रहूँगा? उसे यहाँ मेरे पास लाओ।” पूरे सुसमाचारों में केवल यही एक समय था जब यीशु ने उसके आस पास हो रही उन बातों के प्रति बेसब्री दिखाई। वह किसके साथ बेसबर हो रहा था? शायद शास्त्रियों के साथ। वे मसीह कि सेवकाई को नष्ट करने कि साजिश रच रहे थे। वे शायद यह जान चुके थे कि वहाँ केवल नौ चेले हैं, और वे उस व्यक्ति के दुष्ट आत्मा से युक्त बेटे को वहाँ ले आये थे। यदि उन्होंने यीशु के चेलों को और कुछ करते देख लिया होता, तो वे यीशु के भी पीछे पड़ गए होते! ये राष्ट्र के अगुवे उस अतिदुखी व्यक्ति या उसके बेटे कि मदद नहीं कर रहे थे, वे उसे यीशु को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे! इसीलिए यीशु इतने हताश हो गये थे!

तब वे लड़के को उसके पास ले आये और जब दुष्टात्मा ने यीशु को देखा तो उसने तत्काल लड़के को मरोड़ दिया। वह धरती पर जा पड़ा और चक्कर खा गया। उसके मुँह से झाग निकल रहे थे। तब यीशु ने उसके पिता से पूछा कि ऐसा कितने दिनों से है। पिता ने उत्तर दिया,“यह बचपन से ही ऐसा है। दुष्टात्मा इसे मार डालने के लिए कभी आग में गिरा देती है तो कभी पानी में। क्या तू कुछ कर सकता है? हम पर दया कर, हमारी सहायता कर।”

यीशु ने उससे कहा,“तूने कहा,‘क्या तू कुछ कर सकता है?’ विश्वासी व्यक्ति के लिए सब कुछ सम्भव है।”

तुरंत बच्चे का पिता चिल्लाया और बोला, “मैं विश्वास करता हूँ। मेरे अविश्वास को हटा!”

अब तक इस बात कि खबर फ़ैल गयी थी, और लोग सारी दिशाओं से वहाँ आ रहे थे। उसने दुष्टात्मा को ललकारा और उससे कहा,“ओ बच्चे को बहरा गूँगा कर देने वाली दुष्टात्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूँ इसमें से बाहर निकल आ और फिर इसमें दुबारा प्रवेश मत करना!”

तब दुष्टात्मा चिल्लाई। बच्चे पर भयानक दौरा पड़ा। और वह बाहर निकल गयी। बच्चा मरा हुआ सा दिखने लगा।फिर यीशु ने लड़के को हाथ से पकड़ कर उठाया और खड़ा किया। वह खड़ा हो गया। यीशु ने उसे उसके पिता को सौंप दिया, और सब यह देख कर परमेश्वर कि महानता को देख कर अचम्भे और श्रद्धायुक्त भयभीत हुए।

इसके बाद यीशु अपने घर चला गया। अकेले में उसके शिष्यों ने उससे पूछा की वे इस दुष्टात्मा को बाहर क्यों नहीं निकाल सके। दूसरी परिस्थितियों में, वे दुष्ट आत्माएं निकल लिया करते थे। तो इस बार क्या हुआ? यीशु ने उन्हें बताया, “क्योंकि तुममें विश्वास की कमी है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, यदि तुममें राई के बीज जितना भी विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से कह सकते हो ‘यहाँ से हट कर वहाँ चला जा’ और वह चला जायेगा। तुम्हारे लिये असम्भव कुछ भी नहीं होगा।” इस पर यीशु ने उनसे कहा कि ऐसी दुष्टात्मा प्रार्थना के बिना बाहर नहीं निकाली जा सकती थी।

फिर उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया। और जब वे गलील होते हुए जा रहे थे तो वह नहीं चाहता था कि वे कहाँ हैं, इसका किसी को भी पता चले। यीशु अब गलील से होते हुए पेरा से यहूदिया को निकल पड़ा। वह क्रूस के लिए जा रहा था, और उसे चेलों को कुछ महत्पूर्ण बातें सिखानी थी। इस सन्देश में कुछ अत्यावश्यकता थी जो उसके चेले बाद में ही समझ पाएंगे।

“अब जो मैं तुमसे कह रहा हूँ, उन बातों पर ध्यान दो। मनुष्य का पुत्र मनुष्य के हाथों पकड़वाया जाने वाला है।”

