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कहनी १३१: प्रार्थना कैसे करनी चाहिए 

लूका १८:१-१७

जब लूका ने अपने सुसमाचार में इन बातों को लिखा, उसने यह सीखने का निश्चय किया कि किस प्रकार यीशु के चेलों को जीवन जीना चाहिए। पहले, यीशु ने दृष्टान्त के द्वारा समझाया। लूका ने कहा और यीशु ने दिया “…. उन्हें यह दिखाएं कि निरंतर प्रार्थना करें और कभी हार ना मानें।”

कहानी इस प्रकार है:

“’किसी नगर में एक न्यायाधीश हुआ करता था। वह न तो परमेश्वर से डरता था और न ही मनुष्यों की परवाह करता था। उसी नगर में एक विधवा भी रहा करती थी। और वह उसके पास बार बार आती और कहती,‘देख, मुझे मेरे प्रति किए गए अन्याय के विरुद्ध न्याय मिलना ही चाहिये।’ सो एक लम्बे समय तक तो वह न्यायाधीश आनाकानी करता रहा पर आखिरकार उसने अपने मन में सोचा,‘न तो मैं परमेश्वर से डरता हूँ और न लोगों की परवाह करता हूँ। तो भी क्योंकि इस विधवा ने मेरे कान खा डाले हैं, सो मैं देखूँगा कि उसे न्याय मिल जाये ताकि यह मेरे पास बार-बार आकर कहीं मुझे ही न थका डाले।’’” -लूका १८:२-५

फिर यीशु ने कहा,
“’देखो उस दुष्ट न्यायाधीश ने क्या कहा था। सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों पर ध्यान नहीं देगा कि उन्हें, जो उसे रात दिन पुकारते रहते हैं, न्याय मिले? क्या वह उनकी सहायता करने में देर लगायेगा? मैं तुमसे कहता हूँ कि वह देखेगा कि उन्हें न्याय मिल चुका है और शीघ्र ही मिल चुका है।'” -लूका १८:६-८

आपने देखा कि कैसे यीशु इस कहानी में बहस को बनाता है? यदि एक दुष्ट न्यायधीश एक स्त्री कि प्रार्थना को सुन लेता है जो उसे परेशान किये हुए थी, तो एक अच्छा और दयालू परमेश्वर उनके लिए क्या कुछ ना करेगा जिनसे वह उत्साहपूर्वक प्रेम करता है? यदि एक कमज़ोर और भ्रष्ट व्यक्ति गुस्से में आकर किसी कि मांग को पूरा कर सकता है, तो एक परमेश्वर जो सब बातों में प्रथम है, वह अपने बच्चों के लिए क्या कुछ ना करेग?

यह याद रखना ज़रूरी है कि, यह पद यीशु के आने के विषय में सबसे पहली हैं, क्यूंकि वह वक़्त होगा जब सब कुछ सही हो जाएगा। सब प्रकार के अन्याय और गलत बातें बदल जाएंगी, और परमेश्वर उन्हें नया कर देगा। इस सबके लिए गम्भीरता के साथ प्रार्थना करना सही होगा।

यह हर एक अन्याय और कष्ट जो इस पृथ्वी पर उसके पीछे चलने वालों को सहना पड़ रहा है, उन पर लागू होता है। उसके चुने हुओं को हार नहीं माननी चाहिए! वे अपने पिता को पुकार सकते हैं, यह जानते हुए कि वह एक ज़िद्दी और मतलबी किस्म का न्यायधीश नहीं है। वह उनकी प्रार्थनाओं को सुनेगा! वह अपने लोगों को श्राप के कष्टों से छुटकारा देने में खुश होता है! जितना कि हम चाहते हैं उससे बढ़ कर परमेश्वर अपनी सहायता को और समय के लिए लाना चाहता है। कभी ऐसे दिन होते हैं जब हमें लगता है कि हमारी प्रार्थना सुनी नहीं गयी है। और कुछ बातों के लिए, हमें तब तक प्रतीक्षा करना होगा जब हम स्वर्ग में यीशु के साथ वह पूरी चंगाई को देख सकेंगे और न्याय को पा सकेंगे। परन्तु वे जो विश्वास में लगे रहेंगे वे परमेश्वर के छुटकारे को देखेंगे!

जब यीशु ने इस कहानी को समाप्त किया उसने पूछा,”‘फिर भी जब मनुष्य का पुत्र आयेगा तो क्या वह इस धरती पर विश्वास को पायेगा?’” आपको क्या लगता उसने यह सवाल क्यूँ पुछा होगा? क्या आपको लगता है कि वह चिंतित है? आपको लगता है कि शायद एक भी विश्वासी जन उसके आने पर नहीं बचेगा? वह ऐसा क्यूँ पूछेगा?

