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कहानी १७२: परिणाम

मत्ती २७:३५-५०; मरकुस १५:२४-३७; लूका २३:३३-४६; यूहन्ना १९:१८-३०

Prague - cross on the charles bridge - silhouette

यीशु क्रूस पर छे घंटे, जहां उसने मानवजाति के पापों कि सज़ा अपने ऊपर ले ली। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे हर घिनौने काम कि दुष्टता परमेश्वर के आगे यीशु के व्यक्तित्व में पेश की गई। हर प्रकार के घिनौने पाप। यीशु ने हमारे हर प्रकार के पाप जो अंधकार में किये गए उन्हें अपने ऊपर ले लिया।

जिस समय परमेश्वर  पापों पर क्रोधित हो रहा था जो उस दिन येरूशलेम किये जा रहे थे, समूचा संसार उन तीन घंटों के लिए अँधेरे में हो गया था। वह यहूदी अगुवों के दुष्ट कर्मों को देखता रहा और उन रोमियों के अन्याय को जो वे उसके पुत्र के विरुद्ध दिखा रहे थे। जो मनुष्य ने बुरे के लिए सोचा था वह परमेश्वर ने भले के लिए उपयोग किया। परमेश्वर ने मानवजाति के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अच्छे के लिए बदलने जा रहा था। परमेश्वर का असंतोष इस संसार के अन्धकार के ऊपर मंडरा रहा था। जिस समय परमेश्वर का पुत्र उसके महान अनुग्रह के कार्य को समाप्त कर रहा था, परमेश्वर पिता ने अपने अनुग्रह को आकाशमंडला में दर्शाया।

जब परमेश्वर का  क्रोध समाप्त हुआ, यीशु जानता था। उसने कहा,” पूरा हुआ.”  “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।”

धरती भयनकर रूप से हिलने लगी और तेज़ भूकंप आया। येरूशलेम का शहर हिल गया था और पत्थर दो टुकड़े में हो गया।

सेना के एक अधिकारी ने जो यीशु के सामने खड़ा था, उसे पुकारते हुए सुना और देखा कि उसने प्राण कैसे त्यागे। उसने कहा,“यह व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का पुत्र था!”

यहूदी लोग जब इस कहानी को पढ़ेंगे तो वे इस अंतिम वाक्य को पढ़कर अचंबित होंगे। उसके बलिदान के बाद एक अविश्वासी ही था जिसने मसीह के विषय में बताया। और एक अविश्वासी परन्तु एक रोमी सेनापति। यहूदी इससे बहुत अचंबित हुए। यह कैसे हो सकता है? परमेश्वर का पुत्र सभी देशों, भाषाओँ और कौमों के लिए उद्धार को लाया था। वही सबका प्रभु था!

गुलगुता पर एक बहुत बड़ी भीड़ जमा थी। वे वहाँ उस महान कार्य को देखने आये थे। अब इस प्रचारक का क्या होगा जिसने सभी देशों को क्रोधित किया था! क्या परमेश्वर आकर हस्तक्षेप करेगा? क्या वह एलिया को भेजेगा? घंटों वे प्रतीक्षा करते रहे। अंत में, यीशु ने पुकारा और धरती हिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सब समाप्त हो गया। क्या यह वास्तव में अंत था? लोग अपने घरों को लौटने लगे, महान पीड़ा को दर्शाने के लिए अपनी छाती को पीटते गए। एक बहुत भयंकर बात हुई थी।

बहुत सी स्त्रियां जो यीशु से प्रेम करती थीं, वे दूर खड़े होकर यीशु को देख रही थीं। बहुत से गलील से आयीं थीं। याकूब और यूहन्ना कि माँ, मरियम मगदिलिनी और याकूब वहाँ यीशु को देख रहे थे। उन्हें कितना गहरा सदमा लगा होगा। यह सब कैसे हो सकता था? वह कैसे जा सकता था? उस दिन के दुःख के अँधेरे में वे उस आशा के प्रकाश को नहीं देख पा रहे थे।

सब जगह मालूम हो गया था कि यीशु मर चुका है। सभी लोग उस विशाल भूकंप के बारे में ही चर्चा कर रहे थे। वह उसी समय हुआ जब यीशु ने अपने प्राण त्याग दिए। पुराने नियम में हर एक यहूदी येरूशलेम में जान जाता कि परमेश्वर का भूकंप से सम्बोधित था। उस दिन का अँधेरा उन्हें सीनै पर्वत पर परमेश्वर कि उपस्थिति के होने को याद दिल रहा था। कुछ और अफवाहें फैलने लगीं। येरूशलेम कि कब्रें खुलने लगीं और जो मर गए थे वे दुबारा जीवित हो गए। वे सब यीशु के जी उठने के बाद सब को दिखाई देने लगे। इस सब का क्या मतलब था?

मंदिर में कुछ होने कि बात फैलने लगी। यीशु के मरने के समय, मंदिर का पर्दा दो भाग में फट गया। वो पर्दा साठ फुट ऊंचा और चार इंच मोटा था। पलक झपकते ही कौन हाथ इसे फाड़ सकता है? यह असम्भव था, और फिर भी सच था। धार्मिक अगुवे इसे इंकार नहीं कर सकते थे।

हमारे और आपके लिए यह सोचना कितना कठिन है कि इस सूचना का यहूदियों पर क्या असर डाला होगा। मूसा के समय से मंदिर का पर्दा एक बहुत ही सामर्थ्य चिन्ह था। मंदिर परमेश्वर का महल था, और अति पवित्र का इस पृथ्वी पर वह परमेश्वर के सिंहासन का कक्ष था। वह अपनी पूरी महिमा में वहाँ रहने आया था। यह उसके पवितगर राष्ट्र के लिए बहुत ही बड़ा अवसर था कि वे उस महान परमेश्वर के निकट आ सकते थे। वह पर्दा परमेश्वर के कक्ष को ढाँपता था, जिससे कि वह आवश्यक अलगाव को बनाता था जो अति पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच होना था।

परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहना चाहता था। वे उसके कीमती खज़ाना थे। परन्तु परमेश्वर कि अत्यधिक पवित्रता उस पाप कि उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जिस प्रकार एक कीड़ा जलती हुई लौ के आगे नहीं उड़ सकता, क्यूंकि वह नष्ट हो जाएगा, वैसे ही परमेश्वर कि पवित्रता के आगे एक पापी मनुष्य भस्म हो जाता।

परन्तु सबसे महान परमेश्वर सामर्थ और प्रेम से भरा हुआ है और इसीलिए उसने अपने पवित्र राष्ट्र के पास आना चाहा जो इस श्रापित संसार में जी रहा था। उसने उन्हें अपनी व्यवस्था दी, ताकि वे धार्मिकता के साथ जी सकें। और यह जानते हुए कि  मानवजाति उस व्यवस्था के अनुसार जीवन नहीं जी सकेगा, उसने उन्हें वो रास्ता दिखाया जिससे कि वे उसके पास अपने पापों से पश्चाताप कर सकेंगे। उसने उन्हें बलिदान कि क्रिया सिखाई जिसमें उन्हें अनाज और जानवर के लहू को को लाकर चढ़ाना था। हर एक व्यक्ति को अपने आप को परमेश्वर के आगे पूर्ण रखना है और उसकी धार्मिकता के खोजी बनते हुए अपने को जांचते रहना है।

हर साल, यहूदियों के सबसे उच्च धर्म में, महायाजक पूरे राष्ट्र के लिए बलिदान चढ़ाता था। सब लोगों कि ओर से, महायाजक पवित्र स्थान में प्रवेश करता था। वह विशेष पशु के लहू को लाकर परमेश्वर के सिंहासन पर छिड़कता था। किसी तरह, परमेश्वर ने यह नियुक्त किया था कि यह उसके पवित्र स्थान को शुद्ध करेगा जो लोगों के पापों के कारण प्रदूषित हो जाता था। राष्ट्र के इसके प्रति आज्ञाकारिता में पश्चाताप करने परमेश्वर के क्रोध को संतुष्ट कर देता था ताकि वह अपने बच्चों के साथ रह सके। परमेश्वर ने रास्ता दिखा दिया था।

ये रस्में और संसार को इसी रीति से समझना यहूदी संस्कृति में बहुत गहराई से जड़ा हुआ था। उनके हर रोज़ का जीवन परमेश्वर कि बुलाहट को पकड़े हुए था। धार्मिक यहूदी बहुत ज़िम्मेदारी से अपने जीवन को परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था कि ज्योति में जांचते थे और अपनी भेटें येरूशलेम के मंदिर में चढ़ाना नहीं भूलते थे। उन्हें सम्पूर्ण विश्वास था कि परमेश्वर ने मूसा को उस पवित्र स्थान को बनाने कि आज्ञा दी है। व्यवस्था और रिवाज़ उसके भी ओर से थे। उस परदे को उन्होंने परमेश्वर के कहने के अनुसार बनाया था। इसका क्या मतलब हो सकता है कि वह फट गया?

यीशु के चेलों को और सभी उसके पीछे चलने वालों को बहुत वर्ष लगेंगे उन रहस्यमंद बातों को समझने के लिए जो उस दिन हुईं जब यीशु मरा था। जब परमेश्वर उन बातों को दर्शा रहा था जो यीशु ने पूरी कीं, उनमें एक सबसे शानदार नयी बात थी संसार को नयी वाचा मिली। परमेश्वर ने इस्राएल को कुछ समय के लिए पुरानी वाचा मानने के लिए दी। इसका उद्देश्य बहुत ही पवित्र था, ताकि मसीह के आने के लिए वो राष्ट्र तैयार रहे। इस्राएल के बलिदान यीशु पर केंद्रित थे, जो परमेश्वर के लोगों को वह तस्वीर दिखा रहा था कि किस तरह पाप और मृत्यु का विनाश होगा। अब परमेश्वर के पुत्र ने आकर बलिदान दिया और उसके साथ उसने नयी वाचा बनाई। नयी वाचा के आधार पर, कोई भी बलिदान कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर से अलगाव कि आवश्यकता नहीं थी। अब परमेश्वर कि पवित्रता और उसके बच्चों के बीच किसी भी परदे कि आवश्यकता नहीं थी! यीशु ने वह मार्ग दिखा दिया था जिससे कि हर विश्वासी पवित्र परमेश्वर के पास पूरे स्वतंत्रता और भरोसे के साथ जा सकता था! विश्वास का एक नया युग शुरू हो गया था!

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कहानी १६८: वापस पिलातुस के पास 

Jerusalem - Jesus judgment for Pilate ceramic tiled cross way station

मत्ती २७:१५-२६; मरकुस १५:६-२०; लूका २३:१३-२४; यूहन्ना १८:३८-१९:१६

हेरोदेस, मसीह के मामले में, किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने में सक्षम नहीं था, इसलिए उसने यीशु को पिलातुस के पास वापस भेज दिया। अब, पिलातुस की यहूदी लोगों के साथ एक परंपरा थी। हर फसह के पर्व पर, वह उनसे किसी एक कैदी की रिहाई का अनुरोध लेता, और वह उसे मुक्त कर देता। उस समय, रोमीयों ने बरब्बा नाम के एक खुख्यात अपराधी को कैदी बनाया था। वह एक यहूदी विरोध आंदोलन का हिस्सा था जो यहूदिया पर रोमन सरकार की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था। उन्होंने पिलातुस के खिलाफ विद्रोह छेड़ी हुई थी। बरब्बा ने इस प्रक्रिया में हत्या और डकैती भी की थी। लेकिन यहूदी लोगों को उसके कारण से सहानुभूति थी। वे रोमी शासन से नफरत करते थे, और इसलिए बरब्बा अपने साहसी, घातक कारनामे के लिए उनके लिए एक हीरो था।

यहूदी इस फसह के कैदी को रिहा करवाने के लिए, पिलातुस से मांग करने के लिए एकत्र हुए। इस बीच, पिलातुस ने धार्मिक नेताओं और महायाजकों को बुलाया और यीशु के विषय में कहा, “‘तुम इस आदमी को लाए हो, यह कहते हुए कि यह विद्रोह करने के लिए लोगों को उकसाता है; और तुम्हारे सामने इसे जांचने के बाद, देखो, मैं इस आदमी को तुम्हारे आरोपों के बल पर, दोषी नहीं पाता हूँ। और न तो हेरोदेस ने, क्यूंकि उसने हमें इसे वापस भेजा। ेदेखो, इसने मौत के योग्य कुछ नहीं किया है।” पिलातुस को इस बात का एहसास था कि इन लोगों का यीशु को उनके समक्ष लाने का एक ही कारण था – ईर्ष्या। उनकी ईर्ष्या एक निर्दोष आदमी को मारने के लिए कोई कारण नहीं था।

पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और अपने सिंघासन पर बैठ गया। उसने पूछा: “तुम रिहाई के लिए किसे चाहते हो? बरब्बा या यीशु, जो मसीह कहलाता है?” निश्चित रूप से भीड़ उपदेशक के पक्ष पर होगी!