यीशु उन्हें आगे आने वाले रास्ते को दर्शा रहे थे। यही कारण था जिसके लिए वो आया था, और परमेश्वर का मसीह के लिए शुरू से यही योजना थी। यह एक मुक्तिदाता-सम्बंधित रहस्य था जो कोई भी इसका अनुमान नहीं लगा सकता था। उसने उनसे कहा,”वे उसे मार डालेंगे। किन्तु तीसरे दिन वह फिर जी उठेगा!” चेलों ने उसे सुना, किन्तु वे इस बात को नहीं समझ सके। यह बात उनसे छुपी हुई थी। सो वे उसे जान नहीं पाये। और वे उस बात के विषय में उससे पूछने से डरते थे।यीशु जानता था कि उसके आने वाली परीक्षाएं उसके मित्रों के लिए कठिन होंगी, और वह जानता था कि वे भयभीत होंगे। लेकिन अगर वे अभी जान जानते कि वो जानता कि आने वाला है, तो एक दिन वे इस बात को समझ जाएंगे कि सब कुछ उसके नियंत्रण में था। मसीह का भविष्य कोई दुर्घटना नहीं थी जो इस लिए हुई कि परमेश्वर ने नियंत्रण खो दिया था। यह बहुत ही दिल टूटने वाला परमेश्वर का विशाल उद्धार के कार्य का एक भाग था।  यीशु जनता था कि उसे क्या करना है, और जिस तरह साहसपूर्वक उसने पिता कि मर्ज़ी को पूरा किया, उसने चेलों के विश्वास को मज़बूत करने में भी सहयोग दिया।

जब यीशु और उसके शिष्य कफ़रनहूम में आये तो मन्दिर का दो दरम कर वसूल करने वाले पतरस के पास आये। यह कर येरूशलेम के मंदिर कि देख भाल के लिए था। हर पुरुष जो बीस साल से ऊपर था उसे कर देना होता था। उन्होंने पतरस से पुछा कि यीशु भी कर देता है। पतरस ने उत्तर दिया,“हाँ, वह देता है।” और घर में चला आया। यीशु ने उससे कहा,“’शमौन, तेरा क्या विचार है? धरती के राजा किससे चुंगी और कर लेते हैं? स्वयं अपने बच्चों से या दूसरों के बच्चों से?’

पतरस ने कहा कि वे दूसरों से कर लेते हैं। यीशु ने कहा,“‘यानी उसके बच्चों को छूट रहती है। पर हम उन लोगों को नाराज़ न करें इसलिये झील पर जा और अपना काँटा फेंक और फिर जो पहली मछली पकड़ में आये उसका मुँह खोलना तुझे चार दरम का सिक्का मिलेगा। उसे लेकर मेरे और अपने लिए उन्हें दे देना।’”

यीशु और उसके चेले परमेश्वर के शाही घराने के सदस्य थे। नास्तिक यहूदी के घराने दुसरे किस्म के थे, और इनके पास येरूशलेम के मंदिर के ऊपर अधिकार था जो कर लिया करते थे। यह स्वाभाविक था कि वे उनसे कर लेते थे जो परिवार के बाहर के थे और यीशु ऐसे कर को देने में खुश थे जिसमें कि अंतर दिखे।

कहानी ९३: एक अंधा आदमी

मत्ती १६:१३-२०, मरकुस ८:२२-३०, लूका ९:१८-२१

चेले यीशु के संग बैतसैदा चले आये। वहाँ कुछ लोग यीशु के पास एक अंधे को लाये और उससे प्रार्थना की कि वह उसे छू दे। उसने अंधे व्यक्ति का हाथ पकड़ा और उसे गाँव के बाहर ले गया। उसने उसकी आँखों पर थूका, अपने हाथ उस पर रखे और उससे पूछा,“तुझे कुछ दिखता है?” ऊपर देखते हुए उसने कहा,“मुझे लोग दिख रहे हैं। वे आसपास चलते पेड़ों जैसे लग रहे हैं।” कल्पन कीजिये कि यह व्यक्ति अपनी सारे ज़िन्दगी ऐसे ही पेड़ों से टटकराता रहा होगा। अब वह उन लम्बे, पतले पेड़ों को जिन्हें वह देख रहा था वे चल फिर रहे थे! वे इंसान थे!