यीशु एक चुनौती दे रहा था। उसके आने कि घड़ी को कोई नहीं जानता। वह कल हो सकता है। एक सौ साल बाद भी हो सकता है। परन्तु हर एक पीढ़ी को इस तरह जीना और प्रार्थना करना चाहिए मानो वह कल ही आ रहा हो, क्यूंकि जब वह आएगा, वह उन्हें ढूंढेगा जो अपने महान राजा  वफादार रहे। हम यीशु के प्रशन्न को इस तरह पढ़ें,”जब मैं आऊंगा, क्या मैं तुम्हे वफादार पाऊंगा?”

यीशु ने अपने कुछ दृष्टान्तों से दिखाया कि कैसे हमें उसके पास आना है। यीशु के समय में, एक विधवा एक बहुत ही भेद्य स्त्री हुआ करती थी। उसकि देखभाल करने के लिए और उसे उन लालची और पापी पुरुषों से बचाने के लिए उसके पास उसका पति नहीं था। लेकिन जब हम एक मज़बूत विधवा को देखते हैं जो बार बार उस न्यायधीश के पास जाती है, तो एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती हैं। वह विधवा बिना समाधान के नहीं थी। वह कुछ कर सकती थी और उसने कर दिखाया। वह उस व्यक्ति के पास गयी जिसे न्याय दिलाना ही चाहिए, और उसने उससे मांग की। विधवा स्त्री कि यह एक ऐसी तस्वीर है जो भेद्य है। लेकिन एक है जिसके पास हम जा सकते हैं। वास्तव में, हमें उसके पास जाना ही चाहिए। वही हमारी उम्मीद और भरोसा है। सबसे बड़ा फर्क यह है कि स्वर्ग में हमारा न्यायधीश हमसे प्रेम करता है और ठहरा रहता है कि हमें कब न्याय और शांति दे। हम प्रार्थना में उसके सिंहासन के पास पूरी स्वतन्त्रता और भरोसे के साथ आ सकते हैं!

उस विध्वा कि कहानी बताने के बाद, यीशु ने एक दृष्टान्त बताया। इस बार, वह दो व्यक्तियों का उदहारण देता है जो प्रार्थना करते हैं। उनमें से एक, उस विधवा के समान विनम्रता के साथ आता है। और दूसरा एक अलग रवैया ले कर आता है। वह एक अप्रिय इंसान है। एक समस्या यह है कि, हर मनुष्य के ह्रदय में यह आज़माईश होती है कि उसके समान बनें! क्या कहते हैं:

“”मन्दिर में दो व्यक्ति प्रार्थना करने गये, एक फ़रीसी था और दूसरा कर वसूलने वाला। वह फ़रीसी अलग खड़ा होकर यह प्रार्थना करने लगा,‘हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं दूसरे लोगों जैसा डाकू, ठग और व्यभिचारी नहीं हूँ और न ही इस कर वसूलने वाले जैसा हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूँ और अपनी समूची आय का दसवाँ भाग दान देता हूँ।’’”

यह व्यक्ति कितना धार्मिक लगता है। यीशु ने दुसरे व्यक्ति के विषय में यह कहा,
“’किन्तु वह कर वसूलने वाला जो दूर खड़ा था और यहाँ तक कि स्वर्ग की ओर अपनी आँखें तक नहीं उठा रहा था, अपनी छाती पीटते हुए बोला,‘हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।’”

कौन से व्यक्ति के साथ यीशु ने सहमति दिखाई? वह किसे एक ज़यादा बुरा उदारहण समझता है? उसने कहा,
“‘मैं तुम्हें बताता हूँ, यही मनुष्य नेक ठहराया जाकर अपने घर लौटा, न कि वह दूसरा। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो अपने आप को बड़ा समझेगा, उसे छोटा बना दिया जायेगा और जो अपने आप को दीन मानेगा, उसे बड़ा बना दिया जायेगा।’”

चेलों को झटका लगा। क्या? इस्राएल में, चुंगी लेने वाले को सबसे नीच व्यक्ति माना जाता था। साधारण यहूदी उसके साथ भोजन भी नहीं करते हैं। परन्तु एक फरीसी बहुत ही इज़ज़द्दार माना जाता है! उनके सारे यहूदी तरीके परमेश्वर के तरीकों से विपरीत थे!

यीशु ने कहा कि मनुष्य का परमेश्वर के पास नम्रता के साथ आना ही उसे पसंद है चाहे वह कितना भी पापी हो। फरीसी का परमेश्वर के पास हेकड़ी के साथ आना एक बहुत बड़ा अपराध था। उन्होंने प्रार्थना को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया, जबकि वह एक पवित्र भेंट है जो हमें अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष लाना होता है। और वह घमंड आम तौर पर शांत विचारों से नहीं संतुष्ट होता है। घमंडी व्यक्ति चाहता है कि दुसरे उसके प्रधानता के आगे झुंके। यह ना केवल दूसरों के महत्त्व को कम करता है, बल्कि वे चाहते हैं कि वे उनकी महानता के समाने अपने आप को कम समझें। फरीसी परमेश्वर कि वस्तुओं का उपयोग करके लोगों के समाने अपने आप को छोटे ईश्वर बनके ऊँचा दिखाते थे।