जब पिलातुस वहां बैठा हुआ था, उसे अपनी पत्नी से एक संदेश प्राप्त हुआ। “‘उस धर्मी आदमी के साथ कुछ नहीं करना, क्यूंकि कल रात मैंने उसकी वजह से एक सपने में काफी पीड़ा उठाई।'”

इस बीच, महायाजक और पुरनी, भीड़ के बीच में बाहर जा कर, उन्हें यीशु के बजाय बरब्बा की रिहाई के लिए उकसा रहे थे। वे यीशु को मार डालने की मांग के लिए उकसा रहे थे। उनकी शातिर नफरत कैसी सक्रिय थी!

पिलातुस ने कहा: “‘इन दोनों में से तुम किसे रिहा चाहते हो?'”

“‘इस आदमी को दूर कर दो!'” भीड़ बोल उठी, “और हमें बरब्बा रिहा कर दो!'”

पिलातुस ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे यीशु को लेजाकर चाबुक के साथ कोड़े लगाए। अगर धार्मिक नेता यीशु को अपमानित और दंडित होते देखते, तो शायद वे संतुष्ट हो जाते।

सैनिक पूरे दिन इस यीशु की अफवाहें सुन रहे थे। जब तक उन्हें सैनिकों के पास लाया गया था, यह आरोप अच्छी तरह से जाना जा चुका था कि वह राजा होने का दावा कर रहे थे। यह एक नीच, छोटे यहूदी के लिए इतनी हास्यास्पद बात थी, कि वे उसके बारे में ठठ्ठा उड़ाने के प्रलोभन को रोक नहीं सके। अपने अंधेरे आत्माओं की हिंसा और द्वेष में, उन्हें यीशु को चाबुक से मारने में इतनी प्रसन्नता मिली कि  यीशु का रक्त उनकी पीठ से नीचे बह गया। जब तक वो यह सब कर चुके थे, यीशु की पीठ पर मांसपेशियों, हड्डियों से अलग होकर फट गई थी। लेकिन रोमी सैनिकों की क्रूर बर्बरता अभी तक संतुष्ट नहीं हुई थी। उनमें से कुछ लम्बे कांटों के साथ शाखाए काटने चले गए। उन्होंने उसका मुकुट बुना और उनके सिर पर उसे कुचल दिया। तब उन्होंने एक शाही बैंगनी रंग का एक वस्त्र उसके नुचे, लहू-लुहान पीठ पर डाल दिया। “जय हो, यहूदियों के राजा!” उन्होंने कहा और उन्हें उग्र अवमानना ​​के साथ चेहरे पर मारने लगे।

सैनिक यीशु को पिलातुस के पास वापस लाए। जो यातना मसीह ने सही, वो स्पष्ट थी। निश्चित रूप, से यह पर्याप्त होगा। पिलातुस भीड़ के पास बाहर चला गया और कहने लगा: “‘सुनो, मैं उसको तुम्हारे सामने वापस ला रहा हूँ, ताकि तुम जानो कि मै उसमे कोई दोष नहीं पाता हूँ।” तब यीशु को लोगों के सामने बाहर लाया गया। रक्त उनके सिर पर कांटों के ताज से बह रहा था, और बैंगनी वस्त्र उनके खूनी पीठ से चिपक गया था। पिलातुस ने कहा: “‘देखो इस आदमी को'”। उसकी यह आशा थी कि यीशु को इस तरह की भयानक स्तिथि में  देखने के सदमे के बाद, वे नरम होंगे और उनकी रिहाई के लिए मांग करेंगे। लेकिन भीड़ ने ऐसा नहीं किया। “‘मैं यीशु अर्थार्त, यहूदियों का राजा के साथ क्या करू?'” उन्होंने पूछा।

महायाजक चिल्लाने लगे, “उसे क्रूस पर चढ़ा दो, उसे क्रूस पर चढ़ा दो! ‘” भीड़  भी शामिल हुई। लोगों का रोष बड़ता जा रहा था।

” क्यों? इसने क्या दुष्कर्म किया है? मैंने उस में मौत की मांग लायक कोई दोष नहीं पाया है, इसलिए मैं उसे सज़ा देकर उसे रिहा कर दूंगा,'”पिलातुस ने कहा। लेकिन भीड़ काबू से बाहर हो गई। “‘उसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” वे चीखने लगे।

इस अव्यवस्था के बीच में, कुछ यहूदियों ने बताया: “‘हमारा एक कानून है, और उस कानून के अंतर्गत, उसे मरना चाहिए क्यूंकि उसने खुद को परमेश्वर का बेटा बोला है।'”

इसने पिलातुस को और डरा दिया। यीशु ने पहले से ही उसको बोला था कि वो किसी और जगह का एक राजा था, और उसकी पत्नी को उसके बारे में सपने आ रहे थे। वो वहां गया जहाँ यीशु को रखा जा रहा था और उनसे पूछा: “‘तुम कहां से हो?'”

लेकिन यीशु ने उसे जवाब नहीं दिया। पिलातुस क्रोध के साथ बोला: “‘तुम मुझसे बात नहीं करते? क्या तुम नहीं जानते कि मेरे पास तुम्हे रिहा करने का अधिकार है या क्रूस पर चढाने का अधिकार है? ”

यीशु ने उससे कहा: “यह अधिकार आपको ऊपर से दिया गया था, नहीं तो आपका मेरे ऊपर कोई अधिकार नहीं होता; इस कारणवश, जिसने मुझे पकड़वाया है, उसका पाप ज्यादा महान है।”

वाह। मसीह की आश्वास विश्वास की लहर उनके हर शब्द में थी। यह लहर उनकी चुप्पी में भी थी। पिलातुस का यह गलत मानना था कि वह उस दिन का सबसे उच्च अधिकारी था।  यीशु ने उसे बताया कि वास्तव में, पिलातुस ने अपना अधिकार परमेश्वर से प्राप्त किया था।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो उसने यीशु को बचाने के लिए और अधिक से अधिक प्रयास करना शुरू किया। लेकिन यहूदियों का रोष अधिक बढ़ रहा था और वो नियंत्रण से बाहर हो रहे थे। उसे इस बात का एहसास हो गया था कि वो एक दंगा शुरू करने वाले है। कुछ यहूदियों ने कहा: “‘अगर आप इस आदमी को रिहा करते हैं, तो आप कैसर के कोई दोस्त नहीं हैं। जो कोई भी खुद को राजा प्रतीत करवाता है, वो कैसर का विरोध करता है।”

उनके शब्दों रोम के कैसर के प्रति वफादारी के शब्द नहीं थे। यहूदी, सम्राट से उतनी नफरत करते थे जितनी वे पीलातुस और हेरोदेस से करते थे। वे एक खतरा बन रहे थे। अगर पिलातुस ने यीशु को क्रूस पर नहीं चड़ाया , वे इसका एक मामला बना कर रोम तक खीचते। वे उस पर सम्राट के खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगाते।

जब पिलातुस ने यह सुना, तो वह बाहर जा कर सिंघासन पर फिर से बैठ गया। इस समय तक, सुबह के शुरुआती घंटे बीत गए थे और दोपहर हो रही थी। मंदिर में फसह उत्सव का जश्न पूरे जोर शोर था। दोपहर में, फसह के भेड़, पंद्रह सौ साल पहले मिस्र में उस अंधेरी रात में इस्राएल के पहलौठे बेटों को बचाए जाने खून की याद में कुर्बान कर दिए जाएंगे। यह राष्ट्र के लिए के लिए रास्ता बनी। अब परमेश्वर का पहलौठा पुत्र, सभी राष्ट्रों के उद्धार को लाने के लिए अपने खून को भेट कर देंगे।

पिलातुस ने यीशु को लोगों के सामने बाहर बुलाया – “‘देखो, तुम्हारा राजा!'” उसने कहा।

“‘इसको हमारे से दूर कर दो, इसे क्रूस पर चढ़ा दो!'” लोग चीखने लगे। भीड़ का उन्माद बहुत बड़ गया था।

“‘क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चड़ा दूँ?” पिलातुस ने पूछा।

महायाजकों ने कहा – “‘हमारा, केसर को छोड़, कोई राजा नहीं है!”

वाह। इस्राएल के देश के महायाजकों ने परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकृत घोषित कर दिया। उनकी आवाज, पिलातुस की निर्दोष आदमी को मौत की सज़ा सुनाने की अनिच्छा पर विजय प्राप्त करने लगी। यह स्पष्ट था कि अब कुछ नहीं किया जा सकता था। पिलातुस ने थोड़ा पानी लिया और उस अराजक, उग्र भीड़ के सामने अपने हाथ धोए। “‘मैं इस आदमी के रक्त से निर्दोष हूँ'” उसने घोषणा की। “‘अब इस मामले को खुद ही देख लो।'”

भीड़ वापस चिल्लाई – “‘उसका खून हम पर और हमारे बच्चों पर हो!'”

तब पिलातुस ने यीशु के खिलाफ, मौत की सज़ा सुनाई। धार्मिक नेताओं और भीड़ की मांगों को स्वीकृत किया जा रहा था। बरब्बा को स्वतंत्र कर दिया गया, लेकिन यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए दे दिया गया।

कहानी १४०: विजयी प्रवेश : यंत्रणा हफ्ते का पहला दिन (रविवार)

मत्ती २१:१-११,१४:१७, मरकुस ११:१-११, लूका १९:२९-४४, यूहन्ना १२:१२

फसह के पर्व के लिए यीशु और उसके चेले बैतनिय्याह से येरूशलेम को गए। लाज़र को लेकर भीड़ इतनी उत्साहित थी कि वह उनके पीछे हर जगह चलती रही। यीशु और उसके चेले जब यरूशलेम के पास जैतून पर्वत के निकट बैतफगे पहुँचे तो यीशु ने अपने दो शिष्यों को यह आदेश देकर आगे भेजा। कुछ विशेष तैयारी करने कि ज़रुरत थी। क्यूंकि आप देखिये, यह दिन बहुत उच्च और पवित्र अर्थ के साथ होने वाला था। जिन बातों कि भविष्यवाणी हज़ारों साल पहले हो गयी थी वे अब सच हो रही थीं।

यीशु ने अपने चेलों को दो विशेष आज्ञाएं दी थीं।

उसने कहा:

“‘अपने ठीक सामने के गाँव में जाओ और वहाँ जाते ही तुम्हें एक गधी बँधी मिलेगी। उसके साथ उसका बच्चा भी होगा। उन्हें बाँध कर मेरे पास ले आओ। यदि कोई तुमसे कुछ कहे तो उससे कहना,‘प्रभु को इनकी आवश्यकता है। वह जल्दी ही इन्हें लौटा देगा।’”

फिर जिन्हें भेजा गया था, वे गये और यीशु ने उनको जैसा बताया था, उन्हें वैसा ही मिला। सो जब वे उस गधी के बच्चे को खोल ही रहे थे, उसके स्वामी ने उनसे पूछा,“तुम इस गधी के बच्चे को क्यों खोल रहे हो?”

उन्होंने कहा,“यह प्रभु को चाहिये।” उसके मालिक ने उन्हें अनुमति दे दी और वे उसे यीशु के पास जैतून के पहाड़ पर ले गए। उस समय चेलों को यह सब नहीं समझ आया, बल्कि, जब वह स्वर्ग में उठा लिया जाएगा तब वे उस दिन को याद करके उस महान भविष्यवाणी को समझेंगे जो पूरी हुई।

ज़कर्याह ९:९ में नबी कहता है:
“‘सिय्योन, आनन्दित हो!
यरूशलेम के लोगों आनन्दघोष करो!
देखो तुम्हारा राजा तम्हारे पास आ रहा है!
वह विजय पानेवाला एक अच्छा राजा है। किन्तु वह विनम्र है।
वह गधे के बच्चे पर सवार है, एक गधे के बच्चे पर सवार है।'”

ज़कर्याह कि इस पद में, उस समय का वर्णन है जब इस्राएल के राजा यह देखेंगे कि कैसे उनके लोग सताय जाते हैं। परमेश्वर अपने लोगों को आज़ाद करने के लिए बहुत सामर्थी रूप से कार्य करेगा। उनके दुश्मनों पर पूरी तरह से विजय पाने के बाद, उनका सिद्ध राजा येरूशलेम में विजयी होकर आएगा। उसकी विजय ना केवल इस्राएल में शान्ति को लाएगा, परन्तु सारे देशों में भी। वह एक ऐसा उत्तम, आदर्श जैसा कि पहले कभी नहीं देखा गया है। वह बहुत ही विनमा होगा। चाहे वह कितना भी सामर्थी हो, वह सृष्टिकर्ता के आगे समर्पण के साथ, सर्वशक्तिमान परमेश्वर को महिमा देते हुए राज करेगा।

ये आने वाले मसीहा कि भविश्वानियां थीं! यीशु जब अपने पिता कि इच्छा को सम्पूर्ण रीति से कर रहा था, परमेश्वर उन सब बातों को जो पवित्र शास्त्र में पहले से दी गयी हैं, उन्हें कर रहा था। जब चेले उस गधी और उसके बछड़े को यीशु के पास लाये, उन्हें यकीन नहीं था कि वे ज़कर्याह कि बताई हुई बातों का खुलासा होते देखेंगे। उन्होंने केवल आज्ञा मानी। जब वे पहुँचे, उन्होंने राह में अपने कपड़े बिछा दिए। यीशु उस छोटे बछड़े पर बैठा, और दाऊद के शहर में यात्रा निकाली।

यीशु और उसके साथ चलने वाली भीड़ जब येरूशलेम पहुँची तो शहर के लोगों को मालूम हो गया कि यीशु रास्ते में ही है। फिर उन्होंने उसका दौड़ कर स्वागत किया। आनंद और उत्साह के साथ वे उसकी प्रशंसा करने लगे:
‘“होशन्ना!’
‘धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है!’
वह जो इस्राएल का राजा है!”