तब यीशु ने उसकी आँखों पर जैसे ही फिर अपने हाथ रखे, उसने अपनी आँखें पूरी खोल दीं। उसे ज्योति मिल गयी थी। वह सब कुछ साफ़ साफ़ देख रहा था।

घर जाकर जब अपनी पत्नी और माँ बाप को उसने बताय होगा तो कैसा रहा होगा? पड़ोसियों ने क्या कहा होगा जब उन्होंने देखा होगा कि वह अँधा नहीं था? क्या आप कल्पना कर सकते हैं जब आराधनालय के अगुवों को यह पता चला होगा कि यीशु ने उस चंगा किया है तब उन्होंने क्या कहा होगा? यीशु ने उसे घर वापास भेज दिया लेकिन उसे गाव से जाने को मन किया था। अगर सबको पता लग जाता कि यीशु ने क्या किया है, तो एक और बवाल खड़ा हो जाएगा। यहूदी लोग नहीं जानते थे कि उसकी सामर्थ को लेकर किस तरह सही प्रतिक्रिया करें। वे या तो उसे राजा बनाना चाहते थे या फिर उसे मार देना चाहते थे!

यीशु ने इस व्यक्ति को दो चरणों में क्यूँ चंगा किया? बाइबिल में केवल यही एक कहानी है जहां इसका वर्णन किया गया है, और हम जानते हैं कि यीशु ने यह जानबूझकर किया है। और हम जानते हैं कि यीशु ने ऐसा अच्छे कारण के लिए किया है। सब कुछ जो वह करता था वह अच्छे कारण के लिए ही करता था! हम यह भी जानते हैं कि उस मनुष्य को एक साथ चंगा करने कि सामर्थ थी उसमें! वह एक सबक सिखाना चाहता था! शायद यीशु ने इस तरह किया ताकि हम रुक करके उसके चमत्कार के विषय में सोचें। शायद यीशु अपने चेलों को यह सिखाना चाहता था कि सेवकाई में कुछ चमत्कार औरों कि तरह एक दम नहीं होते हैं। कुछ चंगइयां समय लेती हैं। या फिर उनके लिए यह ऐसी तस्वीर थी जो यह बताती है कि आध्यामिक दृष्टी साफ़ होने में समय लेती है।

यीशु में विश्वासी जन विश्वास को अलग अलग चरणो में सीखते हैं, और हर एक चरण उद्धारकर्ता के विषय में स्पष्ट विचार दर्शाता है। यह उसके चेलों के लिए सत्य था। यीशु के साथ चलने में, उन्हें उसके पीछे नज़दीकी से चलते रहना है। उसकी शिक्षाओं ने जब राजाओं और धार्मिक अगुवों को क्रोधित किया, उन्हें इस बात का सामना करना था कि वास्तव में यीशु वही है जो वह अपने बारे में कहता है। क्या उनके अपने जीवन उसके जोखिम उठाने लायक था? भीड़ जब उसे अस्वीकार कर रही थी और पश्चाताप करने से इंकार कर रही थी, उन्हें यह निर्णय लेना था कि उनको भी अस्वीकृति का सामना करना होगा। उन्होंने इस बात का प्रमाण दे दिया था कि वे गलील में जाकर सुसमाचार सुनाएंगे। वे इस सन्देश में और चमत्कार में विश्वास करते थे। उनकी आँखें साफ़ होती जा रही थीं। परन्तु क्या वे स्वयं यीशु पर विश्वास करेंगे?

और फिर यीशु और उसके शिष्य कैसरिया फिलिप्पी के आसपास के गाँवों को चल दिये। यह हेरोदेस राजा के क्षेत्र के बाहर था। यहाँ अन्यजातियों के देवता का मंदिर था, और लोग सर्व उच्च परमेश्वर कि आराधना करते थे। यह एक अन्यजातियों का क्षेत्र था, इसलिए चेलों को वहाँ सिखाना यीशु के लिए सुरक्षित था।

रास्ते में यीशु ने अपने शिष्यों से पूछा,“’लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?'” यह एक विषय था जिसके विषय में पूरा इस्राएल बात करता था।

उन्होंने उत्तर दिया कि कुछ लोग उसे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना समझते हैं पर कुछ लोग एलिय्याह और दूसरे उसे भविष्यवक्ताओं में से कोई एक को कहते हैं। बहुत सारे अनुमान और अफवाहें थीं लेकिन कोई भी निश्चित नहीं था।यीशु जानना चाहता था कि उसके चेले उसके विषय में क्या सोचते हैं। यीशु ने उनसे पूछा,“’और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ।’”

पतरस ने उसे उत्तर दिया,“तू मसीह है।” यह एक साधारण सा वाकया था। यह एक घोषणा थी। पतरस एक दिशसिद्धि के कारण बोल रहा था क्यूंकि उसके जीवन दाव पर लगा हुआ था! वह अपने विश्वास में इस बात को लेकर बढ़ गया था कि जिसके साथ वह सब जगह जाया करता था वही परमेश्वर है! या तो वह सही था, या फिर वह एक मूर्ख था!

