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कहानी १८३: गलील के एक पहाड़ी पर

मत्ती २८:१६-२०, प्रेरितों के काम १:१-१२

Jesus comes from heaven

यीशु ने अपने चेलों को उसे गलील के एक पहाड़ी पर मिलने को कहा। शायद वह उन्हें वहाँ इसलिए इकट्ठा करना चाहते थे ताकि जो लोग इसराइल के उत्तरी भाग में सागर के किनारे उस पर विश्वास करते थे, यीशु को अपनी आँखों से देखते कि वह कैसे मर जाने के बाद भी मुर्दों में से जी उठा। हम यीशु के इस चयन की वजह को यकीन से नहीं कह सकते है। पर हम यह जानते हैं कि एक समय पर वह पांच सौ से अधिक लोगों को दिखाई दिया था। यह दिलचस्प है कि यीशु केवल उन लोगो को प्रकट हुए जो उस पर सच्चा विशवास रखते थे। यीशु को महायाजकों या पीलातुस के सामने प्रकट होकर अपनी बात साबित करने के लिए कोई रूचि नहीं थी। वह उनके पास आए जो उसे प्यार करते थे और उस पर अपनी आशा डालते थे।

जब यीशु ने गलील के पहाड़ी पर खुद को प्रकट किया, तो लोग उसे देख कर उसकी आराधना करने लगे। इस सब के बावजूद भी, उनके कुछ चेलो के मन में शंका थी।

यीशु के पास उनके लिए एक संदेश था, और यह उसकी भीड़ से राज्य के बारे में अंतिम शिक्षण था। केवल इस बार, वह सीधे सीधे आदेश दे रहा था। इसलिए क्यूंकि यह द्वेष भरे धार्मिक नेताओं, उत्सुक दर्शक, और रोमांच चाहने वालों की भीड़ नहीं थी। ये विश्वासयोग्य थे, और उनके आगे का मार्ग उत्तम, श्रेष्ठ और भला था। एक कार्य आगे था! उन सभी बारो में से जब वो इस सागर को देखते हुए  प्रचार किया करते थे, यह उनमें से आखरी बार था जब वो उनके सामने शारीरिक रूप में शिक्षण दे रहे थे। जैसे आप देखते हैं, हालात गंभीरता से उसके जी उठने के बाद बदल चुके थे, और यीशु अब उनके मुख्य शिक्षक नहीं थे। पवित्र आत्मा उतरने वाली थी, और यीशु वापस अपने पिता के पास जाने को थे। प्रभु ने यह कहा:
यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिक्कारने मुझे दिया गया है। इसलिथे तुम जाकर सब जातियोंके लोगोंको चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा  दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूं।।

इन शक्तिशाली शब्दों से मत्ती ने अपनी पुस्तक को समाप्त करने के लिए चुना। वे उसके के लिए इतने महत्वपूर्ण थे, कि वो यह छवि अपनी किताब पढ़ने वालो के दिमाग में बैठना चाहते था। आप क्यों सोचते हैं कि वे बहुत महत्वपूर्ण थे?

क्योंकि वे न केवल उस पीढ़ी के थे जो यीशु के संगती में रह कर उसके वचनों पर चलते थे। वे उन सभी पीड़ीओं को दर्शाते थे जो तब से अब तक मसीह के पीछे चलते हैं! हमें यीशु की तरह उसके राज्य का संदेश फैलाना है। यीशु इसराइल के राष्ट्र को अपने आने की  घोषणा करने के लिए आए थे। संदेश यह था की दुनिया के सभी देशों में जाकर मसीह यीशु के राज्य के बारे में बताना। हम सभी अपने आप को चेले कहला सकते हैं अगर हम दूसरों को यीशु के पीछे चलने का प्रोत्साहन दे रहे हैं। हर पीढ़ी के दौरान, लोगों को, परमेश्वर पिता ने अपने बेटे को दिया है। जैसे जैसे इस पीड़ी के चेले सुसमाचार को फैलायेंगे, वैसे वैसे उसके चुने हुए लोग उनके शिक्षण के माध्यम से उसकी आवाज सुनेंगे। जैसे वे यीशु मसीह पर अपने विश्वास डालेंगे, वैसे ही उनकी यीशु के ओर प्रतिज्ञा, बपतिस्मे के माध्यम से उनके बाहरी जीवन में प्रकट होगी। वे भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के प्यार और धार्मिकता में जुड़ जाएंगे। और उनके यीशु मसीह के प्रति समर्पण की वजह से, वे उसकी आज्ञाओं का पालन करने की लालसा करेंगे।

सभी विश्वासियों का यह अद्भुत उद्देश्य एक आश्चर्यजनक समाचार से और भी दुगना हो जाता है। यीशु को स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी वस्तुओं पर अधिकार दिया गया था। अंतिम जीत तब हुई जब वो मर के फिर जीवित हो गए। परमेश्वर के महान और पहले से  ठहराए हुए योजनाओं में, शापित दुनिया पिसती चली जाएगी। शैतान और उसकी दुष्ट सेना मानव जाति पर बुराई और विनाश लाने के लिए जारी रहेगी। लेकिन परमेश्वर के राज्य के नए, चमकते, स्वर्ण बीज अब बड़ना शुरू हो गए थे, और दुनिया में कुछ भी इसे रोक नहीं पाएगी, कभी भी नहीं। इसलिए, क्यूंकि प्रभु मसीह हमेशा और सर्वदा अपने चेलों के साथ रहते है,  और अपनी आत्मा से उन्हें सशक्त बनाते है  वो उसका वचन फैला सकते है और परमेश्वर की सामर्थ से उसके सुंदर, धर्मी रास्तों पर चल सकते है।

चालीस दिन के लिए ,विभिन्न समय पर, यीशु  प्रकट हुए ताकि वो उनको उनके राज्य में नए जीवन के बारे में और बता सके। वो याकूब, अपने भाई, के पास आए ; वो भाई जो उस पर उसके जी उठने से पहले विश्वास नहीं करता था। यीशु के फिर जी उठने के बाद ही, याकूब ने सचमुच विश्वास किया। परमेश्वर उसे यरूशलेम के मण्डली का अगुआ बनाना चाहते थे।

उन चालीस दिनों में कहीं, सभी चेले यरूशलेम को वापस आए क्यूंकि यीशु ने उन्हें बताया था की वहीँ से माहान नए काम शुरू होंगे। यीशु ने उनको सिखाते हुए यह बोला की वे येरूशलेम को ना छोड़े, जब तक यह सब बातें पूरी ना हो। जब तक पवित्र आत्मा उन पर ना उतरती, जैसे की यीशु ने उनसे वादा किया था, उनको वही प्रतीक्षा करना था। फिर यीशु ने कहा, ‘..युहन्ना ने तो तुम्हे पानी से बपतिस्मा दिया है, लेकिन कुछ ही दिनों में तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र आत्मा के साथ किया जाएगा।’

चेले सवालों से भरे थे। यीशु मसीह के मृत्यु और जी उठने से वे अचम्बे में डल गए थे, लेकिन उन्हें अभी भी अपने मसीहा के वादे याद थे। यशायाह की पुस्तक में, एक समय की भविष्यवाणी की गई थी  जब परमेश्वर इसराइल को फिर से उठाएगा और उसे दुनिया का  सबसे बड़ा देश बनाएगा। अब जबकि यीशु के पास स्पष्ट रूप से जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, यह सब का होना और भी संभव लग रहा था। क्या पवित्र आत्मा उन्हें यह सब करने की सामर्थ देगी? तो उन्होंने यीशु से पुछा, ” प्रभु, क्या वो समय आ गया है जब आप इस्राएल के  राज्य को फिर से खड़ा करेंगे?

यीशु ने कहा: उस ने उन से कहा; उन समयोंया कालोंको जानना, जिन को पिता ने अपके ही अधिक्कारने में रखा है, तुम्हारा काम नहीं। परंतु जब पवित्र आत्क़ा तुम पर आएगा तब तुम सामर्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

प्रभु और उसके चेले यरूशलेम की ऊंची दीवारों पार कर, नीचे किद्रों घाटी की ओर निकल पड़े। कल्पना करिए की जब उन्होंने गत्समिनी के बाग़ ( जो जैतून के पहाड़ के किनारे है), पार किया होगा, तो उनके मन में क्या विचार आए होंगे।पहाड़ी पर चड़ने के बाद, यीशु ने अपने हाथ उठाकर उनको आशीष दी। ये आशीष के शब्द केवल कुछ भले शब्द नहीं थे। इन आशीष के शब्दों में परमेश्वर के भले और सिद्ध योजना को पूर्ण करने की क्षमता थी। जब यीशु यह आशीष दे ही रहे थे, तो दिखने में ऐसा लगा जैसे वे ऊपर की ओर उठने लगे। जब तक वह एक बादल में गायब न हो गए, चेले ऊपर की ओर निहारते रहे। जब वे इस आश्चर्यजनक पुरुष ,जो परमेश्वर भी था, बादलों में जाते देख ही रहे थे,तो दो सफेद कपड़े पहने पुरुष उनके बगल में आकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “‘गलील के पुरुष, तुम यहाँ खड़े होकर आकाश की तरफ क्यों देख रहे हो? यह यीशु, जो स्वर्ग में उठा लिया गया है, इसी प्रकार से दोबारा आएँगे।”

वाह! किसी दिन वह वापस आएँगे, और हम जानते हैं कि वास्तव में कैसे और कहाँ! जो चेलों ने उस दिन नहीं देखा था, वो यह कि जैसे ही यीशु स्वर्ग में पहुंचे, उन्होंने अपने जगह ली। कहाँ? एक शाही, शाश्वत सिंहासन पर जो परमेश्वर के दाहिने हाथ पर था! वाह! क्या आप इस विजयी ‘घर-वापसी’ के स्वर्गीय जश्न की कल्पना कर सकते हैं? यीशु ने अपना काम पूरा किया!

इस बीच, चेले जैतुन पहाड़ी की ढलानों से नीचे, यरूशलेम शहर वापस चले गए। वे एक ऐसे आनंद से भर गए थे जिसका  न कोई ठिकाना था,  और न समझाया जा सकता था। वो प्रभु की प्रशंसा करने लगे और आने वाली बातों की आस लगाने लगे।

युहन्ना अन्य चेलों में से सबसे लंबे समय जीवित रहा। वह परमेश्वर  की सेवा और उसकी मण्डली की देखरेख कई दशकों तक करता रहा। जबकि मसीह के अनुयाइयों ने रोमन सरकार के हाथों भयानक उत्पीड़न सहा, परमेश्वर की मण्डली विश्वास, बल और संख्या में बढती रही। युहन्ना के मरने से कुछ साल पूर्व, उसने एक इंजील (किताब) लिखी जिसमे ऐसी अतिरिक्त जानकारी है जो मत्ती, मरकुस, या लूका में नहीं पाई जा सकती है। उसमे ऐसे शानदार दृष्टि प्रदर्शित है, जो यीशु मसीह को ‘परमेश्वर’ दिखाती है।

युहन्ना द्वारा मण्डली को लिखे तीन पत्र नए नियम में पाए जाते हैं। हम उन्हें पढ़ सकते हैं और उसका परमेश्वर के लोगों की ओर दिल के के विषय में सीख सकते हैं। उसकी हार्दिक लालसा वही थी जो यीशु की थी: की वे एक दुसरे से प्यार रखे! युहन्ना ने बाइबल की आखरी किताब भी लिखी।उसका नाम ‘प्रकाशितवाक्य’ है। बाद के वर्षों, में प्रभु यीशु ने युहन्ना को ऊपर ले जाकर स्वर्गीय स्थानों की एक झलक दिखलाई। उन्होंने उसे वह सब चीजें दिखाई जो तब होंगी जब परमेश्वर इस श्रापित दुन्य का अंत कर देंगे। हम इसे पढ़ कर आने वाली बातों और घटनाओ को जान सकते है! तब तक, हम उसी युग में, उसी नई वाचा में है जो कि यीशु ने अपनी पहले चेलों के लिए जीती थी। हम उस मण्डली का एक हिस्सा हैं, जो परमेश्वर ने पतरस और युहन्ना द्वारा शुरू की !