यीशु और उसके चेलों के पीछे बैतनिय्याह से जो भीड़ चली थी वे यीशु के पीछे पीछे बछड़े के ऊपर बैठ कर आ रहा था। उन्होंने यीशु को लाज़र को जीवित करते देखा था और वे कि भी अपेक्षा कर रहे थे जो वह भविष्य में करने वाला था। बहुत जल्द, येरूशलेम से बहुत बड़ी भीड़ उनके साथ जश्न मनाती हुई चली आयी। उन्होंने राह पर उसके लिए कपड़े बिछाय। यह विनम्रता कि निशानी है। वे शारीरिक रूप से अपने राजा को सम्मान दे रहे थे। कितना उत्साह और आनंद था। उन्होंने चमत्कार होते देखे। उन्होंने उसके सामर्थी कामों के विषय में कहानियां सुनीं थीं। वो महान दिन आ गया था!

बहुत लोग सड़कों पर आकर उस व्यक्ति को देखना चाहते थे को जिलाया था। जब धार्मिक वे भी उनके साथ जुड़ गए। जब उन्होंने लोगों को यीशु कि प्रशंसा करते सुना तो वे आपस में बड़बड़ाने लगे।

तब फ़रीसी आपस में कहने लगे,“सोचो तुम लोग कुछ नहीं कर पा रहे हो, देखो सारा जगत उसके पीछे हो लिया है।”
भीड़ में खड़े हुए कुछ फरीसियों ने उससे कहा,“गुरु, शिष्यों को मना कर।”
सो उसने उत्तर दिया,“’मैं तुमसे कहता हूँ यदि ये चुप हो भी जायें तो ये पत्थर चिल्ला उठेंगे।’”

यीशु ना केवल इस्राएल का राजा था, वह पूरे विश्व का राजा था, और इसीलिए उसकी सम्पूर्ण रीति से आराधना करनी चाहिए! परन्तु जिस समय वह उत्साह के साथ सवार कर रहा था, वह दुःख से भरा हुआ था। जब उसने पास आकर नगर को देखा तो वह उस पर रो पड़ा और बोला,

“यदि तू बस आज यह जानता कि शान्ति तुझे किस से मिलेगी किन्तु वह अभी तेरी आँखों से ओझल है। वे दिन तुझ पर आयेंगे जब तेरे शत्रु चारों ओर बाधाएँ खड़ी कर देंगे। वे तुझे घेर लेंगे और चारों ओर से तुझ पर दबाव डालेंगे। वे तुझे धूल में मिला देंगे-तुझे और तेरे भीतर रहने वाले तेरे बच्चों को। तेरी चारदीवारी के भीतर वे एक पत्थर पर दूसरा पत्थर नहीं रहने देंगे। क्योंकि जब परमेश्वर तेरे पास आया, तूने उस घड़ी को नहीं पहचाना।” -लूका १९:४२-४४

यह एक नबी था। येरूशलेम का शहर इतना ज़यादा नष्ट होने वाला था कि उसकी हर एक मंज़िल नष्ट होने वाली थी। परन्तु यीशु केवल येरूशलेम के भविष्य के लिए ही नहीं दुखी हो रहा था। वह पूरे राष्ट्र के लिए दुखी हो रहा था। येरूशलेम केंद्र था जहां, परमेश्वर इस पृथ्वी पर अपना राज स्थापित करेगा। यह इस्राएल के लिए चिन्ह भी था।

लोग जिस समय जश्न मन रहे थे, यीशु जानता था कि आगे क्या होने वाला है। इस समय कि सच्ची महिमा बहुत समय तक रहने वाली नहीं थी। जिस राष्ट्र ने यीशु के अद्भुद सेवकाई का सालों के द्वारा विश्वास नहीं किए, वे अंत में भी मसीह के साथ नहीं होंगे। उसका परिणाम बहुत महान होगा। जब रोमी सेना पूरे शहर को और उसके लोगों के साथ निर्दयता दिखाएंगे, तब वहाँ कुछ भी नहीं बचेगा। हज़ारों सालों के लिए इस्राएल पृथ्वी से गायब हो जाता।

मसीह को इंकार करने के बाद, यहूदी लोग परमेश्वर कि सिद्ध योजना के बजाय परमेश्वर के दुश्मनों के तरीकों को चुना। और इसलिए परमेश्वर उन्हें अपनी मर्ज़ी करने देगा उस विनम राजा को चुनने के बजाय वे दुनिया के दुष्ट रास्तों को चुनते हैं जो उन्हें नष्ट कर देगा। वह कितनी विनम्रता पूर्वक जा रहा था जब कि भीतर वह मनुष्य के विनाशकारी पापों के त्रासदी का दुःख मना रहा था।

अविश्वासी इस्राएल के विनाश के बीच जो वे अपने ऊपर लेकर आ रहे थे, यीशु अपने साथ उज्वल आशा को लेकर आ रहा था। उनके विश्वासघात के बावजूद यीशु कि विजय होगी। उसके सिद्ध जीवन के द्वारा, यीशु पाप और मृत्यु के अधिकार को सिद्ध और निष्कलंक मेमना बनकर जय को पाएगा। अब बलिदान देने का समय आ गया था। जो गहरी और उच्च बात वह करने जा रहा था वह उनकी समझ से परे था। छुटकारा केवल इस्राएल देश के लिए ही सीमित नहीं था। यह पृथ्वी के सारे देशों के लिए ही नहीं था। यीशु  सृष्टि को उद्धार देने के लिए आया था। उसकी मृत्यु से वह पूरे विश्व को खरीद लेगा। वह सब कुछ नया कर देगा!

येरूशलेम में जब सारे लोग मसीह के साथ पहुँचे, वे नहीं जानते थे कि वे किस लिए इतना जश्न मना रहे हैं। परन्तु उनके शोर गुल से सारा शहर हिल गया था। “‘यह कौन है?'” उन्होंने पुछा।

“‘यह यीशु नबी है, जो नासरी से आया है!'” भीड़ ने पलट कर जवाब दिया।

उन्होंने मंदिर कि ओर तक यात्रा की। अंधे और लंगड़े भी। आये यीशु ने पूर्ण रूप से चंगाई दी और उन्हें पूर्ण और बलवान बना दिया। कितना अच्छा है उन पुरुषों और स्त्रियों को देखना जो एक समय बंधन में और विकृत थे और वहाँ से कूद हुए और आनंदित होकर गए! परमेश्वर के पवित्र महल पर वे जश्न मना रहे थे। बच्चे उत्साह के साथ आनंद मना रहे थे। “होशन्ना! दाऊद का वह पुत्र धन्य है।”

तो वे बहुत क्रोधित हुए। और उससे पूछा,“तू सुनता है वे क्या कह रहे हैं?”

यीशु ने उनसे कहा,“’हाँ, सुनता हूँ। क्या धर्मशास्त्र में तुम लोगों ने नहीं पढ़ा,‘तूने बालकों और दूध पीते बच्चों तक से स्तुति करवाई है।’”

यीशु भजन सहित 8 से बोल रहे थे। भजन सहित को थोड़ा और पढ़ें, तो हम समझेंगे कि यहूदी अगुवे क्रोधित क्यूँ हुए।

“‘हे यहोवा, मेरे स्वामी, तेरा नाम सारी धरती पर अति अद्भुत है।
तेरा नाम स्वर्ग में हर कहीं तुझे प्रशंसा देता है।

बालकों और छोटे शिशुओं के मुख से, तेरे प्रशंसा के गीत उच्चरित होते हैं।
तू अपने शत्रुओं को चुप करवाने के लिये ऐसा करता है।'”    -भजन सहित ८:१-२

यीशु को इन लोगों को पूरा भजन सहित सुनाने कि ज़रुरत नहीं थे। वे जानते थे कि यीशु क्या कह रहा है। बच्चे जो इस भजन में यीशु कि प्रशंसा कर रहे हैं वे परमेश्वर कि स्तुति कर रहे हैं। वह यह भी स्पष्ट कर रहा था कि दाऊद राजा ने इस घटना का वर्णन पहले ही कर दिया था। बच्चे यीशु कि प्रशंसा उन धार्मिक अगुवों के विरुद्ध में कर रहे थे जिन्होंने अपने आप को यीशु के  दुश्मन बना लिया था। जिन लोगों को परमेश्वर के राष्ट्र को अपने मसीह कि आराधना करने में अगुवाई करनी चाहिए थी, वे असफल रहे, उनकी जगह अब बच्चे कर रहे थे।

यीशु ने उनसे पूरे साहस के साथ सच्चाई को बताया, और वह दया और अनुग्रह ही था। अभी भी समय था और यह एक सही चेतावनी थी। वे परमेश्वर कि योजना के विपरीत में थे। क्या वे पश्चाताप करेंगे?

उन्होंने नहीं किया। उन्होंने वैसा ही किया जैसा कि भजन सहित में लिखा है। वे अपने ही विरोध में शांत हो गए, और वे जाकर यह साज़िश करने लगे कि परमेश्वर के पुत्र को मरवाया जाये।

शाम होने को थी, यीशु और उसके चेले येरूशलेम को चले गये, और रात बिताने के लिए बैतनिय्याह को चले गए।

कहनी १३६: बरतिमाई और जक्कई 

मत्ती २०:२९-३४, मरकुस १०:४६-५२, लूका १८:३५-१९:१०

यीशु यरूशलेम के निकट पहुँच रहे थे। जब तक वे यरीहो पहुंचे, उसके चेलों के साथ एक बड़ी भीड़ मिल गयी थी। पूरे शहर में ऐसी उत्साहित भीड़ को देखना एक अनोखा दृश्य रहा होगा! बरतिमाई (अर्थ “तिमाई का पुत्र”) नाम का एक अंधा भिखारी सड़क के किनारे बैठा था। जब उसने भीड़ को आते सुना, उसने उनसे पुछा कि यह शोर कैसा है। उन्होंने उसे बताया कि यीशु नासरी है। जब उसने सुना कि वह नासरी यीशु है, तो उसने ऊँचे स्वर में पुकार पुकार कर कहना शुरु किया,“दाऊद के पुत्र यीशु, मुझ पर दया कर।”

बहुत से लोगों ने डाँट कर उसे चुप रहने को कहा। पर वह और भी ऊँचे स्वर में पुकारने लगा, “दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया कर!”

तब यीशु रुका और बोला,“’उसे मेरे पास लाओ।’”

सो उन्होंने उस अंधे व्यक्ति को बुलाया और उससे कहा, “हिम्मत रख! खड़ा हो! वह तुझे बुला रहा है।” वह अपना कोट फेंक कर उछल पड़ा और यीशु के पास आया।

फिर यीशु ने उससे कहा,“’तू मुझ से अपने लिए क्या करवाना चाहता है?’”

अंधे ने उससे कहा,“हे रब्बी, मैं फिर से देखना चाहता हूँ।”

तब यीशु बोला,“’जा, तेरे विश्वास से तेरा उद्धार हुआ।’” फिर वह तुरंत देखने लगा और मार्ग में यीशु के पीछे हो लिया।

बरतिमाई तुरंत देखने लगा। सोचिये उसे कैसे लगा जब उसने ज्योति को देखा! परन्तु यह केवल एक ही चंगाई नहीं हुई। उसका यीशु पर विश्वास करना ही सबसे बड़ी चंगाई को लेकर आया। उसने नया जीवन पाया!