जब पहली बार पतरस ने अपने विश्वास कि घोषणा कि, तब वह यहूदियों के नगर में था जहां यीशु के बहुत से चेलों ने उसे छोड़ दिया था। परमेश्वर का पुत्र संसार में आ गया था। पतरस युगानुयुग कि सच्चाई से उत्तेजित था जो मसीह में उपस्थित थी, और वह परिवर्तित हो रहा था।

आपको याद है कि पतरस के साथ कब यह सब घटा? क्या आपको वो कहानी याद है जिसमें पतरस अपने भाई के साथ यरदन नदी पर था जहां यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला सुसमाचार सुना रहा था। वे विश्वास का कदम उठाते हुए परमेश्वर के पीछे चल रहे थे। यहाँ उनकी मुलावत यीशु वे वापस अपने घर गलील उसके साथ चले गए। क्या वे उस वक़्त  अपना जीवन उसको समर्पित करेंगे? फिर एक दिन, जब वे जाल धो रहे थे, यीशु ने उन्हें पुकारा। वे मछुए थे, और वे उसका को बहुत ईमानदारी से कर रहे थे उन्हें सौंपा था। लेकिन जब यीशु ने पुकारा, उन्होंने ने सब कुछ छोड़ कर उस विश्वास के कदम को उठाया जो परमेश्वर ने उन्हें उपलब्ध् कराया था।

परमेश्वर इन लोगों के ह्रदयों में कार्य करने के लिए समय और परिस्थितियों का इस्तेमाल कर रहा था। फिर एक दिन, यीशु ने  मछलियों से भरने के लिए एक अद्भुद  चमत्कार किया। पतरस ने पूरी रात मछली पकड़ने का प्रयास किया पर उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। उसने सारी ज़िन्दगी गलील के समुंद पर मछली पकड़ी, और वह समझ गया था कि कैसे एक चमत्कार के द्वारा इतनी सारी चमकदार, चिकनी मछलियां पकड़ी जा सकती हैं। परमेश्वर के आगे घुटनो पर आकर उस चमत्कार के प्रति उसकी प्रतिक्रिया थी। यीशु के पीछे चलते हुए उमड़ते भय के साथ पतरस अपने विश्वास में बना रहा। जब उसने ऐसा किया, वह इस आश्वस्त आश्वासन में बढ़ता गया कि यीशु उसके भरोसे के लायक था। उसके बदले में, यीशु पतरस और दुसरे चेलों को सुसमाचार के सन्देश को और चंगाई कि सामर्थ को सौंप रहा था, जिससे कि  उनका विश्वास और बढ़ गया!

पतरस इस बात को समझ गया था कि जिस शिक्षक के पीछे वो चल रहा था वह परमेश्वर का चुना हुआ, एक अभिषेक किया हुआ राजा था। उसे विश्वास था कि यीशु के पास वो सब करने कि सामर्थ थी जिसका कि वह प्रचार करता था। पतरस को पूरा विश्वास था कि जो मसीहा उसके  परमेश्वर के राज्य को स्थापित करेगा। पतरस के जीवन के यह कुछ पल थे जो उसके ह्रदय में बढ़ते हुए विश्वास को दर्शा रहे थे, और वह उभरता हुआ विश्वास परमेश्वर कि नज़र में अनमोल था। जो परमेश्वर को खोजते हैं वह उन्हें इनाम देता है।

यीशु ने उससे कहा,“’योना के पुत्र शमौन! तू धन्य है क्योंकि तुझे यह बात किसी मनुष्य ने नहीं, बल्कि स्वर्ग में स्थित मेरे परम पिता ने दर्शाई है। मैं कहता हूँ कि तू पतरस है। और इसी चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा। मृत्यु की शक्ति उस पर प्रबल नहीं होगी।'”

स्वर्गीय पिता ने ही पतरस को वह यशस्वी सच्चाई दिखाई। जब इस्राएल के लोग वचन को लेकर आपस में बड़बड़ा रहे थे, पतरस परमेश्वर कि ओर से सीख चुका था। और परमेश्वर पतरस को अपनी कलीसिया को स्थापित करने के लिए सामर्थी तरीकों से इस्तेमाल करने वाला था।

कलीसिया नई वाचा के बने हुए लोगों से  बनी होगी, जो अपने विश्वास प्रभु यीशु पर रखेंगे। उनकी मृत्यु और जी उठने के बाद, यीशु स्वर्ग में उठा लिया जाएगा जहां वह अपने पिता के दाहिने हाथ जाकर बैठेगा। वह अपनी पवित्र आत्मा उन सब पर भेजेगा जो अपने विश्वास उस पर रखेंगे। वे अपने विश्वास को पतरस और अन्य चेलों के साथ बाटेंगे, जो पूरे येरूशलेम में पूरी सामर्थ के साथ उसका प्रचार करेंगे, और वे एक साथ जीवते परमेश्वर कि कलीसिया बनके आएंगे। वे परमेश्वर के राज्य को इस पृथ्वी पर प्रतुत करेंगे!