लेकिन, हमारे जीवन कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, यदि हम अपने आप को परमेश्वर के आगे सही रीति से पेश करते हैं या नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सही रहे। इस कहानी में, फरीसी परमेश्वर को आराधना और प्रेम से भर के प्रार्थना नहीं कर रहा था। वह वास्तव में अपने आप कि आराधना कर रहा था, और उसका दुसरे पापियों के प्रति प्रतियोगिता करने का गुस्सा, यह प्रदर्शित करता था कि उसे परमेश्वर के बच्चों के लिए कोई परवाह नहीं थी। वह सब गलत कारणों के लिए सही चीज़ करता था। चुंगी लेने वाले व्यक्ति के पास दूसरों पर न्याय करने या उन्हें दोषी ठहराने का समय नहीं था। वह परमेश्वर के आगे अपने पश्चाताप कि चाहत को लेकर आता रहा। इससे परमेश्वर खुश होता है, और परमेश्वर के वचन का आज्ञापालन करने का यही सही तरीका है!

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कहानी ८४: शिष्यों का भेजा जाना 

मत्ती ९:३५-१०:४२, मरकुस ६:६b-११, लूका ९ १-५

यीशु के जीवन के विषय में पढ़ते समय आपनी ध्यान दिया होगा कि, मत्ती के अध्याय पूरी तरह से मिल गए हैं। उद्धारण के लिये, हमने पांचवे अध्याय से लेकर सांतवे अध्याय को पड़ने से पहले आठवे अध्याय को पढ़ा। ऐसा इसलिए है क्यूंकि हम चारों सुसमाचारों कि कहानियों को एक साथ कर रहे हैं। सुसमाचारों के लेखक का यीशु के जीवन के विषय में लिखने का अपना ही अंदाज़ था। हम यह मानते हैं कि मत्ती ने कहानी को इस तरह लिखा कि अपने चेलों को सिखा सके कि यीशु के लिए कैसे जीना है। यह थोडा पाठ्यपुस्तक कि तरह थी। उसने अपने लिखे हुए काम को इस तरह व्यवस्थित किया ताकि दूसरों को सीखने में आसानी हो। उस व्यवस्थित कार्य को उसने पांच भागों में बात जो यीशु ने सिखाय थे। पहला भाग पहाड़ पर सन्देश का है, जो यह सिखाता है कि कैसे परमेश्वर के राज्य में जीना है। अगला भाग वो है जिसे हम अभी पढ़ने वाले हैं। वह मत्ती 10 से है, और उसमें, यीशु अपने चेलों को सिखाते हैं कि कैसे उन्हें स्वर्गराज्य के लिए सुसमाचार का प्रचार करना है।

यीशु ने सभी शहरों और गांवों में जाकर प्रचार किया। उसे भीड़ पर बहुत दया आई जो उसके पास आती थी। वे जीवन के सभी दबावों और जीवन की पीड़ा से दुखी थे। वे चरवाहे के बिना उस भेड़ के समान थे, और उस नाज़ुक जानवर जो शातिर दुश्मन के द्वारा शिकार किया जाता और ज़ख़्मी किया जाता है।तब यीशु ने अपनेचेलों से कहा,“तैयार खेत तो बहुत हैं किन्तु मज़दूर कम हैं।'” एक खेत में, समय आता है जब फल और अनाज को जमा किया जाता है। यह परिश्रम और उत्सव मनाने का समय होगा जब बहुतायत से फसल को लाया जाएगा। जब यीशु ने भीड़ को देखा जो उसके पीछे आती थी, उसने देखा कि बहुतों के ह्रदय स्वर्ग के राज्य के लिए तैयार थे।  तब यीशु ने अपने चेलों से कहा,“तैयार खेत तो बहुत हैं किन्तु मज़दूर कम हैं। इसलिए फसल के प्रभु से प्रार्थना करो कि, वह अपनी फसल को काटने के लिये मज़दूर भेजे।”

जैसे ही यीशु ने उस ज़बरदस्त आवश्यकता को देखा, उन्होंने चेलों को प्रार्थना करने के लिए कहा।यह एक बहुत ही असरदार कार्य था जो वे लोगों कि आवश्यकताओं को मिलाने के लिए कर सकते थे। क्यूंकि आप देखिये, फसल जो है वह परमेश्वर कि फसल है, और लोग उसके लोग हैं। वही है जो उनके प्रति ज़िम्मेदार था और रहेगा। चेलों कि ज़िम्मेदारी थी कि वे उन के लिए प्रार्थना करें जो परमेश्वर के महान फसल कि कटाई के सहभागी थे।