जब यीशु भीड़ के साथ आगे जा रहे थे, बरतिमाई भी उनके पीछे चलते हुए परमेश्वर कि महिमा करता जा रहा था। जब भीड़ ने बरतिमाई कि ख़ुशी को देखा, तब वे बहुत अचंबित हुए और परमेश्वर कि महिमा करने लगे।

जिस समय यीशु अपने दुःख को स्मरण करता हुआ आगे बढ़ रहे थे, उसे दूसरों के लिए दया आ रही थी। भीड़ यरीहो से निकल कर दूसरी ओर को गयी। शहर में सब रुक कर यह देख रहे होंगे कि यह सब शोर कैसा है। बहुत दिनों से वे यीशु के आने के विषय में सुन रहे थे। सब उस चमत्कार करने वाले को देखना चाहते थे जिसने कि पूरे राष्ट्र को उल्टा पुल्टा कर दिया था।

यरीहो में जक्कई नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह कद में बहुत छोटा था और उसे भीड़ के ऊपर से देखने में दिक्कत आ रही थी। परन्तु वह यीशु को देखना चाहता था। जक्कई एक कर वसूलने वाला था जिसे यहूदी लोग धुत्कारते थे। वह रोमी सरकार का एक कठपुतली था जो उनके लिए लोगों से कर वसूलता था। ना केवल यह, वह उनसे ज़रुरत से ज़यादा वसूलता था। जक्कई का काम विशेष करके बहुत दुष्ट था क्यूंकि वह सब कर वसूलने वालों का सरदार था। वह भ्रष्टाचार को अनदेखा करता था जो लोगों के लिए बोझ बन गया था। यरीहो एक मुख्य शहर था और वह भारी राहदारी जमा किया करता था।

जब भीड़ आने लगी, जक्कई को लगा कि वह यीशु को नहीं देख पाएगा यदि वह कोई ऊंचे स्थान पर नहीं चला जाता। सो वह सब के आगे दौड़ता हुआ एक गूलर के पेड़ पर जा चढ़ा।फिर जब यीशु उस स्थान पर आया तो उसने ऊपर देखते हुए जक्कई से कहा,“’जक्कई, जल्दी से नीचे उतर आ क्योंकि मुझे आज तेरे ही घर ठहरना है।’”

क्या आप कल्पना कर सकते हैं? उसके परमेश्वर पिता के प्रति आज्ञाकारिता के कारण, उसे रोकना पड़ा। उसे जक्कई के घर में एक बहुत बड़ा कार्य करना था!

बिना कोई समय बर्बाद करे, जक्कई झटपट नीचे उतरा और  प्रसन्नता के साथ उसका स्वागत किया। जब सब लोगों ने यह देखा तो वे बड़बड़ाने लगे और कहने लगे,“यह एक पापी के घर अतिथि बनने जा रहा है!”

परन्तु यीशु को भीड़ को सुनने में कोई रूचि नहीं थी। वह परमेश्वर पिता कि इच्छा को पूरी करने में वफादार था, और वह जानता था कि जक्कई के ह्रदय में एक बड़ा काम होने जा रहा है।

जक्कई खड़ा हुआ और प्रभु से बोला,“हे प्रभु, देख, मैं अपनी सारी सम्पत्ति का आधा गरीबों को दे दूँगा और यदि मैंने किसी का छल से कुछ भी लिया है तो उसे चौगुना करके लौटा दूँगा!”

यह एक वास्तविक पश्चाताप है! जक्कई पूरी तौर से परिवर्तित हो गया था! ज़रा सोचिये। वह अपनी संपत्ति से आधा बाँट रहा था, उसका घर और खेत और सोना मिलाकर। जिस किसी ने भी उसके भरष्टाचार को सहा था उसे चार गुना वापस मिलने वाला था! यह उद्धार का एक ख़ूबसूरत कार्य था! सुसमाचार के द्वारा उसके ह्रदय का परिवर्तन हो गया था!

यीशु के पीछे जो भीड़ चल रही थी वह यह देख कर खुश हुई कि उसने एक अंधे को चंगा किया। परन्तु जब उसने एक पापी पर दयालुता दिखाई, तब वे पलट गए। उन्होंने कितनी जल्दी उस मनुष्य पर अपने न्याय दिखा दिया जिसे वे मसीहा समझते थे! वे उसके राज्य को समझने के लिए बहुत दूर थे! परन्तु जक्कई ने उसे “स्वामी” कह कर पुकारा। यह कहानी यह पूछती है, “कौन वास्तव में वफादार था?”

यीशु ने उससे कहा,“’इस घर पर आज उद्धार आया है, क्योंकि यह व्यक्ति भी इब्राहीम की ही एक सन्तान है। क्योंकि मनुष्य का पुत्र जो कोई खो गया है, उसे ढूँढने और उसकी रक्षा के लिए आया है।’”

सभी यहूदी इस बात का गर्व करते थे कि वे इब्राहिम के वंश के हैं। इसका मतलब था कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोग थे। परन्तु वे कर वसूलने वाले को अपना परिवार नहीं समझते थे। जक्कई ने यीशु पर पश्चाताप के साथ विश्वास करके यह दिखा दिया कि वह सही में इब्राहिम के परिवार का हिस्सा है। और यीशु ने यहूदियों को सुन्दर तरीके से यह दिखाया कि परमेश्वर अपनी दया और अनुग्रह उन सब पर दिखता है जो उस पर विश्वास करते हैं!

कई बार, हम में से बहुतेरे इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि यीशु अपनी ज्योति उन पाखण्डी धार्मिक अगुवों पर चमकाएगा। हम में से बाकि लोग फरीसियों के हर रोज़ के तिरस्कार के साथ जीते रहते हैं।

कहानी १०६: यीशु का भय 

लूका १२:१-७

फरीसी और शास्त्रि जब यीशु के खिलाफ साजिश रच रहे थे और सवालों से उसे फंसाना चाहते थे, यीशु फिर भी प्रचार करते रहे।निश्चित रूप से चेले इस बात को समझते थे कि यीशु के साथ उनकी वफादारी उनके जीवन को जोखिम में डाल सकती है। सो यीशु ने उन्हें दुष्ट और शक्तिशाली लोगों कि तरफ से सही रूप से देखने के तरीके सिखाये। उसने उन्हें ऊपर कि ओर और अधिक शक्ति को देखने को कहा:

“’फरीसियों के ख़मीर से, जो उनका कपट है,बचे रहो। कुछ छिपा नहीं है जो प्रकट नहीं कर दिया जायेगा। ऐसा कुछ अनजाना नहीं है जिसे जाना नहीं दिया जायेगा। इसीलिये हर वह बात जिसे तुमने अँधेरे में कहा है, उजाले में सुनी जायेगी। और एकांत कमरों में जो कुछ भी तुमने चुपचाप किसी के कान में कहा है, मकानों की छतों पर से घोषित किया जायेगा।

“किन्तु मेरे मित्रों! मैं तुमसे कहता हूँ उनसे मत डरो जो बस तुम्हारे शरीर को मार सकते हैं और उसके बाद ऐसा कुछ नहीं है जो उनके बस में हो। मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि तुम्हें किस से डरना चाहिये। उससे डरो जो तुम्हें मारकर नरक में डालने की शक्ति रखता है। हाँ, मैं तुम्हें बताता हूँ,बस उसी से डरो।

“क्या दो पैसे की पाँच चिड़ियाएँ नहीं बिकतीं? फिर भी परमेश्वर उनमें से एक को भी नहीं भूलता। और देखो तुम्हारे सिर का एक एक बाल तक गिना हुआ है। डरो मत तुम तो बहुत सी चिड़ियाओं से कहीं अधिक मूल्यवान हो।

“किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ जो कोई व्यक्ति सभी के सामने मुझे स्वीकार करता है, मनुष्य का पुत्र भी उस व्यक्ति को परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने स्वीकार करेगा। किन्तु वह जो मुझे दूसरों के सामने नकारेगा, उसे परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने नकार दिया जायेगा।'”    –लूका १२:१ब-९

इस दृश्य की कल्पना कीजिए। आप जीवते परमेश्वर के सिंहासन के सामने खड़े हैं। परमेश्वर का महान, शानदार प्रकाश उसके सिंहासन से बाहर चमकता है। चौबीस अगुवों के साथ करूब भी हैं जो परमेश्वर कि प्रशंसा करते रहते हैं। और आप भी वहाँ खड़े हैं। इस धरती पर रहकर आपने बहुत से पाप किये। आपने लोगों को उस तरह से प्रेम नहीं किया जैसा कि परमेश्वर ने आपसे चाहा था, और आप के कुछ हिस्सो ने भी परमेश्वर को अपने पूरे दिल, प्राण, मन और ताक़त से प्रेम नहीं किया। आप जानते हैं कि आप युगानुयुग के लिए परमेश्वर कि पवित्र उपस्थिति में रहने योग्य नहीं हैं। आपके पाप और असफलताएं आपके प्राण गंदे बोझ कि तरह हैं। लेकिन परमेश्वर के दाहिने हाथ आपका उद्धारकर्ता बैठा है जो आपको बचाएगा। वहाँ यीशु है जो, अपने पूरे शानदार सामर्थ में राज कर रहा है। जब आप उसके आगे घुटने टेकते हैं, तो यह पहली बार नहीं होगा कि आप उसे राजा घोषित करते हैं। इस पृथ्वी पर आपके जीवन भर, आपको सुसमाचार सुनाया गया, और परमेश्वर ने आपकी आँखें खोल दीं ताकि आप देख सकें कि बाइबिल में यीशु के विषय में जो बातें लिखीं हैं वे सच हैं।

आप अपने भरोसा उस पर डालते हैं। अब जब आप परमेश्वर के सिंहासन के सामने खड़े होते हैं, यीशु कि धार्मिकता आपको ढांप देती है। उसने अपने लहू से आपके पापों कि कीमत चुकाई, और परमेश्वर पिता अपने पुत्र कि अच्छाई को आपमें देखता है। आपको शुद्ध और साफ़ किया गया क्यूंकि आपने यीशु को अपने जीवन में स्वीकार करने में असफल नहीं रहे।

और इसलिए, यीशु सब दूतों के सामने, पूरे स्वर्ग और पृथ्वी और परमेश्वर पिता के सामने आपको अपना कहता है। आप युगानुयुग के लिए उसके हैं।

अब, हम यह नहीं जानते कि क्या ऐसा वास्तव में होगा, लेकिन हम कल्पना कर सकते हैं। आप अपने परमेश्वर के सिंहासन के सामने अपने को यीशु के साथ एक सुरक्षित पद पर देख सकते हैं। उस फरीसी कि कल्पना कीजिये जिसने यीशु का इस पृथ्वी पर विरोध किया और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया और अब स्वर्ग के सिंघासन के सामने उसे लाया गया है। उसने यीशु को इंकार किया था और अब परमेश्वर सब दूतों के सामने उसका इंकार करेगा। अब बहुत देर हो चुकी है और उसे अब परमेश्वर के क्रोध का सामना करना पड़ेगा। यीशु ने उसके लिए एक रास्ता बनाया था, लेकिन उसने इंकार कर दिया था, और इसलिए प्रभु कहता है, “‘ठीक है, तुम अपनी मर्ज़ी कर सकते हो। तुमने जो परमेश्वर से हट कर जो रास्ता चुना था वो तुम्हारा है।” उस अलगाव का स्थान नरक है।

जीवन में जो कुछ भी अच्छा और पवित्र है उसका स्त्रोत परमेश्वर है, इसलिए अलगाव का स्थान बहुत ही कष्ट और मुसीबत का है। उस फरीसी के बारे में सोचिये जिसे यीशु ने सारे ब्रह्मांड के सामने बेदखल कर दिया। सोचिये जब उसे नरक में हमेशा हमेशा के लिए फेंक दिया जाएगा जहां उसका अलगाव परमेश्वर से और सारी अच्छी चीज़ों से हो जाएगा जो वह अपने साथ लाता है।

यह सब बातें हमें बहुत दूर में दिखती हैं लेकिन यीशु उन्हें उत्तम दृष्टि से देखने में सक्षम था। वह यह समझता था कि वे जिन्होंने उसे स्वीकारा था और वे जिन्होंने उसका इंकार किया था उनके जीवन दाव पर लगे थे। उन्हें कठोरता पूर्वक उस भयानक भाग्य के लिए डाटना ज़यादा अनुरागशील था बजाय इसके कि वे अपने ही झूठ के कारण धोखा खाते।

लेकिन उन्हें उस भयंकर भविष्य के विषय में बताकर जो फरीसियों और शास्त्रियों के लिए था, यीशु खुलकर उनके नेतृत्व का विरोध कर रहा था। उसने उन पर सबसे गम्भीर बातों के लिए दोषी ठराया और उनके और अपने बेच एक रेखा खींच दी। राष्ट्रों को इस बात का निर्णय लेना होगा कि किसने उनके विश्वास को बनाया। क्या वे मसीह पर विश्वास कर के परमेश्वर कि उन नयी बातों का आदर करेंगे जो वह रहा था? इस्राएल के धार्मिक अगुवों ने अपने बगावत कि पुष्टि कर दी थी। अब लोग क्या करेंगे?