परमेश्वर जानता था कि शैतान कलीसिया के विरुद्ध खड़ा होएगा, उन सब के विरुद्ध लड़ाई करेगा जो उद्धारकर्ता के प्रति निष्ठा रखते हैं। लेकिन यीशु ने पतरस से यह वायदा किया कि, जिस इंसान ने परमेश्वर के पुत्र का सबसे पहले प्रचार किया, अंत में, शैतान ही हारेगा। परमेश्वर अपनी कलीसिया को सच्चाई कि मज़बूत चट्टान पर अपनी कलीसिया को बनाएगा, जो जीवते परमेश्वर के पुत्र, यीशु ने घोषित किया है! यीशु के लिए उन सब ईमानदारों कि विजय निश्चित है।

यीशु ने आगे कहा:

“‘मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दे रहा हूँ। ताकि धरती पर जो कुछ तू बाँधे, वह परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग में बाँधा जाये और जो कुछ तू धरती पर छोड़े, वह स्वर्ग में परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया जाये।’”

यीशु का इससे क्या मतलब था? आपको क्या लगता है स्वर्ग कि कुंजी क्या है? क्या कोई सोने के ताले के साथ सोने कि चाबी है? नहीं। बिलकुल नहीं। यीशु आत्मिक बातों के विषय में कह रहे हैं। स्वर्ग राज्य के लिए कौन सी कुंजी है? यदि  हम देखें जो यीशु ने पतरस को अपनी सारी ज़िन्दगी करने को, हम देखते हैं कि कुंजी परमेश्वर के राज्य के सुसमॅधर को प्रचार काने का चिन्ह है. जन सुसमाचार सुनाया जाता है, तब खोये हुओं के लिए द्वार खुल जाते हैं! वे परमेश्वर के वाचा में बंधे हुए परिवार के हिस्सा बन जाते हैं, याने कि कलीसिया, और यीशु में जीवन बिताते हैं। शास्त्री और फरीसी इसके विपरीत कर रहे थे। यीशु उनके साथ साथ चल रहा था लेकिन वे स्वर्ग राज्य के द्वार को बंद कर रहे थे! मत्ती 23 में, यीशु उन्हें विश्वास के दरवाज़े के सामने खड़े होने के लिए बड़ी कठोरता के साथ डाटा है जो दूसरों के अंदर आने के लिए रास्ता बंद कर रहे हैं। लेकिन यीशु के वफादार लोग उन दरवाज़ों को खोलते रहेंगे ताकि दुसरे उनमें पूरी आज़ाद के साथ आ सकें।

प्रेरित पौलूस, जो यीशु का एक और महान सेवक था, उसने भी कई वर्षों पहले इसका वर्णन किया था। पहले उसने समझाया कि परमेश्वर का वचन विश्वास के साथ आता है। फिर उसने कहा: कि यदि तू अपने मुँह से कहे,“यीशु मसीह प्रभु है,” और तू अपने मन में यह विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जीवित किया तो तेरा उद्धार हो जायेगा।'” -रोमियों १०:९

लेकिन एक समस्या है। कोई बगैर यीशु के बारे में सुने कैसे पश्चाताप कर सकता है? पौलूस ने इस तरह स्वायल किया:
“‘किन्तु वे जो उसमें विश्वास नहीं करते, उसका नाम कैसे पुकारेंगे? और वे जिन्होंने उसके बारे में सुना ही नहीं, उसमें विश्वास कैसे कर पायेंगे? और फिर भला जब तक कोई उन्हें उपदेश देने वाला न हो, वे कैसे सुन सकेंगे? और उपदेशक तब तक उपदेश कैसे दे पायेंगे जब तक उन्हें भेजा न गया हो? जैसा कि शास्त्रों में कहा है: “सुसमाचार लाने वालों के चरण कितने सुन्दर हैं।'” -रोमियों १०:१४-१५

अद्भुद बात यह है कि पतरस के अंत में सुंदर पैर ही होंगे! यीशु के मरने और जी उठने के बाद, पतरस ही वो चेला होगा जो सबसे पहले परमेश्वर के सुसमाचार को पवित्र आत्मा के द्वारा यहूदियों को प्रचार करेगा (प्रेरितों के काम 2), सामरियों को (प्रेरितों के काम 8), और अन्यजातियों को (प्रेरितों के काम 10)  स्वार्ग के राज्य के द्वार को उसने सबके लिए खोल दिया है, सुसमाचार को पूरे संसार में प्रचार करने के लिए उसने रास्ता बना दिया है!