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कहानी १७३: पूर्ति

Stained glass showing Jesus crucified

यूहन्ना १९:३१-३७

यहूदियों के पास एक चिंता का विषय था। यरूशलेम के फाटकों के ठीक बाहर, तीन मृत या मरते हुए आदमी क्रूसों पर टंगे थे। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, उनके शरीर भूमि को अशुद्ध कर रहे थे। यह एक विशेष रूप से बड़ी समस्या थी क्योंकि सूर्यास्त के बाद सबत शुरू होने को था। विश्राम के दिन पर एक क्रूस से लटका हुआ, मरा आदमी, परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ने वाली बात थी। और सबसे बदतर बात यह थी कि यह कोई नियमित विश्राम का दिन नहीं था। यह एक उच्च और पवित्र दिन था। यह फसह का पर्व था! इसलिए वे पेंतुस पीलातुस के पास क्रूस पर चढ़ाये हुए के टूटे पैर मांगने गए।

यह एक अजीब अनुरोध लग सकता है, लेकिन यह वास्तव में समझ की बात थी। सूली पर चढ़ाये जाने की भयावहता यह थी कि लोग घुट घुट कर मरते थे। उनको हाथों को ऐसे क्रूस पर टांगा जाता था, कि जब वो सांस लेते थे तो फेफड़ों में उसका प्रवाह नहीं होता था। उन्हें सांस लेने के लिए कीलों पर अपने पंजों पर उठाना पड़ता था। सांस लेने की प्राकृतिक मानव वृत्ति उन्हें घंटे पे घंटे के लिए उन घावों पर कष्टदायी दुख सहन करने को मज्बोर करती। उनके कष्ट को जल्दी समाप्त करने का यही रास्ता था कि उनके पैरों को तोड़ दिया जाए ताकि वो अपने शरीरों को सांस लेने के लिए और न अघात करें। यह एक भयानक धंदा था, लेकिन रोमी साम्राज्य की दुनिया यही थी।

पिलातुस ने धार्मिक नेताओं के साथ सहमति व्यक्त की। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि उस दिन क्रूस पर चड़ाए जाने वाले आदमियों के पैर तोड़ दिए जाए। लेकिन सिपाही जब यीशु तक पहुंचे,वह मर चुके थे। उनके पैर तोड़ने की बजाय, सैनिकों ने उनके कमर को भाले से भेदा। रक्त और पानी बाहर बह आया।

यूहन्ना के सुसमाचार में इस बिंदु पर,यूहन्ना इस बात की साक्षी देना चाहता है कि यह सब बातें पूरी तरह सच है। वह खुद वहां था और उसने यह सब बातें देखी। वह क्रूस के एकदम पास खड़ा हुआ था जब यह सब हुआ। आने वाले दिनों में, यीशु के जीवन और मौत के बारे में कई अफवाहें फैलने को थी। कई लोग यीशु के पुनुरुथान को झूठा बोलने को थे।वे ऐसा बोलेंगे की शिष्यों ने यीशु के जी उठने के बारे में मन गड़ंत कहानी बनाई है, या फिर यीशु वास्तव में मरा नहीं था। लेकिन यूहन्ना अपने प्यारे दोस्त की सच्ची मौत को वहां खड़ा देख रहा था। उन्होंने कुल पीड़ा में तीन दिन बिताए, लेकिन तब यीशु फिर से जी उठे! वह चाहता था कि हम निश्चित रूप से विश्वास करें, जैसा उसने किया था! यही कारण है कि उसने यह पुस्तक लिखी।

यूहन्ना इस बात की ओर भी संकेत करना चाहता था कि अपने पुत्र के मौत के द्वारा, परमेश्वर अपने वचन की पूर्ती भी ज़ारी रख रहा था। क्या आपको फसह के पर्व की प्राचीन कहानी याद है? मिस्र के फिरौन ने परमेश्वर  के लोगों को अपनी भयानक, जानलेवा उत्पीड़न से मुक्त करने से इनकार कर दिया था। परमेश्वर ने महामारी के ऊपर महामारी भेजी, लेकिन तो भी उसने इनकार कर दिया। अंत में, परमेश्वर अपने सबसे भयानक दंड के साथ आने वाले थे। फिरौन परमेश्वर की सबसे क़ीमती चीज़ को रिहा करने से इनकार कर रहा था, तो परमेश्वर मिस्र के लोगों का सबसे बड़ा खजाना लेने जा रहा था। वह उनके पहले पैदा हुए बेटों की जान लेने जा रहा था। इस्राएलियों के पुत्रों की रक्षा करने के लिए, परमेश्वर ने उन्हें सावधान निर्देश दिए। उन्हें एक बेदाग मेमने का बलिदान करना होगा और उसे भोजन के रूप में लेना होगा। फिर उन्हें उस मेमने का खून लेकर अपने घर के चौखट पर लगाना था। जब परमेश्वर का स्वर्गदूत मिस्र के लिए आएगा, तो वह खून से संरक्षित घरों को छोड़ देगा। यहाँ, मेमने के बारे में परमेश्वर की अपने लोगों को दिए निर्देश हैं:
उसका खाना एक ही घर में हो; अर्थात तुम उसके मांस में से कुछ घर से बाहर न ले जाना; और बलिपशु की कोई हड्डी न तोड़ना। पर्ब् को मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्तव्य कर्म है।
निर्गमन १२:४६-४७

यीशु वह फसह का मेमना था, और उसका खून उसके लोगों की सुरक्षा होना था। यह सब घटनाएं जो इतनी पहले हुई, उस बात की एक तस्वीर थी कि परमेश्वर मसीह के द्वारा क्या करने जा रहा है। और जिस प्रकार लोगों को पहले फसह के मेमने का पैर नहीं तोडना था, ठीक उसी तरह इस महान फसह के मेमने का पैर भी नहीं तोड़ा जाना था।

पुराने नियम में एक और पद है जो यीशु के छेदे जाने की भविष्वाणी करता है। ज़करिया की किताब में परमेश्वर यूं कहते है:
और मैं दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियोंपर अपना अनुग्रह करनेवाली और प्रार्यना सिखानेवाली आत्मा उण्डेलूंगा, तब वे मुझे ताकेंगे अर्थात जिसे उन्होंने बेधा है, और उसके लिए ऐसे रोएंगे जैसे एकलौते पुत्र के लिथे रोते-पीटते हैं, और ऐसा भारी शोक करेंगे, जैसा पहिलौठे के लिए करते हैं।
ज़कारिया १२:१०

यूहन्ना और मसीह के अनुयायियी इस बात को मानोभावपूर्वक मानते थे कि जो कुछ मसीह के साथ हुआ है वो परमेश्वर के पुराने नियम में कार्यों का उत्प्रवाह है। परमेश्वर ने मसीह के जीवन, मृत्यु और जी उठने के हर पल को ठहराया था। पर उसने अपने पवित्र लोगों के जीवन के हर पहलू को भी ठहराया था ताकि वो उद्धारकर्ता की और रास्ता दिखा सकें। जैसे जैसे  चेलों ने आने वाले वर्षों में यीशु के जीवन पर विचार किया, उन्हें परमेश्वर के वचन में पद पे पद में यीशु की छाप दिखने लगी। परमेश्वर ने उन्हें वहां सैकड़ों और हजारों वर्ष पहले रखा ताकि आगे सुसमाचार सुनने वालों को आत्मविश्वास हो सके। यीशु वास्तव में वह था जिसके बारे में वो इतने समय से बात कर रहा था!

कहानी १७०: क्रूस पर चढ़ाया गया राजा

मत्ती २७:३३-३८; मरकुस १५:२२-२६; लूका २३:३३,३८; यूहन्ना १९:१६-२२

Holy Week

फिर जब वे गुलगुता (जिसका अर्थ है “खोपड़ी का स्थान।”) नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने यीशु को पित्त मिली दाखरस पीने को दी। किन्तु जब यीशु ने उसे चखा तो पीने से मना कर दिया।

रोमी सिपाहियों ने  क्रूस को ज़मीन पर रख यीशु कपड़े उतार दिए। यीशु ने अपने हाथ उस लकड़ी के पट्टे पर फैला कर अपने आप को पूरी विनम्रता के साथ सौंप दिया। सिपाहियों ने उसके हाथों में कीलें ठोकीं और क्रूस पर चढ़ा दिया। यह कितना भयंकर था। जो उपकरण अच्छी चीज़ों को बनाने के लिए होते हैं, उन्हें एक मनुष्य के शरीर को फाड़ने के लिए इस्तेमाल किये गए।

सिपाहियों ने क्रूस को खड़ा कर दिया। हर एक सांस जब वह लेता था, अपने शरीर को खींचता था ताकि वह सांस अंदर ले सके। उसके लहू लुहान शरीर उस लकड़ी के पत्ते पर रगड़ता था। हर पल उसकी पीड़ा बढ़ती ही जाती थी। परन्तु ये उस पीड़ा के सामने कुछ नहीं थी जो अनदेखी थी। क्यूंकि आप देखिये, आत्मिक क्षेत्र में, उस पवित्र जन ने पाप को अपने ऊपर ले लिया था। वह परमेश्वर के आगे पाप के अवतार को लेकर आया। मनुष्य के पापों के घिनौने अपमान के कारण उसके प्रति परमेश्वर के क्रोध को उसे अपने ऊपर हाथ फैला कर लेने कि आवश्यकता नहीं थी। उसने परमेश्वर कि इच्छा में होकर उसे पूरे मान सम्मान के साथ लेने कि ठान ली थी। जब वह मनुष्य के हर घिनौने पाप कि सज़ा को अपने ऊपर ले रहा था, परमेश्वर का क्रोध दुष्ट के प्रति भड़का हुआ था। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया था ताकि हम आज़ाद हो जाएं। कितना महाप्रतापी परमेश्वर है।

दो डाकू भी उसके साथ चढ़ाये गए, एक दायें और एक बाएं। सिपाही अपने ही दूषी व्यापार में लगे हुए थे। यीशु के कपड़ों का अब क्या करना था? उसके वस्त्र के चार भाग किये और हर एक सिपाही को उसका एक हिस्सा दे दिया। परन्तु यीशु का भीतरी वस्त्र बहुत अनोखा था। वह बहुत विशेषता से बनाया गया था। वे उसे फाड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए उन्होंने पासे फेंके। यूहन्ना प्रेरित ने यह दिखलाया कि यह वचन का पूरा होना हुआ है। भजन सहित २२:१८ कहता है,”वे मेरे कपड़े आपस में बाँट रहे हैं। मेरे वस्त्रों के लिये वे पासे फेंक रहे हैं।'” इसके बाद वे वहाँ बैठ कर उस पर पहरा देने लगे। जब तक उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, सुबह के नौ बज गए थे।

पिलातुस यीशु के विषय में अभी और कुछ कहना चाहता था। उसने इब्रानियों, लातौनी और यहूदी भाषा में कुछ लिखा।

“‘यह यहूदियों का राजा यीशु नासरी है'”

यीशु को शहर के निकट क्रूस पर चढ़ाया था ताकि सारे यहूदी उसे देख सकें। पिलातुस कि घोषणा उस भाषा में लिखी गयी जो अधिकतर पश्चिमी दुनिया में बोली जाती है। रोमी राज में लातौनी भाषा बोलते थे, जो अपने संग्रामिक अधिकार से सब पर हुकुम चलते थे। यह बहुत ही संपन्न विधिपूर्वक भाषा थी जिसे रोम के कुलीन लोग बोलते थे और अपने बच्चों को सिखाते थे। सभी विचार धरणाओं पर यह हावी था। परन्तु इब्रानी भाषा वो भाषा थी जिससे परमेश्वर का वचन मनुष्य के पास आया। यह कितना उचित था कि तीनों ने यीशु के शासन को उसके बलिदान के दिन घोषित किया!