कहानी ८९: जीवन कि रोटी (भाग II)

यूहन्ना ६:४३-७१

जब लोगों ने यीशु को सुना, वे बड़बड़ाने लगे और शिकायत करने लगे। वह कौन था ऐसा कहने वाला कि वह स्वर्ग से नीचे उतर के आया है? वे सब जानते थे कि वह नासरी से एक बढ़ई यूसुफ का पुत्र है। वे सब उसके माता और पिता। वह ऐसा कैसे दावा कर सकता था कि वह स्वर्ग से आया है?

यदि आप इसके बारे में सोचें, यह किसी भी सामान्य मानव के लिए ऐसा कहना एक हास्यास्पद बात होगी। वास्तव में, यह उससे भी बढ़कर होगा। यह एक भयानक झूठ होगा। किसी भी मनुष्य के लिए झूठ और यह दावा करना कि वह सारी सृष्टि का परमेश्वर बनके स्वर्ग से आया है तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा। यह उसका अपमान होगा जो पूर्ण रूप से अच्छा और पवित्र है। इसीलिए दुनिया के झूठे धर्म भीषण रूप से गलत हैं। वे उसके विषय में कुटिल, विकृत झूठ बताते हैं जो सीधा और सच्चा है! वे शैतान के झूठ का साथ देते हैं और मानव जाती को सृष्टिकर्ता कि खूबसूरती को समझने से रोकते हैं।

यदि यीशु वास्तव में स्वर्ग से था, तो गलील के क्षेत्र में कुछ शानदार हो रहा था। इसका मतलब था कि परमेश्वर पृथ्वी पर आ गया था, और गलील के लोगों को जो सबसे बड़ा निर्णय लेना था वो था कि वे यीशु के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यही सबसे महवपूर्ण निर्णय है जो हम और आप ले सकते हैं।

यीशु जानते थे कि भीड़ उनके खिलाफ कैसे बड़बड़ा रही थी। वे यह भी जानते थे कि परमेश्वर पिता अपनी पवित्र आत्मा के द्वारा उसके शिक्षण में कार्य कर रहा है। गलीली लोग आत्मा के कार्य जिस तरह अस्वीकार कर रहे थे वे यीशु के कार्यों को भी अस्वीकार कर रहे थे। यह पाप उसी पाप के सामान था जब धार्मिक अगुवों ने यीशु को बताया कि वह शैतान का सहभागी है! यीशु ने उत्तर दिया:

“’आपस में बड़बड़ाना बंद करो, मेरे पास तब तक कोई नहीं आ सकता जब तक मुझे भेजने वाला परम पिता उसे मेरे प्रति आकर्षित न करे।'” 

यीशु बता रहे हैं कि जब तक परमेश्वर शुरू ना करे और पीछे ना हो, कोई उस पर विश्वास नहीं कर सकता। यदि हम में से कोई भी यीशु का चेला है, वह इसिलिय कि परमेशर ने हमें कीचड कि दलदल से निकाला ताकि हम पश्चाताप कर सकें। लकिन केवल यही नहीं है जो वह उनके लिए करेगा जो यीशु पर विश्वास करते हैं:

“‘मैं अंतिम दिन उसे पुनर्जीवित करूँगा। नबियों ने लिखा है, ‘और वे सब परमेश्वर के द्वारा सिखाए हुए होंगे।’ हर वह व्यक्ति जो परम पिता की सुनता है और उससेसिखता है मेरे पास आता है। किन्तु वास्तव में परम पिता को सिवाय उसके जिसे उसने भेजा है, किसी ने नहीं देखा। परम पिता को बस उसी ने देखा है|“मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, जो विश्वासी है, वह अनन्त जीवन पाता है। मैं वह रोटी हूँ जो जीवन देती है। तुम्हारे पुरखों ने रेगिस्तान में मन्ना खाया था तो भी वे मर गये। जबकि स्वर्ग से आयी इस रोटी को यदि कोई खाए तो मरेगा नहीं।  मैं ही वह जीवित रोटी हूँ जो स्वर्ग से उतरी है। यदि कोई इस रोटी को खाता है तो वह अमर हो जायेगा। और वह रोटी जिसे मैं दूँगा, मेरा शरीर है। इसी से संसार जीवित रहेगा।’”

यीशु ने वास्तव में उनके बहस को उन्ही पर डाल दिया था। वे क्यूँ उसी मन्ना को चाहते थे जो परमेश्वर ने मूसा के समय में भेजा था, और सब जंगल में मर गए थे? विशेष करके जब कि यीशु ही वो रोटी है जो स्वर्ग से भेजा गया है, और उनके लिए अपने आप को बलिदान कर दिया है? अनंत जीवन को पाने के लिए उन्हें केवल विश्वास करना था!

जब यहूदियों ने यीशु को ऐसा कहते सुना, वे आपस में बहस करने लगे। उन्होंने कहा,”‘यह व्यक्ति अपना शरीर हमें कैसे खाने के लिए दे सकता है?'” स्वर्ग कि अनन्तकाल कि बातें जो यीशु बता रहा है, उसे समझने के बजाय वे शारीरिक बातों पर अधिक ध्यान दे रहे थे।

यीशु ने यह स्पष्ट करने की कोशिश नहीं की। वह जानता था कि उनके ह्रदय कितने कठोर हैं। वह जानता था कि वे जो उसके पास सच्चे विश्वास के साथ आएंगे, वे उसके चेलों के समान विश्वास और भक्ति के साथ प्रतिक्रिया करेंगे। जिनके पास सुनने के लिए कान थे उनके लिए उसके शब्द स्पष्ट थे, लेकिन ये कठोर ह्रदय वाले विद्रोही लोग उन्हें भ्रम में बदल रहे थे। वह बोलता रहा यह जानते हुए भी कि वे समझने से इंकार करेंगे:

“‘मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का शरीर नहीं खाओगे और उसका लहू नहीं पिओगे तब तक तुममें जीवन नहीं होगा। जो मेरा शरीर खाता रहेगा और मेरा लहू पीता रहेगा, अनन्त जीवन उसी का है। अन्तिम दिन मैं उसे फिर जीवित करूँगा। मेरा शरीर सच्चा भोजन है और मेरा लहू ही सच्चा पेय है।  जो मेरे शरीर को खाता रहता है, और लहू को पीता रहता है वह मुझमें ही रहता है, और मैं उसमें। बिल्कुल वैसे ही जैसे जीवित पिता ने मुझे भेजा है और मैं परम पिता के कारण ही जीवित हूँ, उसी तरह वह जो मुझे खाता रहता है मेरे ही कारण जीवित रहेगा। यही वह रोटी है जो स्वर्ग से उतरी है। यह वैसी नहीं है जैसी हमारे पूर्वजों ने खायी थी। और बाद में वे मर गये थे। जो इस रोटी को खाता रहेगा, सदा के लिये जीवित रहेगा।’”

ऐसा लगता था मनो यीशु कोई कठोर ह्रदय वाली भीड़ को पहेलियों में बात कर रहा हो। वह उन्ही कठिन विचारों का उपयोग कर रहा था जिस प्रकार वह दृष्टान्तों। जिनका सच्चा विश्वास था केवल वे ही समझ सकते थे। यीशु क्रूस पर अपनी जान देने के लिए उत्सुक था। अपने शरीर और लहू के द्वारा, वह मानवजाति के लिए उद्धार को प्राप्त कर लेगा। यह परमेश्वर का विशेष बलिदान होगा।

जब लोग सुन रहे थे, तब चेले उससे परेशान हो रहे थे। उन्होंने कहा,”‘यह शिक्षा बहुत कठिन है, इसे कौन सुन सकता है?””
यीशु को अपने आप ही पता चल गया था कि उसके अनुयायियों को इसकी शिकायत है। इसलिये वह उनसे बोला,

“क्या तुम इस शिक्षा से परेशान हो? यदि तुम मनुष्य के पुत्र को उपर जाते देखो जहाँ वह पहले था तो क्या करोगे? आत्मा ही है जो जीवन देता है, देह का कोई उपयोग नहीं है। वचन, जो मैंने तुमसे कहे हैं, आत्मा है और वे ही जीवन देते हैं।किन्तु तुममें कुछ ऐसे भी हैं जो विश्वास नहीं करते।”

यीशु शुरू से ही जानता था कि वे कौन हैं जो विश्वासी नहीं हैं और वे कौन हैं जो उसे धोखा देगा। यीशु ने आगे कहा, “इसीलिये मैंने तुमसे कहा है कि मेरे पास तब तक कोई नहीं आ सकता जब तक परम पिता उसे मेरे पास आने की अनुमति नहीं दे देता।”

इसी कारण यीशु के बहुत से अनुयायी वापस चले गये। और फिर कभी उसके पीछे नहीं चले। फिर यीशु ने अपने बारह शिष्यों से कहा, “क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?”

शमौन पतरस ने उत्तर दिया,“‘हे प्रभु, हम किसके पास जायेंगे? वे वचन तो तेरे पास हैं जो अनन्त जीवन देते हैं। अब हमने यह विश्वास कर लिया है और जान लिया है कि तू ही वह पवित्रतम है जिसे परमेश्वर ने भेजा है।’”

फिर से इसे पढ़ें। क्या आप पतरस के विश्वास और महानता को देख सकते हैं! एक विश्वासी का निपुर्ण उदाहरण उसके शब्द हैं। यीशु ने कहा कि जिन्हें परमेश्वर पिता अपनी ओर खीँच लेता है, वे फिर कभी नहीं खोते, पतरस उसके सही उदाहरण था। पूरी भीड़े, धार्मिक अगुवे, और असफल चेलों में ये कुछ ही थे जिनका विश्वास साफ़ और सच्चा था। मसीह के सन्देश को सुनने के लिए उनके पास कान थे सुनने के लिए और देखने के लिए आँखें थीं।

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम बारहों को मैंने नहीं चुना है? फिर भी तुममें से एक शैतान है।”

यीशु जानता था कि उसके ग्यारह चेलों के पास सच्चा विश्वास था, जब कि सारा यहूदी देश उसके खिलाफ जा रहा था। वह शमौन इस्करियोती के बेटे यहूदा के बारे में बात कर रहा था क्योंकि वह यीशु के खिलाफ़ होकर उसे धोखा देने वाला था।

कहानी ७०: विद्रोह और पश्चाताप के बीच अंतर

मत्ती ११:२०-३०

केवल धार्मिक अगुवे थे जिन्होंने ने परमेश्वर के सन्देश को यूहन्ना और यीशु के द्वारा सुनने से इंकार किया। इस्राएल के देश में बहुत से लोग ने भी उन्हें ठुकराया। यीशु ने उनके बारे में भीड़ से कहा ;

“आज की पीढ़ी के लोगों की तुलना मैं किन से करूँ? वे बाज़ारों में बैठे उन बच्चों के समान हैं जो एक दूसरे से पुकार कर कह रहे हैं,” ‘

हमने तुम्हारे लिए बाँसुरी बजायी,
पर तुम नहीं नाचे।
हमने शोकगीत गाये,
किन्तु तुम नहीं रोये।’

बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना आया। जो न औरों की तरह खाता था और न ही पीता था। पर लोगों ने कहा था कि उस में दुष्टात्मा है। फिर मनुष्य का पुत्र आया। जो औरों के समान ही खाता-पीता है, पर लोग कहते हैं, ‘इस आदमी को देखो, यह पेटू है, पियक्कड़ है। यह चुंगी वसूलने वालों और पापियों का मित्र है।’ किन्तु बुद्धि की उत्तमता उसके कामों से सिद्ध होती है।”