लेकिन यीशु ने और भी कुछ कहा। उसका क्या मतलब था जब उसने ऐसा कहा कि जो पतरस इस पृथ्वी पर बंधेगा वो स्वर्ग में  खोला जाएगा, और जो चीज़ें उसने पृथ्वी में खोई हैं वे स्वर्ग में खोली जाएंगी? इस पूरी कहानी में, पतरस आशीषित हुआ क्यूंकि उसने माना कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है। यही विश्वास स्वर्ग के राज्य के जीवन के द्वार को खोलता है। पतरस को यह दर्शा कर परमेश्वर पिता ने उसे अशिक्षित किया। अब पतरस को प्रचार करने का अधिकार दिया गया था कि कैसे कलीसिया में सिखाय कि पाप कैसे क्षमा हो सकते हैं और किसी के पश्चाताप न करने पर कलीसिया में क्या होता है उस व्यक्ति को निर्वासित कर दिया जाता है। यह बुद्धि और अधिकार पतरस कि अपनी सामर्थ में नहीं था। यह परमेश्वर कि ओर से दी हुई आशीष और ज्ञान था!

पतरस उस दिन इन सब बातों को नहीं समझ पाया। लेकिन उसने यीशु से उन सब बातों को लिया और विश्वास में आगे कदम बढ़ाया, और इन ही सब बातों से अंतर आया। यीशु ने अपने चेलों कोई चेतावनी दी कि वे किसी को ना बताएं कि वह कौन था। जो संदेश विश्वास में बढ़ने वालों के लिए प्रदर्शित हुआ वही उनके लिए जिन्होंने अस्वीकार किया उनसे वह छिप जाएगा।

कहानी २६: लड़ाई का शुरू होना

religious scene, Christ and his disciples

यूहन्ना १ः१९-५१

उसके बपतिस्मा के बाद, यीशु,पवित्र आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाया गया की वह शैतान के द्वारा परखा जाए। इस बीच येरूशलेम के सलाहकार जो देश के सबसे सामर्थी धार्मिक अग्वे थे, उन्होंने याजकों को यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के पास सवाल करने के लिए भेजा। किसी ने भी यूहन्ना को प्रचार करने के लिए अधिकार नहीं दिया था। क्या वह परमेश्वर द्वारा भेजा गया मनुष्य था, या वह एक पाखंडी था? क्या वह मसीहा हो सकता था? यूहन्ना ने तुरंत घोषित किया कि वह वो मसीहा नहीं है जिसका उनको इंतज़ार है। उन्होंने उससे बहुत सवाल किये। यदि वह यीशु नहीं था तो कौन था ? एक नबी ? एलिजा ? वे लोगों को क्या जवाब देंगे जिन्होंने उनको भेजा था ?

यूहन्ना ने उनको अपने ज्ञान के बल पर उत्तर दिया “ मैं उसकी आवाज़ हूँ जो जंगल में पुकार रहा है:‘प्रभु के लिये सीधा रास्ता बनाओ।’”जैसे कि यशायाह नबी ने कहा था।
यह वचन परमेश्वर ने उसे और उसके माँ बाप को दर्शाया और वह अपने आप को कम या ज़यादा नही कहता।
अंत में फरीसियों में से कुछ ने उस से पूछा, यदि वह पुराने नियम में के महान नेताओं में से एक नहीं था तो उसे लोगों को बपतिस्मा देने का क्या अधिकार था ?