पिलातुस को नहीं मालूम था कि आने वाले सालों में पूरे रोमी राज में सुसमाचार लातौनी भाषा और यहूदी भाषा में सुनाया जाएगा। एक दिन, जिस यीशु को उसने क्रूस पर चढ़ाया था, उसे अनंतकाल के राजा कि तरह उसकी उपासना की जाएगी। रोम के महाराजा यीशु के आगे घुटने टेकेंगे!

लेकिन यह सब भविष्य में होना है। इस बीच, यहूदी अगुवे उस चिन्ह से नाखुश थे जो यीशु के सिर पर लगाया गया था। यह रोमी सरकार द्वारा एक लिखित घोषणा थी। सो वे पिलातुस के पास गए और बोले इस बदल कर ऐसे लिखो: “‘उसने कहा, मैं यहूदियोंका राजा हूँ।'” यह चिन्ह का एक दूसरा हास्यास्पद था लेकिन पिलातुस ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला था।

सोचिये पिलातुस के क्या विचार रहे होंगे जब वह उन आराधनालय के दुष्ट सदस्यों को यीशु को क्रूस पर चढाने के लिए लेजाते देख रहा था। इस विचार से हसी आती है कि वे अपने को परमेश्वर के पवित्र लोग मानते थे, और इससे यहूदी अगुवों का गुस्सा और भी अधिक बढ़ जाता था। यदि इन लोगों का कोई भी अनंतकाल का भविष्य है तो वह इन लोगों के जीवन से नहीं दिख सकता था जो परमेश्वर के मंदिर को चलाते थे।

परन्तु यीशु में, पिलातुस ने कुछ भिन्न पाया। उसके किसी भी शिक्षाओं से ऐसा कुछ नहीं था जो उसे स्पष्ट कर सके। पिलातुस दुनिया के सबसे उच्च ज्ञान से शिक्षित था। उसने सभी जगहों में जाकर भिन्न भिन्न धर्मों और संस्कृतियों को। देखा। उसके पास वो अधिकार था जिससे वह शासन चला सकता था। वह उन अगुवों के बीच में रहता था जो मनुष्य जाती से सम्बंधित जटिल सच्चाइयों के हल को लेकर आते थे। युद्ध, अकाल, सामाजिक विश्लेषण आदि, जैसे विषय वे लेकर आते थे। सारे मनुष्य जाती में, केवल ये थे जो मनुष्य के जीवन के भाग को तय करते थे।

जब पिलातुस ने इस महान संकटकाल का सामना किया, तब उसने पुछा,”‘सच्चाई क्या है?'” यूनानी और रोमी दार्शनिकों के समाधान, रोमी फ़ौज में पाये गए समाधान, और ज़बरदस्ती से दी गयी शांति, सब में थोड़ी बहुत सच्चाई थी पर बगैर स्वयं के भीतर कि सच्चाई के। जन पिलातुस ने यीशु के विनम्रता और शुद्धता को देखा, तब उसने जाना कि उसने सच्चाई का सामना किया है।

इस शांत और लहूलुहान मनुष्य कि कोई महानता और सामर्थ थी, जो उस अनदेखी दुनिया का राजा कहलाता था। या तो वह, पागल था या फिर वह सही था। यदि वह सही था, तो फिर उसके चरों ओर चल रहे कोलाहल में पागलपन था। पिलातुस इतने लम्बे समय से था जो जनता था कि छोटी से छोटे से छोटा पद ढोंग था। पर यीशु ने वो सब नष्ट कर दिया। यदि कोई अनन्तकाल का राजा था, तो वह ऐसा होगा जब वह एक स्वार्थी और टूटी दुनिया में प्रवेश करेगा। अपने दुष्ट घृणा के कारण, येरूशलेम के अगुवे उस मनुष्य को मारना चाहते थे जिसकी आत्मा उन सब आत्माओं से कहीं अधिक मूलयवान थी।

हम नहीं जानते कि पिलातुस के मन में क्या चल रहा था जब वह अपने महल में बैठा था। परन्तु हम यह जानते हैं कि उसी के हाथों यह घोषणा लिखवाई गयी कि यीशु यहूदियों का राजा है। और सभी यहूदी अगुवों के विरोध करने पर भी उसने यह लिखा,”‘जो मैंने लिख दिया सो लिख दिया।'”

कहानी १६१: परमेश्वर के पुत्र की प्रार्थनाएं 

यूहन्ना १७

Vienna -  Holy Trinity in Altlerchenfelder church

अपने चेलों के साथ उस अंतिम रात्री में, यीशु ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया था। जिस राज्य कि घोषणा वे करने जा रहे थे, वह उनकी कल्पना से बाहर था, परन्तु वे बहुत महान और अद्भुद था। आने वाले दिनों को देखते हुए यीशु अपनी आँखें स्वर्गीय पिता कि ओर उठाकर प्रार्थना की। आइये सुनते हैं कि कैसे परमेश्वर का पुत्र अपने पिता से बात करता है:

“’हे परम पिता, वह घड़ी आ पहुँची है अपने पुत्र को महिमा प्रदान कर ताकि तेरा पुत्र तेरी महिमा कर सके। तूने उसे समूची मनुष्य जाति पर अधिकार दिया है कि वह, हर उसको, जिसको तूने उसे दिया है, अनन्त जीवन दे। अनन्त जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें। जो काम तूने मुझे सौंपे थे, उन्हें पूरा करके जगत में मैंने तुझे महिमावान किया है। इसलिये अब तू अपने साथ मुझे भी महिमावान कर। हे परम पिता! वही महिमा मुझे दे जो जगत से पहले, तेरे साथ मुझे प्राप्त थी।'”  यूहन्ना १७:१-५

क्या आपको समझ आया? पिता और पुत्र इस तरह कार्य कर रहे थे जिससे कि वे एक दूसरे कि महिमा कर सकें। अब मनुष्य ऐसा करता है, तो यह हास्यास्पद होता। एक दुसरे को हम अच्छे शब्दों के साथ उत्तेजित कर सकते हैं, पर क्यूंकि हम सब पापी हैं इसलिए हम एक हद्द तक ही बोल सकते हैं। हम किसी कि सच में महिमा नहीं कर सकते यदि वे उसके योग्य नहीं हैं। परन्तु परमेश्वर इसके योग्य है, और उसका पुत्र भी। उनके लिए केवल एक ही सही बात यह है कि वे भव्यतापूर्वक महिमा दें। हमारे लिए सबसे उत्तम बात यह है कि हम उनके आगे गिरकर दंडवत करें। इसीलिए यीशु को इंकार करना सबसे भयंकर पाप है। यह पूर्ण रूप से गलत है। परमेश्वर का पुत्र और पिता सत्य हैं और वे एक दूसरे कि महिमा करते हैं।

यीशु जानता था कि जो काम उसके पिता ने उसे सौंपा था वह उसने इस पृथ्वी पर पूरा किया। अब केवल क्रूस ही बचा था। और इसलिए उसने प्रार्थना की कि उसके मृत्यु के पश्चात्, पिता उसकी महिमा को जो उसकी उसके पिता के साथ थी वह उसे वापस मिल जाये।

फिर उसने कहा:
“’जगत से जिन मनुष्यों को तूने मुझे दिया, मैंने उन्हें तेरे नाम का बोध कराया है। वे लोग तेरे थे किन्तु तूने उन्हें मुझे दिया और उन्होंने तेरे वचन का पालन किया। अब वे जानते हैं कि हर वह वस्तु जो तूने मुझे दी है, वह तुझ ही से आती है। मैंने उन्हें वे ही उपदेश दिये हैं जो तूने मुझे दिये थे और उन्होंने उनको ग्रहण किया। वे निश्चयपूर्वक जानते हैं कि मैं तुझसे ही आया हूँ। और उन्हें विश्वास हो गया है कि तूने मुझे भेजा है।'” यूहन्ना १७:६-८

आपने देखा कि विश्वास यीशु के लिए कितना महवपूर्ण है? सब कुछ उसी पर निर्भर करता है! यीशु कि प्रार्थना को सुनिये:
“‘मैं उनके लिये प्रार्थना कर रहा हूँ। मैं जगत के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिए कर रहा हूँ जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। वह सब कुछ जो मेरा है, वह तेरा है और जो तेरा है, वह मेरा है। और मैंने उनके द्वारा महिमा पायी है। मैं अब और अधिक समय जगत में नहीं हूँ किन्तु वे जगत में है अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ। हे पवित्र पिता अपने उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा कर जो तूने मुझे दिया है ताकि जैसे तू और मैं एक हैं, वे भी एक हो सकें। जब मैं उनके साथ था, मैंने तेरे उस नाम की शक्ति से उनकी रक्षा की, जो तूने मुझे दिया था। मैंने रक्षा की और उनमें से कोई भी नष्ट नहीं हुआ सिवाय उसके जो विनाश का पुत्र था ताकि शास्त्र का कहना सच हो।'” यूहन्ना १७:९-१२

“’अब मैं तेरे पास आ रहा हूँ किन्तु ये बातें मैं जगत में रहते हुए कह रहा हूँ ताकि वे अपने हृदयों में मेरे पूर्ण आनन्द को पा सकें। मैंने तेरा वचन उन्हें दिया है पर संसार ने उनसे घृणा की क्योंकि वे सांसारिक नहीं हैं। वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ।
“’मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ कि तू उन्हें संसार से निकाल ले बल्कि यह कि तू उनकी दुष्ट शैतान से रक्षा कर। वे संसार के नहीं हैं, वैसे ही जैसे मैं संसार का नहीं हूँ। सत्य के द्वारा तू उन्हें अपनी सेवा के लिये समर्पित कर। तेरा वचन सत्य है। जैसे तूने मुझे इस जगत में भेजा है, वैसे ही मैंने उन्हें जगत में भेजा है। मैं उनके लिए अपने को तेरी सेवा में अर्पित कर रहा हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा स्वयं को तेरी सेवा में अर्पित करें।   यूहन्ना १७:१३-१९

“’किन्तु मैं केवल उन ही के लिये प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनके लिये भी जो इनके उपदेशों द्वारा मुझ में विश्वास करेंगे। वे सब एक हों। वैसे ही जैसे हे परम पिता तू मुझ में है और मैं तुझ में। वे भी हममें एक हों। ताकि जगत विश्वास करे कि मुझे तूने भेजा है। वह महिमा जो तूने मुझे दी है, मैंने उन्हें दी है; ताकि वे भी वैसे ही एक हो सकें जैसे हम एक हों। मैं उनमें होऊँगा और तू मुझमें होगा, जिससे वे पूर्ण एकता को प्राप्त हों और जगत जान जाये कि मुझे तूने भेजा है और तूने उन्हें भी वैसे ही प्रेम किया है जैसे तू मुझे प्रेम करता है।'”  यूहन्ना १७:२०-२३

अब यीशु हमारे लिए प्रार्थना कर रहा था!