यह कितना दिलचस्प है कि कैसे परमेश्वर प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। मत्ती के अगले ही कहानी में, यीशु ने कुछ दिलचस्प किया। उसने अपने चेलों को फसल काटने के लिए अच्छी तरह तैयार कर दिया था।

यीशु ने सबसे पहले अपने बारह चेलों के जोड़े बनाय। शमौन पतरस को उसके भाई अंद्रियास के साथ रखा। उसके बाद याकूब और यूहन्ना,फिर फिलिप्पुस और बरतुल्मै। फिर यीशु ने थोमा और मत्ती को मिलाया, और फिर हलफै और तद्दै का बेटा याकूब। आखिर में शमौन जिलौत जो यहूदा इस्करियोती के साथ रखा गया। यही वह है जो यीशु को धोखे से पकड़वाएगा। इन जोड़ों को बाहर जाकर स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा जा रहा था। यीशु ने उन्हें दुष्ट आत्माओं को निकलने कि सामर्थ और अधिकार दिया था। उसने उनको सब प्रकार कि बीमारियों को चंगा करने कि शक्ति दी थी।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि चेलों को कैसा लग रहा होगा? यीशु के साथ सब जगह यात्रा करके और उसे अद्भुद कार्यों को करते देखने के बाद उन्हें भी निमंत्रण दिया गया था कि वे भी उसी सन्देश को उसी सामर्थ के साथ बाटें! उनका नया अधिकार इतना ऊपर तक पहुँच गया था कि जो गिरे हुए दूत थे वे भी इन चेलों के आधीन होगये थे! वे चेले के पद से प्रेरित बन चुके थे। उन्हें एक विशेष कार्य से भेजा जा रहा था, और यह उनके आगे के जीवन को तैयार करने के लिए परमेश्वर का महत्वपूर्ण भाग था!

यीशु ने इन बारहों को बाहर भेजते हुए आज्ञा दी कि क्या करना है और क्या नहीं। उसने कहा,
“‘गैर यहूदियों के क्षेत्र में मत जाओ तथा किसी भी सामरी नगर में प्रवेश मत करो। बल्कि इस्राएल के परिवार की खोई हुई भेड़ों के पास ही जाओ और उन्हें उपदेश दो,‘स्वर्ग का राज्य निकट है।’बीमारों को ठीक करो, मरे हुओं को जीवन दो, कोढ़ियों को चंगा करो और दुष्टात्माओं को निकालो। तुमने बिना कुछ दिये प्रभु की आशीष और शक्तियाँ पाई हैं, इसलिये उन्हें दूसरों को बिना कुछ लिये मुक्त भाव से बाँटो। अपने पटुके में सोना, चाँदी या ताँबा मत रखो। यात्रा के लिए कोई झोला तक मत लो। कोई फालतू कुर्ता, चप्पल और छड़ी मत रखो क्योंकि मज़दूर का उसके खाने पर अधिकार है।'”

“तुम लोग जब कभी किसी नगर या गाँव में जाओ तो पता करो कि वहाँ विश्वासयोग्य कौन है। फिर तब तक वहीं ठहरे रहो जब तक वहाँ से चल न दो। जब तुम किसी घर-बार में जाओ तो परिवार के लोगों का सत्कार करते हुए कहो, ‘तुम्हें शांति मिले।’ यदि घर-बार के लोग योग्य होंगे तो तुम्हारा आशीर्वाद उनके साथ साथ रहेगा और यदि वे इस योग्य न होंगे तो तुम्हारा आशीर्वाद तुम्हारे पास वापस आ जाएगा।  यदि कोई तुम्हारा स्वागत न करे या तुम्हारी बात न सुने तो उस घर या उस नगर को छोड़ दो। और अपने पाँव में लगी वहाँ की धूल वहीं झाड़ दो। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब न्याय होगा, उस दिन उस नगर की स्थिति से सदोम और अमोरा नगरों की स्थिति कहीं अच्छी होगी। मैं तुम्हें ऐसे ही बाहर भेज रहा हूँ जैसे भेड़ों को भेड़ियों के बीच में भेजा जाये। सो साँपों की तरह चतुर और कबूतरों के समान भोले बनो।'”

“‘लोगों से सावधान रहना क्योंकि वे तुम्हें बंदी बनाकर यहूदी पंचायतों को सौंप देंगे और वे तुम्हें अपने आराधनालयों में कोड़ों से पिटवायेंगे। तुम्हें शासकों और राजाओं के सामने पेश किया जायेगा, क्योंकि तुम मेरे अनुयायी हो। तुम्हें अवसर दिया जायेगा कि तुम उनकी और ग़ैर यहूदियों को मेरे बारे में गवाही दो। जब वे तुम्हें पकड़े तो चिंता मत करना कि, तुम्हें क्या कहना है और कैसे कहना है। क्योंकि उस समय तुम्हें बता दिया जायेगा कि तुम्हें क्या बोलना है। याद रखो बोलने वाले तुम नहीं हो, बल्कि तुम्हारे परम पिता की आत्मा तुम्हारे भीतर बोलेगी।'”