क्या आपने समझा कि यीशु क्या क्या कह रहे थे? परमेश्वर कि आत्मा ने दोनों यूहन्ना और यीशु कि सेवकाई पर अधिकार ले, लेकिन दोनों भिन्न भिन्न तरीकों से। योहन्ना विलाप करते हुए और उपवास वे जो उससे बात करते थे यह दुष्ट आत्मा से ग्रस्त है। फिर जब यीशु ने पापियों को आनंद दिया और सीने से लगाया तब वे उसे ही पापी करार देने लगे! यदि किसी का ह्रदय यह तय कर लेता है कि जो कुछ परमेश्वर कि ओर से आएगा उसे ठुकराना ही है, तो जो कुछ भी उसके सेवक करेंगे वे उसमें गलतियां निकालेंगे!  लेकिन जिनको परमेश्वर की पवित्र आत्मा का ज्ञान दिया गया है वे यह बात समझेंगे कि यूहन्ना और यीशु कि सेवकाई दोनों परमेश्वर के सामर्थी और प्रभावशाली मर्ज़ी के द्वारा दिया गया है।इस्राइल के प्रभावशाली धार्मिक परिवार में जो भी पैदा हुआ उसके कारण परमेश्वर के बच्चों को नहीं दिखाया गया, परन्तु उनके द्वारा जो जिन्होंने ने परमेश्वर के वचन को परमेश्वर के दासों द्वारा सुना और विश्वास किया।

यीशु ने गलील भर में शहरों की यात्रा की और सभी प्रकार के चमत्कार दिखाए। लेकिन फिर भी, कई लोगों ने पश्चाताप नहीं किया! परमेश्वर का पुत्र उन के लिए सामर्थी वचन लेकर आया, लेकिन अपने ह्रदयों में उसके कार्य नहीं होने दिया। सो यीशु उन शहरों को उनके पश्चाताप के अभाव के कारण ताड़ना देने लगा। उन्होंने कहा;

“‘अरे अभागे खुराजीन, अरे अभागे बैतसैदा तुम में जो आश्चर्यकर्म किये गये, यदि वे सूर और सैदा में किये जाते तो वहाँ के लोग बहुत पहले से ही टाट के शोक वस्त्र ओढ़ कर और अपने शरीर पर राख मल कर खेद व्यक्त करते हुए मन फिरा चुके होते। किन्तु मैं तुम लोगों से कहता हूँ न्याय के दिन सूर और सैदा की स्थिति तुमसे अधिक सहने योग्य होगी। और अरे कफरनहूम, क्या तू सोचता है कि तुझे स्वर्ग की महिमा तक ऊँचा उठाया जायेगा? तू तो अधोलोक में नरक को जायेगा। क्योंकि जो आश्चर्यकर्म तुझमें किये गये, यदि वे सदोम में किये जाते तो वह नगर आज तक टिका रहता।  पर मैं तुम्हें बताता हूँ कि न्याय के दिन तेरे लोगों की हालत से सदोम की हालत कहीं अच्छी होगी।”

प्रभु का दिन आ रहा है, वास्तव में, वह आ ही रहा है। यीशु के समय से लेकर आज कि तारिख तक जब भी किसी शहर में यीशु का सुसमाचार सुनाया जाता है, लोगों के पास चुनाव करने का और कोई रास्ता नहीं होता बजाय इसके कि वे चुनाव करें। उन्हें अपने पापों से पश्चाताप करके यीशु के पास आ जाना चाहिए या फिर वे उसे ठुकरा। चाहे लोग यह समझें कि वे सुनने के लिए बहुत व्यस्त हैं या वे उसे अनदेखा कर रहे हैं क्यूंकि वे मानते हैं कि यीशु को छोड़ और कोई भी रास्ता है आराधना करने का, वह आ रहा था। यीशु मसीह के सुसमाचार के बारे में पीछे से किसी भी शहर में घोषित किया जाता है तो भगवान पृथ्वी आज तक , लोगों को एक विकल्प बनाने के लिए कोई विकल्प नहीं है सभी तरह से चला गया . वे अपने पाप का पश्चाताप और प्रभु यीशु को चालू करने के लिए चयन करना होगा , या वे उसे खारिज कर रहे हैं . लोग उन्हें सुनने के लिए अभी बहुत व्यस्त हैं या वे मसीह से एक और रास्ता विश्वास करते हैं और पूजा करने के लिए चाहते हैं , क्योंकि वे उसे अनदेखा कर रहे हैं लगता है, भले ही वे सभी निर्माण के भगवान उन्हें करने की पेशकश कर रहा है पर बाहर याद कर रहे हैं , और कहा कि एक बहुत है भयानक पाप . और यह वास्तव में उस अवसर को खो रहे हैं जो सृष्टिकर्ता उन्हें देना चाहता है। और इसका अंजाम बहुत भयानक है। क्यूंकि प्रभु का दिन नज़दीक है, और सुरक्षित होने का एक ही रास्ता है और वो है परमेश्वर के छुटकारे से! प्रभु यीशु इन लोगों को अपने महान उद्धार को दे रहे थे,वे परमेश्वर के समय को महिमा द्वारा तोड़ने के गवाह थे, और उनके ह्रदय आनंदित नहीं थे! वे नम्रता और श्रद्धा में अपने घुटनों पर नहीं आये! उनके ह्रदय पूर्ण रूप से कठोर थे।

“‘परम पिता, तू स्वर्ग और धरती का स्वामी है, मैं तेरी स्तुति करता हूँ क्योंकि तूने इन बातों को, उनसे जो ज्ञानी हैं और समझदार हैं, छिपा कर रखा है। और जो भोले भाले हैं उनके लिए प्रकट किया है।'”

“’मेरे परम पिता ने सब कुछ मुझे सौंप दिया और वास्तव में परम पिता के अलावा कोई भी पुत्र को नहीं जानता। और कोई भी पुत्र के अलावा परम पिता को नहीं जानता। और हर वह व्यक्ति परम पिता को जानता है, जिसके लिये पुत्र ने उसे प्रकट करना चाहा है'”।

वाह! पृथ्वी के लोग जो परमेश्वर के द्वारा चुने,  वे वो लोग थे जिन्होंने ने यीशु के वचन को सुना था और उस पर विश्वास किया था। वे परमेश्वर को अधिक आनंद देते थे! वे परमेश्वर के वचन थे! जो भी उनके द्वारा परवर्तित  नहीं होता था इस बात को साबित करते थे कि वे परमेश्वर के उन लोगों में से नहीं हैं  जिन्हें उसके पुत्र ने प्रकट करने को चुना था! यीशु ने आगे कहा;

“‘हे थके-माँदे, बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें सुख चैन दूँगा।  मेरा जुआ लो और उसे अपने ऊपर सँभालो। फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है। तुम्हें भी अपने लिये सुख-चैन मिलेगा। क्योंकि वह जुआ जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ बहुत सरल है। और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है।’”

यह कितना सुन्दर वादा है! यीशु के समय कि धार्मिक अगुवे और फरीसी लोगों पर भयंकर बोझ डालते थे। वे कठोर नियम और कानून बनाते थे और गहरी सतर्कता से वे लोगों पर लागू करते थे। परमेश्वर के पवित्र शास्त्र में सारे नये नियमों के कारण यहूदी लोग इस डर में रहते थे कि वे कहीं पाप न कर बैठें। वह अनुग्रह का एक नया वाचा लेकर आ रहा था, जिस में उसके चुने हुए लोगों के लिए परमेश्वर कि मॉफी और करुणा मुफ्त थी। यह आनंद मानाने का विशाल कारण है!

अपनी सेवकाई में इस समय से, यीशु उनसे जो परमेश्वर के वचन को नहीं सुनते थे और पश्चाताप भी नहीं करते थे बहुत दिलेरी से बात करने लगा। उसके यह कठोरता वास्तव मं उसके प्रेम था।  एक समय आएगा जब इन लोगों के पास पश्चाताप करने को समय नहीं मिलेगा, और वे सब नाश हो जाएंगे। यदि यीशु के अद्भुद चमत्कार और उसके  बहुमूल्य शिक्षण उन्हें नहीं बदल सके, तब शायद न्याय के दिन कि चेतावनियां! यीशु यहूदी लोगों को बार बार समय दे रहा था कि वे मसीह को अपना लें।  क्या वे एक राष्ट्र हो कर अपने उद्धारकर्ता के पास लौट आएंगे?

कहानी ४५ः पहाड़ी उपदेश: धन्य वचन

मत्ती. ५ः३-१२, लूका ६ः२०-२६

जितना कि यह पहाड़ी उपदेश पढ़ा और माना जाता है वैसे ही कुछ ही बाइबल के पद हैं जिनको इसी कि तरह माना जाता है। यह मत्ती की पुस्तक में पांच अध्याय से सात अध्याय के बीच में पाया जाता है। इसमे कुछ एक मनुष्य के हाथों लिखे सुंदर आदर्श शामिल हैं।

जब यीशु गलील के सागर के किनारों के साथ और पूरे क्षेत्र में प्रचार कर रहे थे, वे स्वर्ग के राज्य (या परमेश्वर का राज्य) के बारे में अधिक से अधिक बात कर रहे थे। जन मत्ती ने यीशु के जीवन के बारे में लिखा, उसने सारी अची बातों को इस तरह इकट्ठा किया कि यीशु के सुनने वाले चकित रह गए और उनको एक अलग भाग में डाल दिया। वे सवालों का उत्तर देते हैं: स्वर्ग के राज्य के सदस्यों को किस तरह रहना चाहिए?

मत्ती के धर्मोपदेश में चीजों में से कई के रूप में अच्छी तरह से लूका की पुस्तक में बिखरे हुए पाए जाते हैं। यीशु ने शायद कहानियों को बार बार परमेश्वर कि सच्चाई के विषय में उपयोग कर के हज़ारों सुनने वालों को सिखाया।

पहाड़ का उपदेश बहुत ही शुद्ध और प्रकाशमय है। वह यह सिखाता है कि जो स्वार्ग के राज्य के हैं उनसे परमेश्वर क्या चाहता है। पृथ्वी एक श्रापित जगह जहाँ पुरुष एयर स्त्रीयां और बचे पाप और समझौते में रहते हैं। मनुष्य जात निरंतर परमेश्वर के विरुद्ध रहता है। लेकिन यहिषु ने संसार को बचने के लिए उस काम में निकल पड़ा। वह स्वर्ग के राज्य को इस पृथ्वी पर स्थापित करने के लिए आया था।

स्वर्ग में परमेश्वर की इच्छा का पूरी तरह से पालन किया जाता है। मसीह के अनुयायियों जब पृथ्वी पर परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं, वे यहां उसके राज्य की स्थापना का एक हिस्सा बन जाते हैं! वे परमेश्वर की भव्य बचाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं!

भयानक अभिशाप के पहले दिनों से, परमेश्वर का इस दुनिया के अंधेरे साम्राज्य में तोड़ने के लिए एक योजना बनाई। जब आदम और हव्वा पाप में गिरे, उन्होंने शैतान की शक्ति को मानव जाति कोशैतान की शक्तियों को सौंप दिया। वे अपने शक्तिशाली प्रभु से अलग हो गए थे। लेकिन परमेश्वर इसे यहाँ अंत नहीं करने जा रहा था। समय के साथ, उसने इब्राहीम के बच्चों के माध्यम से एक राष्ट्र बनाया। यह दुनिया के लिए उसके उद्धार योजना का शुरुआती चरन था। उन्हें एक पवित्र लोग होना था, जो अन्य देशों से अलग थे ताकि वे वह विशेष, प्रभावशाली परमेश्वर कि उपस्थिति को पा सकें। मूसा के नेतृत्व के माध्यम से, उसने उन्हें परमेश्वर के तरीकों को समझने में मदद करने के लिए उन्हें कानून दे दिया। यह इस्राएल राष्ट्र को भक्ति और आज्ञाकारिता के साथ उनके, पवित्र, धर्मी, और प्रेमी परमेश्वर के सम्मान में मदद करने के लिए किया गया था। यह उन्हें मसीहा के लिए तैयार होने के लिए तैयार करता।

अब यीशु यह दिखाना चाहते थे कि नियम कैसा उच्च और शुद्ध हमेशा होना चाहिए था। पर्वत के उपदेश में, यीशु सिखाते हैं कि कैसे परमेश्वर कि शुद्ध, प्रकाशमय, पवित्रता मनुष्य के ह्रदय में गहराई से घुसना चाहिए।

यीशु उस दिन के लिए तैयार हो रहा था जब वह पाप के श्राप पर जय पाएगा। वह स्वयं के बलिदान द्वारा मृत्यु और पाप को हरा सकेगा, और वह फिर से जी उठेगा। मृत्यु उसे पकड़ कर  थी। वह जानता था कि वह ऊपर उठाया जाएगा और स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ जाकर बैठेगा।

यीशु जब परमेश्वर कि योजना के लिए उत्सुकता से ठहरे थे, वह जानते थे कि एक बार वह उस सिंहासन पर बैठेगा, वह उन सब पर अपनी आत्मा उँडेलेगा जो उस पर विश्वास करते हैं। पवित्र आत्मा चेलों को वह शक्ति देगा ताकि वे यीशु के पूरे दिल से सेवा कर सकें। वे दुनिया का सुसमाचार फैलाएंगे। वे यीशु के साथ मिलकर रहेंगे जो उनपर स्वार्ग से राज करेगा। वे कलीसिया कहलाए जाएंगे, और उनके ज़रिये, परमेश्वर का राज्य इस पृथ्वी पर फैलेगा। पवित्र आत्मा उनको अन्धकार के राज्य पर जय पाने के लिए सामर्थ देगा। लेकिन शैतानी ताक़ते दुष्टतापूर्वक लड़ती रहेंगी जब तक कि यीशु एक अंतिम और पूर्ण हार सारे दुश्मनों को वापस आने के बाद दे नहीं देता।

इस सन्देश में, यीशु अपनी कलीसिया को दिशा निर्देश दे रहे थे। यीशु के मृत्यु और जी उठने के समय और इस समय तक, हम यीशु के राज्य को इस श्रापित संसार में जी रहे हैं। कभी कभी यह समय “अभी” कहलाता है और कभी “अभी नहीं” यीशु विश्वासियों के लिए उनका राजा और याजक बनके मिल चूका है और उनके पास उसका पवित्र आत्मा भी है। परन्तु वे अभी भी “अभी नहीं” के समय के लिए रुके हुए हैं। और तभी यीशु उसके शत्रु पर विजय पाकर अपने राज्य को पूर्ण रूप से स्थापित करेगा। हममें उसका जीवन है और ह्मुस्से के राज्य भागीदार भी हैं, जब हम उसके राज्य कि बात जोते हैं! यह पहाड़ पर दिया सन्देश हमें बताता हैं कि उसके चेलों को जब तक उसका राज्य नहीं आता उनको कैसे जीना है। वे आवागमन के आदेश हैं!