“’हे परम पिता। जो लोग तूने मुझे सौंपे हैं, मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ, वे भी मेरे साथ हों ताकि वे मेरी उस महिमा को देख सकें जो तूने मुझे दी है। क्योंकि सृष्टि की रचना से भी पहले तूने मुझसे प्रेम किया है।'” यूहन्ना १७:२५-२६

कहानी १६०: आशा का सहायक 

shining dove with rays on a dark

यूहन्ना १६

यीशु ने अपने शिष्यों के लिए एक सहायक भेजने का वायदा किया। यीशु की आत्मा उनके ह्रदय में आकर उसके राज्य के कार्य को करने के लिए उनकी अगुवाई करेगा और सामर्थ देगा।

यीशु ने कहा:
“’जब वह सहायक तुम्हारे पास आयेगा जिसे मैं परम पिता की ओर से भेजूँगा, वह मेरी ओर से साक्षी देगा। और तुम भी साक्षी दोगे क्योंकि तुम आदि से ही मेरे साथ रहे।'” यूहन्ना १५:२६

आत्मा के दूत इस श्रापित दुनिया में बनने का मतलब है कि उसका परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। अन्धकार के लोग और शैतानी ताक़तें ज्योति में चलने वाले लोगों के विरोध में खड़े होंगे। यीशु चाहता था कि उसके चेले तैयार रहें, वे समझ सकें कि यह सब क्या हो रहा है।

उसने कहा:
“’ये बातें मैंने इसलिये तुमसे कही हैं कि तुम्हारा विश्वास न डगमगा जाये। वे तुम्हें आराधनालयों से निकाल देंगे। वास्तव में वह समय आ रहा है जब तुम में से किसी को भी मार कर हर कोई सोचेगा कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है। वे ऐसा इसलिए करेंगे कि वे न तो परम पिता को जानते हैं और न ही मुझे। किन्तु मैंने तुमसे यह इसलिये कहा है ताकि जब उनका समय आये तो तुम्हें याद रहे कि मैंने उनके विषय में तुमको बता दिया था।'” यूहन्ना १६:१-४

चेलों के बारे में सोचिये जब वे यीशु को सुन रहे थे। जो बातें वह उन्हें बता रहा था वे उनसे बहुत भिन्न थीं जो होने वाली थीं। लगभग एक घंटे पहले, वे बहस कर रहे थे कि उनमें से कौन सबसे महान होगा। अब वे इस बात को सीख रहे थे कि भविष्य में उनके लिए कोई भी सम्मान और महिमा नहीं है। यीशु के वचन को फ़ैलाने वालों के लिए बहुत ही चुनौती भरा जीवन होगा जहां विरोध और कष्ट भी सहना होगा। पवित्रा आत्मा चेलों कि अगुवाई करेगा जब गवाही देने के लिए उन्हें सताया जाएगा और मृत्यु भी दी जाएगी।

जब चेलों ने यह समझा कि उनके स्वामी के पीछे चलने कि कीमत क्या होती है, वे यह भी समझ रहे थे कि चाहे वे उसे नहीं देख पाएंगे, उन्हें ऐसे ही उसके पीछे चलते रहना होगा।

यीशु ने कहा:
“‘किन्तु अब मैं उसके पास जा रहा हूँ जिसने मुझे भेजा है और तुममें से मुझ से कोई नहीं पूछेगा,‘तू कहाँ जा रहा है?’ क्योंकि मैंने तुम्हें ये बातें बता दी हैं, तुम्हारे हृदय शोक से भर गये हैं। किन्तु मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ इसमें तुम्हारा भला है कि मैं जा रहा हूँ। क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा। किन्तु यदि मैं चला जाता हूँ तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। और जब वह आयेगा तो पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में जगत के संदेह दूर करेगा। पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ में विश्वास नहीं रखते, धार्मिकता के विषय में इसलिये कि अब मैं परम पिता के पास जा रहा हूँ। और तुम मुझे अब और अधिक नहीं देखोगे। न्याय के विषय में इसलिये कि इस जगत के शासक को दोषी ठहराया जा चुका है।'” यूहन्ना १६:५-११

“’मुझे अभी तुमसे बहुत सी बातें कहनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसको प्रकट करेगा। वह मेरी महिमा करेगा क्योंकि जो मेरा है उसे लेकर वह तुम्हें बतायेगा। हर वस्तु जो पिता की है, वह मेरी है। इसीलिए मैंने कहा है कि जो कुछ मेरा है वह उसे लेगा और तुम्हें बतायेगा।'” यूहन्ना १६:१२-१५

“’कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नहीं देख पाओगे। और थोड़े समय बाद तुम मुझे फिर देखोगे’।’” यूहन्ना १६:१६

चेले नहीं समझ पाये कि यीशु क्या कह रहे हैं, सो वे आपस में चर्चा करने लगे।  तब यीशु ने कहा:

“’क्या तुम मैंने यह जो कहा है, उस पर आपस में सोच-विचार कर रहे हो,‘कुछ ही समय बाद तुम मुझे और अधिक नही देख पाओगे।’ और ‘फिर थोड़े समय बाद तुम मुझे देखोगे?’ मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, तुम विलाप करोगे और रोओगे किन्तु यह जगत प्रसन्न होगा। तुम्हें शोक होगा किन्तु तुम्हारा शोक आनन्द में बदल जायेगा। जब कोई स्त्री जनने लगती है, तब उसे पीड़ा होती है क्योंकि उसकी पीड़ा की घड़ी आ चुकी होती है। किन्तु जब वह बच्चा जन चुकी होती है तो इस आनन्द से कि एक व्यक्ति इस संसार में पैदा हुआ है वह आनन्दित होती है और अपनी पीड़ा को भूल जाती है। सो तुम सब भी इस समय वैसे ही दुःखी हो किन्तु मैं तुमसे फिर मिलूँगा और तुम्हारे हृदय आनन्दित होंगे। और तुम्हारे आनन्द को तुमसे कोई छीन नहीं सकेगा।  उस दिन तुम मुझसे कोई प्रश्न नहीं पूछोगे। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ मेरे नाम में परम पिता से तुम जो कुछ भी माँगोगे वह उसे तुम्हें देगा। अब तक मेरे नाम में तुमने कुछ नहीं माँगा है। माँगो, तुम पाओगे। ताकि तुम्हें भरपूर आनन्द हो।'” यूहन्ना १६:१९ब-२४

“’मैंने ये बातें तुम्हें दृष्टान्त देकर बतायी हैं। वह समय आ रहा है जब मैं तुमसे दृष्टान्त दे-देकर और अधिक समय बात नहीं करूँगा। बल्कि परम पिता के विषय में खोल कर तुम्हें बताऊँगा। उस दिन तुम मेरे नाम में माँगोगे और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम्हारी ओर से मैं परम पिता से प्रार्थना करूँगा। परम पिता स्वयं तुम्हें प्यार करता है क्योंकि तुमने मुझे प्यार किया है। और यह माना है कि मैं परम पिता से आया हूँ। मैं परम पिता से प्रकट हुआ और इस जगत में आया। और अब मैं इस जगत को छोड़कर परम पिता के पास जा रहा हूँ।’” यूहन्ना १६:२५-२८

इन शब्दों ने उन्हें प्रभावित किया। चेलों के दिमाग में कुछ आने लगा। उन्होंने कहा:
“’देख अब तू बिना किसी दृष्टान्त को खोल कर बता रहा है। अब हम समझ गये हैं कि तू सब कुछ जानता है। अब तुझे अपेक्षा नहीं है कि कोई तुझसे प्रश्न पूछे। इससे हमें यह विश्वास होता है कि तू परमेश्वर से प्रकट हुआ है।’”

अब वे समझ गए थे। परन्तु जो उन्हें वह कोई पद या अधिकार नहीं था। उन्हें अपनी सिद्धता या सिद्ध  नहीं प्राप्त हुई थी। उनके लिए महत्वपूर्ण यह था कि वे यीशु को पाएं। उस पर  सच्चाई से विश्वास करें। और वे जानते हैं कि उन्हें मिला क्यूंकि यीशु उनके साथ सहमत थे।

यीशु ने इस पर उनसे कहा,
“’क्या तुम्हें अब विश्वास हुआ है? सुनो, समय आ रहा है, बल्कि आ ही गया है जब तुम सब तितर-बितर हो जाओगे और तुम में से हर कोई अपने-अपने घर लौट जायेगा और मुझे अकेला छोड़ देगा किन्तु मैं अकेला नहीं हूँ क्योंकि मेरा परम पिता मेरे साथ है। मैंने ये बातें तुमसे इसलिये कहीं कि मेरे द्वारा तुम्हें शांति मिले। जगत में तुम्हें यातना मिली है किन्तु साहस रखो, मैंने जगत को जीत लिया है।’” यूहन्ना १६:३१-३३

कहानी १५६: विश्वासघात और इंकार 

मत्ती २६:२१-२४, मरकुस १४:१८-२१, लूका २२:२१-३४, यूहन्ना १३:१८-३८

Ultima cena

यीशु और उसके चेले फसह का भोज कर रहे थे। यीशु जानता था कि यह उसका अपने चेलों के साथ अंतिम भिज होगा। उन्होंने उसके साथ भीड़ में रहकर परिश्रम किया और अपने घरों को छोड़ कर पूरी भक्ति के साथ उसकी सेवा में लगे रहे। और फिर यीशु जानता था उनमें से एक है जो उसके साथ विश्वासघात करेगा और आगे भी करेगा। सो उसने अपने चेलों को उस आशीष के विषय में बताया जो उन्हें एक दुसरे के पाँव धोने से मिलेगी वहीं उसने उन्हें उस श्राप के बारे में बताय जो उनमें से एक को मिलेगा:

“‘मैं उन्हें जानता हूँ जिन्हें मैंने चुना है। किन्तु मैंने उसे इसलिये चुना है ताकि शास्त्र का यह वचन सत्य हो:
“वही जिसने मेरी रोटी खायी मेरे विरोध में हो गया।”
“‘अब यह घटित होने से पहले ही मैं तुम्हें इसलिये बता रहा हूँ कि जब यह घटित हो तब तुम विश्वास करो कि वह मैं हूँ।'”  यह कहने के बाद यीशु बहुत व्याकुल हुआ और साक्षी दी, “मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम में से एक मुझे धोखा देकर पकड़वायेगा।”

यीशु कि बात को सुनकर क्या यहूदा कांपा?  तब उसके शिष्य एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे। वे निश्चय ही नहीं कर पा रहे थे कि वह किसके बारे में कह रहा है। उन्होंने कहा,”प्रभु, निश्चय वो मैं तो नहीं!” वे मासूम थे, फिर भी वे भयभीत थे और उस पाप से डरते थे कि कहीं उनसे ना हो जाये। वे वफादार रहना चाहते थे। यीशु को कितना छुआ होगा। उस ऊपरी कमरे के बाहर वे शक्तिशाली लोग उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे। परन्तु ये चेले, चाहे कितने भी कमज़ोर क्यूँ ना थे, वे वफादार रहे। उनका प्रेम और विश्वास सच्चा था।                                                                                                                          तब यीशु ने उत्तर दिया,“’वही जो मेरे साथ एक थाली में खाता है मुझे धोखे से पकड़वायेगा। मनुष्य का पुत्र तो जायेगा ही, जैसा कि उसके बारे में शास्त्र में लिखा है। पर उस व्यक्ति को धिक्कार है जिस व्यक्ति के द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जा रहा है। उस व्यक्ति के लिये कितना अच्छा होता कि उसका जन्म ही न हुआ होता।’”

जब वे मेज़ पर बैठे हुए थे, यूहन्ना यीशु कि छाती पर टिका हुआ था। कितना महान था उनका प्रेम। उसका एक शिष्य यीशु के निकट ही बैठा हुआ था। इसे यीशु बहुत प्यार करता था। तब शमौन पतरस ने उसे इशारा किया कि पूछे वह कौन हो सकता है जिस के विषय में यीशु बता रहा था।  यीशु के प्रिय शिष्य ने सहज में ही उसकी छाती पर झुक कर उससे पूछा,“हे प्रभु, वह कौन है?”