“भाई अपने भाईयों को पकड़वा कर मरवा डालेंगे, माता-पिता अपने बच्चों को पकड़वायेंगे और बच्चे अपने माँ-बाप के विरुद्ध हो जायेंगे। वे उन्हें मरवा डालेंगे। मेरे नाम के कारण लोग तुमसे घृणा करेंगे किन्तु जो अंत तक टिका रहेगा उसी का उद्धार होगा। वे जब तुम्हें एक नगर में सताएँ तो तुम दूसरे में भाग जाना। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि इससे पहले कि तुम इस्राएल के सभी नगरों का चक्कर पूरा करो, मनुष्य का पुत्र दुबारा आ जाएगा।'”

“शिष्य अपने गुरु से बड़ा नहीं होता और न ही कोई दास अपने स्वामी से बड़ा होता है। शिष्य को गुरु के बराबर होने में और दास को स्वामी के बराबर होने में ही संतोष करना चाहिये। जब वे घर के स्वामी को ही बैल्जा़बुल कहते हैं, तो उसके घर के दूसरे लोगों के साथ तो और भी बुरा व्यवहार करेंगे! इसलिये उनसे डरना मत क्योंकि जो कुछ छिपा है, सब उजागर होगा। और हर वह वस्तु जो गुप्त है, प्रकट की जायेगी।  मैं अँधेरे में जो कुछ तुमसे कहता हूँ, मैं चाहता हूँ, उसे तुम उजाले में कहो। मैंने जो कुछ तुम्हारे कानों में कहा है, तुम उसकी मकान की छतों पर चढ़कर, घोषणा करो। उनसे मत डरो जो तुम्हारे शरीर को नष्ट कर सकते हैं किन्तु तुम्हारी आत्मा को नहीं मार सकते। बस उस परमेश्वर से डरो जो तुम्हारे शरीर और तुम्हारी आत्मा को नरक में डालकर नष्ट कर सकता है।'”

“‘एक पैसे की दो चिड़ियाओं में से भी एक तुम्हारे परम पिता के जाने बिना और उसकी इच्छा के बिना धरती पर नहीं गिर सकती। अरे तुम्हारे तो सिर का एक एक बाल तक गिना हुआ है। इसलिये डरो मत तुम्हारा मूल्य तो वैसी अनेक चिड़ियाओं से कहीं अधिक है।

“’जो कोई मुझे सब लोगों के सामने अपनायेगा, मैं भी उसे स्वर्ग में स्थित अपने परम-पिता के सामने अपनाऊँगा। किन्तु जो कोई मुझे सब लोगों के सामने नकारेगा, मैं भी उसे स्वर्ग में स्थित परम-पिता के सामने नकारूँगा।'”

“यह मत सोचो कि मैं धरती पर शांति लाने आया हूँ। शांति नहीं बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ।  मैं यह करने आया हूँ:

‘पुत्र, पिता के विरोध में,
पुत्री, माँ के विरोध में,
बहू, सास के विरोध में होंगे।
मनुष्य के शत्रु, उसके अपने घर के ही लोग होंगे।’

“जो अपने माता-पिता को मुझसे अधिक प्रेम करता है, वह मेरा होने के योग्य नहीं है। जो अपने बेटे बेटी को मुझसे ज्या़दा प्यार करता है, वह मेरा होने के योग्य नहीं है। वह जो यातनाओं का अपना क्रूस स्वयं उठाकर मेरे पीछे नहीं हो लेता, मेरा होने के योग्य नहीं है। वह जो अपनी जान बचाने की चेष्टा करता है, अपने प्राण खो देगा। किन्तु जो मेरे लिये अपनी जान देगा, वह जीवन पायेगा।'”

“जो तुम्हें अपनाता है, वह मुझे अपनाता है और जो मुझे अपनाता है, वह उस परमेश्वर को अपनाता है, जिसने मुझे भेजा है। जो किसी नबी को इसलिये अपनाता है कि वह नबी है, उसे वही प्रतिफल मिलेगा जो कि नबी को मिलता है। और यदि तुम किसी भले आदमी का इसलिये स्वागत करते हो कि वह भला आदमी है, उसे सचमुच वही प्रतिफल मिलेगा जो किसी भले आदमी को मिलना चाहिए। और यदि कोई मेरे इन भोले-भाले शिष्यों में से किसी एक को भी इसलिये एक गिलास ठंडा पानी तक दे कि वह मेरा अनुयायी है, तो मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि उसे इसका प्रतिफल, निश्चय ही, बिना मिले नहीं रहेगा।’”