उसने कहा ‘ मैं जल से बपतिस्मा देता हूँ लेकिन आप के बीच में एक खड़ा है जिसे आप नहीं जानते ,वह मेरे पीछे आता है, जिसका जूता मैं खोलने के योग्य नहीं हूँ। ‘ “

वाह ! उन दिनों में, सड़कें धूल से भरी थीं, और अधिकतर लोग पैदल सब जगह जाया करते थे। जूतों को बांधना और खोलना एक बहुत विनम्र काम हुआ करता था। यूहन्ना को नहीं लगा कि वह इस काम को करने के योग्य है और विशेषकर के जब यीशु के पैरों से उनके जूते खोलने थे। इस परमेश्वर की इच्छा के आगे यूहन्ना कितना सही और शुद्ध था। जो मनुष्य यूहन्ना के पास सवाल करने के लिए आये थे वे समझते थे कि उनके पास उन सवालों का उत्तर पाने का पूरा अधिकार है।परन्तु परमेश्वर ने यूहन्ना को उसके आने के सन्देश के विषय में अधिकार दिया था। परमेश्वर कि योजनाओं के विषय में उन अधिकारीयों कि आँखें बंध थीं और यह दर्शा रहा था कि उनके ह्रदय कितने कठोर थे।

जिस समय धार्मिक अग्वे परमेश्वर कि योजनाओं को अस्वीकार कर रहे थे, बहुत से लोग यूहन्ना के सन्देश पर विश्वास कर के बपतिस्मा ले रहे थे। इन लोगों ने सुना कि पवित्र आत्मा यूहन्ना से क्या  कह रहा है, और वे उसके पीछे चलने को बहुत उत्साहित थे।  अधिकतर लोग उसके चेले बन गए थे। उसकी वचन कि बातों को सुनने के लिए वे बहुत दिन तक नदी के किनारे डेरा लगाकर रहने लगे।

क्या आप ऐसे व्यक्ति नहीं बनना चाहेंगे? यह कितना भयानक विचार है ऐसा सोचना कि हम परमेश्वर कि योजनाओं के विरुद्ध अपने मनों को कठोर कर लें ! सबसे सुरक्षित बात यह होगी कि हम वही करें जैसा यूहन्ना कहता है। हमें परमेश्वर के आगे निरंतर विनम्र और पश्चाताप के ह्रदय के साथ आना चाहिए।

उस समय, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला यरदन शहर के पास बपतिस्मा देता था। जंगल में स्वर्गदूत जब यीशु कि सेवकाई कर चुके, वह बेथनी के डेरे में वापस चला गया। एक दिन, जब यीशु वहाँ से गुज़र रहा था, यूहन्ना ने कुछ चेलों से कहा, “उस परमेश्वर के मेमने को देखो, जो सारी दुनिया का पाप लिये जाता है!” वाह ! यह एक दम भरने वाला विशाल बयान है। उन सब पाप के वषय में सोचो जो श्राप के कारण इस दुनिया में आया। हर झूठ, हर खून, हर स्वार्थ से भरा काम या गंदे मज़ाक, हर चोरी, हर गिरा हुआ पाप, और हर एक व्यक्ति का सबसे भत्तर हिस्सा, यह सब यह एक मनुष्य दूर कर देगा। या तो यह एक विशाल सच है जो एक श्रापित दुनिया ने सुना होगा या फिर यह एक बेतुका झूठ है और यूहन्ना एक बददिमाग इंसान था।

तब यूहन्ना ने कहा कि यीशु है जिसकी जूते वह पकड़ने के योग्य नहीं था। जिसके विषय उसने  बात की वह आ गया था! उसने कहा, “जिस कारण मैं पानी का बपतिस्मा देने के लिए आया था वह इसलिए था कि वह इस्राएल को प्रकट हो सके।  वाह ! यूहन्ना अपने सारे जीवन भर यीशु के विषय में बता सकता था और यह कि यीशु क्या कुछ करने वाला था और वह पूरी पूरी गहराई से उस पर विश्वास करता था जिसका वह प्रचार करता था। स्वर्गदूतों का उसके पिता के सामने प्रकट होना जो पवित्र से भी पवित्र था, उसकी माँ का अद्बुध तरीके से गर्भवती होना, जंगल में बहुत साल तक रहना, यह सब उस यीशु के विषय में था जो गलील में एक बढई था। यूहन्ना कैसे जानता था? वह यह कैसे जान सकता था कि उसका भाई पुराने नबियों में से वो मसीहा था ?