यीशु ने उत्तर दिया,“’रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबो कर जिसे मैं दूँगा, वही वह है।” फिर यीशु ने रोटी का टुकड़ा कटोरे में डुबोया और उसे उठा कर शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा को दिया। जैसे ही यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया उसमें शैतान समा गया। फिर यीशु ने उससे कहा,“जो तू करने जा रहा है, उसे तुरन्त कर।”  इसलिए यहूदा ने रोटी का टुकड़ा लिया। और तत्काल चला गया। यह रात का समय था। किन्तु वहाँ बैठे हुओं में से किसी ने भी यह नहीं समझा कि यीशु ने उससे यह बात क्यों कही। कुछ ने सोचा कि रुपयों की थैली यहूदा के पास रहती है इसलिए यीशु उससे कह रहा है कि पर्व के लिये आवश्यक सामग्री मोल ले आओ या कह रहा है कि गरीबों को वह कुछ दे दे।

जब वे भोजन कर ही रहे थे, यीशु के चेले आपस में बहस कर रहे थे उनमें से कौन सबसे महान होगा। जब यीशु उन्हें परमेश्वर के राज्य में पैर धोने के विषय में बता रहा था, वे केवल यही सुन रहे थे कि एक राज्य आने वाला है। वे केवल यही जानना चाहते थे कि कौन सबसे महान और प्रभावशाली होगा। वे स्वयं के लिए पद ढूंढ रहे थे। वे फरीसियों और शास्त्रियों के समान व्यवहार कर रहे थे। एक तरीके से, वे यीशु के सन्देश को धोखा दे रहे थे। वे नहीं सुन रहे थे। उन्हें नहीं मालूम था कि आगे क्या होने जा रहा है। यीशु के उत्तर को सुनिये:

“गैर यहूदियों के राजा उन पर प्रभुत्व रखते हैं और वे जो उन पर अधिकार का प्रयोग करते हैं,‘स्वयं को लोगों का उपकारक’ कहलवाना चाहते हैं। किन्तु तुम वैसै नहीं हो बल्कि तुममें तो सबसे बड़ा सबसे छोटे जैसा होना चाहिये और जो प्रमुख है उसे सेवक के समान होना चाहिए। क्योंकि बड़ा कौन है: वह जो खाने की मेज़ पर बैठा है या वह जो उसे परोसता है? क्या वही नहीं जो मेज पर है किन्तु तुम्हारे बीच मैं वैसा हूँ जो परोसता है। किन्तु तुम वे हो जिन्होंने मेरी परिक्षाओं में मेरा साथ दिया है। और मैं तुम्हे वैसे ही एक राज्य दे रहा हूँ जैसे मेरे परम पिता ने इसे मुझे दिया था। ताकि मेरे राज्य में तुम मेरी मेज़ पर खाओ और पिओ और इस्राएल की बारहों जनजातियों का न्याय करते हुए सिंहासनों पर बैठो।'” –लूका २२:२५-३२

स्वर्ग राज्य में हर एक चेले को ना केवल सम्मानित भूमिका निभाने को मिलेगा, उन्हें परमेश्वर के राज्यों को न्याय करने का अधिकार दिया जाएगा। यीशु उन्हें अपने राजकीय अधिकार का एक हिस्सा भी देगा। यीशु एक नया राज्य स्थापित कर रहा था और ये चेले उसके अगुवे होंगे! परन्तु उन्हें उसे हासिल करने के लिए प्रतीक्षा करना होगा। वे उन्हें इस पृथ्वी पर रहते हुए मिलेंगे। उन्हें यीशु के उस अनंतकाल के राज्य कि ओर ताकना होगा।

यीशु उस दिन कि घोषणा के लिए अपने चेलों को तैयार कर रहा था।

“’मनुष्य का पुत्र अब महिमावान हुआ है। और उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है। यदि उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हुई है तो परमेश्वर अपने द्वारा उसे महिमावान करेगा। और वह उसे महिमा शीघ्र ही देगा।”
“’हे मेरे प्यारे बच्चों, मैं अब थोड़ी ही देर और तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे ढूँढोगे और जैसा कि मैंने यहूदी नेताओं से कहा था, तुम वहाँ नहीं आ सकते, जहाँ मैं जा रहा हूँ, वैसा ही अब मैं तुमसे कहता हूँ।
“’मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो। जैसा मैंने तुमसे प्यार किया है वैसे ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम करो। यदि तुम एक दूसरे से प्रेम रखोगे तभी हर कोई यह जान पायेगा कि तुम मेरे अनुयायी हो।’” –यूहन्ना १३:३१-३८

अब चेले परेशान हो गये। वह उन्हें क्यूँ छोड़ रहा था? शमौन पतरस ने उससे पूछा, “हे प्रभु, तू कहाँ जा रहा है?”

यीशु ने उसे उत्तर दिया, “तू अब मेरे पीछे नहीं आ सकता। पर तू बाद में मेरे पीछे आयेगा।”

फिर जो यीशु ने कहा उसे सुनकर पतरस बेचैन हो गया:

“’शमौन, हे शमौन, सुन, तुम सब को गेहूँ की तरह फटकने के लिए शैतान ने चुन लिया है। किन्तु मैंने तुम्हारे लिये प्रार्थना की है कि तुम्हारा विश्वास न डगमगाये और जब तू वापस आये तो तेरे बंधुओं की शक्ति बढ़े।’”

पतरस ने उससे पूछा, “’हे प्रभु, अभी भी मैं तेरे पीछे क्यों नहीं आ सकता? मैं तो तेरे लिये अपने प्राण तक त्याग दूँगा।’” और यह सच था। पतरस बहुत समय था इस पर विचार करने के लिए। धार्मिक अगुवों कि नफरत जितनी अधिक बढ़ती जा रही थी उतना ही यीशु के मित्र बनना खतरनाक होता जा रहा था। परन्तु यीशु पतरस को वो बातें बता रहा था जो वह अपने आप के विषय में नहीं जानता था।

पतरस अधिकतर बातें उसके स्वयं के विषय में थीं ना के यीशु के प्रति उसकी भक्ति की। अब शैतान उसके पीछे था, उस चेले को नाश करने के लिए जो उस दुष्ट के लिए एक खतरा बन चुका था। परन्तु यीशु शैतान के द्वारा पतरस के फटकनेको उसे शुद्ध करने के लिए उपयोग करेगा। यीशु ने कहा,“‘मैं तुझे सत्य कहता हूँ कि जब तक तू तीन बार इन्कार नहीं कर लेगा तब तक मुर्गा बाँग नहीं देगा।’”

जब समय आता, तब पतरस यीशु के लिए अपनी जान नहीं देने वाला था। वह अपनी जान उस घड़ी के लिए बचाना चाहता जब वह यीशु को पकड़वाएगा। यीशु निश्चित रूप से जानते थे कि पतरस क्या करने जा रहा है, और फिर भी यीशु उससे प्रेम करते रहे। क्यूंकि, पतरस का इंकार स्वयं यीशु के लिए नहीं था। वे पतरस के विषय में थे और वो काम जिसके लिए परमेश्वर उसे कलीसिया का चट्टान बनाने के लिए तैयार कर रहा था।

पतरस अपने ही विचार लगा रहा था कि कैसे यीशु कि सेवा करनी चाहिए। वह अपनी ही क़ाबलियत से प्रबावित था कि वह वफादार और दृढ़ रहेगा। परमेश्वर उससे उन सब बातों को छीन लेगा। एक बार जब पतरस इस भयंकर समय से निकल जाएगा, वह एक भीतरी ताक़त के साथ बाहर निकलेगा। इस अपमान और दुःख के बाद, पतरस परमेश्वर पर निर्भर करना सीख जाएगा।

यीशु जानता था कि पतरस उसका इंकार करेगा, परन्तु वह जानता था कि अंत में वह उसके पीछे चलता जाएगा। वह अपने जीवन भर परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को फैलाएगा, उसके लिए सताया जाएगा और यीशु के लिए जेल में भेजा जाएगा। और फिर एक दिन, वह यीशु के नाम के वास्ते मर जाएगा।

कहानी १४६: धिक्कार

Dirty dishes waiting for wash

मत्ती २३:१३-२७, मरकुस १२:४०, लूका २०:४७

यीशु मंदिर के आंगन में खड़ा था, वह पहले से ही इस्राएल के अगुवों के विरुद्ध अपनी अभियोग बातें करने लगा था। यहाँ परमेश्वर का पुत्र था, जो पवित्र देश के अगुवों के विरुद्ध फटकार रहा था। उन्होंने किस तरह लोगों को अपने प्रभाव से दुष्प्रयोग!

यीशु ने कहा कि जहाँ अपने अगुवों के कहने पर चलना ठीक है जो बाइबिल के आधार पर सिखाते हैं, वहीं उनके तौर तरीकों को इंकार करना है। परमेश्वर के सच्चे चेलों को विनम्र होना है, जो उन अगुवों के रहन सहन से बिल्कुल विपरीत था। अब यीशु फरीसियों और शास्त्रियों के विरुद्ध में सात अभिशाप घोषित करने जा रहा था, जो उनके सब धार्मिक छल को बेनकाब करने जा रहा था। फिर भी इन अभिशाप का बल केवल आरोपों से अधिक सामर्थी था। यीशु परमेश्वर के न्याय को इन लोगों पर ऐलान कर रहा था! यह उसका पहला अभिशाप था:
“’अरे कपटी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम लोगों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बंद करते हो। न तो तुम स्वयं उसमें प्रवेश करते हो और न ही उनको जाने देते हो जो प्रवेश के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।'”

आपको इसका अर्थ समझ में आया? ये परमेश्वर के पवित्र राष्ट्र के अगुवे थे! जब मसीह था तब इन्हें अपने राष्ट्र को पश्चाताप करवाना चाहिए था। उनके पास हज़ारों सालों का वचन था जो यीशु के ऊपर दर्शाता था, और उन्हें यह समझने में मदद करता कि यीशु ही स्वर्ग का राज्य है। ना केवल वे पश्चाताप करने में और यीशु कि आराधना करने में असफल रहे, उन्होंने दूसरों को मसीह से दूर करने कि पूरी कोशिश भी की! वे दरवाज़े पर रूकावट कि तरह खड़े रहे!

फिर उसने दूसरा अभिशाप सुनाया:
“’अरे कपटी धर्मशास्त्रियों और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम किसी को अपने पंथ में लाने के लिए धरती और समुद्र पार कर जाते हो। और जब वह तुम्हारे पंथ में आ जाता है तो तुम उसे अपने से भी दुगुना नरक का पात्र बना देते हो!'”

क्या आप मसीह के धार्मिक क्रोध को सुन सकते हैं? क्या आप उसके पवित्र क्रोध को समझ सकते हैं। यह वे लोग थे जिन्हें वो महान और कीमती वायदे दिए गए थे! केवल यही लोग थे जिन्हें सब लोगों में यह अवसर मिला था कि परमेश्वर के वचन को अपने पूरे जीवन भर सीख सकें! उन्होंने उसका उपयोग किया और अपने स्वार्थ के लिए अपने पद को अपमानित किया। वे परमेश्वर के इतने बुरे नमूने थे कि जिस किसी को भी वे शिक्षा देते थे वे भी उनके समान स्वार्थी हो जाते थे!