कहानी ६०: पहाड़ पर उपदेश – प्रार्थना में परमेश्वर के सम्मान  भाग II

मत्ती ६ः११-१५

यीशु ने हमें प्रार्थना के लिए एक नमूना दे दिया। सबसे पहले हम स्तुति और आराधना में अपने पवित्र और सामर्थ परमेश्वर के पास आते हैं। फिर हम उसकी इच्छा जानने के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन यीशु ने यह भी सिखाया कि हमारा जीवन और ज़रूरतें परमेश्वर को बहुत मायने रखता है। जो प्रार्थना उसने चेलों को सिखाई, वो कहता है :
“‘हमारी रोज़ कि रोटी आज हमें दे।'”

यीशु के दिनों में, यहूदी लोग जो मजदूर थे, वे कई अमीर लोगों के स्वामित्व में खेतों में काम किया करते थे। वे अक्सर अपने परिवारों को खिला नहीं पाते थे क्यूंकि उनको कम भुक्तान मिलता था। उनको यह पता नहीं होता था कि वे अपने बच्चों को खाने के लिए पर्याप्त भोजन दे पाएंगे या नहीं। यीशु ने अपने चेलों से इन वास्तविक जरूरतों के लिए प्रार्थना करने को कहा। परमेश्वर उन प्रार्थनाओं को सुनता है। वह भरोसेमंद है!

भोजन हर इंसान कि एक दैनिक जरूरत है। लेकिन यही एक ज़रुरत नहीं जिसके लिए यीशु चाहता है कि उसके शिष्य प्रार्थना ना करें। वह अपने राज्य के लोगों को चाहता है कि सब बातों के लिए उस पर निर्भर रहे। प्रार्थना हमारा तरीका है कि हम अपने रजा से अपनी ज़रूरतों के लिए प्रार्थना करें। और कौन उनको पूरा कर सकता है? आपकी रोज़ कि ज़रूरतें कौन सी हैं जो आपको रोज़ के जीवन में मदद करती हैं? यीशु सब देखता है, और हमें बताया है कि हम उन सब बातों के लिए परमेश्वर पिता से कहें।

इस पापी दुनिया में हम सब कि एक और ज़रुरत है। यह रोटी शारीरिक रूप से हमारे लिए है जितनी महत्वपूर्ण है उतना ही आत्मिक रूप से हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हमें प्रत्येक दिन उससे उन पापों के लिए परमेश्वर से माफी मांगने कि ज़रुरत है। यीशु नेअपने चेलों को प्रार्थना सिखाई, “हमारे अपराधों को क्षमा कर” क्यूंकि वह हमें शुद्ध और साफ़ करना चाहता है। परन्तु हमें उसके पास दीन होकर आना है। हमें पश्चाताप करना है, मानना है कि हम गलत हैं और अपना बचाव करते हैं जब हम यीशु के मार्ग में चलके अपने ही मार्ग में चलते हैं। हमें उसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी। हम दूसरों पर उन बातों का इलज़ाम नहीं लगा सकते जो हम स्वयं करते हैं। हर पाप जो हम करते हैं उसका हम स्वयं निर्णय लेते हैं। पाप कोई छोटी बात नहीं है, उसे हलके में नहीं लिया जा सकता। वह परमेश्वर के गुस्से को और जला देती है। वह हमारी आत्मा को नष्ट कर देती है और परमेश्वर लिए खड़े रहने को भी। यह घातक और विषैला होता है।

सच्चा पश्चाताप मतलब है कि वो सब जो पाप कि सामर्थ को हमारे जीवन से नष्ट कर देने के लिए ज़रूरी है। दूसरों को क्षमा करना उतना ही ज़रूरी है। उन्हें हमें अपने क्रोध और प्रताशोध से मुक्त करना चाहिए। जब हम ऐसा करते हैं तो हम स्वयं भी मुक्त हो जाते हैं।

जो प्रार्थना यीशु ने नमूने के तौर पे दी उसके आखरी दो पंक्तियों में यीशु सिखाता है कि इस पापी दुनिया में लोभ से कैसे निपटना है। उसने कहा:
“‘हमें में परीक्षा में न डाल, लेकिन बुराई से बचा।'”

यीशु ने सिखाया कि हमें उसके पास प्रलोभन से सुरक्षा के लिए जाना चाहिए। हमें उससे इसे छिपाने की जरूरत नहीं है! “हमें आज़माइश से बचा” को इस तरह भी कहा जा सकता है ‘हमें धार्मिकता में ले चल।” पाप करने के स्वभाव को नष्ट करने का सबसे अच्छा तरीका है कि सबसे धार्मिक कार्य करिये जो आप कर सकते हैं!