कहानी २५: जंगल में यीशु कि परीक्षा

मत्ती ४ः१-११; मरकुस १ः१२-१३; लूका ४ः१-१३

प्रभु की आत्मा परमेश्वर के पुत्र को एक विशेष और शक्तिशाली रूप में भरने के लिए आया था। यीशु के बपतिस्मे के बाद,पवित्र आत्मा यीशु को यरदन से और यूहन्ना के व्यस्त सेवकाई के वातावरण से दूर ले गया। पवित्र आत्मा ने यीशु को जंगली जानवरों के बीच अकेले शांति के वातावरण में जाने को उत्तेजित किया।चालीस दिन तक यीशु ने उपवास किया और पिता से प्रार्थना की। यह सेवकाई में तीव्र  और बने रहने के लिए तैयार होने का समय था। उस समय के अंत में वह बहुत भूखा हुआ। उस कमजोरी के समय में शैतान ने मौका पा लिया! शायद वह परमेश्वर के बेटे को पाप करने के लिए लुभा सकता था !

सबसे पहले शैतान ने उसे यह साबित करने के लिए कि वह परमेश्वर का पुत्र है , उसे परखने की  कोशिश कि। उसने कहा कि अगर वास्तव में यीशु परमेश्वर का पुत्र है तो यह पत्थर जो उसके पैरों पर पड़े  हैं उन्हें रोटी बनाये। यीशु ने उस परीक्षा लेने वाले कि बातों को नहीं सुना। उसने सीधे परमेश्वर के वचन कि ओर देखा;

“मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं जीएगा,
परन्तु हर शब्द से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है'”

ये वचन सीधे सीधे व्य्वस्थाविवरण 8:3 से लिए गए थे! बाइबिल की कहानी के इस भाग में, परमेश्वर ने इस्राएलियों को चालीस साल तक मन्ना खिलाया। जब वे वायदे के देश के किनारे बैठे थे, मूसा ने इस्राएलियों को परमेश्वर कि आज्ञाओं को दोहराया और उन्हें उस परमेश्वर पर भरोसा रखने को कहा जो उनके साथ विश्वासयोग्य था। भोजन महत्वपूर्ण है, लेकिन परमेश्वर का प्रावधान अधिक महत्वपूर्ण है। यीशु भोजन के बिना चालीस दिन और चालीस रात तक रहे, और फिर भी जब शैतान उन्हें लुभाने के लिए आया, उससे विरोध करने उनके पास सामर्थ थी। वह अपने पिता पर निर्भर रहते थे, और उन्हें अपनी पहचान को साबित करने या परमेष्वर की इच्छा के बाहर किसी रीति से अपने पेट को भरने कि ज़रुरत नहीं थी।

शैतान ने फिर से उन्हें लुभाने की कोशिश की। शैतान यीशु को येरूशलेम ले आया और परमेश्वर के मंदिर कि सबसे ऊंची चोटी पर ले गया। यह शहर का सबसे ऊंचा स्थान था। शैतान ने उससे कहा, ‘यदि तू  परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे फेंक; क्यूंकि ऐसा लिखा है,

“वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा दें देगा ,कि वे तेरी रक्षा करें “;
और
“वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पाओं में पत्थर से ठेस लगे “

अब शैतान भी वचन के हवाले देने लगा। फर्क सिर्फ इतना है कि वह परमेश्वर के वचनों को घुमा फिरा कर यीशु पर अनाग्यता का दबाव डाल रहा था। यह भी एक बहुत ही चालाक प्रलोभन था। यीशु को कैसे पता था कि वह परमेश्वर था? वह कैसे सुनिश्चित हो सकता था? वह भी अन्य मनुष्य कि तरह पैदा हुआ था। अगर वह अपने आप को मंदिर कि चोटी से अपने को फेंक देता और दूत उसे पकड़ लेते तो निश्चित रूप से हर किसी को विश्वास हो जाता! यहूदी लोगों को समझाने के लिए एक तेज़  और आसान तरीका था ! लेकिन यीशु आत्मा और सच्चाई से भरा हुआ था, और यह परमेश्वर की योजना नहीं थी।  एक बहुत ही लम्बा, और कठिन रास्ता उसके आगे था।  शैतान कुछ भी कर सकता था जिससे कि यीशु परमेश्वर कि योजनाओं को पूरा न कर पाए।  उन्होंने कहा ,

” ‘ दूसरी ओर, यह लिखा है, “आप परीक्षण करने के लिए प्रभु अपने परमेश्वर डाल नहीं होगा.'”

एक बार फिर, यीशु ने व्यवस्थाविवरण से हवाला दिया। इस बार यह 6 अध्याय और 16वी आयत से है, और यह उस समय का है जब मूसा परमेश्वर के लोगों को वायदे के देश में लेजाने के लिए तैयार कर रहा था। केवल समस्या यह थी कि अपने पूरे इतिहास में, इस्राएली अपने परमेश्वर की परीक्षा लेते रहे।फिर, जब इजराइल का देश असफल हो रहा था, यीशु, परमेश्वर के वचन में सिद्द होकर खड़ा रहा। अपनी सुरक्षा और प्रेम पर विश्वास करने के लिए उसे अपने पिता का परीक्षण करने की जरूरत नहीं थी। वह पहले से ही सुनिश्चित था।

शैतान यीशु के पास एक बार फिर आया। इस बार वह यीशु को एक ऊंचे पहाड़ पर ले गया।वहाँ से उसने यीशु को पृथ्वी के सारे महान शक्तिशाली और महीमा से भरे राज्यों को दिखाया। उसने कहा ,

“ये सभी वस्तुएँ मैं तुझे दे दूँगा यदि तू मेरे आगे झुके और मेरी उपासना करे।”

आह! सो अब हम इस दुष्ट सांप का दिल देख सकते हैं।

यह सच है कि शैतान इस दुनिया का राजकुमार है। जब आदम और हव्वा ने शैतान कि बात सुनी तब उन्होंने शैतान को सारी  मानवजाति का अधिकार दे दिया। दुनिया के सारे राष्ट्र और राज्य उसके झूठे अधिराज्य के नीचे हैं। हमें अपने आप से यह पूछना है: क्यों वह मसीह के लिए यह पेशकश करेगा? दुनिया के सारी शक्तियां क्या इस लायक हैं कि उनके लिए सारी महान, विशाल, यशस्वी चीज़ों का त्याग कर देना चाहिए? शैतान यह जानता था कि जो मनुष्य उसके सामने खड़ा है वह परमेश्वर का पुत्र है, जिसकी अनन्त योग्यता और सामर्थ सारे भ्रमाण से परे है। अगर वह परमेश्वर के पुत्र को मनुष्य के कमज़ोर रूप में नष्ट कर देता, तो यह एक परम और अंतिम जीत होती। जो महिमा केवल परमेश्वर कि है उसे पाने के लिए शैतान कितनी कोशिश में लगा रहता है।

परन्तु शैतान यीशु को कुछ ऐसा पेश नहीं कर पा रहा था जो परमेश्वर ने उसे देने का वायदा न किया हो। वह उसे एक छोटा रास्ता दिखा रहा था। जो रास्ता यीशु अपने पिता कि आज्ञा में होकर ले रहा था, वह एक अकल्पनीय पीड़ा और दृडता से भरा रास्ता था। जो राज्य यीशु परमेश्वर के दिखाए हुए पर स्थापित कर रहा था, वह शैतान के दिखाए हुए राज्य से कहीं अधिक यशस्वी था। शैतान यह जानता था कि यदि वह उसे नहीं रोकता है तो वह अन्धकार के राज्य के लिए सब कुछ खो देगा। लेकिन यदि यीशु प्रचलित होता है तो, वह ज्योति के राज्य के लिए सब कुछ जीत लेगा। क्या यीशु अपने प्रभु पर पूरा विश्वास रखेगा? या फिर वह आदम और हव्वा की तरह संदेह और विद्रोह में गिर जाएगा?

यीशु ने शैतान के सामने लाये हुए सभी सांसारिक राज्यों को देखा और फिर एक सरल बयान के साथ उसके प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए यह कहा ;

“शैतान, दूर हो! शास्त्र कहता है:
‘अपने प्रभु परमेश्वर की उपासना कर
और केवल उसी की सेवा कर!’”

इस जंगल में दो प्राणियों के बीच का एक शांत क्षण हो सकता है, लेकिन यह मानवता के इतिहास में और अनंत काल का एक महान और शक्तिशाली क्षण था। यह सच का एक अद्भूत, ब्रह्मांड को हिला देने वाला वज्रपात था। एक कमजोर मानव के रूप में, यीशु ने प्रलोभन का पूरा दबाव महसूस किया और उसके खिलाफ आ रहे परमेश्वर के सबसे शक्तिशाली दुश्मन का,फिर भी वह इन सब के बीच में भी आज्ञाकारी बना रहा। जो विजय मानवजाति खुद के लिए नहीं जीत सकता था वह जीत यीशु ने जीती।

यह बहुत दिलचस्प है। जिस समय आदम और हवा बगीचे में थे उनका सामना शैतान कि योजनाओं से हुआ। उनके पाप के कारण वह भयानक अभिशाप आया। यीशु अभिशाप की शक्ति के खिलाफ खड़े हो गए और उसे शैतान के सिर पर दाल दिया। इस्राएलियों के विफलताओं के वे चालीस साल जो उन्होंने जंगल में बिताये थे, वे परमेश्वर कि उपस्थिति में बिताय यीशु के चालीस दिन कि चमकती हुई विजय के द्वारा छुड़ा लिए गए। वह मानवजाति कि असफलताओं को अपनी उत्तम धार्मिकता से भर रहा था! और उसने आत्मा और वचन कि सामर्थ से ऐसा किया।

इस बार, यीशु ने व्यवस्थाविवरण ६ः१३ का हवाला दिया। आपने देखा कि कैसे प्रभु ने सब कुछ परमेश्वर कि वाचा के साथ बांधा जो उसने इस्राएल के साथ बांधी थी? उसने परमेश्वर के महान दुश्मन से लड़ने के लिए वचन कि सच्चाई को अपनी ताकत का आधार बनाया।

जब शैतान ने ‘यीशु की फटकार सुनी तो वह वहाँ से चला गया। वह जानता था कि वह केवल उस पल के लिए ही हार है। लेकिन उसने वापस आने की साजिश रची। वह जानता था कि वह सर्वश्रेस्ठ परमेश्वर के खिलाफ हारेगा या यीशु मसीह व्यक्तित्व में जीतेगा, और विनाश करने के लिए उसके पास अभी भी समय था। शैतान के जाने के बाद, स्वर्गदूत हमारे कमज़ोर प्रभु कि सेवा के लिए आये।  यीशु ने अपने आज्ञाकारिता के माध्यम से शैतान को हराते हुए सभी परमेश्वर के स्वर्गीय राज्यों ने देखा होगा। वे सब जानते थे की सारी महान बातें दाव पर लगी हैं। वे जानते थे कि लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है।  लूका की पुस्तक में इस बात का उल्लेख है की शैतान परमेश्वर के पुत्र के माध्यम से परमेश्वर की महाकाव्य बचाव योजना को रोकने के लिए एक अधिक उपयुक्त समय पर वापस आएगा।