यीशु ने कहा:
“अरे अंधे रहनुमाओं! तुम्हें धिक्कार है जो कहते हो यदि कोई मन्दिर की सौगंध खाता है तो उसे उस शपथ को रखना आवश्यक नहीं है किन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की शपथ खाता है तो उसे उस शपथ का पालन आवश्यक है। अरे अंधे मूर्खो! बड़ा कौन है? मन्दिर का सोना या वह मन्दिर जिसने उस सोने को पवित्र बनाया।

“तुम यह भी कहते हो ‘यदि कोई वेदी की सौगंध खाता है तो कुछ नहीं,’ किन्तु यदि कोई वेदी पर रखे चढ़ावे की सौगंध खाता है तो वह अपनी सौगंध से बँधा है। अरे अंधो! कौन बड़ा है? वेदी पर रखा चढ़ावा या वह वेदी जिससे वह चढ़ावा पवित्र बनता है? इसलिये यदि कोई वेदी की शपथ लेता है तो वह वेदी के साथ वेदी पर जो रखा है, उस सब की भी शपथ लेता है। वह जो मन्दिर है, उसकी भी शपथ लेता है। वह मन्दिर के साथ जो मन्दिर के भीतर है, उसकी भी शपथ लेता है। और वह जो स्वर्ग की शपथ लेता है, वह परमेश्वर के सिंहासन के साथ जो उस सिंहासन पर विराजमान हैं उसकी भी शपथ लेता है।'”

यह तीसरा अभिशाप थोड़ा भ्रामक है। ये अभिशाप क्या थे जिससे कि यीशु इतना क्रोधित हुआ? फरीसियों और शास्त्रियों ने एक कानूनी प्रणाली वाचा के साथ बना लिया था। यदि कोई किसी वाचा के साथ वायदा देता है, तो वह कानूनी तौर पर बंध जाता है। परन्तु यदि वे शपथ में थोडा सा परिवर्तन करके के बोलते हैं तो वह बंधन नहीं है। किसी व्यक्ति को उसे पूरी तौर से मानना नहीं पड़ेगा!

उन लोगों के लिए कितना भ्रामक है जो पूरे नियमों को नहीं समझते हैं। वे धार्मिक अगुवे जो जानते थे कि क्या कहना है, वे लोगों को इस बात का विश्वास दिलाते थे कि वे ऐसे अनिवार्य वाचा बना रहे थे जिन्हें वे स्वयं भी मानने वाले नहीं थे। वे कह सकते थे,”मैं मंदिर कि कसम खाता हूँ”

इसके बजाय “मैं सोने कि कसम खाता हूँ” यह जानते हुए कि यह ज़यादा अनिवार्य है। उन्हें अपने वायदे रखने कि कोई आवश्यकता नहीं थी!

इससे लोगों में कितना अविश्वास फ़ैल गया था। उनके अपने ही अगुवे उन्हें हेरफेर करने के लिए उस शपथ को उपयोग कर रहे थे! मत्ती 5 में, यीशु ने कहा कि परमेश्वर के चेले जो उसकी उपस्थिति में रहते थे वे सच्चाई को स्पष्ट रूप से बताना चाहेंगे। जब उसने कहा,”हाँ”, इसका मतलब है “हाँ”

जब वह “ना” कहता है तो वह वास्तव में “ना” कह रहा है। लोगों के बीच कैसा बंधन बांध सकता है यदि वे इस बात को समझें कि जो कुछ दूसरा व्यक्ति कह रहा है वह सच है। उनके वायदों को रखने के लिए उन पर विश्वास किया जा सकता था। धार्मिक अगुवों को यही इस्राएल के देश को सिखाना चाहिए था। वे वायदों को रख सकते थे! धार्मिक अगुवे यही इस्राएल के राष्ट्र को सिखा रहे थे। यही संस्कृति है जिस के लिए उन्हें उन सब बातों के लिए लड़ना था जो वे कर रहे थे। स्वर्ग का राज्य ऐसा ही है!

यीशु ने कहा:
“’अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों और फरीसियों! तुम्हारा जो कुछ है, तुम उसका दसवाँ भाग, यहाँ तक कि अपने पुदीने, सौंफ और जीरे तक के दसवें भाग को परमेश्वर को देते हो। फिर भी तुम व्यवस्था की महत्वपूर्ण बातों यानी न्याय, दया और विश्वास का तिरस्कार करते हो। तुम्हें उन बातों की उपेक्षा किये बिना इनका पालन करना चाहिये था। ओ अंधे रहनुमाओं! तुम अपने पानी से मच्छर तो छानते हो पर ऊँट को निगल जाते हो।'”

यीशु ने जब चौथे अभिशाप कि घोषणा की, उसने धार्मिक अगुवों को अनाज्ञाकारिता के लिए फटकारा। यह सच है कि पुराने नियम के विधि के अनुसार उन्हें परमेश्वर को दसवां हिस्सा देना है। धार्मिक अगुवे अपनी वफादारी इतनी दिखाई कि उन्होंने अपने बगीचे के उत्पादन का भी दसवां दिया। परन्तु वे ऐसे जी रहे थे मानो उनके देश में दया और न्याय कि स्थापना कुछ नहीं होता है। शासन में रहने वाले अगुवे होनेसे , यह उनका काम था कि वे उनकी रक्षा करें जो दुराचार और अपमान के आलोचनीय हैं, लेकिन उन्होंने इंकार  कर दिया। वे धार्मिक सक्रियता को ऐसे मानते थे जैसे कि वह सबसे बड़े और महत्वपूर्ण बात हो, जब कि उस परमेश्वर कि बातों को अनदेखा करते थे जो न्याय और दया से प्रेम करता है। वे आज्ञाकारी नहीं थे और अन्याय और भ्रष्टाचार का पूरी तरह साथ देते थे!

फिर यीशु ने कहा:
“’अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम अपनी कटोरियाँ और थालियाँ बाहर से तो धोकर साफ करते हो पर उनके भीतर जो तुमने छल कपट या अपने लिये रियासत में पाया है, भरा है। अरे अंधे फरीसियों! पहले अपने प्याले को भीतर से माँजो ताकि भीतर के साथ वह बाहर से भी स्वच्छ हो जाये।'”

क्या आप पांचवे अभिशाप का अनुमान लगा सकते हैं? कप और बर्तन, फरीसियों और व्यवस्था के शिक्षकों के जीवन को दर्शाता है। वे इस बात से निश्चित थे कि उनका जीवन बाहर से  स्वच्छ है। लोगों के सामने वे जो कुछ भी करते थे वह पवित्र और धार्मिक दिखता था। परन्तु अपने ह्रदयों में वे लालची और स्वार्थी थे! उनके गंदे विचारों के कारण वे बहुत  ही गंदे थे। यीशु ने उन्हें स्वच्छ और अपने ह्रदयों को पवित्र करने कि आज्ञा दी। यदि जो कुछ भी वे अपने पवित्र परमेश्वर के लिए  भक्ति के साथ करते हैं तो उन्हें इस बात कि चिंता करने कि आवश्यकता नहीं कि वे बाहर से कैसे लगते हैं!

छटवा अभिशाप जो यीशु ने कहा वह बहुत कुछ मलिनतापूर्ण था। उसने कहा:
“’अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम लिपी-पुती समाधि के समान हो जो बाहर से तो सुंदर दिखती हैं किन्तु भीतर से मरे हुओं की हड्डियों और हर तरह की अपवित्रता से भरी होती हैं।'”

उन दिनों में, यहूदी लोग समाधी को सफेदी से साफ़ करते थे। समाधियों पर स्पष्ट रूप से निशाँ लगाते थे ताकि वहाँ से गुज़रने वाले लोग उसे छू कर अपने को भ्रष्ट ना कर दें। परमेश्वर के पवित्र व्यवस्था के अनुसार, वह उन्हें सात दिन के लिए अपवित्र कर देता है। यह परमेश्वर की एक विधि थी लोगों को बीमारियों और अप्रतिष्ठा से बचने की। चाहे ये समाधी जो सफ़ेदी करने से शुद्ध दिखती थीं वे फिर भी मरने वालों का स्थान था। लाश अंदर सड़ती थीं और केवल उनका कंकाल ही रह जाता था। इन धार्मिक अगुवों के ह्रदय ऐसे मृत्यु और सड़न से भरे हुए थे। वे शुद्ध और पवित्र दीखते थे, परन्तु वह केवल भीतर बिमारियों को छुपाने के लिए था।

क्या फरीसी और शास्त्री सुनेंगे? एक और अभिशाप बचा था। क्या वह सांतवा अभिशाप उन्हें पश्चाताप कराएगा?

कहनी १२४: गरीबो के प्रति रवैया

लूका १६:१-१३

यीशु अपने चेलों को शिक्षा दे रहे थे जब उन्होंने यह दृष्टान्त बताया:

“‘फिर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,“एक धनी पुरुष था। उसका एक प्रबन्धक था उस प्रबन्धक पर लांछन लगाया गया कि वह उसकी सम्पत्ति को नष्ट कर रहा है। सो उसने उसे बुलाया और कहा,‘तेरे विषय में मैं यह क्या सुन रहा हूँ? अपने प्रबन्ध का लेखा जोखा दे क्योंकि अब आगे तू प्रबन्धक नहीं रह सकता।

इस पर प्रबन्धक ने मन ही मन कहा,‘मेरा स्वामी मुझसे मेरा प्रबन्धक का काम छीन रहा है, सो अब मैं क्या करूँ? मुझमें अब इतनी शक्ति भी नहीं रही कि मैं खेतों में खुदाईगुड़ाई का काम तक कर सकूँ और माँगने में मुझे लाज आती है। ठीक, मुझे समझ गया कि मुझे क्या करना चाहिये, जिससे जब मैं प्रबन्धक के पद से हटा दिया जाऊँ तो लोग अपने घरों में मेरा स्वागत सत्कार करें।

सो उसने स्वामी के हर देनदार को बुलाया। पहले व्यक्ति से उसने पूछा,‘तुझे मेरे स्वामी का कितना देना है?’ उसने कहा,‘एक सौ माप जैतून का तेल।इस पर वह उससे बोला,‘यह ले अपनी बही और बैट कर जल्दी से इसे पचास कर दे।

फिर उसने दूसरे से कहा,‘और तुझ पर कितनी देनदारी है?’ उसने बताया, ‘एक सौ भार गेहूँ।वह उससे बोला, ‘यह ले अपनी बही और सौ का अस्सी कर दे।

इस पर उसके स्वामी ने उस बेईमान प्रबन्धक की प्रशंसा की क्योंकि उसने चतुराई से काम लिया था। सांसारिक व्यक्ति अपने जैसे व्यक्तियों से व्यवहार करने में आध्यात्मिक व्यक्तियों से अधिक चतुर है।

मैं तुमसे कहता हूँ सांसारिक धनसम्पत्ति से अपने लियेमित्रबनाओ। क्योंकि जब धनसम्पत्ति समाप्त हो जायेगी, वे अनन्त निवास में तुम्हारा स्वागत करेंगे। वे लोग जिन पर थोड़े से के लिये विश्वास किया जायेगा और इसी तरह जो थोड़े से के लिए बेईमान हो सकता है वह अधिक के लिए भी बेईमान होगा। इस प्रकार यदि तुम सांसारिक सम्पत्ति के लिये ही भरोसे योग्य नहीं रहे तो सच्चे धन के विषय में तुम पर कौन भरोसा करेगाजो किसी दूसरे का है, यदि तुम उसके लिये विश्वास के पात्र नहीं रहे, तो जो तुम्हारा है, उसे तुम्हें कौन देगा?