परमेश्वर ने शैतान के दुष्ट कामों से हमें छुटकारा पाने को कहा है। शैतान का दूसरा नाम है “अभियोक्ता” और “झूठ का पिता।” उसने हव्वा को धोखा दिया और दुष्ट ग़दर को परमेश्वर कि उत्तम दुनिया में ले आया। हर एक आज़माइश, पाप, नफरत, बीमारियां, और मृत्यु उस भयंकर निर्णय के कारण आया। और अब वह अपने भयानक सामर्थ से मनुष्यजाति पर अपना काम कर रहा है, लड़ाई और दुष्प्रयोग और संकट पर आनंद मनाता है। वह मनुष्य को पाप करने के लिए आज़माइश में डालता है, उनसे हत्या, व्यभिचार, दुसरे लोगों के साथ बेईमानी, करने के लिए आज़माइश में डालता है।

जब शैतान इंसान के ह्रदय में दुष्ट काम करता है, तो वह बहुत बड़े पाप, जैसे हत्या, को ह्रदय में पहले नहीं डालता। वह इससे शुरू करता है उनको यह बता के कि छोटे पाप करना ठीक है। यह वो पाप हैं जो ह्रदय में शुरू होते जिनको कोई देख नहीं सकता। वह अपने शिकार को दूसरों के प्रति नफरत और दुर्भावना को उनके ह्रदय में पैदा करता है। वो उनको बेकार कि बातों से लुभाता है। वह दुसरे पुरुषों को झूठ बोलकर कि दूसरी कि पत्नी को अभिलाषा से देखना गलत नहीं है। यह पाप करने के शांत तरीके हैं जो बाद में बड़े पाप बन जाते हैं। यह ह्रदय में विद्रोह पैदा करते हैं।

पहाड़ पर के उपदेश में यीशु उसके चेलों को अपने पापों को शुरुआत में ही पश्चाताप करके कम कर लेने को कहता है। पाप के लिए नफरत और शुधता के लिए चाहत इतनी मज़बूत होनी चाहिए कि अपने परमेश्वर को अपमानित करने से अच्छा है कि अपने हाथ को ही काट दो या आँख को ही निकाल दो!

हर दिन, हम परमेश्वर के पास इस प्रार्थना को लेकर आ सकते जो यीशु ने अपने चेलों को नमूने के तौर पर दी थी। वह लगातार हमें माफी और नए तरीकों से पाप दूर करने के लिए शक्ति देगा। हम पूरी तरह से उस पर निर्भर कर सकते हैं! परमेश्वर हमारी उन आक्रामक हमलों से बचाएगा जो शैतान और शैतानी ताक़तें हम पर वार करती हैं। हम अपने ही ह्रदय में ज्योति के राज्य के लिए अन्धकार के राज्य के विरुद्ध परमेश्वर के कार्य में जुड़ सकते हैं !

प्रार्थना के अंत में यीशु ने कहा, “‘जब तुम मनुष्य को उनके पापों के लिए क्षमा करते हो जो वे तुम्हारे विरुद्ध करते हैं, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हे भी क्षमा करेगा। परन्तु यदि तुम उनके पाप क्षमा नहीं करते, तुम्हारा पिता भी तुम्हारे पाप क्षमा नहीं करेगा।'” वाह। क्या कोई ऐसी बात है जिसके लिए तुम्हें परमेश्वर से क्षमा मांगने कि ज़रुरत है? क्या कोई है जिसे आपने क्षमा नहीं किया है? उसके बारे में अभी सोचिये! उसे सड़ने मत दीजिये!

जब आप क्षमा करते हैं तो यह याद रखना ज़रूरी है कि कभी कभी क्षमा करने में समय लग जाता है। कुछ पाप इतने दुःख देने वाले होते हैं और कुछ घाव इतने गहरे कि हमें बार बार क्षमा करते जाना पड़ता है। और कभी कभी वो इंसान भी बार बार पाप करते जाता है और इसीलिए हमें और अधिक कारण मिल जाता है क्षमा करने का। यह बहुत कष्टमय और कठिन है।

सबसे अद्भुद बात यह है कि हम उस परमेश्वर को निमंत्रण दे सकते हैं जिसने सारी शृष्टि बनाई। हम उसे प्रार्थना कर सकते हैं और उससे केह सकते हैं कि वो हमारी रक्षा करे और हमारे ह्रदय को परिवर्तित करे। अपनी ताक़त को क्रोध में और प्रतिशोध में व्यतीत करने के बजाय हम अपना भरोसा उस पर डाल दें। ज़रूरी यह है कि हर दिन या हर पल हम परमेश्वर के आगे उस व्यक्ति के लिए क्षमा मांग सकते हैं। जितनी बार हम क्षमा करने का निर्णय लेते हैं हम परमेश्वर के हाथों में उस परिस्थिति को दे देते हैं। हम बदला लेने के हक़ को छोड़ देते हैं और परमेश्वर पर निर्भर करते हैं कि वो अपने अच्छे और सिद्ध तरीके से कार्य करेगा।

वाह। क्या आप सोच सकते हैं कि कैसे विनम्रता और आज्ञाकारिता उस अन्धकार कि दुनिया में कैसे चमकता है? हमें परमेश्वर के शांति बनाने वाले बनना है, और हम विश्वास रखें कि वो हमें ऐसा करने में अपनी सामर्थ देने में सक्षम है। और वह हमें परमेश्वर के बेटे और बेटियां बनने के लिए आशीष देगा!