यूहन्ना ने यह माना कि यदि परमेश्वर ने उसे यह नहीं दिखाया होता कि यीशु ही वो है तो वह कभी नहीं जान पाता। जो परमेश्वर ने कहा उसपर उसे पूरा भरोसा था। परमेश्वर ने यूहन्ना को बता दिया था कि जब वह व्यक्ति आएगा तब उसपर पवित्र आत्मा उतरेगा।  यह ठीक वैसा ही हुआ जब उसने यीशु को बपतिस्मा दिया। यूहन्ना को पूरा विश्वास था कि  पिता परमेश्वर ने उसे मसीहा को प्रकट कर दिया था।  और तब वह साहसपूर्व घोषित करने लगा कि,”मैंने परमेश्वर के पुत्र को देखा है और उसकी गवाही देता हुँ। ”

दुसरे दिन जब यूहन्ना दो चेलों के साथ खड़ा था, यीशु दुबारा वहाँ से गुज़रा।  उसने कहा ,”देखो, परमेश्वर का मेमना!” चेले जानते थे कि यूहन्ना सच बोलता है और वे यीशु के पीछे हो लिए। यीशु ने पीछे मुड़ कर उन्हें अपने पीछे आते देखा। “तुम्हें क्या चाहिए ?” उसने पुछा।

उन्होंने कहा, “रब्बी, आप कहाँ रहते हैं ?” अब, यह शब्द “रब्बी” का अर्थ है शिक्षक, परन्तु इसका मतलब कोई भी शिक्षक नहीं। इसका अर्थ है मेरा शिक्षक। योहन्ना के यह चेले चाहते थे कि यीशु उनको अपना बना ले।

“आओ ‘उसने उत्तर दिया, “और तुम देखोगे। “दोपहर के चार बज रहे थे। वे यीशु के साथ चले गए और उसके साथ पूरा दिन बिताया। उनमें से एक का नाम अन्द्रियास था। जैसे ही उसने सुना जो यूहन्ना ने कहा था, वह अपने भाई, जिसका नाम शिमोन था, उसे ढ़ूंढ़ने चला गया। सोचिये, वह कितना खुश हुआ होगा जब उसे यह बताया गया होगा कि “हमें मसीहा मिल गया है! “तब शिमोन को वह यीशु के पास सीधे ले गया। जब यीशु ने शिमोन को देखा तब उसने कहा, “तुम शिमोन हो, यूहन्ना के बेटे।  तुम्हारा नाम केफस होगा ( जिसका अर्थ पतरस भी है।  इसका अर्थ है ‘चट्टान “)

दुसरे दिन यीशु ने गलील जाने की योजना बनाई। वह एक व्यक्ति जिसका नाम फिलिपूस था उसके पास गया और बोला “मेरे पीछे हो ले। फिलिपूस उसी नगर था जहाँ के पतरस और अन्द्रियास थे।  यह गलील के समुन्दर के उतरी भाग के पानी के किनारे पर बसा हुआ एक शहर था।फिलिपूस अपने दोस्त नतनएल को खोजने गया ताकि वह भी उनके साथ आ सके। उसने कहा,”” ‘ हमने उसे खोज लिया है जिसके विषय में मूसा ने नियम में लिखा था, और जिसके विषय में नबियों ने लिखा था – यीशु नासरी, युसूफ का पुत्र। ”

नतनएल ने कहा,” नासरी! क्या नासरी से कुछ अच्छा निकल कर आ सकता है ? ” इस्राएल में तो बहुत से सुन्दर शहर और पसंद आने वाली जगहैं हैं, और नासरी उसमें से एक नहीं हो सकता। नथानियल को यह बहुत अजीब और अद्बुध लगा कि यीशु ऐसे शहर से आया था। लेकिन फिलिपूस का ध्यान ओझल नहीं हो सकता था।  “आओ और देखो !”  उसने ज़ोर दिया।

जब नतनएल यीशु के पास गया, तो यीशु ने कहा, “यहाँ एक सच्चा इस्राएली है जिसके अंदर कोई असत्य नहीं है। ”
“‘आप मुझे कैसे जानते हैं? ‘ नतनएल ने पूछा।”
‘यीशु ने उत्तर दिया, “फिलिपूस के बुलाने से पहले मैंने तुम्हे खजूर के पेड़ के नीचे खड़े देखा था। ”
नथानियल बहुत चौकन्ना हुआ। उसने पुकार के कहा, “रब्बी , आप परमेश्वर के पुत्र् हैं, आप इस्राएल के राजा हैं। ‘”
यीशु ने वापस उत्तर दिया, “तुम विश्वास करते हो क्युंकि मैंने तुम्हे बताया कि मैंने तुम्हे खजूर के पेड़ के नीचे खड़े देखा था।
तुम इससे भी बड़े बड़े काम देखोगे.. मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुम स्वर्ग को खुलते देखोगे, और मनुष्य के पुत्र् पर परमेश्वर के स्वर्गदूतों को उतरते और चढ़ते देखोगे। ”

वाह ! क्या आप चेलों की उत्तेजना को समझ सकते हैं जब वे यीशु के साथ साथ चलेंगे और बातें करेंगे? यह मसीह था, और उसने उनको चुन लिया था !