कोई भी दास दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से घृणा करेगा और दूसरे से प्रेम या वह एक के प्रति समर्पित रहेगा और दूसरे को तिरस्कार करेगा। तुम धन और परमेश्वर दोनों की उपासना एक साथ नहीं कर सकते।”  –लूका १६:१-१३

जब यीशु इन बातों को अपने चेलों से कह रहे थे, फरीसी भी सुन रहे थे। उन्हें अपने धन से प्रेम था, और जैसे कहानी खुलती जाती है, वे यीशु को घृणा कि दृष्टि से देखने लगे।

इस पर उसने उनसे कहा, 

“’तुम वो हो जो लोगों को यह जताना चाहते हो कि तुम बहुत अच्छे हो किन्तु परमेश्वर तुम्हारे मनों को जानता है। लोग जिसे बहुत मूल्यवान समझते हैं, परमेश्वर के लिए वह तुच्छ है।‘”

 फिर यीशु ने एक और दृष्टान्त बताया:

“’अब देखो, एक व्यक्ति था जो बहुत धनी था। वह बैंगनी रंग की उत्तम मलमल के वस्त्र पहनता था और हर दिन विलासिता के जीवन का आनन्द लेता था। वहीं लाजर नाम का एक दीन दुखी उसके द्वार पर पड़ा रहता था। उसका शरीर घावों से भरा हुआ था।उस धनी पुरुष की जूठन से ही वह अपना पेट भरने को तरसता रहता था। यहाँ तक कि कुत्ते भी आते और उसके घावों को चाट जाते।

और फिर ऐसा हुआ कि वह दीनहीन व्यक्ति मर गया। सो स्वर्गदूतों ने ले जाकर उसे इब्राहीम की गोद में बैठा दिया। फिर वह धनी पुरुष भी मर गया और उसे दफ़ना दिया गया। नरक में तड़पते हुए उसने जब आँखें उठा कर देखा तो इब्राहीम उसे बहुत दूर दिखाई दिया किन्तु उसने लाज़र को उसकी गोद में देखा। तब उसने पुकार कर कहा,‘पिता इब्राहीम, मुझ पर दया कर और लाजर को भेज कि वह पानी में अपनी उँगली डुबो कर मेरी जीभ ठंडी कर दे, क्योंकि मैं इस आग में तड़प रहा हूँ।

किन्तु इब्राहीम ने कहा,‘हे मेरे पुत्र, याद रख, तूने तेरे जीवन काल में अपनी अच्छी वस्तुएँ पा लीं जबकि लाज़र को बुरी वस्तुएँ ही मिलीं। सो अब वह यहाँ आनन्द भोग रहा है और तू यातना। और इस सब कुछ के अतिरिक्त हमारे और तुम्हारे बीच एक बड़ी खाई डाल दी गयी है ताकि यहाँ से यदि कोई तेरे पास जाना चाहे, वह जा सके और वहाँ से कोई यहाँ सके।

उस सेठ ने कहा,‘तो फिर हे पिता, मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि तू लाज़र को मेरे पिता के घर भेज दे,क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं, वह उन्हें चेतावनी देगा ताकि उन्हें तो इस यातना के स्थान पर आना पडे।’

किन्तु इब्राहीम ने कहा,‘उनके पास मूसा है और नबी हैं। उन्हें उनकी सुनने दे।

सेठ ने कहा, ‘नहीं, पिता इब्राहीम, यदि कोई मरे हुओं में से उनके पास जाये तो वे मन फिराएंगे।

“इब्राहीम ने उससे कहा,‘यदि वे मूसा और नबियों की नहीं सुनते तो, यदि कोई मरे हुओं में से उठकर उनके पास जाये तो भी वे नहीं मानेंगे।’”   – लूका १६:१९-३१

कहानी १०५: शास्त्रियों और फरीसियों का वही रवैया 

लूका ११:३७-५४

यीशु परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को सुनाने के लिए यहूदिया के क्षेत्र में जाते रहे। शास्त्री और फरीसी यीशु पर आरोप लगाते रहे कि वह शैतान कि ओर से आया है। उसके दुष्ट आत्माओं को निकालने और स्पष्ट रूप से संदेश को सीखाने के बावजूद उन लोगों ने पश्चाताप करने से इंकार कर दिया। फिर वह इसी आशा को लेकर कि एक दिन वे पश्चाताप करेंगे और उनमें से कुछ तो बच जाएंगे, उनके पीछे लगा रहा।

यीशु का धार्मिक नेताओं के साथ आमना सामना करने के बाद, एक फरीसी ने यीशु को अपने घर भोजन के लिए बुलाया। यीशु उसके साथ भोजन करने के लिए बैठ गया। उन दिनों में, मेज़ बहुत नीचे हुआ करती थीं, इसलिए भोजन करने वाले तकिया लगा कर फर्श पर बैठ सकते थे। वे तकियों पर आधे बैठे हुए और आधे लेटे हुए आपस में बात चीत कर सकते थे।

जब फरीसी ने यीशु को मेज़ पर झुके देखा तो वह चकित हो गया। फरीसी भोजन करने से पहले पूरे धार्मिक क्रिया को करते थे। यीशु ने इसे पूरी तरह से छोड़ दिया था। फरीसियों ने इन धार्मिक क्रियाओं को और जोड़ कर नए नियम बना दिए थे। परमेश्वर के वास्तविक व्यवस्था में इनकी ज़रुरत नहीं थी, लेकिन धार्मिक अगुवों का दबाव बहुत शक्तिशाली था। जो कोई भी इन्हें नहीं मानता था, तो दुसरे उसका न्याय करके अपने आप को ऊंच समझ कर प्रसन्न होते थे। एक समूह होते हुए, फरीसी लोग आम लोगों को नीचा देखते थे जो उन नियमों को उनकी तरह प्रवीणता से नहीं मान पाते थे। जो उनके नियमों का पालन नहीं करते थे उनसे प्रेम करने के बजाय फरीसी लोग उनका तिरस्कार करते थे और वे इसे सही मानते थे।

यीशु इन धार्मिक तीव्रता में अपने आप को झूठे प्रदर्शनों में खींचने वाला नहीं था। उसकी वफादारी केवल परमेश्वर पिता और उसके वचन कि ओर थी। इस पर प्रभु ने उनसे कहा,
“’अब देखो तुम फ़रीसी थाली और कटोरी को बस बाहर से तो माँजते हो पर भीतर से तुम लोग लालच और दुष्टता से भरे हो। अरे मूर्ख लोगों! क्या जिसने बाहरी भाग को बनाया, वही भीतरी भाग को भी नहीं बनाता? इसलिए जो कुछ भीतर है, उसे दीनों को दे दे। फिर तेरे लिए सब कुछ पवित्र हो जायेगा।'” क्या आपने इसे समझा?

परन्तु यीशु ने अभी समाप्त नहीं किया था।  उसे फरीसियों और कुछ भी कहना था। उसने उन्हें छे चेतावनियां दीं। जब आप इसे पढ़ते हैं तो इन्हें गिनिएगा। फिर देखिये कि आप इन्हें समझ पाते हैं:

“’ओ फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है क्योंकि तुम अपने पुदीने और सुदाब बूटी और हर किसी जड़ी बूटी का दसवाँ हिस्सा तो अर्पित करते हो किन्तु परमेश्वर के लिये प्रेम और न्याय की उपेक्षा करते हो। किन्तु इन बातों को तुम्हें उन बातों की उपेक्षा किये बिना करना चाहिये था।

“ओ फरीसियों, तुम्हें धिक्कार है! क्योंकि तुम यहूदी आराधनालयों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आसन चाहते हो और बाज़ारों में सम्मानपूर्ण नमस्कार लेना तुम्हें भाता है।तुम्हें धिक्कार है क्योंकि तुम बिना किसी पहचान की उन कब्रों के समान हो जिन पर लोग अनजाने ही चलते हैं।'”

यीशु जब फरीसि के घर में इन बातों को कह रहा था, धार्मिक नेता अधिक से अधिक असहज हो रहे थे। यह सीधे उनके जीवन के लिए चुनौती था। यदि वे यीशु को परमेश्वर का पुत्र मान लेते, तो वे इन वचनों के द्वारा नम्र हो जाते। परमेश्वर कि ओर उनके ह्रदय में गहराई से कार्य होता। वह उन्हें विनम बनाता और और अपने रास्तों सिद्ध कर लेते। लेकिन उनकी प्राथमिक भक्ति यीशु या बाइबिल के परमेश्वर के प्रति नहीं थी। उनका पहला प्रेम उनके पद कि शक्ति और उनके स्वयं कि शान। यीशु के प्रति आज्ञाकारी होने का मतलब था अपने उन सब चीज़ों से हाथ धो बैठना जो उनके लिए बहुमूल्य थीं। उन्हें इसके साथ संघर्ष करना था।

तब एक न्यायशास्त्री ने यीशु से कहा,“गुरु, जब तू ऐसी बातें कहता है तो हमारा भी अपमान करता है।”

यह कितना दिलचस्प था कि ये लोग यीशु के ईमानदार शब्दों द्वारा अपमानित हुए। ये लोग जो यहूदी राष्ट्र को दमनकारी कानूनों के साथ चला रहे थे, वे चाहते थे कि सब उनके बनाय हुए नियमों का पालन करें। उनकी हेकड़ी और प्रकल्पना इतनी बढ़ गयी थी, कि जब स्वयं परमेश्वर ने उन्हें बताया कि वे गलत हैं, उसे धार्मिक अनुशासन समझने के बजाय अपमानित मान रहे थे।

यीशु ऐसे छोड़ने वाला नहीं था। उसने आगे कहा:

इस पर यीशु ने कहा,
“’ओ न्यायशास्त्रियों! तुम्हें धिक्कार है। क्योंकि तुम लोगों पर ऐसे बोझ लादते हो जिन्हें उठाना कठिन है। और तुम स्वयं उन बोझों को एक उँगली तक से छूना भर नहीं चाहते। तुम्हें धिक्कार है क्योंकि तुम नबियों के लिये कब्रें बनाते हो जबकि वे तुम्हारे पूर्वज ही थे जिन्होंने उनकी हत्या की। इससे तुम यह दिखाते हो कि तुम अपने पूर्वजों के उन कामों का समर्थन करते हो। क्योंकि उन्होंने तो उन्हें मारा और तुमने उनकी कब्रें बनाईं। इसलिए परमेश्वर के ज्ञान ने भी कहा,‘मैं नबियों और प्रेरितों को भी उनके पास भेजूँगा। फिर कुछ को तो वे मार डालेंगे और कुछ को यातनाएँ देंगे।’

“इसलिए संसार के प्रारम्भ से जितने भी नबियों का खून बहाया गया है, उसका हिसाब इस पीढ़ी के लोगों से चुकता किया जायेगा। यानी हाबिल की हत्या से लेकर जकरयाह की हत्या तक का हिसाब, जो परमेश्वर के मन्दिर और वेदी के बीच की गयी थीं। हाँ, मैं तुमसे कहता हूँ इस पीढ़ी के लोगों को इसके लिए लेखा जोखा देना ही होगा।

“हे न्यायशास्त्रियों, तुम्हें धिक्कार है, क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले तो ली है। पर उसमें न तो तुमने खुद प्रवेश किया और जो प्रवेश करने का जतन कर रहे थे उनको भी तुमने बाधा पहुँचाई।”

और फिर जब यीशु वहाँ से चला गया तो वे धर्मशास्त्री और फ़रीसी उससे घोर शत्रुता रखने लगे। बहुत सी बातों के बारे में वे उससे तीखे प्रश्न पूछने लगे।'”                                                                             –लूका ११:४६-५३

क्या आपने इसे समझा? फरीसी और शास्त्रियों ने सारी ज़िन्दगी परमेश्वर की व्यवस्था को पढ़ा है। वे इस बात से निश्चिन्त थे कि वे भी उन सभी अच्छे लोगों कि तरह हैं जिनका बाइबिल में वर्णन है जैसे कि मूसा जिसने कि इस्राएली लोगों को व्यवस्था दी। परन्तु यीशु ने कहा कि ये अगुवे गलत थे। परमेश्वर कि कहानी में, वे लोग धार्मिक सेवकों कि तरफ थे जिन्होंने उसके पवित्र राष्ट्र को परमेश्वर के वचन दिया। वे उनकी तरफ थे जिन्होंने उनको सताया था! वे उन लोगों कि तरह थे जिन्होंने मूसा के जीवन को जंगल में कठिन बना दिया था। वे उन दुष्ट राजाओं के समान थे जिन्होंने नबियों को मरवा दिया था! वे उन नबियों के सम्मान को अपने लिए चाहते थे जो परमेश्वर ने नबियों के लिए ठहराया था, और उनकी कब्रें बनवा कर राष्ट्र के साधारण लोगों से अपनी महिमा और सम्मान लिया। उन्होंने लोगों को परमेश्वर कि ओर नहीं खींचा बल्कि उनका रास्ता बंद कर दिया। और अब, जब जीवित परमेश्वर का बेटा उनके राष्ट्र में आया, उन्होंने भ्रम और शक पैदा कर दिया। मसीहा आ गया था, और उसके सबसे बड़े विरोधी ये ही लोग थे जिनको उसका आदर सत्कार करना था और परमेश्वर के लोगों को सुसमाचार बताना था!