कहानी ५९: पहाड़ पर उपदेश: प्रार्थना में परमेश्वर का सम्मान

मत्ती ६ः५-१०

जब यीशु पहाड़ पर अपने उपदेश को सिखा रहे थे, वह कि परमेश्वर कैसे चाहता है कि प्रार्थना करनी चाहिए। उसने एक प्रार्थना सिखाई जो वे उसे एक नमूने के तौर पर उपयोग कर सकते थे। यीशु यह नहीं चाहते थे उसके चेले प्रार्थना को एक भजन कि तरह दोहराएं। बुदपरस्त ऐसा ही करते थे। वे सोचते थे कि मंत्र के द्वारा वे अपने भगवानों को मन सकते थे। परन्तु सृष्टि कस सृजनेवाला जीवित है और सुनता है। वो बेकार के बड़बड़ाने को सुन्ना नहीं चाहता। परमेश्वर चाहता है कि उसके बच्चे उसे एक बच्चे कि तरह बात करें। वह पूरी सत्यता चाहता है जो हमारे ह्रदय में है।

यीशु ने एक बहुत ही स्पष्ट और सरल योजना दी। यह एक प्रार्थना थी जो परमेश्वर अपने चेलों को सिखाता है कि अपने पिता के पास धार्मिक तरीके से कैसे आना है। यह शायद चेलों कि प्रार्थना बुलाया जाना चाहिए! यह परमेश्वर के पास लाने वाली महत्पूर्ण बातें हैं जिनको परमेश्वर के पास लाना है और किस तरह उनको लाना है।

पहली बात जो हमें करनी है जब हम उसके पास आते हैं और वो है कि हम अपनी आराधना को उसके आगे भेंट चढ़ाएं। वो छोटा सा वाकया हमें उन्ही शब्दों में सिमित न कर दे। स्वर्गदूत सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर की सदा के लिए प्रशंसा करते रहते हैं। हम बहुत से तरीकों से आराधना कर सकते हैं। शायद हम स्तुति में एक भजन सहित पढ़ सकते हैं। हम शांत बैठ कर उन सब बातों पर विचार कर सकते हैं जो उसने हमारे लिए करी हैं। वो पवित्र है और न्यायी है, यशस्वी है, धर्मी और वफादार है! या हम अपनी आराधना को एक कविता या गाने के रूप में भी लिख सकते हैं।

दूसरी बात जो प्रार्थना के लिए यीशु बताते हैं वह परमेश्वर के राज्य के विषय में है। परमेश्वर के राज्य के विषय में कल्पना कीजिये जब वह आएगा और सब बातें जो सही और शुद्ध हैं वे हमेशा के लिए हो जाएंगी और कभी समाप्त नहीं होंगी! फिर कभी आसूं या रोना नहीं होगा क्यूंकि परमेश्वर कि इच्छा का पूर्णता से अनुसरण होगा। कितना अदबुद्दीन होगा! हमारी प्रार्थना के एक भाग यह हो कि हम उससे ये जल्द आने कि अपेक्षा करें।

परमेश्वर के रह्या के आने का दूसरा भाग मांगने के यह हो कि हम चाहें कि हमारे द्वारा, वो कैसे आना चाहिए। हर एक चेले के जीवन में, परमेश्वर की एक सिद्ध योजना है। इस संसार को बनाने से पहले, परमेश्वर ने हम सब के लिए काम तैयार करके रखा जो हमें उसके लिए करना है। हर एक व्यक्ति परमेश्वर के राज्य का कामों को करने के लिए उससे जुडा हुआ है। जिस तरह हर एक विश्वासी यह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर कि मर्ज़ी इस पृथ्वी पर पूरी हो, वो ह्म सब को विशेष तरीके से सुनेगा। हर एक को विशेष कार्य दिया जाएगा। और जब वे उस कार्य से जुड़ेंगे, उनके पास विभिन्न प्रार्थना के विषय होंगे। !

परमेश्वर ने किन किन बातों के लिए आपको उसके राज्य को इस पृथ्वी पर लाने के लिए बुलाया है? आप किस तरह प्रार्थना करते हैं? कौन सी वो बातें हैं जिनके लिए हम प्रार्थना कर सकते हैं यह जानते हुए कि वे रजा के ह्रदय के कितने करीब हैं? हम उनके लिए प्रार्थना कर सकते हैं जो दुखी हैं, अपने प्रियजनों कि रक्षा के लिए और हमारे धार्मिक अगवों के लिए। हम उन लोगों और राज्यों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं जो यीशु को नहीं जानते। हम अपने देश के लिए प्रार्थना कर सकते हैं और पूरी दुनिया कि शांति के लिए भी। जब यीशु ने अपने राज्य के लिए प्रार्थना करने को कहा, उसने प्रार्थना कि सम्भावनाओं के लिए द्वार खोल दिए!