मसीह यीशु सदा के लिए सब पापियों के लिए एक सहायक और याजक रहेगा। उसने प्रलोभन का सबसे उच्च और गहरी शक्ति को महसूस किया और उस पर विजयी हुआ! वह पापी पुरुषों और महिलाओं के परीक्षण और संघर्ष को कितनी दयापूर्वक समझ लेता था! कितनी बहादुरी से उसने हम सब के लिए पाप के ऊपर विजय का रास्ता साफ़ किया।

राज्य में विद्रोह

उत्पत्ति 2-3

Adam and Eve expelled from the Garden of Eden - stained glass

आदम और हव्वा  पूरे आराम और खुशी से उस बगीचे में रहते थे। परमेश्वर , जो सब कुछ  पर प्रभु है, उनके पास हमेशा था। वह उस बगीचे में उन लोगों के साथ बात करते हुए साथ चलता था। वे परमेश्वर की उत्तम इच्छा  से बगीचे की देख रेख करते थे, और वहाँ कोई दुख या दर्द नहीं था।

काश मनुष्य केवल अपने प्रभु पर पूरी निर्भरता में रहना जारी रखता! काश वो इस सृष्टि के राजा की ओर विश्वास्योग्य रहता! बात असल में यह थी कि उस बगीचे में एक और प्राणी भी था। वह इतनी दुष्टता से भरा हुआ था कि वह खुद परमेश्वर से भी नफरत करता था! एक बार की बात थी कि वो एक सुंदर स्वर्गदूत था,लेकिन उसने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया। ऐसे कैसे हो सकता है की कोई भी प्राणी, इतने  उच्च और पवित्र परमेश्वर से मुंह फेर ले? यह हम  समझ  नहीं सकते है, लेकिन यह सच है।

विद्रोह के इस स्वर्गदूत का नाम लूसिफ़ेर था। उसने स्वर्ग में एक तिहाई स्वर्गदूतों को परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने  को उकसाया, और स्वर्ग में एक भयानक युद्ध हुआ। बाकी स्वर्गदूत परमेश्वर के प्रति वफादार बने रहे और लूसिफ़ेर की दुष्ट सेना के खिलाफ लड़े। परमेश्वर के पवित्र स्वर्गदूतों ने ये महान लड़ाई जीत ली है, और लूसिफ़ेर और उसके साथियों को स्वर्ग से बाहर डाल दिया गया। लेकिन उनका विद्रोह खत्म नहीं हुआ। लूसिफ़ेर, जो शैतान भी कहलाया जाता है, एक और हमला करने की ताक में था। और वो तरीका और क्या हो सकता था, पर  परमेश्वर के नए राज्य पर घुसपैठ करना?

शैतान के लिए केवल एक समस्या यह थी कि परमेश्वर इतना महान और बेहद शक्तिशाली है, कि वह उसे बल से नहीं हरा सकता था। उसे छिप के राज्य में उन कमजोरियों को ढूँढना होगा। हम जानते हैं कि यह एक मूर्ख, दुष्ट उम्मीद थी। परमेश्वर सब कुछ जानता है, और वह सब कुछ भी जानते है जो आगे होगा। शैतान को यह पता था कि परमेश्वर ने मनुष्य को अलग से विशेष बनाया है। मनुष्य का यह उच्च सम्मान था कि वो परमेश्वर की इस बनाई हुई दुनिया की देख रेख करे। परमेश्वर ने उन्हें अपनी रचना पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया था। यह एक वास्तविक जिम्मेदारी थी, और वे इसे एक ही तरीके से पूरा कर सकते थे-  परमेश्वर के आदेशों का पालन करके। इस  पृथ्वी की आशीष और बहुतायत, मनुष्य के वफादार आज्ञाकारिता पर निर्भर थी। यदि शैतान इन मनुष्यों को नष्ट कर सकता था, वह जानता था कि वह परमेश्व के सीधे दिल पर वार कर रहा है। वह मानव जाति में परमेश्वर की छवि को कुचल कर, परमेश्वर की पूरी सृष्टि पर अभिशाप ला सकता था! तो उसने वहां आदमी और औरत के खिलाफ एक दुष्ट योजना बनाई।

जब शैतान आदम और हव्वा को नष्ट करने के लिए आया था, तो वह एक घिनौने रूप में नहीं आया। वह भेष में आया था। वह एक साँप के रूप में हव्वा के पास आया और उसे उस एक बात जो परमेश्वर  ने उन्हें नहीं करने को बोला था, राज़ी कर लिया। परमेश्वर ने उन्हें अपने उत्तम ज्ञान से उनकी रक्षा की थी, और शैतान ने उन्हें भरमाया कि परमेश्वर की उत्तम ज्ञान और आदेश गलत है। शैतान ने उनसे कहा कि वे अच्छे और बुरे के ज्ञान के पेड़ से खा सकते है, इसके बावजूद कि परमेश्वर ने उन्हें वो विशेष फल खाने से मना किया था। हव्वा ने परमेश्वर के बजाय शैतान पर विश्वास किया, और इस प्रकार पमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया। उसने पेड़ से फल ले लिया और उसे खा लिया, और फिर उसने उसे अपने पति को भी दिया। तबाही फैलना शुरू हो गई थी।

यह जानना मुश्किल कि पहली बार पाप वास्तव में कब हुआ। क्या यह तब हुआ जब हव्वा साँप की बाते सुनती रही, यह जानने के बाद भी कि वो परमेश्वर को झूठा बोल रहा था? क्या यह तब हुआ जब हव्वा ने उस फल को चाहत से देखा? या क्या यह तब हुआ जब उसने फल खाने का फैसला किया और फल को लेने के लिए हाथ बड़ाया? हव्वा कब अपने पवित्र परमेश्वर की ओर वफादारी से पाप में गिरी?

यह समझना मुश्किल है कि यह पाप कितना ज्यादा बड़ा था। परमेश्वर एक आदर्श राजा, एक उच्च और पवित्र प्रभु था जो लगातार और बहुतायत से अपनी बनाई हुई सृष्टि को आशीष दे रहा था और अपना महान प्यार उंडेल रहा था। परमेश्वर ने आदमी और औरत को अपने रचनात्मक काम में एक हिस्सा बना कर, उनको कल्पना से बाहर आदर और सम्मान दिया था। यह वो परमेश्वर है जो स्वर्ग में अपने शानदार सिंहासन पर बैठा है, और उसके चारो तरफ हजारों स्वर्गदूत पूरे आज्ञाकारिता और लगातार प्रशंसा से आराधना कर रहे है। वे उसकी स्तुति प्रशंसा करते है क्योंकि वह इसका हकदार है, और क्योंकि वह पूर्ण अच्छाई है; और जो वो करता है, वो पूरी तरह सही होती है। इन मनुष्यों को यह कितना अद्भुत सम्मान दिया गया था, और उसने इसे उठा कर फेंक दिया! उन्होंने परमेश्वर की आज्ञा को रद्दी जैसा समझा! हव्वा यह कैसे कर सकती थी? और आदम उसके साथ कैसे शामिल हो सकता था? वो उनसे इतना प्यार करने वाले परमेश्वर, और उनके बीच कैसे किसी चीज़ को आने दे सकते थे?

लेकिन उन्होंने ऐसा किया। और ऐसा करने में, वे खुद पर एक भयानक आभिशाप ले आए। उन्हें ऐसे बनाया गया था कि वे हरदम अपने सृष्टिकर्ता के साथ नजदीकी में रहे, पर मनुष्य ने अपना रास्ता अलग कर लिया। सिर्फ परमेश्वर अच्छाई का एकमात्र स्रोत है।बस एक ही बात रह जाती है – पाप और मृत्यु।

जब परमेश्वर ने आदम और हव्वा को पृथ्वी पर अधिकार दिया, तो वो ऐसा ही चाहता था। जब वे इस दुनिया में पाप और मृत्यु लाए,  तो यह सिर्फ खुद के ऊपर नहीं था। वे इसे अपने बच्चों पर भी लाए। वो उसे परमेश्वर के राज्य के दिल में लाए। परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी रचना पर राज्य करने का अधिकार दिया, पर उनके पाप ने सब कुछ दूषित कर दिया। उस दिन के बाद से, हर जीवित प्राणी और जीव जंतु दुख झेल कर मर जाता है। यह तबाही बहुत बुरी  और भयंकर रूप ले चुकी थी। हम सोच भी नहीं सकते है कि उस दिन कितनी ज्यादा दुष्टता तेज़ गति से फैलने लगी। हर युद्ध, हर अकाल, हर क्रूर हत्या और हर घातक रोग, उस भयानक पल को वापस लाती है जब मानवता ने परमेश्वर का दुश्मन बनने को चुना।

शैतान एक शानदार जीत जीता था। जब पहले मनुष्य ने उसे अपनी वफादारी दी, तो उसने शैतान को अपने ऊपर हावी होने की महान शक्ति भी दी। जब तक यह अभिशाप बना रहता, तब तक वह परमेश्वर के प्रिय के खिलाफ युद्ध कर सकता था।

लेकिन परमेश्वर की एक योजना थी। वह इस दुनिय को बनाने से पहले जानते थे की ऐसा होगा, और उसके पास पहले से ही एक बचाव योजना थी। वह जानता था कि उसे मनुष्य को खुद अपने से बचाना था। वह जानता था कि वह उन्हें शैतान के अंधेर के राज्य से वापस ला के अपने ज्योति के राज्य में लाएगा। जैसे ही परमेश्वर ने आदम, हव्वा और साप को श्रापित किया, उसने अपनी आशीषों का भी वादा दिया। हालांकि हव्वा ने उसके खिलाफ विद्रोह किया था, परमेश्वर ने उसे वापस चुना और उसके और साप के बीच दुश्मनी डाल दी। तब परमेश्वर ने  वादा किया कि एक दिन हव्वा का  एक बेटा होगा और वह साप के सिर को कुचलेगा। वह शैतान के अंधेरे राज्य और अभिशाप की शक्तियों को हराएगा!

बाइबल की बाकी कहानी परमेश्वर के बचाव योजना की महान कहानी है। यह हमें बताती है कि परमेश्वर ने कैसे अपने उद्धार का काम हजारों साल पहले शुरू किया, वह अब क्या कर रहा है, और कैसे वह भविष्य में यह काम पूरा करने जा रहा है! परमेश्वर ने वादा किया था कि एक दिन आदम और हव्वा का बेटा, एक नया, अनन्त स्वर्ग और पृथ्वी लाएगा जो अभिशाप से पूरी तरह मुक्त होगा।

अकल्पनीय, महान और बेतहाशा अच्छाई की बात यह है कि हव्वा का यह बेटा, जो इस दुनिया को बचाएगा, वो और कोई नहीं परुन्तु परमेश्वर खुद होगा। किसी और के पास यह करने की शक्ति नहीं थी, तो परमेश्वर को खुद ही, उसके विरुद्ध बलवा करने वालो को बचाने के लिए आना था। यह योजना शुरुआत के पहले से बनाई गई थी। स्वर्ग के राजकुमार, परमेश्वर का सबसे प्रिय पुत्र, पृथ्वी के पापियों के लिए कीमत चुकाने को अपनी जान देने के लिए आना था। यह प्रभु यीशु मसीह है, और जो कोई उस पर विश्वास रखता है, बचाया जाएगा। वे हमेशा के लिए एक आदर्श राज्य में रहेगा, जहां वे परमेश्वर पर पूर्ण निर्भरता से रहने के लिए आज़ाद हो जाएँगे! उनके पाप की ओर गुलामी चली जाएगी। उनके पास परमेश्वर के अपनाए बच्चे होने की प्रतिष्ठा होगी, और वे हमेशा के लिए एक आदर्श स्वर्ग में रहेंगे जहां न कोई बुराई, उदासी, दर्द या मौत है। क्या आपको यह मन गड़ंत कहानी लगती है? क्या आपको यह कल्पना से बाहर लगती है? आप सही हैं। ऐसा ही है। पर यह तो भी सच है।

जो कहानी हम शुरू करने वाले है, वो बहुत ही रोमांचक है क्योंकि वो यह बताती है की कब परमेश्वर अपने महान बचाव योजना को पूरा करने को पृथ्वी पर आते है। लेकिन ऐसी कई चीजें है जो प्रभु ने मानव इतिहास में अपने बेटे को भेजने से पहले करी। अगर हम उन बातों का विस्तार में समझेंगे, तो हम और गहराई में उन बातें को समझेंगे जो यीशु ने कही और की। अगले कुछ कहानियों में  हम इन बातों को और अधिक जानेंगे।