सो यीशु ने एक अंतिम चेतावनी दी:

“’हे न्यायशास्त्रियों, तुम्हें धिक्कार है, क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले तो ली है। पर उसमें न तो तुमने खुद प्रवेश किया और जो प्रवेश करने का जतन कर रहे थे उनको भी तुमने बाधा पहुँचाई।’”

यीशु ने जब परमेश्वर के राज्य का प्रचार किया, तो उसका प्रभाव धार्मिक नेताओं पर नहीं पड़ा। यदि उनके ह्रदय परमेश्वर कि आत्मा को किसी भी रीति से सुनते होते तो वे इससे बहतर जान पाते। वे परमेश्वर कि महिमा नहीं करना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों के रास्ता में बाधा बन रहे थे जो परमेश्वर कि अच्छाई और सुंदरता को समझ रहे थे। वे अपनी अधार्मिकता से परमेश्वर के लोगों में ज़हर घोल रहे थे, और यीशु उनके राह में सच्चाई कि शक्ति को लेकर खड़ा था। क्या वो परमेश्वर के वचन से उनके ह्रदयों को नम्र बनाने देगा? क्या वे इन चुनौतियों को सुनेंगे और अपने पापों का दुःख मनायेंगे?

बाइबिल कहती है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। यीशु कि डाट ने उन्हें उसे लोगों के सामने और अधिक तिरस्कार करने को मजबूर कर दिया। गुप्त स्थानों में, उसके खिलाफ वे यह साजिश करने लगे कि कैसे उसे उसकी कही हुई बातों के लिए जो उसने उनके विरुद्ध में बोलीं, उसे मरवा दिया जाए। अपने पद कि शक्ति को बचने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे। सो उन्होंने उसे फ़साने के लिए ऐसे सवाल तैयार किये जिससे कि वे उसे झूठा बना सकें। फिर वे उसे पूरे राष्ट्र के सामने बदनाम कर उसकी सेवकाई को नष्ट कर देंगे।

अद्भुद बात यह है कि वे ऐसा कुछ भी नहीं कर सके! उन घंटों कि कल्पना कीजिये जो यीशु ने लोगों के साथ बीताय। कितना कुछ उसने उन्हें सिखाया था। जो भी वचन यीशु कहता था वे परमेश्वर कि ओर से होता था, और जो कुछ भी वह करता था वो पवित्र आत्मा कि सामर्थ के द्वारा होता था। जो कुछ भी उसने किया वह परमेश्वर कि धार्मिकता को  आदर देता था, और इसलिए बाइबिल को भी पूर्णरूप से आदर मिला!

कहानी ९६: स्वर्ग के राज्य में बड़ा कौन 

मत्ती १८:१-१४, मरकुस ९ ३३-५०, लूका ९:४६-५०

एक बार यीशु के शिष्यों के बीच इस बात पर विवाद छिड़ा कि उनमें सबसे बड़ा कौन है। वे आपस में बहस कर रहे थे कि परमेश्वर के राज्य में कौन सबसे बड़ा होगा। यहूदी संस्कृति में, पद और हैसियत बहुत ज़रूरी थे। समाज में सब अपने पद को जानते थे। वे जानते थे कि किसका आदर करना है, और वे यह भी जानते थे कि किसके साथ रहने से अनादर होता है। यीशु उन सभी कठोर सामाजिक नियमों को तोड़ रहे थे, जिसका यह कारण था कि सब उससे बेहद नाराज़ थे। वह खुद एक बढ़ई था और उसके मित्र मछुए और कर लेने वाले थे। यीशु कि सेवकाई गरीबों, टूटे मन वालों, और बीमारी से पीड़ित लोगों में थी। यीशु ने उन्हें उसके ध्यान और देख भाल का सम्मान दिखाया।

यीशु के अद्भुद चमत्कारों के चिन्ह यह दर्शा रहे थे कि वह परमेश्वर से महान आदर और सामर्थ पा रहा है। फिर भी यही यीशु ने सदूसियों और फरीसियों के नियमों को अस्वीकार किया। उसे इस बात कि पर्व नहीं थी कि वे उसकी सेवकाई को पसंद करते हैं या नहीं। उसे ऐसा लगता था कि उसे बताना चाहिए कि कब वे सही हैं और कब नहीं!

धार्मिक अगुवे इसके आदि नहीं थे। वे अपने राष्ट्र में कठोर आदर और महिमा के स्थानों को हासिल करने के आदि थे।उनके ह्रदय पुराने नियम के परमेश्वर कि और निष्ठावान नहीं थे, बल्कि अपने पद के। यीशु उनके लिए कितना दरोध दिलाने वाला था। उसे उनके पद या शक्ति का कोई सम्मान नहीं था, और इस तरह बोलता था जिससे कि इस्राइल के लोगों में उनके नेतृत्व का अपमान हो। सच्चाई कड़वी लगती थी।

चेलों ने अपनी सारी ज़िन्दगी यहूदी समाज में, इसलिए यह स्वाभाविक था कि वे अपने देश के अगुवों के दिखाए रास्ते में वापस जा सकते थे। राज्य के जीवन के बारे में चर्चा कर रहे थे, वे यह जानना चाहते थे कि किसे इज़ज़त और प्रतिष्ठा मिलेगी। क्या वह पतरस हो सकता है जिसने कि यीशु के सबसे चुनौतीभरे सवालों का उत्तर दिया था? यीशु ने कहा था कि वह उसके ऊपर अपनी कलीसिया बनाएगा। या वे पतरस और याकूब और यूहन्ना हैं जिन्हें पहाड़ पर यीशु के साथ निमंत्रण मिला था? उस राज्य में जिसे यीशु लाने वाला था कौन सा चेला सबसे महान होगा? जब वे येरूशलेम को जा रहे थे, कि अपेक्षा थी कि कुछ महान होने जा रहा है। मसीहा क्या करने जा रहा था? और किसे वह इज़ज़त देने जा रहा था?

जन वे कफरनहूम को घर में इकट्ठे आये, तब यीशु ने उनसे पूछा कि रास्ते में किस बात पर सोच विचार कर रहे थे,पर वे चुप रहे। लेकिन यीशु जानता था कि वे क्या सोच रहे हैं। तब यीशु ने एक बच्चे को अपने पास बुलाया और उसे उनके सामने खड़ा करके कहा,“’मैं तुमसे सत्य कहता हूँ जब तक कि तुम लोग बदलोगे नहीं और बच्चों के समान नहीं बन जाओगे, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकोगे। इसलिये अपने आपको जो कोई इस बच्चे के समान नम्र बनाता है, वही स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है। और जो कोई ऐसे बालक जैसे व्यक्ति को मेरे नाम में स्वीकार करता है वह मुझे स्वीकार करता है।'”

यीशु का क्या मतलब था जब उन्होंने कहा कि बच्चे के समान होना है? क्या उन्हें वापस उसी उम्र में चले जाना चाहिए? क्या उन्हें सिकुड़ कर छोटे लोग बन जाना चाहिए? नहीं, लेकिन उन्हें परमेश्वर के पास उसी स्वभाव के साथ आना चाहिए जो एक छोटे बच्चे का होता है? जैसे जैसे लोग बढ़ते हैं, वे नयी बातें सीखते हैं। कभी उन्हें लगता है कि वे सब कुछ जानते हैं। कभी कभी, जीवन के क्लेश और मुसीबतें उन्हें कठोर और कुटील बना देते हैं। परन्तु परमेश्वर पवित्र, उज्जवल और अच्छा है। वह सम्पूर्ण भरोसे के योग्य है। यहाँ तक वह व्यक्ति जो जीवन में बहुत दुखित रहा हो वह भी यीशु के पास आकर उसके अद्भुद चंगाई को ले सकता है। और सबसे शिक्षित और गुणी व्यक्ति को भी आवश्यकता है कि वह भी परमेश्वर के पास पूरे नम्रता और उम्मीद और भरोसे के साथ उस परमेश्वर के पास आए जो सब कुछ कर सकता है और सब जानता है। आपस में पद के लिए लड़ना और एक दुसरे के विरुद्ध में खड़े होना और यह देखना कि कौन सबसे महान है, यीशु चाहते थे उनके चेले परमेश्वर के सामने पवित्रता में आयें और उसे महिमा दें!

यूहन्ना ने यीशु से कहा,“हे गुरु, हमने किसी को तेरे नाम से दुष्टात्माएँ बाहर निकालते देखा है। हमने उसे रोकना चाहा क्योंकि वह हममें से कोई नहीं था।”

यीशु ने उससे कहा,“’उसे रोको मत। क्योंकि जो कोई मेरे नाम से आश्चर्य कर्म करता है, वह तुरंत बाद मेरे लिए बुरी बातें नहीं कह पायेगा।वह जो हमारे विरोध में नहीं है हमारे पक्ष में है।  जो इसलिये तुम्हें एक कटोरा पानी पिलाता है कि तुम मसीह के हो, मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, उसे इसका प्रतिफल मिले बिना नहीं रहेगा।'”

आप देख सकते हैं कि यह यीशु के लिए कितना महत्वपूर्ण था कि परमेश्वर के राज्य के लोग राज्य के हर एक सदस्य कि प्यार से देख भाल करें ?
“’और जो कोई इन नन्हे अबोध बच्चों में से किसी को, जो मुझमें विश्वास रखते हैं, पाप के मार्ग पर ले जाता है, तो उसके लिये अच्छा है कि उसकी गर्दन में एक चक्की का पाट बाँध कर उसे समुद्र में फेंक दिया जाये।'”

चक्की का पाट एक बहुत बड़ा पत्थर होता है जिसे गोल कर के अनाज के ऊपर लुड़काया जाता है। इसे खेत में अनाज को पीसने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, और फसल को बेचने के लिए तैयार करते हैं। यदि किसी के गर्दन पर इस चक्की के पाट को बाँध दिया जाता है, और उसे समुन्द्र में फेंक दिया जाता है, वे तुरंत डूब जाएंगे और फिर कभी वापस ऊपर नहीं आ पाएंगे। यह एक बहुत गम्भीर सज़ा है। क्या आप सोचते हैं कि यीशु ऐसा करना चाहता था? नहीं, वह इसे एक छवि कि तरह इस्तेमाल कर रहा था यह दर्शाने को, कि परमेश्वर का क्रोध उन लोगों के विरुद्ध कितना गम्भीर है जो छोटे बच्चों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। यह बहुत ही भयानक अन्याय है, लेकिन इस दुनिया में, प्रभावशाली लोग यह भूल जाते हैं क्यूंकि उन्हें कोई सज़ा नहीं दे सकता। लेकिन परमेश्वर देगा। यह छोटे बच्चे कौन हैं? क्या वे बच्चे हैं? या आपको लगता है कि यह परमेश्वर के बच्चे हैं, चाहे उनकी कोई भी उम्र हो या कितने भी धनवान या प्रभावशाली हों?

यीशु अपने चेलों को समझाना चाहता था कि सब परमेश्वर कि नज़र में मूल्यवां हैं। चाहे किसी के पास कितनी भी सामर्थ या प्रतिष्ठा हो, उनके पास कोई अधिकार नहीं है कि वे किसी भी छोटे बच्चे को चोट पहुँचाएँ। और यदि वे ऐसा करते हैं, तो उनके लिए खतरे कि बात है क्यूंकि परमेश्वर सब देखता रहता है।